
हालिया दिनों में चीन (China healthcare reforms) ने अपनी पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को वैज्ञानिक तरीके से परखने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। नए नियमों के तहत पारंपरिक चीनी चिकित्सा (TCM – Traditional Chinese Medicine) के इंजेक्शन बनाने वाली कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उनके उत्पाद सुरक्षित हैं, असरदार हैं और उनका वैज्ञानिक आधार (scientific validation) है। अगर ऐसा नहीं हो पाता, तो उनके उत्पाद बाज़ार से हटाए जा सकते हैं।
गौरतलब है कि इंजेक्शन (medical injections) सामान्य दवाओं की तरह मुंह से नहीं लिए जाते, बल्कि सीधे मासंपेशियों या शिराओं में लगाए जाते हैं। नए नियम सिर्फ इंजेक्शनों पर लागू होंगे। इन्हें कई वर्षों से दिल और फेफड़ों की बीमारियों के इलाज या कैंसर के उपचार के साइड इफेक्ट (cancer treatment side effects) कम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। अधिकांशत: ये मुंह से ली जाने वाली दवाइयों के ही सांद्रित रूप हैं। लेकिन समय के साथ इनकी प्रभाविता और सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हैं, और कुछ मामलों में गंभीर दुष्प्रभाव भी सामने आए हैं।
इस कदम से यह लगता है कि चीन अब पारंपरिक चिकित्सा को परखने का तरीका (evidence based medicine) बदल रहा है। पहले TCM मुख्य रूप से लंबे अनुभव और परंपरागत ज्ञान पर आधारित थी, लेकिन अब इसे आधुनिक वैज्ञानिक मानकों (clinical standards) के अनुसार जांचा जा रहा है। यानी अब आधुनिक दवाओं की तरह ही इनके असर और उपयोगिता को प्रमाणों के आधार पर परखा जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे यह साफ हो सकेगा कि कौन-से उपचार सच में काम करते हैं और कौन-से नहीं।
यह सख्ती 2019 में दवा कानूनों (drug regulation laws) में हुए बदलावों का हिस्सा है। इन बदलावों के तहत अब सभी नई दवाओं, चाहे वे पारंपरिक ही क्यों न हों, को सुरक्षा और प्रभावशीलता के आधुनिक मानकों पर खरा उतरना होगा। नए नियम अब उन पुराने TCM इंजेक्शनों (approved drugs review) पर भी लागू किए जा रहे हैं, जिन्हें पहले इन सख्त मानकों के बिना ही मंजूरी मिल गई थी।
हालांकि, कंपनियों को यह तय करने की छूट दी गई है कि वे अपने उत्पादों के लिए सबूत कैसे देंगे। कुछ निर्माता पहले से मौजूद क्लीनिकल डैटा (clinical data) या वास्तविक उपयोग के रिकॉर्ड का उपयोग कर सकते हैं जबकि कुछ को नए शोध – जैसे अन्य दवाओं से गहन तुलनात्मक परीक्षण (comparative trials) – का सहारा लेना पड़ेगा। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अभी मौजूद TCM इंजेक्शनों में से लगभग एक-तिहाई तो बिना अतिरिक्त शोध के नए मानकों पर खरे उतरेंगे। कई सारे उत्पादों के पास पर्याप्त सबूत (insufficient evidence) नहीं हैं, इसलिए उनके बाज़ार से हटने की संभावना है।
सिर्फ सुरक्षा और असर साबित करना ही काफी नहीं होगा, कंपनियों को यह भी बताना होगा कि उनकी दवा शरीर में कैसे काम करती है। यह आसान नहीं है, क्योंकि इन दवाओं में अक्सर कई सक्रिय तत्व (active compounds) होते हैं। कई बार अलग-अलग तत्व मिलकर असर दिखाते हैं, इसलिए यह समझना मुश्किल होता है कि असली प्रभाव किस वजह से हो रहा है।
इन चुनौतियों के बावजूद कुछ वैज्ञानिक इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि पारंपरिक दवाओं का गहराई से अध्ययन (pharmacological research) करने से नई औषधियों की खोज हो सकती है। इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण आर्टेमिसिनिन (artemisinin malaria drug) है, जो मलेरिया की दवा है और एक ऐसे पौधे से निकली है जिसका इस्तेमाल लंबे समय से चीनी पारंपरिक चिकित्सा में होता रहा है।
वैसे, जल्द ही लागू होने वाले ये नए नियम समस्त दवाइयों पर लागू रहेंगे, सिर्फ पारंपरिक चिकित्सा पर नहीं। इसके पीछे उद्देश्य है कि दवाओं के मज़बूत वैज्ञानिक प्रमाण हों, ताकि लोगों का भरोसा बढ़े और पारंपरिक चिकित्सा का महत्व भी बना रहे। इससे मरीज़ों को ज़्यादा सुरक्षित इलाज और यह स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी कि कौन-सी दवाएं वास्तव में असरदार हैं।
आज कई देश प्रमाण-आधारित चिकित्सा की ओर बढ़ रहे हैं; ऐसे में चीन का यह तरीका दुनिया भर में पारंपरिक उपचारों (global health policy) को परखने के लिए एक उदाहरण बन सकता है। भारत जैसे देश के लिए भी इस तरीके को अपनाना आवश्यक है जो पारंपरिक दवाओं का एक बड़ा बाज़ार है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zwsutnc/full/_20260318_on_traditional_chinese_medicines.jpg