संयुक्त राष्ट्र (United Nations) द्वारा जारी चेतावनी के अनुसार पानी के ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की वजह से दुनिया की जल व्यवस्था दम तोड़ रही है। कई नदियां, ग्लेशियर और भूजल भंडार (groundwater depletion) अपनी प्राकृतिक सीमा से ज़्यादा दबाव में हैं, और संभव है कि वे पहले जैसी स्थिति में फिर कभी न लौट सकें।
ग्लेशियर तेज़ी से पिघल (glacier melting) रहे हैं, जिससे नदियों का बहाव बदल रहा है। राजनीतिक तनाव इस समस्या को और जटिल बना रहे हैं। कई देशों के बीच पानी बंटवारे से जुड़े समझौते दबाव में आ गए हैं। अप्रैल 2025 में भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया, जो 1960 से सिंधु नदी तंत्र (Indus river system) के इस्तेमाल को तय करती थी। दूसरी ओर, अफगानिस्तान कुनार नदी पर एक बड़े जलाशय निर्माण की योजना बना रहा है, जिससे पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी में कमी आ सकती है। इसी बीच भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे का समझौता (Ganga water treaty) भी दिसंबर में खत्म होने वाला है। नया समझौता न होने से नदी पर निर्भर लगभग 63 करोड़ लोग प्रभावित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, पानी से सम्बंधित पुराने समझौतों (water agreements) को बनाए रखना ही काफी नहीं है बल्कि उन्हें आज की परिस्थितियों के अनुसार ढालना होगा। पहले के समझौते उस समय के स्थिर जल स्तर को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। लेकिन जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण बारिश, ग्लेशियर पिघलने और नदियों के बहाव के पैटर्न पहले जैसे नहीं रहे। नवीनतम जानकारी उपलब्ध हो, तो समस्याओं का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है।
आजकल वैज्ञानिक ‘डिजिटल ट्विन’ (digital twin technology) नामक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें कंप्यूटर पर नदी प्रणाली का एक आभासी मॉडल बनाया जाता है, जिससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन का नदी पर क्या असर पड़ेगा। चीन की यांग्त्से नदी घाटी में इस तकनीक का इस्तेमाल जल प्रबंधन (smart water management) को बेहतर बनाने के लिए किया जा चुका है।
सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) कई युद्धों और राजनीतिक तनाव के बावजूद दशकों तक चलती रही। इसका एक कारण यह था कि इसमें विश्व बैंक जैसे तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका थी और दोनों देशों के तकनीकी विशेषज्ञों की एक संयुक्त समिति भी बनाई गई थी। और पानी से जुड़े ढांचे और परियोजनाओं (water infrastructure projects) के लिए साझा वित्तीय व्यवस्था भी रखी गई थी।
ऐसी संस्थाओं को और मज़बूत होना चाहिए, ताकि वे पूरे नदी क्षेत्र (river basin management) के प्रबंधन में डैटा के आधार पर फैसले ले सकें। नदियों को केवल पानी के स्रोत के रूप में देखने की बजाय उन्हें समग्र प्राकृतिक तंत्र (ecosystem approach) के रूप में समझना होगा। बेहतर जानकारी, आपसी सहयोग और लचीले समझौतों की मदद से अभी भी आने वाले वैश्विक जल संकट (future water crisis) को टाला जा सकता है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.nature.com/lw767/magazine-assets/d41586-026-00659-w/d41586-026-00659-w_51991024.jpg?as=webp
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (tropical regions) के गर्म और निचले स्थानों में रहने वाले कीट अत्यधिक गर्मी में भी जीवित रहने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है कि इनमें से कई कीट पहले ही अपनी सहनशक्ति के तापमान की सीमा (thermal tolerance limit) के करीब रह रहे हैं। ऐसे में अगर पृथ्वी का तापमान और बढ़ता है, तो इन प्रजातियों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। नेचर पत्रिका (Nature journal) में प्रकाशित इस शोध में यह देखा गया कि अलग-अलग कीट प्रजातियां गर्मी पर किस तरह प्रतिक्रिया देती हैं ताकि यह समझा जा सके कि जलवायु परिवर्तन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कीटों की विविधता को कैसे प्रभावित कर सकता है।
गौरतलब है कि स्तनधारियों के विपरीत, कीट अपने शरीर का तापमान खुद नियंत्रित नहीं कर सकते। उनके शरीर का तापमान लगभग पूरी तरह आसपास के वातावरण (ambient temperature) पर निर्भर करता है। इसलिए अधिक गर्मी से बचने के लिए वे छांव में चले जाना, मिट्टी में दुबक जाना या ठंडक के समय में ही सक्रिय रहना जैसे तरीके अपनाते हैं। उनके शरीर में कुछ खास प्रकार के प्रोटीन (heat shock proteins) भी बनते हैं, जो अधिक तापमान से कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। इन्हें ‘हीट शॉक प्रोटीन’ कहा जाता है। लेकिन इस सुरक्षा की भी एक सीमा है। जब तापमान एक हद से ऊपर चला जाता है, तो कीट हिलना-डुलना बंद कर देते हैं और अंतत: मर जाते हैं।
कीटों की अधिकतम ऊष्मा-सहनशीलता (thermal tolerance) सीमा को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने लगभग 2300 प्रजातियों पर एक बड़ा फील्ड अध्ययन किया। यह काम पर्यावरण वैज्ञानिक किम ली होल्ज़मैन के शोध (Kim Lee Holzman research) से शुरू हुआ था। उन्होंने पेरू के एंडीज़ पर्वत क्षेत्र में अलग-अलग ऊंचाइयों से कई मौसमों के दौरान कीट इकट्ठा किए। हर कीट को एक छोटी ट्यूब में रखकर धीरे-धीरे बढ़ती गर्मी (temperature stress test) के संपर्क में लाया गया। वैज्ञानिक यह देखते रहे कि किस तापमान पर कीट हिलना-डुलना बंद कर देता है, क्योंकि यही उसकी गर्मी सहने की अधिकतम सीमा मानी जाती है। बाद में इसी तरह का प्रयोग केन्या के एक अन्य उष्णकटिबंधीय पर्वतीय क्षेत्र में भी किया गया।
अध्ययन से पता चला कि गर्म और निचले इलाकों में रहने वाले कीट आम तौर पर ठंडे और ऊंचे इलाकों के कीटों की तुलना में ज़्यादा तापमान सहन कर सकते हैं। लेकिन इसके साथ एक बड़ी समस्या भी है। निचले इलाकों का वातावरण पहले ही उस अधिकतम तापमान (heat threshold) के बहुत निकट है, जिसे वहां रहने वाले कीट सह सकते हैं। इसलिए अगर तापमान थोड़ा भी बढ़ता है, तो वे जल्दी ही अपनी सहनशीलता की सीमा (thermal limit exceed) पार कर सकते हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि अलग-अलग कीट समूहों (insect groups comparison) की गर्मी सहने की क्षमता अलग होती है। उदाहरण के लिए, मक्खियां सबसे ज़्यादा संवेदनशील हैं और औसतन लगभग 39 डिग्री सेल्सियस पर ही उनकी गतिविधि रुकने लगती है। भृंग (बीटल) (beetles heat tolerance) थोड़े मज़बूत होते हैं और करीब 41 डिग्री सेल्सियस तक गर्मी सह सकते हैं। मधुमक्खियां और अन्य कॉलोनी बनाकर रहने वाले कीट इससे थोड़ी अधिक गर्मी झेल सकते हैं। टिड्डे (grasshoppers tolerance) और उनसे मिलती-जुलती प्रजातियां सबसे ज़्यादा सहनशील पाई गईं, जो लगभग 44 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सह सकती हैं।
इन समूहों के अंतर को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने सैकड़ों कीट प्रजातियों के जेनेटिक डैटा (genetic data analysis) का अध्ययन किया। कंप्यूटर मॉडल (computational modeling) की मदद से उन्होंने देखा कि कीटों के शरीर में मौजूद हीट शॉक प्रोटीन की संरचना किस तापमान पर बिखरने लगती है। नतीजे प्रयोगों से मिले परिणामों से मेल खाते थे; जिन प्रजातियों के प्रोटीन अधिक स्थिर थे, वे अधिक गर्मी सहन कर पाए। इससे संकेत मिलता है कि गर्मी सहने की यह सीमा कीटों की जैविक बनावट से जुड़ी है। और जैविक बनावट सहस्राब्दियों में बदलती है। अर्थात इन कीट प्रजातियों की स्थिति कमोबेश स्थिर रहेगी।
यह अध्ययन चिंताजनक है। जलवायु मॉडल (climate models) बताते हैं कि इस सदी के अंत तक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों का तापमान इतना बढ़ सकता है कि लगभग आधी कीट आबादियां कुछ घंटों तक भविष्य की गर्मी झेलने के बाद बेहोशी जैसी स्थिति में पहुंच सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी चरम स्थिति आने से पहले ही कीटों की संख्या घटने लग सकती है, क्योंकि लंबे समय तक गर्मी का दबाव (temperature stress) उनके जीवित रहने और प्रजनन की क्षमता को कम कर देता है।
कीट पर्यावरण (ecosystem balance) में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परागण, जैविक कचरे का विघटन करके वे खाद्य संजाल का एक ज़रूरी हिस्सा होते हैं। अगर उनकी संख्या घटती है, तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। शोधकर्ता कहते हैं कि यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि उष्णकटिबंधीय कीट बदलते मौसम (climate adaptation) के साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे। लेकिन अध्ययन दर्शाता है कि दुनिया के सबसे गर्म इलाकों में तापमान में थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी कई कीट प्रजातियों की सहनशीलता (species survival risk) को परास्त कर सकती है।(स्रोत फीचर्स)
दुनिया भर में कई पौधों में अब पहले की तुलना में जल्दी फूल खिलने लगे हैं। पूरा ध्यान बढ़ते तापमान (global warming) पर जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार केवल गर्मी बढ़ना ही इसका कारण नहीं है। जैसे, ग्रीनहाउसों (greenhouse experiments) में सिर्फ ज़्यादा तापमान देने से फूल समय से पहले नहीं खिले। एक नए अध्ययन से पता चला है कि पत्तियों पर जमा होने वाली ओस की बूंदें (dew droplets on leaves) इस जल्दबाज़ी की वजह हो सकती हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, जब पानी की बहुत सूक्ष्म बूंदें (micro water droplets) पत्तियों पर जमती हैं, तो वे कुछ रासायनिक अभिक्रियाएं शुरू करवाती हैं। ये अभिक्रियाएं पौधे को संकेत देती हैं कि अब फूल बनाने का समय आ गया है। तो लगता है कि केवल बढ़ता तापमान नहीं, बढ़ती नमी के कारण बनने वाली ओस भी पौधों के व्यवहार (plant behavior) को प्रभावित कर सकती है।
पहले किए गए प्रयोगों से यह स्पष्ट था कि थोक पानी (bulk water) की तुलना में पानी की बहुत छोटी बूंदें अलग तरह से व्यवहार करती हैं। जब ऐसी सूक्ष्म बूंदें किसी ठोस अजैविक सतह पर बनती हैं, तो उनमें खास रासायनिक अभिक्रियाएं शुरू हो सकती हैं। देखा गया था कि इन अभिक्रियाओं के कारण वहां मूलक (free radicals) बनते हैं जिनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन (unpaired electrons) होते हैं। इस अवलोकन से यह सवाल पैदा हुआ कि यदि ऐसी ही बूंदें किसी सजीव सतह (जैसे पत्ती) पर जमें तो क्या परिणाम होगा।
इसको समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एक छोटे फूलदार पौधे एरेबिडॉप्सिस थैलियाना (Arabidopsis thaliana plant)पर प्रयोग किए। यह ब्रेसिकेसी कुल (Brassicaceae family) का पौधा है।
विस्तृत प्रयोगों में पाया गया कि इस पौधे की पत्तियों पर ओस जमने पर, वहां होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप हाइड्रोजन परॉक्साइड (hydrogen peroxide) और नाइट्रिक ऑक्साइड (nitric oxide molecule) बनते हैं। नाइट्रिक ऑक्साइड पौधों और जंतुओं में एक जाना-माना महत्वपूर्ण संकेतक अणु है। यह बूंद से पौधे की कोशिकाओं में पहुंचकर ऐसी जैव-रासायनिक प्रक्रियाएं शुरू करवाता है, जो अंतत: पुष्पन की प्रक्रिया (flowering process) को सक्रिय कर देती हैं।
पुष्टि के लिए वैज्ञानिकों ने 30 से अधिक वर्षों में जुटाए गए ब्रेसिकेसी कुल के लगभग 1.2 करोड़ पौधों के पुष्पन रिकॉर्ड (plant flowering data) का विश्लेषण किया। उन्होंने फूल खिलने के समय की तुलना 11 अलग-अलग मौसम सम्बंधी कारकों से की। फूल खिलने के समय का सम्बंध तापमान (temperature change) और दिन की लंबाई के अलावा ओस बिंदु से भी देखा गया। ओस बिंदु हवा में उपस्थित नमी (air humidity) और हवा के तापमान से जुड़ा है।
हालांकि सभी वैज्ञानिक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं लेकिन यदि ये निष्कर्ष सही साबित होते हैं, तो वैज्ञानिकों की यह समझ बदल सकती है कि गर्माती जलवायु (climate change) में पौधे कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। यदि केवल तापमान ही नहीं, बल्कि हवा की नमी में छोटे बदलाव भी फूल आने के समय को प्रभावित कर सकते हैं, तो इस शोध का व्यावहारिक उपयोग (agricultural application) भी हो सकता है। भविष्य में किसान नियंत्रित फुहार या हल्की नमी देकर फूलने का समय बदल सकते हैं और फसल उत्पादन (crop yield improvement) बढ़ा सकते हैं।(स्रोत फीचर्स)
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माइक्रोप्लास्टिक (microplastic pollution) अब धरती के लगभग हर हिस्से में फैल चुका है – सहारा रेगिस्तान से लेकर आर्कटिक की बर्फ तक। लेकिन एक सवाल अब तक बना हुआ है: हवा में कितना माइक्रोप्लास्टिक (airborne microplastics) तैर रहा है? एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इसका जवाब बेहद चिंताजनक बताया है।
नेचर में प्रकाशित शोध (Nature journal study) के अनुसार, हर साल भूमि पर होने वाली मानवीय गतिविधियां लगभग 600 क्वाड्रिलियन (6 शंख या 6×1017) माइक्रोप्लास्टिक कण हवा में छोड़ती हैं। यह मात्रा समुद्रों से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक से करीब 20 गुना अधिक है। इससे यह धारणा गलत साबित होती है कि हवा में फैलने वाले माइक्रोप्लास्टिक का मुख्य स्रोत समुद्र हैं; वास्तव में तो भूमि से होने वाला प्रदूषण (land-based pollution) कहीं बड़ा कारण है।
शोध में, भूमि के ऊपर की हवा के हर घन मीटर में औसतन 0.08 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए, जबकि समुद्र के ऊपर यह संख्या केवल 0.003 कण थी। आसान शब्दों में कहें तो हम जो हवा सांस के साथ अंदर ले रहे हैं, उसमें मौजूद ज़्यादातर माइक्रोप्लास्टिक मानव गतिविधियों से आ रहे हैं – जैसे यातायात (vehicular emissions), कारखाने, शहरों की धूल, सिंथेटिक कपड़ों के रेशे और कचरे से।
माइक्रोप्लास्टिक बहुत सूक्ष्म प्लास्टिक कण होते हैं, जिनका आकार एक माइक्रॉन से लेकर पांच मिलीमीटर तक होता है। ये इतने हल्के होते हैं कि हवा इन्हें आसानी से उड़ा ले जाती है और ये दूर- दूर तक फैल सकते हैं। एक बार पर्यावरण में पहुंच जाने के बाद इन्हें हटाना लगभग असंभव होता है और ये सालों तक बने रहते हैं (persistent environmental pollution)।
पहले हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक को लेकर किए गए अनुमान बहुत अलग-अलग थे – कहीं बहुत कम कण बताए गए थे, तो कहीं सैकड़ों। इस नए अध्ययन (global microplastic study) से यह समझ में आता है कि ऐसा क्यों हुआ। पहले के शोध अक्सर सीमित इलाकों के आंकड़ों या प्लास्टिक उपयोग के मोटे-मोटे अनुमानों पर आधारित थे। इसके विपरीत, इस अध्ययन में दुनिया भर के 283 स्थानों से जुटाए गए 2782 आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिससे अब तक का सबसे व्यापक वैश्विक डैटा (global data analysis) तैयार हो सका है।
अध्ययन के प्रमुख लेखक और विएना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एंड्रियास स्टोल के अनुसार इस शोध से एक बात तो साफ है कि हवा में फैलने वाले माइक्रोप्लास्टिक का मुख्य स्रोत भूमि है, न कि समुद्र। हालांकि अभी भी कुछ जानकारियों की कमी है, लेकिन दिशा अब स्पष्ट है। उम्मीद है कि यह अध्ययन आगे होने वाले शोध (future climate research) के लिए आधार बनेगा। बहरहाल, प्लास्टिक प्रदूषण सिर्फ पानी और मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस हवा में भी मौजूद है जिसमें हम सांस लेते हैं, और इसके लंबे समय के असर (health impact) क्या होंगे यह एक बड़ा सवाल है।(स्रोतफीचर्स)
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अच्छा खाओ, सेहतमंद खाओ, जंक फूड मत खाओ, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (ultra processed food)मत खाओ। ऐसी बातें कहना-सुनना आम हैं – स्वास्थ विशेषज्ञों से लेकर शुभचिंतक तक ऐसा कहते हैं। लेकिन शायद ही कोई हमारे ग्रह – पृथ्वी – की सेहत (planetary health)को ध्यान में रखकर ऐसा कहता होगा। इस संदर्भ में पॉट्सडेम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के अर्थ-सिस्टम साइंटिस्ट जोहान रॉकस्ट्रॉम ने नेचर पत्रिका के एक लेख में बताया है कि किस तरह का खाना पृथ्वी की सेहत के लिए अच्छा है। उनका यह लेख ऐसे समय में और भी मौजूं है जब हमने सितंबर 2025 में पृथ्वी की नौ में से सात सीमा-रेखाओं (planetary boundaries)का उल्लंघन कर लिया है। यहां उन्हीं के लेख का सार प्रस्तुत किया जा रहा है।
हम अपनी पसंद का या अपनी सेहत के लिए फायदेमंद भोजन खाते हैं। सलाह देने वाले सेहत के लिहाज़ से अच्छा खाने की सलाह देते हैं। लेकिन जोहान रॉकस्ट्रॉम कहते हैं भोजन का चुनाव सिर्फ हमारी जीवनशैली या सेहत का मामला नहीं है, बल्कि यह समाज और पृथ्वी दोनों की सेहत (earth system health) का मामला है। कैसे?
यदि आप इस पहलू को थोड़ा खंगालेंगे कि हम क्या खाते है, जो खाते हैं उसके उत्पादन (food production) में, और उसे बनाने में कितने संसाधन लगते हैं, तो बात शायद थोड़ी स्पष्ट हो जाए।
मोटे तौर पर हम तीन तरह का खाना खाते हैं
पहला, गैर-प्रोसेस्ड फूड। जैसा उपजा वैसा ही खा लिया, जैसे फल, सलाद वगैरह। (लेकिन यहां यह बात भी ध्यान में रखना होगा कि इन फलों, सब्ज़ियों को उगाने में संसाधन लगते हैं, पानी खर्च होता है, कीटनाशक से लेकर उर्वरक तक डाले जाते हैं। यह मायने रखता है कि इन चीज़ों की खेती के क्या तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं।)
दूसरा, प्रोसेस्ड फूड। खेत या बागानों से आने के बाद अनाज, फल, सब्ज़ी वगैरह को थोड़ा प्रोसेस करके खाना। जैसे गेंहूं, बाजरा आदि की रोटी बनाकर खाना, सब्ज़ियां पकाना वगैरह।
तीसरा, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड। इसमें खाने को अत्यधिक प्रोसेस किया जाता है ताकि वह ज़्यादा दिन तक चले, या झटपट तैयार कर खा लिया जाए। जैसे चिप्स, फ्रोज़न फूड, इंस्टेंट फूड, कोल्डड्रिंक, सॉफ्टड्रिंक्स वगैरह अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड में आते हैं।
मोटे तौर पर कहें, तो भोजन के उत्पादन व प्रोसेसिंग के दौरान कुल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (global greenhouse gas emissions) में लगभग 30 प्रतिशत योगदान होता है। और, दुनिया में हर साल इस्तेमाल होने वाले ताज़े पानी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा खेती में खर्च होता। खेती-बाड़ी न्यूट्रिएंट्स प्रदूषण (nutrient pollution) और जैव विविधता के नुकसान (biodiversity loss) का एक बड़ा कारण भी है। (न्यूट्रिएंट्स प्रदूषण, एक तरह का जल प्रदूषण जिसमें जल निकायों में खेती में इस्तेमाल होने वाले नाइट्रोजन, फॉस्फोरस आदि बहकर मिल जाते हैं और जलनिकायों में शैवाल बढ़ाते हैं।)
वर्तमान भोजन काफी हद तक अस्वस्थ की श्रेणी में आता है और सालाना लगभग डेढ़ करोड़ लोग अस्वस्थ भोजन (unhealthy diet) के चलते असमय मर जाते हैं जो वायु प्रदूषण से होने वाली सालाना मौतों से अधिक है। इसके अलावा, फिलहाल दुनिया की एक प्रतिशत आबादी ही ऐसे दायरे में है जहां लोगों के अधिकार और भोजन की ज़रूरतें पृथ्वी की मर्यादाओं (safe operating space) के अंदर पूरी हो रही हैं।
ऐसे में हमें अपनी खानपान की आदतों में फौरन बदलाव लाने की ज़रूरत है। लेकिन कैसे? वैज्ञानिकों ने इस पर गंभीरता से काम किया है। 2025 के ईट–लैंसेट (EAT-Lancet) कमीशन में लगभग 35 देशों के पोषण, जलवायु, अर्थशास्त्र, स्वास्थ्य और कृषि विशेषज्ञ शामिल थे। इस कमीशन ने बताया है कि स्वस्थ भोजन क्या होता है, और एक उन्नत प्लैनेटरी हेल्थ डाइट (PHD) का सुझाव दिया है। PHD, ऐसा भोजन है जो मनुष्य और पृथ्वी दोनों के लिए स्वास्थ्यकर होगा। इसमें फल, सब्ज़ियां, गिरियां, फलियां और साबुत अनाज भरपूर मात्रा में लेने की सालह दी गई है; ये सभी मिलकर रोज़ाना की कैलोरी इनटेक का लगभग 65 प्रतिशत पूरा करें। PHD में हफ्ते में लगभग एक बार ही रेड मीट खाने और दो बार थोड़ी मात्रा में पोल्ट्री और मछली या शेलफिश खाने की सलाह दी गई है। PHD काफी लचीली है। कई पारंपरिक भोजन – जैसे मेडिटेरेनियन, दक्षिण और पूर्वी एशियाई, अफ्रीकन और लैटिन अमेरिकन भोजन – पहले से ही इसके मुताबिक हैं।
अभी, ज़्यादातर लोगों का आहार PHD से काफी अलग है। कई देशों में, खासकर अमेरिका में, लोग मीट बहुत ज़्यादा खाते हैं और सब्ज़ियां, फल, फलियां और गिरियां नहीं खाते हैं। इसके अलावा, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (processed food consumption) पूरी दुनिया में बहुत तेज़ी से अपनाया जा रहा है, जिसके चलते ऊपर से मिलाई गई शर्करा (added sugar), संतृप्त वसा और नमक का सेवन बढ़ रहा है।
कमीशन ने ग्रह की सभी नौ सीमा-रेखाओं में विभिन्न खाद्य प्रणालियों (food systems) के योगदान को मापा। और इनकी तुलना उस खाद्य प्रणाली से की जो मनुष्य और पृथ्वी दोनों के लिए स्वास्थ्यकर और वहनीय आहार (sustainable diet) दे सकती है। यह अनुमान लगाया गया कि क्या 2050 तक लगभग दस अरब लोगों को पृथ्वी की सीमाओं के अंदर पर्याप्त और स्वास्थ्यकर खाना खिलाया जा सकता है।
नतीजे चौंकाने वाले थे। स्वस्थ खाना खाने, खाने की बर्बादी कम करने (food waste reduction) और वहनीय उत्पादन के तरीकों (जैसे न्यूनतम जुताई) को अपनाकर 2050 तक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कमी की जा सकती है। लेकिन, अगर हमने अपने आहार और तरीकों में कोई बदलाव नहीं किया, तो यह उत्सर्जन 33 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा। यदि नीतिगत बदलाव (policy interventions) करने से रेड मीट की मांग में कमी आती है, तो जंगलों की कटाई (deforestation) में कमी आएगी और चारागाह बनाने के लिए ज़मीन पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाएगा।
सरकारों को ढांचे में बदलाव करने की ज़रूरत है – रेड मीट का उत्पादन (meat production) लगभग 33 प्रतिशत कम करना होगा, जबकि फल, सब्ज़ियों और गिरियों का उत्पादन (plant based food production) लगभग 60 प्रतिशत बढ़ाना होगा। ये बदलाव कई तरह की नीतियों के ज़रिए किए जा सकते हैं: वनस्पति-आधारित खेती के लिए सब्सिडी और इंसेंटिव देकर; ज़्यादा उत्सर्जन वाले मीट उत्पादन पर टैक्स या सीमा लगाकर; अलग-अलग फसलों के लिए आपूर्ति शृंखला में निवेश करके; तथा स्वास्थ्यप्रद व निर्वहनीय भोजन को प्राथमिकता देने वाले मानक बनाकर।
लेकिन यह बदलाव सस्ता नहीं होगा, इसके लिए हर साल लगभग 500 अरब डॉलर का खर्च आएगा। हालांकि इसका कुल फायदा (5-10 खरब डॉलर) (economic benefits) लागत से कहीं ज़्यादा है। यह स्वस्थ भोजन, कम जलवायु क्षति और कम पर्यावरणीय हानि की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में बचत करेगा।
यहां एक बात ध्यान में रखने की है कि दुनिया बाज़ार के प्रभाव (market influence) में है। इसलिए लोगों को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि वे क्या खाएं; नीतिगत स्तर पर स्वस्थ खाने के स्पष्ट दिशानिर्देश (dietary guidelines) तय करने होंगे। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.nature.com/w580h326/magazine-assets/d41586-026-00236-1/d41586-026-00236-1_51970322.jpg
नदी की तलहटी में आधी गड़ी हुई, या समुद्र के किनारे चट्टानों से चिपकी हुई सीपों (oysters) में न तो कोई चमक-दमक है, न कोई तेज़ गति। फिर भी पूरी जलीय-दुनिया (aquatic ecosystem) बहुत हद तक इन्हीं पर टिकी हुई है।
सीपों को अगर एक पंक्ति में समझना हो तो कहा जा सकता है कि वे पानी की सफाईकर्मी (water filter species) हैं। बिना थके, बिना रुके सीप अपने शरीर में पानी खींचती है, उसमें से गंदगी, सूक्ष्म कण, बैक्टीरिया, शैवाल, रसायन और भारी धातु (heavy metals) तक को छानती है और अपेक्षाकृत साफ पानी बाहर छोड़ देती है। वैज्ञानिक बताते हैं कि एक सामान्य आकार की सीप एक दिन में 20 से 40 लीटर तक पानी छान सकती है। अब ज़रा कल्पना कीजिए, अगर किसी नदी या तट पर हज़ारों या लाखों सीपें हों, तो वे कितनी बड़ी मात्रा में पानी को साफ रखती होंगी।
दुनिया भर में सीपों की लगभग 1200 से अधिक प्रजातियां (oyster species) पाई जाती हैं। इनमें से करीब 1000 प्रजातियां मीठे पानी (freshwater mussels) में और बाकी समुद्री जल में रहती हैं। दिलचस्प बात यह है कि मीठे पानी की सीपों की सबसे अधिक विविधता उत्तरी अमेरिका में पाई जाती है। वहां अकेले लगभग 300 प्रजातियां हैं। युरोप में करीब 16 प्रमुख प्रजातियां हैं, जबकि एशिया में भी बड़ी संख्या में मीठे पानी की और समुद्री सीपें मिलती हैं। चीन, भारत, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश सीपों की जैव विविधता और खेती, दोनों के लिए जाने जाते हैं।
सीपों की बनावट बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली होती है। दो मज़बूत खोलों के भीतर उनका कोमल शरीर सुरक्षित रहता है। ये खोल कैल्शियम कार्बोनेट (calcium carbonate shell) से बने होते हैं, जिसे सीपें पानी से धीरे-धीरे लेकर परत-दर-परत जमा करती हैं। यही कारण है कि उनका खोल जीवन भर बढ़ता रहता है। मोती बनने की प्रक्रिया (pearl formation) भी इसी से जुड़ी है। जब कोई बाहरी कण उनके शरीर के भीतर फंस जाता है, तो सीप उसे ढंकने के लिए कैल्शियम की परतें चढ़ाती जाती है और धीरे-धीरे मोती बन जाता है।
सीपों का जीवन चक्र (oyster life cycle) और भी रोचक है। समुद्री सीपें अपने अंडे और शुक्राणु पानी में छोड़ती हैं। उनसे सूक्ष्म लार्वा बनते हैं, जो कुछ समय तक समुद्र में तैरते रहते हैं और फिर किसी सख्त सतह से चिपक जाते हैं।
मीठे पानी की कई सीपें तो और भी अनोखा तरीका अपनाती हैं। उनके लार्वा कुछ समय तक मछलियों के गलफड़ों या पंखों से चिपककर रहते हैं। इससे उन्हें सुरक्षित वातावरण (host fish dependency) मिलता है और वे दूर-दूर तक फैल पाती हैं। बाद में वे नदी की तलहटी में गिरकर स्वतंत्र जीवन शुरू करती हैं। यानी सीपें केवल पानी पर नहीं, मछलियों पर भी निर्भर करती हैं। मछलियां कम हों, तो सीपों का भविष्य भी संकट में पड़ जाता है।
सीपों की सबसे बड़ी खासियत उनकी उम्र (longevity) है। समुद्री सीपें आम तौर पर 10 से 20 साल तक जीवित रहती हैं, जबकि मीठे पानी की कई सीपें 50 से 100 साल तक जी सकती हैं।
हाल के दशकों में यह देखा गया है कि मीठे पानी की सीपों की लगभग एक हज़ार प्रजातियों में से अधिकांश या तो संकटग्रस्त (endangered species) हैं या तेज़ी से घट रही हैं। पोलैंड, क्रोएशिया और ब्रिटेन जैसे देशों में बड़े पैमाने पर सीपों की मृत्यु की घटनाएं दर्ज की गई हैं। लंदन की टेम्स नदी में पिछले 60 वर्षों में मीठे पानी की लगभग सारी सीपें मर चुकी हैं।
उत्तरी अमेरिका में मीठे पानी की 70 प्रतिशत से अधिक सीप प्रजातियां संकटग्रस्त या विलुप्ति की कगार पर हैं। युरोप में 16 में से 12 प्रजातियां खतरे में हैं और 3 को अत्यंत संकटग्रस्त माना गया है। इसके पीछे कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण है जलवायु परिवर्तन। पानी का तापमान बढ़ रहा है, ग्रीष्म लहरें आ रही हैं। जब नदी या समुद्र का पानी अचानक बहुत गर्म हो जाता है, तो सीपें उसे सहन नहीं कर पातीं और बड़े पैमाने पर मर जाती हैं। इसके साथ ही प्रदूषण, रासायनिक अपशिष्ट, माइक्रोप्लास्टिक, नदियों का बहाव बदलना, बांध, खनन और शहरी गंदा पानी इस संकट को और विकट बना रहे हैं।
महासागरों में एक और बड़ी समस्या है समुद्र का अम्लीकरण। कार्बन डाईऑक्साइड समुद्र में घुलकर पानी को अम्लीय बना रही है। इससे सीपों के खोल बनने की प्रक्रिया कमज़ोर हो जाती है। उनका खोल पतला और भुरभरा हो जाता है। छोटी-छोटी शिशु सीपें तो खोल बना ही नहीं पातीं!
समुद्री सीपें तटीय इलाकों के लिए जीवन-रेखा जैसी हैं। वे पानी साफ रखती हैं, तटों को कटाव से बचाती हैं, छोटी मछलियों और केकड़ों को आश्रय देती हैं और मत्स्य उत्पादन को स्थिर बनाए रखती हैं। जहां-जहां सीपों की चट्टानें होती हैं, वहां जैव विविधता कई गुना बढ़ जाती है।
एशियाई देशों में भी सीपों की स्थिति चिंताजनक है। अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे क्षेत्रों की समुद्री जैव विविधता पर सीपों की गिरावट का सीधा असर पड़ रहा है। इन द्वीपों के आसपास के प्रवाल भित्ति (कोरल रीफ) तंत्र में सीपों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे पानी की स्वच्छता बनाए रखने में मदद करती हैं, जिससे कोरल और मछलियों का जीवन संभव होता है। लेकिन समुद्र का बढ़ता तापमान, पर्यटन से उत्पन्न प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा और तटीय विकास की गतिविधियां इन नाज़ुक तंत्रों को कमज़ोर कर रही हैं।
एशिया में सीपों की खेती किसी आधुनिक उद्योग से कम नहीं है, बल्कि यह समुद्र और इंसान के बीच बने एक पुराने रिश्ते का विस्तार है। चीन, जापान, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में सीपों को ‘उगाया’ नहीं जाता, बल्कि उन्हें सही माहौल दिया जाता है, जहां वे अपने प्राकृतिक तरीके से पनप सकें। समुद्र के तट के पास बांस, लकड़ी या रस्सियों की कतारें लगाई जाती हैं। इन्हीं पर सीपों के लार्वा आकर चिपक जाते हैं। कुछ जगहों पर पुराने खोल, पत्थर या खास तरह की टाइलें भी डाली जाती हैं, ताकि छोटे-छोटे सीपों को पकड़ बनाने के लिए ठोस सतह मिल सके। फिर समुद्र अपना काम करता है। पानी के साथ आने वाला पोषण, शैवाल और खनिज तत्व सीपों के भोजन बनते हैं। इंसान को उन्हें खिलाना नहीं पड़ता, बस पानी को साफ और संतुलित बनाए रखना होता है।
चीन इस क्षेत्र में सबसे आगे है। दुनिया में पैदा होने वाली समुद्री सीपों का बड़ा हिस्सा अकेले चीन से आता है। वहां के तटीय प्रांतों में हज़ारों किलोमीटर तक समुद्र में सीपों की खेती फैली हुई है। सैकड़ों सालों से मछुआरा परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस काम से जुड़े हैं। सुबह-सुबह छोटी नावों में निकलकर वे सीपों की कतारों की देखभाल करते हैं, टूटे हुए ढांचे ठीक करते हैं, ज़रूरत से ज़्यादा जमी सीपों को अलग करते हैं और परिपक्व सीपों को बाज़ार तक पहुंचाते हैं। यह खेती लाखों लोगों को रोज़गार देती है; नाविकों को, सफाई और पैकिंग करने वालों को, बाज़ार तक पहुंचाने वालों को और फिर होटल, रेस्तरां और निर्यात से जुड़े लोगों को भी।
जापान में सीपों की खेती तकनीकी रूप से काफी उन्नत है। वहां समुद्र की गहराई, पानी की गति और तापमान को ध्यान में रखकर खेती की जाती है। जापानी वैज्ञानिक सीपों की उन किस्मों पर काम कर रहे हैं जो ज़्यादा गर्म पानी में भी जीवित रह सकें। इससे जलवायु परिवर्तन के असर को कुछ हद तक संतुलित करने की कोशिश की जा रही है। जापान में सीपें केवल भोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा हैं। सूप, सुशी और कई पारंपरिक व्यंजनों में सीपों का इस्तेमाल होता है।
थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में सीपों की खेती छोटे-छोटे तटीय गांवों की रीढ़ है। वहां परिवार के परिवार इस काम से जुड़े हैं। महिलाएं और बुज़ुर्ग अक्सर सीपों को साफ करने, छांटने और बाज़ार के लिए तैयार करने का काम करते हैं। बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर के खर्च तक, बहुत कुछ इसी पर निर्भर करता है। इन देशों में सीपों की खेती गरीब समुदायों के लिए एक स्थिर आमदनी का साधन बन चुकी है।
सीपों का उपयोग केवल भोजन तक सीमित नहीं है। उनके खोलों का इस्तेमाल चूना बनाने में, खाद में कैल्शियम बढ़ाने में और निर्माण सामग्री में भी होता है। कुछ जगहों पर सीपों के खोलों से सड़क और तटीय बांध मजबूत किए जाते हैं। पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में भी सीपों के खोल का पावडर उपयोग में लाया जाता रहा है।
खाने के रूप में सीपें प्रोटीन, ज़िंक, आयरन और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर होती हैं। यही कारण है कि एशियाई देशों में इन्हें ‘समुद्र का पौष्टिक उपहार’ कहा जाता है। गरीब परिवारों के लिए यह सस्ता और पौष्टिक भोजन है, जबकि बड़े शहरों में यही सीपें महंगे रेस्तरां में विशेष व्यंजन के रूप में परोसी जाती हैं।
लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों जैसे इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम में भी सीपों की खेती और प्राकृतिक आबादी पर संकट गहराता जा रहा है। वहां सीपें न केवल पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका से भी जुड़ी हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री तूफानों की तीव्रता, समुद्र स्तर में वृद्धि और जल-तापमान में बदलाव इन क्षेत्रों में सीपों के अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। खेती भी जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से खतरे में पड़ रही है।
अगर सीपें सचमुच कम हो गईं, तो क्या होगा? सबसे पहले तो पानी की गुणवत्ता गिरेगी। नदियां और समुद्र अधिक गंदले होंगे। पीने योग्य पानी तैयार करना और महंगा हो जाएगा। फिर शैवाल विस्फोट बढ़ेंगे, जिससे मछलियां मरेंगी और दुर्गंध फैलेगी। और धीरे-धीरे पूरा पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित होने लगेगा। मत्स्य उद्योग को भी झटका लगेगा। तटीय समुदायों की आजीविका भी खतरे में पड़ेगी।
फिर भी आशा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। वॉशिंगटन डीसी से होकर बहने वाली एनाकोस्टिया नदी को साफ किया जा रहा है सिर्फ सीपों के लिए नहीं, बल्कि सीपों की मदद से। पुनर्प्रवेश कार्यक्रम का उद्देश्य सीवेज, ई.कोली और माइक्रोप्लास्टिक्स सहित अन्य प्रदूषकों को कम करना है।
एनाकोस्टिया नदी की तरह कई लोग एक अलग रणनीति अपना रहे हैं। वे सीपों के संरक्षण के लिए धन जुटाने की बजाय, यह विचार सामने रख रहे हैं कि सीपों का उपयोग पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए किया जा सकता है।
पोलैंड की नीदा नदी में 1980 के दशक में सीपें पूरी तरह समाप्त हो गई थीं, लेकिन जब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स ने प्रदूषण को काफी हद तक कम कर दिया, तब मोटे खोल वाली नदी-सीप को सफलतापूर्वक फिर से बसाया गया।
इन उदाहरणों से यह साफ होता है कि अगर हम पानी को साफ करें, तो सीपें लौट सकती हैं। सीपों में एक और अद्भुत क्षमता है अनुकूलन की। हर सामूहिक मृत्यु के बाद कुछ सीपें बच जाती हैं। वही आगे चलकर नई पीढ़ी (adaptation ability) बनाती हैं। यही विकास की प्रक्रिया है। यही उम्मीद है।
अगर हमने इन खामोश सफाईकर्मियों (ecosystem engineers) को बचा लिया, तो हम न केवल एक जीव-समूह को, बल्कि अपनी नदियों, अपने समुद्रों और अपने भविष्य (sustainable future) को बचा लेंगे। (स्रोत फीचर्स)
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पेरू स्थित अमेज़न जंगल (Amazon rainforest) के पंगुआना जैविक अनुसंधान केंद्र (Panguana Biological Research Station) ने अपने सभी फील्ड अध्ययन बंद कर दिए हैं। यह फैसला इलाके में सक्रिय अवैध सोना खनन करने वालों से मिल रही धमकियों के कारण सुरक्षा की दृष्टि से लिया गया। 1968 में स्थापित यह केंद्र पेरू का सबसे पुराना पर्यावरण शोध संस्थान है। यहां दुनिया भर के वैज्ञानिक वर्षावन, वन्यजीवों और जैव विविधता पर अध्ययन करते रहे हैं। यह केंद्र युयापिचिस नदी के किनारे बने 1600 हैक्टर के एक संरक्षित क्षेत्र (protected forest area) में स्थित है और अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है।
हाल के महीनों में अवैध खनन वाले लोग संरक्षित क्षेत्र के बहुत करीब पहुंच गए हैं। इन लोगों ने कर्मचारियों को जान से मारने की धमकियां दीं और कई बार संरक्षण क्षेत्र में घुसने की कोशिश भी की है। कुछ मौकों पर हथियारबंद टकराव (armed conflict) और गोलियां चलने की घटनाएं हुईं, जिससे वैज्ञानिकों के लिए सुरक्षित रहकर काम करना असंभव हो गया है।
आम तौर पर इस शोध केंद्र में लगभग 30 वैज्ञानिक और सहायक कर्मचारी काम करते थे। पिछले कई वर्षों में यहां किए गए शोध से 300 से अधिक वैज्ञानिक प्रकाशन (scientific publications) सामने आए हैं, जिनमें कीटों, पौधों और वर्षावन की पारिस्थितिकी (rainforest ecology) पर महत्वपूर्ण काम शामिल है। लंबे समय से जुटाए गए आंकड़ों से यह समझने में मदद मिली है कि उष्णकटिबंधीय जंगल पर्यावरणीय बदलावों पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं।
पंगुआना शोध केंद्र में पेरू के चार जलवायु निगरानी टावरों में से एक मौजूद है। ये टावर लगातार धरती और वातावरण के बीच कार्बन, नमी और ऊर्जा के आदान-प्रदान (carbon flux monitoring) को मापते हैं। यह जानकारी जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए बेहद ज़रूरी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार टावर बताता है कि एंडीज़ पर्वत (Andes mountains) कैसे अमेज़न के मौसम को प्रभावित करते हैं।
हालांकि टावर में लगे स्वचालित उपकरण दूर से अब भी डैटा (remote sensing data) इकट्ठा कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा कारणों से वैज्ञानिकों और वालंटियर्स को वहां जाने से मना कर दिया गया है। स्टेशन प्रबंधन को डर है कि पहले की गई शिकायतों के बदले में खनन करने वाले लोग इस टावर को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
पेरू में अवैध खनन एक गंभीर और बढ़ती हुई समस्या बन चुका है। अमेज़न कंज़र्वेशन (Amazon Conservation) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 1980 के बाद से खनन गतिविधियों ने 225 से ज़्यादा नदियों और झीलों को नुकसान पहुंचाया, करीब 1.4 लाख हैक्टर जंगल नष्ट किए, और कई आदिवासी समुदायों (indigenous communities) को प्रभावित किया है। यह काम अक्सर उन दूर-दराज़ इलाकों में फैलता है, जहां सरकार की मौजूदगी बहुत कम होती है। स्थानीय अभियोजक भी मानते हैं कि कमज़ोर निगरानी और कार्रवाई की कमी के कारण अवैध खनन लगातार बढ़ रहा है। हाल ही में पुलिस और सेना ने कुछ मशीनें नष्ट कीं, लेकिन इलाके में तनाव अब भी बना हुआ है।
फिलहाल क्षेत्रीय प्रशासन ने सीमित गश्त (security patrols) का सुझाव दिया है, लेकिन वैज्ञानिकों को चिंता है कि अगर मज़बूत सुरक्षा नहीं मिली, तो अमेज़न का यह महत्वपूर्ण वैज्ञानिक केंद्र लंबे समय तक बंद ही रह सकता है।(स्रोत फीचर्स)
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भारत की बढ़ती आबादी के लिए आवास और बुनियादी निर्माण की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए देश में भवन निर्माण (construction sector) और निर्माण सामग्री तेज़ी से बढ़ रहे हैं। लेकिन यह बढ़त ऊर्जा खपत और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (greenhouse gas emissions) में भी काफी योगदान देती है। भवन-निर्माणों के पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए भारत सरकार ने ऊर्जा दक्षता और टिकाऊपन/वहनीयता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विभिन्न नीतियां, योजनाएं और कार्यक्रम लागू किए हैं।
सरकार की प्रमुख पहलों में से एक है ऊर्जा संरक्षण टिकाऊ भवन संहिता (Energy Conservation Sustainable Building Code, ECSBC)। इसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) द्वारा विकसित किया गया है और विद्युत मंत्रालय (MoP) द्वारा लागू किया गया है। ECSBC में नए वाणिज्यिक और आवासीय भवनों के लिए न्यूनतम ऊर्जा दक्षता मानक निर्धारित हैं, और मूलत: इन्हें ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता (ECBC) के आधार पर विकसित किया गया है। इसमें ऊर्जा संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग और भवन के लिए अन्य हरित भवन आवश्यकताओं के मानदंड/मानक भी शामिल हैं। ECSBC के अलावा, कई निजी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा समर्थित स्वैच्छिक हरित बिल्डिंग रेटिंग सिस्टम्स भी व्यापक रूप से लागू हैं।
ये हरित बिल्डिंग रेटिंग सिस्टम ऊर्जा और जल दक्षता, टिकाऊ/वहनीय निर्माण सामग्री का उपयोग, अपशिष्ट प्रबंधन और भीतरी पर्यावरण गुणवत्ता सहित कई टिकाऊ/वहनीय मानकों के आधार पर परियोजनाओं का आकलन और प्रमाणन करते हैं। हालांकि ये रेटिंग सिस्टम्स आवासीय और वाणिज्यिक दोनों तरह के भवनों के लिए हैं, लेकिन इनका उपयोग अभी भी सीमित है – विशेष रूप से आवासीय क्षेत्र में। हालांकि न केवल केंद्र स्तर पर बल्कि नगर पालिकाओं के स्तर पर भी इन नीतियों को समर्थन हासिल है, लेकिन भारत की कुल भवन निर्माण/सामग्री का केवल 5 प्रतिशत हिस्सा ही हरित प्रमाणित है। हरित भवन निर्माण अपनाने में एक प्रमुख बाधा है हरित इमारतों के जीवनपर्यंत मिलने वाले लाभों के बारे में सीमित जागरूकता और समझ। पूरी जानकारी का अभाव उपभोक्ताओं की सोच-समझकर निर्णय लेने की क्षमता को सीमित करता है।
सूचना हस्तक्षेप
हमारा मानना है कि यदि उपभोक्ताओं को हरित प्रमाणन (green certification) के लाभ बताने वाली सही और प्रासंगिक जानकारी आसानी से उपलब्ध होगी तो हरित भवनों को अपनाने/बनाने में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
इस कमी को दूर करने के लिए हमारा सुझाव है कि मानकीकृत वहनीयता दर्शाने वाला एक प्रारूप (standard sustainability disclosure) बनाया जाए, जिसका उपयोग निर्माता अपनी परियोजनाओं का प्रचार-प्रसार करते समय करें। यह प्रारूप संभावित खरीदारों को भवन के पर्यावरणीय फायदों और टिकाऊ/वहनीय विशेषताओं के बारे में बताने का एक स्पष्ट, विश्वसनीय और तुलनीय तरीका होगा। ऊर्जा दक्षता, जल खपत, प्रयुक्त सामग्री और प्रमाणन जैसी महत्वपूर्ण जानकारी को सुलभ और समझने योग्य बनाकर यह प्रारूप रियल एस्टेट बाज़ार में पारदर्शिता (real estate transparency) बढ़ा सकता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उपभोक्ताओं को विकल्प चुनने में सक्षम बनाएगा और हरित भवनों के लाभों के बारे में उनकी जागरूकता बढ़ाएगा। जैसे-जैसे उपभोक्ताओं की जागरूकता बढ़ेगी, पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार निर्माण की मांग भी बढ़ सकती है, जिससे बाज़ार भी टिकाऊ/वहनीय प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रेरित होगा। भारत के तेज़ी से हो रहे शहरीकरण (urbanization in India) के मद्देनज़र, ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2047 तक 50 प्रतिशत से अधिक आबादी शहरी क्षेत्रों में रहेगी। यह तरीका हरित भवन प्रथाओं को मुख्यधारा में लाने और संसाधन-कुशल, कम कार्बन वाले शहरी भवन निर्माण को तेज़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
हरित भवन रेटिंग प्रणालियां
पिछले दो दशकों में, भारत में हरित भवन प्रमाणन की इकोसिस्टम (green building ecosystem) अच्छी तरह से स्थापित हो चुकी है। भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) द्वारा शुरू की गई भारतीय हरित भवन परिषद (IGBC) पहली और व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली प्रणाली थी। इसके अलावा अन्य प्रमुख रेटिंग प्रणालियां हैं – दी एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (TERI) की GRIHA, एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (ASSOCHAM) की GEM और यूएस ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल की LEED। ये रेटिंग प्रणालियां विभिन्न प्रकार की इमारतों के लिए दिशानिर्देश देती हैं, जिनमें व्यक्तिगत भवनों से लेकर भवन परिसरों, आस-पड़ोस और यहां तक कि शहर-स्तरीय विकास परियोजनाएं भी शामिल हैं।
परियोजनाओं को हासिल टिकाऊ स्कोर के आधार पर प्रमाण-पत्र मिलता है। हर रेटिंग सिस्टम की रेटिंग वैधता अवधि अलग है; आम तौर पर किसी परियोजना को हासिल रेटिंग 3 से 5 वर्षों तक वैध रहती है। वैधता अवधि समाप्त होने के बाद परियोजनाओं को पुन: प्रमाणन लेना पड़ता है, जो पहले से विद्यमान इमारतों के लिए अलग होता है। पुन: प्रमाणन के समय रेटिंग बदल सकती है। इसमें रहवास-उपरांत ऑडिट के आधार पर परियोजना का मूल्यांकन किया जाता है, क्योंकि किसी परियोजना की वहनीयता की स्थिति समय के साथ बदल सकती है।
समस्त रेटिंग प्रणालियां ऊर्जा दक्षता, जल दक्षता, निर्माण सामग्री एवं संसाधन, अपशिष्ट प्रबंधन आदि जैसे प्रमुख क्षेत्रों में कुछ अनिवार्य और कुछ वैकल्पिक मानदंड निर्धारित करती हैं। इनमें से कुछ रेटिंग प्रणालियां कुछ मानदंडों के अनुपालन के लिए ECBC के उपयोग की भी अनुशंसा करती हैं। गौरतलब है कि हर रेटिंग सिस्टम का समान वहनीय उपायों के लिए वेटेज और स्कोर करने का तरीका अलग होता है। इसलिए, किसी भवन को मिली हरित रेटिंग बस यह बताती है कि वह पारंपरिक/सामान्य भवनों से बेहतर है। अत: यह संभव है कि हरित रेटिंग प्राप्त भवन, हरित भवन का प्रमाणन हासिल करने के लिए निर्धारित पर्याप्त हरित विशेषताओं को पूरा न करता हो।
हरित भवन पदचिह्न
भवन की हरित भवन पदचिह्न की नवीनतम जानकारी हरित भवन रेटिंग सिस्टम के पोर्टल (green building portal) पर डाली जाती है, और उद्योग विशेषज्ञों द्वारा भवन स्टॉक संख्या का अनुमान भी लगाया जाता है। इन आंकड़ों के आधार पर, देश में कुल भवन निर्माणों में से 5 प्रतिशत भवन IGBC प्रमाणित हैं, 0.4 प्रतिशत GRIHA प्रमाणित भवन हैं और 0.04 प्रतिशत भवन LEED प्रमाणित हैं। यह दर्शाता है कि भारत में हरित भवनों का उपयोग/निर्माण अभी भी काफी कम है।
मानक वहनीयता प्रारूप
हरित विशेषताओं के प्रचार-प्रसार में सुधार और जागरूकता बढ़ाने का एक तरीका हो सकता है कि भवन विशेषताओं की रिपोर्टिंग का एक मानकीकृत प्रारूप (standard reporting format) बनाया जाए। इस प्रारूप से उपभोक्ता हरित रेटेड बनाम गैर-हरित रेटेड भवन की वहनीयता लागत की तुलना कर पाएंगे।
हरित बिल्डिंग काउंसिल भवन की हरित या वहनीय विशेषताओं को उजागर करने के लिए एक मानकीकृत प्रारूप बनाने में मदद कर सकती है। मानक प्रारूप दो महत्वपूर्ण उद्देश्यों को पूरा कर सकता है। एक तो यह किसी भवन की विशिष्ट वहनीय/टिकाऊ विशेषताओं के बारे में उपभोक्ताओं की समझ में सुधार कर सकता है। दूसरा यह तकनीकी रेटिंग को खरीदारों और उपयोगकर्ताओं के लिए स्पष्ट और सुलभ जानकारी के रूप में पेश कर सकता है, और सोचे-समझे निर्णय लेने में मदद कर सकता है।
वर्तमान में, IGBC, GRIHA, LEED और GEM जैसी विभिन्न ग्रीन बिल्डिंग प्रमाणन प्रणालियां हैं, जो वहनीयता का आकलन करने के लिए अलग-अलग वेटेज और स्कोर पद्धतियों का उपयोग करती हैं। मसलन, ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण या सामग्री के पुन: उपयोग जैसे मापदंड पर हर रेटिंग प्रणाली का ज़ोर अलग है। इसके अलावा, दक्षता लाभ या वित्तीय लाभ का अनुमान लगाने के लिए उपयोग की जाने वाली विधियां विभिन्न कारकों के आधार पर भी अलग-अलग होती हैं, जैसे परियोजना के चरण (डिज़ाइन बनाम रहवास-उपरांत), आधारभूत तुलना के लिए प्रयुक्त मान्यताओं और कार्यान्वित की जाने वाली तकनीकों या प्रथाओं के प्रकार के आधार पर।
मापदंडों और प्रचार प्रारूपों, दोनों में यह भिन्नता उपभोक्ताओं के लिए परियोजनाओं को दिए गए प्रमाणपत्र को पूरी तरह से समझना मुश्किल बना देती है। एक सुसंगत पैमाने या तुलना बिंदु की अनुपस्थिति में भवनों की हरित विशेषताओं की तुलना करना भ्रामक हो जाता है और अक्सर गलत समझ और निर्णय लेने में असमर्थता का कारण बनता है। इसलिए शब्दावली, मानकों को सुसंगत बनाने वाला मानकीकृत प्रारूप जानकारी को सरल बना सकता है, तुलना को आसान कर सकता है और हरित भवन के वादों पर उपभोक्ता का विश्वास बढ़ा सकता है।
टिकाऊ मानदंड
हरित रेटिंग सिस्टम द्वारा परिभाषित टिकाऊ मानदंडों का हमने विश्लेषण किया। इस आधार पर हम कुछ ऐसे चुनिंदा मानदंड सुझा रहे हैं जो उपभोक्ताओं को सोचे-समझे और पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार विकल्प चुनने में सक्षम बना सकते हैं। यही मानदंड मानकीकृत रिपोर्टिंग के प्रारूप भी बन सकते हैं।
1. दिनांक और वैधता के साथ हरित रेटिंग (rating validity): रेटिंग जारी करने की तिथि और वैधता की जानकारी उपभोक्ता के लिए अहम है। यह जानकारी उपभोक्ता को यह विश्वास दिलाती है कि प्रमाणपत्र हालिया है और यह भवन टिकाऊ है।
2. भवन के जीवनकाल में होने वाली बचत का अनुमानित आंकड़ा (lifecycle savings): भवन और इकाई दोनों स्तर पर ऊर्जा, जल और अपशिष्ट प्रबंधनों से होने वाली अनुमानित आर्थिक बचत दिखाई जा सकती है।
भवन स्तर पर – नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन, पानी की बचत और उसके पुनर्चक्रण एवं पुनर्उपयोग, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन आदि के लिए लगाई गई प्रणालियां बताई जा सकती हैं।
व्यक्तिगत इकाई स्तर पर – कुशल भवन आवरण बनाकर, नलों में पानी प्रवाह कम करने वाले उपाय लगाकर किए गए ऊर्जा संरक्षण के बारे में जानकारी देना। मौजूदा विभिन्न उपकरणों/सॉफ्टवेयर से हरित भवन की लागत का आकलन दर्शाया जा सकता है।
3. ऊर्जा दक्षता का मापन:
बिजली बचत की मात्रा द्वारा
सौर, SWH प्रणालियों द्वारा
कुशल उपकरणों द्वारा
नवीकरणीय प्रौद्योगिकियां अपनाकर और कुशल उपकरण लगाकर बिजली बिल कम आएगा।
4. तापीय आराम का मापन:
(एसी के साथ और बिना बिताए आरामदायक घंटे/वर्ष
दीवार और खिड़की की सामग्री के आधार पर
HVAC दक्षता (U value, WWR, RETV, EER) के आधार पर
एसी के बिना यदि भवन के भीतर आरामदायक वक्त बीतता है तो इससे बिजली बचेगी। दिए गए अंक उपभोक्ताओं को यह आकलन करने में मदद कर सकते हैं कि गर्मी से राहत पाने के लिए क्या वास्तव में एसी में ज़रूरी है?
5. ऊर्जा प्रदर्शन सूचकांक (Energy Performance Index – EPI): यह विभिन्न परियोजनाओं में ऊर्जा खपत की तुलना करने में मदद करता है – कम EPI यानी उच्च दक्षता।
6. जल दक्षता का मापन (water efficiency metrics)
प्रतिशत पानी की बचत
वर्षा जल संचयन की मात्रा
रीसायकल पानी की मात्रा और उसका उपयोग
यह मीठे पानी की बचत करेगा, स्थिरता को बढ़ाएगा और पानी का बिल कम करेगा
7. अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियां (on-site waste management): ऑन-साइट अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों और उनकी दक्षता के बारे में जानकारी देना।
8. सार्वजनिक परिवहन से निकटता (public transport accessibility): नज़दीकी सार्वजनिक परिवहन सेवा तक पैदल जाने में लगने वाला समय – उपभोक्ताओं को रोज़ाना आने-जाने में लगने वाले समय की योजना बनाने में मददगार होगा।
9. सबकी पहुंच (universal accessibility): बुज़ुर्गों और विकलांग व्यक्तियों सहित सभी के लिए आसान पहुंच।
वर्तमान में भी कुछ हरित भवन सलाहकार और डेवलपर अपने-अपने प्रारूपों के ज़रिए (खासकर विपणन या प्रमाणन के दौरान) परियोजना की वहनीयता सम्बंधी विशेषताएं बताते हैं। हालांकि ये प्रयास पारदर्शिता के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता दर्शाते हैं लेकिन प्रारूपों में एकरूपता के अभाव के चलते उपभोक्ताओं के लिए विभिन्न परियोजनाओं के लाभों की तुलना करना और मूल्यांकन एक चुनौती बन जाता है।
आगे की राह
एक मानक प्रारूप से हरित और टिकाऊ भवन विशेषताओं के बारे में जागरूकता लाने में काफी मदद मिल सकती है, और प्रमाणित हरित भवनों को खरीदने/बनाने में तेज़ी आ सकती है। यह प्रारूप उपभोक्ताओं को पारंपरिक भवनों की तुलना में टिकाऊ भवनों के लाभों के बारे में विश्वसनीय, तुलनीय और समझने में आसान जानकारी दे सकता है। इसका उपयोग रियल एस्टेट परियोजनाओं के विपणन(real estate marketing), बिक्री और प्रचार सामग्री में किया जा सकता है।
यह प्रारूप भारतीय राष्ट्रीय भवन परिषद (National Building Council) द्वारा गठित एक अंतर-परिषद समिति द्वारा तैयार करके लागू किया जा सकता है। इस समिति में केंद्र सरकार, प्रमुख हरित भवन परिषद और रियल एस्टेट हितधारक और राज्य RERA प्राधिकरणों (Real Estate Regulatory Authority) के प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं।
प्रस्तावित समिति को ये प्रमुख नीतिगत कार्य सौंपे जा सकते हैं:
1. विभिन्न हरित भवन रेटिंग सिस्टम के मुख्य टिकाऊ मापदंडों का समन्वय करके एकरूप प्रारूप बनाना और अधिसूचित करना।
2. सभी मान्यता प्राप्त ढांचों में सामंजस्य बनाना, जिससे एकरूपता और तुलनीयता सुनिश्चित हो।
3. कार्यान्वयन दिशानिर्देश और अनुपालन प्रोटोकॉल स्थापित करना, जिसमें राज्य-स्तरीय RERA जैसे मौजूदा प्लेटफार्मों के साथ एकीकरण शामिल है, ताकि इसे अपनाना आसान हो।
4. वहनीयता के दावों को सत्यापित करने व गलतबयानी से सम्बंधित शिकायतों के समाधान के लिए एक निगरानी एवं शिकायत निवारण तंत्र बनाना।
5. प्रारूप की प्रभावशीलता की समीक्षा करने और इसके बेहतर होते वहनीयता मानकों, नियामकों और उपभोक्ता अपेक्षाओं के अनुरूप अपडेट करने के लिए सतत परामर्श करना।
प्रमुख हितधारकों के बीच समन्वय को बढ़ावा देकर समिति उपभोक्ता और डेवलपर्स के बीच मौजूदा सूचना अंतर को पाट सकती है। भारत तेज़ी से शहरीकृत हो रहा है। ऐसे प्रयास अधिक टिकाऊ निर्मित परिवेश (sustainable urban development) बनाने में मदद कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://img.etimg.com/thumb/width-1200,height-900,imgsize-28874,resizemode-75,msid-111003760/industry/services/property-/-cstruction/green-buildings-market-in-india-to-reach-39-billion-by-2025.jpg
जलवायु बदलाव (climate change) की समस्या के समाधान के रूप में विश्व स्तर पर दो तरह के प्रयास चर्चित हैं। पहला तो यह है कि इसके लिए ज़िम्मेदार ग्रीनहाऊस गैसों (greenhouse gases) के उत्सर्जन को कम किया जाए। दूसरा, कि इस समस्या का सामना करने के लिए लोगों व समुदायों की तैयारी बेहतर हो। इन दो पक्षों को प्रायः मिटिगेशन व एडाप्टेशन कहा जाता है व ये दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। आगे चुनौती ऐसा कार्यक्रम बनाने की है जिनसे लोगों की आजीविका भी बेहतर हो तथा साथ में जलवायु बदलाव संकट के इन दोनों पक्षों पर भी कार्य आगे बढ़ सके।
भारत जैसे विकासशील देशों (developing countries) के संदर्भ में तो यह चुनौती और भी अहम है क्योंकि जहां जलवायु बदलाव के संदर्भ में हमें अपनी ज़िम्मेदारी अवश्य निभानी है पर साथ में आजीविका व आर्थिक पक्ष (economic development) को भी आगे बढ़ाना है। ऐसे कार्यक्रम बनाने होंगे जिनमें उचित समन्वय बन सके। फिर भारत जैसे देश में यह समन्वय ग्रामीण क्षेत्रों में बनाना तो और भी ज़रूरी हो गया है।
यदि हम पहले पक्ष ‘मिटिगेशन’ या ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की बात करें तो प्राकृतिक खेती (natural farming) व बागवानी (sustainable agriculture) को बढ़ाना इसमें अहम कदम है। प्राकृतिक खेती व बागवानी को बढ़ाकर कृषि पर ग्रीनहाऊस गैस का अत्यधिक उत्सर्जन करने वाले जीवाश्म ईंधन का जो बड़ा बोझ है, उसे कम किया जा सकता है। यदि किसी गांव में प्राकृतिक खेती के त्वरित प्रसार से रासायनिक खाद व कीटनाशक दवा आदि का उपयोग कम होता है तो जीवाश्म ईंधन का उपयोग व ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन भी कम हो जाएगा। इसके अतिरिक्त अनेक छोटे औज़ारों के उपयोग को प्रोत्साहित कर बड़ी मशीनों व ट्रैक्टरों आदि में डीज़ल की अधिक खपत की संभावना भी कम होती है।
प्राकृतिक खाद (organic manure) के उपयोग से व प्राकृतिक खेती से खेतों की मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ता है, उसकी मिट्टी में कार्बन संजोने की क्षमता (carbon sequestration) बढ़ती है व वायुमंडल में कार्बन डाईक्साइड का उत्सर्जन कम होता है।
किसान छोटे बगीचों में फलदार पेड़ लगा सकते हैं, गावों के आसपास मिश्रित स्थानीय प्रजातियों के वृक्ष (native species) इस तरह साथ-साथ लगाए जा सकते हैं कि वे एक साथ एक-दूसरे से सहयोग करते हुए पनप सकें।
दूसरी ओर, जलवायु बदलाव व उससे जुड़े प्रतिकूल मौसम और आपदाओं का सामना बेहतर ढंग से करने की क्षमता यानी एडाप्टेशन (climate resilience) के लिए जल व मिट्टी संरक्षण (water and soil conservation) सबसे महत्त्वपूर्ण है। जल व मिट्टी संरक्षण से सूखे व बाढ़ (drought and flood) दोनों तरह की आपदाओं को कम करने में मदद मिलती है व साथ में ग्रामीण आजीविकाओं का मज़बूत आधार तैयार होता है। सामान्य वर्ष में भी कुछ महीनों के लिए अनेक गांवों के जल-स्रोत सूख जाते हैं। यह स्थिति गांववासियों के लिए ही नहीं, पशु-पक्षियों के लिए भी बड़ा संकट बन जाती है।
वन्य जीव-जंतुओं (wildlife) व आवारा घूम रहे पशुओं के लिए भी प्यास का संकट बढ़ जाता है। जल-संरक्षण से यह संभावना बढ़ती है कि इन जल-स्रोतों में वर्ष भर पानी की उपस्थिति बनी रहेगी। जल संरक्षण से भूजल स्तर (groundwater level) ठीक बना रहता है जिससे कुंओं व हैंडपंप आदि से पानी मिलता रहता है। अधिक वर्षा के समय बहुत-सा पानी विभिन्न गांवों में व उनके जल-स्रोतों व खेतों में संरक्षित रह जाए तो विभिन्न स्थानों पर बाढ़ की संभावना अपने आप कम हो जाएगी।
प्रतिकूल मौसम (extreme weather) के समय में मिश्रित खेती (mixed cropping) की पद्धति से फसल के कुछ हिस्से को बचाने की संभावना बढ़ जाती है। मिश्रित खेती को कई स्तरों पर बढ़ावा देकर व छोटे किसानों को खेतों में अनाज, दलहन, तिलहन के साथ कई तरह की सब्ज़ियां व फल लगाने को प्रोत्साहित कर उन्हें प्रतिकूल मौसम में भी सशक्त रहने के लिए सक्षम बनाया जा सकता है।
प्राकृतिक खेती की इन तकनीकों से किसानों का खर्च बहुत कम (low-cost farming) हो सकता है। यदि खर्च कम होगा तो कर्ज़ की ज़रूरत भी कम हो जाएगी। इस तरह, छोटे किसान जलवायु बदलाव के अधिक कठिन दौर का सामना करने में सक्षम हो जाएंगे। दूसरी ओर, किसानों की बीज सम्बंधी आत्म-निर्भरता (seed self-reliance) को बढ़ाने पर भी अधिक ध्यान देना चाहिए। आत्म-निर्भरता बढ़ने से जलवायु बदलाव का सामना करने की क्षमता बढ़ जाती है।
जिन समुदायों में आपसी सहयोग व एकता (community cooperation) बढ़ती है, उनकी जलवायु बदलाव के दौर का आपसी सहयोग से बेहतर ढंग से सामना करने की क्षमता भी बढ़ती है। ज़रूरत है कि ग्रामीण समुदाय आपसी सहयोग को बढ़ाएं, उनके स्व-सहायता समूह (self-help groups) गठित किए जाएं, अधिक व्यापक स्तर पर भी संगठन बनाए जाएं, सबके सहयोग से सामाजिक उद्यम (social enterprises) स्थापित किए जाएं।
उपरोक्त सभी प्रयास सृजन संस्था ने निरंतर अपने कार्यक्रमों के ज़रिए किए हैं। इन कार्यक्रमों का मूल उद्देश्य ग्रामीण आजीविकाओं (जैसे कृषि, बागवानी, बकरी-पालन) को टिकाऊ तौर पर बेहतर और समृद्ध करना है व इसमें विशेष तौर पर कमज़ोर वर्ग व उसमें भी महिलाओं (women empowerment) पर विशेष ध्यान दिया जाता है। सृजन के कार्यक्रमों के अन्तर्गत छोटे बगीचों में फलदार पेड़ लगाने के अतिरिक्त तपोवन नामक मानव-निर्मित वन (community forests) अनेक गांवों में लगाए गए हैं जिनमें मिश्रित स्थानीय प्रजातियों के हज़ारों वृक्ष साथ-साथ लगाए गए हैं। कार्यक्रम जलवायु बदलाव के संकट के दोनों पहलुओं के लिहाज़ से बहुत मददगार सिद्ध हो रहा है।
इस तरह अनेक स्तरों पर जो कार्य ग्रामीण आजीविका आधार को मजबूत करते हैं, वे जलवायु बदलाव (climate action) की गंभीर समस्या के संदर्भ में भी मददगार होते हैं। एक ओर वे जलवायु बदलाव के संकट को कम करने में सहयोग करते हैं तो दूसरी ओर, प्रतिकूल मौसम और आपदाओं का सामना करने की ग्रामीण समुदायों की क्षमता को बढ़ाते भी हैं। इन कार्यक्रमों के इस व्यापक महत्व व समन्वय क्षमता को देखते हुए इन्हें सरकारी व सी.एस.आर. स्तर (CSR initiatives) पर अधिक सहयोग व समर्थन प्राप्त होना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.asiapathways-adbi.org/wp-content/uploads/2024/06/Climate-Smart-Agriculture-for-a-Sustainable-Future-1024×631.png
नेचर पत्रिका (Nature Journal research) में प्रकाशित एक विश्लेषण का निष्कर्ष है कि आइस कैप्स से पिघलती बर्फ धरती के घूर्णन को धीमा (Earth rotation slowdown) कर रही है। स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन ऑफ ओशिएनोग्राफी के भू-भौतिकविद डन्कन एग्न्यू का मत है कि घूर्णन की रफ्तार में इस गिरावट के कारण शायद लीप सेकंड (leap second timing) जोड़ने की ज़रूरत टल जाएगी।
दरअसल, हम समय का मापन पृथ्वी की गतियों (Earth rotation time) के आधार पर ही करते आए हैं। जैसे एक वर्ष तब पूरा होता है जब पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर ले। इसी प्रकार एक दिन का मतलब होता है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर एक पूरा चक्कर लगा ले। इसी के अनुसार 1 सेकंड को इस दिन की अवधि के एक अंश के रूप में परिभाषित किया गया है। लेकिन पृथ्वी की गतियां बहुत स्थिर (planetary motion changes) नहीं हैं। इन पर कई चीज़ों का असर पड़ता है।
फिर 1967 में परमाणु घड़ियों (atomic clocks timekeeping) का उपयोग शुरू हुआ था। परमाणु घड़ियां किसी परमाणु द्वारा उत्सर्जित प्रकाश की आवृत्ति या फ्रिक्वेंसी के आधार पर चलती हैं। फिलहाल दुनिया भर में लगभग साढ़े चार सौ परमाणु घड़ियां समय का हिसाब रखती हैं। इसे को-ऑर्डिनेटेड युनिवर्सल टाइम (UTC time standard) कहते हैं। आजकल के उपकरणों को चलाने के लिए इनके द्वारा दर्शाया गया समय ही इस्तेमाल किया जाता है। इनके समयमान और पृथ्वी के प्राकृतिक दिन पर आधारित समयमान में थोड़ा अंतर होता है और इनके बीच तालमेल रखना होता है।
समय मापन से जुड़े कई वैज्ञानिकों (मेट्रोलॉजिस्ट) का मत था कि लाखों वर्षों में पृथ्वी का घूर्णन धीमा हो रहा है और कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि पृथ्वी-घूर्णन के सेकंड और यूटीसी के सेकंड के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए लीप सेकंड जोड़ना पड़े। लीप सेकंड जोड़ने की प्रथा 1972 में शुरू की गई थी और तब से 27 बार लीप सेकंड जोड़ने की ज़रूरत पड़ी है। आखरी लीप सेकंड 2016 में जोड़ा गया था।
दरअसल, पृथ्वी की घूर्णन गति में दीर्घावधि गिरावट मुख्य रूप से चंद्रमा के कारण (lunar tidal effect) होती है। चंद्रमा समंदरों पर आकर्षण बल लगाता है जिसकी वजह से घर्षण पैदा होता है और धरती अपने अक्ष पर थोड़ा धीमे घूमने लगती है। इस मंदन के कई रोचक परिणाम होते हैं। जैसे 2000 साल पहले ग्रहण आज की घूर्णन गति के आधार पर की गई गणना से थोड़ा अलग समय पर दिखते थे। और तो और, प्राचीन तलछटों के विश्लेषण से लगता है कि करीब 1.4 अरब वर्ष पूर्व दिन शायद आजकल के सिर्फ 19 घंटों (shorter day in past) के बराबर हुआ करता था।
पृथ्वी की घूर्णन गति में बदलाव का एक कारण और है। छोटी अवधि में पृथ्वी की घूर्णन गति में उतार-चढ़ाव कई भू-भौतिकीय घटनाओं के कारण होते रहते हैं। इस वक्त पृथ्वी के घूर्णन पर असर पड़ रहा है केंद्रीय भाग में स्थित तरल में चल रही धाराओं (Earth core circulation) का। इन धाराओं की वजह के बाहरी पर्पटी की घूर्णन रफ्तार बढ़ी है।
एग्न्यू का विश्लेषण बताता है कि यदि रफ्तार बढ़ने की यह प्रवृत्ति जारी रही, तो अगला लीप सेकंड शायद 2026 में नहीं बल्कि 2035 में जोड़ना पड़गा। और तो और, शायद आगे चलकर लीप सेकंड घटाने की बात भी उभर सकती है।
लेकिन अब घूर्णन गति को प्रभावित करने वाला एक तीसरा कारण महत्वपूर्ण हो चला है – जलवायु परिवर्तन (climate change impact) और धरती का गर्माना। 1990 के दशक की शुरुआत से ग्रीनलैंड तथा अंटार्कटिका की बर्फ पिघलकर भूमध्य रेखा की ओर बही (polar ice melt redistribution) है। इसकी वजह से पृथ्वी का भूमध्य वाला हिस्सा थोड़ा मोटा हुआ है यानी पृथ्वी पहले की तुलना में थोड़ी पिचक गई है। इसकी वजह से घूर्णन की गति धीमी पड़ी है।
यानी कुछ कारणों से पृथ्वी की घूर्णन गति बढ़ रही है जबकि बर्फ के पिघलकर बहने से घूर्णन गति कम हो रही है। हम देख ही चुके हैं कि घूर्णन गति कम हो तो पृथ्वी का प्राकृतिक दिन लंबा (longer day due to rotation change) हो जाता है। इसलिए यूटीसी में हमें लीप सेकंड जोड़कर तालमेल बनाना पड़ता है। लेकिन यदि नेट गति उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ती जितनी अपेक्षा है तो लीप सेकंड की ज़रूरत देर से पड़ेगी।
एग्न्यू के मुताबिक यदि बर्फ पिघलने का असर न हो तो ऋणात्मक लीप सेकंड वर्तमान अपेक्षा से काफी पहले ज़रूरी हो जाएगा (negative leap second event)। मानवीय गतिविधियां जलवायु परिवर्तन को गहराई से प्रभावित करती हैं। लीप सेकंड का टलना ऐसा ही एक प्रभाव है। वैसे समय मापन से सम्बंधित लोगों के लिए तो यह अच्छी खबर होगी क्योंकि हर थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद जोड़े गए लीप सेकंड कंप्यूटिंग में काफी दिक्कतें पैदा करते हैं। और यदि लीप सेकंड घटाना पड़ा तो समस्या और विकट होगी क्योंकि वर्तमान कंप्यूटर कोड्स में इसे संभालने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।
फ्रैंकफर्ट (जर्मनी) स्थित इंटरनेशनल अर्थ रोटेशन एंड रेफरेंस सिस्टम्स सर्विस (Earth Rotation Monitoring) के क्रिश्चियन बिज़ुआर्ड का कहना है कि भविष्य में पृथ्वी के घूर्णन के सारे कयास आंतरिक कोर के व्यवहार पर निर्भर हैं और इसे समझना आसान नहीं है। सारी अनिश्चितता के बावजूद, एग्न्यू को लगता है कि जलवायु परिवर्तन (global warming impact on time) की वजह से पिघलते बर्फ का जैसा असर समय मापन पर हो रहा है, वह शायद लोगों को नींद से जगाकर जलवायु परिवर्तन के बारे में कुछ करने को उकसाएगा, और वैसा हुआ तो सबका भला होगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.nature.com/w1248/magazine-assets/d41586-024-00932-w/d41586-024-00932-w_26909758.jpg?as=webp