खगोल विज्ञानियों को ऐसा लगता है कि हमारे सौरमंडल में
नेप्च्यून से परे एक और ग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहा है। इस ग्रह को कोई भी देख
नहीं पाया है इसलिए हाल ही में खगोल विज्ञानियों ने यह सुझाव दिया है कि यह बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल
वगैरह की तरह पारंपरिक ग्रह न हो कर शायद कुछ और हो! इससे पहले कुछ इसे प्लेनेट
नाइन तो कुछ प्लेनेट एक्स कह रहे थे।
हाल ही में खगोल विज्ञानियों ने यह दावा
किया है एक कारण यह भी हो सकता है कि इस नौवें ग्रह को अब तक की सबसे उन्नत दूरबीन
से भी इसलिए नहीं देखा जा सका है, क्योंकि यह ग्रह न होकर एक ब्लैक होल है।
दरअसल ब्लैक होल अत्यधिक घनत्व तथा द्रव्यमान वाले ऐसे पिंड होते हैं, जो
आकार में तो बहुत छोटे होते हैं मगर इनके अंदर गुरुत्वाकर्षण बल इतना ज़्यादा होता
है कि इनके चंगुल से प्रकाश की किरणों का भी बच निकलना नामुमकिन होता है। चूंकि यह
प्रकाश की किरणों को भी अवशोषित कर लेता है,
इसलिए यह हमारे लिए
अदृश्य बना रहता है।
खगोल विज्ञानियों को एक अरसे से ऐसा लगता रहा
है कि सौरमंडल के बिलकुल बाहरी किनारे पर,
जहां से हमारी
आकाशगंगा शुरू होती कही जा सकती है, एक ऐसा विशाल पिंड होना चाहिए, जिसका
द्रव्यमान हमारी पृथ्वी से 5 से 10 गुना ज़्यादा है। उसे अभी देखा नहीं गया है, लेकिन
खगोलीय गणनाएं यही इशारा करती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारे सौरमंडल की
बाहरी सीमा से परे ऊर्ट-बादल से हो कर गुज़र रहे धूमकेतु (कॉमेट) जिस तरह सौरमंडल
की सीमा के भीतर खिंच जाते हैं, उससे यही लगता है कि वहां हमारी पृथ्वी से
भी शक्तिशाली कोई विशाल पिंड है। वह अपने गुरुत्वाकर्षण बल से इन धूमकेतुओं को
अपने रास्ते से विचलित कर सकता है। एक डच वैज्ञानिक यान हेंड्रिक ऊर्ट ने 1950 में
इस बादल के होने की संभावना जताई थी। हिसाब लगाया गया है कि यह बादल सौरमंडल की
बाहरी सीमा से परे 1.6 प्रकाश वर्ष की दूरी तक फैला हुआ है।
इंग्लैंड के डरहम युनिवर्सिटी के जैकब शोल्ट्ज़
और शिकागो के इलिनॉय युनिवर्सिटी के जेम्स अनविन ने हाल ही में यह नया सिद्धांत
प्रस्तावित किया है कि प्लेनेट नाइन या प्लेनेट एक्स एक आदिम ब्लैक होल है। सूर्य
से लगभग 10 गुना अधिक द्रव्यमान वाले तारों का
हाइड्रोजन और हीलियम रूपी र्इंधन खत्म हो जाता है,
तब उन्हें फैलाकर
रखने वाली ऊर्जा भी खत्म जाती है और वे अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण सिकुड़कर
अत्यधिक सघन पिंड यानी ब्लैक होल बन जाते हैं। हम आम तौर पर ब्लैक होल शब्द का
इस्तेमाल इन्हीं भारी-भरकम खगोलीय पिंडों के लिए करते हैं। मगर, आदिम
ब्लैक होल के बारे में वैज्ञानिकों की मान्यता है कि इनका निर्माण ब्राहृांड की
उत्पत्ति यानी बिग बैंग के समय हुआ होगा। और ये ब्लैक होल आकार में बहुत छोटे होते
हैं। स्टीफन हॉकिंग का ऐसा मानना था कि इन ब्लैक होल्स के अध्ययन से ब्राहृांड की
शुरुआती अवस्थाओं के बारे में पता लगाया जा सकता है।
हालिया शोध के मुताबिक इस आदिम ब्लैक होल
ने सौरमंडल के बड़े ग्रहों की कक्षाओं को सूर्य के सापेक्ष 6 डिग्री तक झुका दिया
है। इस ब्लैक होल की कक्षा काफी चपटी है। यह वर्तमान में अपनी कक्षा में सूर्य से
अधिकतम दूरी के आसपास है। इसका परिभ्रमण काल 20 हज़ार वर्ष होना चाहिए। वैज्ञानिकों
ने आकाश में 20 डिग्री गुना 20 डिग्री अर्थात 400 वर्ग डिग्री का एक क्षेत्र
चिंहित किया है जिसके भीतर यह मौजूद हो सकता है। कंप्यूटर गणनाओं से यह भी पता चला
है कि यह ब्लैक होल हमारे सूर्य की परिक्रमा करते हुए हर तीन करोड़ वर्षों पर
धूमकेतुओं से भरे ऊर्ट बादल में उथल-पुथल मचाता है।
बहरहाल, अगर प्लेनेट नाइन वास्तव में एक ब्लैक होल है तो इसे खोजना किसी ग्रह को खोजने से बड़ी चुनौती होगी। मगर ध्यान देने वाली ज़रूरी बात यह है कि ब्लैक होल के आसपास का प्रभामंडल उच्च ऊर्जा फोटॉन प्रसारित करेगा और यह एक्स-रे और गामा किरणों के रूप में दिखाई देगा, जिससे इसकी मौजूदगी की पुष्टि की जा सकेगी। अगर हमारे सौर मंडल में ब्लैक होल की मौजूदगी साफ हो जाएगी, तो इससे सौर मंडल के मौजूदा मॉडल में बड़े बदलाव की ज़रूरत होगी! (स्रोत फीचर्स) नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : http://www.astronomy.com/-/media/Images/News%20and%20Observing/News/2019/09/planet9cluster.jpg?mw=600
“सत्य को झूठ से अलग करने के लिए वैज्ञानिक मिज़ाज की ज़रूरत होती है। विज्ञान के सिद्धान्त चौकस दिमाग का निर्माण करते हैं और तथ्य को भ्रामक जानकारियों से अलग समझने में मदद करते हैं।” – नोबेल विजेता वैज्ञानिक सर्ज हैरोशे ff
आदिम मनुष्य बादल, आसमान,
सागर, तूफान
नदी, पहाड़, तरह-तरह के पेड़ पौधों, जीव-जंतुओं
के बीच अपने आपको असुरक्षित, असहाय और असमर्थ महसूस करता था। वह भय, कौतुहल
और जिज्ञासा से व्याकुल हो जाता था।
उसका जीवित रह पाना उसके अपने परिवेश की
जानकारी और अवलोकन पर निर्भर था, इसलिए अपने देखे-अनदेखे दृश्यों से उसने
अनेकों पौराणिक कथाओं की रचना की। इन कथाओं के ज़रिए मनुष्य, विभिन्न
जानवरों और पेड़-पौधों की उत्पत्ति की कल्पना तथा व्याख्या की गई। इन कथाओं में
जानवर और पौधे मनुष्य की भाषा समझते और बोलते थे। वे एक-दूसरे का रूप धारण किया
करते थे। इन कथाओं में ईश्वररूपी सृष्टा की बात कही गई। मनुष्य की चेतना ने सृष्टि
के संचालक, नियन्ता, करुणामय ईश्वर का आविष्कार किया। आत्मा तथा
परमात्मा की अनुभूति की उसने। वह प्रकृति के साथ एकात्मकता महसूस करने लगा। उसे
सुरक्षा का आश्वासन मिला।
समय के साथ विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में
जानकारियां इकठ्ठी होती रहीं। समाज, संस्कृतियों का विकास होता गया। हिन्दू, बौद्ध, ईसाई, कनफ्यूशियसवाद, इस्लाम
इत्यादि ज्ञान की परंपराएं विकसित और स्थापित हुर्इं। इन सभी परंपराओं की स्थापना
है कि इस संसार में जो भी जानने लायक महत्वपूर्ण बातें हैं उन्हें जाना जा चुका
है। ईश्वर ने ब्राहृांड की सृष्टि की, मनुष्य और अन्य जीवों का निर्माण किया।
माना गया कि प्राचीन ऋषिगण, पैगंबर और धर्मप्रवर्तक व्यापक ज्ञान से
युक्त थे और यह ज्ञान धर्मग्रंथों तथा मौखिक परंपराओं में हमें उपलब्ध है। हम इन
ग्रंथों तथा परंपराओं के सम्यक अध्ययन से ही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। मनीषियों
के उपदेशों और वाणियों से हमें इस गूढ़ ज्ञान की उपलब्धि हो सकती है। इस स्थापना
में यह अकल्पनीय है कि वेद, बाइबल या कुरान में ब्राहृांड के किसी
महत्वपूर्ण रहस्य की जानकारी न हो जिसे कोई हाड़-मांस का जीव उद्घाटित कर सके।
सोलहवीं सदी से ज्ञान की एक अनोखी परंपरा
का विकास हुआ। यह परंपरा विज्ञान की परंपरा है। इसकी बुनियाद में यह स्वीकृति है
कि ब्राहृांड के सारे महत्वपूर्ण सवालों के जवाब हमें नहीं मालूम, उनकी
तलाश करनी है।
वह महान आविष्कार जिसने वैज्ञानिक क्रांति
का आगाज़ किया, वह इसी बात का आविष्कार था कि मनुष्य अपने सबसे अधिक
महत्वपूर्ण सवालों के जवाब नहीं जानता। वैसे तो हर काल में, सर्वाधिक
धार्मिक और कट्टर समय में भी, ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने कहा कि ऐसी कई
महत्वपूर्ण बातें हैं, जिनकी जानकारी पूरी परंपरा को नहीं है। ये लोग हाशिए पर कर
दिए गए या सज़ा के भागी हुए अथवा ऐसा हुआ कि उन्होंने अपना नया मत प्रतिपादित किया
और कालांतर में यह मत कहने लगा कि उसके पास सारे सवालों के जवाब हैं।
सन 1543 में निकोलस कॉपर्निकस की पुस्तक De revolutionibus orbium का प्रकाशन हुआ। यह मानव सभ्यता के विकास
में एक क्रांति की सूचना थी। इस क्रांति का नाम वैज्ञानिक क्रांति है। इस पुस्तक
ने स्पष्ट तौर पर घोषणा की कि आकाशीय पिंडों का केंद्र धरती नहीं, सूरज
है। यह घोषणा उस समय के स्वीकृत ज्ञान को नकारती थी,
जिसके अनुसार धरती
ब्राहृांड का केंद्र है। यह बात आज साधारण लगती है,
पर कॉपर्निकस के समय
(1473 -1543) यह कहना धर्मविरोधी माना जाता था। उस समय चर्च समाजपति की भूमिका में
था। चर्च की मान्यता थी कि धरती ईश्वर के आकाश का केंद्र है। कॉपर्निकस को विश्वास
था कि धर्म-न्यायाधिकरण उसे और उसके सिद्धांत दोनों को ही नष्ट कर डालेगा। इसलिए
उसने इसके प्रकाशन के लिए मृत्युशय्या पर जाने की प्रतीक्षा की। अपनी सुरक्षा के
लिए कॉपर्निकस की चिंता पूरी तरह सही थी। सत्तावन साल बाद जियार्डेनो ब्रूनो ने
खुले तौर पर कॉपर्निकस के सिद्धांत के पक्ष में वक्तव्य देने की ‘धृष्टता’ की तो
उन्हें इस ‘कुकर्म’ के लिए ज़िंदा जला दिया गया था।
गैलीलियो(1564-1642) ने प्रतिपादित किया कि
प्रकृति की किताब गणित की भाषा में लिखी गई है। इस कथन ने प्राकृतिक दर्शन को
मौखिक गुणात्मक विवरण से गणितीय विवरण में बदल दिया। इसमें प्राकृतिक तथ्यों की
खोज के लिए प्रयोग आयोजित करना स्वीकृत एवं मान्य पद्धति हो गई। अंत में उनके
टेलीस्कोप ने खगोल विज्ञान में क्रांतिकारी प्रभाव डाला और कॉपर्निकस की सूर्य
केंद्रित ब्राहृांड की अवधारणा के मान्य होने का रास्ता साफ किया। लेकिन इस सिस्टम की वकालत करने के कारण उन्हें धर्म-न्यायाधिकरण
का सामना करना पड़ा था।
एक सदी बाद,
फ्रांसीसी गणितज्ञ और
दार्शनिक रेने देकार्ते ने सारे स्थापित सत्य की वैधता का परीक्षण करने के लिए एक
सर्वथा नई पद्धति की वकालत की। आध्यात्मिक संसार के अदृश्य सत्य का इस पद्धति से
विश्लेषण नहीं किया जा सकता था। आधुनिक काल में वैज्ञानिक प्राकृतिक संसार के
अध्ययन के लिए प्रवृत्त हुए। आध्यात्मिक सत्य का अध्ययन सम्मानित नहीं रहा।
क्योंकि उसके सत्य की समीक्षा विज्ञान के विश्लेषणात्मक तरीकों से नहीं की जा
सकती। जीवन और ब्राहृांड के महत्वपूर्ण तथ्य तर्क-संगत वैज्ञानिकों की गवेषणा के
क्षेत्र हो गए। देकार्ते ने ईश्वर की जगह मनुष्य को सत्य का अंतिम दायित्व दिया, जबकि
पारंपरिक अवधारणा में एक बाहरी शक्ति सत्य को परिभाषित करती है। देकार्ते के
मुताबिक सत्य व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करता है। विज्ञान मौलिकता को महान
उपलब्धि का निशान मानता है। मौलिकता स्वाधीनता का परिणाम होती है, प्रदत्त
ज्ञान से असहमति है।
सन 1859 में चार्ल्स डार्विन के जैव
विकासवाद के सिद्धान्त के प्रकाशन के साथ विज्ञान और आत्मा के रिश्ते के तार-तार
होने की बुनियाद एकदम पक्की हो गई।
आधुनिक विज्ञान इस मायने में अनोखा है कि
यह खुले तौर पर सामूहिक अज्ञान की घोषणा करता है। डार्विन ने नहीं कहा कि उन्होंने
जीवन की पहेली का अंतिम समाधान कर दिया है और इसके आगे कोई और बात नहीं हो सकती।
सदियों के व्यापक वैज्ञानिक शोध के बाद भी जीव वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं कि वे
नहीं जानते कि मस्तिष्क में चेतना कैसे उत्पन्न होती है। पदार्थ वैज्ञानिक स्वीकार
करते हैं कि उन्हें नहीं मालूम कि बिग बैंग कैसे हुआ या सामान्य सापेक्षता के
सिद्धांत और क्वांटम मेकेनिक्स के बीच सामंजस्य कैसे स्थापित किया जाए।
वैज्ञानिक क्रांति के पहले अधिकतर
संस्कृतियों में विकास और प्रगति की अवधारणा नहीं थी। समझ यह थी कि सृष्टि का
स्वर्णिम काल अतीत में था। मानवीय बुद्धि से रोज़मर्रा ज़िंदगी के कुछ पहलुओं में
यदा-कदा कुछ उन्नति हो सकती है लेकिन संसार का संचालन ईश्वरीय विधान करता है।
प्राचीन काल की प्रज्ञा का अनुपालन करने से हम सृष्टि और समाज को संकटग्रस्त होने
से रोक सकते हैं। लेकिन मानव समाज की मौलिक समस्याओं से उबरना नामुमकिन माना जाता
था। जब सर्वज्ञाता ऋषि, ईसा, मोहम्मद और कन्फ्यूशियस अकाल, रोग, गरीबी, युद्ध
का नाश नहीं कर पाए तो हम साधारण मनुष्य किस खेत की मूली हैं?
वैज्ञानिक क्रांति के फलस्वरूप एक नई
संस्कृति की शुरुआत हुई। उसके केंद्र में यह विचार है कि वैज्ञानिक आविष्कार हमें
नई क्षमताओं से लैस कर सकते हैं। जैसे-जैसे विज्ञान एक के बाद एक जटिल समस्याओं का
समाधान देने लगा, लोगों को विश्वास होने लगा कि नई जानकारियां हासिल करके और
इनका उपयोग कर हम अपनी समस्याओं को सुलझा सकते हैं। दरिद्रता, रोग, युद्ध, अकाल, बुढ़ापा, मृत्यु
विधि का विधान नहीं है। ये बस हमारे अज्ञान का नतीजा हैं।
विज्ञान का कोई पूर्व-निर्धारित मत/सिद्धांत नहीं है, अलबत्ता, इसकी गवेषणा की कुछ सामान्य विधियां हैं। सभी अवलोकनों पर आधारित हैं। हम अपनी ज्ञानेंद्रियों के जरिए ये अवलोकन करते हैं और गणितीय औज़ारों की मदद से इनका विश्लेषण करते हैं। (स्रोत फीचर्स) नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://familytimescny.com/wp-content/uploads/2016/09/STEM.jpg
आकाश में सूरज, चांद,
ग्रहों और तारों की
दुनिया बहुत अनोखी है। आपने चांद और तारों को खुशी और आश्चर्य से कभी न कभी ज़रूर
निहारा होगा। गांवों में तो आकाश में तारों को देखने में और भी अधिक आनंद आता है, क्योंकि
शहरों की अपेक्षा गांवों में बिजली की रोशनी की चकाचौंध कम होती है और वातावरण भी
स्वच्छ एवं शांत होता है। तारों को निहारते-निहारते और उनकी विशाल संख्या को देखकर
आप ज़रूर आश्चर्यचकित हो जाते होंगे। इस बात की पूरी संभावना है कि आपने शहर में
कभी भी ऐसा सुंदर दृश्य न देखा होगा!
हम अपनी कोरी आंखों से जितने भी ग्रहों, तारों
एवं तारा-समूहों को देख सकतें हैं, वे सभी एक अत्यंत विराट योजना के सदस्य हैं, जो
आकाश में लगभग उत्तर से दक्षिण तक फैली हुई नदी के समान प्रवाहमान प्रतीत होती है।
यह एक निहारिका (गैलेक्सी) है। हमारा सूर्य और उसका परिवार यानी सौरमंडल जिस
निहारिका का सदस्य है उसका नाम आकाशगंगा (मिल्की-वे) है। हमारी आकाशगंगा में 100
अरब से भी ज़्यादा तारे हैं। हमारा सूर्य इन्हीं में से एक साधारण तारा है।
सूर्य आकाशगंगा के केंद्र से लगभग 27,000
प्रकाश वर्ष दूर एक किनारे पर है। इसलिए पृथ्वी से देखने पर आकाशगंगा तारों के एक
सघन पट्टे के रूप में दिखाई देती है। चूंकि हम स्वयं आकाशगंगा के भीतर ही स्थित
हैं, इसलिए हम इसकी सही आकृति का सटीक अनुमान नहीं लगा पाए हैं।
हम आकाशगंगा के 90 प्रतिशत हिस्से को नहीं देख सकते। वास्तव में, हम
अपनी आकाशगंगा के बारे में जो कुछ भी जानते हैं,
वह ब्राहृांड की
हज़ारों अन्य निहारिकाओं की संरचना के अध्ययन और अप्रत्यक्ष खगोलीय प्रेक्षणों पर
ही आधारित है। वैज्ञानिकों ने हमारी आकाशगंगा को सर्पिल या कुंडलित निहारिका
(स्पाइरल गैलेक्सी) की श्रेणी में वर्गीकृत किया है। अधिकांश पाठ्यपुस्तकों और
विज्ञान की लोकप्रिय पुस्तकों में आकाशगंगा को एक सपाट तश्तरीनुमा सर्पिल संरचना
के रूप में ही दिखाया जाता है।
हाल ही में पोलैंड के वारसॉ विश्वविद्यालय
के शोधकर्ताओं ने आकाशगंगा के अब तक के सर्वश्रेष्ठ 3-डी मानचित्र विकसित करते हुए
आकाशगंगा को समतल या सपाट मानने की हमारी परंपरागत धारणा को चुनौती दी है। इस नए
अध्ययन से यह पता चलता है कि हमारी आकाशगंगा ऊपर और नीचे के घुमावदार किनारों के
साथ काफी विकृत है। सपाट तश्तरीनुमा योजना बनाने की बजाय मिल्की-वे के तारे एक ऐसी
तश्तरी बनाते हैं जो किनारों पर बिलकुल मुड़ जाती है,
कुछ-कुछ अंग्रेजी के
अक्षर ‘S’ की तरह।
शोधकर्ताओं ने हमारी आकाशगंगा में बिखरे और
नियमित अंतराल पर चमकने वाले (स्पंदन करने वाले) सेफाइड वेरीएबल तारों की सूर्य से
दूरी मापकर आकाशगंगा का पहले से बहुत ज़्यादा सटीक 3-डी चार्ट बनाया है। सेफाइड
तारों के स्पंदन और उनके निरपेक्ष कांतिमान (एब्सॉल्यूट मैग्नीट्यूड) में सीधा
सम्बंध होता है। इसके चलते ये तारे दूरियां मापने वाले तारे कहे जाते हैं। सेफाइड
तारों का स्पंदन जितना ज़्यादा होता है, उतनी ही उस तारे की निरपेक्ष कांति ज़्यादा
होती है।
अत: स्पंदन-काल की जानकारी होने पर
निरपेक्ष कांति भी ज्ञात हो जाती है। उसके बाद प्रत्यक्ष कांति और निरपेक्ष कांति
के परस्पर सम्बंध के आधार पर गणित की सहायता से उस तारे की दूरी मालूम हो जाती है।
इसी तरह सेफाइड तारों की चमक की विविधता का इस्तेमाल करते हुए सूर्य से इनकी सटीक
दूरी को मापा जाता है।
शोधकर्ताओं ने 2400 से अधिक सेफाइड तारों
की दूरी को मापा। इनमें से अधिकांश तारों की पहचान चिली के दक्षिणी अटाकामा
रेगिस्तान के लास कैंपानास ऑब्ज़र्वेटरी के ऑप्टिकल ग्रेविटेशनल लेन्सिंग
एक्सपेरिमेंट (ओजीएलई) की सहायता से की गई। ओजीएलई एक पोलिश खगोलीय परियोजना है, जो
मुख्यत: सेफाइड तारों की जांच-पड़ताल करती है। यह खगोलविदों को बड़ी सटीकता के साथ
ब्राहृांडीय दूरियों की गणना करने में सक्षम बनाता है।
खगोलविद डोरोटा स्कोरॉन ने इस अध्ययन का
नेतृत्व किया है, जो जर्नल साइंस के हालिया अंक में प्रकाशित हुआ है। शोध
पत्र के सह-लेखक पर्जमेक म्राज के मुताबिक आकाशगंगा की जिस वर्तमान आकृति को हम
जानते हैं, वह दूसरी मिलती-जुलती निहारिकाओं के आधार पर तथा मुख्यत:
अप्रत्यक्ष मापों पर आधारित है। उन सीमित प्रेक्षणों द्वारा तैयार किए आकाशगंगा के
मानचित्र अधूरे हैं। हालिया 3-डी मानचित्र प्रत्यक्ष प्रेक्षणों और बड़े पैमाने पर
हुए अध्ययन पर आधारित हैं।
इस नए शोध के नतीजों के मुताबिक आकाशगंगा की वक्र भुजाएं कई लहरदार तरंगों में बंटी होती हैं। संक्षेप में कहें, तो इस शोध से यह पता चला है कि आकाशगंगा और उसकी भुजाएं एक चपटे समतल में तारों की तश्तरी नहीं, बल्कि लहरदार हैं। यह बहुत ही उलझी हुई एक विराट संरचना है। बहरहाल, यह नया 3-डी मानचित्र निश्चित रूप से हमारी आकाशगंगा की आकृति सम्बंधी हमारी समझ में आमूल-चूल परिवर्तन लाएगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://en.es-static.us/upl/2019/02/WarpedMilkyWay-e1549386858602.jpg
रांगा एक बहुत ही उपयोगी धातु है जिसे संस्कृत में वंग या त्रपुस तथा अंग्रेज़ी में टिन कहा जाता है। लैटिन भाषा में इसे स्टैनम कहा जाता है जिसका अर्थ है सख्त। इसका रासायनिक संकेत Sn, परमाणु संख्या 50 है और परमाणु भार 118.7 है। इसका घनत्व 7.31 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर, द्रवणांक 231.9 डिग्री सेल्सियस, तथा क्वथनांक 2602 डिग्री सेल्सियस है।
यह बताना कठिन है कि मानव ने रांगे का
उपयोग सर्वप्रथम कब तथा कहां प्रारंभ किया। शुरू-शुरू में रांगे का उपयोग सिर्फ
तांबे के साथ मिलाकर एक मिश्र धातु (एलॉय) बनाने के लिए किया जाता था। इस मिश्र
धातु का नाम था कांसा (बेल मेटल)। कांसे के बर्तन तथा औज़ार शुद्ध तांबे से बने
बर्तनों तथा औज़ारों की तुलना में अधिक मज़बूत होते थे। परंतु आज यह किसी को मालूम
नहीं कि उस काल में कांसे के निर्माण हेतु जो टिन उपयोग में लाया जाता था वह
धात्विक अवस्था में होता था अथवा टिनयुक्त अयस्क को ही अवकारक परिस्थितियों में
मिश्रित कर कांसे का निर्माण किया जाता था।
ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि
रांगे का उपयोग सर्वप्रथम पूर्वी देशों (जैसे भारत,
चीन वगैरह) में शुरू
हुआ। भारत में लगभग साढ़े तीन हज़ार वर्ष ईसा पूर्व रांगे को उपयोग में लाए जाने के
प्रमाण मिलते हैं। गुजरात में लोथल नामक स्थान पर कुछ हड़प्पा कालीन पुरातात्विक
अवशेष मिले हैं जिनसे पता चलता है कि वहां मालाओं में उपयोग हेतु धातु के मनके
बनाए जाते थे। इन धातुओं में रांगा भी शामिल था। ये अवशेष लगभग पांच हज़ार वर्ष
पुराने बताए जाते हैं। महाभारत काल में भी अन्य धातुओं के साथ कांसे का उपयोग किया
जाता था।
मौर्य तथा गुप्त काल में भी अन्य धातुओं के
साथ कांसे का काफी अधिक उपयोग किया जाता था। गुप्त काल में कांसे से बर्तन तथा
मूर्तियों के अलावा सिक्कों का भी निर्माण किया जाता था। गुप्त काल में निर्मित
कांसे की मूर्तियां भारत में कई स्थानों पर पुरातात्विक खुदाई के दौरान पाई गई
हैं। बिहार में भागलपुर ज़िले के बटेश्वर नामक पहाड़ी स्थल पर प्राचीन काल के कुछ
पुरातात्विक अवशेष मिले हैं जिनमें कांस्य मूर्तियां भी शामिल हैं। ये मूर्तियां
पाल एवं गुप्त काल की बताई जाती हैं। इन मूर्तियों में शामिल हैं ध्यान तथा भूमि
स्पर्श मुद्रा में गौतम बुद्ध की कांस्य प्रतिमा। इसी काल की कुछ कांस्य प्रतिमाएं
भागलपुर ज़िले में ही एक अन्य स्थान सुल्तानगंज में भी मिली हैं। दूसरी इस्वीं
शताब्दी में भारत के महान आयुर्वेदाचार्य चरक ने वंग भस्म (टिन ऑक्साइड) को औषधि
निर्माण हेतु उपयोगी पाया था। कहा जाता है कि चीन में भी लगभग 1800 ईसा पूर्व
कांस्य उद्योग काफी पनप चुका था।
मिरुा में एक स्थान पर पुरातात्विक खुदाई
से 3700 ईसा पूर्व में निर्मित कांसे की एक छड़ पाई गई है। इसके रासायनिक विश्लेषण
से पता चला है कि इसमें 9.1 प्रतिशत रांगा उपस्थित है। मिरुा में ही 600 ईसा पूर्व
रांगे की चादर का उपयोग किसी व्यक्ति के मृत शरीर को लपेटकर कब्र में दफनाने के
लिए किया गया था।
शुद्ध रांगे से निर्मित जो सबसे पुरानी
वस्तुएं मिली हैं उनमें शामिल हैं अंगूठी तथा तीर्थ यात्रियों द्वारा उपयोग में
लाई जाने वाली बोतलें। ये वस्तुएं मिरुा में अनेक स्थानों पर की गई खुदाई से मिली
हैं। ये चीजें लगभग 1500 वर्ष ईसा पूर्व निर्मित बताई जाती हैं। रांगा मिरुा में
कहीं नहीं पाया जाता। अत: यह निष्कर्ष निकाला गया है कि यहां रांगे का आयात अन्य
देशों से किया जाता था। ऐसा माना जाता है कि भूमध्य सागरीय क्षेत्र के देशों में
रांगा या रांगे से बनी वस्तुएं एशियाई देशों से मंगाई जाती थीं।
प्रारंभिक हिब्रू,
ग्रीक तथा लैटिन
साहित्य में जो ‘टिन’ शब्द व्यवहार में लाया जाता था उसका अर्थ आज से भिन्न था। बाइबल
में वर्णित ‘टिन’ शब्द हिब्रू शब्द ‘बेडिल’ के अर्थ में आया है। बेडिल शब्द का
उपयोग तांबे तथा टिन की मिश्र धातु के लिए किया जाता था। यूनान के महान कवि होमर
ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक इलियाड में कांसे तथा टिन को अलग-अलग धातुओं के रूप में
माना है।
युरोप में कई देशों में रांगे का खनन एवं
व्यापार कई सदियों से चलता रहा है। लगभग 15वीं शताब्दी ईसा पूर्व में टिन के खनन
प्रारंभ किए जाने के संकेत मिले हैं। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि इंग्लैंड में
कॉर्नवाल की खानों से टिन का काफी अधिक खनन किया जाता था। फिर उस टिन को पूर्वी
भूमध्य सागरीय क्षेत्र के देशों में स्थित धातुकर्म केन्द्रों पर पहुंचाया जाता
था। कुछ उपलब्ध साक्ष्यों से पता चलता है कि लगभग 500 ईसा पूर्व तक कॉर्नवाल की
खानों से लगभग 30 लाख टन रांगे का खनन किया गया। उस काल में ब्रिाटेन से प्रति
वर्ष लगभग एक हज़ार टन टिन का निर्यात अन्य देशों को किया जाता था। 1925 इस्वीं में
इंग्लैंड के पुरात्ववेत्ताओं को ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में निर्मित एक दुर्ग की
खुदाई करते समय प्रगलन भट्टियां मिलीं जिनके अंदर टिन-युक्त धातु-मल पड़ा हुआ था।
इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि आज से लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व इंग्लैंड में टिन
का उपयोग काफी विकसित अवस्था में था। जूलियस सीज़र ने अपनी पुस्तक डी बैलो गैलिको
में भी इस बात की चर्चा की है कि इंग्लैंड के कुछ क्षेत्रों में टिन का उत्पादन
किया जाता था।
पेरू के रेड इंडियन (जिन्हें इन्का कहा
जाता है) लोगों द्वारा निर्मित एक पुराने किले में वैज्ञानिकों को शुद्ध टिन मिला
है। उन लोगों ने यह टिन शायद कांसे के निर्माण के लिए रखा होगा। यहां की वस्तुएं
काफी उच्च कोटि की मानी जाती थीं। 16वीं शताब्दी में जब स्पैनिश विजेता कार्टेस
मेक्सिको पहुंचा तो स्थानीय लोगों द्वारा टिन से बने सिक्कों का उपयोग होते देखा।
प्राचीन काल में टिन का उपयोग प्राय: कांसे
के निर्माण के लिए किया जाता था। फिर कांसे से दैनिक उपयोग के सामान (जैसे चाकू, हथियार, बर्तन
तथा आभूषण) बनाए जाते थे। मध्यकाल में कांसे का उपयोग घंटियों के निर्माण के लिए
व्यापक स्तर पर किया जाने लगा। टिन में कुछ विशेष गुण होते हैं। जैसे इसमें जंग
नहीं लगता। यह आघातवर्धनीय है (यानी इसकी चादरें बनाई जा सकती हैं) तथा इसका
द्रवणांक भी कम है। ये सभी गुण मिल कर रांगे को काफी उपयोगी बना देते हैं। सन् 79
में प्लीनी ने बताया था कि टिन तथा लेड की मिश्र धातु को आसानी से पिघलने वाले
सोल्डर के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है। रोमवासी अपने तांबे के बर्तनों पर
टिन की कलई किया करते थे। इंग्लैंड में 17वीं सदी के मध्य के दौरान रांगे की कलई
युक्त इस्पात का निर्माण किया जाने लगा। रांगे में यह विशेषता है कि यह हवा में
रहने पर ऑक्सीजन के संयोग से अपने चारों ओर टिन ऑक्साइड की एक सूक्ष्म परत का
निर्माण कर लेता है। यह परत स्थाई होती है जो पानी,
नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, कार्बन
डाईऑक्साइड तथा अमोनिया आदि से प्रतिक्रिया नहीं करती।
अभी संसार में उत्पादित कुल रांगे का लगभग
आधा भाग टिन प्लेट के निर्माण में खर्च हो जाता है जिसे मुख्यत: डिब्बों के
निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है। यही कारण है कि टिन को डिब्बों की धातु कहा
जाता है।
विभिन्न उपयोगों में टिन के रासायनिक
यौगिकों का उपयोग व्यापक स्तर पर किया जाता है। स्टैनस तथा स्टैनिक क्लोराइड रूई
तथा रेशम को रंगने में रंग को पक्का बनाने का काम करते हैं। चीनी मिट्टी के
बर्तनों तथा कांच में लाली लाने के लिए ‘कारियस पर्पल’ नामक पदार्थ को उपयोग में
लाया जाता है। यह स्टैनस क्लोराइड तथा स्वर्ण क्लोराइड के विलयन से बनाया जाता है।
सुनहरे रंग में किसी वस्तु को रंगने के लिए स्टैनस डाईसल्फाइड का उपयोग किया जाता
है। इसे ‘मोज़ैक स्वर्ण’ भी कहा जाता है।
भूपटल में रांगा सिर्फ 0.004 प्रतिशत
उपस्थित है। यह प्राय: ग्रैनाइट के साथ पाया जाता है। ग्रैनाइट की एक पट्टी दक्षिण
पूर्व एशिया, चीन, मलाया,
इंडोनेशिया तथा
पूर्वी ऑस्ट्रेलिया से होकर गुज़रती है जिसमें रांगे के अयस्क पाए जाते हैं। युरोप
में रांगायुक्त ग्रैनाइट सैक्सोनी, चेकोस्लोवाकिया,
इंग्लैंड, फ्रांस
तथा स्पेन में पाया जाता है। दक्षिणी अमेरिका में रांगायुक्त ग्रैनाइट बोसीनिया
में मिलता है। अफ्रीका में नाइजीरिया तथा कांगो में रांगायुक्त ग्रैनाइट पाया जाता
है। प्राचीन काल से ही टिन का प्रमुख अयस्क कैसीटेराइट रहा है। टिन के उत्पादन में
मलेशिया का योगदान सबसे अधिक है। टिन का उत्पादन करने वाले अन्य प्रमुख देश हैं
रूस, चीन, इंडोनेशिया,
थाइलैंड तथा
ऑस्ट्रेलिया। नीदरलैंड में भी काफी टिन मिलता है।
भारत में टिन खनिजों के उत्खनन के प्रयास
प्रागैतिहासिक काल से ही चलते रहे हैं। भारत में रांगे का प्रमुख उपयोग था कांसे
का निर्माण। उस काल में हमारे देश में रांगे का खनन छिटपुट ढंग से तथा गृह उद्योग
स्तर पर किया जाता था। प्राचीन काल के दौरान भारत के किसी भाग में व्यापक स्तर पर
रांगे के खनन के संकेत नहीं मिलते। मैक्सीलैंड नामक एक भूविज्ञानवेत्ता ने सन्
1849 में पारसनाथ (झारखंड) के निकट पुरगो नामक स्थान पर कैसीटेराइट खनिज का लौह
भट्टी में प्रगलन कुटीर उद्योग स्तर पर होते देखा था। लुइस फर्मोर नामक भूविज्ञानवेत्ता
ने सन् 1906 में बताया कि पुरगो क्षेत्र में कैसीटेराइट ग्रेनुलाइट नामक शैल की एक
पतली परत लगभग 15 सेंटीमीटर मोटी है जिसमें कैसीटेराइट 30 से 50 प्रतिशत तक उपलब्ध
है।
बिहार के गया जिले में धनरास तथा ढकनहवा पहाड़ियों में कैसीटेराइट की प्राप्ति के समाचार कुछ समय पूर्व मिले थे। यहां पर टिन अयस्कयुक्त शैल की परत लगभग चार किलोमीटर लम्बी तथा 0.36 किलोमीटर चौड़ी है। झारखंड के हज़ारीबाग जिले में अनेक स्थानों पर कैसीटेराइट पाया जाता है। राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में सोनियाना नामक स्थान पर कैसीटेराइट पाया जाता है। भीलवाड़ा जिले में परोली नामक स्थान पर पेगमेटाइट नामक शैल में कैसीटेराइट पाया जाता है। कर्नाटक में धारवाड़ जिले के डम्बल नामक स्थान पर भी कैसीटेराइट पाया जाता है। मध्य प्रदेश के बस्तर जिले में गोविन्दपाल, चीतलनार, मुंडवाल तथा जोगपाल नामक स्थानों पर उच्च दर्जे का कैसीटेराइट पाया जाता है जिसमें टिन की मात्रा 55 से 67 प्रतिशत तक है। फिलहाल भारत में टिन का खनन कहीं भी नहीं हो रहा है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : http://scienceviews.com/geology/images/SIA1546.jpg
वैज्ञानिकों ने बताया है कि एक विशाल क्षुद्र ग्रह 14 सितंबर
के दिन पृथ्वी के नज़दीक से गुज़रेगा। गुज़रते समय इसकी रफ्तार 23000 कि.मी. प्रति
घंटा रहेगी। इस क्षुद्रग्रह यानी एस्टीरॉइड का नाम है 2000QW7 और यह दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज
खलीफा से थोड़ा ही छोटा है – इसका व्यास 300-650 मीटर के बीच आंका गया है। यह
जानकारी जेट प्रपल्शन लैबोरेटरी के सेंटर फॉर नीयर अर्थ ऑब्जेक्ट्स ने दी है।
खगोल शास्त्र की भाषा में उन सारे पिंडों
और क्षुद्रग्रहों को नीयर अर्थ ऑब्जेक्ट यानी पृथ्वी निकट पिंड कहा जाता है जो
पृथ्वी से 1.3 खगोलीय इकाई से कम दूरी से गुज़रते हैं। गौरतलब है कि पृथ्वी और
सूर्य के बीच की दूरी को एक खगोलीय इकाई कहते हैं और यह 14.96 करोड़ किलोमीटर है।
यानी कोई भी पिंड यदि पृथ्वी से 19 करोड़ किलोमीटर से कम दूरी पर गुज़रे तो उसे
नज़दीकी पिंड कहा जाएगा। सेंटर फॉर नीयर अर्थ ऑब्जेक्ट के मुताबिक 2000QW7 पृथ्वी से 0.03564 खगोलीय इकाई (53 लाख
कि.मी.) की दूरी से गुज़रेगा जो चांद की हमसे दूरी के मुकाबले लगभग 14 गुना है।
यह क्षुद्रग्रह भी सूर्य के चक्कर काटता है और कई वर्षों में एकाध बार इसका परिक्रमा पथ पृथ्वी की कक्षा को काटता है। पिछली बार ऐसी घटना 1 सितंबर 2000 के दिन हुई थी। 14 सितंबर के बाद 2000QW7 फिर से 19 अक्टूबर 2038 को हमारे पास से गुज़रेगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://static.independent.co.uk/s3fs-public/thumbnails/image/2019/04/17/12/asteroid-earth-moon-nasa.jpg?w968h681
पूर्वी भारत के एक गांव
में 22 जुलाई के दिन शायद एक छोटा-सा उल्कापिंड चावल में खेत में गिरा है। समाचार
एजेंसी सीएनएन के अनुसार, बिहार
के महादेव गांव में चावल के खेत में भरे पानी में लगभग 14 किलोग्राम वज़नी एक
फुटबॉल के आकार की अजीब-सी चट्टान गिरी और खेत में इसकी वजह से गड्ढा बन गया।
फिलहाल इस रहस्यमयी चट्टान को बिहार के एक संग्रहालय में
रखा गया है, लेकिन
जल्द ही इसे बिहार के श्रीकृष्ण विज्ञान केंद्र में स्थानांतरित कर दिया जाएगा,
ताकि विशेषज्ञ यह पता लगा सकें कि यह
वास्तविक उल्कापिंड है या कोई मामूली पत्थर।
उल्कापिंड अंतरिक्ष की चट्टानें हैं जो हमारे वातावरण में
घुसने के बाद पूरी तरह भस्म हो जाने से बचकर पृथ्वी पर गिरती हैं। आम तौर पर इस
तरह के पिंडों में चुंबकीय गुण होते हैं क्योंकि वे अक्सर लौह व निकल धातुओं से
बने होते हैं। बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी एक बयान के अनुसार इस
संभावित उल्कापिंड में चुंबकीय गुण पाए गए हैं।
यूं तो हमारे ग्रह पर प्रतिदिन लगभग 100 टन से अधिक धूल और
रेत के आकार के उल्कापिंडों की बौछार होती है लेकिन बड़े पिंड बहुत कम गिरते हैं।
नासा के अनुसार, पिछले
वर्ष एक कार के आकार का क्षुद्रग्रह एक बड़े आग के गोले के रूप में वायुमंडल में
दाखिल होकर ज़मीन से टकराया था।
हर दो-एक हज़ार साल में, फुटबॉल के मैदान के आकार का उल्कापिंड पृथ्वी से टकराता है और स्थानीय स्तर पर नुकसान पहुंचाता है। हर बीसेक लाख सालों में ही में कोई इतना विशाल उल्कापिंड पृथ्वी से टकराता है जिसमें पूरी मानव सभ्यता को नष्ट करने की क्षमता होती है। (स्रोत फीचर्स)
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एजेंसी
फ्रांस प्रेस के अनुसार 19 जुलाई को चीनी अंतरिक्ष स्टेशन तियांगोंग-2 अपनी कक्षा
छोड़ धरती पर गिर गया। लेकिन पिछली बार के विपरीत,
इस दौरान पूरे समय इस पर चीन के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का
नियंत्रण रहा।
चीनी
राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन (CNSA)
पहले ही यह बता चुका था कि चीन का दूसरा प्रायोगिक अंतरिक्ष स्टेशन तियांगोंग-2
अपनी कक्षा छोड़ने वाला है और पृथ्वी के वायुमंडल में पुन: प्रवेश करने वाला है।
प्रशासन के अनुसार पुन: प्रवेश के दौरान तियांगोंग-2 वायुमंडल में पूरी तरह जल
जाएगा और यदि कुछ बचा तो वह प्रशांत महासागर के पाइंट नेमो नामक इलाके में गिरेगा।
लेकिन यह स्थिति चीन के पहले अंतरिक्ष स्टेशन तियांगोंग-1 से भिन्न है। उसने भी अप्रैल
2018 में अपनी कक्षा छोड़ दी थी और पृथ्वी पर अनियंत्रित तरीके से आ गिरा था।
लेकिन तियांगोंग-1 पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया था। हालांकि संयोग से तियांगोंग-1
भी प्रशांत महासागर के इसी इलाके में गिरा था।
तियांगोंग-2 उत्तरी बॉटलनोज़ व्हेल से थोड़ा बड़ा, 10 मीटर लंबा और 8600 किलोग्राम वज़नी था। इस अंतरिक्ष स्टेशन में 18 मीटर लंबे सौलर पैनल थे जिससे यह अजीब-सी व्हेल मछली की तरह दिखता था।
अंतरिक्ष प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि तियांगोंग-2 ने अपने सारे प्रयोग पूरे कर लिए थे। और इसने अपनी 2 साल की तयशुदा उम्र से एक साल अधिक कार्य किया। स्पेस डॉटकॉम के मुताबिक इस दौरान तियांगोंग-2 ने एक बार (अक्टूबर-नवंबर 2016 में) दो अंतरिक्ष यात्रियों और कई रोबोटिक मिशन की मेज़बानी की थी। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.thesun.co.uk/wp-content/uploads/2018/01/nintchdbpict000378766354.jpg?strip=all&w=700
अभी कुछ समय पहले, 2014 में गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता
लगाया गया और इस वर्ष ब्लैक होल की पहली तस्वीर ली गई। दोनों ही खोजें आइंस्टाइन
के सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत की भविष्यवाणी के प्रभावशाली प्रमाण हैं। ये
दोनों घटनाएं वर्ष 2015 के दोनों ओर घटी हैं जो आइंस्टाइन के युगांतरकारी शोध पत्र
के प्रकाशन का शताब्दी वर्ष था। सौ वर्षों के इस अंतराल में काफी बहसें और चर्चाएं
तो होती रही हैं साथ ही साथ प्रकृति को लेकर इस महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि ने हमें
अचंभित भी किया है।
इस सिद्धांत का पहला भाग, विशिष्ट
सिद्धांत, 1905 में प्रकाशित हुआ था। इसमें उच्च वेगों पर वस्तुओं के
व्यवहार तथा द्रव्यमान और ऊर्जा की आपसी तुल्यता की बात की गई थी।
दूसरा भाग,
सामान्य सापेक्षता, गुरुत्वाकर्षण
पर विचार करता है और ऐसे प्रभावों के बारे में चर्चा करता है जो ब्राहृांड के स्तर
पर नज़र आते हैं। ये वो चीज़ें हैं जिनको हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में नहीं देखते
हैं। लेकिन सामान्य सापेक्षता को असाधारण सटीकता के साथ सत्यापित किया गया है और
यह प्रकृति का एक निर्विवाद हिस्सा है। प्रकृति के नियमों को समझने का काम इसी के
मार्गदर्शन में करना होगा।
इन आविष्कारों के महत्व और विशिष्ट प्रकृति, दोनों
को देखते हुए आइंस्टाइन ने स्वयं उन पाठकों,
जो पेशेवर वैज्ञानिक
नहीं थे, के लिए एक स्पष्ट और सरल,
लेकिन सैद्धांतिक रूप
से गहन विवरण प्रस्तुत करने का काम हाथ में लिया। परिणामस्वरूप 1917 के वसंत में
उन्होंने जर्मन भाषा में एक पुस्तिका का प्रकाशन किया था: ‘रिलेटिविटी: दी स्पेशल
एंड दी जनरल थ्योरी (ए पॉपुलर अकाउंट)’। इसकी शताब्दी के अवसर पर प्रिंसटन
युनिवर्सिटी ने हिब्रू विश्वविद्यालय, यरुशलम के साथ मिलकर 1960 में किए गए इसके
अंग्रेज़ी अनुवाद को फिर से प्रकाशित किया है। इसमें बाद में जोड़े गए परिशिष्ट भी
शामिल किए गए हैं और साथ ही एक रीडिंग कम्पेनियन,
टिप्पणियां और अन्य
अनुवादों पर नोट्स तथा अन्य स्मृतियां भी शामिल की गई हैं।
मूल पुस्तक तो केवल 132 पृष्ठों की है
जिसमें 32 अध्याय हैं। बहुत सारे अध्याय हैं,
नहीं? जी
हां, आइंस्टाइन ने सापेक्षता की अपनी पहली पुस्तक को छोटे-छोटे
हिस्सों में विभाजित किया था। एक अध्याय तो केवल एक पृष्ठ लंबा है। सहजता और
स्पष्टता तथा गणित के कम से कम उपयोग के साथ,
उन्होंने इस सिद्धांत
के मूल विचार को विकसित करने के लिए सिर्फ आवश्यक चीज़ों को ही प्रस्तुत किया है।
जैसा कि वे प्रस्तावना में कहते हैं, “यह पुस्तिका उन पाठकों के लिए है जो एक
सामान्य वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से सिद्धांत में रुचि तो रखते हैं, लेकिन
सैद्धांतिक भौतिकी के गणितीय औज़ारों से परिचित नहीं हैं।”
आइंस्टाइन पहले पारंपरिक विचार का परिचय
देते हैं। उसके अनुसार यदि अवलोकन के दो प्रेक्षण मंच एक-दूसरे के सापेक्ष एकरूप
गति से चल रहे हैं, तब दोनों मंचों की सापेक्ष गतियों को जोड़कर-घटाकर एक-दूसरे
में परिवर्तित किया जा सकता है। कोई भी प्रेक्षक यह नहीं बता सकता है कि वह एक ऐसे
मंच पर है जो ‘स्थिर’ है या एकरूप गति से चलायमान है क्योंकि भौतिकी के नियम एकरूप
सापेक्ष गति में प्रेक्षकों के किसी भी जोड़े के लिए एक जैसे होते हैं। इस
अभिन्नता को आइंस्टाइन ने सापेक्षता का नियम कहा।
सिर्फ प्रकाश की गति एक अपवाद है। प्रकाश
के मामले में होता यह है कि प्रकाश का स्रोत या प्रेक्षण करने वाला उपकरण किसी भी
वेग से चले, प्रकाश का वेग हमेशा 3,00,000 कि.मी. प्रति सेकंड (निर्वात
में) होता है। यह सापेक्षता के उपरोक्त नियम के विरुद्ध है। चूंकि प्रकाश के वेग
के स्थिर होने की बात को एच.ए. लॉरेंट्ज़ ने विद्युत चुंबकत्व के सिद्धांतों के
आधार पर प्रतिपादित किया था, इसलिए लगता था कि इस मामले में सापेक्षता
के नियम को तिलांजलि दे दी जाए, हालांकि इस नियम के विरुद्ध कोई सबूत नहीं
था।
यहीं पर सापेक्षता के विशेष सिद्धांत का
प्रवेश होता है। विशेष सिद्धांत में लॉरेंट्ज़ के काम का उपयोग करते हुए स्थान और
समय की प्रकृति की पुन: व्याख्या की गई है। यह पुन:व्याख्या उक्त विरोधाभास का
समाधान कर देती है – इसके अनुसार एक-दूसरे के सापेक्ष गति कर रहे दोनों मंचों के
लिए प्रकाश का वेग तो समान रहता है, लेकिन गतिशील ताने-बाने के संदर्भ में मापन
किया जाए तो लंबाई और समय के अंतराल ही सिकुड़ या फैल जाते हैं।
इस पुनव्र्याख्या का एक और निष्कर्ष यह है
कि किसी कण की गति की ऊर्जा न केवल उसके स्थिर द्रव्यमान और चाल पर निर्भर करती है, बल्कि
द्रव्यमान और एक ऐसे कारक पर भी निर्भर करती है,
जिसका मान चाल के साथ
बढ़ता है। यह कारक चाल के वर्ग को प्रकाश के वेग के वर्ग से विभाजित करने पर
प्राप्त होता है। इसलिए द्रव्यमान में यह वृद्धि नगण्य रहती है, सिवाय
उस स्थिति के जब वस्तु का वेग बहुत अधिक हो। हालांकि ऊर्जा के इस समीकरण से हमें
किसी स्थिर कण की आंतरिक ऊर्जा का मान मिलता है जो E = mc2 के रूप में मशहूर
है।
सामान्य सिद्धांत
उपरोक्त विचार एकरूप सापेक्ष गति पर चलने
वाले प्लेटफार्मों के बारे में हैं। इसके बाद आइंस्टाइन एक ऐसे मामले पर विचार
करते हैं जहां एक प्लेटफार्म को त्वरण प्रदान किया जाता है यानी उसकी चाल बदलती
जाती है। इस स्थिति में दो मंचों की परस्पर सापेक्ष गति लगातार बदलती रहती है।
त्वरणशील प्लेटफॉर्म पर प्रेक्षक त्वरण की विपरीत दिशा में एक बल का अनुभव करेगा, और
उसे सभी स्वतंत्र वस्तुएं इसी विपरीत दिशा में गिरती हुई प्रतीत होंगी। और इस
प्रेक्षक के पास गुरुत्वाकर्षण बल और त्वरण के कारण लग रहे बल के बीच अंतर जानने
का कोई तरीका नहीं होगा। आइंस्टाइन का मत है कि वास्तव में इनके बीच कोई अंतर है
भी नहीं। इस आधार पर उन्होंने सापेक्षता के नियम को सामान्य रूप से गुरुत्वाकर्षण
क्षेत्र में स्थित मंच अथवा त्वरणशील मंच दोनों पर लागू करने का सुझाव दिया था।
यहां स्थिति यह हो जाती है कि प्रकाश किरण
का मार्ग, जो एक प्लेटफॉर्म पर सरल रेखा में दिखाई देता है, वह
त्वरणशील गति या गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में स्थित मंच से एक वक्र के रूप में दिखाई
देगा। तो इसका मतलब यह होगा कि सापेक्षता का नियम सामान्य रूप से लागू नहीं होता
है? आइंस्टाइन इस सवाल से निपटने के लिए कुछ परिमापों के रूप
में घटनाओं के निर्धारण का एक नया तरीका विकसित करते हैं – जैसे किसी स्थिर बिंदु
से दूरी व दिशा, और समय के माप।
किसी समतल सतह पर किसी बिंदु की स्थिति
बताने का सामान्य तरीका दो लंबवत रेखाओं से उसकी दूरी बताने का है (यह ग्राफ का
तरीका है)। इस तरह दर्शाने के बाद दो बिंदुओं के बीच की दूरी निकाली जा सकती है।
किंतु यदि जिस सतह पर रेखाएं खींची जाएं वह समतल न होते हुए गोलाई लिए हो (जैसे
पृथ्वी) तो बिंदुओं के बीच की दूरी समतल सतह के समान नहीं होगी। गणित का उपयोग किए
बगैर, इस तरह के तर्क का उपयोग करते हुए,
आइंस्टाइन ने एक
गोलाईदार स्थान का विचार विकसित किया जो एक गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की उपस्थिति से
मेल खाता है। इसकी मदद से उन्होंने साबित किया कि गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में
प्रकाश की वक्र मार्ग पर चलती किरण अभी भी उसी चाल से चल रही है!
इस विचार ने ब्राहृांड की एक नई प्रणाली का
मार्ग प्रशस्त किया। यह प्रणाली ब्राहृांड पर लागू होती है, जहां
विशाल द्रव्यमान के पिंड और गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र हैं। यह प्रणाली न्यूटन की उस
प्रणाली से अलग है जो 17वीं शताब्दी से सौर मंडल का वर्णन करने में काफी
प्रभावशाली साबित हुई थी। द्रव्यमान ‘कम’,
यानी तुलनात्मक रूप
से कम हो, तो आइंस्टाइन की प्रणाली न्यूटन प्रणाली का ही रूप ले लेती
है।
इसलिए न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत
में एक सन्निकटन था। यह उस स्थिति में काफी अच्छे परिणाम देती थी जब मापन पर्याप्त
रूप से सटीक नहीं थे। न्यूटन द्वारा प्रतिपादित व्युत्क्रम वर्ग का नियम (जो कहता
है कि दो पिंडों के बीच लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल उनके बीच की दूरी के वर्ग के
व्युत्क्रमानुपाती होता है) भी एक सन्निकटन ही है। आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता
सिद्धांत के आने के बाद तथ्यों की व्याख्या के लिए इस नियम को अलग से कहने की
ज़रूरत नहीं रह जाती क्योंकि कम द्रव्यमान पर वह आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता
सिद्धांत का एक सीमित रूप ही है।
आइंस्टाइन पारंपरिक ब्राहृांड विज्ञान में अन्य विसंगतियों का जि़क्र भी करते हैं, जिन्हें सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत ने सुलझाया है। बुध की कक्षा के अग्रगमन (या पुरस्सरण, प्रेसेशन) की अवधि की गणना करना इस सिद्धांत की एक प्रमुख सफलता रही। न्यूटोनियन यांत्रिकी के तहत, ग्रहों की कक्षाएं दीर्घवृत्ताकार हैं और ये दीर्घवृत्त परिवर्तनशील नहीं हैं। और बुध (सूर्य का सबसे करीब ग्रह) के अलावा शेष सभी ग्रहों के लिए यह बात सही पाई गई थी। बुध के मामले में दीर्घवृत्ताकार कक्षा स्वयं भी घूमती है। यह गति काफी धीमी है, हर सदी में केवल 43 सेकंड (ध्यान दें कि 1 सेकंड डिग्री का 3600वां भाग होता है)। न्यूटोनियन यांत्रिकी इसको समझाने में असमर्थ थी। लेकिन सामान्य सापेक्षता सिद्धांत की मदद से, आइंस्टाइन ने यह दर्शा दिया कि सभी ग्रहों की कक्षाएं घूमती हैं, और बुध के मामले में उन्होंने एक सदी में 43 सेकंड के अग्रगमन की गणना भी की! (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://images-eu.ssl-images-amazon.com/images/I/41FGpIFB1BL.jpg
दुनिया के पहले अंतरिक्ष यात्री यूरी गागरिन थे, उन्होंने 12 अप्रैल 1961 को पृथ्वी का एक चक्कर पूरा किया था। इस से भड़ककर यू.एस. ने ‘प्रोजेक्ट अपोलो’ लॉन्च किया था जिसके तहत पहली बार मनुष्य चांद पर उतरा था। चंद्रमा से वापस धरती पर आने के बाद आर्मस्ट्रॉन्ग ने कहा था कि “मनुष्य का एक छोटा कदम मानवजाति के लिए बड़ी छलांग है।” उसके बाद से अब तक 37 देशों के लगभग 536 लोग अंतरिक्ष की यात्रा कर चुके हैं। और आज यदि आपके पास पर्याप्त पैसा और जज़्बा है तो दुनिया की कम-से-कम चार कंपनियां आपको अंतरिक्ष की सैर करवाने की पेशकश कर रही हैं।
लेकिन अंतरिक्ष यात्रा मानव शरीर पर क्या प्रभाव डालती है- इस दौरान शरीर के रसायन शास्त्र, शरीर क्रियाओं, जीव विज्ञान और उससे जुड़ी चिकित्सीय परिस्थितियां कैसे प्रभावित होती हैं। मसलन, मंगल से पृथ्वी की दूरी औसतन 5 करोड़ 70 लाख किलोमीटर है और वहां पहुंचने में लगभग 300 दिन लगते है। तो इस एक साल की यात्रा के दौरान शरीर में क्या-क्या बदलाव होंगे? इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए नासा ने अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर में होने वाले परिवर्तनों को जानने के लिए एक प्रयोग किया था जिसमें एक अंतरिक्ष यात्री को पृथ्वी से 400 किलोमीटर दूर स्थित इंटनेशनल स्पेस स्टेशन (आइएसए) में रखा गया।
इस अध्ययन में अंतरिक्ष यात्री स्कॉट केली को एक साल तक अंतरिक्ष स्टेशन में रखा गया और इस दौरान उनकी कई जीव वैज्ञानिक पैमानों पर जांच की गई। अंतरिक्ष यात्रा के कारण होने वाले प्रभावों की पुष्टि के लिए कंट्रोल के तौर पर स्कॉट के आइडेंटिकल जुड़वां भाई मार्क केली पृथ्वी पर ही रुके थे। इस दौरान मार्क की भी उन्हीं पैमानों पर जांच की गई। इस अध्ययन में कंट्रोल रखना एक बेहतरीन योजना है, क्योंकि स्कॉट में आए बदलाव अंतरिक्ष यात्रा का ही प्रभाव है इसकी पुष्टि मार्क के साथ तुलना करके की जा सकती है।
अंतरिक्ष के कौन से कारक शरीर को प्रभावित करते हैं। शरीर को प्रभावित करने वाले कारकों में से एक कारक है अंतरिक्ष का शून्य गुरुत्वाकर्षण या माइक्रो ग्रेविटी। अंतरिक्ष में शून्य गुरुत्वाकर्षण के कारण भारहीनता का एहसास होता है, जो शरीर को प्रभावित करता है। पृथ्वी पर हमें सीधा या तनकर खड़े होने में गुरुत्वाकर्षण मदद करता है। खड़े होने या चलने की स्थिति में हमारे शरीर में रक्त या अन्य तरल का प्रवाह नीचे की ओर होता है (शरीर में मौजूद पंप और वाल्व, इस नैसर्गिक प्रवाह के विपरीत, इन तरल पदार्थों का पूरे शरीर में संचार करते हैं)। अंतरिक्ष में शून्य गुरुत्वाकर्षण के कारण शरीर का तरल या रक्त संचार प्रभावित होता है। डॉ. लॉबरिच और डॉ. जेग्गो साइंस पत्रिका में प्रकाशित अपने पेपर में बताते हैं कि पृथ्वी पर जीवन ने पृथ्वी की सतह पर लगने वाले गुरुत्वाकर्षण के अनुरूप आकार लिया है, और लगभग सभी शारीरिक क्रियाएं इसके अनुकूल ढली हैं। तो शून्य गुरुत्वाकर्षण या माइक्रो ग्रेविटी उन्हें कैसे प्रभावित करेगी।
अंतरिक्ष में शरीर को प्रभावित करने वाला दूसरा कारक है आयनीकारक विकिरण से संपर्क। आयनीकारक विकिरण ब्राहृांडीय किरणों तथा सौर किरणों जैसे रुाोत से निकलती हैं। यह विकिरण अंतरिक्ष यात्रियों पर प्रभाव डालता है। पृथ्वी पर मौजूद वायुमंडल और पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र इस विकिरण से हमारी सुरक्षा करता है। यानी अध्ययन के दौरान अंतरिक्ष स्टेशन निवासी स्कॉट पृथ्वी पर रुके मार्क की तुलना में आयनीकारक किरणों के संपर्क में अधिक आए थे।
जुड़वां भाइयों के इस अध्ययन में उनके शरीर में हुए रसायनिक, भौतिक और जैव-रासायनिक बदलावों की विस्तारपूर्वक तुलना फ्रेंसिन गेरेट, बैकलमेन और उनके साथियों द्वारा की गई। उन्होंने अंतरिक्ष यात्रा से पहले, यात्रा के दौरान, यात्रा से वापसी के तुरंत और 6 महीने बाद स्कॉट में संज्ञान सम्बंधी, शारीरिक, जैव-रासायनिक परिवर्तनों, सूक्ष्मजीव विज्ञान और जीन के व्यवहार और टेलोमेयर (क्रोमोसोम के सिरों वाले खंड) का अध्ययन किया। साथ ही साथ यही अध्ययन पृथ्वी पर रुके मार्क के साथ भी किए गए। उनका यह अध्ययन 25 महीने तक चला।
अध्ययन के नतीजे क्या रहे? अध्ययन में उन्होंने पाया कि अंतरिक्ष यात्रा के दौरान शरीर की कुछ जैविक प्रक्रियाएं जैसे प्रतिरक्षा प्रणाली (टी-कोशिकाएं), शरीर का द्रव्यमान, आंत में मौजूद सूक्ष्मजीव वगैरह कम प्रभावित हुए थे। कुछ अन्य प्रक्रियाएं जैसे रक्त प्रवाह मध्यम स्तर तक प्रभावित हुए थे। लेकिन अंतरिक्ष यात्रा के दौरान टेलोमेयर गंभीर रूप से प्रभावित हुए थे; स्कॉट के टेलोमेयर छोटे हो गए थे। इससे लगता है कि आयनीकारक किरणों ने स्कॉट को प्रभावित किया था। शून्य गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के कारण रक्त और ऊतकों का तरल ऊपरी हिस्सों में पहुंच गया था, कैरोटिड (गर्दन में मौजूद धमनी) की दीवार मोटी हो गई थी जिसके परिणाम-स्वरूप ह्मदय और मस्तिष्क की रक्त वाहिनियों में बदलाव हुए थे। साथ ही स्कॉट में रेटिना के इर्द-गिर्द रक्त प्रवाह और कोरोइड का मोटा होना देखा गया था, जिसके कारण नज़र हल्की धुंधली पड़ गई थी।
वापसी पर सामान्य स्थिति
वैज्ञानिक अंतरिक्ष यात्रा से वापसी के बाद भी स्कॉट की जांच करते रहे थे। उन्होंने पाया कि स्कॉट में जो बदलाव अंतरिक्ष यात्रा के दौरान आए थे, पृथ्वी पर लौटने के बाद वे सामान्य स्थिति में लौट आए थे। हमें इस तरह के और भी अध्ययनों की ज़रूरत है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि लंबी अंतरिक्ष यात्रा जैविक और शारीरिक रूप से किस तरह प्रभावित करती है क्योंकि जितनी लंबी अंतरिक्ष यात्रा होगी प्रभाव भी उतना अधिक होगा। इसके अलावा अंतरिक्ष यात्रा से वापसी के बाद सामान्य अवस्था में लौटने में भी अधिक वक्त लगेगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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शुक्र ग्रह (जिसे कई बार शुक्र तारा भी कह देते हैं) अपनी धुरी पर बहुत धीमे-धीमे घूमता है। पृथ्वी जितने समय में अपनी धुरी पर 243 बार घूम जाती है, उतने समय में शुक्र मात्र एक चक्कर पूरा कर पाता है। यानी पृथ्वी के 243 दिन शुक्र के एक दिन के बराबर होते हैं। धुरी पर चक्कर लगाने को घूर्णन कहते हैं। पता यह चला है कि हाल के अवलोकनों में घूर्णन के इस समय में वृद्धि हुई है। पृथ्वी के बारे में प्रमाण हैं कि उसकी घूर्णन गति बदलती तो है मगर सहस्राब्दियों में बदलती है। लेकिन शुक्र का दिन पिछले मात्र 16 सालों में 6.5 मिनट लंबा हो गया है।
लॉस एंजेल्स स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के थॉमस नवारो, जेराल्ड श्यूबर्ट और सेबेस्शियन लेबोनिस तथा पेरिस के सोर्बोन ने नेचर जियोसाइन्स पत्रिका में शुक्र ग्रह के वातावरण की अपनी अनुकृति का विवरण प्रस्तुत किया है। इससे पता चल सकता है कि शुक्र के घने वायुमंडल में गड़बड़ी उसके घूर्णन को प्रभावित करेगी। इस अनुकृति में एक सौर दिवस की लंबाई में 2 मिनट तक की घट-बढ़ की गुंजाइश है। जो अनुकृति बनाई गई है वह एक असाधारण संरचना के प्रस्तुतीकरण के लिए है। यह एक ग्रह के आकार की रचना है जो एक वायुमंडलीय तरंग भी हो सकती है। यह शुक्र के ऊपरी वायुमंडल में देखी गई है। शोध पत्र के मुताबिक यह तरंग पिछले चालीस वर्षों में शुक्र के दिन की लंबाई में देखे गए उतार-चढ़ाव की व्याख्या कर सकती है।
लट्टू के समान घूमती वस्तुएं अपनी आंतरिक रचना में बदलाव के ज़रिए अपनी घूर्णन गति को बदल सकती हैं। इसके लिए किसी बाहरी वस्तु से संपर्क की ज़रूरत नहीं होती। दूसरी ओर, सीधी रेखा में गतिमान कोई वस्तु चलती ही रहेगी, जब तक कि उसे रोका या धीमा न किया जाए। किंतु एक बार वह धीमी हो जाए, तो तब तक वापिस गति नहीं पकड़ेगी जब तक कि उसे ठेला न जाए। घूर्णन करती वस्तु के साथ ऐसा नहीं है। यदि चक्कर मारता कोई स्केटर या कलाबाज़ अपनी भुजाएं फैला दे, तो उसकी घूर्णन गति धीमी पड़ जाएगी। और यदि वह अपनी भुजाओं को वापिस समेट ले, तो गति बढ़ जाएगी। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि घूर्णन करती वस्तु के उन हिस्सों में घूर्णन ऊर्जा ज़्यादा संग्रहित होती है जो अक्ष से ज़्यादा दूरी पर हैं। सीधी रेखा में चल रही वस्तु के साथ ऐसा नहीं होता। ऐसे मामलों में वस्तु के सारे हिस्से अपने-अपने द्रव्यमान के अनुसार ऊर्जा का संग्रह करते हैं।
तारों और ग्रहों जैसे पिंडों की शुरुआत गैस और धूल के विशाल बादलों के रूप में हुई थी। फिर ये गुरुत्वाकर्षण के कारण धीरे-धीरे संघनित हुए। जो शुरुआती हल्का-सा घूर्णन चल रहा था वह तब कई गुना बढ़ गया जब पिंड के दूरस्थ हिस्से अक्ष के समीप आते गए। जब किसी तारे या ग्रह का अंतिम आकार व बनावट स्थापित हो जाते हैं तब एक अंतिम घूर्णन गति होती है। आम तौर पर यह स्थिर बनी रहती है।
पृथ्वी के मामले में वैसे तो आकार और डील-डौल कमोबेश स्थिर रहे हैं किंतु लाखों सालों में थोड़े-बहुत परिवर्तन भी हुए हैं। घूर्णन की वजह से ही पिंड पर कुछ बल लगते हैं जो उसकी आकृति को बदलते हैं। चूंकि भूमध्य वाला हिस्सा ध्रुवों की अपेक्षा अधिक तेज़ी से घूमता है, इसलिए भूमध्य का पदार्थ थोड़ा बाहर की ओर फेंका जाता है बनिस्बत ध्रुवों के और इस वजह से मध्य में पृथ्वी थोड़ी फूल गई है और ध्रुवों पर चपटी हो गई है। इसकी वजह से घूर्णन की गति धीमी हो जाती है, जब तक कि मध्य भाग का विस्तार स्थिर नहीं हो जाता। हिम युग के दौरान समुद्रों का पानी ध्रुवों के आसपास बर्फ के रूप में संग्रहित हो जाता है। बर्फ का वज़न दबाव डालता है जिसकी वजह से भूमध्य क्षेत्र और फूल जाता है और घूर्णन धीमा पड़ जाता है। फिर जब धरती गर्म होती है और बर्फ पिघलता है, तो दबाव शिथिल पड़ जाता है, तोंद घट जाती है और घूर्णन गति बढ़ जाती है।
समुद्री धाराएं और हवाएं भी किसी ठोस पिंड के घूर्णन को प्रभावित कर सकती हैं। जब धाराएं और हवाएं ठोस पिंड की गति के विपरीत दिशा में आती हैं तो ठोस पिंड के घूर्णन की रफ्तार बदलना ही होती है ताकि घूर्णन की कुल ऊर्जा अपरिवर्तित रहे। वैसे पृथ्वी के संदर्भ में समुद्रों और वायुमंडल का वज़न शेष धरती के मुकाबले बहुत कम हैं, जिसके चलते यह असर नज़र नहीं आता। चांद और पृथ्वी के बीच लगने वाला ज्वारीय असर भी घूर्णन गति में बहुत कम परिवर्तन कर पाता है। आंकड़ों में कहें तो यह असर प्रति शताब्दी में एक दिन में 2.3 मिलीसेकंड के बराबर होता है।
शुक्र का कोई चांद तो है नहीं, इसलिए ज्वारीय असर की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। लेकिन वहां वायुमंडल का असर उल्लेखनीय हो जाता है। शुक्र का वायुमंडल कार्बन डाईऑक्साइड से भरा है। थोड़ी ऊंचाई पर गंधकाम्ल है। शुक्र के वायुमंडल का दबाव पृथ्वी के वायुमंडल की अपेक्षा 92 गुना अधिक है और वज़न 93 गुना अधिक है। इसमें हम 20 प्रतिशत और जोड़ सकते हैं क्योंकि शुक्र का वज़न पृथ्वी के वज़न का 80 प्रतिशत है। इसके अलावा, शुक्र का वायुमंडल अत्यंत ऊर्जावान है। यह वायुमंडल 4 पृथ्वी दिवसों में पूरे ग्रह का चक्कर काट लेता है जबकि शुक्र को एक अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करने में 243 पृथ्वी-दिवस लगते हैं। लिहाज़ा, शुक्र पर चक्कर काटते वायुमंडल का असर पृथ्वी की तरह नगण्य नहीं है।
शुक्र के घूर्णन का निश्चित माप वह माना गया जो नासा के मेजीलान मिशन द्वारा किया गया था। यह था प्रति घूर्णन 242.0185ल्0.0001 पृथ्वी दिवस। युरोपीय अंतरिक्ष संस्था के मिशन वीनस एक्सप्रेस ने 2006 में पाया कि शुक्र पर कुछ भौगोलिक संरचनाओं की स्थिति की गणना और वास्तविक स्थिति में 19.9 किलोमीटर की त्रुटि है। इसका मतलब है कि 16 साल पहले किए गए आखरी मापन के बाद शुक्र का घूर्णन 6.5 मिनट धीमा हुआ है।
2015 से शुरू करके जापान के वीनस ऑर्बाइटर आकात्सुकी शुक्र के वायुमंडल की विस्तृत तस्वीरें भेजता रहा है। यह देखा गया था कि उच्च गति की हवाएं छोटे आकार की रचनाओं को धीमा करती हैं, वहीं ग्रह के पैमाने की रचनाएं मुख्य हवाओं की अपेक्षा धीमी या तेज़ चलती हैं। यह सोचा गया था कि यह वायुमंडल में विशाल तरंगों की द्योतक हैं। आकात्सुकी ने दर्शाया था कि शुक्र के ऊपरी वायुमंडल में एक धनुषाकार रचना है जो उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव के बीच 10,000 कि.मी. में फैली है। कई दिनों के अवलोकन के दौरान इस रचना की स्थिति स्थिर रही जबकि ग्रह की सतह अपनी गति से घूमती रही। वर्तमान शोध पत्र में कहा गया है कि शुक्र के चार दिवसों तक ग्रह के सूर्य की ओर वाले हिस्से पर दोपहर के समय वायुमंडल में बड़े आकार की एक रचना बनी रही थी।
थॉमस नवारो और साथियों ने शुक्र पर संभावित विभिन्न परिस्थितियों की कंप्यूटर अनुकृति तैयार की। ये परिस्थितियां ज्ञात मापदंडों और वर्तमान रचना के साथ मेल खाती थीं। अनुकृति विश्लेषण के आधार पर उन्हें लगता है कि जो कुछ देखा गया है वह शुक्र की सतह की संरचना से मेल खाता है जो वायुमंडलीय तरंगों को जन्म देती है। यहां वायुमंडल का वज़न किसी भी अंसतुलन को बहाल करने की कोशिश करता है। इन तरंगों को ‘गुरुत्व तरंगें’ कहते हैं और ये पृथ्वी के वायुमंडल में भी पैदा होती हैं। ये तरंगें तब पैदा होती है जब वायुमंडल की निचली परतों (जो ऊंचाई के साथ ठंडी होती जाती हैं) से ऊपरी परतों को ऊर्जा का स्थानांतरण होता है। इनके बीच एक मध्यवर्ती परत होती है।
उच्च गति से घूमते वायुमंडल और धीमी गति से घूमते ठोस पिंड के बीच अंतरक्रिया का परिणाम यह होता है कि घूर्णन गति प्रभावित होती है। लिहाज़ा, ग्रह की घूर्णन गति में किसी बैले नर्तकी या कलाबाज़ की तरह उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। देखा जाए तो 243 दिनों में 6.5 मिनट की कमी कोई बड़ी बात नहीं है, मगर बड़ी बात यह है कि यह कमी मात्र 16 सालों की छोटी-सी अवधि में हुई है। यह भी संभव है कि इन्हीं वजहों से शुक्र की घूर्णन गति सौर मंडल के शेष ग्रहों की अपेक्षा सबसे धीमी है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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