
पर्यावरण और पारिस्थितिकी संरक्षण में अहम योगदान देने वाले माधव धनंजय गाडगिल (Madhav Gadgil, environmentalist) विगत 7 जनवरी को इस संसार से विदा हो गए।
24 मई 1942 को पुणे में जन्मे माधव गाडगिल ने फर्ग्यूसन कॉलेज, पुणे से जीव विज्ञान में स्नातक और मुंबई युनिवर्सिटी से प्राणि विज्ञान में स्नातकोत्तर किया। आगे की पढ़ाई के लिए वे हारवर्ड युनिवर्सिटी (Harvard University) गए।
भारत लौटकर वे पुणे स्थित आगरकर शोध संस्थान से जुड़ गए। इसके बाद वे बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट आफ साइंस से जुड़े, जहां उन्होंने पारिस्थितिक विज्ञान केंद्र (Indian Institute of Science, ecological sciences) की स्थापना में अहम भूमिका निभाई जो भारत में आधुनिक पारिस्थितिकी अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
भारत की पारिस्थितिकी के संरक्षण (ecological conservation) में उनका अतुलनीय योगदान रहा। नीलगिरी पर्वतों को जैवमंडलीय संरक्षित क्षेत्र का दर्जा दिलाने से लेकर गाडगिल आयोग (Gadgil Committee, Western Ghats ecology) के तहत पश्चिमी घाट को इकॉलॉजिकली सेंसिटिव एरिया घोषित किए जाने तक उनका योगदान रहा। जैव विविधता अधिनियम, 2002 के निर्माण में उनकी अहम भूमिका रही। उन्होंने सदैव संरक्षण के प्रयासों में ज़मीन से जुड़े समुदायों को शामिल रखने की पैरवी की और इस शामिलियत के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने नेशनल बायोडायवर्सिटी अथॉरिटी के लिए पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर का मैनुअल तैयार किया, जिसकी मदद से कोई भी जैव विविधता और उससे जुड़े ज्ञान का दस्तावेज़ीकरण कर सकता है। वे वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन में भी शामिल रहे और प्रधानमंत्री की विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सलाहकार परिषद के सदस्य (science policy advisor) भी रहे।
पर्यावरण व इकॉलॉजी के क्षेत्र में अहम योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण (Padma Bhushan awards), चैम्पियन ऑफ दी अर्थ, शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार वगैरह से नवाज़ा गया।
अपने जीवन काल में उन्होंने कई महत्वपूर्ण शोधकार्य (scientific research) किए। उनके द्वारा 250 से अधिक वैज्ञानिक शोधपत्र प्रकाशित हैं। उनका मानना था कि जन चेतना के लिए विज्ञान आम लोगों की भाषा में होना चाहिए। उनकी यह सोच उनके लेखन और सार्वजनिक व्याख्यानों में भी झलकती है। उन्होंने अंग्रज़ी, मराठी, हिंदी और अन्य भाषाओं में कई किताबें (popular science books) लिखीं। उनकी कुछ उल्लेखनीय किताबें हैं ‘A Walk Up the Hill: Living with People and Nature’, ‘Ecology and Equity: The Use and Abuse of Nature in Contemporary India’, ‘यह दरकती ज़मीन’, ‘जीवन की बहार’ आदि। उनके सरल-सहज व्याख्यान और चर्चाएं (public lectures, educational videos) यू-ट्यूब पर उपलब्ध हैं।
वे हमारे बीच अब नहीं रहे लेकिन उनके कार्य, विचार और लेखन सदैव हमारे साथ रहेंगे। और, उनके द्वारा तैयार शोधार्थियों, विद्यार्थियों और प्रेरित युवाओं के ज़रिए उनका कार्य जारी रहेगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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