कीटनाशकों का उपयोग मछलियों की उम्र घटा रहा है

साइंस पत्रिका (Science journal) में प्रकाशित हालिया शोध पत्र से पता चला है कि फसलों में इस्तेमाल होने वाला क्लोरपायरीफॉस नामक कीटनाशक (chlorpyrifos pesticide) मछलियों की कोशिकाओं को तेज़ी से बूढ़ा बना रहा है। इससे समय से पहले उनकी मृत्यु हो जाती है।

गौरतलब है कि क्लोरपायरीफॉस मनुष्यों, खासकर बच्चों, के तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। इस कारण युरोपियन यूनियन और यूएस के कई राज्यों में यह प्रतिबंधित (European Union ban)  है, जबकि कई देशों में इसका अब भी इस्तेमाल जारी है। आम तौर पर इसका उपयोग सेब, संतरा और गेहूं जैसी फसलों पर किया जाता है। बारिश के बाद यह रसायन बहकर नदियों और झीलों में पहुंच जाता है।

इसके दीर्घावधि असर को समझने के लिए वैज्ञानिक चुनशेंग लियू की टीम ने मीठे पानी की मछली (freshwater fish study) पर अध्ययन किया। चार वर्षों तक उन्होंने चीन के हुबेई प्रांत की तीन बड़ी झीलों से 24 हज़ार से अधिक मछलियां इकट्ठा कीं। इनमें से दो झीलों में सालों से खेती से प्रदूषित पानी आ रहा था, जबकि एक झील अपेक्षाकृत साफ थी।

उन्होंने पाया कि प्रदूषित झीलों में बड़ी और उम्रदराज मछलियां की संख्या काफी कम थी। तीन साल से अधिक उम्र की मछलियों की संख्या लगभग 96 प्रतिशत तक घट चुकी थी। यह भी दिखा कि जिन वर्षों में मछलियों के शरीर में क्लोरपायरीफॉस की मात्रा अधिक थी, उन वर्षों में बूढ़ी मछलियां सबसे कम मिलीं (fish population decline)।

जांच करने पर वैज्ञानिकों को प्रदूषित झीलों की मछलियों की कोशिकाओं में भारी मात्रा में लिपोफुसिन (lipofuscin accumulation) नाम का अपशिष्ट मिला, जो आम तौर पर उम्र बढ़ाने का काम करता है। इससे भी अधिक चिंता की बात टेलोमेयर में आए बदलाव (telomere shortening) थे। टेलोमेयर डीएनए के सिरों पर मौजूद सुरक्षा कवच होते हैं, जो उम्र के साथ धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं। जिन मछलियों पर क्लोरपायरीफॉस का असर पड़ा था, उनके टेलोमेयर सामान्य से कहीं ज़्यादा छोटे पाए गए। इनके छोटे हो जाने का मतलब है बीमारी और जल्दी मौत का खतरा। इससे साफ संकेत मिला कि यह कीटनाशक मछलियों की कोशिकाओं को तेज़ी से बूढ़ा कर रहा है।

पुष्टि के लिए प्रयोगशाला में भी परीक्षण (laboratory experiment) किया गया। मछलियों को बहुत ही कम मात्रा में क्लोरपायरीफॉस दिया गया – उतना ही जितना झीलों के पानी में था। चार महीने बाद साफ पानी में रखी सभी मछलियां ज़िंदा रहीं, लेकिन जिन टैंकों में कीटनाशक था, वहां बूढ़ी मछलियों में से लगभग आधी मर गईं और उनके टेलोमेयर लगभग एक-तिहाई तक छोटे हो चुके थे।

अध्ययन से स्पष्ट है कि रासायनिक प्रदूषण (chemical pollution) न केवल ज़हरीला होता है बल्कि जीवों को जल्दी बूढ़ा भी करता है। हालांकि अभी इंसानों पर इसके सीधे असर (human health impact) को लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक चेताते हैं कि ऐसी ही जैविक प्रक्रियाएं इंसानों में भी होती हैं।

यदि कीटनाशकों का इस्तेमाल ऐसे ही चलता रहा, तो रसायन चुपचाप पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem damage) को बदल देंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.z7q96j3/full/_20260115_on_pesticides.jpg

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