डॉ. सिसिन्थी शिवाजी के वैज्ञानिक योगदान

डॉ. सचिन शुक्ल, डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

डॉ. सिसिन्थी शिवाजी
(1952-2025)

डॉ. शिवाजी ने 1973 में बिट्स पिलानी से एम.एससी (BITS Pilani) की और 1977 में दिल्ली विश्‍वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि हासिल की। इसके बाद 1980 में वे हैदराबाद स्थित कोशिकीय एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र (सी.सी.एम.बी.-CCMB, hyderabad) में वैज्ञानिक के पद पर नियुक्त हुए। इस केंद्र से वे 2012 में निदेशक-स्तर के वैज्ञानिक के रूप में सेवानिवृत्त हुए। इस अवधि में उन्होंने लेबोरेटरी फॉर दी कन्ज़र्वेशन ऑफ एंडेंजर्ड स्पीशीज़ (LaCONES) की स्थापना में बहुमूल्य योगदान दिया|

तत्पश्चात, 2013 में उन्होंने एल.वी. प्रसाद नेत्र संस्थान (LV Prasad Eye Institute) में पदभार ग्रहण किया। यहां वे 2016 से 2020 तक प्रो. ब्राइयेन होल्डेन नेत्र अनुसंधान केंद्र के निदेशक पद पर कार्यरत रहे और जीवन पर्यंत जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने नेत्र सम्बंधी सूक्ष्मजीव संसार (Ocular Microbiome) की पहचान, नेत्र रोगों में सूक्ष्मजीव संसार और बीमारियों के दौरान इसमें होने वाले परिवर्तनों के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।

डॉ. शिवाजी ने अंटार्कटिका व आर्कटिक सागर, हिमालय क्षेत्र के हिमनदों (ग्लेशियर्स), वायुमंडल के समतापमंडल एवं हिंद महासागर, अंडमान द्वीपों, तथा लोनार झील के पानी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों के वर्गीकरण एवं जैव विविधता (extremophile microbes) पर अग्रणी अध्ययन किए।

उनकी मुख्य वैज्ञानिक उपलब्धियों को निम्न बिंदुओं में निरूपित किया जा सकता है:

1. उनके तीस वर्षों से भी अधिक (1984-2015) के अध्ययनों ने तीन नए जीवाणु समूहों: लोहाफेक्स-1 (LOHAFEX1), लोहाफेक्स-2 (LOHAFEX2) एवं लोहाफेक्स-3 (LOHAFEX3); सात नए वंशों (Genera); एवं अंटार्कटिका, आर्कटिक, एवं हिमालयी क्षेत्र के हिमनदों, वायुमंडल के समतापमंडल एवं हिंद महासागर, अंडमान द्वीपसमूह, तथा लोनार झील के जल में पाए जाने वाले जीवाणुओं एवं खमीर (यीस्ट) की 81 नई प्रजातियों की पहचान की है।

2. उनके द्वारा अंटार्कटिका में पाए जाने वाले जीवाणुओं (Antarctic bacteria) की 32 नई प्रजातियों की पहचान एक अत्यंत महत्वपूर्ण खोज है। गौरतलब है कि यह आंकड़ा अंटार्कटिका में अब तक खोजी गई कुल नई प्रजातियों का लगभग 12 प्रतिशत है।

3. उन्होंने ही विश्व में सर्वप्रथम वायुमंडल के समतापमंडल में पाए जाने वाले बैक्टीरिया (stratospheric bacteria) की सात नई प्रजातियों की उपस्थिति का प्रमाण प्रस्तुत किया|

उनके शोध अध्ययनों ने दो नए जीन्स की पहचान की जो निम्न तापमान पर जीवों के जीवन के लिए आवश्यक होते हैं – एस्पार्टेट एमीनोट्रान्सफेरेस एवं टी-आरएनए रूपांतरकारी एन्ज़ाइम जीटीपीएस का जीन (cold adaptation genes)।

4. सूक्ष्मजीवों के वर्गीकरण एवं विविधता पर उनके द्वारा किए गए शोधकार्यों ने ना केवल देश में अपितु विदेशों (जापान, जर्मनी एवं फ्रांस) में कार्यरत वैज्ञानिकों को भी सहयोग के लिए आमंत्रित किया है|

5. वे वर्ष 1984-85 में अंटार्कटिका पर भेजे गए चतुर्थ भारतीय अभियान दल के सदस्य थे एवं 2007 में आर्कटिक पर भेजे गए प्रथम भारतीय अभियान दल के सदस्य थे।

6. वे भारत की प्रमुख विज्ञान अकादमियों (राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, इलाहाबाद; भारतीय विज्ञान अकादमी, बंगलूरु; तेलंगाना विज्ञान अकादमी, हैदराबाद; एवं भारतीय सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक संघ) की सदस्यता (international scientific collaboration) से सम्मानित किए गए।

7. सूक्ष्मजीवों के वर्गीकरण पर किए गए उनके शोध कार्यों के लिए उन्हें 2002 में जीव विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्टता के अंटार्कटिक पुरस्कार; एवं 2016 में ध्रुवीय एवं हिमांक क्षेत्रीय विज्ञान के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 2014 में वे भारतीय सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक संघ द्वारा स्थापित कार्ल वॉसे स्मृति पुरस्कार के प्रथम प्राप्तकर्ता थे।

8. उन्होंने सूक्ष्मजीवों के वर्गीकरण एवं जैव विविधता, सूक्ष्मजैविकी, एवं आणविक जीव विज्ञान के क्षेत्र में 320 से भी अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए एवं सूक्ष्मजैविकी में तीन पुस्तकें प्रकाशित कीं।

उनके द्वारा खोजी गई नवीन जीवाणु प्रजातियां वर्तमान में राष्ट्रीय जैव-संसाधन (national bio resources) बन चुकी हैं। इनकी खोज में अनोखी जैव-तकनीक सामर्थ्य (उदाहरणस्वरूप हिमालय के सियाचिन क्षेत्र में रह रही हमारी सेनाओं के मानव अवशिष्ट का जैव-अपघटन) झलकती है।

विज्ञान के क्षेत्र में डॉ. शिवाजी को उनके विशिष्ट योगदान के लिए एक ऐसे वैज्ञानिक के रूप में सदैव सम्मानपूर्वक याद किया जाएगा जिन्होंने विभिन्न वैज्ञानिक क्षेत्रों, जैसे प्रजनन जीव विज्ञान, वन्यजीव संरक्षण, हिमजैविकी, एवं नेत्र सूक्ष्मजैविकी में अनूठा शोध किया (multidisciplinary scienceandIndian microbiologist); जैसा कि वे स्वयं अपने व्याख्यानों में कहा करते थे – “साइंस इज़ बेसिक, वाइल्ड, एंड कूल (science is basic, wild and cool)!” एक परोपकारी व्यक्ति होने के नाते उन्होंने अपने नेत्र दान कर दिए ताकि वे मरणोपरांत किसी ज़रूरतमंद के काम आ सकें| (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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