पृथ्वी पर ‘आज़माइशी’ जीवन की खोज 

डॉ. इरफ़ान ह्यूमन

जीवाश्म (fossils) वे अश्मीभूत अवशेष या निशान होते हैं जो किसी प्राचीन सजीव के मरने के बाद लाखों- करोड़ों वर्षों तक सुरक्षित रह जाते हैं। ज़रूरी नहीं कि जीवाश्म हमेशा पूरे के पूरे जीव के रूप में मिलें, बल्कि इनके कुछ हिस्से अश्मीभूत रूप मिल सकते हैं, जैसे हड्डियां या दांत, खोल या कवच (सीप, घोंघे के), पत्ती या लकड़ी की छाप, पदचिह्न, शरीर की छाप (जैसे एडिआकारा के जीवों की)। एडिआकारा के जीवाश्म अब तक खोजे गए सबसे अजीब जीवाश्मों में गिने जाते हैं। इनमें अजीब क्या है? जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका (Geological Society of America) के स्रोत बताते हैं कि ये कोमल, मुलायम शरीर वाले जीव थे, जिनके जीवाश्म आश्चर्यजनक रूप से अत्यंत बारीक विवरणों के साथ सुरक्षित मिले हैं, वह भी ऐसी चट्टानों में जहां सामान्यत: संरक्षण संभव ही नहीं माना जाता।

दरअसल, जिन जीवों के पास कठोर खोल या हड्डियां नहीं होतीं, जैसे जेलीफिश (soft bodied organisms), वे जीव लगभग कभी भी जीवाश्म रिकॉर्ड में सुरक्षित नहीं मिल पाते। फिर, बलुआ-पत्थर में संरक्षण और भी कठिन होता है क्योंकि यह मोटे कणों से बनी चट्टान होती है, जिनमें पानी आसानी से रिस सकता है। ये चट्टानें आम तौर पर लहरों और तूफानों से प्रभावित अशांत वातावरण में बनती हैं। ऐसे हालातों में नाज़ु़क जैविक अवशेष जीवाश्म बनने से बहुत पहले ही सड़-गलकर नष्ट हो जाते हैं। फिर भी, पृथ्वी के इतिहास के एक चरण में लगभग 57 करोड़ वर्ष पहले कुछ असाधारण हुआ। इसे एडिआकारन काल (Ediacaran period) कहा जाता है। इस दौरान समुद्र तल पर रहने वाले कोमल शरीर वाले जीव रेत में दब गए और अभूतपूर्व सटीकता (exceptional fossilization) के साथ संरक्षित हो गए।

लगभग 63.5 करोड़ वर्ष पूर्व से 54.1 करोड़ वर्ष पूर्व तक, एडिआकारन काल पृथ्वी के इतिहास (geological time scale) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण था। एडिआकारन काल में पहली बार बड़े, जटिल और नग्न आंखों से देखे जा सकने वाले जीव प्रकट हुए। इस काल में अधिकांश जीवों के शरीर में न तो हड्डियां थीं, न कठोर खोल थे, बस त्रि-सममिति, सर्पिल, पत्तीनुमा और फ्रैक्टल जैसी विचित्र संरचनाएं थीं। अत: एडिआकारन काल वह समय था जब जीवन ने पहली बार जटिल बनने की हिम्मत की। यह प्रीकैम्ब्रियन युग (Precambrian era) का अंतिम दौर था, जिसके बाद कैंब्रियन युग शुरू हुआ।

ये जीव कैंब्रियन जैविक विस्फोट (Cambrian explosion) से केवल कुछ करोड़ वर्ष पहले जीवित थे। कैंब्रियन विस्फोट के दौरान जटिल व विविध जंतु जीवन का तेज़ी से उदय हुआ। लंबे समय तक इसे एक अचानक हुई जैविक क्रांति माना जाता रहा। लेकिन अब वैज्ञानिक इसे एक लंबी, धीरे-धीरे विकसित प्रक्रिया (gradual evolution) का परिणाम मानते हैं।

येल विश्वविद्यालय (Yale University) की जीवाश्म विज्ञानी डॉ. लिडिया टार्हन (Lydia Tarhan) इस प्रक्रिया को ‘लॉन्ग फ़्यूज़’ कहती हैं, जिसमें एडिआकारा जीव समूह के जानवर  आकार, जटिलता और पारिस्थितिक भूमिकाओं के क्रमिक विस्तार का एक शुरुआती चरण दर्शाते हैं। कुल मिलाकर यह काल जटिल पशु जीवन के लिए ‘भूमिका तैयार करने वाला मंच’ था।

अश्मीकरण की अनोखी प्रक्रिया (fossilization process)

इन जीवों का संरक्षण कैसे हुआ, यह समझना विकासक्रम (evolutionary history) में उनके स्थान को जानने के लिए बेहद ज़रूरी है। डॉ. लिडिया टार्हन और उनके सहयोगियों द्वारा किया गया एक अध्ययन, जो जियोलॉजी पत्रिका (Geology journal) के 15 दिसम्बर, 2025 के अंक में प्रकाशित हुआ, इस प्रक्रिया पर नई रोशनी डालता है। अध्ययन का शीर्षक है: Authigenic clays shaped Ediacara-style exceptional fossilization।

अध्ययन में शोधकर्ताओं (scientific study) ने एक नई रासायनिक तकनीक अपनाई। उन्होंने न्यूफाउंडलैंड और उत्तर-पश्चिमी कनाडा से मिले एडिआकारा जीवाश्मों में लीथियम समस्थानिकों का विश्लेषण किया। इनमें वे जीवाश्म भी शामिल थे जो रेतीले और कीचड़युक्त दोनों प्रकार के तलछट में सुरक्षित थे। इन समस्थानिकों से यह पता लगाने में मदद मिली कि क्या मिट्टी के खनिजों ने अश्मीभूत करने में भूमिका निभाई और क्या ये मिट्टियां ज़मीन से बहकर आई थीं (डिट्राइटल क्ले – detrital clay) या समुद्र तल के भीतर ही बनी थीं (ऑथिजेनिक क्ले)।

पता चला कि डिट्राइटल मिट्टी के कण पहले से ही उस तलछट में मौजूद थे, जिसने इन जीवों को ढंका था। इन्हीं कणों की सतह पर नई मिट्टियां समुद्र तल के भीतर ही बनने लगीं। सिलिका और लौह से भरपूर समुद्री जल तथा एडिआकारन काल के महासागरों की असामान्य रसायनिकी (ocean chemistry) ने इन ऑथिजेनिक मिट्टियों को बढ़ने में मदद की।

असल में, ये मिट्टियां प्राकृतिक सीमेंट (natural cementation) की तरह काम करने लगीं। इन्होंने रेत के कणों को आपस में बांध दिया और कोमल ऊतकों की महीन आकृतियों और छापों को रेत-पत्थर में स्थायी रूप से सुरक्षित कर दिया। डॉ. टार्हन भविष्य में इसी लीथियम समस्थानिक तकनीक (geochemical analysis) को अन्य क्षेत्रों और कालों के जीवाश्मों पर लागू करने की योजना बना रही हैं, ताकि यह देखा जा सके कि क्या ऐसी ही प्रक्रियाएं कहीं और भी सक्रिय थीं। फिलहाल, यह अध्ययन हमें उस दौर की पृथ्वी की कहीं अधिक स्पष्ट तस्वीर (ancient Earth history) देता है, जब जंतु जीवन के विकास में एक निर्णायक मोड़ आया था।

यह खोज उस पुरानी धारणा (scientific theory) को चुनौती देती है कि आखिर एडिआकारा बायोटा (Ediacara biota) इसलिए सुरक्षित रहे क्योंकि उनके शरीर असाधारण रूप से मज़बूत या रासायनिक रूप से प्रतिरोधी थे। इसके बजाय, अब यह स्पष्ट होता है कि इनका जीवाश्म रिकॉर्ड (preservation conditions) में बच पाना असाधारण पर्यावरणीय परिस्थितियों का परिणाम था।

कहां मिलते हैं ये जीवाश्म

एडिआकारा बायोटा के जीवाश्म (global fossil sites) ऑस्ट्रेलिया, रूस, कनाडा, भारत, नामीबिया जैसे कई देशों में मिले हैं। भारत में मध्य प्रदेश (भीमबैठका) और राजस्थान (जोधपुर सैंडस्टोन) (India fossil sites) के प्राचीन तलछटों में इनके पाए जाने का दावा है।

वैज्ञानिकों के लिए अब भी यह पहेली है कि ये जीव आधुनिक जानवरों के पूर्वज थे या नहीं? या ये जीवन की कोई अलग, अब विलुप्त शाखा (extinct life forms) थे! इसी कारण इन्हें कभी-कभी ‘आज़माइशी जीवन रूप’ (एक्सपेरिमेंटल लाइफ फॉर्म्स – experimental life forms) भी कहा जाता है।

जो भी हो, हम आज जो जीवन देखते हैं, वह जीवाश्मों की डायरी (history of life on Earth) पढ़कर ही समझा गया है, वरना पृथ्वी का अतीत पूरी तरह रहस्य बना रहता! (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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समुद्र की गहराइयों में ऑक्सीजन कैसे आई

प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में 4000 मीटर की गहराई पर ऑक्सीजन की खोज की सबसे पहली खबर 2024 में नेचर जियोसाइन्स जर्नल (Nature Geoscience journal) में प्रकाशित हुई थी। यह खोज ए. स्वीटमैन की टीम ने की थी। इसके साथ ही वैज्ञानिकों के बीच गहमागहमी शुरू हो गई। कारण यह था कि इतनी गहराई पर ऑक्सीजन का पाया जाना एक रहस्य जैसा था क्योंकि वहां सूरज की रोशनी तो पहुंचती नहीं जो प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis process) की क्रिया को ऊर्जा दे सके। गौरतलब है कि धरती पर ऑक्सीजन मूलत: पेड़-पौधों द्वारा सूरज के प्रकाश की उपस्थिति में सम्पन्न प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से ही पैदा होती है। लिहाज़ा, यह सवाल स्वाभाविक है कि इतनी गहराई के अंधकार में कौन-सी प्रक्रिया ऑक्सीजन उत्पादन (oxygen production mystery) को अंजाम दे रही है।

अब वैज्ञानिक समुद्र की गहराई (deep ocean research) में और प्रयोगशाला में समुद्री गहराई की परिस्थितियां निर्मित करके इस सवाल का जवाब पाने की कोशिश करेंगे। इसके लिए वैज्ञानिक एक शोध जहाज़ नौटिलस पर सवार होकर हवाई और मेक्सिको के बीच स्थित क्लेरियन-क्लिपरटन क्षेत्र (Clarion Clipperton Zone) में जाएंगे जहां पहली खोज की गई थी और समुद्र में कुछ खोजी यंत्र उतारकर नमूने एकत्रित करेंगे और वहां कई चीज़ों का मापन भी करेंगे।

ये खोजी यंत्र पानी की अम्लीयता (water acidity pH level) का मापन करेंगे। यदि अम्लीयता अधिक मिलती है तो कहा जा सकेगा कि वहां हाइड्रोजन की उपस्थिति बहुत ज़्यादा है अर्थात वहां पानी के अणु टूट रहे हैं।

मूल अध्ययन के दौरान ऑक्सीजन उस क्षेत्र में मिली थी जहां कई धातुओं (metal nodules) से बनी डल्लियां (जैसे बड़ी होती है) मिली थीं। इनमें मैंगनीज़ और कोबाल्ट जैसी मूल्यवान धातुएं भी पाई गई थीं। ये डल्लियां वहां करोड़ों साल पहले बनी होंगी। वैज्ञानिकों ने इसके आधार पर अनुमान लगाया था कि शायद यही धातुएं पानी के विघटन को उत्प्रेरित कर रही हैं – लगभग उसी तरह जैसे प्रयोगशाला में पानी के विद्युत विच्छेदन से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन बनती है। यह एक संभावना मात्र है। यह भी हो सकता है कि वहां मौजूद सूक्ष्मजीव (deep sea microbes) यह ऑक्सीजन बना रहे हों। मौजूदा खोजबीन इन दो संभावनाओं के बीच निर्णय करने का प्रयास है। इसके लिए कई कसौटियों पर आधारित मापन ज़रूरी है और खोजी यंत्रों पर तमाम किस्म के उपकरण (scientific instruments) लगाए गए हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्राचीन ग्रीक पुजारिनें अनुष्ठान पेय कैसे बनाती थीं

प्राचीन समय में ग्रीक के एक शहर एल्यूसिस (Eleusis Greece) में एक अनुष्ठान हुआ करता था, जिसे नाम दिया गया है एल्यूसिनियन मिस्ट्रीज़ (Eleusinian Mysteries)। मिस्ट्रीज़ इसलिए कि एक तो उस समय सख्त पाबंदियों के कारण इस संस्कार में होने वाली चीज़ों का खुलासा करने की मनाही थी, और अब भी इसके कई पहलू वैज्ञानिकों के लिए रहस्य ही बने हुए हैं। इन रहस्यों में से एक है इस अनुष्ठान के दौरान पीया जाने वाली पेय, काइकॉन (Kykeon drink), जिसे दीक्षा लेने वाले लोगों द्वारा एक देवी के सम्मान में पीया जाता था। ऐसा माना जाता था कि देवी अपना गम ग़लत करने के लिए काइकॉन पीती थीं। जिन्होंने भी काइकॉन पीया था उनके बयानों से पता चलता है कि इसे पीने के बाद एक अलग ही अनुभव होता है; जैसे आप किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गए हो। उनके ये विवरण ऐसे लगते थे जैसे अनुभव अक्सर लायसर्जिक एसिड डाईइथाइलएमाइड (LSD) जैसे मतिभ्रम उत्पन्न करने वाले ड्रग्स (hallucinogenic drugs) लेने पर होते हैं।

लेकिन अब ऐसा लगता है कि वैज्ञानिकों (modern research) ने अलौकिक दुनिया में ले जाने वाले इस पेय को बनाने का नुस्खा पता कर लिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि प्राचीन ग्रीक पुजारिनें जौ पर पनपने वाली एक परजीवी फफूंद से काइकॉन बनाती थीं, जो LSD जैसा असर देती थीं और जिसे पीकर लोगों को अजीबोगरीब चीज़ें दिखती थी और विचित्र अनुभव (psychedelic experience) होते थे।

दरअसल हर संस्कृति, समुदाय में दुनिया और उसके क्रियाकलापों को समझाने के लिए कुछ पारंपरिक-पौराणिक कहानियां (Greek mythology) प्रचलित होती हैं। प्राचीन ग्रीकवासियों के पास भी कुछ कहानियां थी। जैसे एक कहानी के अनुसार, पाताललोक का शासक हेडिस पृथ्वी की फसल की देवी डिमीटर की बेटी पर्सेफोन (Persephone myth) का हरण कर लेता है। देवता हेडिस के साथ समझौता करते हैं, और तय होता है कि पर्सेफोन हर साल के कुछ दिन अपनी मां के साथ पृथ्वी पर बिताएगी और साल के बाकी दिन पाताल में रहेगी। जब पर्सेफोन पाताल में होती, देवी डिमीटर दुख में इतना डूब जाती हैं कि पृथ्वी पर फसलें उगना बंद हो जाती हैं। अपना दुख दूर करने के लिए देवी डिमीटर काइकॉन नामक पेय पीती हैं। ग्रीक पुराणों (ancient myths) में यह मौत और पुनर्जन्म के चक्र का एक कहानी-फलसफा है जिसे एल्यूसिनियन संस्कार के समय दीक्षा लेने वालों को रस्मी तौर पर सुनाया जाता था।

हालांकि इस संस्कार की रस्मों को गोपनीय रखे जाने के कड़े नियम थे, लेकिन फिर भी कहीं-कहीं थोड़ा उल्लेख मिल जाता है। जैसे सातवीं सदी ईसा पूर्व की एक इबारत (ancient text) में काइकॉन बनाने के नुस्खे के बारे में अंदाज़ा मिलता है। इबारत में, डिमीटर बताती हैं कि काइकॉन में “जौ, पानी और थोड़ा पुदीना” होता है। इस इबारत के आधार पर वैज्ञानिकों का अंदाज़ा था कि इस पेय में जंगली घास और अनाजों पर पनपने वाली फफूंद एर्गोट मतिभ्रम करने वाली अलौकिक अनुभूति की ज़िम्मेदार होती होगी। जैसा कि अब वैज्ञानिक जानते हैं कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में, जैसे कि क्षारीय माध्यम में, एर्गोट से लायसर्जिक एसिड एमाइड्स (lysergic acid amides) बन सकते हैं। लायसर्जिक एसिड एमाइड्स LSD जैसे ही रसायन होते हैं और वैसा ही प्रभाव देते हैं। लेकिन यह भी पता है कि यदि एर्गोट को ठीक से प्रोसेस नहीं किया जाए तो इसके विषैले यौगिक (toxic compounds) अपना असर दिखाते हैं, नतीजतन ऐंठन, गैंग्रीन जैसी समस्या हो सकती है और यहां तक कि मौत भी हो सकती है।

उक्त जानकारी के आधार पर, काइकॉन का नुस्खा पता कर रहे शोधकर्तांओं (scientists study) को इतना अंदाज़ा तो था कि प्राचीन पुजारिनें राख से बने क्षारीय घोल की मदद से एर्गोट से लायसर्जिक एसिड एमाइड्स हासिल करती होंगी। लेकिन ठीक तरीका स्पष्ट नहीं हो पाया था, क्योंकि ज़रा भी गड़बड़ी जानलेवा हो सकती थी।

यह पता करने के लिए शोधकर्ताओं ने एर्गोट फफूंद को पीसकर पाउडर बनाया और अलग-अलग क्षारीयता और सांद्रता वाले राख के घोल में मिला दिया। इसके बाद, उन्होंने इस मिश्रण को अलग-अलग समयावधि के लिए उबाला। इस तरह उन्होंने नमूनों को 48 अलग-अलग तरीकों (scientific testing) से गर्म किया।

उन्हें मात्र एक तरीके से एर्गोट से ऐसा यौगिक मिला जो विषैलेपन से मुक्त था और मतिभ्रम जैसा असर देता था (psychoactive compound)। शोधकर्ताओं को एक निश्चित क्षारीयता वाले राख के घोल में एर्गोट मिलाकर, उसे 120 मिनट तक उबालने पर लायसर्जिक एसिड एमाइड्स प्राप्त हुए थे (chemical process)।

साइंटिफिक रिपोर्ट्स (Scientific Reports journal) में प्रकाशित इन नतीजो से पता चलता है कि हज़ारों साल पहले भी लोग LSD जैसे यौगिक बनाकर उनका उपयोग (ancient chemistry) करते थे। लेकिन कुछ वैज्ञानिक इन निष्कर्षों के प्रति थोड़ा चेताते हैं: उनका कहना है कि यह अध्ययन महज संभावना बताता है कि ग्रीकवासी पेय बनाने के लिए ऐसा करते होंगे, लेकिन वे वास्तव में ऐसा करते थे या नहीं, पता नहीं (research limitations)।

एक रास्ता तो यह हो सकता है कि एल्यूसिस में मिले प्राचीन बर्तनों (archaeological evidence) में एर्गोट के अवशेष खोजे जाएं। यदि मिलते हैं तो पक्के तौर पर कुछ कहा जा सकेगा। आगे शोधकर्ताओं का इरादा भी ऐसे ही अवशेष तलाश करने का है। (स्रोत फीचर्स)

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क्या ‘विज्ञान-समर्थित’ सप्लीमेंट्स सच में भरोसेमंद हैं?

दियों से अश्वगंधा (Withania somnifera) की जड़ आयुर्वेद में तंदुरुस्ती और मनदुरुस्ती के लिए इस्तेमाल होती रही है। आज यह एक लोकप्रिय वेलनेस ट्रेंड (wellness trend) बन चुकी है। सोशल मीडिया और विज्ञापनों में इसे तनाव कम करने, नींद सुधारने, ऊर्जा बढ़ाने और दिमाग तेज़ करने जैसे कई फायदों से जोड़ा जा रहा है, जिससे इसकी लोकप्रियता काफी बढ़ गई है। लेकिन वैज्ञानिक रूप से इसके फायदे और असर भली-भांति साबित (scientific evidence) नहीं हुए हैं।

हाल के कई क्लीनिकल परीक्षणों (clinical trials) की समीक्षा से यह संकेत मिलता है कि अश्वगंधा तनाव, चिंता और अवसाद (stress anxiety depression) कम करने में मदद करता है। लेकिन इन अध्ययनों की अपनी सीमाएं हैं: वे छोटे स्तर पर किए गए हैं और उनके तरीके अलग-अलग हैं; इसलिए पक्के निष्कर्ष निकालना मुश्किल है। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे पूरी तरह प्रमाणित इलाज नहीं, बल्कि एक संभावित सहायक सप्लीमेंट (dietary supplement) मानते हैं, जिस पर अभी और अधिक शोध की ज़रूरत है।

अश्वगंधा की बढ़ती लोकप्रियता के चलते नियामक संस्थाओं (regulatory authorities) के बीच बहस भी पैदा हो गई है। फ्रांस और डेनमार्क जैसे देशों ने खासकर गर्भवती महिलाओं, बच्चों और कुछ बीमारियों से ग्रस्त लोगों के लिए इसकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। डेनमार्क ने तो 2023 में अश्वगंधा युक्त उत्पादों पर प्रतिबंध भी लगा दिया था। वहीं भारत का आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) इसे सामान्य रूप से सुरक्षित मानता है, लेकिन यह भी कहता है कि कुछ लोगों में इसके साइड इफेक्ट हो सकते हैं।

गौरतलब है कि अश्वगंधा एक बड़े और तेज़ी से बढ़ते सप्लीमेंट बाज़ार (supplement market) का हिस्सा है। आजकल कोलाजेन, मशरूम एक्सट्रैक्ट, प्रोबायोटिक्स, मैग्नीशियम और ओमेगा-3 जैसे सप्लीमेंट भी काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। अमेरिका और युरोप में बड़ी संख्या में लोग नियमित रूप से इनका सेवन करते हैं, और आने वाले समय में यह बाज़ार बहुत तेज़ी से बढ़ने वाला है। इनकी लोकप्रियता का बड़ा कारण यह दावा है कि ये विज्ञान-समर्थित हैं, यानी इनके फायदे वैज्ञानिक शोध (evidence based claims) से साबित हुए हैं।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि कई सप्लीमेंट्स के पीछे का विज्ञान उतना साफ और स्पष्ट नहीं होता, जितना विज्ञापनों (marketing claims) में दिखाया जाता है। शुरुआत में सप्लीमेंट्स का इस्तेमाल विटामिन की कमी को पूरा करने के लिए होता था, जैसे रिकेट्स के लिए विटामिन डी का। लेकिन समय के साथ बाज़ार ऐसे उत्पादों की ओर बढ़ गया जो सामान्य सेहत सुधारने (general wellness) के लिए होते हैं, न कि किसी खास बीमारी के इलाज के लिए। दिक्कत यह है कि इनके ‘ऊर्जा बढ़ाने’ या ‘इम्युनिटी मज़बूत करने’ (immunity booster) जैसे दावों को सही तरह से मापना मुश्किल है।

नियम-कानून इस मामले को और जटिल बना देते हैं। कई देशों में सप्लीमेंट्स को दवाओं (food vs medicine regulation) की बजाय खाद्य पदार्थ माना जाता है, जहां उनकी सुरक्षा को प्रमाणित करना तो ज़रूरी होता है, लेकिन असर को साबित करना ज़रूरी नहीं होता। अमेरिका में स्थिति यह है कि यदि कंपनियां किसी बीमारी के इलाज का दावा न करें, तो अनुमति लिए बिना उसे लेकर सामान्य स्वास्थ्य से जुड़े दावे कर सकती हैं। इससे ये उत्पाद जल्दी बाज़ार में आ जाते हैं और निगरानी भी सीमित हो सकती है। वहीं युरोप में कंपनियों को ऐसे दावों के लिए ज़्यादा मज़बूत वैज्ञानिक प्रमाण (scientific proof) देने पड़ते हैं, लेकिन वहां भी कई बार अधूरी जानकारी के आधार पर ही निर्णय लिए जाते हैं।

एक और बड़ी समस्या यह है कि सप्लीमेंट्स एक जैसे नहीं होते। उनकी मात्रा, बनाने का तरीका और पौधे के किस हिस्से का उपयोग किया गया है (dosage variation), ये सब अलग-अलग हो सकते हैं। इसके चलते अलग-अलग अध्ययनों की आपस में तुलना करना मुश्किल हो जाता है (research variability)। उदाहरण के लिए, अश्वगंधा से जुड़ी कुछ सुरक्षा चिंताएं उन शोधों पर आधारित थीं, जिनमें बहुत अधिक मात्रा या पूरे पौधे का इस्तेमाल किया गया था, जो सामान्य उपयोग से अलग हो सकता है।

ऐसे सबूतों को समझना वैज्ञानिकों के लिए भी आसान नहीं होता। कई बार एक ही विषय पर अलग-अलग अध्ययन अलग नतीजे देते हैं, क्योंकि उनकी गुणवत्ता, सैंपल और तरीके अलग होते हैं। ऐसे में नियम बनाने वाली संस्थाओं को तय करना पड़ता है कि किस अध्ययन पर ज़्यादा भरोसा किया जाए। विशेषज्ञों के अनुसार, ये फैसले पूरी तरह अंतिम सच तय करने के बारे में नहीं होते, बल्कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर सबसे सही लगने वाले निष्कर्ष (data interpretation)  तक पहुंचने की कोशिश होते हैं।

बहरहाल, विज्ञान-समर्थित सप्लीमेंट्स (science backed supplements) की बढ़ती लोकप्रियता से यह स्पष्ट होता है कि लोग अब अपनी सेहत पर खुद नियंत्रण रखना (self-care trend) चाहते हैं। लेकिन यह भी सामने आता है कि वैज्ञानिक शोध और विज्ञापनों के दावों में फर्क है। कुछ सप्लीमेंट्स सच में फायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन कई के लिए सबूत अभी सीमित या पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। इसलिए किसी नुस्खे के विज्ञान-समर्थित होने के दावे का मतलब यह नहीं है कि वह हमेशा असरदार ही होगा। (स्रोत फीचर्स)

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तेहरान में ‘ब्लैक रेन’ से बढ़ा स्वास्थ्य संकट

हाल ही में ईरान की राजधानी तेहरान में मिसाइल हमलों (missile attacks) के बाद घना धुआं और काली बारिश (ब्लैक रेन-black rain) देखी गई है। इन हमलों में तेल भंडार और रिफाइनरियों को नुकसान पहुंचा, जिससे भारी प्रदूषण फैल गया। इसके चलते वर्षा पर्यावरण और मनुष्यों दोनों के लिए नुकसानदेह बारिश में बदल गई।

ब्लैक रेन का मतलब ऐसी बारिश से है जिसमें वायुमंडल में मौजूद प्रदूषक घुल जाते हैं। तेहरान में यह प्रदूषण जलते हुए तेल और ईंधन से पैदा हुआ है। जब ये पदार्थ जलते हैं, तो वायुमंडल में हाइड्रोकार्बन, सल्फर ऑक्साइड्स, नाइट्रोजन यौगिक और बेंज़ीन जैसे कई खतरनाक रसायन (toxic chemicals) फैल जाते हैं। जब बारिश इस प्रदूषित वायु से होकर गुज़रती है, तो ये कण उसमें घुल जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बारिश का पानी काला और हानिकारक बन जाता है।

बारिश का काला रंग मुख्य रूप से कालिख (soot) की वजह से होता है, जो अधूरी तरह से जलने पर बनने वाले बहुत छोटे कार्बन कण होते हैं। इसके अलावा, हमलों में टूटे-फूटे भवनों से निकली धूल और औद्योगिक कचरा भी इसमें मिल सकता है, जिससे यह और ज़्यादा हानिकारक बन जाता है। यानी ब्लैक रेन इस बात का संकेत है कि हवा अत्यधिक प्रदूषित (air pollution indicator) है।

तेहरान की भौगोलिक स्थिति ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है। यह शहर अल्बोर्ज़ पहाड़ों (Alborz mountains) के पास स्थित है, जहां तापमान व्युत्क्रमण (temperature inversion) की स्थिति बन जाती है। यानी गर्म हवा ऊपर और ठंडी हवा नीचे फंस जाती है, जिससे प्रदूषित हवा ऊपर नहीं उठ पाती और फैल नहीं पाती। नतीजतन, ज़हरीले कण भूमि के पास ही बने रहते हैं, जिससे खतरा और बढ़ जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों (health experts) की चिंता यह है कि लोग प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं और दूषित बारिश के संपर्क में आ रहे हैं। धुआं और बहुत बारीक कण सांस लेने में दिक्कत पैदा कर सकते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें पहले से दिल या फेफड़ों की बीमारी (heart and lung disease) है। गंभीर मामलों में यह हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण भी बन सकता है। शिशु और बच्चे सबसे अधिक जोखिम में हैं, क्योंकि उनका शरीर अभी विकसित हो ही रहा है।

एक बड़ी चिंता अतिसूक्ष्म (PM2.5) कणों की है। ये सूक्ष्म कण फेफड़ों के अंदर गहराई तक पहुंच जाते हैं और खून में भी मिल सकते हैं। इससे हृदयरोग, उच्च रक्तचाप (high blood pressure) के अलावा मस्तिष्क (brain health risk) पर भी असर पड़ सकता है। इसके अलावा, बारिश में मौजूद रसायन त्वचा और आंखों में जलन (skin and eye irritation) पैदा कर सकते हैं और अधिक मात्रा में होने पर गंभीर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।

बहरहाल, प्रशासन ने लोगों को सलाह दी है कि वे जितना हो सके घर के अंदर रहें और मौसम बदलने का इन्तज़ार करें।

तेहरान की यह स्थिति दिखाती है कि युद्ध (war environmental impact) के दौरान पर्यावरण को हुआ नुकसान बहुत जल्दी एक बड़े स्वास्थ्य संकट (public health crisis) में बदल सकता है, जिसके असर लंबे समय तक बने रह सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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