विष्ठा प्रत्यारोपण से चूहों का दिल जवान होता है

ह तो जानी-मानी बात है कि बुढ़ापे के साथ दिमाग धीमा होने लगता है, आप भूलने लगते हैं और नए हुनर सीखने में परेशानी महसूस करते हैं। लेकिन अब चूहों पर किए गए प्रयोगों ने उम्मीद की एक धुंधली सी किरण दिखाई है। इस शोध ने दर्शाया है कि युवा चूहे के आमत के बैक्टीरिया (मल के रूप में) बूढ़े चूहों को देने पर बुढ़ाते दिमाग के कुछ लक्षण पलटे जा सकते हैं।

वैज्ञानिकों का मत है कि हमारी आंत में बसने वाले बैक्टीरिया हमारे मूड से लेकर आम तंदुरुस्ती तक हर चीज़ को प्रभावित करते हैं। और आंतों का यह सूक्ष्मजीव संसार उम्र के साथ बदलता रहता है। लेकिन इसका असर भलीभांति परखा नहीं गया था।

इसी असर को परखने के लिए शोधकर्ताओं ने 3-4 माह के चूहों की विष्ठा के नमूने लिए (3-4 माह चूहों की जवानी होती है) और इन्हें 20 माह उम्र के चूहों में प्रत्यारोपित कर दिया (20 माह के चूहे वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में आते हैं)। तुलना के लिए कुछ चूहों को उनकी ही उम्र के चूहों की विष्ठा दी गई थी (यानी युवाओं को युवाओं की तथा बूढ़ों को बूढ़ों की)।

शोधकर्ताओं ने सबसे पहले तो यह देखा कि युवा चूहों का सूक्ष्मजीव संसार पाने वाले बूढ़े चूहों का सूक्ष्मजीव संसार युवाओं के समान हो गया था। उदाहरण के लिए युवाओं की आंत में बहुतायत से पाए जाने वाले एंटरोकॉकस बैक्टीरिया बूढ़ो में भी प्रचुर हो गए।

और तो और, दिमाग पर भी असर देखा गया। दिमाग का हिप्पोकैम्पस नामक हिस्सा सीखने तथा याददाश्त से सम्बंधित होता है। युवा विष्ठा पाने के बाद बूढ़े चूहों में भी यह हिस्सा भौतिक व रासायनिक रूप से युवा चूहों जैसा हो गया। यह भी देखा गया कि युवा विष्ठा पाए बूढ़े चूहे भूलभुलैया वाली पहेलियां सुलझाने में भी बेहतर हो गए और भूलभुलैया के रास्तों को याद रखने में भी निपुण साबित हुए। युनिवर्सिटी कॉलेज कॉर्क के तंत्रिका वैज्ञानिक जॉन क्रायन और उनके साथियों द्वारा नेचर एजिंग नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित परिणामों के मुताबिक हमउम्र चूहों की विष्ठा के ऐसे कोई असर नहीं हुए।

शोधकर्ताओं ने बताया है कि कुछ चीज़ें नहीं बदलीं। जैसे इस उपचार के बाद बूढ़े चूहे ज़्यादा मिलनसार नहीं हुए थे। आंतों के कई बैक्टीरिया वैसे के वैसे बने रहे। वैसे अन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि इस टीम ने अभी प्रामाणिक रूप से यह नहीं दर्शाया है कि आंतों का सूक्ष्मजीव संसार किस हद तक बदला और क्या स्थायी रूप से बदल गया। वैसे क्रायन ने चेताया है अभी तुरंत मनुष्यों पर छलांग लगाने का वक्त नहीं आया है क्योंकि ऐसे अन्य अध्ययनों के परिणाम मिश्रित रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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डायनासौर आपसी युद्ध में चेहरे पर काटते थे

ब जीव अपने लिए प्रणय-साथी, अधिकार क्षेत्र या स्थान के लिए एक-दूसरे से लड़ते हैं, तो नज़ारा दर्शनीय व डरावना होता है। हाल ही में वैज्ञानिकों को इस बात के सबूत मिले हैं कि टायरेनोसॉरस रेक्स जैसे डायनासौर भी ऐसा ही करते थे, और इस लड़ाई में वे एक-दूसरे के चेहरे पर काटते थे।

शोधकर्ताओं ने विभिन्न तरह के डायनासौर (थेरापॉड) की 528 जीवाश्मित खोपड़ियों का विश्लेषण किया। इनमें से 122 खोपड़ियों पर उन्हें काटने के गहरे निशान और ठीक हो चुके घावों के निशान मिले। ये निशान लगभग 60 प्रतिशत वयस्क डायनासौर में दिखाई दिए, लेकिन किसी भी कम उम्र डायनासौर में नहीं दिखे। पैलियोबायोलॉजी में शोधकर्ता बताते हैं कि इससे पता चलता है कि डायनासौर एक-दूसरे को तभी काटते थे जब वे किशोरावस्था पार कर जाते थे (यानी यौन परिपक्वता पर पहुंच जाते थे)। लगभग इसी समय वे अपने लिए प्रणय-साथियों की तलाश में होते थे या अपना सामाजिक प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश कर रहे होते थे।

काटने के निशान की जगह से पता चलता है कि लड़ाई में डायनासौर अधिकतर प्रतिद्वंदी को थोड़ा बाजू से काटते थे, जिसमें दोनों डायनासौर थोड़ा सिर झुकाकर अपने प्रतिद्वंद्वी की खोपड़ी या निचला जबड़ा दबोचते थे।

शोधकर्ताओं ने उन छोटे आकार के डायनासौर की खोपड़ी की भी जांच की, जिनसे आज के सभी पक्षी विकसित हुए हैं। लेकिन इनमें से किसी भी डायनासौर के चेहरे पर काटने के निशान नहीं थे। इससे लगता है कि अपने वंशज पक्षियों की तरह इन डायनासौर ने भी मादाओं के लिए हिंसक तरीके से लड़ना बंद कर दिया था, और इसकी बजाय वे मादाओं को अपने चमकदार पंखों से लुभाने लगे थे। (स्रोत फीचर्स)

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आदिम समुद्री शिकारी एक विशाल ‘तैरता सिर’ था

दो साल पहले वैज्ञानिकों ने ‘मिलेनियम फाल्कन’ को पृथ्वी के पहले समुद्री शिकारी की उपाधि से नवाज़ा था। उसके दो साल बाद उन्हीं शोधकर्ताओं को कनाडा के बर्जेस शेल के उसी स्थान पर एक बड़े अंतरिक्ष यान जैसे जीव का जीवाश्म मिला। युनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के जीवाश्म विज्ञानी जोसेफ मोयसियक के अनुसार आधा मीटर लंबा यह आर्थोपॉड (सन्धिपाद) मूलत: एक विशाल ‘तैरता सिर’ था, जो 50 करोड़ साल पहले कैम्ब्रियन समुद्र में रहता था।

टाइटेनोकोरिस गेनेसी का सिर उसके शरीर की लगभग आधी लंबाई के बराबर था, और वह एक गुंबदनुमा, नुकीले सिरे वाले कवच से ढंका हुआ था। इसी विशेषता के कारण इसे लैटिन नाम मिला जिसका अर्थ है ‘टाइटन का हेलमेट’। यह जीव समुद्र के पेंदे से सटकर तैरता था, और अपने कांटेनुमा उपांगों से कीचड़ से अपना शिकार खोदता था। संभवत: इसका नुकीला हेलमेट इस खुदाई में मदद करता था।

इसकी आंखें खोल के पीछे की तरफ ऊपर की ओर थीं जो शिकार खोजने के काम में मददगार तो नहीं रही होंगी बल्कि शिकारियों को भांपने के लिए होंगी।

टाइटेनोकोरिस आर्थोपोड्स के एक विविध समूह (रेडियोडोन्ट्स) से सम्बंधित है, जो लगभग 52 करोड़ वर्ष पहले हुए कैम्ब्रियन विस्फोट के तुरंत बाद मकड़ियों, कीड़ों और हॉर्सशू केकड़ों के पूर्वजों से अलग हो गए थे। इस समय जब कशेरुकी जीव छिंगली बराबर मछली से थोड़े ही बड़े थे, तब रेडियोडोन्ट्स का कैम्ब्रियन समुद्र पर दबदबा था।

सभी रेडियोडोन्ट्स की तीन विशेषताएं होती हैं: इनका मुंह गोलाकार होता है जो एक अनानास की खड़ी काट की तरह दिखता है और इनमें मांस को फाड़ने वाले पैने दांत होते हैं, मुंह के सामने एक जोड़ी कांटेदार उपांग होते हैं और बड़ी संयुक्त आंखें होती हैं। इस नई जीवाश्म प्रजाति में ये सभी लक्षण दिखते हैं।

शोधकर्ताओं को जब इसका जीवाश्म मिला तब पहले तो उन्होंने सोचा कि यह जीवाश्म केवल एक विशाल कैम्ब्रोरेस्टर है, क्योंकि कैम्ब्रोरेस्टर उस स्थान पर बहुतायत में पाए जाते थे। लेकिन जब उन्होंने 11 सम्बंधित नमूनों से इस जीवाश्म की तुलना की तो इसे बहुत अलग पाया। रॉयल सोसाइटी ओपन एक्सेस में शोधकर्ता बताते हैं कि यह कुछ नया था। और उनके अनुसार टाइटेनोकोरिस को नया जीनस मिलना चाहिए था।

कैम्ब्रोरेस्टर के स्थान पर टाइटेनोकोरिस का मिलना कैम्ब्रियन पारिस्थितिक तंत्र की विविधता को रेखांकित करता है – यहां शिकारी जीव बहुतायत में हैं। पृथ्वी पर शुरुआत में समुद्रों में प्रचुर मात्रा में शिकार उपलब्ध रहा होगा जिससे एक ही स्थान पर एक साथ कई शिकारी जीवों को पर्याप्त भोजन मिल जाता होगा।

बहरहाल, शोधकर्ता अगली गर्मियों में उस स्थान पर जाकर अधिक संपूर्ण टाइटेनोकोरिस जीवाश्म खोजने के लिए जाएंगे। हो सकता है कि उन्हें चट्टानों में छिपी कोई नई प्रजाति भी मिल जाए। (स्रोत फीचर्स)

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सबसे चमकदार ततैया के छत्ते

हालिया अध्ययन बताता है कि जीव-जगत में सबसे चमकदार हरी चमक जुगनू की नहीं होती, बल्कि एशिया में पाई जानी वाली पेपर ततैया के छत्ते हरे रंग में सबसे तेज़ चमकते हैं। जर्नल ऑफ दी रॉयल सोसाइटी इंटरफेस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह प्रकाश ततैया के लार्वा (जीनस पॉलिस्टेस) द्वारा ककून में बुने रेशम प्रोटीन से निकलता है। इस चमक को पराबैंगनी रोशनी में 20 मीटर दूर से देखा जा सकता है।

शोधकर्ताओं को लगता है कि छत्ते की यह चमक संध्या के समय ततैया को घर वापसी में मदद करती है – जब शाम गहराने लगती है लेकिन हल्की पराबैंगनी रोशनी होती है। पोलिस्टेस 540 नैनोमीटर तरंग दैर्घ्य तक का प्रकाश देख सकते हैं, और ककून से निकलने वाला हरा प्रकाश इसी तंरग दैर्घ्य का होता है।

यह भी संभावना है कि यह फ्लोरेसेंट प्रोटीन सूर्य के पराबैंगनी विकिरण को अवशोषित कर लेता है और विकसित होते लार्वा को इस हानिकारक विकिरण से बचाता है। संभवत: फ्लोरेसेंस लार्वा की वृद्धि में भी मदद करता है: शोधकर्ता बताते हैं कि कई पोलिस्टेस प्रजातियों की वृद्धि जंगल में बरसात के मौसम के दौरान होती हैं, जब अक्सर धुंध या बादल छाए रहते हैं। तब यह ककून लैम्प धुंध में ततैयों को सूर्य का अंदाज़ा देता है; ककून की हरी रोशनी ततैयों द्वारा दिन-रात चक्र का तालमेल बनाए रखने में उपयोग की जाती होगी, जो उनके उचित विकास में महत्वपूर्ण है। (स्रोत फीचर्स)

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वायरस की मदद से परजीवी ततैया पर विजय

वायरस की मदद से परजीवी ततैया पर पतंगों और तितलियों के दो बड़े दुश्मन हैं – परजीवी ततैया और वायरस। ये एक दूसरे से संघर्ष भी करते हैं। एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि कुछ वायरस संक्रमण के बाद पतंगों और तितलियों में अपने जीन्स स्थानांतरित करते हैं जिससे वे परजीवी का सफाया करने वाले प्रोटीन बनाने लगते हैं।

गौरतलब है कि ततैया और मक्खियों की कई प्रजातियां अन्य कीड़ों के अंदर अपने अंडे देती हैं जिससे उनकी संतानों को भोजन का स्रोत और विकास के लिए एक सुरक्षित स्थान मिल जाता है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में मेज़बान जीव की जान चली जाती है। लेकिन आर्मीवर्म, कटवर्म और कैबेज बटरफ्लाई जैसी कुछ प्रजातियों में कुछ ततैया के प्रति प्रतिरोध देखा गया है।

मामले की छानबीन के लिए टोकियो युनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नॉलॉजी की कीटविज्ञानी मडोका नकाई और उनकी टीम ने पहले नॉर्थ आर्मीवर्म लार्वा को सामान्य पॉक्स वायरस से संक्रमित किया और फिर विभिन्न परजीवी ततैया प्रजातियों से संपर्क करवाया। असंक्रमित लार्वा परजीवियों के शिकार हो गए, जबकि वायरस-संक्रमित लार्वा और उनके प्लाज़्मा ने मीटियोरस पल्चीकॉर्निस के अलावा, लगभग सभी परजीवियों को खत्म कर दिया। शोधकर्ताओं ने संक्रमित आर्मीवर्म में दो प्रोटीन्स की भी पहचान की, जिसे उन्होंने पैरासीटॉइड किलिंग फैक्टर (PKF) नाम दिया। उन्हें लगता है कि यह परजीवी के लिए विषैला हो सकता है।                

इसके बाद युनिवर्सिटी ऑफ वालेंसिया के कीट विज्ञानी साल्वेडोर हेरेरो और सहयोगियों ने कीट-संक्रामक वायरस और पतंगे व तितली दोनों में वे जीन्स खोज निकाले जो PKF का निर्माण कर सकते हैं। विश्लेषण से पता चलता है कि PKF जीन कई बार वायरस से इन कीटों में स्थानांतरित हुआ है। यानी वायरस से संक्रमित होने के बाद भी कोई कीट जीवित रहे तो उसे ऐसा जीन मिल जाता है जो परजीवी से रक्षा करता है।

PKF प्रोटीन की भूमिका की बात सुनिश्चित करने के लिए युनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया के आणविक जीवविज्ञानी डेविड थीलमन और उनके सहयोगियों ने आर्मीवर्म्स को दो वायरसों से संक्रमित किया। उन्होंने पाया कि संक्रमित आर्मीवर्म्स ततैया लार्वा को रोकने में सफल रहे। इसके अलावा, बीट आर्मीवर्म जिनके स्वयं के जीन PKF का निर्माण करते हैं, भी परजीवियों को मारने में सक्षम थे। जब PKF बनाने वाले जीन को खामोश कर दिया, तो कई परजीवी जीवित रहे। अर्थात परजीवियों को मारने में PKF की भूमिका है। रिपोर्ट साइंस में प्रकाशित हुई है।    

PKF से परजीवी कैसे मरते हैं यह पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक ततैया लार्वा को संक्रमित नार्थ आर्मीवर्म प्लाज़्मा के संपर्क में रखा। पता चला कि PKF ने प्रभावित कोशिकाओं को तहस-नहस कर दिया था।                                 

इस अध्ययन से शोधकर्ताओं को फसलों और जंगलों में लार्वा-परजीवियों के रूप में उपयोग किए जाने वाले कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोध को समझने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसकी जटिलता को समझने के लिए अभी और अध्ययन की आवश्यकता है। फिर भी, इन नए प्रोटीन्स की पहचान से आगे का रास्ता तो मिला है। शोधकर्ता वायरस-मेज़बान-परजीवी के पारस्परिक प्रभाव को जांचना चाहते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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हवा से प्राप्त डीएनए से जीवों की पहचान

डीएनए हर जगह पाया जाता है। यह हवा में भी मौजूद होता है, इसी कारण कई लोगों को पराग या बिल्ली के बालों की रूसी से एलर्जी होती है। हाल ही में दो शोध समूहों ने अलग-अलग काम करते हुए बताया है कि वातावरण में कई जीवों का डीएनए पाया जाता है जो आसपास के क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति का पता लगाने में काम आ सकता है।

टेक्सास टेक युनिवर्सिटी के इकॉलॉजिस्ट मैथ्यू बार्नेस इस अध्ययन को काफी महत्वपूर्ण मानते हैं जिससे हवा के नमूनों की मदद से पारिस्थितिकी तंत्र में कई प्रजातियों का पता लगाया जा सकता है। इसके लिए शोधकर्ता काफी समय से पानी में बिखरे डीएनए की मदद से ऐसे जीवों को खोजने का प्रयास कर रहे थे जो आसानी से नज़र नहीं आते। झीलों, नदियों और तटीय क्षेत्रों से प्राप्त पर्यावरणीय डीएनए (ई-डीएनए) से प्राप्त नमूनों से शोधकर्ताओं को लायनफिश के साथ-साथ ग्रेट क्रेस्टेड न्यूट जैसे दुर्लभ जीवों का पता लगाने में भी मदद मिली। हाल ही में कुछ वैज्ञानिकों ने तो पत्तियों की सतह से प्राप्त ई-डीएनए से कीड़ों को ट्रैक किया और मृदा से प्राप्त ई-डीएनए से कई स्तनधारियों का भी पता लगाया।

अलबत्ता, हवा में उपस्थित ई-डीएनए पर कम अध्ययन हुए हैं। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि जीव कितने ऊतक हवा में छितराते हैं और आनुवंशिक सामग्री कितने समय तक हवा में बनी रहती है। पूर्व के कुछ अध्ययनों में हवा में बहुतायत से पाए जाने वाले बैक्टीरिया और कवक सहित अन्य सूक्ष्मजीवों का पता लगाने के लिए मेटाजीनोमिक अनुक्रमण का उपयोग किया गया है। इस तकनीक में डीएनए के मिश्रण का विश्लेषण किया जाता है। इसके साथ ही 2015 में वाशिंगटन डीसी में लगाए गए एयर मॉनीटर्स में कई प्रकार के कशेरुकी और आर्थोपोडा जंतुओं के ई-डीएनए पाए गए थे। हालांकि इस तकनीक की उपयोगिता के बारे में अभी कुछ स्पष्ट नहीं था और न ही यह पता था कि स्थलीय जीवों द्वारा त्यागी कोशिकाएं हवा में कैसे बहती हैं।   

इस वर्ष की शुरुआत में यॉर्क युनिवर्सिटी की मॉलिक्यूलर इकॉलॉजिस्ट एलिज़ाबेथ क्लेयर ने पीयर जे में बताया था कि प्रयोगशाला से लिए गए हवा के नमूनों में नेकेड मोल रैट का डीएनए पहचाना जा सकता है। लेकिन खुले क्षेत्रों में ई-डीएनए के उपयोग की संभावना का पता लगाने के लिए क्लेयर और उनके सहयोगियों ने चिड़ियाघर का रुख किया। मुख्य बात यह है कि चिड़ियाघर में प्रजातियां ज्ञात होती हैं और आसपास के क्षेत्रों में नहीं पार्इं जातीं। यहां टीम हवा में पाए जाने वाले डीएनए के स्रोत का पता कर सकती थी।

क्लेयर ने चिड़ियाघर की इमारतों के बाहर और अंदर से 72 नमूने एकत्रित किए। बहुत कम मात्रा में प्राप्त डीएनए को बड़ी मात्रा में प्राप्त करने के लिए पॉलिमरेज़ चेन रिएक्शन का उपयोग किया गया। ई-डीएनए को अनुक्रमित करने के बाद उन्होंने ज्ञात अनुक्रमों के एक डैटाबेस से इनका मिलान किया। टीम ने चिड़ियाघर, उसके नज़दीक और आसपास की 17 प्रजातियों (जैसे हेजहॉग और हिरण) की पहचान की। चिड़ियाघर के कुछ जीवों के ई-डीएनए उनके बाड़ों से लगभग 300 मीटर दूर पाए गए। उन्हें चिड़ियाघर के जीवों को खिलाए जाने वाले चिकन, सूअर, गाय और घोड़े के मांस के ई-डीएनए भी प्राप्त हुए हैं। टीम ने कुल 25 स्तनधारियों और पक्षियों की पहचान की है। इसी प्रकार का एक अध्ययन डेनमार्क के शोधकर्ताओं ने कोपेनहेगन चिड़ियाघर में भी किया। यहां कुल 49 प्रजातियों के कशेरुकी जीवों की पहचान की गई।

कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इन वायुवाहित डीएनए की मदद से उन जीवों का पता लगाया जा सकता है जिनको खोज पाना काफी मुश्किल होता है। ये जीव मुख्य रूप से शुष्क वातावरण, गड्ढों या गुफाओं में रहते हैं या फिर पक्षियों जैसे ऐसे वन्यजीव जो कैमरों की नज़र से बच निकलते हैं।

हालांकि, इस प्रकार से वायुवाहित डीएनए से जीवों की उपस्थिति का पता लगाना अभी भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि ये ई-डीएनए हवा में कितनी दूरी तक यात्रा कर सकते हैं। यानी डैटा के आधार पर किसी जीव की हालिया स्थिति बताना मुश्किल है। डीएनए बहकर कितनी दूर जाएगा यह कई कारकों पर निर्भर करता है। जैसे ई-डीएनए जंगल की तुलना में घास के मैदानों में ज़्यादा दूरी तक फैल सकता है। इसमें एक मुख्य सवाल यह भी है कि वास्तव में जीव डीएनए का त्याग कैसे करते हैं। संभावना है कि वे अपनी त्वचा को खरोंचने, रगड़ने, छींकने या लड़ाई जैसी गतिविधियों के दौरान त्यागते होंगे। इसके अलावा ई-डीएनए अध्ययन में नमूनों को संदूषण से बचाना भी काफी महत्वपूर्ण होता है।

लेकिन इन अज्ञात पहलुओं के बावजूद बार्नेस को इस अध्ययन से काफी उम्मीदें हैं। आने वाले समय में इस तकनीक की मदद से वैज्ञानिक हवा के नमूनों से कीटों की पहचान करने का भी प्रयास करेंगे। (स्रोत फीचर्स)

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मादा नेवलों में विचित्र प्रसव-तालमेल

हाल ही में नेवलों की आबादी पर किए गए अध्ययन से प्रजनन सम्बंधी कुछ अद्भुत परिणाम सामने आए हैं।

युगांडा में किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि एक समूह की 60 प्रतिशत मादा गर्भवती नेवले एक ही रात बच्चों को जन्म देती हैं भले ही उनके गर्भधारण का समय अलग-अलग ही क्यों न हो। बायोलॉजी लेटर्स नामक जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह तालमेल वास्तव में घातक प्रतियोगिता को टालने के इरादे से प्रेरित है।

युनाइटेड किंगडम स्थित युनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर की जीव विज्ञानी सारा हॉज के अनुसार इन समूहों में शावक नेवलों का जल्दी या देर से जन्म लेना, दोनों ही खतरनाक हो सकते हैं। जल्दी जन्म लेने वाले नवजात नेवले अन्य मादा नेवलों के लिए आसान शिकार बन जाते हैं। ये मादाएं इन नन्हे नेवलों को अपनी आने वाली संतान के लिए बाधा मानती हैं। दूसरी ओर, देर से जन्म लेने वाले नेवलों के जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है क्योंकि उनको भोजन के लिए अधिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना होता है और समूह के अन्य वयस्क नेवलों की देखभाल भी नहीं मिलती।

अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओ ने शिशुओं के जन्म के समय का वज़न भी नियंत्रित किया। इसके लिए उन्होंने कुछ गर्भवती नेवलों को गर्भावस्था के दौरान अतिरिक्त भोजन दिया। यह देखा गया कि सुपोषित मादाओं ने अपने तंदुरुस्त बच्चों की बजाय कम भोजन प्राप्त मादा नेवलों के कम वज़न वाले बच्चों का ज़्यादा ध्यान रखा – उन्हें दूध पिलाया, देखभाल की और रक्षा की। यानी साथ-साथ बच्चे पैदा होने से कमज़ोर बच्चों को कुछ फायदा तो मिलता है।    

वैज्ञानिकों को लगता है कि इस उत्कृष्ट तालमेल में फेरेमोन की भूमिका हो सकती है।

युगांडा स्थित क्वीन एलिज़ाबेथ नेशनल पार्क में नेवलों (मंगोस मंगो) के 11 समूहों पर लगभग सात वर्ष लंबा अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में युनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के प्रोफेसर माइकल केंट और उनके सहयोगियों ने कुछ मादाओं को अल्प अवधि के गर्भनिरोधक देकर निर्धारित किया कि कौन-सी मादाएं संतान का योगदान करेंगी। वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि यदि प्रभावशाली मादाएं समूह में संतान का योगदान नहीं कर पाती हैं तो वे सभी नवजात नेवलों को मार देती हैं। लेकिन यदि उन्हें लगता है कि इन नवजात नेवलों में उनकी संतानें भी हैं, तो वे उन सबको बख्श देती हैं।

निष्कर्ष बताते हैं कि कशेरुकियों के बीच सहयोग के विकास में इस तरह की रणनीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे यह भी पता चलता है कि जनसंख्या नियंत्रण में अन्य मादाओं के नवजात शिशुओं की हत्या एक महत्वपूर्ण प्रतिकूल रणनीति हो सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार कई सामाजिक स्तनधारियों में एक प्रमुख मादा प्रजनक होती है। इन नेवलों में लगभग 12 मादाएं एक साथ गर्भवती होती हैं और एक ही दिन जन्म देने के लिए तालमेल बनाती हैं। केंट बताते हैं कि इस प्रयोग में मादा नेवलों के बीच तालमेल बनाने का मुख्य उद्देश्य प्रजनन में इस तरह की जानलेवा घटनाओं को टालना है। (स्रोत फीचर्स)

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मल जीवाश्म में गुबरैले की नई प्रजाति

गुबरैले हर जगह पाए जाते हैं और लगभग हर रोज़ एक नई प्रजाति का पता चलता है। अब इनकी एक प्रजाति अजीबोगरीब जगह पर मिली है: डायनासौर के मल का जीवाश्म। पूरी तरह से सुरक्षित यह गुबरैला 23 करोड़ वर्ष पूर्व पाया जाता था। इसे नाम दिया गया है ट्राएमिक्सा कोप्रोलिथिका। पहली बार कोई संपूर्ण कीट मल के जीवाश्म (कोप्रोलाइट) में पाया गया गया है।

विश्व भर के संग्रहालयों और शोध संग्रहों में कोप्रोलाइट्स बड़ी संख्या में हैं। लेकिन कुछेक वैज्ञानिकों ने ही कोप्रोलाइट्स का विश्लेषण उनमें उपस्थित पदार्थों के लिहाज़ से किया है। मान्यता यह है कि इतने छोटे कीड़ों का पाचन तंत्र से साबुत गुज़रकर मल में पहचानने योग्य रूप में मिल पाना संभव नहीं है। अब तक जीवाश्म वैज्ञानिकों को कीटों के बारे में अधिकांश जानकारी एम्बर या रेज़िन जीवाश्मों से हासिल होती थी जो बदकिस्मती से इनमें फंस जाते थे। देखा जाए ये जीवाश्म अधिक पुराने नहीं होते; ऐसा सबसे प्राचीन जीवाश्म 14 करोड़ वर्ष पुराना है।    

कोप्रोलाइट्स में कीट अवशेषों के बारे में पता लगाने के लिए उपसला युनिवर्सिटी के जीवाश्म विज्ञानी मार्टिन क्वार्नस्टॉर्म और उनके सहयोगियों ने पोलैंड के उस क्षेत्र के कोप्रोलाइट्स का अध्ययन किया जिसे 23 करोड़ वर्ष पुराने ट्राएसिक काल से सम्बंधित माना जाता है। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कोप्रोलाइट का एक दो सेंटीमीटर का टुकड़ा चुना जो एक बड़े कोप्रोलाइट का टुकड़ा रहा होगा। सिंक्रोट्रॉन की मदद से इस पर तीव्र एक्स-रे किरणों की बौछार की और घुमा-घुमाकर उसका 3-डी मॉडल तैयार किया। नमूने में कीट उपस्थित थे – भलीभांति संरक्षित और पूर्ण रूप में। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इन कीटों का आकार 1.4 मिलीमीटर था। सिर, एंटीना और पैर के अंश भी दिखे।

यह मल संभवत: लगभग 2.3 मीटर लंबे चोंचवाले डायनासौर साइलेसौरस ओपोलेंसिस का है। कोप्रोलाइट एक ऐसा सूक्ष्म-वातावरण प्रदान करते हैं जहां मुलायम ऊतकों सहित कार्बनिक पदार्थ संरक्षित रहते हैं। ये जीवाश्म दबकर चपटे भी नहीं होते। इस अध्ययन में शामिल नेशनल सन येट-सेन युनिवर्सिटी के कीट विज्ञानी मार्टिन फिकासे के अनुसार यह विलुप्त गुबरैला मिक्सोफैगा नामक समूह से सम्बंधित हैं जो नम इलाकों में शैवाल पर पनपता था। शोधकर्ताओं की टीम ने उदर के भागों की संख्या या एंटीना की स्थिति जैसी  विशेषताओं के आधार पर इसे आधुनिक मिक्सोफैगा समूह में रखा है जिसके चार वंश आज भी जीवित हैं। वैसे आज तक कोई ऐसा जीवाश्म नहीं मिला था कि उसके आधार पर प्रजाति, वंश और परिवार के बारे में कुछ कहा जा सके।

इन नमूनों की मदद से पुनर्निर्मित तस्वीरों और मॉडलों से गुबरैले की न केवल नई प्रजाति का पता चला है बल्कि इसके भोजन और उन जीवों के वातावरण की जानकारी भी प्राप्त हुई है जिन्होंने इस कीट का भक्षण किया था। इस जानकारी से वैज्ञानिकों को प्राचीन खाद्य संजाल और प्राचीन डायनासौर के पारिस्थितिकी तंत्र को समझने में भी मदद मिल सकती है। शुरुआती और बाद के ट्राएसिक युग के कोप्रोलाइट्स के अध्ययन से कीट विकास के बारे में भी जानकारी मिलने की उम्मीद है। वैज्ञानिकों को अभी तक इसके विलुप्ति के कारणों की कोई जानकारी नहीं मिली है जबकि इसके निकटतम सम्बंधी आज भी जीवित हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पौधे और कीट के बीच जीन का स्थानांतरण

सेल पत्रिका में प्रकाशित एक शोध पत्र में एक पौधे और कीट के बीच जीन हस्तांतरण का मामला रिपोर्ट हुआ है। मामला यह है कि एक सफेद मक्खी (व्हाइटफ्लाई, बेमिसिया टेबेकी) जिन पौधों से पोषण लेती है, उनमें से एक पौधे से एक जीन सफेद मक्खी में स्थानांतरित हुआ है। यह जीन (BtPMaT1) कीट को फिनॉलिक ग्लायकोसाइड समूह के रसायनों से सुरक्षा प्रदान करता है। कई पौधे कीटों के हमले से स्वयं की रक्षा के लिए ये रसायन बनाते हैं। यह जीन मिल जाने के बाद यह मक्खी इस पौधे को बगैर किसी नुकसान के खा सकती है।

अलग-अलग प्रजातियों के बीच आपस में लैंगिक प्रजनन के बिना जीन्स का लेन-देन क्षैतिज जीन स्थानांतरण कहलाता है। क्षैतिज जीन स्थानांतरण पूर्व में एक-कोशिकीय जीवों, तथा कवक व गुबरैलों जैसे कुछ बहुकोशिकीय जीवों में भी देखा गया था। यह कई तरीकों से हो सकता है। एक तो आनुवंशिक सामग्री किसी वायरस के माध्यम से एक से दूसरे जीव में स्थानांतरित हो सकती है, वहीं कुछ जीव पर्यावरण में मुक्त पड़े डीएनए भी ग्रहण कर सकते हैं।

सफेद मक्खियां पौधों में बीमारियां फैलाती हैं और फसलों को तबाह भी कर डालती हैं। इसलिए चाइनीज़ एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज़ के यूजुन झैंग और उनके साथी यह समझना चाह रहे थे कि पौधों द्वारा अपने बचाव में रुाावित रसायनों से सफेद मक्खियां कैसे बच निकलती हैं।

यह जानने के लिए शोधकर्ता सफेद मक्खी के जीनोम में उस जीन की तलाश कर रहे थे जो उसे पौधों द्वारा छोड़े गए कीटनाशक के खिलाफ लड़ने में मदद करता है। सफेद मक्खियों के जीनोम की तुलना उन्होंने उन अन्य कीटों के जीनोम से की जो इन पौधों के विषाक्त रसायनों को झेल नहीं पाते थे और मर जाते थे। उन्हें BtPMaT1 नामक जीन मिला जो इसी कीट में है और एक ऐसा प्रोटीन बनाता है जो फिनॉलिक ग्लायकोसाइड को बेअसर कर देता है।

इसके बाद, शोधकर्ताओं ने नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नॉलॉजी इंफॉर्मेशन डैटाबेस का उपयोग कर इस जीन के विकास के बारे में पता किया। उन्हें किसी भी अन्य कीट में यह जीन या इसके समान कोई अन्य जीन नहीं मिला। इसका मतलब है कि सफेद मक्खी में यह जीन कहीं और से आया था।

आखिरकार, उन्हें एक ऐसा जीन मिल गया। लेकिन वह जीन किसी कीट में न होकर पौधे में था। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि साढ़े तीन करोड़ वर्ष पहले किसी वायरस ने पौधे में उस जीन का भक्षण कर लिया होगा और किसी सफेद मक्खी ने उस वायरस-संक्रमित पौधे को खा लिया होगा। वायरस ने वह जीन सफेद मक्खी के जीनोम में स्थानांतरित कर दिया होगा, जहां से वह सफेद मक्खी की पूरी आबादी में आ गया होगा। यह दर्शाता है कि अन्य जीवों से स्थानांतरित हुए जीन किसी जीव को बेहतर तरीके से जीवित रहने में मदद कर सकते हैं।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने सफेद मक्खियों में BtPMaT1 जीन को निष्क्रिय करने की योजना बनाई। इसके लिए उन्होंने विषैले टमाटर के पौधों को जेनेटिक रूप से संशोधित कर ऐसी व्यवस्था की कि वे एक ऐसा आरएनए बनाने लगें जो BtPMaT1  को निष्क्रिय कर देता है। जब सफेद मक्खियों ने टमाटर के इन पौधों को खाया तो जीन के काम न कर पाने के कारण वे मारी गर्इं। उक्त जीन से रहित एक अन्य कीट को जब ये पौधे खिलाए गए तो उनकी मृत्यु दर अपरिवर्तित रही। इससे लगता है कि ऐसे पौधे विकसित किए जा सकते हैं जो सफेद मक्खियों के लिए हानिकारक हों लेकिन अन्य प्रजातियों को नुकसान न पहुंचाएं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक नई गैंडा प्रजाति के जीवाश्म

हाल ही में उत्तर-पश्चिमी चीन के गान्सु प्रांत में पाए गए जीवाश्मों से विशाल गैंडा की एक नई प्रजाति पहचानी गई है। यह प्रजाति लगभग 2.65 करोड़ वर्ष पूर्व ओलिगोसीन युग के दौरान पाई जाती थी। नई प्रजाति (पैरासेराथेरियम लिनज़िएंज़) विलुप्त हो चुके सींगरहित गैंडा वंश से सम्बंधित है।

विशाल गैंडे को पृथ्वी के अब तक के सबसे बड़े स्तनधारियों में गिना जाता है। चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइंस के प्रोफेसर टाओ डेंग और उनके सहयोगियों के अनुसार इसकी खोपड़ी और पैर अब तक ज्ञात सभी स्तनधारियों की तुलना में लंबे हैं लेकिन इसके पैर की बड़ी हड्डी बहुत विशाल नहीं है।

डेंग आगे बताते हैं कि इस जीव का आकार आर्द्र या शुष्क जलवायु वाले खुले जंगली क्षेत्रों के लिए उपयुक्त था। पूर्वी युरोप, एनाटोलिया और कॉकेशस में पाए गए कुछ अवशेषों को छोड़कर, विशाल गैंडे मुख्य रूप से एशिया में चीन, मंगोलिया, कज़ाकस्तान और पाकिस्तान के क्षेत्रों में रहते थे। गौरतलब है कि मध्य इओसीन युग से ओलिगोसीन युग के अंत तक विशाल गैंडे के सभी छह वंश चीन के उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पश्चिम क्षेत्रों में पाए जाते थे। इनमें पैरासेराथेरियम वंश के गैंडे सबसे अधिक संख्या में थे। इनकी उपस्थिति के अधिकांश प्रमाण पूर्वी और मध्य एशिया के क्षेत्रों में मिले हैं जबकि पूर्वी युरोप और पश्चिमी एशिया में इनके खंडित नमूने प्राप्त हुए हैं। केवल तिब्बती पठार के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र में पैरासेराथेरियम बगटिएन्स प्रजाति के पर्याप्त और स्पष्ट प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

गौरतलब है कि पैरासेराथेरियम लिनज़िएंज़ के जीवाश्मों में एक पूर्ण खोपड़ी, कुछ रीढ़ की हड्डियां और जबड़े की हड्डी प्राप्त हुए हैं। विश्लेषण से पता चला है कि पैरासेराथेरियम लिनज़िएंज़ अपने वंश की सबसे विकसित प्रजाति थी। 

कम्युनिकेशन्स बायोलॉजी में प्रकाशित नतीजों के अनुसार ओलिगोसीन युग की शुरुआत में पैरासेराथेरियम प्रजातियां पश्चिम की ओर कज़ाकस्तान की ओर फैली जबकि इनके वंशजों का विस्तार दक्षिण एशिया में हुआ। इसके बाद ओलिगोसीन युग के आगे के दौर में पैरासेराथेरियम तिब्बती क्षेत्र को पार करते हुए उत्तर की ओर लौटे और पश्चिम में कज़ाकस्तान में पूर्व में लिंज़िया घाटी की ओर उभरे। गौरतलब है कि ओलिगोसीन युग के आखरी दौर की उष्णकटिबंधीय परिस्थितियों ने विशालकाय गैंडे को मध्य एशिया की ओर आकर्षित किया जो इस बात के संकेत देता है कि उस समय तक तिब्बत का क्षेत्र ऊंचे पठार के रूप में विकसित नहीं हुआ था। अनुमान है कि ओलिगोसीन युग के दौरान, विशाल गैंडे शायद तिब्बत को पार करते हुए या टेथिस महासागर के पूर्वी तट के रास्ते मंगोलियाई पठार से दक्षिण एशिया तक फैले थे। इस विशाल गैंडे के तिब्बती क्षेत्र पार करके भारत-पाकिस्तान उपमहाद्वीप तक पहुंचने के अन्य साक्ष्य मौजूद हैं। एक बात तो साफ है कि तिब्बत का पठार उस समय तक इन बड़े स्तनधारी जीवों के विचरण में बाधा नहीं बना था। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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