जलवायु परिवर्तन, अंतर्राष्ट्रीय तनाव और बढ़ता जल संकट

संयुक्त राष्ट्र (United Nations) द्वारा जारी चेतावनी के अनुसार पानी के ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की वजह से दुनिया की जल व्यवस्था दम तोड़ रही है। कई नदियां, ग्लेशियर और भूजल भंडार (groundwater depletion) अपनी प्राकृतिक सीमा से ज़्यादा दबाव में हैं, और संभव है कि वे पहले जैसी स्थिति में फिर कभी न लौट सकें।

ग्लेशियर तेज़ी से पिघल (glacier melting) रहे हैं, जिससे नदियों का बहाव बदल रहा है। राजनीतिक तनाव इस समस्या को और जटिल बना रहे हैं। कई देशों के बीच पानी बंटवारे से जुड़े समझौते दबाव में आ गए हैं। अप्रैल 2025 में भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया, जो 1960 से सिंधु नदी तंत्र (Indus river system) के इस्तेमाल को तय करती थी। दूसरी ओर, अफगानिस्तान कुनार नदी पर एक बड़े जलाशय निर्माण की योजना बना रहा है, जिससे पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी में कमी आ सकती है। इसी बीच भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे का समझौता (Ganga water treaty) भी दिसंबर में खत्म होने वाला है। नया समझौता न होने से नदी पर निर्भर लगभग 63 करोड़ लोग प्रभावित हो सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, पानी से सम्बंधित पुराने समझौतों (water agreements) को बनाए रखना ही काफी नहीं है बल्कि उन्हें आज की परिस्थितियों के अनुसार ढालना होगा। पहले के समझौते उस समय के स्थिर जल स्तर को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। लेकिन जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण बारिश, ग्लेशियर पिघलने और नदियों के बहाव के पैटर्न पहले जैसे नहीं रहे। नवीनतम जानकारी उपलब्ध हो, तो समस्याओं का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है।

आजकल वैज्ञानिक ‘डिजिटल ट्विन’ (digital twin technology) नामक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें कंप्यूटर पर नदी प्रणाली का एक आभासी मॉडल बनाया जाता है, जिससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन का नदी पर क्या असर पड़ेगा। चीन की यांग्त्से नदी घाटी में इस तकनीक का इस्तेमाल जल प्रबंधन (smart water management) को बेहतर बनाने के लिए किया जा चुका है।

सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) कई युद्धों और राजनीतिक तनाव के बावजूद दशकों तक चलती रही। इसका एक कारण यह था कि इसमें विश्व बैंक जैसे तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका थी और दोनों देशों के तकनीकी विशेषज्ञों की एक संयुक्त समिति भी बनाई गई थी। और पानी से जुड़े ढांचे और परियोजनाओं (water infrastructure projects) के लिए साझा वित्तीय व्यवस्था भी रखी गई थी।

ऐसी संस्थाओं को और मज़बूत होना चाहिए, ताकि वे पूरे नदी क्षेत्र (river basin management) के प्रबंधन में डैटा के आधार पर फैसले ले सकें। नदियों को केवल पानी के स्रोत के रूप में देखने की बजाय उन्हें समग्र प्राकृतिक तंत्र (ecosystem approach) के रूप में समझना होगा। बेहतर जानकारी, आपसी सहयोग और लचीले समझौतों की मदद से अभी भी आने वाले वैश्विक जल संकट (future water crisis) को टाला जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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