खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि अनुसंधान में निवेश ज़रूरी

ज़ुबैर सिद्दिकी

खाने-पीने की चीज़ें लगातार महंगी हो रही हैं। इसकी वजह सिर्फ युद्ध, आपूर्ति शृंखला की समस्याएं या जलवायु परिवर्तन नहीं है, बल्कि एक कम नुमाया वजह भी है – कृषि सम्बंधी वैज्ञानिक शोध और नवाचारों में लगातार घटता निवेश। यदि सरकारें जल्द ही कृषि शोध में निवेश को कम से कम दुगना नहीं करतीं, तो आने वाले वर्षों में भोजन और अधिक महंगा, उपलब्धता में कमी और पर्यावरण को अधिक नुकसान हो सकता है। यह बात नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में कही गई है, जिसे फिलिप जी. पारडे, कोनी चैन-कांग, गर्ट-जान स्टैड्स, युआन चाई, जूलियन एम. एलस्टन, जान ग्रेलिंग और हर्नान मुनोज़ ने संयुक्त रूप से तैयार किया है। यहां इसी अध्ययन का सार प्रस्तुत है।

पिछले 40 सालों में दुनिया की आबादी लगभग 80 प्रतिशत बढ़ी है, यानी करीब 3.5 अरब लोग बढ़े हैं। इसके बावजूद खाद्य उत्पादन मांग (global food production)  के साथ बना रहा, क्योंकि खेती में विज्ञान ने बड़ी भूमिका निभाई। बेहतर बीज, उर्वरक, मशीनें, कीट नियंत्रण, सिंचाई और भंडारण तकनीकों (agriculture technology) ने किसानों को उसी ज़मीन से ज़्यादा खाद्यान्न उगाने में मदद की। ये सुधार अपने-आप नहीं हुए, बल्कि सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा लंबे समय तक किए गए कृषि अनुसंधान और विकास में निवेश का नतीजा थे।

हालांकि, उपरोक्त दल द्वारा 1980 से 2021 तक 150 देशों में किए गए एक वैश्विक अध्ययन (global agriculture study) से एक चिंताजनक बात सामने आई है। आबादी बढ़ने और लोगों की आय बढ़ने के कारण भोजन की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन कृषि से जुड़े वैज्ञानिक शोध में निवेश (agricultural research investment) की रफ्तार धीमी पड़ती जा रही है – और कई देशों में तो यह घट भी रहा है। यह कमी पहले ही भोजन की बढ़ती कीमतों में योगदान कर रही है, और लंबे समय में इसके असर और भी गंभीर हो सकते हैं।

कृषि शोध की ज़रूरत को समझने के लिए हमें अब तक उसकी उपलब्धियों को देखना होगा। 1980 से 2021 के बीच दुनिया में कृषि से होने वाला उत्पादन लगभग 137 प्रतिशत बढ़ा, जबकि कृषि भूमि में बहुत ज़्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई। इसमें किसानों की मेहनत के साथ लंबे समय का वैज्ञानिक शोध महत्वपूर्ण था। रोग-रोधी गेहूं, जल्दी पकने वाला चावल, ज़्यादा दुधारू पशु और पानी की बचत करने वाली खेती – ये सभी दशकों के शोध से संभव हुए। इतिहास बताता है कि कृषि शोध में लगाया गया हर रुपया समाज को करीब दस रुपए से ज़्यादा का फायदा (research ROI agriculture) देता है, जिससे किसान और उपभोक्ता दोनों लाभान्वित होते हैं।

लेकिन खेती में नई तकनीक लाना आसान नहीं होता। एक नई फसल किस्म विकसित करने में 6 से 10 साल लग जाते हैं (crop development cycle), और फिर उसे किसानों तक पहुंचने में और समय लगता है। इसलिए आज कृषि शोध में किए गए फैसले आने वाले कई दशकों तक खाद्य कीमतों, उपलब्धता (future food security) और पर्यावरणीय टिकाऊपन को प्रभावित करेंगे।

वैश्विक निवेश की रफ्तार धीमी

रिपोर्ट बताती है कि 1980 से 2015 के बीच कृषि से जुड़े शोध पर दुनिया भर में खर्च हर साल औसतन 2.7 प्रतिशत बढ़ रहा था। लेकिन 2015 से 2021 के बीच यह बढ़ोतरी घटकर सिर्फ 1.9 प्रतिशत रह गई (decline in agri R&D funding), यानी करीब एक-तिहाई की गिरावट। अध्ययन में शामिल आधे से ज़्यादा देशों में शोध पर खर्च की रफ्तार धीमी पड़ी, और लगभग एक-तिहाई देशों में तो खर्च घट ही गया।

यह सुस्ती सभी तरह के देशों में दिख रही है। जो अमीर देश कभी कृषि शोध में सबसे आगे थे, वहीं सबसे ज़्यादा गिरावट नज़र आ रही है। 2015 से पहले जहां उनका खर्च सालाना करीब दो प्रतिशत बढ़ता था, अब वह वृद्धि एक प्रतिशत तक सिमट गई है। इनमें से लगभग हर चौथा देश कृषि शोध पर सरकारी खर्च कम कर चुका है।

मध्यम आय वाले देश – जैसे चीन, भारत और ब्राज़ील – अब भी निवेश बढ़ा रहे हैं, लेकिन वहां भी गति पहले जैसी तेज़ नहीं रही।  सबसे खराब हाल गरीब देशों के हैं: 2015 के बाद से इनमें से आधे से ज़्यादा देशों ने कृषि शोध पर वास्तविक खर्च घटा दिया है, जबकि इन्हीं देशों में खाद्य सुरक्षा की समस्या सबसे गंभीर है।

शोध में निवेश की कमी बहुत गलत समय पर हो रही है; जलवायु परिवर्तन खेती को और मुश्किल बना रहा है। ऊपर से मिट्टी और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधन भी कमज़ोर हो रहे हैं। ऐसे में कृषि को बचाने के लिए कम नहीं, बल्कि ज़्यादा शोध और नवाचार (innovation ecosystem agriculture) की ज़रूरत है।

फंडिंग का बदलता संतुलन

यह अध्ययन बताता है कि कृषि शोध के लिए पैसा लगाने वाले बदल रहे हैं। वर्ष 1980 में दुनिया भर में खेती से जुड़े शोध पर होने वाले कुल खर्च का लगभग दो-तिहाई हिस्सा सरकारों, विश्वविद्यालयों और सरकारी शोध संस्थानों से आता था। लेकिन 2021 तक निजी कंपनियां लगभग आधा खर्च उठाने लगी हैं।

यह बदलाव व्यापक आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों का नतीजा है। जैसे-जैसे देश विकसित होते हैं, खेती में तकनीक की भूमिका बढ़ती है और श्रम पर निर्भरता कम होती जाती है। इसके अलावा लोगों के खान-पान की आदतें भी बदल रही हैं – प्रोसेस्ड और पैक्ड खाद्य पदार्थ ज़्यादा खाए जा रहे हैं। इससे खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन और खुदरा तकनीकों में निजी निवेश बढ़ा है – खासकर अमीर देशों में।

निजी निवेश ज़रूरी और उपयोगी है, लेकिन वह सरकारी शोध की जगह नहीं ले सकता। कंपनियां आम तौर पर ऐसे शोध में पैसा लगाती हैं जिससे सीधा मुनाफा हो – जैसे बीज, रसायन, मशीनें या खाद्य उत्पाद। वहीं सरकार द्वारा वित्तपोषित शोध मिट्टी की सेहत सुधारने, पानी के टिकाऊ इस्तेमाल, पौधों की जेनेटिक्स को समझने व पर्यावरणीय असर को घटाने जैसे विषयों पर काम करता है। इनका सामाजिक लाभ बड़ा होता है लेकिन व्यापारिक मुनाफा कम।

अगर सरकारी और सार्वजनिक शोध पर खर्च घटता है, तो निजी नवाचार भी कमज़ोर पड़ता है, क्योंकि निजी क्षेत्र भी उन्हीं बुनियादी खोजों पर निर्भर करता है जो सरकारी फंडिंग से होती हैं। यानी सरकार द्वारा वित्तपोषित शोध में कटौती पूरी नवाचार प्रणाली की रफ्तार को धीमा कर देती है।

मध्यम-आय देशों का उद्भव और बढ़ती असमानता

1980 में जहां अमीर देश वैश्विक कृषि शोध खर्च पर हावी थे, वहीं 2021 तक मध्यम-आय देशों ने उन्हें पीछे छोड़ दिया। आज दुनिया के कुल कृषि शोध खर्च में लगभग आधा हिस्सा एशिया-प्रशांत क्षेत्र का है।

चीन, भारत और ब्राज़ील अब कृषि शोध में सबसे अधिक निवेश करने वाले देशों में शामिल हैं। यह उनकी बड़ी आबादी और खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताओं को दर्शाता है। कभी इस क्षेत्र का निर्विवाद नेता रहा अमेरिका अब न सिर्फ चीन से पीछे है, बल्कि सरकारी कृषि शोध खर्च में भारत से भी कम निवेश करता है।

लेकिन इसके साथ-साथ एक और चिंता बढ़ रही है – खर्च का अत्यधिक केंद्रीकरण। 2021 में कुल वैश्विक कृषि शोध खर्च में से लगभग 70 प्रतिशत दुनिया के सिर्फ शीर्ष 10 देशों से आता था, जबकि सबसे नीचे के 50 देशों का साझा हिस्सा सिर्फ 0.5 प्रतिशत (global inequality agriculture research) था। यह अंतर खास तौर पर उप-सहारा अफ्रीका जैसे गरीब क्षेत्रों के लिए चिंताजनक है, जहां 2050 तक 80 करोड़ से अधिक लोग जुड़ने की उम्मीद है, लेकिन जो अभी वैश्विक कृषि शोध खर्च का केवल 3 प्रतिशत  योगदान देता है।

पहले, गरीब देशों को अमीर देशों में हुए शोध से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और तकनीक हस्तांतरण के ज़रिए फायदा मिलता था (CGIAR जैसे कार्यक्रम)। लेकिन अब जब मध्यम-आय देश शोध खर्च पर हावी हो गए हैं, तो वे दुनिया के सबसे गरीब क्षेत्रों के लिए अंतर्राष्ट्रीय नवाचार में पर्याप्त निवेश नहीं कर रहे। उदाहरण के लिए, एशिया की खेती के लिए बनी तकनीकें अक्सर अफ्रीका (Sub-Saharan Africa food crisis) की जलवायु, मिट्टी, कीट-रक्षा, और बाज़ारों में सीधे काम नहीं आतीं।

भोजन की बढ़ती कीमतें

इस विश्लेषण का एक अहम निष्कर्ष यह है कि कृषि उत्पादन बढ़ने की रफ्तार स्वाभाविक रूप से धीमी (crop yield stagnation) पड़ रही है। पहले उत्पादन बढ़ाना अपेक्षाकृत आसान था, लेकिन अब जैविक और भौतिक सीमाएं आड़े आ रही हैं, जिससे फसलों की पैदावार बहुत धीरे-धीरे बढ़ती है। उदाहरण के लिए, 1960 के दशक में गेहूं की वैश्विक पैदावार को 50 प्रतिशत  बढ़ाने में लगभग 12 साल लगे थे, जबकि हाल के दशकों में इतना ही इज़ाफा करने में 30 साल से भी अधिक समय लग रहा है।

ऊपर से जलवायु परिवर्तन (climate change impact on farming) और पर्यावरणीय क्षरण खेती को और मुश्किल बना रहे हैं। मौजूदा उत्पादन स्तर को बनाए रखने के लिए ही अब पहले से अधिक निवेश की ज़रूरत पड़ रही है। यदि यह निवेश नहीं हुआ, तो पैदावार थम सकती है या घट सकती है, जिससे भोजन महंगा होगा और ज़मीन, पानी व प्राकृतिक तंत्रों पर दबाव बढ़ेगा।

चूंकि कृषि शोध की प्रभाविता दिखने में अक्सर दशकों लगते हैं, इसलिए आज निवेश घटने से तत्काल संकट तो नहीं आएगा। लेकिन यह आने वाले वर्षों के लिए ज़मीन तैयार कर देगा। नतीजतन भूख, कुपोषण, गरीबी, पर्यावरण क्षति और सामाजिक अशांति जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं।

क्या किया जाए?

शोधकर्ताओं का कहना है कि कृषि शोध (agri-food research funding) में घटते निवेश को तुरंत पलटना ज़रूरी है। अगले पांच साल में कृषि-खाद्य शोध पर वैश्विक खर्च दुगना किया जाना चाहिए और इसके बाद हर साल लगभग 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती रहनी चाहिए।

साथ ही, सरकारी और निजी शोध को बेहतर तालमेल (public-private partnership agriculture) के साथ आगे बढ़ना चाहिए। सरकारें ऐसे शोध में निवेश करें जिनमें जोखिम ज़्यादा हो लेकिन समाज को बड़ा लाभ मिले, जबकि कंपनियां वैज्ञानिक खोजों को उपयोगी उत्पादों और सेवाओं में बदलने पर ध्यान दें।

राजनीतिक बदलावों से कम प्रभावित नए वित्तीय मॉडल लंबे समय के शोध को टिकाऊ समर्थन दे सकते हैं। साथ ही, सरकारों को नियामक प्रणालियों को आधुनिक बनाना होगा ताकि जीन-एडिटिंग जैसी नई तकनीकों का सुरक्षित और ज़िम्मेदार इस्तेमाल किया जा सके।

नई तकनीकें (gene editing in agriculture) मदद को मौजूद हैं, लेकिन लगातार निवेश और मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना इन्हें किसानों और उपभोक्ताओं तक पहुंचाना मुश्किल होगा।

यदि सरकारें पिछले सफल अनुभवों पर भरोसा करके कृषि में निवेश कम करती रहीं, तो नतीजा होगा महंगा भोजन, बढ़ती असमानता (global food crisis risk) जिसका सर्वाधिक असर सबसे गरीब लोगों पर पड़ेगा। शोधकर्ताओं का संदेश साफ है: भविष्य में सस्ता और टिकाऊ भोजन इस बात पर निर्भर है कि हम आज निवेश के कैसे फैसले लेते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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शाकनाशी के असर सम्बंधी एक शोध पत्र रद्द किया गया 

शाकनाशक ग्लायफोसेट (glyphosate) के स्वास्थ्य पर असर को लेकर एक शोध पत्र 2000 में रेग्यूलेटरी टॉक्सिकोलॉजी एंड फार्मेकोलॉजी (Regulatory Toxicology and Pharmacology) नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ था। हाल ही में जर्नल ने इस शोध पत्र को निरस्त यानी रीट्रेक्ट (paper retraction) करने का निर्णय लिया है। निरस्त करने का कारण इस शोध पत्र के साथ जुड़े गंभीर नैतिक सरोकारों और इसके निष्कर्षों की वैधता के प्रति संदेहों को बताया गया है।

इस शोध पत्र में कहा गया था कि कीटनाशक ग्लायफोसेट (जिसे राउंड-अप के नाम से बेचा जाता है) मानव स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल असर नहीं डालता है।   

दरअसल, पूरा मामला तब शुरू हुआ था जब कुछ लोगों ने मॉनसेंटो के खिलाफ मुकदमा (Monsanto lawsuit) दायर किया कि उन्हें जो कैंसर (नॉन-हाजकिन्स लिम्फोमा – non-Hodgkin lymphoma) हुआ है वह ग्लायफोसेट की वजह से हुआ है। इस मुकदमे के दौरान यह उजागर हुआ था कि 2015 में इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर की रिपोर्ट (IARC report)  में यह निष्कर्ष दिया गया था कि संभवत: ग्लायफोसेट एक कैंसरकारी पदार्थ है। यह प्रमाण मुकदमे की सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किया जा सकता था।

मॉनसेंटो इस प्रमाण को गलत साबित करने में जुट गई। सुनवाई के दौरान सामने आया कि कंपनी ने कुछ शोधकर्ताओं से संपर्क किया था कि वे एक समीक्षा पर्चे (review paper) में यह कहें कि ग्लायफोसेट का ऐसा कोई असर नहीं होता है। कंपनी अधिकारियों के आंतरिक ईमेल वार्तालाप (internal emails) से यह साज़िश उजागर हो गई।

शोध पत्र को निरस्त करते हुए जर्नल ने कहा है कि उपरोक्त शोध पत्र के लेखकों ने मात्र उन्हीं अध्ययनों को समीक्षा में शामिल किया था जो मॉनसेंटो द्वारा किए गए थे और अप्रकाशित (unpublished studies) थे। लेखकों ने कई सारे बाहरी प्रकाशित अध्ययनों को अनदेखा कर दिया था, हालांकि वे भी समकक्ष समीक्षा (पीयर रिव्यू – peer review) आधारित जर्नल्स में प्रकाशित नहीं हुए थे।

उपरोक्त शोध पत्र के तीन लेखकों में से दो (रॉबर्ट क्रोस और इयान मनरो) का निधन हो चुका है। जर्नल ने शोध पत्र निरस्त करने से पहले तीसरे लेखक गैरी विलियम्स (Gary Williams) से संपर्क किया मगर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

समीक्षा पर्चे के निरस्त होने के बाद मॉनसेंटो के खिलाफ मुकदमा लड़ रहे फरियादियों (plaintiffs) की राह की एक बाधा दूर हो गई है। इस समीक्षा पर्चे के आधार पर मॉनसेंटो दावा कर रहा था कि वैज्ञानिक अध्ययन ग्लायफोसेट को हानिरहित प्रमाणित करते हैं। वैसे मॉनसेंटो (अब बायर (Bayer acquisition) के स्वामित्व में) ने एक बयान में कहा है कि इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर की रिपोर्ट मात्र एक रिपोर्ट है और दुनिया भर की नियामक संस्थाएं सहमत हैं कि ग्लायफोसेट का उपयोग निरापद है और यह कैंसरकारी नहीं है।

अब इतना तो स्पष्ट है कि इस समीक्षा पर्चे को कहीं भी उद्धरित (citation ban) नहीं किया जा सकेगा और इसके हवाले से ग्लायफोसेट को हानिरहित नहीं बताया जा सकेगा। लेकिन अभी भी यूएस पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (US EPA) और युरोपियन केमिकल्स एजेंसी (European Chemicals Agency) ने अपना निर्णय बदला नहीं है। दूसरी ओर, मॉनसेंटो के प्रभाव में लिखे गए कुछ अन्य शोध पत्रों (industry-funded research) पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बहुउपयोगी गन्ना

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

हाल ही में ओलिवियर गार्समूर और उनके साथियों ने सेल पत्रिका में एक शोधपत्र प्रकाशित किया है। इसका शीर्षक है ‘जंगली गन्ना प्रजातियों के जीनोमिक चिन्ह गन्ने को पालतू बनाने, उसके विविधिकरण और उसकी आधुनिक खेती के बारे में बताते हैं (The genomic footprints of wild Saccharum species trace domestication, diversification, and modern breeding of sugarcane)’। इस शोध में ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, चीन, फ्रांस, फ्रेंच पोलिनेशिया, भारत, जापान और यू.एस. की गन्ने की 390 किस्मों का जीनोमिक विश्लेषण किया गया।

ये पौधे कई तरह के जीन्स के संकर (हाइब्रिड) थे, जिनमें कई क्रोमोसोम एकाधिक (पॉलीप्लॉइडी) थे। ऐसी पॉलीप्लॉइड (polyploid crops) किस्में मनुष्यों द्वारा व्यावसायिक निर्यात की वजह से बनीं। मनुष्य गन्नों को देश के अलग-अलग राज्यों से लेकर अफगानिस्तान, श्रीलंका और इंडोनेशिया जैसे देशों में निर्यात करते और बेचते थे।

उन्होंने यह भी बताया कि एक ओर तो गन्ना एक मुनाफे की फसल है, जिसका इस्तेमाल इसकी मिठास के कारण किया जाता है। दूसरी ओर, इसका इस्तेमाल बायोएथेनॉल बनाने (bioethanol production) के लिए भी किया जाता है, जिसे निजी, सार्वजनिक और व्यावसायिक वाहनों के जीवाश्म ईंधन के एक स्वच्छ विकल्प के तौर पर बनाया जाता है।

भारत में गन्ना

भारत में गन्ने की पैदावार बहुत ज़्यादा होती है, खासकर 13 राज्यों में। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और गुजरात 2018-19 से 2023-24 तक गन्ने के शीर्ष पांच उत्पादक राज्य रहे। 2024-2025 में करीब 4400 लाख टन गन्ने का उत्पादन (India sugarcane production) हुआ था।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भी देश भर में कई शुगर रिसर्च इंस्टीट्यूट बनाए हैं जो गन्ने की किस्मों और पैदावार को बेहतर बनाने (sugarcane breeding) के लिए पारंपरिक वानस्पतिक तरीकों और आणविक जीव विज्ञान के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। इनमें से तमिलनाडु के कोयंबटूर में स्थित सबसे पुराने शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट ने गन्नों में जेनेटिक विविधता देखने के लिए भारत भर के चार अलग-अलग मूल के गन्नों का आणविक जेनेटिक विश्लेषण किया था। 2006 में किए गए इस विश्लेषण के नतीजे जेनेटिक रिसोर्सेज़ एंड क्रॉप इवॉल्यूशन जर्नल में प्रकाशित हुए थे।

शुरुआत में वर्णित गार्समूर के शोध में विश्लेषण के लिए पश्चिमी देशों और चीन के गन्नों के नमूने लिए गए थे। वहीं कोयंबटूर के शोधकर्ताओं ने अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु के नमूनों का विश्लेषण किया। जेनेटिक विश्लेषण में शोधकर्ताओं ने पाया कि अरुणाचल प्रदेश में गन्ने की किस्मों में सबसे अधिक विविधता थी (genetic diversity crops)।

2018 में, 3 बायोटेक में प्रकाशित एक पेपर में लखनऊ स्थित भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने देश के उपोष्णकटिबंधीय हिस्सों की गन्ने की 92 किस्मों की जेनेटिक विविधता और आबादी की संरचना का भी विश्लेषण किया (molecular markers) । इसके नतीजे भी भारत में कई तरह के गन्ने की प्रचुरता की ओर इशारा करते हैं।

चीन, भारत और पाकिस्तान में पारंपरिक औषधि (traditional medicine) बनाने वाले भी अपनी चिकित्सा में गन्ने का इस्तेमाल करते रहे हैं। इस संदर्भ में हाल ही में चीन के शोधकर्ताओं द्वारा एक समीक्षपत्र प्रकाशित किया गया है, जिसका शीर्षक है ‘गन्ने का रासायनिक संगठन और जैविक गतिविधियां: संभावित औषधीय महत्व एवं निर्वहनीय विकास’, (The chemical composition and biological activities of sugarcane: Potential medicinal value and sustainable development)। यह पेपर बताता है कि पारंपरिक चीनी औषधियों के स्रोत टिकाऊ विकास के मामले में गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं, ये स्रोत घट रहे हैं। और, यह समस्या प्राकृतिक पर्यावरण में हो रहे बदलावों और मनुष्यों द्वारा की जा रही अनियंत्रित कटाई से और बढ़ रही है।

इसलिए, पारंपरिक चीनी औषधियों के स्रोतों के रखरखाव और विकास के लिए उन स्रोतों का अध्ययन करना बहुत ज़रूरी है जिनमें औषधीय महत्व और कृषि क्षमता है, साथ ही उनके नए इस्तेमाल खोजना भी ज़रूरी है। अपनी समीक्षा में, लेखकों ने गन्ने के रासायनिक संगठन और इसकी संभावित जैवगतिविधियों पर चर्चा की है, चिकित्सा में इसके उपयोग को समझा है, और भविष्य के शोध की संभावित दिशा बताई है।

गार्समूर और उनके साथियों ने भी बताया है, गन्ने का इस्तेमाल बायोएथेनॉल बनाने के लिए भी किया जाता है (green fuel), जो कार और बस जैसी सवारी गाड़ियों के साथ-साथ ट्रकों के डीज़ल या पेट्रोल का एक हरित विकल्प है। भारत ने भी बायोएथेनॉल बनाने के लिए गन्ने के अपशिष्ट, चावल और गेहूं का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस मंत्रालय ने असम में बायोएथेनॉल बनाना शुरू कर दिया है। कुल मिलाकर, हम गन्ने पर आधारित एक हरित भारत की उम्मीद करते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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कीड़े-मकोड़े भी आम खाद्य हो सकते हैं

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

विश्व की आबादी के लिए खाद्य उत्पादन (food production) में कीट कई तरह से मदद करते हैं। कीट हमारे फसली पौधों का परागण करते हैं, सड़ते-गलते पौधों और जानवरों के अवशेषों को विघटित करते हैं, और प्राकृतिक कीट नियंत्रक (natural pest control) भी हैं। और तो और, हम मधुमक्खियों से प्राप्त शहद खाते हैं।

कीट हमारे चारों ओर मौजूद हैं। लेकिन यदि हम कीटभक्षण (entomophagy), यानी कीटों या उनके लार्वा को खाने की बात करेंगे तो हममें से कई लोग इन्हें खाने के नाम से कतराएंगे। इसका एक कारण शायद निओफोबिया (neophobia) है, यानी कुछ नया आज़माने का डर या हिचक।

साथ ही, आज हम पृथ्वी के अत्यधिक दोहन (overexploitation) को लेकर भी चिंतित हैं। हमें ऐसे खाद्य पदार्थों की ज़रूरत है जो प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन/उपभोग किए बिना उच्च-गुणवत्ता की कैलोरी (nutrition) दें सकें। कीट इस अपेक्षा पर खरे उतरते हैं। शुष्क भार के हिसाब से उनमें 40 प्रतिशत प्रोटीन, 20-30 प्रतिशत वसा और पोटेशियम-आयरन जैसे खनिज (minerals) भी होते हैं।

दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी पहले से ही खाने योग्य कीट (edible insects) खा रही है। कुछ कीटों को स्वादिष्ट माना जाता है। मैक्सिकन एस्कैमोल (Mexican escamoles) का स्वाद मक्खन लगे बेबीकॉर्न जैसा होता है। मैक्सिकन एस्कैमोल को ‘रेगिस्तान का पकवान’ कहा जाता है, जो वास्तव में पेड़ों पर बिल बनाने वाली मखमली चींटी (Liometopum occidentale) के तले हुए प्यूपा और लार्वा होते हैं। शेफ शेरिल किर्शेनबाम (Cheryl Kirshenbaum) ने वर्ष 2023 में पीबीएस पर ‘सर्विंग अप साइंस’ के एक एपिसोड में स्वादिष्ट कीट मेनू के बारे में बताया था।

भारत में, पूर्वोत्तर राज्यों, ओडिशा और पश्चिमी घाट के स्थानीय समुदाय के लोग खाद्य कीट (insect diet in India) खाते हैं। इन्हें खाने के चलन की जड़ उनकी पोषण सम्बंधी आवश्यकताओं (nutrition needs), सांस्कृतिक आदतों और लोक चिकित्सा तरीकों में निहित है। पूर्वोत्तर में आदिवासी और ग्रामीण आबादी कथित तौर पर प्रोटीन पूर्ति के लिए 100 से अधिक खाद्य कीट प्रजातियां खाती हैं। इन कीटों को स्थानीय बाज़ारों में बेचा भी जाता है। तले, भुने या पके हुए गुबरैले, पतंगे, हॉर्नेट और जलकीट (water bugs) चाव से खाए जाते हैं – जबकि मक्खियां नहीं खाई जातीं।

चूंकि कीटों की आबादी घट रही है, ऐसे में प्रकृति में मौजूद कीटों को पकड़ना और उन्हें खाना, टिकाऊ विचार नहीं हो सकता। इसलिए कुछ समूहों ने अर्ध-पालतूकरण (semi-domestication) का तरीका अपनाया है, जिसमें कीटों और उनके लार्वा का पालन-पोषण (insect farming) और वृद्धि मनुष्यों द्वारा की जाती है। लुमामी स्थित नागालैंड विश्वविद्यालय (Nagaland University) के नृवंशविज्ञानी इस पर अध्ययन कर रहे हैं कि कीट पालन के पारंपरिक तरीकों और नई प्रजातियों की खेती के लिए कैसे इन तरीकों को अनुकूलित किया जा सकता है।

नागालैंड और मणिपुर (Northeast India) की चाखेसांग और अंगामी जनजातियां एशियाई जायंट हॉर्नेट (Asian giant hornet) को एक स्वादिष्ट व्यंजन मानती हैं; वे इनके वयस्क जायंट हार्नेट को भूनकर और इनके लार्वा को तलकर खाते हैं। इन हॉर्नेट का अब अर्ध-पालतूकरण किया जा रहा है। इनकी खेती इनका खाली छत्ता/बिल खोजने से शुरू होती है। मिलने पर इनके छत्ते/बिल को एक मीटर गहरे पालन गड्ढे (rearing pit) में लाया जाता है, जो मिट्टी से थोड़ा भरा होता है। खाली छत्ते/बिल को गड्ढे के ठीक ऊपर एक खंभे से बांध दिया जाता है और पोली मिट्टी से ढंक दिया जाता है। जल्द ही एक रानी हॉर्नेट (queen hornet) के साथ श्रमिक हॉर्नेट इसमें आ जाते हैं, जो ज़मीन के नीचे छत्ते/बिल को विस्तार देना शुरू कर देते हैं। परिणामस्वरूप एक उल्टे पिरामिड जैसी एक बड़ी बहुस्तरीय संरचना बनती है। दोहन के लिए, वयस्क हॉर्नेट को धुआं दिखाया जाता है और लार्वा निकाल लिए जाते हैं।

तमिलनाडु में अन्नामलाई पहाड़ियों के आसपास के आदिवासी समूह बुनकर चींटियों (weaver ants) का उपयोग भोजन और औषधीय संसाधन (medicinal use) के रूप में करते हैं। अंडों, लार्वा और वयस्कों की मौजूदगी वाले पत्तों के घोंसलों को भूनकर और फिर सिल-बट्टे पर पीसकर मसालेदार सूप बनाया जाता है। ततैया और दीमक के छत्तों का भी ऐसा ही उपयोग किया जाता है और मधुमक्खियों को श्वसन (respiratory diseases) और जठरांत्र सम्बंधी बीमारियों (digestive health) को कम करने के लिए स्वास्थ्य पूरक के रूप में खाया जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) का मानना है कि आहार में कीटों को शामिल करना (insect-based diet) स्थायी खाद्य उत्पादन (sustainable food production) की कुंजी हो सकती है। कीट प्रसंस्करण (insect processing) की रणनीतियां उन्हें अधिक स्वीकार्य बना सकती हैं। झींगुर (crickets), भंभीरी (beetles) और टिड्डे (locusts) के पाउडर (या आटे) का उपयोग अब मट्ठा पाउडर की तरह ही प्रोटीन पूरक (protein supplement) के रूप में किया जाता है।

जैसे-जैसे आहार सम्बंधी रुझान (food trends) विकसित हो रहे हैं, वैसे-वैसे हम मोटे अनाज (millets) अपना रहे हैं, और प्रयोगशाला में तैयार किए गए मांस (lab-grown meat) को आज़माना चाह रहे हैं; हो सकता है कि जल्द ही हमारी थाली में कीट (insect cuisine) भी परोसे जाएं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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स्थानीय जैव-विविधता से धान का सर्वोत्तम विकास

भारत डोगरा

धान (rice crop) विश्व की सबसे महत्वपूर्ण फसल है। अत: बहुराष्ट्रीय कंपनियां यह भरपूर प्रयास कर रही हैं कि उनके नियंत्रण वाली जीएम (GM crops) व जीन परिवर्तित फसलें चावल में भी चल निकलें। दूसरी ओर, किसानों के हित में यह है कि यहां की देशी विविधता भरी धान की किस्मों को खेतों में उगाया जाए। यह भारत के संदर्भ में तो और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में धान की जैव-विविधता (rice biodiversity) का विशाल भंडार है। इन्हें हमारे पूर्वज किसानों ने एकत्र किया परंतु बहुराष्ट्रीय कंपनियां इनसे मुनाफा कमाना चाहती हैं।

भारत के विख्यात धान वैज्ञानिक डॉ. आर. एच. रिछारिया 1960-70 के दशक में केंद्रीय धान अनुसंधान संस्थान (Central Rice Research Institute) कटक के निदेशक रहे। यहां उन्होंने देशी विविधता भरी किस्मों पर आधारित महान धान विकास कार्यक्रम तैयार किया था। लेकिन इससे पहले कि वे इसे कार्यान्वित कर पाते विदेशी किस्मों को बाहर से लाद दिया गया व डॉ. रिछारिया को अपना पद छोड़ना पड़ा। फिर भी उनके अति विशिष्ट योगदानों को देखते हुए सरकार ने बार-बार उनका परामर्श लेने की ज़रूरत समझी।

1960-70 के दशक के मध्य में विदेशी सहायता संस्थाओं और अनुसंधान केंद्रों के दबाव में भारतीय सरकार ने चावल की बौनी व रासायनिक खाद का अधिक उपयोग करने वाली किस्मों के प्रसार का निर्णय लिया। इन्हें चावल की ‘अधिक उत्पादक किस्में’ (हाई यील्डिंग वेरायटी – एच.वाय.वी.) (high yielding varieties – HYV) कहा गया। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इतनी ही या इससे अधिक उत्पादकता देने वाली देशी किस्मों को अधिक उत्पादक किस्मों की सरकारी सूची में सम्मिलित नहीं किया गया, और विदेशी किस्मों को अधिक उत्पादकता का एकमात्र स्रोत मान लिया गया। इन्हें देश के अनेक भागों मे ‘हरित क्रांति किस्में’ (Green Revolution rice) कहा जाता है। Text Box: धान उत्पादकता की औसत वार्षिक वृद्धि दर प्रति हैक्टर
हरित क्रांति से पूर्व	हरित क्रांति के बाद	
(1951-52 से 1967-68) 	(1968-69 से 1980-81)
	3.2 प्रतिशत	2.7 प्रतिशत
(स्रोत - 12वीं पंचवर्षीय योजना)

नीचे प्रस्तुत तालिका से स्पष्ट है कि अपेक्षाकृत कम रासायनिक खाद व अन्य खर्च के बावजूद धान उत्पादकता (paddy yield) में वृद्धि दर हरित क्रांति या विदेशी किस्मों के प्रसार से पहले अधिक थी।

विदेशी अधिक उत्पादक किस्मों की इस विफलता के क्या कारण हैं? फरवरी 1979 में केंद्रीय धान अनुसंधान संस्थान, कटक में डॉ. रिछारिया की अध्यक्षता में हुई धान प्रजनन के ख्यात विशेषज्ञों की बैठक में इस विफलता के कुछ कारण बताए गए थे – विदेशी अधिक उत्पादक किस्मों का भारत के अधिकतर धान उत्पादन क्षेत्र के लिए अनुकूल न होना व बीमारियों व कीड़ों आदि के प्रति अधिक संवेदनशील होना। कहा गया कि

“अधिकतर एच.वाय.वी. टी.एन.(1) या आई.आर.(8) से व्युत्पादित है व इस कारण उनमें बौना करने का डी.जी.ओ.वू. जेन का जीन है। इस संकीर्ण आनुवंशिक आधार से भयप्रद एकरूपता उत्पन्न हो गई है, इसी कारण विनाशक जंतुओं (कीट आदि) व बीमारियों के प्रति संवेदनशीलता भी बढ़ी है। प्रसारित की गई अधिकतर किस्में प्रारूपी उच्च भूमि व निम्न भूमि (टिपिकल अपलैंड्स एंड लोलैंड्स), जो देश में कुल चावल क्षेत्र का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा है, के लिए अनुकूल नहीं है। इन स्थितियों में सफलता के लिए हमें अपने अनुसंधान कार्यक्रमों व रणनीतियों को पुन:उन्मुख करने की आवश्यकता है।” एक अन्य स्थान पर इसी टास्क फोर्स (task force) ने कहा है, “भारत में जारी की गई विभिन्न धान की किस्मों की वंशावली को सरसरी निगाह से देखने से ही स्पष्ट हो जाता है कि जनन द्रव्य का आधार बहुत संकीर्ण है।”

नई किस्मों की विनाशक जंतुओं (पेस्ट) के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता के विषय में टास्क फोर्स ने कहा है, “एच.वाय.वी. के आगमन से गालमिज, भूरे फुदके (ब्राऊन प्लांटहॉपर), पत्ती मोड़ने वाले कीड़े (लीफ फोल्डर) वोर्ल मैगट जैसे विनाशक कीटों की स्थिति में उल्लेखनीय तब्दीली आई है। चूंकि अब तक जारी की गई अधिकतर एच.वा.वी. मुख्य विनाशक जंतुओं के प्रति संवेदनशील है, 30 से 100 प्रतिशत तक फसल की हानि होने की संभावना रहती है। उत्पादकता को स्थायित्व प्रदान करने के लिए अंतर्निहित प्रतिरोध (बिल्ट इन रज़िस्टेंस) (built in resistance) वाली किस्मों का विकास अति आवश्यक हो गया है।” किंतु प्रतिरोधक किस्मों के विकास का पिछला रिकार्ड तो कतई उत्साहवर्द्धक नहीं रहा है, जैसा कि टास्क फोर्स ने स्वीकार किया, “कीट प्रतिरोधक प्रजनन कार्यक्रम के परिणाम अभी तक उत्साहपूर्वक नहीं रहे हैं। हालांकि विनाशक जंतुओं की प्रतिरोधी कुछ किस्में जारी की गई हैं लेकिन रत्न के अलावा इनमें से किसी का भी अच्छा प्रसार नहीं हुआ है। रत्न का भी अच्छा प्रसार वेधकों के प्रति इसकी सहनशील प्रकृति के कारण नहीं अपितु इसके अच्छे दाने, तैयार होने की कम अवधि व व्यापक अनुकूलनशीलता के कारण हुआ है।”

“गालमिज के लिए हालांकि बहुत सारे प्रतिरोधक दाता मिले हैं, पर अभी तक देश में जारी की गई अधिकतर प्रतिरोधक किस्में या तो कम उत्पादक हैं अथवा विभिन्न स्थानों पर उगाये जाने पर, प्रतिरोध में एकरूपता नहीं दिखाती हैं। यहां भी ऊंची उत्पादकता (high yeild) व अधिक स्थायी प्रतिरोध के मिलन को प्राप्त नहीं किया जा सका है।”

टास्क फोर्स के इन उद्धरणों में हम इतना ही जोड़ना चाहेंगे कि एच.वाय.वी. की ये समस्यायें अभी तक बनी हुई हैं। इसके साथ यह भी जोड़ देना उचित है कि कम साधनों वाले छोटे किसानों के लिए ये किस्में विशेष रूप से समस्याप्रद है। इन किस्मों के आगमन के बाद धान उत्पादन का अधिक बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत समृद्ध क्षेत्रों व अपेक्षाकृत समृद्ध किसानों के खेतों से प्राप्त होने लगा है, क्षेत्रीय व व्यक्तिगत विषमताएं बढ़ी है।

जब धान के संदर्भ में सरकार द्वारा बहुप्रचारित हरित क्रांति (green revolution in india) की विफलता सामने आने लगी और रासायनिक खाद व कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता हानिकारक सिद्ध होने लगी तो देश की इस सबसे महत्वपूर्ण फसल के बारे में चिंतित सरकार को वर्षों से उपेक्षित इस महान कृषि वैज्ञानिक की याद आई। तब वर्ष 1983 में श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने उन्हें धान उत्पादन बढ़ाने के लिए एक कार्ययोजना बनाने का आग्रह किया। डॉ. रिछारिया ने ऐसी कार्य योजना तैयार की, पर श्रीमती इंदिरा गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या के बाद यह दस्तावेज भी उपेक्षित रह गया।

डॉ. रिछारिया की कार्य योजना के शब्दों में, “मुख्य समस्या अनचाही नई चावल किस्मों को जल्दबाज़ी में जारी करना है। हमने देसी ऊंची उत्पादकता की किस्मों को नकार कर बौनी (विदेशी) एच.वाय.वी. किस्मों के आधार पर अपनी रणनीति निर्धारित की। हम सूखे की स्थिति को भी भूल गए, जब इन विदेशी एच.वाय.वी. में उत्पादकता गिरती है। अधिक सिंचाई व पानी में उगाई जाने पर ये किस्में बीमारियों व नाशक जीवों के प्रति संवेदनशील रहती हैं, जिनका नियंत्रण आसान नहीं है व इस कारण भी उत्पादकता घटती है।” निष्कर्ष में डॉ. रिछारिया कहते हैं, कि जब नींव ही कमज़ोर है (विदेशी जनन द्रव्य) तो इस पर बना भवन ढहेगा ही।

योजना में एक अन्य स्थान पर उन्होंने लिखा है, “धान में विफलता का सबसे महत्वपूर्ण व नज़दीकी कारण किसी क्षेत्र में पूरी तरह या आंशिक तौर पर धान की किस्मों का बार-बार (या जल्दी-जल्दी) बदलना है। यह इस कारण है क्योंकि पर्यावरण में पहले के जनन द्रव्य के संदर्भ में जो कृषि पारिस्थितकी संतुलन शताब्दियों तक अनुभवजन्य प्रजनन व चयन की प्राकृतिक प्रक्रिया में बन गया था, वह अस्त-व्यस्त हो जाता है।”

सौभाग्यवश, देसी (indigenous varieties) अधिक उत्पादकता की किस्में, जो स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल हैं, देश में उपलब्ध हैं। 1971-74 के दौरान मध्य प्रदेश में किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला था कि देसी किस्मों में से 8 प्रतिशत अधिक उत्पादकता की किस्में हैं अथवा उनकी उत्पादकता 3705 किलोग्राम धान प्रति हैक्टर से अधिक है।

इसे ध्यान में रखते हुए एच.वाय.वी. को पुन: परिभाषित करना आवश्यक है, क्योंकि अब तक सरकारी स्तर पर उनकी पहचान विदेशी, बौनी, अधिक रासायनिक खाद की खपत करने वाली किस्मों के संदर्भ में ही की गई है।

अनुसंधान व प्रसार दोनों क्षेत्रों में डॉ. रिछारिया अधिकाधिक विकेंद्रीकरण (decentralized research) को महत्व देते हैं। यह धान के पौधों की अपनी विशिष्टताओं के कारण भी अनिवार्य है। उनके शब्दों में, “करोड़ों को भोजन देने वाले चावल के पौधों की यदि सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बतानी हो तो यह इसकी (भारत व अन्य चावल उत्पादक क्षेत्रों में फैली) हज़ारों किस्मों में ज़ाहिर विविधता है।” अत: उन्होंने धान उगाने वाले पूरे क्षेत्र में ‘अनुकूलन धान केंद्रों’ का एक जाल-सा बिछा देने का सुझाव दिया। “अनुकूलन धान केंद्र अपने क्षेत्र से एकत्र सभी स्थानीय धान की किस्मों के अभिरक्षक होंगे। भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए उन्हें अपने प्राकृतिक माहौल में ही जीवित रखा जाएगा।” इन केंद्रों के कार्य ये होंगे : ()   चावल के विकसित जेनेटिक संसाधनों को भविष्य के अध्ययनों के लिए उपलब्ध कराना – इसे इसके मूल रूप में भारत या बाहर के किसी केंद्रीय स्थान पर सुरक्षित रखना तो लगभग असंभव है। इसे इसके मूल रूप में तो किसानों के सहयोग से इसके प्राकृतिक माहौल में ही सुरक्षित रखा जा सकता है।

() युवा किसानों को अपनी आनुवंशिक सम्पदा के मूल्य व महत्व के विषय में शिक्षित/जागरूक करना व उनमें किस्मों का पता लगाने, एकत्र करने के प्रति रुचि जागृत करना।

अपने विस्तृत अनुभव के आधार पर डॉ. रिछारिया बताते हैं कि धान क्षेत्रों में मुझे ऐसे किसान मिलते ही रहे हैं जो धान की अपनी स्थानीय किस्मों में गहन रुचि लेते हैं व अलग-अलग किस्मों की उपयोगिता, यहां तक कि उसका इतिहास बता सकते है। इन केंद्रों की ज़िम्मेदारी ऐसे चुने हुए, प्रतिबद्ध किसानों को सौंपी जाएगी। हज़ारों किस्मों की पहचान करने, उन्हें सुरक्षित रखने की उनकी जन्मजात प्रतिभा का लाभ वर्तमान व भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उठाना चाहिए।

ऊपर बताए गए रास्ते को अपनाने में देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि डॉ. रिछारिया ने यह चेतावनी भी दी थी कि जिस तरह विदेशी बौनी किस्मों (foreign rice hybrids) को फैलाने व स्थानीय किस्मों को गायब करने के प्रयास चल रहे है उसके चलते शायद हमारी यह विरासत भी भविष्य में हमें उपलब्ध न रहे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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टमाटर – एक सेहतमंद सब्ज़ी

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

दुनिया भर के दैनिक आहार में टमाटर (tomato) का एक ज़रूरी घटक बन जाना एक दिलचस्प कहानी है। योलांडा इवांस ने नेशनल जियोग्राफिक (National Geographic) पत्रिका के 5 जून, 2025 के अंक में मिथकों (tomato myths) और लोककथाओं के माध्यम से टमाटर के बढ़ते चलन के बारे में लिखा है, और बताया है कि कैसे टमाटर हमेशा से एक लोकप्रिय सब्ज़ी नहीं था।

एक समय था जब इन्हें दुष्ट, बदबूदार और ‘ज़हरीले सेब’ (poisonous apples) माना जाता था। इन्हें अंधविश्वास और बीमारी से जोड़कर देखने का प्रमुख कारण यह था कि तांबे के बर्तनों में रखने पर इनकी अभिक्रिया लेड से होती थी। न्यू जर्सी के सलेम के किसानों द्वारा टमाटर पकाने के लिए एक अधिक उपयुक्त बर्तन के इस्तेमाल ने अमेरिका (tomato history in America) में लोगों की राय बदल दी।

टमाटर भारत (tomato in India) की देशज वनस्पति नहीं थी, बल्कि ये 15वीं शताब्दी में पुर्तगाली व्यापारियों के साथ यहां आए थे। फिर 16वीं शताब्दी में ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने इन्हें अपनाया, और पूरे देश में इनकी खेती शुरू की और इन्हें अपने भोजन में शामिल किया। लेकिन लोग तब भी टमाटर को लेकर एहतियात बरतते थे। जैसा कि स्वतंत्र पत्रकार सुश्री सोहेल सरकार ने लिखा है, 1938 में चिकित्सक डॉ. तारा चितले और उनके सहयोगियों ने लोगों को सर्दी-ज़ुकाम, स्कर्वी और आयरन की कमी के इलाज में टमाटर (tomato for vitamin C & iron) के फायदों के बारे में समझाने की कोशिश की थी, लेकिन लोगों की प्रतिक्रिया ठंडी ही रही।

बदलाव आखिरकार तब आया जब ज़्यादा से ज़्यादा यात्रियों ने हमारे आहार में टमाटर शामिल करने की सिफारिश की, और भारत में राष्ट्रीय पोषण संस्थान (National Institute of Nutrition) के विशेषज्ञों ने हमारे दैनिक आहार में विटामिन और खनिजों के महत्व और टमाटर में इनकी प्रचुरता के बारे में बताया।

स्वास्थ्य लाभ

वनस्पति विज्ञान में टमाटर को एक फल (tomato as fruit) माना जाता है। कैलिफोर्निया की आहार और जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ (diet & public health expert) सुश्री सिंथिया सास ने भी सेहत के लिए टमाटर के फायदे बताए हैं। इनमें से कुछ फायदे हैं – टमाटर एंटीऑक्सीडेंट (antioxidants in tomato) से समृद्ध फल है, एंटीऑक्सीडेंट हृदय और मस्तिष्क को स्वस्थ रखते हैं। टमाटर में ऐसे पोषक तत्व होते हैं जो हृदय रोग के जोखिम को काफी कम कर देते हैं। टमाटर का अधिक सेवन उच्च रक्तचाप (tomato for blood pressure) को कम करता है (वरिष्ठ नागरिक ध्यान दें)। टमाटर में मौजूद सेल्यूलोज़ रेशेदार पदार्थ कब्ज़ की दिकक्त को दूर रखते हैं। टमाटर में लाइकोपीन (lycopene benefits) नामक लाल कैरोटीनॉयड वर्णक 70 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को अल्ज़ाइमर की समस्या से बचने में मदद कर सकता है। सुश्री सास की सलाह है कि टमाटर पकाने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि वे अच्छी तरह से धुले हुए हों और धूल-जनित कीटाणुओं से मुक्त हों।

टमाटर की खेती (tomato cultivation) पूरे भारत में की जाती है, और प्रति एकड़ 5,000 से 10,000 पौधे लगाए जाते हैं। तेलंगाना कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जयशंकर का अनुमान है कि भारत में वर्ष 2022-2023 में 210 लाख टन टमाटर का उत्पादन हुआ था, जो चीन (680 लाख टन) (China tomato production) के बाद दूसरे नंबर पर था। टमाटर की खेती करने वाले शीर्ष सात राज्य हैं: मध्य प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु। बैंगलुरु स्थित भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (Indian Institute of Horticultural Research) टमाटर की विभिन्न किस्मों पर शोध कर रहा है। इनमें से एक है ‘अर्क रक्षक’ (Ark Rakshak tomato variety) नामक किस्म, जो कि एक रोग-प्रतिरोधी संकर किस्म है। दूसरी है ‘अर्क श्रेष्ठ’ (Ark Shreshta tomato variety) किस्म जो लंबे समय तक खराब न होने वाले टमाटर की पैदावार के लिए तैयार की जा रही है, ताकि इनका परिवहन (निर्यात – tomato export) आसान हो सके।

आज, देश का लगभग हर घर अपने भोजन में टमाटर का उपयोग करता है। वर्तमान भारतीय व्यंजनों (Indian cuisine with tomato) में टमाटर किसी न किसी रूप में शामिल है – चाहे टमाटर का सूप हो, चटनी हो, सालन हो या रसम, सैंडविच, बर्गर, पिज़्ज़ा हो या फिर सॉस (tomato sauce) के रूप में।

टमाटर का स्वाद चखने के बाद और यह जानने के बाद कि यह दुष्ट नहीं है, बल्कि इसके कई स्वास्थ्य लाभ हैं, चलिए टमाटर डालकर कुछ पकाएं और मज़े से खाएं! (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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धान की फसल को बचाएगा एक खास जीन

चीन के वैज्ञानिकों ने हाल ही में धान से जुड़ी एक बड़ी खोज की है। उन्होंने धान में एक ऐसा प्राकृतिक जीन पाया है जो दिन-ब-दिन गर्मा रही जलवायु (climate change impact on rice) में भी फसल की गुणवत्ता और पैदावार को बढ़िया बनाए रख सकता है। इस जीन से गेहूं और मक्का जैसी अन्य फसलों (heat-tolerant crops) को भी फायदा हो सकता है।

गौरतलब है कि धान की फसल को गर्माहट तो चाहिए होती है लेकिन अगर रातें ज़्यादा गर्म हो जाएं, खासकर धान फूलने के समय(flowering stage in rice), तो फसल को नुकसान होता है। गर्म रातों के कारण धान के दाने ‘चॉक’ जैसे सफेद और भुरभुरे हो जाते हैं, कुटाई के वक्त ये दाने टूट जाते हैं, और पकने पर चिपचिपे स्वादहीन लगते हैं। यह समस्या अब ज़्यादा बढ़ रही है क्योंकि जलवायु परिवर्तन की वजह से रात का तापमान दिन की तुलना में दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है, खासकर एशिया और अफ्रीका के उन इलाकों में जहां धान उगाया जाता है (rice cultivation in Asia and Africa)।

2004 की एक रिपोर्ट के अनुसार यदि रात का औसत तापमान एक डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो धान की पैदावार 10 प्रतिशत तक घट सकती है (rice yield temperature effect)।

इसके समाधान के लिए 2012 में चीन की हुआझोंग एग्रीकल्चरल युनिवर्सिटी (Huazhong Agricultural University) के वनस्पति वैज्ञानिक यीबो ली और उनकी टीम ने धान की ऐसी किस्में खोजनी शुरू कीं जो अधिक गर्म रातें झेल सकें। उन्होंने चीन के चार गर्म इलाकों में धान 533 की किस्मों का परीक्षण किया। इनमें से दो किस्मों, Chenghui448 और OM1723, की गुणवत्ता और उपज गर्मी में भी अच्छी रही। फिर, इन दोनों किस्मों से संकर धान तैयार किया। इसके जीन विश्लेषण (gene analysis in rice) में क्रोमोसोम 12 पर उन्हें एक खास जीन मिला, जिसे QT12 नाम दिया गया है।

सामान्य स्थिति में तीन कारक QT12 जीन का नियमन करते हैं, और मिलकर इसे संतुलित रूप से काम करने देते हैं। लेकिन जब तापमान बढ़ता है तो इन तीनों में से एक नियामक अलग हो जाता है और QT12 ज़्यादा सक्रिय हो जाता है (heat-responsive genes in crops)। इससे धान की कोशिकाओं में एंडोप्लाज़्मिक रेटिकुलम प्रभावित होता है। यह कोशिका का वह हिस्सा है जो प्रोटीन को तह करने और उन्हें सही जगह पहुंचाने का काम करता है।

जब तापमान के कारण यह प्रक्रिया गड़बड़ा जाती है तो दाने के भ्रूणपोष में प्रोटीन कम और स्टार्च ज़्यादा जमा होने लगता है। यही असंतुलन दानों को ‘भुरभुरा’ (grain chalkiness due to heat) बनाता है।

वैज्ञानिकों ने QT12 की भूमिका को साबित करने के लिए एक ताप-संवेदी धान की किस्म में इस जीन को शांत कर दिया। नतीजे चौंकाने वाले थे: संशोधित धान ने गर्मी में भी सामान्य मात्रा में पैदावार दी, जबकि असंशोधित धान ने 58 प्रतिशत कम पैदावार दी। इसका मतलब है कि QT12 केवल दानों की गुणवत्ता नहीं, बल्कि उपज को भी प्रभावित करता है।

एक दिलचस्प बात यह है कि जीन एडिटिंग की तकनीक के बिना, पारंपरिक ब्रीडिंग (traditional breeding techniques) से भी काम चल सकता है। वैज्ञानिकों ने धान की कुछ किस्मों में QT12 के ऐसे प्राकृतिक रूप पाए हैं जो गर्मी में सक्रिय नहीं होते। जब उन्होंने इन्हें चीन की लोकप्रिय हाइब्रिड किस्म हुआझेन में जोड़ा, तो नतीजे आशाजनक मिले। गर्मी-सह्य इस नई हुआझेन किस्म ने 31-78 प्रतिशत तक अधिक पैदावार दी। सफेद और भुरभुरे दाने भी कम थे।

QT12 के ऐसे रूप ज़्यादातर गर्म इलाकों में उगाई जाने वाली इंडिका किस्मों (indica rice variety)  में पाए जाते हैं, जबकि जेपोनिका किस्मों में ये जीन पूरी तरह अनुपस्थित हैं, जो ठंडे इलाकों (जैसे जापान, चीन के पहाड़ी क्षेत्र और अमेरिका) (temperate climate rice) में उगाई जाती हैं। QT12 जीन को जेपोनिका किस्मों में भी डाल कर इन क्षेत्रों की फसलों को भी गर्मी से बचाया जा सकेगा।

दिलचस्प बात यह है कि QT12 जीन सिर्फ धान में ही नहीं बल्कि गेहूं और मक्का जैसी दूसरी महत्वपूर्ण फसलों में भी ऐसे जीन मौजूद हैं(QT12 gene in wheat and maize)। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस खोज की मदद से अब इन फसलों की भी गर्मी-सह्य किस्में तैयार की जा सकेंगी, जो खाद्य सुरक्षा को मज़बूती देगी(climate-resilient crops for food security)। हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि अकेले QT12 बहुत ज़्यादा गर्मी से सभी धान की किस्मों को नहीं बचा सकता, खासकर जब रात का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाए। इसलिए वैज्ञानिक अभी भी अन्य जीन और किस्मों पर शोध कर रहे हैं ताकि जलवायु संकट से लड़ने के और उपाय मिल सकें (genes for climate change adaptation in crops)। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भोजन में को-एंज़ाइम की भूमिका – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

एंज़ाइम (enzyme) ऐसे प्रोटीन होते हैं जो कोशिका में अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं, इससे चयापचय कुशलता से होता है। कुशल कामकाज के लिए कई एंज़ाइमों को सहकारक के रूप में कुछ अणु चाहिए होते हैं। इन सहायक अणुओं को को-एंज़ाइम (co-enzyme) कहा जाता है।

को-एंज़ाइम नैसर्गिक रूप से पाए जाने वाले कार्बनिक अणु होते हैं जो एंज़ाइम के साथ जुड़कर उनके कार्य में मदद करते हैं। को-एंज़ाइम क्यू (Coenzyme Q), जिसे यूबिक्विनोन के रूप में भी जाना जाता है, एक अणु है जिसमें कई आइसोप्रीन इकाइयां होती हैं। गौरतलब है कि आइसोप्रीन एंटीऑक्सिडेंट (antioxidants) होते हैं और तनाव की स्थिति से उबरने में मदद करते हैं।

यूबिक्विनोन हर कोशिका झिल्ली में मौजूद होता है और ऊर्जा उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण होता है। यूबिक्विनोन 10 प्रकार (CoQ1…CoQ10) के होते हैं। प्रत्येक यूबिक्विनोन श्वसन शृंखला का एक अणु होता है (cellular respiration)। ये पानी में अघुलनशील है लेकिन वसीय माध्यम में घुलनशील एंटीऑक्सीडेंट (fat soluble antioxidants) होते हैं। ये सभी को-एंज़ाइम कोशिका के प्रमुख ऊर्जा उत्पादक उपांग, माइटोकॉन्ड्रिया, के कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस लेख में, हम मुख्य रूप से दो को-एंज़ाइम – CoQ9 और CoQ10 – पर बात करेंगे।

CoQ9 में नौ आइसोप्रीन इकाइयां होती हैं। गेहूं, चावल, जई, जौं, मक्का और बाजरा जैसे अधिकांश अनाजों में CoQ9 प्रचुर मात्रा में पाया जाता (sources of coenzymes) है। इसके अलावा यह बांस और दालचीनी, एवोकाडो और काली मिर्च जैसे फूल वाले पौधों में भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

CoQ10 का महत्व

मनुष्यों में, CoQ10 माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria) में इलेक्ट्रॉन परिवहन शृंखला का एक घटक है –  यही वह प्रक्रिया है जिससे शरीर की अधिकांश कोशिकीय ऊर्जा (cellular energy) का उत्पादन होता है। हृदय जैसे अंगों को बहुत ज़्यादा ऊर्जा चाहिए होती है और उनमें CoQ10 अधिक मात्रा में पाया जाता है। CoQ9 तो हमें अपने दैनिक भोजन के साथ खूब मिल जाता है। लेकिन कभी-कभी हमें अच्छे स्वास्थ्य के लिए अतिरिक्त CoQ10 की आवश्यकता होती है, क्योंकि कतिपय जेनेटिक कारकों, उम्र बढ़ने और तंत्रिका सम्बंधी समस्याओं के लिए इस यूबिक्विनोन की अधिक ज़रूरत होती है।

2008 में, इटली के मोंटिनी और उनके साथियों ने न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन  (new England journal of medicine) में बताया था कि CoQ10 की खुराक देने से उन रोगियों को मदद मिली जिन्हें तंत्रिका सम्बंधी समस्याएं (neurological disorders) थीं। इसी तरह, 2012 में, लंदन के न्यूरोलॉजी एंड नेशनल हॉस्पिटल की शमीमा अहमद और उनके साथियों ने बताया था कि CoQ10 की कमी वाले शिशुओं को यूबिक्विनोन एनालॉग (CoQ10 जैसा पदार्थ) देकर मदद की जा सकती है। और कई आहार विशेषज्ञ ऐसी दवाएं लिखते हैं और कंपनियां बेचती हैं जो CoQ10 के समान होती हैं।

CoQ10 का उत्पादन

जापान के इबाराकी स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रोबायोलॉजिकल साइंसेज़ के कोइचि कोदोवाकी और उनके दल ने 2006 में फेडरेशन ऑफ युरोपियन बायोसाइन्स सोसायटीज़ (FEBS) लेटर्स में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया था कि धान के पौधों को जेनेटिक रूप से परिवर्तित करके उनमें CoQ10 बनाया जा सकता है। शोधकर्ता धान के पौधों में ‘DdsA’ नामक जीन को प्रविष्ट करवाकर CoQ10 का उत्पादन भी कर पाए थे। उनमें CoQ10 का निर्माण 1.3 से 1.6 गुना अधिक हुआ और शर्करा भी उसी अनुपात में अधिक बनी। फिर, 2021 में नेचर सेल बायोलॉजी में मुनीकी नाकामुरा और उनके साथियों ने नोबेल फेम की मशहूर तकनीक, CRISPR-Cas9 की मदद से इसी उद्देश्य से सफलतापूर्वक जीन संपादन किया था।

खेत से कारखाने तक

‘जीन-संपादित पौधे खेत से कारखाने तक’, यह शीर्षक है नेचर जर्नल के 20 फरवरी, 2025 के अंक में प्रकाशित शोधपत्र का। इस शोधपत्र की लेखक चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन मॉलीक्यूलर प्लांट साइंसेज़ की जिंग-जिंग शू और उनके साथी हैं। इसमें शोधकर्ताओं ने CoQ1 पर ध्यान केंद्रित करते हुए पौधों की सैकड़ों प्रजातियों का अध्ययन किया। यह एक ऐसा एंज़ाइम है जो CoQ की आइसोप्रिनॉइड शृंखला को संश्लेषित करता है। एंज़ाइम के जीन को उन्होंने जेनेटिक रूप से परिवर्तित किया, ताकि धान की ऐसी किस्म तैयार हो जो 75 प्रतिशत तक CoQ10 से युक्त हो। शू के इस श्रमसाध्य काम से यह पता चलता है कि एंटीऑक्सीडेंट अनुपूरक का कारखाना उत्पादन करने के लिए विभिन्न प्रकार की खाद्य फसलों को कैसे तैयार किया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://th-i.thgim.com/public/incoming/9y1c8x/article69465056.ece/alternates/LANDSCAPE_1200/6607_11_4_2025_0_29_38_5_10_04_RAINDAMAGEWHEATCROPLUCKNOW_O.JPG

दुनिया की भोजन आपूर्ति के लिए जलीय कृषि

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

भारत ने जलीय कृषि (Aquaculture) (यानी मछली, झींगा वगैरह को पालना) को अपना कर आबादी की पोषण सम्बंधी ज़रूरतों की पूर्ति करने में काफी प्रगति की है। जलीय कृषि में, भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। झींगा (Prawns) उत्पादन (Prawns farming) में भारत विश्व में दूसरे पायदान पर खड़ा है। भारत में, आंध्र प्रदेश इसका सर्वाधिक उत्पादक राज्य है, इसके बाद पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा और गुजरात का नंबर आता है।
वास्तव में, लोगों की आहार सम्बंधी प्राथमिकताएं भी बदल गई हैं – झींगे में प्रोटीन अधिक और वसा कम होने के चलते, देश और विदेश, दोनों ही बाज़ारों (Seafood market) में इनकी मांग बढ़ रही है। कई उद्योग जलीय कृषि में मदद करते हैं। जैसे जलीय जीवों का आहार (Aquafeed) उपलब्ध कराना, उनमें संक्रमण नियंत्रण पर काम करना आदि। किसान और स्थानीय उद्यमी दोनों ही लगातार ऐसे नए उपाय खोजते रहते हैं जो पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ उत्पाद की गुणवत्ता भी बढ़ाएं, और जलवायु परिवर्तन से होने वाली पर्यावरणीय चुनौतियों (Climate impact on aquaculture) से निपटें।
आम बोलचाल में अक्सर प्रॉन (prawn) और श्रिम्प (shrimp) दोनों को झींगा कहा जाता है, जबकि जीव विज्ञान की दृष्टि से दोनों अलग-अलग प्रजातियां हैं। झींगा पालन में ब्लैक टाइगर झींगा (Black Tiger Shrimp) (Penaeus monodon) बेशकीमती उत्पाद है। जहां भी परिस्थितियां अनुकूल हों वहां ब्लैक टाइगर झींगे की खेती (पालन) (Tiger shrimp farming) की जा सकती है। किसान इनको पालकर बाज़ार की मांग को पूरा कर पाते हैं; ये झींगे एक किलोग्राम में 30 या उससे कुछ कम संख्या में चढ़ते हैं। कई जलीय प्रजातियों की तरह इन झींगों के पालन के लिए भी तालाब के पानी का एक निश्चित मात्रा में लवणीय (खारा) होना ज़रूरी होता है: प्रति लीटर पानी में 10-25 ग्राम लवण होना झींगों के फलने-फूलने के लिए अच्छा होता है। गौरतलब है कि समुद्र के पानी में प्रति लीटर 35 ग्राम लवण होते हैं।
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर ज़िले जैसे निचले इलाकों में जलीय जीवों का पालन करने के लिए ज्वार के दौरान चढ़े समुद्री पानी को कृषि तालाबों में भर लिया जाता है। आंध्र प्रदेश के तटीय व अन्य इलाकों का भूजल खारा है तो इन स्थानों में जलीय जीव पालन के लिए तालाबों में भूजल के साथ नदी-नहरों का मीठा पानी मिला दिया जाता है।
एक सामान्य कृषि तालाब (Shrimp pond) लगभग 150 मीटर लंबा, 100 मीटर चौड़ा और लगभग दो मीटर गहरा होता है। एक पालन चक्र (Culture cycle) चार से छह महीने का होता है। प्रत्येक पालन चक्र के बाद तालाब का पानी खाली कर दिया जाता है, और अगले चक्र की तैयारी के लिए तालाब सुखा दिया जाता है। झींगों की बेहतर पैदावार के साथ-साथ रोगाणुओं पर कारगर नियंत्रण के लिए आंध्र प्रदेश के बापटला ज़िले के एक उद्यमी किसान शिव राम रुद्रराजू छोटे तालाब बनाने की सलाह देते हैं। क्योंकि यदि बीमारी फैलती है तो छोटे तालाब प्रसार अधिक नहीं होने देंगे, नतीजतन आर्थिक नुकसान कम होगा। देखा गया है कि विब्रियो हार्वेई (Vibrio harveyi) जैसे रोगजनक बैक्टीरिया (Vibrio harveyi disease) झींगा पालन के लिए गंभीर खतरा हैं। भारत में, इनके चलते वार्षिक उपज में 25 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है। प्रकोप के वर्षों में व्हाइट स्पॉट सिंड्रोम वायरस (White Spot Syndrome Virus – WSSV) इससे भी अधिक हानिकारक हो सकता है।
कई प्रयोगशालाएं झींगा पालन तालाबों में संक्रामक सूक्ष्मजीवों की पहचान करने के लिए परीक्षण सेवाएं दे रहीं हैं (Disease diagnostic services) । चूंकि किसानों को आजू-बाजू के तालाबों में रोग फैलने का डर होता है, इसलिए संक्रमित तालाब की पहचान होने पर उसे फौरन ही खाली कर दिया जाता है।
आम तौर पर कौवे रोगजनकों को फैलाते हैं; वे संक्रमित झींगों को पकड़ते हैं, उड़ते हुए इन संक्रमित झींगों को अन्य तालाबों में गिरा सकते हैं। इसके लिए भी एहतियात बरती जाती है; अक्सर तालाबों को प्लास्टिक की जाली से ढंककर रख जाता है। लेकिन कभी-कभी कौवों को मारने के लिए शिकारियों को भी तैनात किया जाता है।
हमारे यहां के किसानों ने रोगजनकों को थामने के लिए अन्य तरीके अपनाए हैं। तालाब के पानी में प्रोबायोटिक्स (Probiotics in aquaculture) मिलाए जाते हैं। इन प्रोबायोटिक्स में बैसिलस बैक्टीरिया होते हैं जो झींगे को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं लेकिन रोगजनक सूक्ष्मजीवों की तुलना में तेज़ी से वृद्धि करके रोगजनकों को परास्त कर देते हैं।
एक अन्य तरीका है नर्सरी में पाले गए झींगा शिशुओं से झींगा पालन शुरू करना (Nursery rearing of shrimp)। चेन्नई में केंद्रीय खारा जलकृषि संस्थान ने विशिष्ट रोगज़नक मुक्त झींगों की किस्म (Specific Pathogen Free – SPF shrimp) विकसित करने का बीड़ा उठाया है। रोगजनकों से सुरक्षित माहौल में विकसित ये झींगे कुछ खास रोगजनकों से मुक्त होने के लिए प्रमाणित होते हैं।
रोगजनक मुक्त रखने का एक अन्य तरीका है ‘फेज थेरेपी’ (Phage therapy in aquaculture)। फेज थेरेपी में बैक्टीरियाभक्षी वायरस का उपयोग किया जाता है। ये बैक्टीरियाभक्षी वायरस केवल विब्रियो बैक्टीरिया को ढूंढ-ढूंढकर संक्रमित करते हैं और मार देते हैं।
चाहे अनुभवी किसानों द्वारा खेत में विकसित किए जा रहे हों, या अनुसंधानों से विकसित किए जा रहे हों, अच्छी बात यह है कि इन मिले-जुले प्रयासों से आज भारत में वार्षिक झींगा उत्पादकता 17 प्रतिशत (Shrimp productivity in India) बढ़ गई है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बंजर भूमि में हरियाली की मुस्कान – भारत डोगरा

किसी भी किसान को खुशी होगी यदि उसकी पथरीली और बंजर (barren land) भूमि पर हरी-भरी फसलें (green crops) लहलहाने लगें। यही खुशी आज राजस्थान (Rajasthan) के करौली ज़िले (Karauli district) के अनेक किसानों में दिख रही है।

मकनपुरस्वामी गांव (मंडरयाल ब्लॉक) के कृषक बल्लभ और विमला ने बताया कि उनके गांव में पत्थर का खनन (stone mining) होता रहा है तथा बहुत सारी ज़मीन पथरीली (rocky land) होने के साथ-साथ खनन के पत्थर भी इधर-उधर बिखरे रहते हैं। गांव में पानी की बहुत कमी थी। अत: उनकी ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा बंजर पड़ा था। इस स्थिति में आसपास के अनेक गांवों ने चंदा एकत्र किया (community funding) और श्रमदान करके वर्षा के बहते पानी को एक स्थान पर रोक कर जलसंकट (water crisis) को कुछ हद तक कम किया।

वे आगे बताते हैं कि इससे भी बड़ा बदलाव तब आया जब ‘सृजन’ नामक संस्था (Srijan NGO) ने जल स्रोतों से मिट्टी हटवाकर खेतों में डलवाई। इससे जल स्रोत में गहराई (deepening of water bodies) आई, अधिक जल एकत्र होने लगा व खेतों का उपजाऊपन बढ़ा। खेतों की मेड़बंदी (farm bunding) की तो उनमें भी पानी रुकने लगा। कृषि भूमि का समतलीकरण (land leveling)  किया गया। इस सबका मिला-जुला असर यह हुआ कि बहुत सी पथरीली बंजर भूमि पर अब खेती होने लगी।

बल्लभ व विमला अपने हरे-भरे सब्ज़ी (organic vegetables) के खेत दिखाते हुए बताते हैं कि बीज, पौधों व प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण का यह असर है। आरंभ में प्राकृतिक खेती(zero budget farming) में कुछ कठिनाई आई पर अब प्राकृतिक खेती से उत्पादित गेहूं की कीमत डेढ़ गुना मिल रही है। विविध सब्ज़ियों का फसल-चक्र वर्ष भर चलता रहता है जिससे आय भी होती है व पोषण भी सुधरता है। पशुओं के गोबर व मूत्र की खाद बनाने के लिए बायो-रिसोर्स सेंटर (bio-resource center) भी उन्होंने स्थापित किया है।

इसी गांव के किसान मानसिंह बताते हैं कि संस्था की मदद से व सरकारी विभागों से प्राप्त सब्सिडी (government subsidy) से उन्हें सोलर पंप सेट लगाने में सहायता मिली है। सोलर पंप बहुत कामयाब हैं व डीज़ल के खर्च में बहुत कमी आई है, जबकि प्राकृतिक खेती (sustainable agriculture)  के प्रसार से अन्य खर्चों में भी बहुत कमी आई है।

इसी ब्लॉक में जगदड़पुरा (Jagdarpura village) की महिला किसान संगठित हुई हैं और वे नियमित मीटिंग कर विकास कार्य को आगे बढ़ाती हैं। यह गांव राजस्थान की सीमा पर है व थोड़ा-सा आगे जाकर मध्य प्रदेश का मुरैना ज़िला या चंबल के बीहड़ (Chambal ravines) आरंभ हो जाते हैं। अत: यहां भूमि बंजर होने का खतरा बीहड़ों के प्रसार से भी है, और मिट्टी के अधिक कटाव से बीहड़ फैलते व बढ़ते हैं। गांव के किसान अपनी मेहनत से ज़मीन को समतल (land reclamation) कर इस कठिन परिस्थिति को संभालते हैं।

जल संरक्षण (water conservation)  से लेकर प्राकृतिक खेती जैसे विभिन्न प्रयासों से इस गांव में लगभग 25 हैक्टर बंजर भूमि पर खेती होने लगी है व इससे लगभग दो गुनी भूमि पर फसल की सघनता व उत्पादकता बढ़ी है। जिस भूमि पर पहले केवल बाजरा होता था, उस पर अब गेहूं(wheat), चना (chickpeas), सरसों (mustard) व सब्ज़ियां (vegetables )सब हो रहे हैं। सृजन संस्था के माध्यम से सरकारी कृषि विज्ञान केंद्र से भी किसानों का मज़बूत का सम्बंध बना है व सिलाई मशीन, सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर आदि का लाभ मिला है।

खारा पानी गांव की बड़ी समस्या है। जब जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission)  में लगे नल से बेहतर गुणवत्ता का पानी आने लगा तो लोग बहुत प्रसन्न हुए पर किसी अन्य गांव में फसल के लिए पानी लेने हेतु पाइपलाइन तोड़ दी गई तो यहां नल में पानी आना रुक गया और लोग फिर खारा पानी पीने को मजबूर हो गए।

ऐसे अनेक गांवों में संस्था, सरकार और समुदाय की भागीदारी से बहुत कम बजट में जल स्रोतों के निर्माण(water bodies restoration), पुराने जल स्रोतों के सुधार, मेड़बंदी, भूमि समतलीकरण आदि कार्यों से बंजर भूमि को हरा-भरा (fertile land) करने की संभावनाएं बनाई गई हैं। पांच वर्षों के इस प्रयास में 1250 एकड़ बंजर भूमि पर खेती संभव हुई व 286 पोखरों का सुधार हुआ जबकि 96 नए पोखर बनाए गए। इस प्रयास से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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