दीमक भी खेती-किसानी करती हैं

हुत पहले, जब मनुष्य ने खेती (farming) करना सीखा भी नहीं था, तब कुछ दीमक प्रजातियां खेती (termite farming) में माहिर हो चुकी थीं। लगभग 5 करोड़ साल पहले दीमकों ने अपने भूमिगत बिलों में एक खास फफूंद (Termitomyces) उगाना शुरू किया था, जो उनका मुख्य भोजन बना। लेकिन खेती में इन्हें भी वही समस्या पेश आती थी – ‘खरपतवार’ यानी ऐसी फफूंद (weed fungus) पनपने की जो उनकी फसल को बर्बाद कर दे।

हालिया शोध (research) से पता चला है कि दीमक अपने खेतों को सुरक्षित रखने के लिए एक खास तरीका अपनाती हैं। जब उनकी फसल में खरपतवार फफूंद लग जाती है तो वे उतने हिस्से को ऐसी मिट्टी से ढंक देती हैं जिसमें प्राकृतिक फफूंदरोधी सूक्ष्मजीव (antifungal microbes) मौजूद होते हैं।

यह अध्ययन दीमक की प्रजाति Odontotermes obesus पर किया गया, जो दक्षिण एशिया में पाई जाती है। ये सूखी पत्तियों को चबा-चबाकर उनका कचूमर बिल के खास कक्षों में भर देती हैं। इन कक्षों का तापमान व नमी फफूंद (fungus growth) के पनपने के लिए एकदम सही रहती है। धीरे-धीरे पत्तियों के कचूमर (कॉम्ब) पर पनपती फफूंद को दीमक खा लेती हैं।

लेकिन जब कोई बाहरी हानिकारक फफूंद, जैसे Pseudoxylaria, हमला करती है तो दीमक तुरंत सक्रिय हो जाती हैं। प्रयोगशाला (laboratory) अध्ययनों में देखा गया कि दीमक संक्रमित हिस्से को मिट्टी में दबा देती हैं, जबकि स्वस्थ हिस्सों को नहीं। यह भी पता चला कि साधारण कीटाणुविहीन (स्टरलाइज़्ड – sterilized) मिट्टी हानिकारक फफूंद को नहीं रोक पाती। लेकिन दीमक के टीलों से ली गई मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक फफूंदरोधी सूक्ष्मजीव हमलावर फफूंद को पूरी तरह रोक देते हैं।

शोधकर्ताओं को सबसे अधिक प्रभावित दीमकों के लचीले व्यवहार ने किया। जब संक्रमण सीमित होता है तो वे सिर्फ संक्रमित हिस्से को साफ कर हटाती हैं। लेकिन अगर संक्रमण ज़्यादा फैल जाता है तो पूरे ‘कॉम्ब’ को दफना देती हैं ताकि बाकी बस्ती सुरक्षित रहे। एक और प्रयोग में, जब स्वस्थ हिस्सा संक्रमित हिस्से से जोड़ा गया तो दीमकों ने बहुत सावधानी से बीमार हिस्से को काटकर मिट्टी में दबा दिया और स्वस्थ फसल (healthy crop) को बढ़ने दिया।

IISER मोहाली के जीवविज्ञानी ऋत्विक रायचौधरी और उनकी टीम के अनुसार यह छोटे-छोटे जीवों की निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता को दर्शाता है। कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के माइकल पॉल्सन का कहना है कि दीमकों की यह कुशलता उनके पारिस्थितिक महत्व (ecological importance) को दर्शाती है। अपनी भूमिगत खेती (underground farming) संभालकर दीमक न केवल खुद का भोजन तैयार करती हैं, बल्कि पौधों के अवशेषों को उपजाऊ मिट्टी में बदलकर प्राकृतिक संतुलन (natural balance) में भी मदद करती हैं। शोधकर्ता यह जानना चाहते हैं कि दीमक खेती के तरीके कैसे तय करती हैं और सूक्ष्मजीवों (microbes) द्वारा हानिकारक फफूंद रोकने की क्रियाविधि क्या है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zqyk5jg/abs/_20250925_on_termites.jpg

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