
सदियों से अश्वगंधा (Withania somnifera) की जड़ आयुर्वेद में तंदुरुस्ती और मनदुरुस्ती के लिए इस्तेमाल होती रही है। आज यह एक लोकप्रिय वेलनेस ट्रेंड (wellness trend) बन चुकी है। सोशल मीडिया और विज्ञापनों में इसे तनाव कम करने, नींद सुधारने, ऊर्जा बढ़ाने और दिमाग तेज़ करने जैसे कई फायदों से जोड़ा जा रहा है, जिससे इसकी लोकप्रियता काफी बढ़ गई है। लेकिन वैज्ञानिक रूप से इसके फायदे और असर भली-भांति साबित (scientific evidence) नहीं हुए हैं।
हाल के कई क्लीनिकल परीक्षणों (clinical trials) की समीक्षा से यह संकेत मिलता है कि अश्वगंधा तनाव, चिंता और अवसाद (stress anxiety depression) कम करने में मदद करता है। लेकिन इन अध्ययनों की अपनी सीमाएं हैं: वे छोटे स्तर पर किए गए हैं और उनके तरीके अलग-अलग हैं; इसलिए पक्के निष्कर्ष निकालना मुश्किल है। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे पूरी तरह प्रमाणित इलाज नहीं, बल्कि एक संभावित सहायक सप्लीमेंट (dietary supplement) मानते हैं, जिस पर अभी और अधिक शोध की ज़रूरत है।
अश्वगंधा की बढ़ती लोकप्रियता के चलते नियामक संस्थाओं (regulatory authorities) के बीच बहस भी पैदा हो गई है। फ्रांस और डेनमार्क जैसे देशों ने खासकर गर्भवती महिलाओं, बच्चों और कुछ बीमारियों से ग्रस्त लोगों के लिए इसकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। डेनमार्क ने तो 2023 में अश्वगंधा युक्त उत्पादों पर प्रतिबंध भी लगा दिया था। वहीं भारत का आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) इसे सामान्य रूप से सुरक्षित मानता है, लेकिन यह भी कहता है कि कुछ लोगों में इसके साइड इफेक्ट हो सकते हैं।
गौरतलब है कि अश्वगंधा एक बड़े और तेज़ी से बढ़ते सप्लीमेंट बाज़ार (supplement market) का हिस्सा है। आजकल कोलाजेन, मशरूम एक्सट्रैक्ट, प्रोबायोटिक्स, मैग्नीशियम और ओमेगा-3 जैसे सप्लीमेंट भी काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। अमेरिका और युरोप में बड़ी संख्या में लोग नियमित रूप से इनका सेवन करते हैं, और आने वाले समय में यह बाज़ार बहुत तेज़ी से बढ़ने वाला है। इनकी लोकप्रियता का बड़ा कारण यह दावा है कि ये विज्ञान-समर्थित हैं, यानी इनके फायदे वैज्ञानिक शोध (evidence based claims) से साबित हुए हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि कई सप्लीमेंट्स के पीछे का विज्ञान उतना साफ और स्पष्ट नहीं होता, जितना विज्ञापनों (marketing claims) में दिखाया जाता है। शुरुआत में सप्लीमेंट्स का इस्तेमाल विटामिन की कमी को पूरा करने के लिए होता था, जैसे रिकेट्स के लिए विटामिन डी का। लेकिन समय के साथ बाज़ार ऐसे उत्पादों की ओर बढ़ गया जो सामान्य सेहत सुधारने (general wellness) के लिए होते हैं, न कि किसी खास बीमारी के इलाज के लिए। दिक्कत यह है कि इनके ‘ऊर्जा बढ़ाने’ या ‘इम्युनिटी मज़बूत करने’ (immunity booster) जैसे दावों को सही तरह से मापना मुश्किल है।
नियम-कानून इस मामले को और जटिल बना देते हैं। कई देशों में सप्लीमेंट्स को दवाओं (food vs medicine regulation) की बजाय खाद्य पदार्थ माना जाता है, जहां उनकी सुरक्षा को प्रमाणित करना तो ज़रूरी होता है, लेकिन असर को साबित करना ज़रूरी नहीं होता। अमेरिका में स्थिति यह है कि यदि कंपनियां किसी बीमारी के इलाज का दावा न करें, तो अनुमति लिए बिना उसे लेकर सामान्य स्वास्थ्य से जुड़े दावे कर सकती हैं। इससे ये उत्पाद जल्दी बाज़ार में आ जाते हैं और निगरानी भी सीमित हो सकती है। वहीं युरोप में कंपनियों को ऐसे दावों के लिए ज़्यादा मज़बूत वैज्ञानिक प्रमाण (scientific proof) देने पड़ते हैं, लेकिन वहां भी कई बार अधूरी जानकारी के आधार पर ही निर्णय लिए जाते हैं।
एक और बड़ी समस्या यह है कि सप्लीमेंट्स एक जैसे नहीं होते। उनकी मात्रा, बनाने का तरीका और पौधे के किस हिस्से का उपयोग किया गया है (dosage variation), ये सब अलग-अलग हो सकते हैं। इसके चलते अलग-अलग अध्ययनों की आपस में तुलना करना मुश्किल हो जाता है (research variability)। उदाहरण के लिए, अश्वगंधा से जुड़ी कुछ सुरक्षा चिंताएं उन शोधों पर आधारित थीं, जिनमें बहुत अधिक मात्रा या पूरे पौधे का इस्तेमाल किया गया था, जो सामान्य उपयोग से अलग हो सकता है।
ऐसे सबूतों को समझना वैज्ञानिकों के लिए भी आसान नहीं होता। कई बार एक ही विषय पर अलग-अलग अध्ययन अलग नतीजे देते हैं, क्योंकि उनकी गुणवत्ता, सैंपल और तरीके अलग होते हैं। ऐसे में नियम बनाने वाली संस्थाओं को तय करना पड़ता है कि किस अध्ययन पर ज़्यादा भरोसा किया जाए। विशेषज्ञों के अनुसार, ये फैसले पूरी तरह अंतिम सच तय करने के बारे में नहीं होते, बल्कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर सबसे सही लगने वाले निष्कर्ष (data interpretation) तक पहुंचने की कोशिश होते हैं।
बहरहाल, विज्ञान-समर्थित सप्लीमेंट्स (science backed supplements) की बढ़ती लोकप्रियता से यह स्पष्ट होता है कि लोग अब अपनी सेहत पर खुद नियंत्रण रखना (self-care trend) चाहते हैं। लेकिन यह भी सामने आता है कि वैज्ञानिक शोध और विज्ञापनों के दावों में फर्क है। कुछ सप्लीमेंट्स सच में फायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन कई के लिए सबूत अभी सीमित या पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। इसलिए किसी नुस्खे के विज्ञान-समर्थित होने के दावे का मतलब यह नहीं है कि वह हमेशा असरदार ही होगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/a/ad/WithaniaFruit.jpg/500px-WithaniaFruit.jpg