
जेलीफिश (jellyfish) एक समुद्री अकशेरुकी जीव है जो आम तौर पर अपने छतरी जैसी आकृति से पहचाना जाता है। यह निडेरिया फायलम में कैसियोपिडी कुल में आता है और कैसिओपी जीनस का सदस्य है जिसमें 12 प्रजातियां हैं। देखा जाए तो यह हायड्रा, सी-एनीमोन, कोरल जैसे अन्य जलचर जंतुओं का सम्बंधी है। यहां जिस जेलीफिश (Cassiopea andromeda) की बात हो रही है वह उल्टी छतरी जैसा दिखता है। यानी छत्ता ज़मीन पर और झालर ऊपर।
यह शैवालों के साथ सहजीवी सम्बंध (symbiotic relationship) में रहता है। शैवाल प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) के ज़रिए भोजन का निर्माण करते हैं। ये शैवाल इसके छाते में बसते हैं और यही कारण है कि ये जेलीफिश छाते को उल्टा रखती हैं ताकि इन शैवालों को भोजन निर्माण के लिए प्रकाश मिलता रहे। जेलीफिश विभिन्न रंगों में मिलती है और यह रंग इन्हें शैवालों की बदौलत ही मिलता है।
अब वैज्ञानिकों ने नेचर कम्यूनिकेशन्स (Nature Communications) में प्रकाशित एक शोध पत्र में बताया है कि जेलीफिश और स्टारलेट सी-एनीमोन (Nematostella vectensis) में नींद जैसे पैटर्न नज़र आते हैं। अक्सर यह मान लिया जाता है कि नींद लेने के लिए दिमाग ज़रूरी है लेकिन उक्त अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है।
देखा जाए तो नींद (sleep behavior) एक जोखिम भरा व्यवहार है – उस दौरान जंतु शिकारियों के प्रति कमज़ोर हो जाते हैं। वैज्ञानिकों का विचार है कि यदि फिर भी नींद आती है, तो इसकी कुछ तो लाभदायक भूमिका होनी चाहिए। इस्राइल के शोधकर्ता उपरोक्त दो प्रजातियों में इसी की छानबीन कर रहे थे। ये दोनों जंतु उथले लैगून्स के पेंदों में अपने टेन्टेकल्स को लहराते पड़े रहते हैं। टेन्टेकल्स शिकार को पकड़ने का काम करते हैं (marine animal behavior)।
इनमें नींद जैसी अवस्था देखी गई थी। यह देखा गया था कि दिन के कई घंटे ये ऊंघते रहते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इन जंतुओं में मस्तिष्क तो छोड़िए, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (central nervous system) भी नहीं होता। इनकी तंत्रिकाएं पूरे शरीर में बिखरी होती हैं।
बार-इलान विश्वविद्यालय के लियोर एपलबॉम और उनके साथी देखना चाहते थे कि इनमें नींद का पैटर्न कैसा होता है और नींद की भूमिका क्या है। अपनी प्रयोगशाला में उन्होंने एक एक्वेरियम में कई सारी जेलीफिश रखीं और कई दिनों तक उन्हें 12 घंटे रोशनी और 12 घंटे अंधकार में रखा (light dark cycle experiment), यह देखने के लिए कि जेलीफिश इन अवधियों में कितनी बार अपनी छतरी नुमा तोंद को ऊपर-नीचे करती हैं। यह फूलना-पिचकना इनके जागे होने का एक संकेत है।
प्रयोग में देखा गया कि रात में जेलीफिश कम सक्रिय रहती हैं और अपनी तोंद को प्रति मिनट लगभग पांच बार कम ऊपर-नीचे करती हैं। अब यह देखना था कि क्या इस क्रिया का सम्बंध निद्रावस्था से है। शोधकर्ताओं ने जेलीफिश पर रोशनी चमकाई और देखा कि वे कितनी जल्दी अपनी धड़कन से प्रतिक्रिया देती हैं। किसी ऊंघते मनुष्य के ही समान जेलीफिश ने अंधकार में रोशनी की प्रतिक्रिया देने में 20 सेकंड का टाइम लिया। जबकि दिन में चौकन्नी अवस्था में उन्हें मात्र 10 सेकंड लगते हैं।
सी-एनीमोन (sea anemone organism) का पैटर्न इससे उल्टा था। वे रात में सक्रिय रहते हैं और दिन में उनकी हरकतें धीमी रहीं और प्रतिक्रिया अवधि लंबी। अलबत्ता, दोनों ही जंतु दिन की एक-तिहाई अवधि तक सोते रहे। और तो और, सी-एनीमोन के सोने जागने का क्रम उनकी अंदरुनी घड़ी (सर्काडियन क्लॉक) से संचालित था। शोधकर्ताओं ने प्रकाश व अंधकार के क्रम को पलट दिया, तब भी सी-एनीमोन का सोने-जागने का क्रम बरकरार रहा। दूसरी ओर, जेलीफिश में यह क्रम प्रकाश से प्रभावित हुआ – अंधेरे में वे उनींदे रहे और रोशनी में सक्रिय (sleep deprivation effect)।
यह भी देखा गया कि इन जंतुओं को यदि एक रात की नींद ठीक से न मिले तो उन्हें बाद में ज़्यादा आराम की ज़रूरत होती है, ठीक इंसानों के समान। शोधकर्ताओं ने एक्वेरियम में पानी को 6 घंटे तक उस दौरान मथा जो जेलीफिश के सोने का समय था। इससे उनकी नींद कच्ची रही और बाद में वे सामान्य जेलीफिश की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक समय तक सोते रहे।
शोधकर्ताओं ने नींद के साथ छेड़छाड़ का एक तरीका और आज़माया। उन्होंने कुछ एक्वेरियम टंकियों में मेलेटोनिन (melatonin hormone) डाल दिया। मेलेटोनिन एक हॉरमोन है, मनुष्यों में मस्तिष्क जिसका स्राव रात में करता है और यह नींद प्रेरित करता है। मेलेटोनिन का ऐसा ही असर जेलीफिश तथा सी-एनीमोन पर भी हुआ और वे दिन की उस अवधि में ऊंघने लगे जब वे सामान्य तौर पर सक्रिय होते हैं (sleep regulation)।
ज़ाहिर है कि ये दो जंतु नींद का मज़ा लेते हैं। पूर्व में कई शोधकर्ता दर्शा चुके थे कि मक्खियों, चूहों और मनुष्यों सहित कई प्रजातियों में नींद डीएनए को हुई क्षति को कम (DNA damage repair) करता है। यह क्षति जाग्रत अवस्था में होती रहती है। एपलबॉम का विचार है कि शायद जेलीफिश और सी-एनीमोन में भी ऐसा ही होता है। अपने इस विचार की जांच के लिए उन्होंने एक प्रयोग किया। उन्होंने जेलीफिश को पराबैंगनी (यूवी) प्रकाश के संपर्क (ultraviolet UV radiation) में रखा। यूवी प्रकाश डीएनए क्षति के लिए जाना जाता है। यूवी के संपर्क में रहने के बाद जेलीफिश सामान्य से ज़्यादा देर तक सोती रहीं जबकि उनमें मस्तिष्क नहीं होता।
इसी प्रकार से, सी-एनीमोन को ऐसी कीमोथेरपी औषधि (chemotherapy drug) दी गई जो डीएनए क्षति करती है। इस उपचार के बाद ये सी-एनीमोन 30 प्रतिशत ज़्यादा सोए (DNA repair mechanism)।
तो, सवाल उठता है कि नींद की झपकी के सारे आसन्न खतरों के बावजूद जंतु सोते क्यों हैं। एक गोल कृमि सीनेरोब्डाइटिस एलेगेंस (Caenorhabditis elegans worm) के नींद व्यवहार पर शोध करने वाली कैलिफोर्निया स्टेट विश्वविद्यालय की जीव वैज्ञानिक चेरिल फान बर्सकिर्क का कहना है कि नींद तंत्रिकाओं के रख-रखाव का एक तरीका हो सकता है क्योंकि तंत्रिकाएं डीएनए क्षति का सबसे अधिक खतरा झेलती हैं। उनका तो कहना है कि नींद का उद्भव संभवत: पहली-पहली तंत्रिकाओं (early nervous system) के साथ ही हुआ होगा। यानी नींद तो मस्तिष्क के विकास से पहले ही महत्वपूर्ण भूमिका अख्तियार कर चुकी थी। वे कहती हैं कि एपलबॉम की टीम द्वारा किए गए ये प्रयोग एक बार फिर इस धारणा को चुनौती देते हैं कि नींद का विकास (evolution of sleep) जटिल मस्तिष्क को संभालने के लिए हुआ है। (स्रोत फीचर्स)
जेलीफिश की सोन–जागने की प्रक्रिया का वीडियो देखें: https://youtu.be/UPtSlvU6nh8
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://caltech-prod.resources.caltech.edu/main/images/LGoentoro_Jellyfish-Research-3782-NEWS-WEB.width-600.jpg