सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स: एक शानदार मॉडल जीव

डॉ. किशोर पंवार, डॉ. सुशील जोशी

ब वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार (nobel prize) मिलता है, तो वे अमूमन अपने परिवार, सहकर्मियों, अपने विश्वविद्यालय या शोध का वित्तपोषण करने वालों का शुक्रिया अदा करते हैं। लेकिन जब विक्टर एम्ब्रोस (Victor Ambros) और गैरी रुवकुन (Gary Ruvkun) को वर्ष 2024 के कार्यिकी या चिकित्सा विज्ञान नोबेल सम्मान से नवाज़ा गया, तो रुवकुन ने चंद मिनट अपने प्रयोग के जंतु को दिए। वह जंतु है एक नन्हा-सा कृमि सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स  (Caenorhabditis elegans)। इस जंतु को उन्होंने ‘बडास’ की संज्ञा दी, अमरीकी बोलचाल में जिसका मोटे तौर पर मतलब होगा सख्तजान। यह मॉडल जीवों के इतिहास में एक मील का पत्थर था। वैसे इस जंतु पर शोध कार्य के फलस्वरूप 4 नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं। और रुवकुन ने ही नहीं, हर वैज्ञानिक ने अपने नोबेल व्याख्यान में इस नन्हे कृमि का शुक्रिया अदा किया है। जैसे 2002 में सिडनी ब्रेनर, जॉन सल्स्टन और रॉबर्ट होर्विट्ज़ को अंगों के विकास तथा पूर्व-निर्धारित कोशिका मृत्यु यानी एपोप्टोसिस सम्बंधी खोजों के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था। अपने नोबेल व्याख्यान में सिडनी ब्रेनर ने कहा था, “इसमें कोई संदेह नहीं कि इस वर्ष के नोबेल पुरस्कार का चौथा विजेता सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स है।”

वेब ऑफ साइन्स (Web of Science) डैटा के अनुसार 1980 से 2023 के बीच सी. एलेगेन्स से सम्बंधित 24,496 पर्चे प्रकाशित हुए। इनमें से यदि समीक्षा पर्चों को हटा दिया जाए, तो भी यह संख्या 20,322 होती है।

कैसा है यह कृमि

यह गोलकृमि (roundworm) मिट्टी में रहने वाला एक सरल जंतु है जो सड़े-गले कार्बनिक पदार्थ युक्त ज़मीन में पाया जाता है। ऐसी मिट्टी में पाए जाने वाले बैक्टीरिया ही इसका भोजन हैं। यह एक पारदर्शी जीव (transparent organism) है और यही इसकी एक खासियत है जो इसे एक मॉडल जीव बनाती है। 1900 में एमील मौपस ने इस प्रजाति को खोजा था और नाम रखा था रैबडायटिस एलेगेन्स। 1955 में एल्सवर्थ डोगर्टी ने इसे जीनस अर्थात वंश का दर्जा दिया और यह सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स (सी. एलेगेन्स) हो गया।

मात्र 1 मिलीमीटर लंबाई वाले इस कृमि के दो लैंगिक रूप होते हैं – उभयलिंगी और नर। उभयलिंगी के शरीर में कुल जमा 959 कायिक कोशिकाएं होती हैं जबकि नर में 1031 होती हैं। तुलना के लिए देखें कि मनुष्यों में अरबों कोशिकाएं होती हैं। इसका जीवन चक्र (life cycle) मात्र तीन दिन का है – यानी 3 दिन बाद एक नया कृमि पैदा हो जाता है। इसके शरीर में न तो हृदय होता है, न रक्त परिसंचरण तंत्र, और न ही श्वसन तंत्र। शरीर कुल मिलाकर एक मुंह, ग्रसनी (pharynx), और जननांगों से मिलकर बना होता है। ऊपर से पारदर्शी क्यूटिकल का आवरण होता है। इसे प्रयोगशाला में पनपाना-पालना आसान है। यही सरलता इसे जीव विज्ञान का एक बहुमूल्य मॉडल बनाती है।

हालांकि कृमि और मनुष्य कई प्रकार से अलग हैं, फिर भी दोनों प्रजातियों के जीन्स और आणविक मार्गों में काफी समानताएं हैं। यदि आप यह पता लगा लें कि कोई कोशिकीय क्रियाविधि कृमि के विकास के दौरान कैसे काम करती है तो 95 प्रतिशत मामलों में यह इंसानों में भी बिल्कुल उसी तरह काम करेगी। इसका मतलब है कि कृमि पर किए गए वैज्ञानिक अध्ययन से प्राप्त जानकारी, मनुष्यों में बीमारियों और विकास के बारे में समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

चूंकि यह कृमि पारदर्शी है, इसलिए इसमें नाभिकीय प्रवास (nuclear migration) सूक्ष्मदर्शी से जीवित जीव में ही देखा जा सकता है। भ्रूणावस्था में इसकी कोशिकाओं के तेज़ विकास तथा एक-एक कोशिका के अलग-अलग आसान अवलोकन की बदौलत प्रत्येक कोशिका की नियति का मार्ग देखा जा सकता है – इसे कोशिका नियति मानचित्र (cell fate map) कहा जाता है।

सी. एलेगेन्स का सर्वप्रथम अध्ययन तो विक्टर नाइगॉन और एल्सवर्थ डोगर्टी की प्रयोगशाला में 1940 के दशक में किया गया था लेकिन इसे एक मॉडल जंतु का दर्जा दिलवाने का काम 1963 में सिडनी ब्रेनर ने किया था जब उन्होंने इसे परिवर्धन के जीव विज्ञान और जेनेटिक्स के अध्ययन हेतु एक मॉडल के रूप में प्रस्तावित किया। 1974 में ब्रेनर ने जेनेटिक छंटनी के प्रारंभिक परिणाम प्रकाशित किए थे। उन्होंने शरीर रचना व कामकाज की दृष्टि से अलग-अलग सैकड़ों उत्परिवर्तित जंतुओं को पृथक किया था। 1980 के दशक में जॉन सल्स्टन तथा उनके सहकर्मियों ने वयस्क उभयलिंगी की समस्त 959 कायिक कोशिकाओं की कोशिका वंशावली का पूर्ण मानचित्रण किया। इसका अर्थ यह है कि इनमें से प्रत्येक कोशिका का, निषेचित अंडे से लेकर वयस्क तक का, संपूर्ण विकासात्मक इतिहास पता लगाया गया। इसी के साथ पहले-पहले जीन्स का क्लोनिंग किया गया और अंतत: 1998 में यह पहला बहुकोशिकीय जीव बना जिसके पूरे जीनोम का अनुक्रमण (genome sequencing) कर लिया गया था।

प्रारंभिक अनुसंधान

सी. एलेगेन्स का प्रथम विवरण 1900 में एमील मौपस द्वारा दिया गया था। उन्होंने इसे अल्जीरिया में मिट्टी में से हासिल किया था। बहरहाल, शुरुआती शोध कार्य तो इस बात पर केंद्रित रहा था कि इस कृमि का शुद्ध कल्चर (pure culture) तैयार कर लिया जाए, यानी जिसमें किसी अन्य प्रजाति की मिलावट न हो।

ट्रांसजेनेसिस (जीन हस्तांतरण)

ट्रांसजेनेसिस (transgenesis) किसी जीव के जीनोम में पराई आनुवंशिक सामग्री (एक ट्रांसजीन) को शामिल करने की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप एक ट्रांसजेनिक जीव (transgenic organism) उत्पन्न होता है जो नए जीन को अभिव्यक्त करता है तथा एक संशोधित गुण या विशेषता प्रदर्शित करता है। यह किसी जीन की भूमिका को समझने का एक अच्छा तरीका हो सकता है।

सी. एलेगेन्स इस प्रक्रिया के लिए सर्वथा अनुकूल है। ट्रांसजेनिक कृमि तैयार करने का सबसे आम तरीका तो यह है कि बाहरी डीएनए को कृमि की एक सिंसिशियल जर्म लाइन में डाला जाए। सिंसिशियल जर्म लाइन वह होती है जिसमें जर्म कोशिकाएं (कोशिकाएं जो युग्मकों में विकसित हो सकती हैं) एक ही कोशिका द्रव्य साझा करती हैं, जिससे एक बहुकेंद्रकीय कोशिका बनती है। यह व्यवस्था विशेष रूप से युग्मक निर्माण की प्रक्रिया के दौरान देखी जाती है। दूसरा तरीका बायोलिस्टिक ट्रांसफॉर्मेशन (biolistic transformation) यानी मनचाहे डीएनए को सीधे लक्षित कोशिका में पहुंचाने का है।

सी. एलेगेन्स में इस प्रक्रिया का उपयोग करके कई महत्वपूर्ण समझ हासिल हुई हैं।

कोशिका व जंतु की मृत्यु

कोशिकाओं की मृत्यु बहुकोशिकीय जंतु विकास का एक अहम व सामान्य हिस्सा है। ऊतकों को तराशना, अंगों की संरचना का निर्माण, अंगों की साइज़ का नियंत्रण वगैरह स्वाभाविक कोशिका मृत्यु (एपोप्टोसिस – apoptosis) से तय होते हैं। जब स्वाभाविक कोशिका मृत्यु की प्रक्रिया गड़बड़ हो जाए, तो कई चीज़ें गड़बड़ा जाती है। मनुष्यों में कई बीमारियों में कोशिका मृत्यु सम्बंधी गड़बड़ियां शामिल होती हैं। इस दृष्टि से कोशिका मृत्यु (पूर्व निर्धारित या असमय) को समझना अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण विषय है।

सी. एलेगेन्स उन कोशिकीय व आणविक प्रक्रियाओं (molecular mechanisms) का खुलासा करने में प्रमुख रहा है जो क्रमादेशित कोशिका मृत्यु (एपोप्टोसिस) का नियंत्रण करती हैं। हालांकि यह परिकल्पना तो बहुत पहले प्रस्तुत हो चुकी थी कि एपोप्टोसिस एक सुनियंत्रित प्रक्रिया है लेकिन कोशिका मृत्यु को नियंत्रित करने वाले कारकों का अध्ययन सर्वप्रथम सी. एलेगेन्स में ही किया गया था (2003)।

सबसे महत्वपूर्ण अवलोकन यह था कि एक ही उम्र के कृमियों में कोशिकाओं की संख्या और स्थान लगभग एक जैसे रहते हैं। अर्थात इस जंतु में कोशिकाओं के वंश लगभग अपरिवर्तित रहते हैं। इस प्रस्ताव में महत्वपूर्ण भूमिका इस बात की थी कि सी. एलेगेन्स की त्वचा का आवरण (क्यूटिकल) पारदर्शी होने की वजह से इसमें कोशिका विभाजन की प्रक्रिया का अध्ययन आसान है। इन प्रयासों की मदद से यह स्पष्ट हुआ कि सी. एलेगेन्स का उभयलिंगी व नर वयस्क तैयार होने के लिए सटीकता से 1090 और 1178 कायिक कोशिकाएं बन जाना ज़रूरी है। सी. एलेगेन्स के व्यवस्थित अध्ययन से एपोप्टोसिस, मृत कोशिका के मलबे को हटाने वगैरह की जटिल क्रियाविधि स्पष्ट हो पाई है। लेकिन हमने ऊपर देखा था कि वयस्क उभयलिंगी में मात्र 959 कोशिकाएं होती हैं। यहीं से एपोप्टोसिस का भान हुआ – एपोप्टोसिस के कारण 131 कोशिकाएं मृत हो जाती हैं, तो बची रहती हैं 959 (1090-131)। यह भी पता चला कि नर में एपोप्टोसिस में 147 कोशिकाएं मारी जाती हैं (1178-147=1031)। इस प्रक्रिया के विभिन्न लक्षण सी. एलेगेन्स में पहचाने गए और इनमें से कई लक्षण स्तनधारी कोशिकाओं में बने रहे हैं।

लेकिन कोशिका मृत्यु से अलग तंत्रगत ध्वंस वह प्रक्रिया है जो जंतु की मृत्यु का कारण बनती है। इस तरह की मृत्यु के कारक भी पहचाने गए हैं और यह भी देखा जा चुका है कि इन कारकों को बाधित करने से क्षय-जन्य मृत्यु को टाला जा सकता है।

प्रत्येक कोशिका के सटीक विकास मार्ग (कोशिका वंशावली) की जानकारी में से जो सबसे महत्वपूर्ण समझ हासिल हुई, उसका सम्बंध एपोप्टोसिस से है। कोशिकाओं की मृत्यु का अवलोकन तो कई जीवों में किया जा चुका था लेकिन सी. एलेगेन्स की कोशिका वंशावली ने दर्शाया कि एपोप्टोसिस विशिष्ट कोशिकाओं में, विशिष्ट समय पर होता है और यह एक विशिष्ट जैव-रासायनिक प्रक्रिया से संपन्न होता है जो सख्त जेनेटिक नियंत्रण में होती है। और तो और, यह भी स्पष्ट हुआ कि एपोप्टोसिस के लिए ज़िम्मेदार जीन्स जैव-विकास के दौरान जंतुओं में संरक्षित रहे हैं। और एपोप्टोसिस क्रियापथ में गड़बड़ी इंसानों में कई रोगों का कारण बनती है – जैसे, कैंसर, आत्म-प्रतिरक्षा रोग (autoimmune disease) और तंत्रिका-विघटन से सम्बंधित रोग। एपोप्टोसिस क्रिया पथ को कई बार कीमोथेरपी या रेडिएशन के द्वारा सक्रिय किया जाता है। कोशिका वंशावली और एपोप्टोसिस और सी. एलेगेन्स को जेनेटिक विश्लेषण के लिए एक मॉडल जीव के रूप में विकसित करने के शोध कार्य के लिए सिडनी ब्रेनर, जॉन सल्स्टन और एच. रॉबर्ट होविट्ज़ को 2002 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

कोशिकाओं में संकेत लेनदेन

सिग्नल ट्रांसडक्शन (signal transduction) वह प्रक्रिया है जिसके ज़रिए कोई भी कोशिका बाह्य संकेत प्राप्त करती है, उसे प्रोसेस करती है और उस पर प्रतिक्रिया देती है। जंतुओं में लगभग सारे सिग्नल ट्रांसडक्शन मार्गों की खोज सी. एलेगेन्स (भ्रूण या उससे आगे की अवस्थाओं) के विभिन्न उत्परिवर्तियों पर अध्ययन के ज़रिए हुई है। मनुष्यों में अधिकांश कैंसर (cancer biology) में पाया गया है कि किसी न किसी सिग्नल ट्रांसडक्शन क्रियापथ में गड़बड़ी होती है। लिहाज़ा, इनकी समझ ने कैंसर जीव विज्ञान में भी काफी योगदान दिया है। हाल में, सी. एलेगेन्स में तंत्रिका संकेतों तथा इंसुलिन संकेतन के मार्गों का भी खुलासा हुआ है, जिसके चलते यह इस तरह के अध्ययनों के लिए आकर्षक मॉडल बन गया है।

बुढ़ाना

अंडा देने के बाद प्रयोगशाला की परिस्थितियों में कृमि का जीवनकाल (lifespan) करीब 14 से 21 दिन का होता है। ऐसे उत्परिवर्तित जंतु खोजे गए हैं जिनका जीवनकाल 50 से 100 प्रतिशत अधिक होता है। साथ ही कृमियों में जीवनकाल को बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार कई जीन्स भी पहचाने गए हैं। इनमें से अधिकांश जीन्स विभिन्न जंतुओं में संरक्षित रहे हैं और कुछ जंतुओं के बढ़े हुए जीवनकाल से सम्बंधित भी हैं। मनुष्यों में बुढ़ाना (aging process) एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें लगभग सारे अंग-तंत्र प्रभावित होते हैं। इसलिए शुरू-शुरू में यह एक आश्चर्यजनक खोज थी कि विविध जंतुओं में बुढ़ाने की जैविक प्रक्रिया काफी एक समान है जबकि उनके जीवन काल में काफी अंतर होते हैं।

सी. एलेगेन्स बुढ़ाने की प्रक्रिया को समझने में एक महत्वपूर्ण मॉडल जीव रहा है। उदाहरण के लिए, देखा गया है कि इंसुलिन-नुमा वृद्धि कारक (आईजीएफ- IGF signaling) को बाधित कर दिया जाए तो वयस्क का जीवन तीन गुना तक बढ़ जाता है। दूसरी ओर, यदि ग्लूकोज़ खिलाया जाए तो उम्र आधी रह जाती है (जो ऑक्सीकारक तनाव की वजह से होता है)। इसी प्रकार से, यदि अधेड़ावस्था (कृमि की अधेड़ावस्था) में इंसुलिन/आईजीएफ का विघटन करवा दिया जाए तो जीवन में काफी वृद्धि हो जाती है। यह भी देखा गया है कि कृमि के लंबी उम्र वाले उत्परिवर्तित संस्करण ऑक्सीकारक तनाव (oxidative stress) और पराबैंगनी प्रकाश का प्रतिरोध दर्शाते हैं। ऐसे उत्परिवर्तियों में डीएनए की मरम्मत करने की क्षमता भी ज़्यादा थी। अर्थात डीएनए मरम्मत की क्षमता का सम्बंध लंबी उम्र से है जो उम्र के साथ कम होती जाती है।

एक मान्यता यह रही है कि डीएनए की ऑक्सीकारक क्षति बुढ़ाने की वजह होती है। सी. एलेगेन्स के अध्ययन से पता चला है कि सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज़ दिया जाए तो वह क्रियाशील ऑक्सीजन मूलकों को कम करता है और बुढ़ाने की प्रक्रिया को धीमा करता है।

यह देखा गया कि सी. एलेगेन्स को लीथियम क्लोराइड का उपचार देने पर भी उसकी जीवन अवधि बढ़ती है।

सी. एलेगेन्स के अध्ययन का एक विषय टीलोमेयर पर केंद्रित रहा है। टीलोमेयर (telomere) सूणसूत्रों के सिरों पर डीएनए की दोहराई जानी वाली शृंखला होती है। यह गुणसूत्र को क्षति से बचाती है और हर कोशिका विभाजन के बाद छोटी होती जाती है। इसकी लंबाई एक हद से कम हो जाने के बाद वह कोशिका आगे विभाजन नहीं कर पाती और झड़ जाती है।

लेकिन सी. एलेगेन्स के अध्ययन में एक विचित्र बात पता चली। ड्रॉसोफिला मेलानोगैस्टर जैसे कई जंतुओं में टीलोमेयर की लंबाई को बनाए रखने की विधि में रिट्रोट्रांसपोज़ॉन्स की भूमिका देखी गई है। रिट्रोट्रांसपोज़ॉन्स डीएनए के ऐसे खंड होते हैं जो एक जगह से दूसरी जगह फुदकते रहते हैं। लेकिन सी. एलेगेन्स में टीलोमेयर की सुरक्षा के लिए सामान्य तरीके के अलावा एक अलग तरीके का उपयोग देखा गया है, जिसे वैकल्पिक टीलोमेयर लेंदेनिंग (ALT) कहते हैं। सी. एलेगेन्स वह पहला यूकेरियोट जीव था जिसने सामान्य टीलोमेयर प्रक्रिया को ठप किए जाने के बाद ALT हासिल कर ली। इसी तरह ALT कई कैंसर में देखी गई है  जो कई परिस्थितियों में अपना टीलोमेयर लंबा करती रहती हैं। ऐसे कैंसर ज़्यादा घातक (aggressive cancer) साबित होते हैं। लिहाज़ा सी. एलेगेन्स ALT अध्ययन के लिए एक अहम मॉडल है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/c/cc/Adult_Caenorhabditis_elegans.jpg

सीनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स: एक शानदार मॉडल जीव

भाग – 2

डॉ. किशोर पंवार, डॉ. सुशील जोशी

लेख के पहले भाग में हमने जीव वैज्ञानिक शोध में मॉडल जीव सी. एलेगेन्स (C. elegans) के योगदान के कुछ पहलू देखे। दूसरे भाग में चर्चा कुछ और पहलुओं पर…

नींद

सी. एलेगेन्स संभवत: सबसे सरल (आदिम) जंतु है जिसमें नींद जैसी अवस्था (sleep-like state) देखी गई है। यह जंतु हर निर्मोचन (moulting) से पहले एक सुस्त हालत में जाता है। यह भी दर्शाया गया है कि सी. एलेगेन्स शारीरिक तनाव, गर्मी के आघात, पराबैंगनी विकिरण और बैक्टीरिया-जनित टॉक्सिन से संपर्क के बाद भी नींद में चला जाता है।

संवेदनाएं

इस कृमि के पास आंखें तो नहीं होतीं लेकिन यह प्रकाश के प्रति संवेदनशील होता है। इसका कारण एक प्रकाश संवेदी प्रोटीन (LITE-1) की उपस्थिति है और यह प्रकाश संवेदी प्रोटीन जंतुओं में पाए जाने वाले अन्य प्रकाश-संवेदी रंजकों (ऑप्सिन तथा क्रिप्टोक्रोम) की तुलना में 10-100 गुना अधिक कुशलता से प्रकाश अवशोषित करता है।

सी. एलेगेन्स त्वरण को सहन करने में भी असाधारण है – यह 4,00,000 गुरुत्व के सेंट्रीफ्यूज (hypergravity) (40,000 घूर्णन प्रति मिनट) में रखकर घुमाने पर भी अप्रभावित रहता है।

सी. एलेगेन्स के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि भ्रूणावस्था के उपरांत कोशिकाओं का प्रवास बहुत कम होता है और जो प्रवास होता है वह पूर्वानुमान के योग्य (predictable cell migration) होता है। परिणाम यह होता है कि विभिन्न अलग-अलग कृमियों में कोई विशिष्ट कोशिका उसी स्थान पर पाई जाएगी और उन्हीं कोशिकाओं के साथ सीधे संपर्क में रहेगी।

यह तंत्रिका तंत्र का एक महत्वपूर्ण लक्षण है। किसी वयस्क उभयलिंगी कृमि में 302 तंत्रिका कोशिकाएं (neurons) होती हैं और साथ में 56 ग्लियल कोशिकाएं (glial cells)। विभिन्न तकनीकों की मदद से सी. एलेगेन्स के पूरे तंत्रिका तंत्र का मानचित्रण किया जा चुका है। देखा गया है कि शरीर की भित्ती में मोटर (यानी काम को अंजाम देने वाली) तंत्रिकाएं होती हैं। मुंह पर रसायन-संवेदी तंत्रिकाएं पाई जाती हैं। स्पर्श, प्रकाश, तापमान, नमक व अन्य संवेदनाओं के लिए अलग-अलग तंत्रिकाएं होती हैं। सभी संवेदी तंत्रिकाओं का जुड़ाव मोटर तंत्रिकाओं से होता है।

कुल मिलाकर सोचा गया था कि यह कृमि एक चलती-फिरती नलिका भर है जो मात्र बुनियादी क्रियाओं को पूरा करती होगी – भोजन-ग्रहण, अंडे देना और चलना-फिरना। लेकिन आगे अनुसंधान ने कृमि के व्यवहार (behavioral biology) के कई आयाम उजागर किए। इस संदर्भ में नोबेल विजेता मार्टिन चाफी का काम उल्लेखनीय है। कुछ जंतु एक ग्रीन फ्लोरेसेंट प्रोटीन (GFP – green fluorescent protein) का निर्माण करते हैं जो एक हरी रोशनी उत्सर्जित करता है। इसके निर्माण के लिए ज़िम्मेदार जीन को अन्य जीवों के जीनोम में जोड़ा जा सकता है। अब GFP जैविक प्रक्रियाओं के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण औज़ार बन गया है। मार्टिन चाफी ने सी. एलेगेन्स के जीनोम में इस जीन को जोड़ दिया और इस तरह से वे 6 अलग-अलग कोशिकाओं को रंगीन बनाने में सफल रहे। रंगीन हो जाने के कारण इन कोशिकाओं का निरंतर अध्ययन किया जा सकता था। इसकी मदद से वे तंत्रिका कोशिकाओं के विकास का अध्ययन कर पाए थे। इसके अलावा, उनके अनुसंधान ने GFP के सामान्य उपयोग का मार्ग प्रशस्त किया। आजकल सी. एलेगेन्स के तंत्रिका तंत्र को मानव तंत्रिका रोगों (neurological disorders) तथा अन्य विकारों के मॉडल के रूप में उपयोग किया जाने लगा है। इसी के साथ सी. एलेगेन्स की ग्लियल कोशिकाओं के कार्य और कार्यिकी का अध्ययन भी इस दृष्टि से किया जा रहा है तथा तंत्रिकाओं और अन्य कोशिकाओं के बीच सम्बंधों की भी पड़ताल जारी है।

सूक्ष्म तथा हस्तक्षेपी आरएनए

सी. एलेगेन्स के जीवन चक्र में चार एकदम अलग-अलग लार्वा अवस्थाएं होती हैं। हर लार्वा अवस्था तथा वयस्क में बनने वाली क्यूटिकल की संरचना अलग-अलग होती हैं जिसके आधार पर इन्हें पहचाना जा सकता है। कई अलग-अलग ऐसे उत्परिवर्तित (developmental mutants) कृमि तैयार किए गए हैं जो विकास की इन अवस्थाओं के लिहाज़ से थोड़े अलग-अलग होते हैं। जैसे किसी में कोई विकास अवस्था छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं तो किसी में एक ही अवस्था बार-बार दोहराई जाती है। इनके अध्ययन से कुछ महत्वपूर्ण परिणाम प्राप्त हुए हैं।

उदाहरण के लिए lin-4 नामक जीन में उत्परिवर्तन वाले कृमियों में प्रथम लार्वा अवस्था दोहराई गई जिससे पता चला कि lin-4 द्वारा बनाया गया प्रोटीन प्रथम लार्वा अवस्था से निकलकर द्वितीय लार्वा अवस्था में प्रवेश के लिए ज़रूरी है। दूसरी ओर, lin-14 जीन में उत्परिवर्तन का असर उल्टा हुआ – ऐसे कृमियों में प्रथम लार्वा अवस्था आई ही नहीं, सीधे द्वितीय लार्वा अवस्था आ गई। इससे तो लगता है कि प्रथम लार्वा अवस्था होने के लिए lin-14 द्वारा बनाया जाने वाला प्रोटीन ज़रूरी है। लेकिन… एक बड़ा लेकिन इंतज़ार कर रहा था।

जब इन दोनों जीन्स को क्लोन किया गया तो पता चला कि lin-4 जीन किसी प्रोटीन का कोड करने लायक ही नहीं था। दूसरी ओर lin-14 प्रोटीन का कोड था। दरअसल, lin-4 जीन एक सूक्ष्म आरएनए का कोड पाया गया – शुरू में यह सूक्ष्म आरएनए 70 न्यूक्लियोटाइड लंबा था और अंत में 22 न्यूक्लियोटाइड का रह गया। विश्लेषण से पता चला कि lin-4 द्वारा बनाए गए आरएनए में lin-14 द्वारा बनाए गए मेसेंजर आरएनए के उन हिस्सों के पूरक थे जो अनूदित नहीं किए जाते (यानी ये किसी प्रोटीन का निर्माण नहीं करते)। इस खोज से यह समझ उभरी कि शायद lin-4 एक माइक्रो-आरएनए (microRNA) बनाता है जो lin-14 के प्रतिलेखन को रोक देता है। lin-4 वह पहला जीन था जिसे एक माइक्रो-आरएनए बनाते देखा गया था। आगे चलकर इसी तरह के अन्य माइक्रो-आरएनए पहचाने गए जो किसी जीन के काम को ठप कर देते हैं। मनुष्य के जीनोम में लगभग 1800 ऐसे माइक्रो-आरएनए जीन्स पहचाने जा चुके हैं।

माइक्रो-आरएनए की खोज के साथ आरएनए-हस्तक्षेप (RNAi) को सी. एलेगेन्स में जीन अभिव्यक्ति को रोकने के लिए उपयोग किया गया। वैसे तो RNAi द्वारा जीन की अभिव्यक्ति को रोकने की प्रक्रिया पेटुनिया में देखी गई थी लेकिन इसकी क्रियाविधि को समझकर इसका उपयोग करने की बात सी. एलेगेन्स में ही हुई। एण्ड्र्यू फायर और क्रैग मेलो ने देखा कि सी. एलेगेन्स में डबल-स्ट्रैंडेड आरएनए (डीएसआरएनए) को इंजेक्ट करने से सम्बंधित मैसेंजर आरएनए (एमआरएनए) को नष्ट करके विशिष्ट जीन को शांत किया जा सकता है, जिससे प्रोटीन उत्पादन का दमन हो सकता है। 1998 में की गई इस खोज ने जीन नियमन की हमारी समझ में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया और इसके लिए उन्हें 2006 में नोबेल से नवाज़ा गया था।

बीमारियों की तहकीकात

शुरुआत में तो माना गया था कि मानव रोगों के अनुसंधान में इस कृमि की भूमिका सीमित ही है। लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि मानव जीन्स और जीन्स के विविध संस्करणों को सी. एलेगेन्स के जीनोम में जोड़कर अभिव्यक्त करवाया जा सकता है तो नए आयाम खुल गए। उदाहरण के लिए, kindlin-1 जीन को देखते हैं। सी. एलेगेन्स में इसके समजातीय जीन से जो प्रोटीन बनता है वह इन्टेग्रिन (integrin signaling) से अंतर्क्रिया करता है। इस खोज के बाद मनुष्यों में इसी प्रकार की रोग प्रक्रिया की खोज की गई। इंटेग्रिन कोशिका संवाद में अहम भूमिका निभाते हैं और इनमें गड़बड़ी कई रोगों का कारण बन सकती है।

इसी प्रकार से मनुष्यों में एक जीन होता है presenilin-1 जिसे अल्ज़ाइमर रोग (Alzheimer’s disease) से जुड़ा माना जाता है। जब इसे सी. एलेगेन्स में अभिव्यक्त करवाया गया तो पता चला कि इसकी वजह से तापमान संवेदी गति में बाधा आई।

हाल ही में शोधकर्ता ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम दिक्कत (autism spectrum disorder) को समझने के लिए सी. एलेगेन्स में समजातीय जीन्स पहचानने का प्रयास कर रहे हैं। सी. एलेगेन्स के तंत्रिका तंत्र (neural circuits) को भलीभांति समझा जा चुका है। इसके अलावा इस कृमि में ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से जुड़े कई समजातीय जीन्स भी हैं। हालाकि कृमि में ऑटिज़्म संपूर्ण रूप में तो प्रकट नहीं होता लेकिन कई खोजबीन इसकी मदद से संभव हैं। एक तो किसी जेनेटिक उत्परिवर्तन का असर इसकी तंत्रिकाओं के कामकाज और कृमि के व्यवहार पर देखा जा सकता है। इस तरह के अध्ययनों से ऑटिज़्म के मूल में उपस्थित क्रियाविधियों को समझने में मदद मिलती है।

उदाहरण के लिए शोधकर्ताओं ने सायनेप्स (तंत्रिकाओं के बीच जुड़ाव) निर्माण व कामकाज के लिए ज़रूरी जीन्स का अध्ययन करके यह समझने की कोशिश की है कि उनका ऑटिज़्म-सम्बंधी व्यवहार की असामान्यताओं से क्या सम्बंध है। वैसे तो सी. एलेगेन्स एक सरल जीव है लेकिन यह सामाजिक व्यवहार का प्रदर्शन करता है – जैसे भोजन के कारण झुंड बनाना। शोधकर्ता जेनेटिक उत्परिवर्तन और कृमि के इस व्यवहार में परिवर्तन के सम्बंध का अध्ययन करते हैं। चूंकि इस कृमि में ट्रांसजेनेसिस आसान है, इसलिए इस तरह के कई अध्ययन किए जा रहे हैं। 

औषधि अनुसंधान

छोटा जीनोम और छोटे जीवन चक्र की वजह से यह बहुकोशिकीय जीव जंतुओं में औषधियों और विषों की तेज़ी से छंटनी (drug screening) करने का उम्दा मॉडल है। सी. एलेगेन्स में मानव रोगों के समजातीय जीन देखे जाते हैं। इसलिए यह वर्तमान में स्वीकृत दवाइयों के नए उपयोग (drug repurposing) खोजने में मदद कर सकता है।

अंतरिक्ष में उड़ान

सी. एलेगेन्स तब सुर्खियों में आया था जब 2003 में कोलंबिया स्पेस शटल हादसे के बाद भी यह जीवित मिला था। बाद में 2009 में घोषणा हुई थी कि सी. एलेगेन्स अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (space station) पर दो सप्ताह बिता रहा था। इसे वहां भेजा गया था ताकि शून्य गुरुत्वाकर्षण (microgravity) का असर मांसपेशियों के विकास और अन्य शरीर क्रियाओं पर परखा जा सके। इस अनुसंधान का सम्बंध प्रमुख रूप से अंतरिक्ष उड़ान, बिस्तर पर पड़े रहने, बुढ़ापे और मधुमेह के कारण मांसपेशीय विकारों को समझना था। कोलंबिया शटल के मुसाफिर कृमियों के वंशजों को बाद में एंडेवर यान में भेजा गया था। ऐसे कई अंतरिक्ष प्रयोगों का निष्कर्ष था कि मांसपेशियों और हड्डियों के जुड़ावों को प्रभावित करने वाले जीन्स अंतरिक्ष में कम अभिव्यक्त होते हैं। अलबत्ता, यह पता नहीं चल पाया है कि इसका मांसपेशियों की ताकत पर क्या असर होता है। 

जेनेटिक्स

सी. एलेगेन्स के जीनोम में करीब 20,470 ऐसे जीन्स होते हैं जो किसी न किसी प्रोटीन का कोड (protein-coding genes) हैं। इनमें से 35 प्रतिशत जीन्स मानव होमोलॉग्स (human homologs) (समजातीय) हैं। समजातीय जीन विभिन्न प्रजातियों में पाए जाने वाले ऐसे जीन होते हैं जो एक सामान्य पूर्वज जीन से विकसित होते हैं। उनके डीएनए अनुक्रम में काफी हद तक समानता होती है और अक्सर उनके कार्य भी सम्बंधित होते हैं। और यह कई बार दर्शाया जा चुका है कि यदि मानव जीन्स को सी. एलेगेन्स में डाला जाए तो वे अपने समजातीय जीन्स का स्थान ले लेते हैं। इसके विपरीत सी. एलेगेन्स के कई जीन्स स्तनधारी जीन्स के समान कार्य कर सकते हैं।

उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि गोल कृमि सी. एलेगेन्स ने जीव विज्ञान की कई गुत्थियों को सुलझाने में मदद की है और पिक्चर अभी बाकी है। लेकिन एक बात पर कुछ कहना मुनासिब है। वह है सी. एलेगेन्स को तमाम जीव वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के लिए एक मॉडल बनाने के प्रयास।

सिडनी ब्रेनर से शुरू करके सी. एलेगेन्स पर काम करने वाले शोधकर्ताओं का एक समुदाय विकसित होता गया, जो स्वयं को कृमि-जन (worm-people) कहते हैं। इस समुदाय की एक विशेषता इसका सहयोगी रवैया और खुलापन रहा है। अपनी खोज को एक-दूसरे से साझा करना, नए शोधकर्ताओं को हर तरह से मदद करना (चाहे सामग्री उपलब्ध करवाकर या कामकाज में मदद देकर), समय-समय पर मिलकर विचार-विमर्श करना इस समुदाय के व्यवहार में शुमार रहा है।

1975 से ही यह समूह एक छमाही वर्म ब्रीडर्स गज़ट (Worm Breeders’ Gazette) प्रकाशित करता आ रहा है। सी. एलेगेन्स शोध समुदाय हर दो साल में अंतर्राष्ट्रीय कृमि सम्मेलन (International Worm Meeting) आयोजित करता है जहां शोध पत्रों वगैरह के अलावा कृमि सम्बंधी प्रहसन, नृत्य वगैरह प्रस्तुत किए जाते हैं।

एक वर्मबुक प्रकाशित की जाती है जिसमें वर्तमान शोध के विवरण, शोध सम्बंधी सामग्री की उपलब्धता तथा प्रोटोकॉल वगैरह शामिल होते हैं।

अर्थात यह गोलकृमि अनुसंधान की जो संभावनाएं प्रस्तुत करता है, उनको साकार रूप देने में एक कृमि समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

नर ऑक्टोपस में संभोग के लिए विशेष भुजा

क्टोपस आठ भुजाओं वाला विचित्र जंतु है। मज़ेदार बात यह है कि नर अपने शुक्राणुओं को मादा के शरीर में पहुंचाने के लिए इन्हीं में से एक भुजा का उपयोग करते हैं। हेक्टोस्टायलस (hectocotylus) नामक इस भुजा में इस काम के लिए विशेष परिवर्तन हुए हैं। एक नए प्रीप्रिंट शोध पत्र में बताया गया है कि हेक्टोस्टायलस के चम्मचनुमा अग्र भाग पर रसायनग्राही (chemoreceptors) होते हैं, जो प्रमुख मादा हॉरमोन प्रोजेस्टरोन (progesterone hormone) को भांप सकते हैं।

हारवर्ड विश्वविद्यालय (Harvard University) के तंत्रिका जीव वैज्ञानिक पाब्लो विलार ने प्रयोगशाला में एक ऑक्टोपस (Octopus bimaculoides) को संभोग के लिए प्रेरित किया। ये जंतु बंदी अवस्था में काफी आक्रामक हो सकते हैं। इसलिए विलार ने नर व मादा ऑक्टोपस को एक्वेरियम के दो अलग-अलग कक्षों में रखा जिनके बीच एक अपारदर्शी दीवार थी और दीवार में छिद्र थे ताकि वे आपस में एक-दूसरे की भुजाओं को छूकर जान-पहचान कर सकें।

आश्चर्य कि बात थी एक-दूसरे को न देख पाने के बावजूद नर ने अपने हेक्टोस्टायलस को छिद्र के पार ले जाकर मादा से संभोग कर लिया। वैसे तो हेक्टोस्टायलस बाकी सात भुजाओं जैसा होता है लेकिन इसके आधार से लेकर सिरे तक एक खांचा होता है। जब यह अंग मादा के अंडाशय तक जाने वाले किसी मार्ग (डिंबवाहिनी) को पहचान लेता है तो वह ढेर सारे शुक्राणु (sperm transfer) उसमें छोड़ देता है। विलार ने चार जोड़ियों में ऐसा अंधा संभोग देखा।

तो विलार और उनके मार्गदर्शक निक बेलोनो (Nick Bellono) के मन में विचार आया कि क्या हेक्टोस्टायलस रसायनों की मदद से डिंबवाहिनी को भांपता है। बेलोनो और उनके साथी पहले ऑक्टोपस के चूषकों में ऐसे रसायन-ग्राही देख चुके थे। ये ग्राही किसी सतह उपस्थित विभिन्न अणुओं को भांप सकते हैं। सामान्य भुजाओं में ये ग्राही भोजन ढूंढने या हानिकारक सूक्ष्मजीवों को पहचानने में मददगार होते हैं। लेकिन हेक्टोस्टायलस में इन ग्राहियों का काम स्पष्ट नहीं था। अनुमान था कि इनका उपयोग संभोग में होता होगा।

इस विचार को परखने के लिए विलार ने बंदी ऑक्टोपसों के बीच की दीवार के छिद्रों पर छोटे-छोटे पात्रों में अलग-अलग रसायन भर दिए। देखा गया कि नर ऑक्टोपस ने अपने हेक्टोस्टायलस से उस छिद्र को ज़्यादा देर तक टटोला जिसके पात्र में मादा यौन हॉरमोन (female sex hormone)  थे।

पता चला कि हेक्टोस्टायलस पर रासायनिक ग्राहियों की संख्या (chemoreceptor density) अन्य भुजाओं से तीन गुना अधिक थी। यह भी पाया गया कि सामान्यत: सेफेलोपॉड जंतुओं (cephalopods) में हेक्टोस्टायलस में रसायन संवेदना काफी अधिक होती है। ऑक्टोपस की दो अन्य प्रजातियों तथा स्क्विड (squid species) में काटकर अलग किए गए हेक्टोस्टायलस को प्रोजेस्टरोन के संपर्क में रखने पर उसमें काफी हरकत होती रही।

यह सही है कि ऑक्टोपस का दिमाग बड़ा होता है लेकिन उसकी भुजाएं अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से करती हैं। सवाल है कि ऑक्टोपस का तंत्रिका तंत्र (nervous system) डिंबवाहिनी की खोज का नियमन कैसे करता है। एक संभावना है कि हेक्टोस्टायलस की तंत्रिकाएं प्रोजेस्टरोन के संकेत की तीव्रता (hormone signal strength) भांपते हुए आगे बढ़ने के निर्देश देती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कीटनाशकों का उपयोग मछलियों की उम्र घटा रहा है

साइंस पत्रिका (Science journal) में प्रकाशित हालिया शोध पत्र से पता चला है कि फसलों में इस्तेमाल होने वाला क्लोरपायरीफॉस नामक कीटनाशक (chlorpyrifos pesticide) मछलियों की कोशिकाओं को तेज़ी से बूढ़ा बना रहा है। इससे समय से पहले उनकी मृत्यु हो जाती है।

गौरतलब है कि क्लोरपायरीफॉस मनुष्यों, खासकर बच्चों, के तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। इस कारण युरोपियन यूनियन और यूएस के कई राज्यों में यह प्रतिबंधित (European Union ban)  है, जबकि कई देशों में इसका अब भी इस्तेमाल जारी है। आम तौर पर इसका उपयोग सेब, संतरा और गेहूं जैसी फसलों पर किया जाता है। बारिश के बाद यह रसायन बहकर नदियों और झीलों में पहुंच जाता है।

इसके दीर्घावधि असर को समझने के लिए वैज्ञानिक चुनशेंग लियू की टीम ने मीठे पानी की मछली (freshwater fish study) पर अध्ययन किया। चार वर्षों तक उन्होंने चीन के हुबेई प्रांत की तीन बड़ी झीलों से 24 हज़ार से अधिक मछलियां इकट्ठा कीं। इनमें से दो झीलों में सालों से खेती से प्रदूषित पानी आ रहा था, जबकि एक झील अपेक्षाकृत साफ थी।

उन्होंने पाया कि प्रदूषित झीलों में बड़ी और उम्रदराज मछलियां की संख्या काफी कम थी। तीन साल से अधिक उम्र की मछलियों की संख्या लगभग 96 प्रतिशत तक घट चुकी थी। यह भी दिखा कि जिन वर्षों में मछलियों के शरीर में क्लोरपायरीफॉस की मात्रा अधिक थी, उन वर्षों में बूढ़ी मछलियां सबसे कम मिलीं (fish population decline)।

जांच करने पर वैज्ञानिकों को प्रदूषित झीलों की मछलियों की कोशिकाओं में भारी मात्रा में लिपोफुसिन (lipofuscin accumulation) नाम का अपशिष्ट मिला, जो आम तौर पर उम्र बढ़ाने का काम करता है। इससे भी अधिक चिंता की बात टेलोमेयर में आए बदलाव (telomere shortening) थे। टेलोमेयर डीएनए के सिरों पर मौजूद सुरक्षा कवच होते हैं, जो उम्र के साथ धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं। जिन मछलियों पर क्लोरपायरीफॉस का असर पड़ा था, उनके टेलोमेयर सामान्य से कहीं ज़्यादा छोटे पाए गए। इनके छोटे हो जाने का मतलब है बीमारी और जल्दी मौत का खतरा। इससे साफ संकेत मिला कि यह कीटनाशक मछलियों की कोशिकाओं को तेज़ी से बूढ़ा कर रहा है।

पुष्टि के लिए प्रयोगशाला में भी परीक्षण (laboratory experiment) किया गया। मछलियों को बहुत ही कम मात्रा में क्लोरपायरीफॉस दिया गया – उतना ही जितना झीलों के पानी में था। चार महीने बाद साफ पानी में रखी सभी मछलियां ज़िंदा रहीं, लेकिन जिन टैंकों में कीटनाशक था, वहां बूढ़ी मछलियों में से लगभग आधी मर गईं और उनके टेलोमेयर लगभग एक-तिहाई तक छोटे हो चुके थे।

अध्ययन से स्पष्ट है कि रासायनिक प्रदूषण (chemical pollution) न केवल ज़हरीला होता है बल्कि जीवों को जल्दी बूढ़ा भी करता है। हालांकि अभी इंसानों पर इसके सीधे असर (human health impact) को लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक चेताते हैं कि ऐसी ही जैविक प्रक्रियाएं इंसानों में भी होती हैं।

यदि कीटनाशकों का इस्तेमाल ऐसे ही चलता रहा, तो रसायन चुपचाप पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem damage) को बदल देंगे। (स्रोत फीचर्स)

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अंतरिक्ष में बैक्टीरिया पर वायरस संक्रमण प्रयोग

डॉ. इरफान ह्यूमन

अंतरिक्ष की गुरुत्वाकर्षण रहित दुनिया में विषाणु अर्थात वायरस (virus) और जीवाणु यानी बैक्टीरिया (bacteria) की लड़ाई कैसे बदल जाती है?

इस सवाल पर थोड़ा प्रकाश डालता है ओपन-एक्सेस जर्नल प्लॉस बायोलॉजी (PLOS Biology) में प्रकाशित हालिया अध्ययन। इस प्रयोग में जब वैज्ञानिकों ने एशरीशिया कोली (ई. कोली) बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वायरस (फेज) को अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) (International Space Station – ISS) पर भेजा, तो इन सूक्ष्मजीवों ने वैसा व्यवहार नहीं किया जैसा ये पृथ्वी पर करते हैं। माइक्रोग्रैविटी (नगण्य गुरुत्वाकर्षण) में संक्रमण तो हुआ, लेकिन समय के साथ वायरस और बैक्टीरिया दोनों ही अलग-अलग तरीके से विकसित हुए। जेनेटिक बदलाव आए, जिनसे वायरस का बैक्टीरिया से जुड़ने का तरीका बदल गया और बैक्टीरिया ने खुद को बचाने के नए हथियार विकसित किए। ये खोज फेज थेरपी (बैक्टीरियाभक्षी वायरस की मदद से उपचार की तकनीक) को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है, खासकर दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों (antibiotic resistance) के खिलाफ।

फेज यानी वे वायरस जो बैक्टीरिया को संक्रमित करते हैं, और उनके एवं मेज़बान के बीच की लड़ाई सूक्ष्मजीवीय पारिस्थितिकी (microbial ecology) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसे अक्सर ‘इवॉल्यूशनरी आर्म्स रेस’ (वैकासिक हथियार दौड़) कहा जाता है, जहां बैक्टीरिया वायरस से बचने के लिए सुरक्षा उपाय बनाते हैं, और वायरस उस सुरक्षा को तोड़ने के नए-नए तरीके ईजाद करते रहते हैं। पृथ्वी पर तो इस लड़ाई का काफी अध्ययन हो चुका है।

लेकिन, नगण्य गुरुत्वाकर्षण (low gravity) में फेज-बैक्टीरिया की खींचातानी पर बहुत कम अध्ययन हुए हैं। इस कमी को दूर करने के लिए, पी. हस और उनके साथियों ने ई. कोली बैक्टीरिया के दो नमूने लिए, जिन्हें टी7 नामक फेज से संक्रमित किया गया। एक नमूना पृथ्वी पर रखा और दूसरा अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS experiment) पर।

अंतरिक्ष के अवलोकन

1. संक्रमण की गति में बदलाव

शुरुआत में संक्रमण धीमा हुआ, क्योंकि नगण्य गुरुत्वाकर्षण बैक्टीरिया की शरीर क्रिया (cell physiology)  और फेज-बैक्टीरिया के टकराव की भौतिकी को प्रभावित करती है। नगण्य गुरुत्वाकर्षण में बैक्टीरिया की कोशिकाएं अलग-अलग तरीके से इकट्ठा होती हैं, जिससे फेज का जुड़ना मुश्किल हो जाता है।

2. जेनेटिक उत्परिवर्तन

फेज में ऐसे उत्परिवर्तन हुए जो उनकी संक्रमण क्षमता यानी रिसेप्टर्स से जुड़ने की ताकत बढ़ाते हैं। वहीं, बैक्टीरिया में बचाव और अंतरिक्ष में जीवित रहने के नए जेनेटिक बदलाव (genetic adaptation)  विकसित हुए। पता चला कि फेज का रिसेप्टर बाइंडिंग प्रोटीन (receptor binding protein) अंतरिक्ष में अलग तरीके से बदलता है।

3. नए रहस्य

अंतरिक्ष के फेज पृथ्वी पर दवा-प्रतिरोधी ई. कोली (drug resistant bacteria) के खिलाफ ज़्यादा प्रभावी साबित हुए। इससे पता चलता है कि नगण्य गुरुत्वाकर्षण बैक्टीरिया-फेज के सह-विकास को नए तरह से ढालता है, जो सूक्ष्मजीवों के अनुकूलन के बुनियादी सिद्धांतों को चुनौती देता है।

अंतरिक्ष अन्वेषण (space exploration) में सूक्ष्मजीव एक बड़ी चुनौती हैं, क्योंकि वे अंतरिक्ष यान को संदूषित (spacecraft contamination) और यात्रियों की सेहत को प्रभावित कर सकते हैं। यह शोध कई लिहाज़ से फायदे दे सकता है :

1. यात्रियों की स्वास्थ्य रक्षा

लंबे मिशन (जैसे मंगल यात्रा) (Mars mission) में नगण्य गुरुत्वाकर्षण बैक्टीरिया को ज़्यादा खतरनाक बना सकता है, लेकिन फेज उन्हें नियंत्रित कर सकते हैं। इससे अंतरिक्ष में सूक्ष्मजीव के नियंत्रण के लिए नए साधन मिल सकते हैं। मसलन, आईएसएस पर सूक्ष्मजीवों की 3डी मैपिंग (microbial mapping) दिखाती है कि अंतरिक्ष का वातावरण उनके मेटाबोलाइट्स को बदल देता है, जिससे संक्रमण बढ़ सकता है।

2. ग्रहीय सुरक्षा

अंतरिक्ष में सूक्ष्मजीवों के अनुकूलन को समझने से हम अन्य ग्रहों पर पृथ्वी के जीवों को फैलने से रोक सकते हैं। शोध से पता चलता है कि नगण्य गुरुत्वाकर्षण बैक्टीरिया के जीनोम में बदलाव लाता है, जो अंतरिक्षयान निर्जीवीकरण (space sterilization)  के नए तरीके सुझा सकता है।

स्वास्थ्य के लिए उपयोगिता

पृथ्वी पर, एंटीबायोटिक प्रतिरोध (antibiotic resistance crisis) एक वैश्विक संकट है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2050 तक इससे एक करोड़ मौतें हो सकती हैं। यह शोध मानव स्वास्थ्य में क्रांति ला सकता है।

अंतरिक्ष में हुए उत्परिवर्तनों के अनुसार फेज को इंजीनियर (phage engineering) करके दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया के खिलाफ ज़्यादा प्रभावी बनाया जा सकता है।

नगण्य गुरुत्वाकर्षण बैक्टीरिया की प्रतिरक्षा व फेज के विकास को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करता है, जो पृथ्वी पर संक्रमण मॉडल्स सुधार सकता है। जैसे, अंतरिक्ष में बैक्टीरिया लाइसोजेनिक फेज (जो बैक्टीरिया के जीनोम में छिप जाते हैं) से जुड़े संस्करण विकसित करते हैं, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता समझने में मदद करता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि अंतरिक्ष-प्रेरित बदलावों से पृथ्वी पर अत्यधिक सक्रिय फेज बन सकते हैं। इससे अस्पतालों में सुपरबग्स से लड़ना आसान हो सकता है।

पूर्व शोध

अंतरिक्ष में फेज और बैक्टीरिया (space microbiology) के आपसी सम्बंध पर शोध नया नहीं है, लेकिन आईएसएस में इसे नई दिशा मिली है। यहां प्रमुख शोधों का क्रमिक अवलोकन दिया जा रहा है।

शुरुआती इतिहास: अंतरिक्ष सूक्ष्मजीव विज्ञान की शुरुआत 1935 में हुई थी, जब बैक्टीरिया को गुब्बारा उड़ान और रॉकेट्स पर भेजा गया। अपोलो मिशन्स (1960-70) में अंतरिक्ष में सूक्ष्मजीवों को जांचा गया था, लेकिन फेज पर ध्यान कम था।

2000 का दशक: आईएसएस के शुरू होने के बाद 2010-2015 में साल्मोनेला और ई. कोली की अंतरिक्ष में बढ़ी आक्रामकता पाई गई, लेकिन फेज शामिल नहीं थे।

2020 फेज इवॉल्यूशन प्रोजेक्ट (phage evolution project): रोडियम साइंटिफिक और आइएसएस नेशनल लैब ने फेज इवॉल्यूशन अध्ययन शुरू किया, जहां फेज को अंतरिक्ष में बैक्टीरिया को संक्रमित करने के लिए भेजा गया।

2024 लाइसोजेनिक बैक्टीरिया-फेज अध्ययन: नेचर कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित अध्ययन में आईएसएस से 245 बैक्टीरियल जीनोम्स का विश्लेषण किया गया। पाया कि अंतरिक्ष उड़ान के दौरान बैक्टीरिया में लाइसोजेनिक फेज से जुड़े संस्करण बढ़ते हैं, जो अनुकूलन से जुड़े हैं।

2025 आइएसएस का माइक्रोबियल मैप: सेल जर्नल में, आईएसएस के यूएसओएस में सूक्ष्मजीवों और मेटाबोलाइट्स का 3डी मैप बनाया गया, जो अंतरिक्ष के चरम वातावरण को दिखाता है। इसमें फेज की भूमिका का संकेत मिला है।

2025 में फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी में आरएनए वायरस की अंतरिक्ष में लघु-कालिक वैकासिकी पर अध्ययन प्रकाशित हुआ, जो फेज से प्रेरित था। अंतत: ये सभी 2026 के अध्ययन के आधार बने, जो पहली बार पूरे जीनोम अनुक्रम (whole genome sequencing) से फेज-मेज़बान के सहविकास पर नज़र रखता है। (स्रोत फीचर्स)

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अत्यंत प्राचीन जीवाश्मों में चयापचय रसायनों के निशान

लाखों साल पहले इस धरती पर विचरने वाले जीव (prehistoric animals) क्या खाते होंगे? क्या वे कभी किसी बीमारी (ancient diseases) का शिकार बनें होंगे? इन सवालों के जवाब दे पाना मुमकिन नहीं लगता। नेचर में प्रकाशित हालिया अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इन नामुमकिन लगने वाले सवालों के जवाब दिए हैं। उन्होंने बताया है कि लाखों साल पहले विचरने वाले जीवों ने क्या खाया, उनका रहवास कैसा था, और वे कैसी बीमारियों से जूझ रहे थे।

इन सवालों का जवाब देने के लिए शोधकर्ताओं ने सहारा लिया है मेटाबोलाइट्स (metabolites) का। मेटाबोलाइट किसी जीव के शरीर की चयापचय प्रक्रिया में बने उप-उत्पाद होते हैं। दरअसल हम जो भी खाते हैं, किसी भी संक्रमण की चपेट में आते हैं, या जिन भी परिस्थितियों को हमारा शरीर झेलता है चयापचय प्रक्रिया में बने मेटाबोलाइट उस सबके गवाह बन जाते हैं।

जीवित जीवों के खान-पान या रोग सम्बंधी छान-बीन करने के लिए तो उनके रक्त या मूत्र के नमूनों से मेटाबोलाइट्स (biological samples, disease analysis) हासिल कर लिए जाते हैं। लेकिन अश्मीभूत जीवों में तो रक्त-मूत्र मिलना संभव नहीं है। लेकिन यह भी होता है कि जैसे-जैसे दांत, हड्डियां या हाथीदांत जैसे सख्त ऊतक विकसित होते हैं, वृद्धि करते हैं, रक्त के साथ मेटाबोलाइट्स उनमें पहुंचते रहते हैं और ये मेटाबोलाइट्स इन सख्त ऊतकों की खुरदरी, छिद्रदार संरचनाओं में फंस जाते हैं। इस आधार पर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के जैविक नृविज्ञानी टिम ब्रोमेज के मन में यह सवाल आया कि क्या हड्डियों, दांतों और हाथीदांत जैसी सख्त और छिद्रदार जगह पर मेटाबोलाइट्स फंसकर संरक्षित भी रह सकते हैं (bone preservation, fossil chemistry)।

हालांकि, कुछ हालिया अध्ययनों में ऐसे मेटाबोलाइट्स मृत्यु के बाद कंकाल के अवशेषों (skeletal remains, post-mortem biomarkers) में संरक्षित पाए गए हैं, लेकिन वे कंकाल महज कुछ दशक पुराने थे। लेकिन ये शोधकर्ता तो लाखों साल (13 से 30 लाख साल तक) प्राचीन जीवाश्मों में मेटाबोलाइट्स खोजना चाह रहे थे।

ब्रोमेज और उनके साथियों ने प्राचीन तंज़ानिया की ओल्डुवाई गॉर्ज, और दक्षिण अफ्रीका की मकापंसगैट और मलावी के होमिनिन खुदाई स्थलों से प्राप्त अश्मीभूत हड्डियों और दांतों से नमूने लेकर उनकी मास स्पेक्ट्रोग्राफी (mass spectrometry, chemical analysis) करके प्रत्येक जीवाश्म में कैद रासायनिक पदार्थों का पता लगाया। एक बार जब उन्होंने नमूनों के भीतर संभावित मेटाबोलाइट्स की पहचान कर ली, तो उन्होंने उनकी तुलना वर्तमान में जीवित उनके जैसे जीवों के मेटाबोलाइट्स से की।

शोधकर्ताओं को विश्लेषण में प्रत्येक नमूने में हज़ारों मेटाबोलाइट्स मिले, जिनमें से सैकड़ों ऐसे थे जो वर्तमान जीवों द्वारा बनाए जाने वाले मेटाबोलाइट से मेल खाते थे।

इस आधार पर शोधकर्ताओं ने प्राचीन जानवरों के जीवन (ancient life reconstruction) के बारे में अनुमान लगाए। जैसे, मेटाबोलाइट के आधार पर शोधकर्ता यह अंदाज़ा कर पाए कि कई अश्मीभूत जीव मादा थे। ओल्डुवाई गॉर्ज से मिले दो जेरबिल और एक गिलहरी के जीवाश्म में ऐसे मेटाबोलाइट्स मिले जो एस्ट्रोजन को पचाने (estrogen metabolism) वाले जीन से जुड़े थे। अश्मीभूत उल्लू के पेट में से मिली जेरबिल की एक अन्य हड्डी से भी मादा (sex identification)होने के अतिरिक्त रासायनिक संकेत मिले।

आगे के विश्लेषण में शोधकर्ताओं को अतीत की बीमारियों के संकेत भी मिले। ओल्डुवाई गॉर्ज से मिले गिलहरी, चिवोंडो से मिले हाथी और मकापंसगैट से मिले बोविड के जीवाश्म से ऐसे मेटाबोलाइट्स मिले जो संभवत: ट्रायपैनोसोमा ब्रूसाई (Trypanosoma brucei) परजीवी के खिलाफ प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से जुड़े थे। यह परजीवी मनुष्यों में निद्रा रोग का कारण बनता है।

फिर, जीवाश्म मेटाबोलाइट्स की तुलना ज्ञात पौधों के मेटाबोलाइट्स से करके शोधकर्ता कुछ जानवरों के आहार और वातावरण के बारे में भी बता पाए। ओल्डुवाई गॉर्ज से मिली 18 लाख साल पुरानी गिलहरी में ऐसे मेटाबोलाइट्स मिले जो शतावरी और एलो कुल पौधों के भक्षण का संकेत देते हैं। इस आधार पर लगता है कि उस समय जंगल घना रहा होगा। ऐसे ही पता चला कि 24 लाख साल पहले मलावी में विचरने वाला एक जीव मृत्यु के समय बच्चा था, वर्मवुड की छाल और शहतूत की पत्तियां खाता था और जब वह मरा तो शायद किसी संक्रमण से ग्रस्त था।

हालांकि अन्य वैज्ञानिक चेताते है कि शोधकर्ताओं को जीवाश्मों से जुड़े मेटाबोलाइट्स का विश्लेषण करते समय सावधान रहना चाहिए। क्योंकि यह दुविधा हमेशा होती है कि मेटाबोलाइट्स उस अश्मीभूत जानवर द्वारा बनाए गए थे या आसपास की मिट्टी से जीवाश्म में समा गए हैं।

अलबत्ता, शोधकर्ताओं ने जीवाश्मों के आसपास की मिट्टी की जांच करके इस समस्या का ध्यान रखा है। वे यह भी कहते हैं कि “मिट्टी कोई संदूषक नहीं है बल्कि यह तो उस जीवन का प्रतिबिंब है जो उस पर बसा था।”

बहरहाल यह बड़ी बात है कि वैज्ञानिक लाखों साल पुराने जीवाश्म नमूनों से मेटाबोलाइट हासिल करके उनका विश्लेषण कर सके। ऐसे विश्लेषण अतीत के बारे में लगाए गए कई अनुमानों को मज़बूती दे सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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दो सिर वाली तितलियां

कुछ तितलियों में ऐसा अनुकूलन हुआ है कि लगता है उनके दो सिर (false head adaptation) हैं। माना जाता है कि यह विशेषता उन्हें शिकारियों से बचने (predator defense) में मदद करती है। जीव वैज्ञानिक यह समझने के प्रयास करते रहे हैं कि यह विचित्र अनुकूलन हुआ कैसे। पहले तो यह देखते हैं कि ‘दूसरे सिर’ का मतलब क्या है।

दरअसल, कुछ तितलियों (butterfly species) के पंखों पर कुछ ऐसे पैटर्न और संरचनाएं विकसित हो जाती है कि वहां एक और सिर की उपस्थिति का भ्रम होता है। जैसे वहां छद्म एंटेना (fake antennae) उभर आते हैं, चटख रंग उभर आते हैं, पंख पर धारियों के पैटर्न बन जाते हैं, बड़े-बड़े धब्बे बन जाते हैं और सिर के समान संरचना विकसित हो जाती है। ऐसा माना जाता था कि ये सारे गुणधर्म एक साथ, एकबारगी प्रकट हो गए ताकि शिकारियों को भटकाया जा सके। लेकिन यह समझा नहीं जा सका था कि इन विशेषताओं का जैव-वैकासिक इतिहास क्या है।

अब इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्स एजूकेशन एंड रिसर्च (IISER, तिरुअनंतपुरम / IISER Thiruvananthapuram) के तरुणकिश्वर सुमनम और उल्लसा कोडांडरमैया ने प्रोसीडिंग्स ऑफ रॉयल सोसायटी-बी में इस सवाल पर प्रकाश डाला है और चरण-दर-चरण इस गुण के विकास की परतें खोली हैं।

एक बात तो पहले से पता थी – तितलियों के पंखों के पिछले सिरे पर विकसित इन गुणधर्मों का उनकी उड़ान या प्रजनन (flight & reproduction) जैसे कार्यों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं होता है। लेकिन छद्म सिर से जुड़े इन परिवर्तनों के उभरने का क्रम क्या था? इसकी समझ बनाने के लिए आइसर के वैज्ञानिकों ने तितलियों की लगभग 1000 प्रजातियों के चित्रों का विश्लेषण किया और यह ध्यान दिया कि प्रत्येक प्रजाति में छद्म सिर के कौन-कौन से लक्षण नज़र आते हैं। इसके बाद शोधकर्ताओं ने एक वंशवृक्ष (phylogenetic tree) तैयार करके यह देखा कि छद्म सिर वाली प्रजातियां एक-दूसरे से कितनी निकटता से सम्बंधित हैं। इस वंशवृक्ष के कंप्यूटर विश्लेषण से स्पष्ट हुआ कि छद्म सिर के पांच में से चार लक्षण – नकली एंटेना, सिर के समान बनावट, चटख रंग (wing coloration) और पंख पर चमकीला धब्बा – परस्पर सम्बंधित रूप से प्रकट हुए हैं। इस विश्लेषण से यह भी पता चला कि इन लक्षणों का उभरना किस क्रम में हुआ है। पता चला कि पंख के चटख रंग सबसे पहले प्रकट हुए और उसके बाद पंखों पर धारियों का पैटर्न उभरा। इसके बाद ही नकली एंटेना और सिर जैसी बनावट विकसित हुई थी।

तो इन सबके एक के बाद एक क्रमिक विकास का कारण क्या रहा होगा?

शोधकर्ताओं का मत है कि ये सब एक साथ आ गए क्योंकि प्राकृतिक चयन (natural selection) का एक ही दबाव काम कर रहा था: शिकारियों के हमले (predator attack pressure)। अलबत्ता, यह सवाल बरकरार है कि छद्म सिर का यह गुण इन तितलियों को कितनी व किस तरह की सुरक्षा प्रदान करता है। (स्रोत फीचर्स)

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जानवरों में सर्दी से निपटने के अनोखे तरीके

मारे लिए सर्दियों के मौसम का मतलब गर्म कपड़े, हीटर और अधिक समय घरों के अंदर बिताना है। लेकिन जंगली जीवों के पास ऐसी कोई सुविधा नहीं। कीट, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी – सभी ने सर्दी से निपटने के अलग-अलग तरीके (winter survival in animals) विकसित किए हैं। कोई दुबक जाता है, कोई अपनी गतिविधि धीमी कर लेता है, कोई झुंड में सटकर बैठकर गर्मी बनाए रखता है, तो कोई ठंड से बचने के लिए लंबी यात्रा करता है। ऐसे ही कुछ जीवों के खास तरीकों (animal adaptation to cold) पर यहां चर्चा की जा रही है।

मकड़ियों का तरीका (spiders in winter)

मकड़ियां देखने में ज़रा सी दिखती हैं, लेकिन कई मकड़ियां सर्दियों के लिए अच्छी तरह तैयार होती हैं। उत्तरी अमेरिका में ज़मीन पर रहने वाली मकड़ियां, जैसे वुल्फ स्पाइडर, पत्तों की चादर, लकड़ियों के नीचे या मिट्टी में थोड़ी गहराई में जाकर सर्दी बिताती हैं। बर्फ के नीचे का यह इलाका सतह की तुलना में कुछ डिग्री अधिक गर्म होता है।

मकड़ियां अपने शरीर की गर्मी खुद नहीं बना सकतीं, इसलिए ठंड बढ़ने पर उनकी गतिविधियां धीमी हो जाती हैं। इससे उनकी ऊर्जा बचती है। सर्दियों के हल्के गर्म दिनों में कुछ मकड़ियां थोड़ी देर के लिए सक्रिय भी हो जाती हैं। जाल बनाने वाली कई मकड़ियां अपने अंडों (spider eggs winter) को रेशम की मोटी तह वाले थैलों में रखती हैं। कुछ प्रजातियों में बच्चे पूरी सर्दी इसी थैले में साथ-साथ रहते हैं और बसंत आने पर बाहर निकलते हैं।

कुछ मकड़ियां तो और भी खास तरीका अपनाती हैं – वे अपने शरीर में ‘एंटीफ्रीज़’ जैसे रसायन (antifreeze chemicals in insects) बना लेती हैं। ये रसायन शरीर के अंदर बर्फ जमने से रोकते हैं, जिससे मकड़ियां बेहद कम तापमान में भी जीवित रह पाती हैं।

कछुए: बिना फेफड़ों के सांस (turtles brumation)

ठंड बढ़ते ही कछुओं की कई प्रजातियां ब्रूमेशन में चली जाती हैं, जो सरीसृपों में शीतनिद्रा जैसा होता है। इस दौरान उनकी गतिविधियां बहुत धीमी हो जाती हैं। ज़मीन पर रहने वाले कछुए, जैसे बॉक्स टर्टल, मिट्टी में दबकर जमा की हुई चर्बी के सहारे सर्दी काट लेते हैं।

पानी में रहने वाले कछुए, जैसे पेंटेड टर्टल, पूरी सर्दी (painted turtle in winter) तालाब या झील के पेंदे में रहते हैं, तब भी जब ऊपर की सतह पूरी तरह बर्फ बन जाती है। ठंडा पानी उनके शरीर को ठंडा रखता है, जिससे उन्हें कम ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ती है। ये कछुए हवा से सांस लेने के बजाय अपनी त्वचा, मुंह और एक विशेष छिद्र के ज़रिए सीधे पानी से ऑक्सीजन सोख लेते हैं।

जब ऑक्सीजन बहुत कम हो जाती है, तो कुछ कछुए बिना ऑक्सीजन के भी ऊर्जा बनाते हैं। इससे उनके शरीर में हानिकारक अम्ल बनता है लेकिन अपने खोल के कैल्शियम से वे उसे निष्क्रिय कर देते हैं। यानी उनका खोल (turtle shell protection) ही जाड़ों का सुरक्षा कवच है।

मधुमक्खियां: हम साथ-साथ हैं (bees in winter)

अधिकांश कीटों से अलग, मधुमक्खियां सर्दियों में भी सक्रिय रहती हैं। जैसे ही ठंड बढ़ती है, युरोपीय मधुमक्खियां छत्ते के अंदर रानी के चारों ओर जमा हो जाती हैं। कामगार मधुमक्खियां अपने पंख हिलाए बिना उड़ान वाली मांसपेशियों को तेज़ी से सिकोड़ती-फैलाती हैं, जिससे शरीर में गर्मी पैदा (honeybee winter cluster) होती है। मधुमक्खियां लगातार अपनी स्थिति बदलती रहती हैं। इससे रानी और पूरा छत्ता कड़ी ठंड में भी सुरक्षित रहता है।

इस रणनीति के लिए लंबी तैयारी ज़रूरी होती है। गर्मियों में मधुमक्खियां रस इकट्ठा कर लगभग 40 किलो शहद जमा कर लेती हैं, ताकि पूरी सर्दी उसी से ऊर्जा मिलती रहे। वे छत्ते की जगह भी काफी सोच-समझकर चुनती हैं, अक्सर खोखले पेड़ों के अंदर, जहां गर्मी बेहतर बनी रहती है (beehive winter survival)

चिपमंक: छोटी-छोटी नींद (chipmunk torpor)

चिपमंक न तो पूरी तरह शीतनिद्रा में जाते हैं और न ही पूरी तरह सक्रिय रहते हैं। वे ज़मीन के नीचे बने जटिल बिलों में रहते हैं, जहां सुरंगें और भोजन से भरे कक्ष होते हैं।

पूर्वी चिपमंक कुछ दिनों के लिए टॉरपर नाम की हल्की नींद में चले जाते हैं। इस दौरान उनकी दिल की धड़कन बहुत कम हो जाती है और शरीर का तापमान बिल की ठंडक के अनुसार गिर जाता है। हर कुछ दिनों में वे जागते हैं, जमा किया हुआ खाना खाते हैं और फिर दोबारा टॉरपर (torpor in animals) में चले जाते हैं। रुक-रुक कर सोने की यह रणनीति उन्हें ऊर्जा बचाने में मदद करती है और सतर्क भी रखती है।

पक्षी: गर्मी की ओर प्रवास (bird migration winter)

कई पक्षियों के लिए सर्दी से बचने का सबसे अच्छा तरीका है उस इलाके से पलायन कर जाना। अमेरिका और कनाडा में 70 प्रतिशत से ज़्यादा पक्षी सर्दियों में दक्षिण की ओर उड़ जाते हैं, जहां मौसम गर्म होता है और भोजन आसानी से मिलता (migratory birds) है।

कुछ पक्षियों की यात्राएं हैरान कर देने वाली होती हैं। आकार में एक सिक्के जितनी छोटी रूबी-थ्रोटेड हमिंगबर्ड (hummingbird migration) एक ही दिन में 700 किलोमीटर चौड़ी मेक्सिको की खाड़ी पार कर लेती है। वहीं रूफस हमिंगबर्ड जैसे कुछ पक्षी दक्षिण की बजाय पूर्व की ओर उड़ते हैं और फ्लोरिडा या लुइसियाना पहुंच जाते हैं।

पक्षियों का प्रवास उनके स्वभाव, दिन-रात की लंबाई, हवा की दिशा और भोजन की उपलब्धता से तय होता है। यह सफर जोखिम भरा होता है, लेकिन ऐसा करके वे कड़ाके की ठंड से बच पाते हैं।

प्रकृति अद्भुत है, और उसमें रहने वाले जीव और उनके तरीके और भी अद्भुत। उन्हें देखें, समझें, सराहें।  (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्राचीन आरएनए हासिल किया जा सका

पिछले कुछ दशकों से वैज्ञानिक प्राचीन डीएनए का विश्लेषण (ancient DNA research) कर अतीत के जीवन के बारे में, उद्विकास (evolution studies) के बारे में समझने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अकेले डीएनए पर मौजूद जीन्स आधी-अधूरी कहानी बता पाते हैं। डीएनए वह अणु होता है जिसमें किसी जीव के निर्माण व कामकाज की सारी सूचना क्षारों के क्रम के रूप में मौजूद होती है। इस डीएनए के छोटे-छोटे अनुक्रम (जीन्स) के आधार पर कोशिकाओं में एक अन्य अणु बनाया जाता है जिसे आरएनए कहते हैं। आरएनए ही कोशिकाओं में प्रोटीन बनवाने (RNA sequencing) का काम करता है।

किसी जीवित जीव में कोई जीन कब और कहां सक्रिय होता है, उससे उस जीव की समझ बनाने पर बहुत फर्क पड़ सकता है। और यह जानकारी कि कोई जीन कब और कहां सक्रिय हुआ है आरएनए में दर्ज होती है। दिक्कत यह है कि आरएनए तो डीएनए से भी जल्दी अपघटित हो जाता है; कारण है उसकी नाज़ुक बनावट और उसको अपघटित करने वाले एंज़ाइम। पाठ्यपुस्तकों की ज़ुबानी, “मृत्यु के कुछ ही मिनटों या घंटों के भीतर आरएनए बरबाद हो जाता है।” इसलिए प्राचीन नमूनों से आरएनए हासिल (ancient RNA samples) करने के गिने-चुने प्रयास ही हुए हैं।

और ये प्रयास भी पिछले कुछ सालों में ही हुए हैं। सबसे पहले तो वैज्ञानिकों को पुराने मक्के और जौ के बीजों से और पर्माफ्रॉस्ट में जमे भेड़िये के ऊतक से आरएनए के खंड हासिल करने में सफलता मिली। फिर 2023 में, कुछ वैज्ञानिकों ने 132 साल पुराने तस्मानियाई टाइगर (बिल्ली जैसा मार्सुपियल) का आरएनए (Tasmanian tiger RNA) हासिल कर उसका अनुक्रमण किया। और इन्ही नतीजों से प्रेरित होकर हालिया अध्ययन किया गया (RNA preservation)

अध्ययन में, स्टॉकहोम युनिवर्सिटी के जीवाश्म विज्ञानी लव डालेन ने रूस की एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर 10 प्राचीन वुली मैमथ (हाथी जैसा झबरीला जानवर) (woolly mammoth RNA) के ऊतकों से आरएनए हासिल करने का प्रयास किया। ये नमूने पूरे मैमथ के नहीं बल्कि छोटे-छोटे टुकड़े थे। यानी आरएनए ढूंढने का मौका भी बस आर-पार की स्थिति जैसा था।

अच्छी बात कि वे इन नमूनों से ठीक-ठीक हालत में आरएनए हासिल कर पाए। उन्होंने एंज़ाइम की मदद से आरएनए अणु से डीएनए की शृंखलाएं बनाईं, फिर उन डीएनए का अनुक्रमण किया। इसके आधार पर यह अनुमान लगाया कि उन आरएनए में अनुक्रम कैसा रहा होगा। वे 10 मैमथ में से तीन मैमथ के प्राचीन आरएनए पहचान पाए (genome reconstruction); ये 39,000 से 52,000 साल प्राचीन थे।

हालांकि इन मैमथ से अधिकतर आरएनए टूटी-फूटी हालत में मिले थे, लेकिन एक मैमथ जिसका नाम यूका रखा गया है, से काफी जानकारी मिल सकी। एक तो, कुछ ऐसे आरएनए अनुक्रम मिले जो सिर्फ वाय क्रोमोसोम (Y chromosome genes) पर पाए जाने वाले जीन में होते हैं। यह हैरान करने वाली बात थी क्योंकि अब तक उनको लगता था कि यूका मादा है। यूका से मिले दूसरे आरएनए में पेशीय ऊतक बनाने और रख-रखाव रखने के निर्देश थे (mammoth biology)।

सेल पत्रिका में प्रकाशित (Cell journal study) ये नतीजे इस दिशा में शोध के और मौके खुलने की आशा जगाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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इस मछली के सिर पर दांत होते हैं

ह तो जानी-मानी बात है कि अधिकांश रीढ़धारी यानी कशेरुकी जंतुओं (vertebrates) के मुंह में दांत पाए जाते हैं जो चबाने वगैरह का काम करते हैं। लेकिन एक मछली है जिसके सिर पर एक उभरा हुआ अंग टेनाक्युलम (tenaculum) होता है और उस पर दांत उगे होते हैं। इन विचित्र मछलियों को भूतहा शार्क (ghost shark) या शिमेरा मछली (chimaera fish) कहते हैं। 

ऐसी ही एक शिमेरा है स्पॉटेड रैटफिश (Hydrolagus colliei)। यह उत्तर-पूर्वी प्रशांत महासागर में रहती है। लंबाई लगभग दो फुट होती है, सिर बड़ा सा होता है और एक लंबी सी पूंछ होती है।

देखा गया है कि टेनाक्युलम सभी शिमेरा मछलियों के सिर पर होता है। लेकिन टेनाक्युलम पर दांत सिर्फ नर शिमेरा में पाए जाते हैं। खास बात यह है कि नर शिमेरा में टेनाक्युलम को ऊपर उठाया जा सकता है। नर शिमेरा संभोग (mating behavior) के दौरान टेनाक्युलम पर उगे दांतों की मदद से मादा को थामकर रखते हैं। वैसे तो कई मछलियों में कूल्हों के नज़दीक ऐसे अंग (reproductive organ) होते हैं जो मादा को पकड़कर सटाए रखते हैं। गौरतलब बात है कि शिमेरा में सिर पर मौजूद टेनाक्युलम कूल्हों के अंग के अतिरिक्त होता है। लेकिन वैज्ञानिक इस बात पर विचार करते रहे हैं कि आखिर टेनाक्युलम पर दांत आए कैसे यानी जैव विकास (evolutionary origin) में इनकी उत्पत्ति कैसे हुई।

अब फ्लोरिडा विश्वविद्यालय (University of Florida) के कार्ली कोहेन और उनके साथी शोधकर्ताओं ने सिर पर उगे दांतों की उत्पत्ति का अनुमान लगा लिया है और अपने निष्कर्ष प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइन्सेस (PNAS) (यूएस) में प्रकाशित किए हैं। इसके लिए उन्होंने Hydrolagus colliei के विकास के विभिन्न चरणों (developmental stages) का अध्ययन किया और साथ ही उन्होंने कार्बोनिफेरस काल (Carboniferous period) में पाई जाने वाली ऐसी ही एक मछली Helodus simplex के जीवाश्मों का भी अध्ययन किया।

सबसे पहली बात तो यह पता चली कि नरों में यह उभार पहले पूरा विकसित हो चुकने के बाद ही दांत निकलते हैं। ये दांत टेनाक्युलम के अंदर से ही उगते हैं। यह भी स्पष्ट हुआ कि इस रचना का सम्बंध ऊपरी जबड़े (upper jaw) से है और दांतों का विन्यास शार्क के मुंह के दांतों (shark teeth) से मेल खाता है।

शोधकर्ताओं ने टेनाक्युलम और उस पर दांतों के विकास के लिए ज़िम्मेदार आणविक क्रियापथ (molecular pathways)  और जीन्स वगैरह को भी पहचाना है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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