इस वर्ष के इगनोबेल हकदार

प्रतिका गुप्ता

नोबेल पुरस्कार (nobel prize) से तो सभी वाकिफ हैं। यह विज्ञान के क्षेत्र में संजीदगी से किए गए अहम शोधकार्य के लिए दिया जाता है, जिसमें सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ-साथ वैज्ञानिकों को गोल्ड मेडल और लगभग 10 लाख डॉलर की राशि भी मिलती है। यह भी सर्वमान्य है कि डीएनए की संरचना का खुलासा करना शोध का एक महत्वपूर्ण विषय है। लेकिन क्या आपको लगता है कि नाक छिनकना भी शोध का विषय हो सकता है?

नोबेल पुरस्कार के विपरीत, इगनोबेल पुरस्कार उतनी ही संजीदगी से किए गए ऐसे शोधकार्यों के लिए दिए जाते हैं जो पहले पल में तो लोगों को गुदगुदाते हैं लेकिन दूसरे ही पल लोगों को विचार करने पर मजबूर करते हैं। वास्तव में, इगनोबेल (Ig Nobel) पुरस्कार ‘ignoble’ शब्द पर तंज है जिसका मतलब होता है अप्रतिष्ठित। लेकिन, इगनोबेल पुरस्कार पाने वाले को भी काफी प्रतिष्ठा मिलती है, भले ही नकद राशि न मिलती हो। ये पुरस्कार इस बात को रेखांकित करते हैं कि महज भारी-भरकम और संजीदा लगने वाले विषय ही अहम नहीं होते और सिर्फ उन्हीं पर संजीदगी से शोधकार्य नहीं किए जाते, बल्कि हमारे मन में उठने वाले छोटे-छोटे सवाल भी उतने ही अहम होते हैं और उनके जवाब उतनी ही संजीदगी (scholarly diligence) से खोजना होते हैं।

इस वर्ष भी एनल्स ऑफ इंप्रॉबेबल जर्नल ने 10 क्षेत्रों में इन शोधकार्यों को इगनोबेल के सम्मान से नवाज़ा है। खुद देखिए कि बात कहां से निकलकर कहां तक पहुंच सकती है।

1. बायोमैकेनिक्स: चुंबन की वैज्ञानिक परिभाषा

इस वर्ष बायोमैकेनिक्स का इगनोबेल पुरस्कार मैटिल्डा ब्रिंडल, कैथरीन टैलबोट और स्टुअर्ट वेस्ट को चुंबन की एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा (kissing definition) देने के लिए मिला है। इस परिभाषा के अनुसार “चुंबन एक ऐसी गैर-आक्रामक क्रिया है जिसमें एक ही प्रजाति के जीवों के बीच मुंह-से-मुंह (या होंठ-से-होंठ) का सीधा संपर्क हो, होंठो/मुंह में कुछ हलचल हो और यह संपर्क या हलचल भोजन के खाने-खिलाने के लिए न हो।” न सिर्फ मनुष्यों बल्कि कई प्रजातियों में इस तरह का व्यवहार देखा गया है जिसमें दो जीवों के बीच मुंह से मुंह का संपर्क होता है; चुंबन को सटीक रूप से परिभाषित करने से इसे विभिन्न प्रजातियों के बीच बेहतर समझा जा सकेगा और इसके उद्भव और कारणों के बारे में सोचा जा सकेगा। शोधकर्ताओं की उक्त परिभाषा के अनुसार अब तक ज्ञात जीवों में ध्रुवीय भालू, कुछ पक्षी, चींटियां और कुछ अन्य प्राइमेट भी चुंबन करते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाने की कोशिश की कि यह व्यवहार कब विकसित हुआ। उन्होंने पाया है कि यह व्यवहार लगभग 2.5 करोड़ साल पहले वानरों (एप्स) के पूर्वजों से आया है। अब समझना बाकी है कि इस व्यवहार की भूमिका क्या है।

2. अर्थशास्त्र: अमीरी और अनैतिक व्यवहार 

अर्थशास्त्र का इगनोबेल पुरस्कार पॉल पिफ और उनके साथियों को उस शोध के लिए मिला है जिसमें उन्होंने सामाजिक-आर्थिक स्थिति और अनैतिक व्यवहार के बीच सम्बंध की पड़ताल की है। उन्होंने पाया कि गरीबों की तुलना में अमीर लोग (wealthy people) अधिक अनैतिक व्यवहार करते हैं। ये निष्कर्ष उनके द्वारा किए गए सात अध्ययनों के आधार पर दिए गए हैं। पहले दो अध्ययनों में उन्होंने इन दोनों वर्गों के लोगों का व्यवहार चौराहे पर वाहन चलाते समय देखा; उन्होंने पाया कि अमीर लोग चौराहे पर अपनी बारी आने के पहले ही दूसरे वाहनों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। तीसरे अध्ययन में प्रतिभागियों को कुछ परिस्थितियां देकर उन पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई – अमीर लोगों ने अधिक अनैतिक निर्णय लिए। चौथे अध्ययन में सिर्फ और सिर्फ बच्चों के लिए रखी कैंडी को अमीरों की भूमिका निभा रहे प्रतिभागियों ने अधिक लिया। पांचवे अध्ययन में बातचीत के दौरान अपनी बात मनवाने के लिए झूठ बोलने की प्रवृत्ति अमीरों में अधिक दिखी। छठवे अध्ययन में खेल जीतने के लिए चीटिंग करने का व्यवहार अमीरों में अधिक दिखा। और सातवें अध्ययन में कार्यस्थल पर अमीर अधिक अनैतिक व्यवहार (unethical behaviour) करते पाए गए।

3. रसायन विज्ञान: प्रोटीन से भरपूर कॉकरोच का दूध

रसायन विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध के लिए मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने बताया कि Diploptera punctata नामक कॉकरोच का दूध (cockroch milk) गाय के दूध से भी तीन गुना अधिक पौष्टिक है। यह कॉकरोच आम घरों में मिलने वाले कॉकरोच से अलग है और अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देता है। दरअसल, मादा कॉकरोच अपने शरीर में विकसित हो रहे भ्रूणों को एक विशेष पोषक तरल से भोजन देती है। भ्रूण जब इस तरल को ग्रहण करते हैं तो उनकी आंत में यह प्रोटीन, वसा और शर्करा से भरपूर छोटे-छोटे क्रिस्टलों के रूप में जमा हो जाता है। ये क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलकर बढ़ते भ्रूण को पोषण देते हैं।

2016 में भारतीय और फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी की मदद से इन क्रिस्टलों की संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि यह तरल अत्यधिक पौष्टिक है: यह गाय के दूध की तुलना में तीन गुना से अधिक पोषण और ऊर्जा दे सकता है। घबराइए नहीं, वैज्ञानिक सीधे इस दूध उपयोग मनुष्य के इस्तेमाल के लिए नहीं सोच रहे हैं, बल्कि इसके घटकों के आधार पर पोषक पेय (nutritious drink) तैयार करने का विचार है।

4. चिकित्सा: नाक कैसे छिनकें

चिकित्सा का इगनोबल पुरस्कार जापानी चिकित्सक टोकुजी उन्नो के 1977 के उस अध्ययन के लिए मिला है जिसमें उन्होंने बताया था कि नाक कैसे साफ करें। रोज़ाना नाक की सफाई श्वासनली और फेफड़ों के संक्रमण के जोखिम को कम करती है, और जब सर्दी-ज़ुकाम होता है तो नाक तो छिनकनी पड़ती है। उन्नो यही जानना चाह रहे थे कि किस तरह नाक की सफाई (nostril hygiene) स्वस्थ रहने में मदद कर सकती है। इसके लिए उन्होंने देखा कि कितनी तेज़ी और ताकत से हवा बाहर करने पर, एक बार में एक नथुने से छिनकने पर, या दोनों नथुनों से छिनकने पर नाक की सफाई में क्या अंतर पड़ता है। उन्होंने यह सब 14 से 48 वर्ष की आयु के 15 लोगों पर करके देखा। नाक से निकलने वाली हवा की गति मापने के लिए दो न्यूमोटैकोमीटर (pnuemotachometer) लगाए गए और नाक से निकली हवा की मात्रा तथा समय भी दर्ज किया गया। साथ ही कान की बाहरी नलिका में दबाव परिवर्तन को एक कैथेटर और संवेदनशील प्रेशर ट्रांसड्यूसर से मापा गया। उन्होंने पाया कि दोनों नथुने खुले रखते हुए नाक साफ करने की बजाय एक बार में एक नथुने को खुला रखकर नाफ साफ करने से ज़्यादा अच्छे से सफाई होती है।

5. जीव विज्ञान: सांप कब काट सकता है

यह तो कहा ही जाता है कि सांप तभी काटता है जब आपका पैर उस पर पड़ जाए। जीव विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन के लिए दिया गया जिसमें शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि विषैले सांप पर पांव कहां पड़ने पर उसके द्वारा काटने की संभावना अधिक होती है। उन्होंने ब्राज़ील के विषैले सांप पिट वाइपर (pit viper snake) के व्यवहार का अध्ययन किया और उसकी लंबाई, लिंग, उम्र, तापमान, दिन का समय तथा मनुष्य द्वारा दी गई उत्तेजनाओं जैसे कारकों को देखा। प्रयोगों में सांपों के साथ नियंत्रित मानव-संपर्क की परिस्थितियां बनाई गईं और यह देखा गया कि कहां पांव पड़ने पर सांप रक्षा के लिए काटता (defensive snakebite) है। पाया गया कि सिर पर पांव पड़ने पर काटने की संभावना लगभग 44 प्रतिशत थी, शरीर के बीच के हिस्से पर 20 प्रतिशत और पूंछ पर 11 प्रतिशत थी। छोटे सांपों, विशेषकर नवजातों में काटने की प्रवृत्ति भी अधिक पाई गई। हालांकि पशु-नैतिकता सरोकारों के चलते इस अध्ययन को साइंटिफिक रिपोर्ट्स ने फरवरी 2025 में वापस ले लिया।

6. भौतिकी: छींटे-मुक्त युरिनल 

भौतिकी का इगनोबेल पुरस्कार ऐसे युरिनल डिज़ाइन (splash-free urinal design) करने के लिए दिया है जिससे आसपास फैलने वाले छींटे और गंदगी न के बराबर फैलें। शोधकर्ताओं ने ऐसा अनुभव किया था कि कितनी भी सावधानी से युरिनल में पेशाब की जाए, आसपास के फर्श पर छींटे फैल ही जाते हैं और सार्वजनिक शौचालयों की सफाई का मुद्दा बना रहता है। यदि सफाईकर्मी हर व्यक्ति के जाने के बाद सफाई करते रहें तो यह उनके लिए भी थकाऊ होता है, और सफाई बरकरार रखने में संसाधन, पैसा और ऊर्जा भी लगती ही है। इसी के समाधान में उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि छींटे छिटककर बाहर आते ही क्यों हैं और इस आधार पर नए युरिनल डिज़ाइन पेश किए; इन डिज़ाइन का नाम उन्होंने नॉटी-लू (Nauti-Loo), कॉर्नुकोपिया (Cornucopeea) और यूरिन-नो (Urine-no) नाम दिए हैं। इसके लिए उन्होंने किसी तरल के सतह से टकराने के कोण और छींटों के उचकने के बीच के सम्बंध का गणितीय मॉडल बनाया और पाया कि किसी सतह पर किसी तरल की जितनी सीधी धार (90 डिग्री के कोण से) पड़ेगी छींटे उतने ज़्यादा छिटकते हैं, सतह पर धार यदि कम कोण (30 डिग्री से कम) से टकराए तो छींटे कम उछलते हैं। इसके आधार पर उन्होंने तिरछी सतहों वाले तीन युरिनल डिज़ाइन तैयार किए और उनका परीक्षण किया। नई डिज़ाइनों से प्रचलित युरिनल की तुलना महज़ 1.4 प्रतिशत छींटे बाहर आए।

7. तकनीक: मच्छर की सूंडी से 3-डी प्रिंटिंग

तकनीक का इगनोबेल पुरस्कार वैज्ञानिकों की उस कोशिश को मिला जिसमें मरी हुई मादा मच्छर की सूंड को 3-डी प्रिंटर की बेहद सूक्ष्म नोज़ल के रूप में इस्तेमाल किया गया। मच्छर की सूंड बहुत पतली होने के साथ काफी मज़बूत भी होती है। कई कीटों के सूंड (मुखांगों) की संरचना और यांत्रिक गुणों की तुलना करने पर मादा मच्छर की सूंड सबसे उपयुक्त लगी। उन्होंने प्रयोगशाला में पाले गए मृत मच्छरों से सूंड अलग करके डिस्पेंसिंग नोज़ल से जोड़ा और डायरेक्ट-इंक-राइटिंग 3-डी प्रिंटर (direct-ink-writing 3-D printer) में लगाया और अलग-अलग गति संयोजन से प्रिंट करके देखा। उन्होंने पाया कि इस नोज़ल व्यवस्था से लगभग 20 माइक्रोमीटर पतली लकीरें प्रिंट की जा सकती हैं, जो आम व्यावसायिक नोज़लों की तुलना में काफी पतली लकीरें हैं।

8. घ्राण विज्ञान: संतान की गंध 

घ्राण विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन को मिला है जिसमें शोधकर्ताओं ने यह जांचा कि माता-पिता अपनी संतानों के शरीर की गंध को अलग-अलग उम्र में किस तरह महसूस करते हैं। पोलैंड में किए गए अध्ययन में 235 माता-पिता ने कुल 367 संतानों के शरीर की गंध की सुखदता (pleasing body odor) का आकलन किया। संतानों की उम्र एक महीने से 35 वर्ष तक थी। प्रतिभागियों ने अपनी संतानों की गंध को 0 से 20 के पैमाने पर बेहद बुरी से बहुत अच्छी तक अंक दिए। शोधकर्ताओं ने संतानों की उम्र, माता-पिता और संतान का लिंग, साथ बिताया समय तथा माता-पिता और-संतान के बीच सम्बंध जैसे कारकों को भी विश्लेषण में शामिल किया। पाया गया कि संतान की उम्र बढ़ने के साथ उसके शरीर की गंध को सुखद मानने की प्रवृत्ति घटती गई। शिशुओं की गंध को 93.7 प्रतिशत माता-पिता ने सुखद या बहुत सुखद बताया, जबकि किशोरावस्था से बड़ी संतानों के लिए यह आंकड़ा 75.2 प्रतिशत था। शोधकर्ताओं का कहना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच सम्बंधों में गंध की भूमिका हो सकती है।

9. शांति: दुश्मन का दुश्मन दोस्त क्यों

शांति का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध को मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने दोस्ती और दुश्मनी के बीच एक दिलचस्प सामाजिक मनोविज्ञान का अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं ने छह अध्ययनों में कुल 1183 प्रतिभागियों से पूछा कि वे अपने आदर्श दोस्त (ideal friend) में क्या गुण चाहते हैं। प्रतिभागी अमेरिका और भारत के छात्र तथा सामान्य समुदाय के थे। उनसे यह भी पूछा गया कि उनका दोस्त उनके साथ, किसी अजनबी के साथ या उनके दुश्मन के साथ कैसा व्यवहार करे तो उन्हें ठीक लगेगा। सामान्य स्थिति में लोगों ने दयालु और भरोसेमंद दोस्त को अधिक पसंद किया। लेकिन जब सवाल किसी दुश्मन के प्रति व्यवहार का था, तो तस्वीर बदल गई। कुछ प्रतिभागियों ने ऐसे दोस्त को पसंद किया जो उनके दुश्मन के प्रति थोड़ा रूखा और सख्त रवैया रखते हों। शोधकर्ताओं ने इसे “embedded dyad” यानी दोस्ती को व्यापक सामाजिक नेटवर्क के भीतर देखने के दृष्टिकोण से समझाया। कोई दोस्त केवल हमारे साथ ही ताल्लुक नहीं रखता बल्कि वह हमारे प्रतिद्वंद्वियों से भी मिलता-जुलता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर हम पर पड़ सकता है।

10. मृदा विज्ञान: जांघियों से मिट्टी की सेहत 

मृदा विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार मिट्टी में दबाए गए सूती जांघियों और टी-बैग्स के ज़रिए मिट्टी की जैविक सक्रियता और गुणवत्ता (soil biological activity & quality) का अध्ययन करने के लिए मिला है। विचार सरल था: मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव जितने सक्रिय होंगे, सूती कपड़े जैसे जैविक पदार्थ की अपघटन गति उतनी ही तेज़ होगी। शोधकर्ताओं ने शौकिया वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे मानकीकृत सूती जांघिए और टी-बैग्स वगैरह अपने आसपास की विभिन्न तरह की मिट्टियों (जैसे बाग-बगीचे, मैदान, खेत आदि) में गाड़ दें और लगभग दो महीने बाद उन्हें निकालें, ताकि यह देखा जा सके कि कपड़ा कितना सड़-गल गया और कितना बाकी है। दुनिया भर के  लगभग 1000 शौकिया वैज्ञानिकों ने 2000 से अधिक जांघिए और हज़ारों टी-बैग्स दफनाए। पाया गया कि निजी बगीचों, जहां पेड़-पौधों की प्रजातियों में विविधता थी, में कपड़ा सबसे अधिक तेज़ी से अपघटित हुआ, जबकि लॉन (जिस पर सिर्फ एक तरह के पौघे – हरी घास या दूब – उगी थी) में अपघटन (decomposition) धीमी गति से हुआ। मिट्टी की गुणवत्ता के लिहाज़ से यह अहम है।

चलते–चलते

विगत 3 सितंबर को स्विट्जरलैंड के ज़्यूरिख में इस वर्ष के इगनोबेल पुरस्कार दिए गए। अपने 36 वर्ष के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब एनल्स ऑफ इंप्रोबेबल ने यह समारोह बोस्टन के बाहर आयोजित किया गया। इसका कारण पिछले दो वर्ष का अनुभव रहा: विगत दो सालों में अमेरिका में सख्त किए गए वीज़ा नियमों और विभिन्न देशों के बीच चल रहे युद्ध एवं संघर्ष के चलते कई विजेता चाहकर भी समारोह में शामिल नहीं हो पा रहे थे। और, इगनोबेल पुरस्कार के संस्थापक मार्क अब्राहम्स (mark abrahams) के लिए यह चिंता का विषय था कि यह समारोह जो हल्के-फुल्के और मज़ेदार अंदाज़ में सम्पन्न होता है उस पर संघर्ष और नीतियां हावी हो रही हैं, विजेता शामिल नहीं हो पा रहे हैं और मेहमानों के लिए देश का दौरा करना असुरक्षित हो गया है।

इस वर्ष विजेता तो शामिल हो ही पाए, साथ ही समारोह में नोबेल पुरस्कार विजेता एशर डफलो, अभिजीत बनर्जी, मिशेल मेयर एवं टिम हंट भी शामिल रहे जिन्होंने इगनोबेल पुरस्कार विजेताओं को मशरूम-आकार की ट्रॉफी दी। आमंत्रित अतिथियों ने 24/7 की तर्ज पर व्याख्यान भी दिए: तयशुदा विषय पर पहले तो 24 सेकंड में और फिर 7 शब्दों में विषय समझाया गया। समारोह की शुरुआत ‘लैबोरेटरी ऑफ स्मॉल डिसास्टर’ की थीम पर डांस परफॉर्मेंस हुई, फंजाई थीम पर ओपेरा संगीत (fungi themed opera)सम्पन्न हुआ, और समारोह का समापन दर्शकों ने कागज़ के हवाई-जहाज़ उड़ाकर किया। हर इवेंट की शुरुआत फोर-पीस ऑर्केस्ट्रा द्वारा की गई, और विजेताओं की वेशभूषा उनके शोध विषय से सम्बंधित थी।

अगले वर्ष ये पुरस्कार बेल्जियम के एंटवर्प (antwerp) में 5 सितंबर को दिए जाएंगे। आप यदि दर्शकों में शामिल होना चाहें तो मई में टिकट बुकिंग उनकी वेबसाइट पर प्रारंभ होगी। और, आप चाहें तो किसी मज़ेदार लेकिन संजीदा शोध को अगले वर्ष के लिए नामित (nominate) भी कर सकते हैं, क्या पता आपका नामित शोध पुरस्कार पा जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एड्स वायरस से निपटने का नया प्रयास

वैसे तो एड्स वायरस (ह्युमैन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस यानी एच.आई.वी.) (HIV) पर किए गए अनुसंधान ने हमें ऐसी कई दवाइयां मुहैया कराई हैं जो वायरस को काबू में रखती हैं और उसे हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को तहस-नहस करने से रोके रखती हैं। दुनिया भर में करीब 4 करोड़ लोग एच.आई.वी. के साथ जी रहे हैं और कोई इलाज नहीं खोजा जा सका है। आज तक इलाज करके मात्र 11 लोगों को वायरस से मुक्त किया जा सका है। यह स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण (Stem cell transplant) के ज़रिए संभव हुआ है। दिक्कत यह है कि स्टेम कोशिका उपचार का उपयोग आसान नहीं है।

अब एच.आई.वी./एड्स (AIDS) सम्मेलन में प्रस्तुत कुछ निष्कर्ष एक नई राह सुझा रहे हैं। कुछ अध्ययन प्रयोगशालाओं में किए गए हैं और कुछ अध्ययन मरीज़ों पर भी किए गए हैं। इनमें एक नए विचार का इस्तेमाल किया गया है।

आम तौर पर एड्स वायरस कोशिका में प्रवेश करने के बाद संक्रमित कोशिका में ऐसे परिवर्तन करता है कि वे उसकी उपस्थिति को भांपने और भांपकर स्वयं को नष्ट करने में असफल रहती हैं। यदि कोशिकाएं स्वयं को नष्ट करें तो उनके अंदर बैठे वायरस भी खत्म हो जाएंगे। यदि वायरस की इस करामात से पार पा लें तो काम आसान हो जाएगा।

यह सही है कि वर्तमान में उपलब्ध दवाइयां एच.आई.वी. का दमन इतनी हद तक कर देती है कि रक्त परीक्षण (Blood Test) में वह नज़र नहीं आता। लेकिन वह संक्रमित टी-कोशिकाओं (Infected T-cells) और मैक्रोफेजों में बना रहता है और अपना जेनेटिक कोड व्यक्ति के गुणसूत्रों में पिरो देता है। जैसे ही व्यक्ति उपचार बंद करता है ये सुप्त वायरस अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगते हैं और जल्दी ही लाखों वायरस रक्त में पहुंच जाते हैं। कई संक्रमित कोशिकाएं इन वायरसों को बाहर निकालने की प्रक्रिया में या प्रतिरक्षा तंत्र के हमले में मारी जाती हैं, लेकिन कुछ जीवित रह जाती है।

नई रणनीति टी-कोशिकाओं व मैक्रोफेज में पाए जाने वाले ऐसे सेंसर्स पर टिकी है जो सूक्ष्मजीवों को ताड़ते हैं। इन्हें कार्ड-8 (CARD8) कहते हैं। ये मुख्य रूप से प्रोटीएज़ (Protease) नामक एंज़ाइम को पहचानते हैं जो नव-निर्मित प्रोटीन्स को तोड़ता है ताकि नए वायरस बनाए जा सकें। जैसे ही कार्ड-8 किसी वायरस प्रोटीन की उपस्थिति भांपता है, वह एक किस्म की कोशिकीय खुदकुशी की प्रक्रिया शुरू करवा देता है जिसके चलते नए वायरसों का निर्माण अस्त-व्यस्त हो जाता है। इस प्रक्रिया को पायरोप्टोसिस (Pyroptosis) कहते हैं। 

एच.आई.वी. अपना प्रोटिएज़ दो एक-सी इकाइयों को जोड़कर बनाता है। 2021 में साइन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र में वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के लियांग शान और उनके साथियों ने बताया गया था कि कार्ड-8 (Card-8) सिर्फ दो इकाइयों के जुड़ने पर बने डाइमर को ही पहचानता है। वायरस इसका फायदा उठाते हैं – वे दो इकाइयों को जोड़ने की प्रक्रिया को तब तक मुल्तवी रखते हैं जब तक कि वायरस कण मेज़बान कोशिका से बाहर न झांकने लगे। शान की टीम ने यह भी बताया था कि दो वर्तमान एच.आई.वी. रोधी दवाइयां (एफेवाइरिनेज़़ और रिल्पिवायरिन) किसी तरह से डाइमर (Dimer) निर्माण की इस प्रकिया को जल्दी करवा देती हैं। उस समय तो किसी ने इस खोज की उपचारात्मक संभावना पर ध्यान नहीं दिया था लेकिन अब इस पर चर्चा हो रही है।

कई औषधि निर्माताओं ने ऐसी अधिक शक्तिशाली दवाइयों पर काम भी शुरू कर दिया है। जैसे टारगेटेड एक्टिवेटर ऑफ सेल किल (TACK) पर ध्यान दिया जा रहा है। 2023 में मर्क कंपनी ने साइन्स ट्रांसलेशन मेडिसिन में बताया था कि उसने ऐसा अणु खोज लिया है जो प्रोटिएज़ को डाइमराइज़ करवाने में एफेवाइरिनेज़ (Efavirenz) से कई गुना शक्तिशाली है। कंपनी इसका परीक्षण ऐसे लोगों पर कर रही है जिन्हें पहले कोई उपचार नहीं मिला है। 

दूसरी ओर, कोलंबिया विश्वविद्यालय के डेविड हो एक दोतरफा रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसमें TACK को एक अन्य तरीके के साथ जोड़ गया है। यह दूसरा तरीका है सुप्तावस्था पलट एजेंट (Latency reversal agents LRA) पर आधारित। ये ऐसे एजेंट होते हैं जो वायरस की सुप्तावस्था (latency) को समाप्त करके उन्हें अपनी प्रतिलिपियां बनाने को उकसाते हैं। इसके पीछे विचार यह है कि जिन कोशिकाओं में वायरस तेज़ी से प्रतिलिपियां बनाएंगे, उन्हें प्रतिरक्षा तंत्र नष्ट कर देगा या वे स्वयं ही फट जाएगी। लेकिन अब तक इस तरह से वायरस का जखीरा कम करने में सफलता सीमित रही है।

हो की प्रयोगशाला में बेहतर LRA बनाने पर काम चल रहा है। वहां सुप्त संक्रमित कोशिकाओं के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो ऐसे कोशिकीय संकेतों को शुरू करवा दें जो वायरस को अपनी प्रतिलिपि बनाने को उकसाएं। लेकिन प्रयोगशाला में एच.आई.वी. संक्रमित लोगों से ली गई कोशिकाओं में अकेली एंटीबॉडी कारगर नहीं रही। ये कोशिकाएं ऐसे व्यक्तियों की थीं जो उपचार ले रहे थे और वायरस को पूरी तरह नियंत्रित कर रहे थे। लेकिन हो ने बताया है कि जब उन्होंने साथ में TACK औषधि मिला दी तो वायरल आरएनए (Viral RNA) की मात्रा तेज़ी से कम हुई।

हो का कहना है कि एच.आई.वी. संक्रमण की स्थिति पर असर डालने के लिए LRA और टैक का उपयोग शायद ज़रूरी न हो।

रिट्रोवायरस (Retrovirus) और अन्य मौकापरस्त संक्रमणों पर एक सम्मेलन में वॉशिंग्टन विश्वविद्यालय मेडिसिन की प्रिया लाल ने बताया कि उनकी टीम ने सात ऐसे एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्तियों को शामिल किया जो विभिन्न वायरस रोधी दवाइयों और एफेवाइरिनेज़ की मदद से वायरस पर काबू किए हुए थे। सुप्त रूप से संक्रमित कोशिकाओं के प्रति संवेदी तकनीकों की मदद से पता चला कि 4 महीने के उपरांत 6 व्यक्तियों में सुप्त संक्रमित कोशिकाएं 20 से 50 प्रतिशत तक कम हो गई थीं। शोधकर्ताओं ने स्वीकार किया है कि इतनी गिरावट किसी व्यक्ति को रोगमुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है लेकिन यह इस विचार का प्रमाण है कि प्रोटिएज़ को सक्रिय करने वाले शक्तिशाली कारकों का विकास करना उपयोगी होगा। कई औषधि निर्माताओं ने इस दिशा में काम करना शुरू भी कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भारत की आनुवंशिक विविधता पर सबसे बड़ा अध्ययन

भारत (India) ने अपनी आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) को समझने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। GenomeIndia Project के तहत वैज्ञानिकों ने देश के लोगों में लाखों ऐसे आनुवंशिक बदलाव खोजे हैं, जिनकी जानकारी पहले दुनिया के बड़े वैज्ञानिक डैटाबेस (Database) में मौजूद नहीं थी। इसके लिए 83 अलग-अलग आबादियों के लगभग 9800 स्वस्थ लोगों के पूरे जीनोम का अध्ययन किया गया और करीब 4.4 करोड़ नए आनुवंशिक बदलाव पहचाने गए।

शोध से पता चलता है कि अब तक दुनिया के अधिकतर आनुवंशिक अध्ययन युरोपीय मूल के लोगों पर आधारित थे, जिनमें भारतीय और दक्षिण एशियाई (South Asian) आबादी को कम महत्व मिला था। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह परियोजना भविष्य में बीमारियों की पहचान, लोगों की वंशावली समझने, व्यक्ति-विशिष्ट चिकित्सा और दवाइयों के असर सम्बंधी बेहतर समझ बनाने में मददगार होगी।

इस परियोजना में शामिल वैज्ञानिक इतने बड़े स्तर पर नए आनुवंशिक बदलाव देखकर हैरान रह गए। बहुत दुर्लभ बदलावों को हटाने के बाद भी कुल बदलावों में से 10 प्रतिशत से ज़्यादा ऐसे थे, जो पहले किसी वैज्ञानिक डैटाबेस में दर्ज नहीं थे। वैज्ञानिकों के अनुसार इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत की आनुवंशिक विविधता का बड़ा हिस्सा अभी भी अनजाना है। इसकी वजह देश में हज़ारों अलग-अलग समुदायों (communities) का लंबे समय तक अलग-अलग रहना, प्रवासन और अपने ही सामाजिक समूहों में विवाह करना है।

भारत के जैव प्रौद्योगिकी विभाग से वित्तीय सहायता प्राप्त इस परियोजना में देश भर के 20 शोध संस्थानों ने मिलकर काम किया है। अभी करीब 10,000 लोगों के जीनोम (Genome) का अध्ययन किया गया है, लेकिन भविष्य में इसे बढ़ाकर 10 लाख जीनोम तक ले जाने की योजना है, जिसमें अलग-अलग बीमारियों से जुड़े समूह भी शामिल होंगे। वैज्ञानिकों का मानना है कि इतना बड़ा डैटा बेस भारतीय लोगों के लिए अधिक सटीक चिकित्सा प्रणाली (Perfect Medical System) बनाने में मदद करेगा।

अध्ययन में सबसे खास बात कुछ अलग-थलग रहने वाले आदिवासी समुदायों (Tribal Communities) से जुड़ी थी। इन समुदायों में आनुवंशिक एकरूपता (Gentic Uniformity) बहुत ज़्यादा पाई गई, जिसे होमोज़ायगोसिटी (Homozygosity) कहते हैं। जब छोटे समुदायों में पीढ़ियों तक अंदर ही अंदर ही विवाह होते रहते हैं, तो कुछ हानिकारक जीन ज़्यादा सामान्य हो सकते हैं, क्योंकि बच्चों को माता-पिता दोनों से एक जैसे खराब जीन मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

शोध में पाया गया कि 29 में से 27 आदिवासी समूहों में बीमारी पैदा करने वाले आनुवंशिक बदलाव महत्वपूर्ण स्तर पर मौजूद थे। दक्षिण भारत के एक आदिवासी समुदाय में वैज्ञानिकों ने HGD जीन में एक हानिकारक बदलाव खोजा, जो अल्केप्टोनयूरिया ((Alkaptonuria) नाम की दुर्लभ बीमारी से जुड़ा है। यह बीमारी शरीर के जोड़ों और अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है। खास बात यह थी कि यह बदलाव अंतर्राष्ट्रीय आनुवंशिक डैटाबेस में मौजूद नहीं था; यानी सामान्य जांच में यह बीमारी आसानी से छूट सकती थी।

वैज्ञानिकों ने 7000 से ज़्यादा जीन्स में 15,000 से अधिक ऐसे आनुवंशिक बदलाव (Gentic Changes) भी खोजे, जो कुछ जीन्स की गतिविधि को मंद या बंद कर सकते हैं। इनमें से कुछ बदलाव बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं, जबकि कुछ, शरीर को कुछ बीमारियों से बचाने में मदद भी कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में इनमें से कुछ खोजों का उपयोग नई RNA आधारित चिकित्सा (RNA based Treatment) विकसित करने में किया जा सकता है, जो खराब जीन के असर को ठीक करने की कोशिश करती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इलाज के रूप में इस्तेमाल करने से पहले अभी और प्रयोगशाला परीक्षणों की ज़रूरत है।

अध्ययन में यह भी पता चला कि भारतीय लोगों पर दवाओं का असर अलग-अलग हो सकता है। एक ऐसा आनुवंशिक बदलाव मिला, जो एनेस्थीसिया (निश्चेतन) के दौरान होने वाली जटिलताओं से जुड़ा है और पहले की सोच से कहीं अधिक लोगों में पाया गया। पहले माना जाता था कि यह सिर्फ एक खास समुदाय तक सीमित है, लेकिन नए अध्ययन में यह कई अलग-अलग समूहों में मिला। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में इससे बेहोशी की दवाएं देने के तरीके में बदलाव आ  सकता है।

वैज्ञानिकों ने ऐसे आनुवंशिक बदलाव भी खोजे, जो इस बात पर असर डाल सकते हैं कि शरीर अवसाद (Depression), दर्द, कैंसर (Cancer) और खून से जुड़ी बीमारियों की दवाओं का किस तरह इस्तेमाल करता है। कुछ आदिवासी समुदायों में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति में ऐसे बदलाव पाए गए, जो इस बात पर असर डाल सकते हैं कि शरीर अवसाद-रोधी या तेज़ दर्द निवारक दवाओं को कैसे प्रोसेस करता है। भविष्य में ऐसी जानकारी डॉक्टरों को अलग-अलग लोगों के लिए ज़्यादा सुरक्षित और असरदार इलाज चुनने में मदद कर सकती है।

हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में जीन के आधार पर इलाज तय करने वाली सटीक चिकित्सा अभी शुरुआती चरण में है। दवाओं पर जीन के असर को समझने वाले परीक्षण मौजूद तो हैं, लेकिन अभी इतने सबूत नहीं हैं कि डॉक्टर हर इलाज का फैसला पूरी तरह इन पर भरोसा करके कर सकें, खासकर मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) से जुड़ी दवाओं में। इसे अस्पतालों में नियमित रूप से इस्तेमाल करने से पहले और बड़े क्लीनिकल अध्ययनों की ज़रूरत होगी।

इस शोध से यह भी पता चला कि अभी इस्तेमाल होने वाले आनुवंशिक जोखिम अनुमान मॉडल भारतीय लोगों के लिए पूरी तरह सही नहीं हैं। ज़्यादातर मॉडल युरोपीय आबादी के डैटा पर आधारित हैं, इसलिए वे भारतीय समुदायों पर ठीक से काम नहीं करते। इसी वजह से GenomeIndia टीम ने भारतीय लोगों के लिए एक नया संदर्भ डैटाबेस तैयार किया है, ताकि आनुवंशिक जानकारी को ज़्यादा सही तरीके से समझा जा सके।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी बड़ी खोज के बावजूद मानव जीनोम (Human Genome) का बड़ा हिस्सा अभी भी अनजाना है। अभी तक का शोध मुख्य रूप से उन जीन्स पर केंद्रित रहा है, जो प्रोटीन बनाते हैं, जबकि वे पूरे डीएनए का सिर्फ 2 प्रतिशत हिस्सा हैं। बाकी 98 प्रतिशत हिस्सा, जिसे डार्क जीनोम (Drak Genome) कहा जाता है, जीन्स को नियंत्रित करने और कई बीमारियों से जुड़े महत्वपूर्ण बदलाव छिपाए हो सकता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर इस हिस्से को बेहतर तरीके से समझ लिया जाए, तो GenomeIndia Project सिर्फ जीन बदलावों की सूची न रहकर भविष्य में व्यक्ति-विशिष्ट चिकित्सा का शक्तिशाली उपकरण बन सकता है। फिलहाल यह परियोजना भारत की आनुवंशिक विविधता को वैश्विक वैज्ञानिक मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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स्वास्थ्य: मात्र सुविधाओं, व्यवस्थाओं से आगे

ग्लोरजियो विंस्टन गौड़ा

फरवरी 2026 के पहले सप्ताह में मैंने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले के धरमजयगढ़ ब्लॉक के दूरदराज़ आदिवासी गांवों में कुछ समय बिताया था। उन दिनों मैंने जो देखा, जो अनुभव किया, उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बंधी कार्यों के प्रति मेरे नज़रिए को किसी व्याख्यान या पाठ्यपुस्तक से कहीं ज़्यादा प्रभावित किया। मैंने जो देखा, अनुभव किया उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य को एक नए नज़रिए से देखने-समझने में मेरी मदद की।

मैं सिद्धांतों यानी स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक निर्धारक, गरीबी, भौगोलिक स्थिति और शिक्षा आदि के संयुक्त प्रभाव का अच्छे से अध्ययन करके इस क्षेत्र में गया था। मैंने इसकी रूपरेखा तैयार की थी, इसके चित्र बनाए थे और भोपाल में अपने विश्वविद्यालय की कक्षाओं में इन ढांचों की रूपरेखा पर चर्चा भी की थी। लेकिन, इस मैदानी अध्ययन के बाद मुझे यह समझ में आया कि हर आंकड़े के पीछे एक उलझी हुई, सख्त और किसी भी रूपरेखा की तुलना में कहीं अधिक जटिल ज़िंदगी होती है।

ये कोई अनोखी जगहें नहीं हैं। ये साधारण गांव हैं। यहां अभी भी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं – जैसे, अच्छी सड़कें, मोबाइल सिग्नल, आसान पहुंच वाले अस्पताल और सुचारू संस्थाएं – जो हमें आसानी से उपलब्ध हैं और उन्हें हम उतना महत्व नहीं देते। दूरी हमेशा किलोमीटर में नहीं नापी जाती। कभी-कभी इसे ‘कितने वर्षों से उपेक्षित है’ के रूप में नापा जाता है, इसे हर महत्त्वपूर्ण सूची में हमेशा अंतिम स्थान पर रहने की संग्रहित तकलीफ के रूप में भी नापा जाता है।

हम अक्सर ‘समुदाय–आधारित तरीकों’ के बारे में बातें करते हैं। लेकिन इन शब्दों का असली मतलब आपको तभी समझ आता है, जब आप अपना लैपटॉप छोड़कर, पक्की सड़कों पर चलना छोड़कर, घने जंगल से होते हुए किसी ऐसे गांव तक पहुंचते हैं, जहां पिछले मॉनसून के बाद से अब तक कोई एम्बुलेंस नहीं पहुंची है।

ओंगना गांव में एक मां के साथ हुई त्रासदी

ओंगना गांव में लगभग 1200 लोग रहते हैं। इनमें बिरहोर (हाशिए का एक जनजातीय समूह), ओरांव और कंवर समुदाय के लोग शामिल हैं। यहां तीन आंगनवाड़ी केंद्र हैं। जिनमें तीन से छह वर्ष की आयु के कुल 59 बच्चे पंजीकृत हैं। मेरे चारों दौरों के दौरान तीनों केंद्रों पर मुझे पांच या छह बच्चे ही मिले। यह पंजीकृत संख्या का मुश्किल से दस प्रतिशत था।

यहां की व्यवस्था इस अनुपस्थिति की आदी हो चुकी है। इस अनुपस्थिति के लिए हमेशा एक जैसी ही सफाई दी जाती है: आदिवासी परिवार अपने बच्चों को खेतों में, जंगलों में, या जहां दिन में काम पर जाते हैं, वहां अपने साथ ले जाते हैं। यह एक स्थापित तथ्य-सा बन गया है और इसे बिना किसी जांच के कार्यक्रम सम्बंधी रिपोर्टों में मान लिया जाता है। कोई नहीं पूछता कि ऐसे (आंगनवाडी) केंद्र के होने का मतलब क्या है, जहां रजिस्टर में खानापूर्ति कर दी जाती है किंतु बच्चे होते ही नहीं। इसे लेकर कोई भी इतना चिंतित नहीं है कि इसके कारणों का पता लगाए।

स्थानीय आशा कार्यकर्ताओं को ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण दिवस (VHSND) की तैयारी में मदद करते हुए मेरी मुलाकात एक महिला से हुई। वह 31 साल की थी, चार महीने की गर्भवती थी और वह सातवीं बार गर्भवती थी। इससे पहले के छह बच्चों में से चार जीवित थे। उसने प्रसव-पूर्व देखभाल के लिए पंजीकरण नहीं कराया था। उसका अपना आधार कार्ड भी खो गया था। ऐसा होने पर भारत में प्रशासनिक कामों में बड़ी अड़चनें आती हैं। आधार कार्ड होने से लगभग हर सरकारी लाभ को प्राप्त करना आसन हो जाता है – जैसे पोषण सहायता, नगद हस्तांतरण और अस्पताल में प्रसव सुविधा या प्रसव के दौरान मिलने वाली अन्य सुविधाएं। आधार कार्ड विहीन व्यक्ति व्यवस्था की नज़रों में ओझल हो जाते हैं, भले ही व्यवस्था उनसे चंद सौ मीटर दूरी पर ही क्यों न हो।

मितानिन (छत्तीसगढ़ में आशा कार्यकर्ता को मितानिन कहते हैं) और पड़ोसियों से बात करके मैंने उस महिला की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश की। वह और उसका पति शराब की लत से जूझ रहे थे। गरीबी और शराब पीने की लत इस कदर आपस में गुंथी हुई थी कि यह कहना मुश्किल था कि किस वजह से कौन सी समस्या पैदा हुई। इन समुदायों में नशे की लत के बारे में नैतिक दृष्टिकोण के अलावा शायद ही कभी किसी अन्य दृष्टिकोण से चर्चा की गई होगी। ओंगना में यह समस्या हर जगह देखने को मिलेगी और बीते सालों में यहां यह आम हो गई है। ये सभी चीज़ें दैनिक जीवन में इस तरह से घुलमिल गई हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों का इनसे कुछ लेना-देना ही नहीं रह गया है।

फिर यह भी पता चला, जिसके लिए मैं तैयार नहीं था, कि उसका छठा बच्चा, जो कि मात्र 9 महीने का था, पानी की टंकी में डूबकर मर गया था। क्योंकि, उसकी मां नशे की हालत में उस बच्चे को पानी पिलाने की कोशिश कर रही थी। उसके हाथों से छूटकर बच्चा टंकी में गिर गया था और उसे घंटों बाद इसका पता चला था, जब उसके बड़े बेटे ने टंकी की ओर इशारा करके पूछा कि बच्चा हिल क्यों नहीं रहा है।

मैं झूठ नहीं कहूंगा, पहले तो मैंने भी उसे नैतिक आधार पर तौला (जज किया)। यह मेरे जैसे एक ऐसे व्यक्ति की सहज प्रतिक्रिया होगी जो रोकथाम, ज़िम्मेदारी निभाने और इससे अलग क्या किया जा सकता है सोचने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। इसलिए, मेरे अंदर भी यह प्रवृत्ति सहज रूप से तुरंत आई और मुझे यह उचित भी लगी। मुझे यह समझने में अधिक समय लगा कि मेरे सामने वास्तव में क्या चल रहा है: मेरे सामने एक ऐसी महिला थी जो ऐसी दिल दहला देने वाली परिस्थितियों में जीवित बची हुई थी, जिसकी हममें से अधिकतर लोग कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। वह बिना किसी सहारे के, बिना किसी समझदार साथी के और बिना किसी समर्थन के, अपने शरीर में सातवां बच्चा पाल रही थी। वह एक ऐसी महिला थी जो पहले ही अपने दो बच्चे खो चुकी थी।

अगली सुबह जब वह स्वास्थ्य केंद्र पर नहीं आई, तो मैं एक पुरुष मितानिन प्रशिक्षक के साथ उसके घर गया। जब हम वहां पहुंचे, तो उसका पति दिन शुरू होने से पहले ही नशे में धुत था। वह एक टूटी हुई लकड़ी से उस महिला को पीटने की धमकी दे रहा था। उसने कहा कि उसकी पत्नी ने VHSND में जाने से इनकार कर दिया है। उसकी नशे की हालत में, हमारे पास सच्चाई जानने का कोई तरीका नहीं था। हालांकि, हम उसे शांत कराने में कामयाब रहे। मैं उस महिला को स्वास्थ्य केंद्र ले गया, जहां ग्रामीण स्वास्थ्य आयोजक (RHO, छत्तीसगढ़ में सहायक नर्स दाई/बहुउद्देशीय कार्यकर्ताओं का पदनाम) ने उसकी गर्भावस्था का पंजीकरण किया और आवश्यक जांचें कीं। इस सब में लगभग दो घंटे लगे। हमारे इस प्रयास ने उसे यह समझने में मदद की कि स्वास्थ्य केंद्र की देख-रेख में हुई गर्भावस्था और पहले की उन गर्भावस्थाओं के बीच क्या अंतर है जो बिना किसी स्वास्थ्य केंद्र की देख-रेख के हुई थीं।

पीछे मुड़कर देखता हूं तो सबसे ज़्यादा यही बात चौंकाती है कि यह सब लगभग न होने की कगार पर था – अगर उसका नाम मितानिन की सूची में न होता, अगर हमने उसकी गैरहाज़िरी पर ध्यान न दिया होता, अगर मैं अपने शुरुआती फैसले को ही आखिरी मान लेता और सोच लेता कि यह परिवार हमारी पहुंच से बाहर है।

हस्तक्षेप छोटा-सा था, लेकिन उसके लिए कितने ‘अगर-मगर’ पार करने पड़े थे।

प्राय: सार्वजनिक स्वास्थ्य का काम ऐसे ही परिवारों तक पहुंचना तो होता है, जिन्हें समाज पहले ही छोड़ चुका होता है, जिनकी कोई आवाज़ नहीं होती, जिनकी मुश्किलें किसी की नज़र में नहीं आतीं; और तो और, जिनका अस्तित्व तक जैसे किसी के लिए मायने नहीं रखता।

भौगोलिक परिस्थितियां

कनकुला धरमजयगढ़ से लगभग 28 किलोमीटर दूर है। यहां मोबाइल नेटवर्क नहीं आता है। यहां जाने वाली सड़क, सड़क कहने लायक भी नहीं है। कच्चा, पगडंडी सरीखा रास्ता घने जंगलों, सूखी नदी और धंसती रेत से होकर जाता है। इस इलाके में मोटरसाइकिल का जाना भी मुश्किल है। इस गांव में 61 परिवार हैं और आबादी 217 है। मानसून के दौरान, यह क्षेत्र स्वास्थ्य व्यवस्था के नक्शे से पूरी तरह गायब हो जाता है, क्योंकि, सारे रास्ते डूब जाते हैं और कोई भी स्वास्थ्य कार्यकर्ता हफ्तों तक यहां नहीं पहुंच पाता।

मैंने स्वास्थ्य सुविधाओं में बाधा पैदा करने वाली भौगोलिक कटाव की परिस्थितियों के बारे में पढ़ा था। लेकिन, मैंने कनकुला में इसे अलग तरह से समझा। कटाव सिर्फ दूरी से नहीं होता – वह उन तमाम चीज़ों के मिले-जुले असर से होता है जो वहां तक कभी पहुंच ही नहीं पाईं: हर वह संदेश/सूचना जो कभी पहुंची नहीं, हर वह कोशिश जो पहुंच योग्य इलाके की सीमा से आगे न बढ़ सकी, हर वह योजना जो सड़क के पास रहने वालों को ध्यान में रखकर बनाई गई है।

जब लोगों को टीकाकरण के लिए प्रेरित करने के लिए मैं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के साथ घर-घर गया तो पाया कि हर बार  आंगनवाड़ी  कार्यकर्ता दरवाज़ा खटखटाती, अंदर से “नहीं” का जवाब सुनकर आगे बढ़ जातीं। ना तो लोग ही अपने ‘न’ के जवाब का कोई स्पष्टीकरण देते और ना ही आंगनवाड़ी कार्यकर्ता उन्हें समझाने का प्रयास करती। जब मैंने पूछा कि वे आगे क्यों बढ़ जाती हैं, तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने सीधे कहा: “वे नहीं आएंगे।” उनकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी। बस एक निराशा थी – वह निराशा जो वर्षों तक वही दरवाज़े बार-बार खटखटाने और वही जवाब पाने के बाद पैदा होती है। उन्होंने यह विश्वास करना बंद कर दिया था कि कभी कोई दरवाज़ा खुलेगा। और, मैं इसके लिए उन्हें दोष नहीं दे सकता था।

मैंने खुद परिवारों से बात करने की अनुमति मांगी। मैंने पाया कि उनके मना करने का कारण बहुत सीधा और तर्कसंगत था। उनका कहना था कि “इंजेक्शन लगने के बाद बच्चों को बुखार आ जाता है। हम टीकाकरण नहीं करवाना चाहते।”

यह अज्ञानता नहीं थी। बल्कि, गांववासियों का एक अनुभवजन्य सत्य था। इन परिवारों ने बच्चों को टीके लगवाने के बाद हल्का बुखार आते देखा था। किसी ने उन्हें यह नहीं समझाया था कि वास्तव में टीका लगने के बाद बुखार आना सही है, यही होना चाहिए। बुखार एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही होती है, वह अभ्यास कर रही होती है, सुरक्षा के लिए तैयार हो रही होती है। इस सही जानकारी के अभाव में, उन्होंने अपना स्वयं का स्पष्टीकरण गढ़ लिया था और वह सुसंगत था। यह बात एक मां से दूसरी मां तक फैल गई और पूरे गांव ने इस पर बात को एक प्रामाणिक सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया। यह बात गांव के लोगों के लिए एक अनुभवजन्य सत्य की तरह विश्वसनीय और निर्विवादित थी। आप इसे केवल उनका ‘भ्रम’ कहकर खारिज नहीं कर सकते। यह ऐसी बात थी, जिस पर समुदाय के लोगों ने अपने पास उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर सोच-समझ कर अपनी यह धारणा बनाई थी।

यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक रचनावाद (social constructivism) का एक अच्छा उदाहरण है। बीमारी, उपचार और शरीर के बारे में हमारी मान्यताएं निर्वात में नहीं बनती हैं। वे साझा अनुभव, सामुदायिक चर्चा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक-दूसरे को सुनाई जाने वाली कहानियों के ज़रिए बनती हैं। कनकुला में, ‘टीके से बुखार आता है’ की धारणा कोई गलतफहमी नहीं थी; यह सामाजिक रूप से निर्मित सत्य था, जो इस गांव में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई गई कहानियों के आधार पर पुष्ट हुआ था। इसका कारण था कि यहां कोई भी बाहरी स्वास्थ्य सूचना कभी भी भरोसेमंद ढंग से लोगों के पास नहीं पहुंची थी। यह बात समझ लें तो आपके काम करने का तरीका बदल जाएगा। आप उन्हें गलत साबित करने के लिए उनके पास नहीं जाएंगे। बल्कि, आप उन्हें सुनने और समझने के लिए उनके पास जाएंगे – यह समझने के लिए कि लोगों ने जो देखा है, उसके आधार पर उन्हें वह बात क्यों सही लगी। फिर, जो समझ पहले से मौजूद है, उसके समांतर कुछ नया निर्माण करने के उद्देश्य से उनके बीच जाएंगे। सामुदायिक ज्ञान को अज्ञानता कहकर उसे खारिज करने से वह गायब नहीं हो जाता। यह बस संवाद का दरवाज़ा बंद करता है।

मैंने पहले पुरुषों के साथ समय बिताया। मैंने उन्हें सुना और बातचीत के माध्यम से उनके साथ एक सहजता स्थापित की। इस मेल-जोल को बढ़ाने की दिशा में, मैंने उनसे उन विषयों पर भी हंसी-मज़ाक किया जो स्वास्थ्य से नहीं जुड़े थे। फिर, मैंने उन्हें समझाया कि टीका कैसे काम करता है। मैंने उन्हें बुखार आने के कारणों के बारे में समझाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि सुबह जंगल जाने की योजना बना रहे तीन परिवार टीकाकरण करवाने के लिए आ गए।

बाद में, पुरुष RHO ने मुझे बताया कि ये परिवार वर्षों से टीकाकरण के दिन भाग जाते थे। किसी शत्रुता या हठधर्मी विरोध के कारण नहीं। बल्कि, इसलिए कि कभी किसी ने उन्हें इतने इत्मीनान और ईमानदारी से, टीकाकरण का फायदा नहीं समझाया था।

इन समुदायों और पूरे स्वास्थ्य तंत्र के बीच दूरी केवल भौगोलिक दूरी नहीं है। यह दूरी बरसों तक उन्‍हें नज़रअंदाज़ करने, सूचनाओं से वंचित रखने से पैदा हुई है। यह दूरी उन संस्थाओं ने पैदा की है जिन तक पहुंच पाना कभी आसान नहीं रहा और उन योजनाओं ने भी पैदा की जो इन्‍हें ध्‍यान में रखकर कभी बनाई ही नहीं गईं। इस दूरी को पाटना निरंतर चलने वाली, चमक–दमक से रहित प्रक्रिया है। यह अक्सर रिपोर्टों में दर्ज़ नहीं होती, न ही इससे सुर्खियां बनती हैं। लेकिन मेरा मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की असली ज़मीन यहीं है। इस पर चर्चा घर के दरवाज़े पर, पहाड़ी पर, सूखी नदी के किनारे होती है और उन जगहों पर होती है जहां सड़क नहीं पहुंचती।

ज़मीनी स्तर पर कार्य

गरीबी, भौगोलिक स्थिति, साक्षरता, अवसर जैसे सामाजिक निर्धारकों पर कक्षाओं में होने वाली चर्चाएं गलत नहीं हैं। लेकिन जब तक कि आप इन्हें किसी खास व्यक्ति के संदर्भ में, किसी खास घर के संदर्भ में और किसी खास सुबह साकार होते नहीं देख लेते तब तक ये अमूर्त सिद्धांत ही बने रहते हैं। जैसे – एक शराबी पति, जिसके हाथ में टूटी हुई लकड़ी का टुकड़ा है। आंगनवाड़ी केंद्र में टूटा और बेकार पड़ा हुआ ग्रोथ मॉनिटरिंग यंत्र (विकास निगरानी उपकरण), जिसके चलते यह मापना मुश्किल हो जाता है कि स्वास्थ्य केंद्र पर आने वाले बच्चे उम्र के हिसाब बढ़ रहे हैं या नहीं। ये कोई अपवाद नहीं हैं। बल्कि, ये काम का अभिन्न हिस्सा हैं।

मैं बार-बार यही बात दोहराता हूं कि कितना कुछ सक्रिय मौजूदगी पर निर्भर करता है – सक्रिय मौजूदगी यानी शारीरिक, धैर्यपूर्ण और बिना चमक-दमक वाली उपस्थिति। कनकुला के परिवारों को किसी अभियान की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें बस एक ईमानदार बातचीत की ज़रूरत थी। ओंगना की महिला को किसी नई नीति की ज़रूरत नहीं थी। उसे बस किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो बिना किसी पूर्वाग्रह के एक आम मंगलवार की सुबह उसके दरवाज़े पर आए और उसे यह बताए कि उसकी गर्भावस्था कितना मायने रखती है, उसके लिए ज़रूरी स्वास्थ्य सम्बंधी प्रयास किए जा रहे हैं।

ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास जो ज्ञान होता है, वह किसी डैशबोर्ड (औपचारिक डिजिटल माध्यम) द्वारा नहीं समझा जा सकता है। क्योंकि, ज़मीनी स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही ये बात जानते हैं कि किन परिवारों ने दरवाज़े पर दी गई दस्तक का जवाब देना बंद कर दिया है और क्यों। वे जानते हैं कि जुलाई में कौन सी सड़कें नदी में डूब जाती हैं। वे जानते हैं कि किसका पति शराब पीता है, कौन-सा बच्चा तीन महीने से नहीं तौला गया है, कौन-सा परिवार मुलाकात का जवाब देगा और किन घरों को अतिरिक्त सहायता की ज़रूरत है। यह ज्ञान कारगर हस्तक्षेप का आधार बनता है, जो वास्तव में काम करता है। जब हम थकान के कारण या किसी अन्य कारण से कार्यकर्ताओं के अनुभवों को नज़रंदाज़ कर देते हैं, तो हम स्वास्थ्य प्रणाली में लंबे समय के अनुभव के साथ अर्जित महत्वपूर्ण जानकारी गंवा देते हैं। जबकि स्‍वास्‍थ्‍य प्रणाली इसी के आधार पर काम करती है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पानी की जांच से जैव विविधता के सुराग

न्यूयॉर्क के बीच बहने वाली ईस्ट रिवर के बाल्टी भर पानी ने रॉकफेलर विश्वविद्यालय के मार्क स्टोकेल को न्यूयॉर्क शहर के जीवन के बारे में हैरान करने वाली जानकारी दी है। नदी के पानी में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे खंडों का अध्ययन करके उन्होंने उसमें पाई जाने मछलियों, शहर के जीवों, लोगों की सेहत और उनके खानपान की आदतों तक के बारे में संकेत पाए। अध्ययन दिखाता है कि पर्यावरणीय डीएनए (eDNA) पर्यावरण को समझने का एक तेज़ और सस्ता तरीका बनता जा रहा है।

यह शोध प्लॉस वन में प्रकाशित हुआ है। स्टोकेल और साथियों ने एक साल तक हर हफ्ते ईस्ट रिवर से पानी के नमूने लिए। फिर उन्होंने उस पानी में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे खंडों की जांच की, जो जीवों की त्वचा, बाल, गंदगी या दूसरे जैविक पदार्थों के ज़रिए पानी में पहुंचे थे।

अध्ययन में पता चला कि शहर के बीच बहने वाली यह नदी जीवों से भरपूर और लगातार बदलने वाला पारिस्थितिकी तंत्र है। वैज्ञानिकों ने इसमें 71 मछली प्रजातियां पहचानीं, जिनमें कुछ ऐसी भी थीं जो पहले इस इलाके में बहुत कम दिखाई देती थीं, और अब अच्छी संख्या में दिखाई दे रही हैं। अध्ययन यह दिखाता है कि ईस्ट रिवर अब पहले की तुलना में काफी साफ हो चुकी है।

गौरतलब है कि पर्यावरणीय डीएनए तकनीक पानी, मिट्टी या हवा में मौजूद जीवों के छोड़े गए छोटे-छोटे डीएनए खंडों के विश्लेषण पर आधारित है। सभी जीव लगातार अपनी कोशिकाएं और गंदगी छोड़ते रहते हैं, इसलिए उनका डीएनए कुछ दिनों तक वातावरण में बना रह सकता है।

पारंपरिक तरीकों में नाव, जाल, ट्रैप या गोताखोरों की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन eDNA तकनीक बहुत कम उपकरण और खर्च में बड़ी मात्रा में जानकारी दे सकती है। यह ऐसी मुश्किल जगहों में उपयोगी है, जहां तेज़ धाराएं और चट्टानी इलाका सामान्य जांच को कठिन बना देते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, पूरे एक साल के इस अध्ययन का खर्च किसी रिसर्च बोट को सिर्फ एक दिन चलाने जितना था।

वैज्ञानिकों को नदी के पानी में सिर्फ मछलियों के ही नहीं, बल्कि ज़मीन पर रहने वाले जीवों के डीएनए भी मिले। वैज्ञानिकों को गिलहरी, रैकून, बीवर, गाय, सूअर, मुर्गियों और चूहों के डीएनए के संकेत मिले, जो शायद गंदे पानी और बारिश के बहाव के ज़रिए नदी तक पहुंचे थे। खासकर चूहों का डीएनए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे भविष्य में शहरों में चूहों की बढ़ती संख्या का जल्दी पता लगाया जा सकता है। दिलचस्प बात यह रही कि पानी में मिले जीवों के डीएनए का अनुपात लोगों के मांस खाने के आंकड़ों से काफी मेल खाता था। इससे संकेत मिलता है कि eDNA तकनीक भविष्य में लोगों की खानपान की आदतों और स्वास्थ्य के रुझानों को समझने में मदद कर सकती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि पहली बार गंदे पानी से मिले eDNA का इस्तेमाल लोगों की खानपान की आदतों को इतने विस्तार से समझने के लिए किया गया है।

विशेषज्ञ eDNA को पर्यावरण और वन्यजीवों की निगरानी के लिए एक बहुत उपयोगी नई तकनीक मानते हैं। यह जीवों की सही-सही संख्या तो नहीं बता सकती, लेकिन यह ज़रूर दिखा सकती है कि कोई प्रजाति समय के साथ बढ़ रही है या घट रही है। इससे पर्यावरण में हो रहे बदलावों और बाहरी प्रजातियों के फैलाव का जल्दी पता लगाया जा सकता है।

यह तकनीक अब दुनिया के कई हिस्सों में इस्तेमाल हो रही है। कनाडा में दुर्लभ वनबिलावों (लिंक्स) का पता लगाने से लेकर माउंट एवरेस्ट के आसपास पिघले बर्फ के पोखरों में तितलियों की प्रजातियों की पहचान तक, eDNA कई जगहों पर मदद कर रहा है।

हालांकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि eDNA पारंपरिक पर्यावरणीय जांच तरीकों की पूरी जगह नहीं ले सकती। लेकिन यह एक पूरक के तौर पर उन्हें और मज़बूत बना सकती है। हवा-पानी के नमूनों से पर्यावरण की विस्तृत जानकारी निकालकर यह तकनीक शहरों और प्रकृति की अदृश्य दुनिया को समझने का नया रास्ता खोल रही है, और यह जानने में मदद कर रही है कि प्राकृतिक दुनिया कैसे बदल रही है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मालवा के भूजल भंडारों का पुनर्भरण और गांधीसागर

डॉ. राम प्रताप गुप्ता (जून 2016 में स्रोत में प्रकाशित लेख)

आज़ादी के बाद के 20-25 वर्षों में सिंचाई सुविधाओं और विद्युत उत्पादन में वृद्धि के उद्देश्य से देश की सभी बड़ी नदियों पर उपयुक्त स्थानों पर बांध बनाए गए। इसी प्रक्रिया में मालवा की जीवनरेखा मानी जाने वाली चंबल नदी (Chambal River) के पानी के दोहन के उद्देश्य से चंबल घाटी विकास निगम के अन्तर्गत तीन बांध – गांधीसागर, राणा प्रताप सागर और जवाहर सागर – से नहरें निकालकर राजस्थान और मध्यप्रदेश में सिंचाई सुविधाएं प्रदान करना प्रस्तावित था। इनमें से गांधीसागर सबसे बड़ा बांध था; जिसमें दोहन किए जाने वाले पानी का 83 प्रतिशत भाग संग्रहित होता है।

इस प्रथम बांध (Dam) के महत्व का अंदाज़ा इससे भी लगता है कि सन 1954 में इसका शिलान्यास और सन 1960 में इसका उद्घाटन भी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने किया और कहा था कि गांधीसागर जैसे बांध तो नए भारत के नए तीर्थ हैं। गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने की दृष्टि से तत्कालीन जल इंजीनियरिंग सोच के आधार पर यह तय किया गया कि 4500 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले चंबल नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए ताकि सारा पानी गांधीसागर में ही आए। चंबल घाटी विकास परियोजना मध्यप्रदेश और राजस्थान की संयुक्त परियोजना है और इस हेतु किए गए समझौते में मध्यप्रदेश ने इस शर्त पर भी अपनी सहमति प्रदान कर दी थी। प्रशासन और जल संसाधन विभाग ने यह आकलन ज़रूरी नहीं समझा कि जलग्रहण क्षेत्र में वर्षाजल के दोहन पर रोक लगाने से इस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

गांधी सागर के निर्माण के पूर्व चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र मालवा अर्थात दक्षिणी-पश्चिमी मध्यप्रदेश के आठ ज़िलों – धार, इन्दौर, देवास, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और नीमच – में भूजल का स्तर काफी ऊंचा रहता था। इस क्षेत्र की नदियों जैसे क्षिप्रा, छोटी कालीसिंध, शिवना और चंबल में ही नहीं, छोटे-छोटे नदी-नालों में भी वर्ष भर पानी बहता रहता था। उस समय तक कृषि में रासायनिक खाद का उपयोग शुरू नहीं हुआ था और जैविक खाद (Organic Manure) का ही उपयोग होने से मिट्टी में वर्षा के पानी को सोखने और धारण करने की क्षमता भी अच्छी थी, जिससे मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती थी और असिंचित क्षेत्र में रबी की फसलें ली जाती थीं। मालवा के असिंचित क्षेत्र में पैदा होने वाले कठिया गेहूं की अपनी श्रेष्ठ गुणवत्ता तथा मालवा के प्रसिद्ध लड्डू-बाफलों में इसी का उपयोग होने से इसकी मांग भी बहुत थी और इसके उत्पादक कृषकों को इसकी अच्छी कीमत मिलती थी।

मालवा की इन्हीं विशिष्टताओं को किसी जन कवि ने इस तरह प्रस्तुत किया है-

“मालवा धरती धीर गंभीर

पग-पग रोटी, डग-डग नीर”

सन 1960 में गांधी सागर के निर्माण के बाद के कुछ वर्षों तक तो इसके जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के जल दोहन पर प्रतिबंध का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा। पूर्व में इस क्षेत्र में तालाब काफी संख्या में बने थे, इससे वर्षा का बड़ा भाग उनमें संग्रहित हो जाता था और मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नमी (Moisture) बनी रहने से वर्षा के दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध ने स्थानीय किसानों को विशेष प्रभावित नहीं किया। मालवा क्षेत्र की अनेक रियासतों – होल्कर, देवास सीनियर एवं जूनियर, ग्वालियर, रतलाम और सैलाना – में बंटे होने से इस क्षेत्र में गांधीसागर के निर्माण के पूर्व कितने तालाब थे, इसका कोई व्यवस्थित विवरण नहीं मिलता है। गांधीसागर जलाशय के 660 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में 95 तालाब डूब में आए थे, इसी के आधार पर यह मोटा अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय चंबल के 4500 वर्ग कि.मी. में फैले जल ग्रहण क्षेत्र में लगभग 800 तालाब थे अर्थात मालवा क्षेत्र में तालाबों का जाल बिछा हुआ था। इसी कारण चंबल घाटी योजना के संदर्भ में चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा जल दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध का अगले कुछ वर्षों तक तो कोई प्रतिकूल प्रभाव दिखाई नहीं दिया।

बाद के वर्षों में आबादी में तेज़ वृद्धि और रोज़गार हेतु अन्य व्यवसायों का सृजन नहीं होने से कृषि पर दबाव बढ़ता गया। पूर्व में किसी तालाब के जलग्रहण क्षेत्र में कृषि करने की इजाज़त नहीं दी जाती थी। समय के साथ कृषि भूमि की मांग में वृद्धि होने से सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से किसान तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र की भूमि पर भी खेती करने लगे, जिससे मिट्टी की ज़मीन से पकड़ कम हो गई और वह बहकर तालाबों में आने लगी और तालाब सिकुड़ने लगे। इस तरह मुक्त हुई ज़मीन के अधिक उपजाऊ (Fertile) होने से किसान उस पर भी खेती करने लगे। बाद में राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से इसे अपने नाम भी कराने लगे। इस प्रक्रिया में चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में कितने तालाब नष्ट हुए इसका कोई रिकार्ड नहीं है, परन्तु काफी संख्या में तालाब नष्ट होने का अनुमान है। प्रत्येक क्षेत्र में तालाब की भूमि पर खेती करने के उदाहरण मिल जाएंगे।

सन 1970 के आसपास मालवा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हरित क्रांति के प्रवेश के चलते कृषि में पानी की मांग तेज़ी से बढ़ी। सिंचाई (Irrigation) की बढ़ती मांग की पूर्ति के लिए वर्षा के पानी के दोहन के सतही स्रोतों से वंचित किसानों के लिए भूजल का दोहन ही एक मात्र सहारा रहा। परिणामस्वरूप मालवा में कुओं और नलकूपों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी। कुओं से सिंचित क्षेत्र का आकार सन 1966-67 में 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 629.5 हज़ार हैक्टर हो गया। जैसे-जैसे भूजल स्तर नीचे गिरता गया, वैसे-वैसे अधिक गहराई तक खोदने के बावजूद कुओं में पानी की उपलब्धता कठिन होती गई। ऐसे में किसानों ने नलकूपों का सहारा लेना शुरू कर दिया। आंकड़े बताते हैं कि सन 1966-67 में भूजल से सिंचित क्षेत्र 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 738.5 हज़ार हैक्टर (कुओं से 629.5 हज़ार हैक्टर और नलकूपों से 108.5 हज़ार हैक्टर) अर्थात लगभग 7 गुना हो गया। आगे भी यह प्रक्रिया धीमी गति से जारी रही है।

भूजल विशेषज्ञों का कहना है कि कुल भूजल भंडारों के 70 प्रतिशत भाग का दोहन ही सम्पोषणीय होता है, 70 से 90 प्रतिशत दोहन को सेमी क्रिटिकल, 70 से 100 प्रतिशत दोहन को क्रिटिकल तथा 100 प्रतिशत से अधिक दोहन को अतिदोहित भूजल की श्रेणी में रखा जाता है। मालवा में भूजल के दोहन की दृष्टि से ज़िले के आंकड़ों के बजाय विकास खण्ड स्तरीय आंकड़े अधिक उपयुक्त माने जाते है क्योंकि किसी-किसी ज़िले में किसी विकास खण्ड में भूजल भंडारों का दोहन 100 प्रतिशत से अधिक है तो कुछ विकास खंडों में 70 प्रतिशत से भी कम हो सकता है। जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट डायनेमिक ग्राउंडवॉटर रिसोर्सेज़ ऑफ मध्य प्रदेश के अनुसार 2009 में मालवा में 34 विकास खंडों में भूजल का दोहन 70 प्रतिशत से अधिक था। भूजल के अतिदोहन से भूजल स्तर नीचे तो जा ही रहा है, उसमें फ्लोरोसिस का खतरा बढ़ता जा रहा है। रतलाम ज़िले को छोड़ शेष 7 ज़िलों में फ्लोराइड (Fluoride) की मात्रा ज़्यादा पाई गई है।

जब हरित क्रांति तकनीक (Green Revoltion Techniques)के फैलाव के कारण भूजल के अतिदोहन के बावजूद पानी की बढ़ती मांग पूरी नहीं हो सकी तो किसानों ने सस्ती बिजली का उपयोग कर क्षेत्र के नदी नालों से पानी पंप कर सिंचाई शुरू कर दी। ऐसे सिंचित क्षेत्र को राजस्व विभाग ‘अन्य स्रोतों से सिंचित’ मद में शामिल करता है। सन 1966-67 में कुओं, नलकूपों, नहरों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र मात्र 208.00 हज़ार हैक्टर था तथा नदी नालों से सीधे सिंचित क्षेत्र मात्र 10.90 हज़ार हैक्टर था। सन 1998-99 में कुओं, नलकूपों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र का आकार बढ़कर 809.8 हज़ार हैक्टर अर्थात (1966-67 की तुलना में 3.9 गुना) हो गया, जबकि नदी नालों से सिंचित क्षेत्र सन 1996-97 में 10.9 हज़ार हैक्टर से बढ़कर 688.3 हज़ार हैक्टर हो गया (63 गुना से अधिक वृद्धि)। सन 1998-99 में सिंचित क्षेत्र में वृद्धि में नदी नालों से पानी पंप कर सिंचित क्षेत्र का योगदान 52.6 प्रतिशत रहा। इसके बाद तो नदी नाले सूखने लगे। इस तरह भूजल और सतही जल के अतिदोहन से मालवा की पारिस्थितिकी गड़बड़ा गई।

वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण ऊपर वर्णित समस्याएं तो उत्पन्न हुई ही हैं, गांधीसागर बांध में पर्याप्त मात्रा में पानी पहुंचाने का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाया है। गांधीसागर (Gandhisagar) में पानी संग्रहण की क्षमता 6.28 एम.ए.एफ. है, परंतु इसमें पानी आवक के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि सन 1976-77 से सन 1985-86 के दशक में इसमें पानी की औसत आवक 3.31 एम.ए.एफ. और 1993-94 से 2002-03 के दशक में 3.28 एम.ए.एफ. रही है। डेम्स, रिवर्स एंड पीपुल के हिमांशु ठक्कर के अनुसार चंबल घाटी योजना के तीनों बांधों में 1985-86 से 2009-10 की अवधि में विद्युत उत्पादन करीब 3.86 मेगावाट से गिरकर 1.9 मेगावाट ही रह गया।

इस तरह गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने और निर्धारित मात्रा में बिजली उत्पादन का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो सका है। साथ ही इसमें पानी की आवक के स्वरूप में भी परिवर्तन आ गया है। प्रारम्भिक वर्षों में तो जलग्रहण क्षेत्र में 10 इंच वर्षा के बाद ही गांधी सागर में आवक शुरू हो जाती थी, अब 20-22 इंच वर्षा के बाद ही पानी आना शुरू होता है। जल ग्रहण क्षेत्र की प्रारम्भिक वर्षा तो इस क्षेत्र की सूखी मिट्टी द्वारा सोखने और खाली हो चुके नदी नालों को भरने में ही खप जाती है। आवक चंबल में बाढ़ों के माध्यम से ही अधिक होती है।

सन 1961 से 1980 की 20 वर्षीय अवधि में चंबल में आने वाली बाढ़ों का औसत 3.15 प्रति वर्ष रहा जो 1981 से सन 2000 की 20 वर्षीय अवधि में बढ़कर 4.15 प्रति वर्ष हो गया। स्वाभाविक रूप से, बाढ़ों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ उनके साथ बहकर आने वाली मिट्टी की मात्रा में भी वृद्धि हुई होगी और इसी वजह से गांधीसागर की जल भरण क्षमता कम होती जा रही है।

ऐसे में एक प्रश्न उठता है कि क्या कोई ऐसा तरीका भी है जिसके माध्यम से चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर रोक को समाप्त किया जा सके ताकि मालवा पुन: हरा-भरा हो सके, इसमें डग-डग पर इसके नदी नालों में वर्ष भर पानी बहा करे और गांधीसागर में पानी की आवक पर कोई प्रतिकूल प्रभाव भी न पड़े?

इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें राजस्थान और मध्यप्रदेश के समझौते के उस अंश पर पुनर्विचार करना होगा कि गांधीसागर में वर्षा के पानी की आवक बनाए रखने के लिए चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संग्रहण हेतु किसी संरचना का निर्माण नहीं किया जाएगा। यह भी समझना होगा कि पोखरों, स्टॉप डैम्स तथा जोहड़ों का निर्माण होने दिया जाए तो संभावित परिणाम क्या होंगे। संभावित असर के अनुमान के लिए यह देखना होगा कि जयपुर के तरुण भारत संघ द्वारा अलवर ज़िले की थानागाझी तहसील में जन सहयोग से वर्षा जल के संचयन हेतु बनाए गए तालाबों, पोखरों, जोहड़ों, स्टॉप डैम्स (Stop Dams) आदि संरचनाओं के निर्माण के क्या प्रभाव रहे हैं। उससे पूर्व अलवर के राजा द्वारा वनों पर जनता के अधिकारों को छीनकर अपने अधिकार में लेने के पश्चात् सन 1930 में उस समय बिछाई जा रही रेल पटरियों के लिए लकड़ी की आपूर्ति हेतु सारे जंगलों को काट दिया गया था। जिससे वर्षा का पानी तेज़ी से बहकर नदियों में जाने लगा। वनों के विनाश के साथ ही मिट्टी में जैविक अंशों की कमी से उसकी वर्षा के पानी को धारण करने की क्षमता भी कम हो गई। जिस तरह चंबल के पानी के दोहन हेतु गांधीसागर बांध बनाया गया, उसी तरह क्षेत्र में बहने वाली नदी अरवारी नदी पर भी बांध बनाया गया, परन्तु गांधीसागर की तरह वह भी अधिकांश वर्षों में खाली रहता था, प्रतिकूल पारिस्थितिकी प्रभावों के कारण उस क्षेत्र में खेती भी कम होती जा रही थी, लोग रोज़गार हेतु दिल्ली, जयपुर आदि की ओर पलायन कर रहे थे। अर्थात मालवा की तुलना में थानागाझी तहसील और अरवारी नदी के जलग्रहण क्षेत्र के लोग वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण अपेक्षाकृत अधिक प्रतिकूल प्रभावों के शिकार हो रहे थे।

इसी पृष्ठभूमि में तरुण भारत संघ ने थानागाझी तहसील के गांव गोपालपुरा के मांगूलाल पटेल की सलाह पर उस क्षेत्र में तालाब, पोखर, जोहड़, स्टॉप डैम्स आदि बनाए। ऐसी संरचनाओं की संख्या करीब तीन हज़ार थी। राजस्थान के जल संसाधन विभाग ने यह कहते हुए कि इससे अरवारी नदी पर बने बांध में पानी की आवक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इन संरचनाओं के निर्माण का विरोध किया, किन्तु क्षेत्र में तालाब, पोखर आदि संरचनाओं का निर्माण तो एक जन आन्दोलन का अंग था, अत: सरकार उनके निर्माण को रोकने में असमर्थ रही। तरुण भारत संघ के नेतृत्व में क्षेत्र के 650 गांवों के निवासियों ने कुल 3000 संरचनाओं का निर्माण किया। यह सारा कार्य किसी इंजीनियर की सलाह के बगैर स्थानीय निवासियों के परम्परागत ज्ञान पर आधारित था। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय बाद क्षेत्र की 5 सूख चुकी नदियों में पुन: वर्ष भर पानी बहने लगा और अरवारी नदी पर बने बांध में भी पर्याप्त पानी आने लगा। अरावली पर्वत के हरे-भरे हो जाने से वर्षा के पानी के धीमी गति से बहने तथा मिट्टी में नमी बढ़ने से वर्ष में दो फसलें लेना और पशुपालन भी आसान हो गया। क्षेत्र में प्रतिदिन करीब 20 हज़ार कि.ग्रा. दूध पैदा होने लगा। पूरे क्षेत्र के किसानों की आर्थिक स्थिति (Economical Condition) में काफी सुधार हुआ। अरवारी तहसील में वर्षा जल के दोहन हेतु संरचनाओं के निर्माण के अनुकूल प्रभावों पर पूरे भारत का ही नहीं, पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हुआ। क्षेत्र की जनता और तरुण भारत संघ के राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन स्वयं क्षेत्र के ग्राम हमीरपुरा में पधारे। इस कार्य के लिए उन्हें डाउन टु अर्थ-जोसेफ सी. जॉन पुरस्कार भी दिया गया। विश्व की अन्य संस्थाओं ने भी श्री राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत किया।

चंबल के जलग्रहण क्षेत्र को भी थानागाझी तहसील में वर्षा के जल दोहन हेतु किए गए कार्य को दोहराना होगा। समाज के लोगों को वर्तमान में वर्षा जल के दोहन पर लगाई रोक के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक तथा क्षेत्र में वर्षा जल (Rainwater) के संचयन हेतु नई संरचनाओं के निर्माण के लिए प्रेरित करना मुश्किल नहीं होगा। सरकार भी इस कार्य में मदद कर सकती है। मालवा के नीमच तहसील के ग्राम बरलाई के किसानों ने वर्षा जल के संचयन हेतु सराहनीय कार्य किया है। ऐसा ही अन्य क्षेत्रों के किसान आसानी से कर सकेंगे। आवश्यकता है तो केवल राजेन्द्र सिंह जैसे व्यक्तित्व की जो इस क्षेत्र को इस दिशा में प्रेरित कर सकें। मालवा में वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के 55 वर्षों के प्रतिकूल प्रभावों के बाद अब इस क्षेत्र के पारिस्थितिकीविदों, किसानों और अन्य को इनसे मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कॉफी का दिमाग और मूड पर सकारात्मक प्रभाव

हाल ही प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, कॉफी (Coffee) पीने से बात सिर्फ ऊर्जा बढ़ाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह मूड को बेहतर करने, चिंता कम करने और मस्तिष्क के काम करने के तरीके पर भी असर डाल सकती है। एपीसी माइक्रोबायोम आयरलैंड के शोधकर्ताओं के अनुसार कैफीन-युक्त और कैफीन-मुक्त, दोनों तरह की कॉफी पेट के सूक्ष्मजीव-संसार को बदलकर मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बना सकती हैं।

नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित इस शोध में पेट-और मस्तिक (गट–ब्रेन) सम्बंध पर ध्यान दिया गया है। हालांकि कॉफी के फायदे पहले भी बताए जाते रहे हैं, लेकिन यह अध्ययन खास तौर पर दिखाता है कि कॉफी इस सम्बंध को कैसे सीधे प्रभावित करती है।

इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने 62 लोगों पर अध्ययन किया। इनमें से आधे लोग रोज़ 3–5 कप कॉफी पीते थे और बाकी कॉफी नहीं पीते थे। जब कॉफी पीने वालों ने दो हफ्ते तक कॉफी बंद की, तो उनके पेट के बैक्टीरिया में बदलाव दिखा। लेकिन जब दोनों समूहों ने कॉफी पीना शुरू किया, तो दोनों समूहों ने बेहतर मूड, कम तनाव (less stress) और कम अवसाद महसूस किया।

यह भी पता चला कि कॉफी पीने से पेट में पाचन और सेहत के लिए फायदेमंद बैक्टीरिया बढ़ते हैं। यही बदलाव मानसिक स्थिति (Mental Condition) को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि कॉफी का प्रकार भी मायने रखता है – कैफीन-मुक्त कॉफी से याददाश्त और सीखने की क्षमता बेहतर हुई, जिससे पता चलता है कि सिर्फ कैफीन ही नहीं, बल्कि कॉफी में मौजूद अन्य तत्व भी दिमाग के लिए फायदेमंद हैं।

कैफीन-युक्त कॉफी के कुछ अलग फायदे भी देखे गए। इसे पीने वाले लोगों में चिंता कम हुई, सतर्कता बढ़ी (more Attentive) और ध्यान बेहतर हुआ। साथ ही, यह शरीर में सूजन के खतरे को भी कम कर सकती है, जो जीर्ण बीमारियों से जुड़ी होती है।

यह नतीजे पहले के शोधों की भी पुष्टि करते हैं, जिनमें बताया गया था कि संतुलित मात्रा में कॉफी पीने से टाइप 2 डायबिटीज़, दिल की बीमारी और दिमाग से जुड़ी कुछ समस्याओं का खतरा कम हो सकता है। लेकिन यह नया अध्ययन खास तौर पर यह दिखाता है कि कॉफी तुरंत असर डालते हुए मूड और मानसिक स्पष्टता को भी बेहतर बना सकती है, और इसका सम्बंध पेट की सेहत से है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि कॉफी को सिर्फ जागने या ऊर्जा बढ़ाने वाला पेय नहीं समझना चाहिए, बल्कि यह शरीर के कई हिस्सों पर असर डालने वाला एक जटिल खाद्य तत्व है। यह पेट के अच्छे बैक्टीरिया (Good Bacteria) और उनके काम करने के तरीके को बदलकर शारीरिक और मानसिक सेहत दोनों को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।

यह सही है कि इसके लंबे समय के असर को समझने के लिए अभी और शोध की ज़रूरत है, लेकिन अब तक के नतीजे बताते हैं कि सीमित मात्रा में कॉफी पीना – चाहे उसमें कैफीन (Caffeine) हो या न हो – मूड सुधारने और रोज़मर्रा के तनाव को कम करने में मददगार हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हू-ब-हू एक जैसे जुड़वां के बीच पहचान का संकट

पिछले दिनों फ्रांस की एक अदालत में एक अजीबो-गरीब मामला उठा। पढ़ने में अत्यंत फिल्मी लगने वाला यह मामला जब यथार्थ में सामने आया तो खलबली मचना स्वाभाविक था।

हुआ यह कि हत्या के एक मामले में दो में से एक जुड़वा लिप्त था। बंदूक पर से डीएनए प्राप्त हुआ था। डीएनए वह आनुवंशिक पदार्थ होता है जिसकी मदद से सम्बंधित व्यक्ति की पहचान की जा सकती है। किया यह जाता है कि उस डीएनए के कुछ खंडों में क्षार का अनुक्रम पता किया जाता है। इस विधि में डीएनए के 30 विशिष्ट खंडों का क्षार अनुक्रम निकाला जाता है। ऐसा देखा गया है कि इन्हीं 30 खंडों में सबसे अधिक विविधताएं पाई जाती हैं – यानी इन हिस्सों में व्यक्ति-व्यक्ति में सबसे अधिक अंतर देखे जाते हैं और इनके आधार पर तुलना करके व्यक्ति की पहचान की जा सकती है।

लेकिन जब मामला हू-ब-हू एक जैसे या आइडेंटिकल जुड़वां का हो तो बात बदल जाती है। आइडेंटिकल जुड़वा एक ही अंडाणु के, एक ही शुक्राणु से निषेचन से बने भ्रूण के दो भागों में बंटकर अलग-अलग विकसित होने से बनते हैं। यानी इन दोनों में डीएनए एक समान होता है। तो डीएनए के 30 छोटे-छोटे खंडों की तुलना से व्यक्ति विशेष की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। तो क्या किया जाए?

इस संदर्भ में डीएनए के चंद खंडों की बजाय पूरे-के-पूरे डीएनए (यानी समूचे जीनोम) का विश्लेषण मददगार हो सकता है। इस तरीके में वैज्ञानिक यह पता कर सकते हैं कि निषेचित अंडे के विभाजन के बाद डीएनए में किस तरह के उत्परिवर्तन हुए हैं। 2014 में किए गए एक अध्ययन में दो वयस्क जुड़वा के डीएनए में मात्र 5 जेनेटिक अंतर देखे जा सके थे। समूचे जीनोम के विश्लेषण से कुछ मामलों में अदालतों को जुड़वा के बीच भेद करने में मदद ज़रूर मिली है लेकिन इस तरह के विश्लेषण के लिए ज़रूरी होता है कि पर्याप्त मात्रा में डीएनए मिल जाए, जो मिलना काफी मुश्किल होता है।

इस सिलसिले में कुछ शोधकर्ताओं ने माइटोकॉण्ड्रिया में पाए जाने वाले डीएनए की मदद ली है। गौरतलब है कि माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकाओं में पाया जाने वाला एक ऐसा उपांग है जिसके पास अपना डीएनए होता है और यह केंद्रक में पाए जाने वाले डीएनए से स्वतंत्र होता है। माइटोकॉण्ड्रिया के डीएनए (mtDNA) में अपेक्षाकृत तेज़ी से परिवर्तन होते हैं। अर्थात जुड़वा संतानें mtDNA के मामले में ज़्यादा अंतर दर्शाती हैं। यूएस की अदालतें आजकल mtDNA के प्रमाणों को स्वीकारने लगी हैं।

इस संदर्भ में डीएनए विश्लेषण की एक और तकनीक पर शोध जारी है। यह देखा गया है कि उम्र के साथ कोशिकाओं के केंद्रक में डीएनए पर अलग-अलग स्थानों पर मिथाइल समूह चस्पा होने लगते हैं। यानी स्वयं डीएनए में तो कोई परिवर्तन नहीं होता लेकिन मिथाइल समूह चस्पा होने के कारण जीन्स की अभिव्यक्ति बदलने लगती है। इन परिवर्तनों को एपिजेनेटिक परिवर्तन कहते हैं और ये व्यक्ति के खानपान, धूम्रपान या शराब सेवन जैसे व्यवहारों के कारण अलग-अलग हो सकते हैं; जुड़वा के बीच भी अंतर आ जाते हैं। इनके आधार पर उन्हें अलग-अलग पहचाना जा सकता है। जैसे दक्षिण कोरिया में वैज्ञानिकों ने 54 नवजात आइडेंटिकल जुड़वा के जीनोम्स का विश्लेषण किया था। एपिजेनेटिक अंतरों के आधार पर वे 54 जुड़वाओं में से 50 के बीच भेद कर पाए थे। यही प्रयोग जब वयस्क जुड़वाओं पर किया गया तो 47 में से 41 जोड़ियों तथा 118 में से 105 जोड़ियों के जुड़वाओं की अलग-अलग पहचाने हो पाई थी।

फ्रांस की अदालत में तो मुकदमा जारी है लेकिन वैज्ञानिक अपने तईं कोशिशों में इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://raisingchildren.net.au/pregnancy/health-wellbeing/twin-pregnancy/twins

बच्चों पर सोशल मीडिया के प्रभाव पर ऐतिहासिक फैसला

लॉस एंजिल्स की अदालत (Los Angeles court case) के एक अहम फैसले में सोशल मीडिया कंपनियों पर सख्त नियंत्रण की मांग करने वालों को बड़ी जीत मिली है। ज्यूरी ने माना कि बड़ी टेक कंपनियों ने जानबूझकर ऐसे प्लेटफॉर्म बनाए जो लोगों को ‘लत’ (addictive platforms) लगा देते हैं। अदालत ने स्वीकार किया कि इसी के चलते 20 वर्षीय युवती (कैली – के.जी.एम.) की मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचा है। 20 साल की कैली द्वारा दायर यह मामला इस बात में बदलाव ला सकता है कि समाज बच्चों के प्रति सोशल मीडिया कंपनियों की ज़िम्मेदारी (platform accountability) को कैसे देखता है।

कैली द्वारा अदालत को दिए बयान के अनुसार, उसने बहुत कम उम्र में ही यूट्यूब और इंस्टाग्राम (YouTube Instagram usage) का इस्तेमाल शुरू कर दिया था, जबकि नियम इसके खिलाफ थे। धीरे-धीरे उसका इन प्लेटफॉर्म्स पर व्यतीत समय इतना बढ़ गया कि उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित होने लगी। वह परिवार से दूर रहने लगी और घंटों ऑनलाइन रहने लगी। लगभग 10 साल की उम्र में उसे दुश्चिंता और अवसाद (anxiety depression) जैसी समस्याएं होने लगीं, जिसकी पुष्टि बाद में डॉक्टर ने भी की। साथ ही उसे अपने शरीर को लेकर ज़रूरत से ज़्यादा चिंता रहने लगी।

ज्यूरी ने यह भी पाया कि मेटा (Meta platforms) (इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सऐप) और गूगल (यूट्यूब) (Google YouTube) ने ऐसे फीचर्स बनाए जो लोगों को ज़्यादा समय तक ऑनलाइन बांधे रखते हैं, जिससे कैली की मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ा। अदालत ने उसे 60 लाख डॉलर का मुआवज़ा देने का आदेश दिया, जिसमें मेटा को ज़्यादा हिस्सा देना होगा। यह फैसला सिर्फ कैली के लिए ही नहीं, बल्कि अमेरिका में चल रहे ऐसे सैकड़ों मामलों (legal precedent) के लिए भी महत्वपूर्ण नज़ीर माना जा रहा है।

इस मामले का मुख्य मुद्दा यह था कि सोशल मीडिया के कुछ फीचर्स – जैसे लगातार स्क्रॉल करना और एल्गोरिदम के अनुसार कंटेंट दिखाना (content recommendation system) – इरादतन इस तरह बनाए गए थे कि लोग ज़्यादा समय तक जुड़े रहें। कैली के वकीलों ने इन्हें ‘लत लगाने वाली मशीन’ बताया और कहा कि कंपनियों को इसके असर का पता था, खासकर बच्चों पर। लेकिन उन्होंने नुकसान रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि कम उम्र के यूज़र्स को जोड़कर रखना कंपनियों का बड़ा लक्ष्य (user engagement strategy) था।

कंपनियों ने इस फैसले को मानने से इन्कार (legal appeal) किया है और अपील करने की बात कही है। मेटा का कहना है कि किशोरों की मानसिक समस्याएं कई कारणों से होती हैं, सिर्फ एक प्लेटफॉर्म को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। गूगल ने कहा कि यूट्यूब तो एक वीडियो सेवा (video platform) है, न कि पारंपरिक सोशल मीडिया। लेकिन ज्यूरी ने माना कि दोनों कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्म को बनाने और चलाने में गंभीर लापरवाही (corporate negligence) की है।

यह मामला ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में बच्चों पर सोशल मीडिया के असर (social media effects on children) को लेकर चिंता बढ़ रही है। हाल के महीनों में कई और फैसलों में भी कंपनियों को हानिकारक या अनुचित कंटेंट दिखाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि अब लोगों की सोच बदल रही है और टेक कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे मुनाफे और यूज़र एंगेजमेंट (profit vs safety) से ज़्यादा यूज़र की सुरक्षा को प्राथमिकता दें।

अब सरकारें भी इस मुद्दे पर कदम (government regulation) उठाने लगी हैं। कुछ देशों ने नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने या सीमाएं तय करने की शुरुआत कर दी है। ब्रिटेन (UK social media policy)  में यह भी विचार हो रहा है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। इससे संकेत मिलता है कि सरकारें मान रही हैं कि मौजूदा सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं और सख्त नियमों (strict laws) की ज़रूरत है।

अभियान चलाने वालों और प्रभावित परिवारों (advocacy groups) ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि अब सोशल मीडिया से जुड़े खतरों को गंभीरता से लिया जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि असली बदलाव सिर्फ अदालत के फैसलों से नहीं आएगा, बल्कि इसके लिए कड़े नियम (policy reforms) और कंपनियों में सुधार भी ज़रूरी होंगे।

बहरहाल, यह मामला एक बड़ी बहस को सामने लाता है – तकनीकी विकास, मुनाफा और लोगों की सेहत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जन-आंदोलन के रूप में स्वास्थ्य सेवा: शहीद अस्पताल

रोहित एम.

लौह अयस्क (iron ore mining) की लाल धूल से ढंकी हुई दल्ली राजहरा (Dalli Rajhara, Chhattisgarh) की सड़कों को देखकर ऐसा लगता है जैसे समय कहीं ठहर सा गया हो। इस छोटे से शहर में रहने और सांस लेने के कुछ ही पलों बाद एक अजीब से विलगाव का एहसास होना तय है।

इसमें जब उस मज़दूर आंदोलन (labor movement history), जिसने लगभग आधी सदी से इस शहर को आकार दिया है, की कहानी जुड़ जाती है तो दंतकथा बनना तय है। इस इतिहास का जीता-जागता साक्षी है शहीद अस्पताल (Shaheed Hospital model)। यह अस्पताल, जिसे मज़दूरों ने मज़दूरों के लिए बनाया था, जिसकी एक-एक ईंट मज़दूरों के योगदान से आई थी, एक असाधारण दौर की याद दिलाता है।

अस्पताल की पुरानी इमारत के प्रवेश द्वार पर लगी शिला-स्मारिका (memorial plaque) – जो 3 जून, 1983 को शहीद अस्पताल के उद्घाटन की याद दिलाती है – पर दो नाम खुदे हुए हैं: लहर सिंह (खदान मज़दूर) और हलालखोर (किसान और अर्रेझर गांव के बड़े-बुज़ुर्ग)। ये वे लोग थे जिन्होंने इस अस्पताल का उद्घाटन किया था।

दल्ली और राजहरा, भिलाई स्टील प्लांट (Bhilai Steel Plant – बीएसपी) के स्वामित्व वाली दो लौह अयस्क खदान इकाइयां हैं, जिनके नाम पर इस शहर का नाम ‘दल्ली राजहरा’ पड़ा है। यह बालोद ज़िले में स्थित एक छोटा सा कस्बा है, जो भिलाई से लगभग 90 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी लगभग 44,000 है।

शहीद अस्पताल में 100 से 150 किलोमीटर दूर तक के कस्बों और गांवों से लोग इलाज के लिए आते हैं। मंगलवार को छोड़कर, सप्ताह के बाकी सभी दिन अस्पताल की ‘बाह्य-रोगी’ (OPD) इमारत और रिसेप्शन लॉबी में खूब आवक-जावक रहती है। शहर से सटी हुई लौह अयस्क की खदानें — जिनका इतिहास इस जगह से गहराई से जुड़ा हुआ है — मंगलवार को बंद रहती हैं। इसी वजह से, शहीद अस्पताल में भी मंगलवार को सीमित सेवाएं ही उपलब्ध रहती हैं।

एक आम दिन में शहीद अस्पताल की लॉबी राजनांदगांव, रायपुर, बालोद, कांकेर, चरामा और अन्य जगहों से आए मज़दूरों, किसानों और छोटे-मोटे दुकानदारों (working class patients) से खचाखच भरी रहती है, जो अपने रजिस्ट्रेशन का इंतज़ार कर रहे होते हैं।

बाहर से देखने पर, शहीद अस्पताल नई और पुरानी इमारतों का एक मिला-जुला रूप लगता है, जिसमें घुमावदार सीढ़ियां, एक विशाल प्रतीक्षालय और अलग-अलग हिस्सों की ओर जाने वाले गलियारे हैं। अस्पताल का स्टाफ पूरी लगन से विभिन्न वार्डों में घूमता रहता है और बीमारों की देखभाल करता है। बाहरी दिखावों से परे, अस्पताल का इतिहास मुख्यत: बातों के ज़रिए ही फैलता जाता है, जिनमें संघर्षों (workers struggle) की यादें गुंथी होती हैं।

कहानियां मुंह-ज़ुबानी एक से दूसरे इंसान तक पहुंचती हैं — जैसे, छत के बहुत जल्दी बन जाने की कहानी, जिसको बनाने में दस हज़ार खदान मज़दूरों (mine workers protest) ने अपना काम रोककर योगदान दिया था; या फिर वह कहानी जिसमें अस्पताल को बिजली देने से मना कर दिया गया था, जिसके बाद खदानों के हर क्षेत्र के मज़दूरों ने मिलकर विरोध प्रदर्शन (workers protest movement) किया था। ये घटनाएं अस्पताल के स्टाफ और स्थानीय समुदाय की यादों में हमेशा-हमेशा के लिए रच-बस गई हैं।

मज़दूरों के ऐतिहासिक संघर्षों (trade union history) से निकले कई मूल्य शहीद अस्पताल के रोज़मर्रा के कामकाज में साफ झलकते हैं। अस्पताल का संचालन समितियों और एक मज़बूत आंतरिक लोकतंत्र प्रणाली (internal democracy system) के ज़रिए किया जाता है। नर्सें, सफाईकर्मी, डॉक्टर और अन्य स्टाफ अलग-अलग प्रशासनिक मामलों पर फैसले लेने में बराबर की हिस्सेदारी निभाते हैं।

बैठकों में वेतन, काम के घंटे, कार्यस्थल से जुड़े मुद्दे और अस्पताल के भावी कार्यों (organizational decisions) जैसे विषयों पर चर्चा की जाती है। “यहां कुछ ज़्यादा ही लोकतंत्र है”, ऐसी काना-फूसी अक्सर मैंने सुनी है; लोगों का कहना है कि निर्णय प्रक्रिया बहुत ज़्यादा थकाऊ और लंबी-लंबी बहसों (democratic process challenges) वाली होती है। हालांकि, आंतरिक लोकतंत्र के प्रति शहीद अस्पताल की प्रतिबद्धता पूरी तरह से अडिग है।

जग्गू राम साहू – जिन्हें प्यार से ‘जग्गू दादा’ कहते हैं — 70 वर्षीय रिटायर्ड खदान मज़दूर (retired mine worker) हैं जो अक्सर अस्पताल में अपनी साधारण-सी गुलाबी शर्ट पहने हुए दिखते हैं और मरीज़ों व स्टाफ, दोनों का ही बड़े प्यार से अभिवादन करते हैं। अब वे पूर्णकालिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (community health worker) के तौर पर काम करते हैं। एक बार मैंने उनसे अस्पताल के इतिहास के बारे में पूछा। उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया; वे कुर्सी की छोर पर बैठ गए और उन्होंने मुझे ‘लाल मैदान’ (Red Maidan protest) में हुई उस ऐतिहासिक बैठक के बारे में विस्तार से बताया।

खदानों में ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों (contract labor issues) में लंबे समय से जो अलगाव की भावना पनप रही थी, वह 1977 के ‘लाल मैदान’ विरोध प्रदर्शन (1977 labor protest)  के रूप में सामने आई। इमर्जेंसी हटे अभी ज़्यादा समय नहीं गुज़रा था, और हवा में संघर्ष करने तथा मज़दूरों के जायज़ अधिकारों को वापस दिलाने का जोश भरा हुआ था। जग्गू दादा याद करते हुए बताते हैं, “उन दिनों जो मज़दूर पक्की नौकरी पर नहीं थे उन्हें महीने के 70 रुपए मिलते थे, जबकि पक्की नौकरी वाले मज़दूरों की तनख्वाह 300 रुपए थी। दरअसल, दोनों तरह के मज़दूर एक ही तरह का काम कर रहे थे।”

जग्गू दादा जब लाल मैदान विरोध प्रदर्शन (labor union protest) के उन जोशीले दिनों के बारे में बात करते हैं, तो उनकी आंखों में एक चमक दिखाई देती है। उन्हें याद है कि हज़ारों ठेका मज़दूर कई दिनों तक वहीं जमे रहे; वे नाचते-गाते थे और आपस में संगठित होने तथा यूनियन बनाने के बारे में चर्चा करते थे। वे बोनस, साइट पर जबरन खाली बैठाने के बदले मुआवज़ा और बारिश के पहले अपनी कच्ची झोपड़ियों की मरम्मत (labor welfare demands) के लिए भत्ते की मांग कर रहे थे।

लाल मैदान का यह विरोध प्रदर्शन आगे चलकर ‘छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ’ (CMSS) में बदल गया। यह एक ऐसा मज़दूर संगठन था जिसने शंकर गुहा नियोगी को अपना नेता चुना, जो कि उस समय यूनियन संगठक और आंदोलनकर्ता के तौर पर जानी जाने वाली शख्सियत थे। जब मैंने जग्गू दादा से पूछा कि उन्हें शंकर गुहा नियोगी के बारे में कैसे पता चला और यह फैसला उन्होंने कैसे किया कि वही उनके नेता होंगे, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “आपको नेल्सन मंडेला (Nelson Mandela inspiration) के बारे में कैसे पता चला और आपने उनका सम्मान करने का फैसला कैसे किया? ठीक उसी तरह, हमें भी उस समय तक नियोगी जी के बारे में पता चल चुका था और हमने उन्हें अपना नेता चुन लिया।”

अधिकारों के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ता और शिक्षाविद इलीना सेन, जो दल्ली राजहरा के ट्रेड यूनियन आंदोलन से काफी करीब से जुड़ी हुई थीं, अपनी संस्मरण किताब इनसाइड छत्तीसगढ़ – ए पॉलिटिकल मेमॉयर (Inside Chhattisgarh – A Political Memoir) में लिखती हैं: “1977 में जब नई यूनियन बनी, उसके कुछ ही समय बाद उसके नेताओं ने पास की दानीटोला खदानों का दौरा किया। वहां शंकर गुहा नियोगी अपने ससुराल में अपना स्वास्थ्य संभाल रहे थे। वे आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम (मीसा – MISA Act India) जैसे सख्त और भयावह कानून के तहत हिरासत से रिहा हुए थे और वहां ठीक हो रहे थे।” यहीं पर यूनियन नेताओं ने, जो कि नियोगी के काम और विचारों से अच्छी तरह वाकिफ थे, उनसे मज़दूर आंदोलन के बौद्धिक और संगठनात्मक विकास (labor movement leadership) की बागडोर संभालने की गुज़ारिश की।

यह आंदोलन जग्गू दादा जैसे कई लोगों के लिए ज़िंदगी बदलने वाला अनुभव (social movement impact) साबित हुआ। लोगों की मदद करने की अपनी दिली चाहत की वजह से उनका झुकाव ‘स्वास्थ्य विभाग’ की ओर हुआ। स्वास्थ्य विभाग मज़दूर संगठन द्वारा बनाए गए 17 विभागों में से एक था। ‘शहीद अस्पताल’ इसी स्वास्थ्य विभाग की एक पहल थी। इस अस्पताल का नाम उन 11 खदान मज़दूरों की शहादत (martyrs memorial) की याद में रखा गया था, जो 1977 में हुई पुलिस फायरिंग में मारे गए थे। यह घटना ऐतिहासिक ‘लाल मैदान’ सभा के बाद हुई थी।

जग्गू दादा ने 1981 में एक ‘स्वयंसेवी स्वास्थ्य कार्यकर्ता’ (volunteer health worker) के तौर पर अपने काम की शुरुआत की थी। उस समय, ट्रेड यूनियन दफ़्तर के परिसर में बनी एक कच्ची झोपड़ी (गैराज) में ही एक अस्थायी क्लीनिक चलाया जाता था। 2012 में अपनी सेवानिवृत्ति तक वे दिन के समय खदानों में काम करते, और साथ ही एक स्वयंसेवी स्वास्थ्य कार्यकर्ता के तौर पर भी अपनी सेवाएं देते रहे — यह एक ऐसा काम था जिसके प्रति उनके मन में गहरा जुनून था। सेवानिवृत्ति के बाद, वे एक ‘पूर्णकालिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता’ बन गए। उन्होंने शहीद अस्पताल की स्वास्थ्य टीमों के साथ मिलकर भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal gas tragedy relief) और 1993 के लातूर भूकंप (Latur earthquake relief) जैसी आपदाओं के दौरान राहत कार्यों में हिस्सा लेने के लिए काम से लंबी-लंबी छुट्टियां भी लीं – इस कारण उनके वरिष्ठ अधिकारियों की त्यौरियां भी चढ़ गईं।

जग्गू दादा के लिए, सामाजिक सक्रियता (एक्टिविज़्म-activism) और स्वास्थ्य सेवा का काम आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है। जब मैंने उनसे शंकर गुहा नियोगी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत ‘संघर्ष और निर्माण’ (struggle and development concept) के बारे में पूछा, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “हम अपने पेट की खातिर संघर्ष करते हैं, और समाज की सेवा के लिए अस्पताल में काम करते हैं।”

शहीद अस्पताल के वरिष्ठ सदस्यों से जग्गू दादा जैसी कहानियां अक्सर सुनने को मिलती रहती हैं।

कुलेश्वरी दीदी यानी कुलेश्वरी सोनवानी, जो इस समय अस्पताल की सबसे वरिष्ठ नर्स हैं, ने मुझे अपनी कहानी सुनाई, “शहीद अस्पताल के बिना मेरी अपनी कोई पहचान ही नहीं है।” वे उन चुनिंदा नर्सों में से हैं, जो उस शुरुआती दौर से ही अस्पताल के साथ जुड़ी रही हैं, जब यह ट्रेड यूनियन दफ्तर के गैराज में चलने वाला एक अस्थायी क्लीनिक हुआ करता था।

जब मैंने उनसे पूछा कि आज जो भव्य शहीद अस्पताल हमारे सामने खड़ा है, उसकी नींव कैसे रखी गई, तो उन्होंने मुझे कुसुम बाई (maternal death case) की कहानी सुनाई। उन्होंने बताया, “कुसुम बाई मज़दूर नेताओं में से एक थीं। मेडिकल सुविधाओं की कमी के चलते प्रसव के दौरान उनकी मौत हो गई। दल्ली राजहरा में बीएसपी के स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों ने उन्हें भर्ती करने से मना कर दिया था, क्योंकि उनके पास हेल्थ कार्ड (health access issue) नहीं था। कुसुम बाई की शोक सभा में मज़दूरों ने फैसला किया कि वे अपने और ऐसी ही मुश्किलों का सामना कर रहे अपने जैसे अन्य लोगों के लिए एक अस्पताल बनाएंगे।”

जब तक शहीद अस्पताल नहीं बना था, तब तक दल्ली राजहरा में ठेके पर काम करने वाले खदान मज़दूरों (contract workers healthcare) के लिए स्वास्थ्य सेवाएं लगभग न के बराबर थीं। उन्हें नियमित मज़दूरों की तरह कोई सुविधाएं या अधिकार नहीं मिलते थे। मज़दूरों के अपने अस्पताल बनाने के पक्के इरादे को कई युवा डॉक्टरों का साथ मिला – जैसे, बिनायक सेन (Binayak Sen), आशीष कुंडू, पवित्र गुहा, सैबल जाना, पुण्यब्रत गुन वगैरह। इन डॉक्टरों ने मज़दूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनके इस सामूहिक सपने को पूरा करने में मदद की।

69 साल की अनुभवी कार्यकर्ता कुलेश्वरी दीदी को अपनी ज़िंदगी के सफर में कई निजी मुश्किलों (domestic violence) का सामना करना पड़ा। उनके पति बिल्कुल नहीं चाहते थे कि वे शहीद अस्पताल में काम करें। उन्होंने मुझे बताया कि उस ज़माने में जो औरतें काम के लिए घर से बाहर निकलती थीं उन्हें ‘चरित्रहीन’ (women stigma) कहा जाता था। अपने पति के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “उन्हें शराब की बहुत बुरी लत थी। वे देर रात घर लौटते थे और मुझे मारते-पीटते थे।” शक की वज़ह से कभी-कभी वे कुलेश्वरी दीदी की रात की ड्यूटी के वक्त अस्पताल में ही सोते थे। कई बार उन्होंने अपने घर के हिंसक माहौल से भागकर अस्पताल में ही पनाह ली। उनके पति शराब पर ही सारा पैसा उड़ा देते थे। उनके पति द्वारा नशे में की गई हिंसा आज भी उनकी यादों में ताज़ा है। वे बताती हैं, “उन दिनों के बारे में सोचते ही मैं सिहर उठती हूं।”

उस मुश्किल दौर में जब उनके परिवार ने उनका साथ छोड़ दिया था और कोई भी उनके साथ खड़ा नहीं था, तब अस्पताल के डॉक्टरों और कर्मचारियों ने ही हर तरह से उनकी मदद (support system) की थी। “मुझे नहीं लगता कि इस अस्पताल के बिना मैं इतने लंबे समय तक ज़िंदा रह पाती।” यह कहते हुए उनकी आंखे भर आईं थीं। उनके दो बेटे और एक बेटी थी। उनके एक बेटे ने आत्महत्या कर ली थी। जैसे-जैसे समय बीतता गया और कुलेश्वरी दीदी के बच्चे बड़े होते गए, घर में उनकी स्थिति और मज़बूत होती गई।

मिट्टी की एक छोटी-सी झोपड़ी में शुरू हुआ छोटा-सा दवाखाना (small clinic beginning) चार दशकों का सफर तय कर आज एक विशाल और शानदार अस्पताल (modern hospital setup) बन चुका है। हालांकि, शहीद अस्पताल के शुरुआती साल चुनौतियों से भरे थे। सुजाता दीदी, वे भी अनुभवी नर्स हैं और हाल ही में रिटायर हुई हैं, ने अस्पताल के शुरुआती दिनों की बहुत ही छोटी-छोटी बातें बताईं।

उस समय, पेशेवर स्टाफ को रखने के लिए बहुत कम पैसे (low funding healthcare) थे। स्वास्थ्य कार्यों में रुचि रखने वाले लोगों को अस्पताल चलाने के लिए स्वयंसेवक के तौर पर भर्ती किया गया। अपने संस्मरण में इलीना सेन लिखती हैं कि कैसे डेविड वर्नर (David Werner book) की किताब ‘जहां डॉक्टर न हो (व्हेयर देयर इज़ नो डॉक्टर – Where There Is No Doctor) स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए एक बुनियादी किताब बन गई थी। चूंकि कई कार्यकर्ताओं की औपचारिक शिक्षा सीमित थी, इसलिए जानकारी देने के लिए चर्चाओं और चित्रों का इस्तेमाल किया जाता था, साथ ही डॉक्टरों के साथ सैद्धांतिक और प्रैक्टिकल कक्षाएं भी होती थीं।

इसी तरह, एक ट्रेड-यूनियन बैठक के बाद सुजाता दीदी को क्लीनिक-डिस्पेंसरी में काम शुरू करने के लिए बुलाया गया। ‘वह एक ऐसा समय था जब हमें एक साथ कई काम (multi tasking healthcare) करने पड़ते थे। नर्सिंग के कामों के अलावा, हम बहुत दूर से पानी लाते थे, कपड़े धोते थे, खाना बनाते थे और क्लीनिक को संभालते थे।’ वे याद करते हुए बताती हैं कि अस्पताल की पुरानी मिट्टी की दीवारों (rural setup hospital) पर गोबर और मिट्टी से छबाई भी किया करते थे।

शुरुआती दिनों में, डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं सहित पूरा स्टाफ बहुत ही घनिष्ठ समुदाय की तरह रहता था। वे एक साथ रहते थे और अपना खाना आपस में बांटकर खाते थे। यहां तक कि डॉक्टर और नर्स भी अस्पताल की चादरें धोने जैसे कामों में हाथ बंटाते थे। उन्होंने याद करते हुए बताया, “हम शायद ही कभी अस्पताल से बाहर जाते थे। हमने कई-कई घंटों काम किया, सुबह 11 बजे से रात 12 बजे तक। और शुरू में, हमें कोई वेतन (unpaid work) नहीं मिलता था। हम तो बस अपने लोगों की मदद कर रहे थे।”

अब, 150 बिस्तरों वाला यह अस्पताल – जिसमें सर्जरी, जनरल मेडिसिन और प्रसूति एवं स्त्री रोग के लिए वार्ड हैं – इस क्षेत्र की नर्सों, सफाई कर्मचारियों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं, कम्युनिस्ट डॉक्टरों, मज़दूरों और किसानों (people powered healthcare) के कंधों पर खड़ा हुआ है। इसकी फीस बहुत कम है, ताकि यहां के लोगों की आमदनी के हिसाब से उनकी जेब पर भारी न पड़े। इसका प्रशासन मुख्य रूप से ट्रेड यूनियन के नेताओं और अस्पताल के कर्मचारियों (collective management) द्वारा किया जाता है। शहीद अस्पताल के बाह्य-रोगी विभाग (OPD) में रोज़ाना तकरीबन 200 मरीज़ आते हैं।

इस शानदार काम की मज़बूत रीढ़ हैं 70 वर्षीय मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. सैबल जाना (Dr Saibal Jana), जिन्हें प्यार से ‘जाना सर’ कहते हैं। वे ऊर्जा के एक ऐसे स्रोत हैं जो शहीद अस्पताल के कामकाज को सुचारू रूप से चलाए रखता है।

पिछले 40 वर्षों से, डॉ. जाना ने अस्पताल को एकजुट रखा है, और खुद को मज़दूरों के संघर्षों (egalitarian values) से जुड़े समानतावादी मूल्यों के प्रति समर्पित कर दिया है। मज़बूत कद-काठी वाले, दिल खोलकर हंसने वाले और असीम ऊर्जा से भरे इस सज्जन को अक्सर क्लीनिकल राउंड के दौरान एक सादे सूती कुर्ते या शर्ट में देखा जा सकता है। चपटे फ्रेम वाले चश्मे के पीछे उनकी आंखें हर मरीज़ को पूरे ध्यान से देखती हैं। जैसा कि एक डॉक्टर ने मुझे बताया, “जाना सर मरीज़ों के चेहरों को बहुत ध्यान से देखने (clinical observation) पर ज़ोर देते हैं। उनके अनुसार, कई मामलों में, सिर्फ चेहरा देखकर ही बीमारी का एक मोटा-मोटा अंदाज़ा लगाया जा सकता है।”

लगातार खुद सीखते रहने की बदौलत वे एक ऐसे डॉक्टर बन गए जो इस क्षेत्र के लोगों की सभी चिकित्सकीय और सर्जिकल ज़रूरतों का इलाज करने में सक्षम हैं। शहीद अस्पताल के नेता के तौर पर, उन्होंने ‘जन स्वास्थ्य आंदोलन’ (public health movement) की अगुवाई की, जिसने इस क्षेत्र के मज़दूरों को प्रभावित करने वाले स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न मुद्दों के संदर्भ में अभियान चलाया।

इमारत के निर्माण से लेकर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण तक, अस्पताल के विकास के हर चरण में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। हर्निया का ऑपरेशन करते समय ऑपरेशन टेबल पर अरबपतियों के बारे में बात करने से लेकर, नियमित राउंड के दौरान स्वास्थ्य और इलाज जैसे विषयों पर बड़ी दवा कंपनियों (pharma industry critique) के नैरेटिव को सक्रिय रूप से चुनौती देने तक, डॉ. जाना शहीद अस्पताल के लिए एक नैतिक मार्गदर्शक की तरह हैं।

क्लीनिकल राउंड लेते समय, एक बार उन्होंने ट्रेड यूनियन नेता शंकर गुहा नियोगी की ‘अर्ध-मशीनीकरण’ (semi mechanization concept) की अवधारणा को दोहराते हुए कहा था, “अगर मशीनें गलती करें, तो शायद हमें कभी पता ही न चले। लेकिन अगर इंसान गलती करते हैं, तो उसे सुधारने की गुंजाइश हमेशा रहती है।” ‘अर्ध-मशीनीकरण’ आज के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI debate) और तकनीकी क्रांतियों के दौर के लिए एक महत्वपूर्ण विचार है, जिसे फिर से सामने लाने की ज़रूरत है। यह CMSS के उस अभियान से विकसित हुआ था जो पूर्ण-मशीनीकरण के खिलाफ था, क्योंकि पूर्ण-मशीनीकरण से खदानों में कई नौकरियां खत्म हो जातीं।

उस समय, नियोगी ने तर्क दिया था कि भारत जैसे श्रम-अधिशेष (जहां श्रमिकों की बहुतायत हो – labor surplus economy) वाले देश के लिए पूर्ण-मशीनीकरण वांछनीय तकनीकी विकल्प नहीं है, और भविष्य में दल्ली राजहरा खदानों के लिए एक बेहतर रणनीति अर्ध-मशीनीकरण ही होगी।’ CMSS ने खनन में अर्ध-मशीनीकरण पर एक अध्ययन भी करवाया था, जिसमें दिल्ली के अर्थशास्त्रियों की एक शोध टीम शामिल थी। इलीना सेन अपने संस्मरणों में उनकी रिपोर्ट के बारे में लिखती हैं, “उनकी रिपोर्ट ने इस विकल्प की सराहना की और दिखाया कि लागत के लिहाज़ से अर्ध-मशीनीकरण सस्ता था, और साथ ही यह श्रमिकों के लिए भी अनुकूल था।”

इसी भावना के साथ, डॉ. जाना मशीनों से हासिल निष्कर्षों (human vs machine) के मुकाबले मानवीय अवलोकन को ज़्यादा महत्व देते हैं। अत्यधिक टेस्ट करवाने की बजाय बारीकी से शारीरिक जांच अपनाने से मरीज़ों को अनावश्यक स्वास्थ्य खर्चों से बचने में मदद मिल सकती है। एक अन्य अवसर पर, डॉ. जाना ने कहा था, ‘हमें उत्पादन की प्रक्रिया में अपनी चेतना (human intelligence) का उपयोग करने की ज़रूरत है। जो लोग मशीनों को बढ़ावा देना चाहते हैं, वे ही मानवीय मूल्यों के ऊपर मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं। मशीन के पुर्ज़ों को समय-समय पर बदलना पड़ता है, और यह अपने आप में खर्चीली प्रक्रिया है।’

उन्होंने कहा था, “अंततः, निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए मानवीय चेतना ही सबसे महत्वपूर्ण है।” यह पूंजी-प्रधान तकनीक (capital intensive technology) की बजाय लोगों के विज्ञान को सशक्त बनाने (people’s science centric approach) की दिशा में एक कदम है। कई मायनों में, डॉ. जाना के शब्द शहीद अस्पताल के मूल मूल्यों को पूरी तरह से समेटे हुए हैं।

शहीद अस्पताल में फुसफुहाटें (collective voice)  बयार बन जाती हैं। एक डाल से दूसरी डाल तक और एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ तक, मशीनी खदानों की भूलभुलैया जैसी गुफाओं से एक गूंज उठती है और पहुंच जाती है अस्पताल के उस प्रांगण तक जहां शिशु जन्म लेते हैं। यह गूंज वास्तव में लामबंद होने, व्यवस्था को बदलने, उठ खड़े होने, विद्रोह करने और स्वयं को मुक्त कराने (people’s movement) की एक ज़ोरदार हुंकार है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://nivarana.org/vital-signs/healthcare-as-a-peoples-movement-the-story-of-shaheed-hospital