
वैश्विक कोविड-19 टीकाकरण (COVID-19 vaccination) के दौरान वैज्ञानिकों ने एस्ट्राज़ेनेका (AstraZeneca vaccine) और जॉनसन एंड जॉनसन द्वारा विकसित टीका लेने वाले कुछ लोगों में एक गंभीर दुष्प्रभाव पाया, हालांकि यह दुष्प्रभाव दुर्लभ है। इन लोगों में असामान्य तरीके से खून के थक्के बने और प्लेटलेट्स की संख्या घट गई थी। शोधकर्ताओं ने अब इस बीमारी के के लिए ज़िम्मेदार जैविक प्रक्रिया को समझ लिया है।
VITT यानी वैक्सीन इंड्यूस्ड इम्यून थ्रम्बोसायटोपीनिया एंड थ्रम्बोसिस) की स्थिति अमेरिका में जॉनसन एंड जॉनसन टीका लेने वाले लगभग 2 लाख में से 1 व्यक्ति और ब्रिटेन में एस्ट्राज़ेनेका टीका लेने वाले लगभग 1 लाख में से 3 व्यक्तियों में देखी गई थी। दोनों टीकों को बनाने में एडेनोवायरस (adenovirus vector vaccine) के परिवर्तित रूप का उपयोग किया गया था। हालांकि इन टीकों ने लाखों लोगों की जान बचाई, फिर भी VITT के चंद मामलों के बाद कुछ देशों ने अपनी टीका नीति बदल (vaccine policy change) ली। उदाहरण के तौर पर, 2021 में ब्रिटेन ने 40 साल से कम उम्र के लोगों को ऐसा दूसरा टीका लेने की सलाह दी, जिनमें खून के थक्के बनने का जोखिम नहीं था।
गौरतलब है कि 2021 में वैज्ञानिकों ने पाया था कि VITT से प्रभावित लोगों के शरीर में PF4 (Platelet Factor 4)नामक एक प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी बन रही थीं, जो खून के थक्के बनने में भूमिका निभाता है। लेकिन यह साफ नहीं था कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अचानक इस प्रोटीन पर हमला क्यों करने लगी (autoimmune reaction)।
हाल ही में न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन (New England Journal of Medicine study) में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इसका कारण बताया है। जब एक विशेष जीन संस्करण वाले लोग एडेनोवायरस का सामना करते हैं, तो उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली आम तौर पर pVII नामक वायरल प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी बनाती है। ज़्यादातर लोगों में यह प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित और हानिरहित होती है। लेकिन थोड़े-से लोगों में एक छोटा-सा जेनेटिक बदलाव (genetic mutation) इन एंटीबॉडीज़ की बनावट बदल देता है। इसमें सिर्फ एक अमीनो अम्ल का परिवर्तन होता है, जिसके कारण एंटीबॉडी pVII की बजाय PF4 प्रोटीन से चिपकने लगती है। यदि टीकाकरण के बाद ऐसी गलत दिशा में काम करने वाली एंटीबॉडीज़ ज़्यादा बनने लगें, तो इससे शरीर में खतरनाक थक्के बनने लगते हैं और साथ-साथ प्लेटलेट्स की संख्या भी घट जाती है (abnormal immune response)।
शोधकर्ताओं ने जिन 21 लोगों में VITT पाया, उन सभी में एक अमीनो अम्ल का यह जेनेटिक बदलाव मौजूद था। जब वैज्ञानिकों ने इस बदलाव के बिना एंटीबॉडी बनाकर उन्हें चूहों पर परखा, तो खून के थक्के बनना काफी कम हो गया (preclinical research)।
फ्लिंडर्स युनिवर्सिटी के प्रतिरक्षा विशेषज्ञ टॉम गॉर्डन के अनुसार, यह पहली बार है जब किसी ऑटोइम्यून बीमारी को उसके अंतिम असली कारण तक साफ-साफ जोड़ा जा सका है।
इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि टीकों में कोई कमी या खोट नहीं थी। इस अध्ययन से भविष्य में और ज़्यादा सुरक्षित टीके बनाने में मदद मिल सकती है, साथ ही ऐसी दुर्लभ ऑटोइम्यून प्रतिक्रियाओं की पहले पहचान भी बेहतर तरीके से हो सकेगी (vaccine safety research)। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.gavi.org/sites/default/files/vaccineswork/2021/Thumb/shutterstock_1907619577_h2.jpg