शनि के चंद्रमा टाइटन का ओझल बर्फीला महासागर

रीब दो दशकों से शनि ग्रह का सबसे बड़ा चंद्रमा टाइटन (titan) वैज्ञानिकों के आकर्षण का केंद्र रहा है। माना जाता था कि उसकी मोटी बर्फीली सतह के नीचे तरल पानी का एक विशाल महासागर (subsurface ocean) छिपा है, जो जीवन की संभावना के लिए काफी अहम है। लेकिन हालिया शोध के अनुसार शायद ऐसा नहीं है।

टाइटन के अंदर महासागर होने का विचार 2000 के दशक के अंत में कैसिनी अंतरिक्ष यान (Cassini spacecraft) के आंकड़ों से आया था। कैसिनी जब-जब टाइटन के पास से गुज़रा, तो रेडियो संकेतों ने उसकी गति में बहुत हल्के बदलाव दर्ज किए। इससे टाइटन के गुरुत्वाकर्षण और आकार में हल्के बदलाव का पता चला। शनि के खिंचाव से टाइटन थोड़ा फैलता-सिकुड़ता दिखा, जिससे सतह पर 10 मीटर से ऊंचे ज्वार-भाटे जैसे प्रभाव बने। वैज्ञानिकों ने तब निष्कर्ष निकाला कि इतनी लचक तभी संभव है, जब बर्फ के नीचे तरल पानी का महासागर हो (liquid water ocean)।

इस सोच के चलते टाइटन को महासागरीय चंद्रमा के खास समूह में रखा गया था, जिसमें युरोपा और एन्सेलेडस (Europa Enceladus) जैसे चंद्रमा भी हैं। यह विचार टाइटन में कार्बनिक रसायन की भरपूर उपस्थिति के कारण भी था।

लेकिन नेचर में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है। ग्रह वैज्ञानिक फ्लावियो पेट्रिका और उनकी टीम का कहना है कि टाइटन के भीतर कभी महासागर रहा होगा, लेकिन आज वह शायद जम चुका है। हालांकि, उसकी मोटी बर्फीली परत के अंदर कुछ जगहों पर पिघले पानी के छोटे-छोटे पोखर हो सकते हैं।

इस बहस की जड़ है ऊर्जा। अगर टाइटन के अंदर अब भी बड़ा तरल महासागर होता, तो शनि के खिंचाव से पैदा होने वाली गर्मी का बड़ा हिस्सा उस महासागर को गर्म (tidal heating, internal energy) रखने में लग जाता। लेकिन कैसिनी द्वारा 124 नज़दीकी उड़ानों के डैटा का दोबारा विश्लेषण करने पर पता चला कि टाइटन बहुत ज़्यादा ऊर्जा बाहर छोड़ रहा है – करीब 4 टेरावॉट, जो आधुनिक मानव सभ्यता की लगभग एक-चौथाई ऊर्जा ज़रूरत के बराबर है। इतनी अधिक गर्मी का उत्सर्जन किसी विशाल तरल महासागर की उपस्थिति से मेल नहीं खाता।

इसमें एक और उलझन है। समय के साथ शनि के ज्वारीय खिंचाव को टाइटन की कक्षा को वृत्ताकार और स्थिर (orbital dynamics) बना देना चाहिए था, लेकिन टाइटन आज भी दीर्घवृत्ताकार पथ (elliptical orbit) पर घूम रहा है। पहले वैज्ञानिक मानते थे कि बहुत पहले किसी क्षुद्रग्रह की टक्कर ने इसकी कक्षा बिगाड़ दी होगी। लेकिन नया मॉडल एक आसान वजह बताता है: अगर टाइटन के भीतर तरल महासागर नहीं है, तो ऊर्जा को सोखने वाला कोई माध्यम नहीं होगा और कक्षा अस्थिर बनी रहेगी।

पेट्रिका की टीम ने टाइटन के दो मॉडल बनाए – एक जिसमें भीतर महासागर हो और दूसरा जिसमें न हो (interior planetary modeling)। जिस मॉडल में महासागर नहीं है, बल्कि करीब 500 किलोमीटर मोटी बर्फ की परत के नीचे चट्टानी कोर है, वही टाइटन से मिलने वाले आंकड़ों से बेहतर मेल खाता है (rocky core)। यह मॉडल टाइटन की गर्मी के उत्सर्जन, उसके झुकाव और शनि के खिंचाव के प्रति उसके व्यवहार, इन सभी बातों को एक ही ढांचे में समझाता है।

हालांकि, सभी वैज्ञानिक इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हैं। कुछ का कहना है कि टाइटन को ‘महासागरीय चंद्रमाओं’ की सूची से हटाने के लिए और ठोस सबूतों की ज़रूरत (evidence based research)है।

और तो और, इस नई खोज से टाइटन पर जीवन की संभावना (life on Titan) पूरी तरह खत्म नहीं होती। उल्टा, कुछ शोधकर्ताओं को यह विचार और भी संभावनाओं से भरा लगता है क्योंकि इसके अनुसार एक बड़े महासागर की जगह टाइटन की बर्फ के नीचे कई छोटी-छोटी तरल जल-राशियां हो सकती हैं, शायद कुछ तो अटलांटिक महासागर से भी बड़ी। ऐसे सीमित जल-क्षेत्र जीवन के लिए ज़रूरी रसायनों को बेहतर ढंग से सांद्रित कर सकते हैं।

इस बहस का जवाब शायद नासा के ड्रैगनफ्लाई मिशन (NASA Dragonfly mission) से मिलेगा, जो 2034 में टाइटन पर उतरने वाला है। यह मिशन ऐसे उपकरण लेकर जाएगा जो भूकंपीय तरंगों (seismic waves) को माप सकेंगे, जो ठोस बर्फ और तरल पानी में अलग-अलग तरह से व्यवहार करती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.sciencealert.com/images/2025/12/1-PIA18410-cassini-titan-crop-642×413.jpg

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