आधुनिक टेक्नॉलॉजी के चालक: दुर्लभ मृदा तत्व

डॉ. सुशील जोशी

मानव इतिहास में विभिन्न रासायनिक तत्व समय-समय पर महत्वपूर्ण रहे हैं। रासायनिक तत्वों के अहम होने से पहले हम लकड़ी-पत्थर के औज़ारों पर निर्भर थे। उस काल को पाषाण युग कहते हैं। इसे भी पत्थरों के प्रकारों और उनके उपयोग के आधार पर पुरा-पाषाण और नव-पाषाण काल में विभाजित किया जाता है। पहली बार धातुओं का उपयोग शुरू हुआ था कांसे के साथ और यह कहलाया कांस्य युग। उसके बाद बाद आता है लौह युग। कांसा तांबे और टिन की मिश्रधातु यानी एलॉय है जबकि लोहा एक शुद्ध धातु है। कांसा और लोहा से बने औज़ारों ने खेती में क्रांति कर दी थी। इसके अलावा लोहा हथियारों में भी उपयोगी साबित हुआ।

कांस्य व लौह युग के नाम तो दो तत्वों पर पड़े हैं लेकिन इनके साथ तांबा, टिन, आर्सेनिक व सीसा (लेड) भी बराबर महत्व के थे। टिन का उपयोग तांबे में मिलाकर कांसा बनाने में किया जाता था जबकि आर्सेनिक तथा लेड का उपयोग भी धातु की चीज़ें बनाने में होता था। सोना-चांदी, प्लेटिनम भी महत्वपूर्ण धातुएं थीं। धीरे-धीरे इस्पात (लोहे और कार्बन व अन्य तत्वों की मिश्र-धातु) बनाया जाने लगा।

फिर आता है कार्बन युग। हालांकि इसे औपचारिक दर्जा नहीं मिला है लेकिन औद्योगिक क्रांति का चालक कार्बन ही था। एक बड़ा अंतर यह है कि जहां कांसा और लोहा चीज़ें बनाने में काम आते हैं वहीं कार्बन ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बना – चाहे तत्व के रूप में या यौगिकों के रूप में। लकड़ी को जलाकर गर्मी प्राप्त करना तो इतिहास में काफी पहले शुरू हो चुका था लेकिन आगे चलकर कोयले के भंडारों की खोज तथा निष्कर्षण के चलते ऊर्जा का यह स्रोत बहुत महत्वपूर्ण हो गया – भाप के इंजिन से सभी वाकिफ हैं और यह भी जानते हैं कि ये इंजिन कोयले को जलाकर चलते थे और इनके आगमन ने यातायात व अन्य क्षेत्रों में कैसी क्रांति ला दी थी।

हाइड्रोजन प्रकृति में सबसे हल्का तत्व है, जिसका अणु भार 2 होता है। इसका उपयोग अमोनिया और मेथेनॉल बनाने में होता है। अमोनिया का उत्पादन मुख्य रूप से रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन में होता है, जबकि मेथेनॉल अन्य औद्योगिक प्रक्रियाओं में काम आता है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में जितनी हाइड्रोजन का उत्पादन होता है, उसमें से 25 प्रतिशत का इस्तेमाल तो पेट्रोलियम शोधन व परिष्करण में होता है। हाइड्रोजन का उपयोग धातुकर्म में भी किया जाता है जहां यह धातु के ऑक्साइड्स से शुद्ध धातु प्राप्त करने के लिए अवकारक का काम करती है।

हाइड्रोजन का एक बड़ा उपयोग असंतृप्त वनस्पति तेलों को संतृप्त बनाने में किया जाता है। इसका उपयोग सेमीकंडक्टर, एलईडी तथा सपाट स्क्रीन्स के निर्माण में तराशी कार्य में भी होता है। वेल्डिंग में भी काम आती है। और आजकल कार्बन मुक्त ऊर्जा स्रोत के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग ईंधन सेल बनाने में बढ़ता जा रहा है। ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का सीधा इस्तेमाल भी होता है।

आगे चलकर, कार्बन के यौगिक महत्वपूर्ण हो गए – पेट्रोल, डीज़ल, गैसोलीन वगैरह। पेट्रोलियम उत्पाद ऊर्जा के अलावा वस्तु-निर्माण (जैसे प्लास्टिक) के अहम स्रोत बन गए। जिन इलाकों में पेट्रोलियम के प्रचुर भंडार थे, भू-राजनीति में उनका महत्व बढ़ता गया। साथ ही, कार्बन ईंधन जलाने का एक पर्यावरणीय असर भी हुआ – इनको जलाने से ऊर्जा के साथ-साथ कार्बन डाईऑक्साइड निकलती है जो एक ग्रीनहाउस गैस है और धरती का तापमान बढ़ाने में ज़बर्दस्त योगदान देती है।

कार्बन के बाद आए तत्व

सिलिकॉन आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटरों और सूचना टेक्नॉलॉजी का आधार है। युरेनियम परमाणु ऊर्जा का प्रमुख स्तंभ है। लेकिन आधुनिक युग में सबसे महत्वपूर्ण हो गए लीथियम और दुर्लभ मृदा तत्व (रेयर अर्थ एलीमेंट्स)। ये कार्बन से मुक्त ऊर्जा के दोहन के प्रमुख स्रोत हैं – बैटरियां, हरित टेक्नॉलॉजी वगैरह के। इसी के चलते अब दुनिया में ये नए तत्व महत्वपूर्ण हो चले हैं और वर्तमान भू-राजनीति पर हावी हैं हालांकि पेट्रोलियम का महत्व कम नहीं हुआ है। तो चलिए बात करते हैं दुर्लभ मृदा तत्वों और आधुनिक टेक्नॉलॉजी में उनकी निर्णायक भूमिका की।

दुर्लभ मृदा तत्व

दुर्लभ मृदा नामक 17 तत्व कई मामलों में आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए महत्वपूर्ण हैं। जैसे विद्युत वाहनों, पवन चक्कियों के टर्बाइन और मिसाइल, सोनार जैसे सैन्य उपकरणों के लिए चुंबक बनाने में। दुर्लभ मृदा तत्वों का रणनीतिक महत्व मुख्य रूप से इस बात पर टिका है कि इनका उपयोग स्मार्टफोन, टैबलेट्स, कंप्यूटर, टेलीविज़न तथा कई अन्य घरेलू उपकरणों में किया जाता है। इसके अलावा, दुर्लभ मृदा तत्वों का इस्तेमाल चिकित्सा के क्षेत्र में कतिपय कैंसरों के उपचार में तथा वैज्ञानिक अनुसंधान में भी होता है। दुर्लभ मृदा तत्व रक्षा क्षेत्र में भी प्रयुक्त होते हैं; जैसे रडार, सोनार, लेज़र तथा मिसाइल की दिशा-निर्देशक प्रणालियों में।

उत्प्रेरक के रूप में भी ये उपयोगी साबित हुए हैं। उदाहरण के लिए सीरियम नामक दुर्लभ मृदा तत्व कच्चे तेल (पेट्रोलियम) को कई अन्य उपयोगी पदार्थों में बदलने के लिए एक उत्प्रेरक की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसी प्रकार से परमाणु रिएक्टर्स में गैडोलीनियम का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि यह रिएक्टर में ऊर्जा का नियंत्रित उत्पादन करवाने में भूमिका निभाता है।

अलबत्ता, दुर्लभ मृदा तत्वों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताएं उनकी प्रकाश उत्सर्जन क्षमता (संदीप्ति) और उनका चुंबकत्व हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों के प्रकाश उत्सर्जन के गुण का उपयोग स्मार्टफोन के स्क्रीन को रंगत देने में होता है। इसी गुण का एक अन्य उपयोग असली-नकली करंसी नोट्स के बीच अंतर करने में भी होता है। इनसे बने ऑप्टिकल फाइबर्स समुद्र में लंबी दूरियों तक संकेत पहुंचाते हैं।

सबसे शक्तिशाली तथा विश्वसनीय चुंबक भी इन्हीं धातुओं से बन रहे हैं और यही धातुएं आपके हेडफोन्स में ध्वनि तरंगें पैदा करती हैं और अंतरिक्ष में संप्रेषण में सहायक होती हैं।

और अब दुर्लभ मृदा तत्व हरित टेक्नॉलॉजी के विकास को भी गति दे रहे हैं। पवन चक्कियों और विद्युत-चालित वाहनों के ये प्रमुख अवयव बन गए हैं। और तो और, आजकल जिन क्वांटम कंप्यूटर्स की चर्चा हो रही है, उनमें भी ये प्रमुख घटक हैं।

दुर्लभ मृदा तत्वों की उपलब्धता

पिछले कुछ वर्षों में दुर्लभ मृदा तत्वों के अलावा लौह व अन्य धातुओं की मांग में ज़बर्दस्त वृद्धि देखी गई है। विश्व बैंक का अनुमान है कि मूलत: हरित व नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण के चलते दुर्लभ मृदा तत्वों की मांग और बढ़ेगी। जैसे, विद्युत चालित व हाइब्रिड वाहनों तथा सौर व पवन ऊर्जा के दोहन के लिए ज़रूरी उपकरणों का निर्माण इन्हीं तत्वों पर निर्भर है। उम्दा प्रकाश-उत्सर्जन और चुंबकीय गुण की वजह से ये टेक्नॉलॉजी के महत्वपूर्ण घटक बन गए हैं।

वैसे इन तत्वों को दुर्लभ मृदा तत्व कहते ज़रूर हैं, लेकिन प्रकृति में ये उतने भी दुर्लभ नहीं हैं। लोहा, तांबा तथा निकल जैसी धातुओं की अपेक्षा ये कहीं अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन इनका भौगोलिक वितरण तथा इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया इन्हें दुर्लभ बना देते हैं। इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया पर्यावरण पर प्रतिकूल असर भी डालती है।

तथ्य यह है कि प्रकृति में ये तत्व विभिन्न खनिजों के साथ मिश्रण के रूप में पाए जाते हैं। लिहाज़ा, इन्हें अलग-अलग करना पड़ता है। इस काम के लिए तेज़ाबों और कई कार्बनिक विलायकों का उपयोग ज़रूरी होता है जो पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक होते हैं। एक तो निष्कर्षण के दौरान कार्बन डाईऑक्साइड उत्पन्न होती है और साथ ही रेडियोधर्मी तथा रासायनिक कचरा पैदा होता है। और तो और, किसी मिश्रण में धातु विशेष की सांद्रता के अनुसार निष्कर्षण की अलग-अलग विधियों का उपयोग किया जाता है। परिणामस्वरूप प्रत्येक धातु के लिए विशिष्ट टेक्नॉलॉजी और जानकारी की ज़रूरत होती है। निष्कर्षण में विभिन्न चरण होते हैं और समय लगता है। इस तरह की सुविधाएं फिलहाल चीन में मौजूद हैं।

अधिकांश दुर्लभ मृदा तत्वों की खदानें चीन में हैं जो विश्व के भंडारों के लगभग एक-तिहाई का मालिक है। इसके बाद वियतनाम, ब्राज़ील, रूस, भारत, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीनलैंड तथा यूएस हैं। वर्तमान में चीन इस सेक्टर में सर्वोपरि है और वह दुनिया भर के कुल उत्पादन के 90 प्रतिशत को नियंत्रित करता है। इस संदर्भ में चीन के बोलबाले के कई कारण बताए जाते हैं। पहला तो यही है कि दुर्लभ मृदा के व्यापक भंडार उसके भोगोलिक क्षेत्र में हैं। यह भी कहा जाता है कि वहां पर्यावरणीय कायदे-कानून थोड़े शिथिल हैं और उत्पादन की प्रकिया की खासी जानकारी है। चीन ने इस सेक्टर में काफी निवेश भी किया है।

दुर्लभ मृदा धातुओं में इस एकाधिकार का उपयोग चीन एक भू-राजनैतिक हथियार के रूप में भी करता है। उदाहरण के लिए उसने जापान को इन तत्वों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर अपनी शर्तें मनवाई थीं। आशंका यह है कि ऐसा अन्य देशों के साथ भी संभव है। उदाहरण के लिए, यूएस दुर्लभ मृदाओं की 80 प्रतिशत आपूर्ति के लिए चीन पर निर्भर है। यूएस द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने का प्रयास इसी से निपटने का तरीका हो सकता है।

दुर्लभ मृदाओं के गुण

आखिरकार, इन 17 तत्वों में ऐसी क्या खास बात है कि ये आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों का महत्व उनके भौतिक व रासायनिक गुणों में निहित है। इसके अलावा वे कई खनिजों के गुणों में इज़ाफा भी कर सकते हैं जिसके चलते इन खनिजों की प्रौद्योगिकी उपयोगिता बढ़ जाती है।

बात को समझने के लिए हमें परमाणुओं पर गौर करना होगा। सारे तत्व परमाणुओं से बने होते हैं जिनमें एक केंद्रीय नाभिक होता है जहां परमाणु का सारा धनावेश प्रोटॉन के रूप में संग्रहित होता है और ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन इस नाभिक के चक्कर काटते हैं।

चुंबकत्व

चुंबकत्व मूलत: आवेशों की गति से पैदा होता है। परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन आवेशित कण होते हैं और पदार्थों में चुंबकत्व इन्हीं इलेक्ट्रॉन की गति से उत्पन्न होता है। परमाणु में इलेक्ट्रॉन धनावेशित केंद्रक की परिक्रमा करते हैं। यह हुई इलेक्ट्रॉन की पहली गति। केंद्रक के आसपास चक्कर काटते हुए इलेक्ट्रॉन बेतरतीब ढंग से यहां-वहां नहीं भटकते; वे निर्धारित कक्षाओं में घूमते हैं। इलेक्ट्रॉन की दूसरी गति होती है उनका अपने अक्ष पर घूर्णन। इन दोनों गतियों को मिलाकर चुंबकत्व उत्पन्न होता है।

इलेक्ट्रॉन के परिक्रमा करने की कक्षाएं केंद्रक के पास से दूर तक होती हैं – इन्हें क्रमश: 1, 2, 3, 4 कहा जाता है। फिर प्रत्येक कक्षा में उप-कक्षाएं होती हैं जिन्हें s, p, d, f  कहा जाता है। इन कक्षाओं/उपकक्षाओं में इलेक्ट्रॉन की संख्या निश्चित होती है – जैसे पहली कक्षा में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं, दूसरी में 8, तीसरी में 18 तथा चौथी में 32। फिर, इलेक्ट्रॉन उप-कक्षाओं में बंटते हैं। किसी भी उपकक्षा में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं। और जब किसी उपकक्षा में दो इलेक्ट्रॉन हों तो उनका घूर्णन विपरीत दिशा में होता है। चूंकि घूर्णन विपरीत दिशा में होता है इसलिए प्रत्येक से उत्पन्न चुंबकत्व जोड़ीदार इलेक्ट्रॉन के चुंबकत्व को निरस्त कर देता है और परमाणु कुल मिलाकर अचुंबकीय बना रहता है।

लेकिन कुछ परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन व्यवस्था ऐसी होती है कि उनमें सारे जोड़-घटा के बाद चुंबकत्व शेष रहता है। ऐसे परमाणुओं में सारे इलेक्ट्रॉनों की जोड़ियां नहीं बनती। बेजोड़ी इलेक्ट्रॉनों की गति से उत्पन्न चुंबकत्व कैंसल नहीं होता और कुछ नेट चुंबकत्व बचा रहता है।

दुर्लभ मृदा तत्वों के परमाणुओं की इलेक्ट्रॉन जमावट देखें तो पता चलता है कि उनमें में 5 बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं। लेकिन एक दिक्कत है – दुर्लभ मृदा तत्वों की धात्विक त्रिज्या बहुत अधिक होती है (धात्विक त्रिज्या से आशय होता है धातु की जमावट में पास-पास के दो परमाणुओं के केंद्रकों के बीच की दूरी)। इस कारण से इनमें बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन का घनत्व कम हो जाता है और चुंबकत्व काफी सीमित रहता है। किंतु जब इन्हें लोहे या कोबाल्ट जैसी संक्रमण धातु (जिनमें काफी संख्या में बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन होते हैं) के साथ मिलाकर मिश्र-धातु (एलॉय) बनाई जाती है तो इनका यह गुण निखर जाता है। इस प्रकार बनाए गए चुंबक कहीं ज़्यादा चुंबकीय ऊर्जा संग्रह कर लेते हैं। जैसे नियोडीमियम से बना चुंबक उतने ही आकार के लौह चुंबक की तुलना में 18 गुना ज़्यादा चुंबकीय ऊर्जा संग्रह कर सकता है।

दुर्लभ मृदा चुंबकों का उपयोग टर्बाइन्स, विदुयत मोटर, वायुयानों और मिसाइलों में लक्ष्य निर्धारण प्रणालियों, स्पीकर्स तथा कंप्यूटर हार्ड ड्राइव्स में किया जाता है।

दुर्लभ मृदा से बने चुंबकों की एक दिक्कत यह रही है कि सामान्य तापमान पर उनका चुंबकत्व लगभग चुक जाता है। बहरहाल, कोबॉल्ट या लोहे जैसी किसी संक्रमण धातु और दुर्लभ मृदा तत्वों की मिश्र-धातु से बने चुंबकों का चुंबकत्व काफी ऊंचे तापमान पर भी बरकरार रहता है। मसलन, नियोडीमियम-लौह-बोरॉन (Nd2Fe14B) चुंबक या समारियम-कोबॉल्ट (SmCo5) चुंबक।

प्रकाशउत्सर्जन

किसी पदार्थ पर विद्युत-चुंबकीय विकिरण की बौछार की जाए और वह प्रकाश पैदा करने लगे तो इस गुण को संदीप्ति कहते हैं। कुछ दुर्लभ मृदा तत्वों में यह गुण पाया जाता है। इसके चलते ये फॉस्फर्स (यानी प्रकाश-उत्सर्जक तत्वों) के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। जैसे एलईडी और सीएफएल में। युरोपियम आधारित फॉस्फर्स लाल रोशनी पैदा करते हैं और ये रंगीन टेलीविज़न के विकास में महत्वपूर्ण रहे हैं। संदीप्ति गुणों के चलते एर्बियम आयन ग्लास फाइबर्स में संकेतों को एम्लीफाय करने में महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। इनकी मदद से लंबी दूरी के टेलीफोन संवाद और इंटरनेट डैटा का आवागमन सुलभ हुआ है। दुर्लभ मृदा तत्वों के संदीप्ति गुण का एक अन्य ज़बर्दस्त उपयोग लेज़र के क्षेत्र में होता है। विभिन्न किस्म के लेज़र्स का इस्तेमाल चिकित्सा, सैन्य कार्यों में किया जाता है। खास तौर से ये गाइडेड मिसाइल्स में किसी लक्ष्य की दूरी तथा दिशा निर्धारण करने में मददगार हैं।

विद्युतीय गुण

दुर्लभ मृदा तत्वों के विद्युतीय गुण उन्हें निकल-धातु हायड्राइड (NiMH) बैटरियों के लिए उपयुक्त बनाते हैं। इन बैटरियों के एनोड्स जिस पदार्थ से बनते हैं उसे मिशमेटल कहते हैं, जो सीरियम, लैन्थेनम, नियोडिमियम तथा प्रासियोडीमियम का मिश्रण है। चूंकि यहां मिश्रण का ही उपयोग होता है इसलिए इसका निर्माण सस्ता पड़ता है। दुर्लभ मृद्दा तत्वों की बदौलत इन बैटरियों में ऊर्जा संग्रहित करने की क्षमता (ऊर्जा घनत्व) अधिक होती है और चार्जिंग-डिसचार्जिंग के कई चक्रों के बावजूद यह क्षमता बनी रहती है। इन बैटरियों का उपयोग हायब्रिड कारों वगैरह में बहुतायत से होता है।

दुर्लभ मृदा तत्वों का इलेक्ट्रॉन विन्यास उन्हें उपयोगी उत्प्रेरक भी बनाता है। इस संदर्भ में लैन्थेनम और सीरियम प्रमुख रहे हैं। सीरियम का इस्तेमाल पेट्रोल से चलने वाली कारों में किया जाता है। इसके इस्तेमाल से कारों से उत्सर्जित गैसों में विषैली कार्बन मोनोऑक्साइड को कार्बन डाईऑक्साइड में बदला जाता है। लैन्थेनम का उपयोग कच्चे तेल से उपयोगी हायड्रोकार्बन्स बनाने में होता है।

धातुकर्म की दिक्कतें

दुर्लभ मृदा तत्व लगभग हर महाद्वीप पर मिलते हैं और समुद्र के पेंदों में भी। लेकिन अधिकांश चट्टानों में इनकी सांद्रता बहुत कम होती है। चुनौती यह होती है कि ऐसे अयस्क खोजे जाएं जिनमें इन तत्वों की सांद्रता पर्याप्त हो।

दुर्लभ मृदा तत्व प्राय: साथ-साथ पाए जाते हैं। इन्हें अलग-अलग करना और शुद्ध रूप में प्राप्त काफी महंगा होता है। सबसे पहले तो धरती से चट्टानें या रेत खोदकर निकालना होती है, फिर उसमें से मूल्यवान अयस्क को अलग करना होता है। इसके अलावा, खास तौर से दुर्लभ मृदा तत्वों के मामले में, एक महत्वपूर्ण चरण धातुओं को एक-दूसरे से अलग-अलग करने का होता है। यह काफी कठिन और महंगा साबित होता है क्योंकि सारे दुर्लभ मृदा तत्वों के रासायनिक गुणधर्म लगभग एक समान होते हैं।

इस समस्या से निपटने के लिए कई जटिल पृथक्करण प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं। इनमें से सबसे अधिक उपयोग सॉलवेंट एक्सट्रेक्शन का किया जाता है। इसमें दुर्लभ मृदा तत्वों के मिश्रण को दो अघुलनशील विलायकों में डाला जाता है, जिनमें उनकी घुलनशीलता थोड़ी अलग-अलग होती है। फिर इन दो विलायकों को अलग-अलग किया जाता है और प्रक्रिया को कई बार (सैकड़ों बार) दोहराया जाता है ताकि धीरे-धीरे किसी एक तत्व की सांद्रता बढ़ती जाए। ज़ाहिर है, यह कार्य बहुत संसाधन-निर्भर, समयखर्ची और महंगा होता है। इसके विकल्पों पर काम जारी है।

इसलिए वैज्ञानिक दुर्लभ मृदा तत्वों के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में हैं। एक स्रोत हो सकता है वनस्पति। कुछ पौधे मिट्टी में से इन तत्वों को चुनिंदा ढंग से सोखते हैं और अपने ऊतकों में संग्रहित कर लेते हैं। सूरजमुखी, कैनरी घास तथा कुछ फर्न यह काम बखूबी करते हैं। इनके सत पर फिर सॉलवेंट एक्सट्रेक्शन लागू करना पड़ता है। वैसे अभी इस तरीके का औद्योगिक इस्तेमाल नहीं किया गया है।

एक स्रोत अन्य धातुओं के निष्कर्षण से बचा कचरा भी है और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में से प्राप्त करना भी हो सकता है।

भूराजनीतिक समस्याएं

विद्युत वाहनों तथा नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव के चलते अब पेट्रोलियम पर निर्भरता से हटकर दुनिया इन धातुओं पर निर्भर होने लगी है और धातु उत्पादक देशों का दबदबा बढ़ रहा है।

दुर्लभ मृदा तत्वों के परिशोधन पर चीन का वर्चस्व है, जिसके चलते वह निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर इसे एक राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है।

कई देश अब धातु संसाधनों की जमाखोरी में लग गए हैं। आधुनिक शस्त्र (रडार, लेज़र, लक्ष्य निर्धारण प्रणालियां) विशिष्ट दुर्लभ तत्वों पर निर्भर हैं और ये अब राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्र में आ गए हैं।

उपरोक्त तथ्यों के मद्देनज़र अब खनिज सुरक्षा साझेदारियां विकसित होने लगी हैं।

जीवाश्म ईंधन (कोयला तथा तेल) के भंडार अपेक्षाकृत कम भौगोलिक इलाकों में सिमटे हैं जिसकी वजह से भू-राजनीति पर इनका खासा असर रहा है क्योंकि आपूर्ति शृंखला में बाधाएं रही हैं, कई सरकारें इनके आयात पर निर्भर हैं और ये संसाधन आंतरिक तनावों और समस्याओं से जुड़े रहे हैं।

फिलहाल कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा बहुत कम है, हालांकि यह बढ़ता जा रहा है। इसकी प्रमुख वजहों में जलवायु परिवर्तन की चिंता, जीवाश्म ईंधनों के चुक जाने का डर, नवीकरणीय ऊर्जा की लागत में गिरावट, और कई देशों में ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की आकांक्षा है। ऊर्जा के मसले और भू-राजनीति के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा कई नज़रियों से की जा सकती है।

आयात पर निर्भर देश कोशिश करते हैं कि पर्याप्त व किफायती ऊर्जा मिलती रहे। दूसरी ओर, संसाधन-समृद्ध देश अपने संसाधनों से पर्याप्त लाभ अर्जित करना चाहते हैं। बहरहाल, सभी देश चाहते हैं कि व्यापारिक प्रवाह बना रहे।

ऐसा लगता है कि ऊर्जा-संक्रमण (यानी जीवाश्म ईंधनों से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव) महत्वपूर्ण खनिजों की मांग को निर्धारित करने वाला प्रमुख कारक होगा। अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक यदि वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम रखने का लक्ष्य लें, तो ऊर्जा संक्रमण के लिए बड़े पैमाने पर अधोसंरचना और सामग्री की ज़रूरत होगी। इस नज़ारे में वर्ष 2050 तक 33,000 गीगावॉट नवीकरणीय बिजली ज़रूरी होगी और 90 प्रतिशत सड़क परिवहन का विद्युतीकरण करना होगा।

ऊर्जा सुरक्षा की चिंता मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन के चुक जाने से जुड़ी है। जीवाश्म ईंधन और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए ज़रूरी सामग्रियों के बीच एक प्रमुख अंतर है। जहां जीवाश्म ईंधन समाप्त हो जाएगा, वहीं नवीकरणीय ऊर्जा से सम्बंधित सामग्री के खत्म हो जाने का खतरा नहीं है। हालांकि यह सही है कि ऊर्जा संक्रमण सामग्रियों का कोई अभाव नहीं है लेकिन उनकी खनन व परिशोधन की क्षमताएं सीमित हैं। कहा यह जा रहा है कि किसी एक पदार्थ की कमी होने पर दुनिया भर में ऊर्जा संक्रमण थम जाएगा। इनके नए-नए स्रोत तलाशे जा रहे हैं तथा खनन व परिशोधन में निवेश बढ़ रहा है। इसके अलावा कार्यकुशलता में सुधार और किसी पदार्थ की जगह दूसरे के इस्तेमाल होने पर मांग और आपूर्ति का समीकरण बदल सकता है।

एक समस्या यह है कि क्रिटिकल सामग्री के खनन व परिशोधन का कार्य कुछ चुनिंदा देशों में सिमटा हुआ है और पूरे नज़ारे पर इनका दबदबा है – ऑस्ट्रेलिया (लीथियम), चिली (तांबा व लीथियम), चीन (ग्रेफाइट तथा दुर्लभ मृदा तत्व), कॉन्गो जनतांत्रिक गणतंत्र (कोबाल्ट), इंडोनेशिया (निकल) तथा दक्षिण अफ्रीका (प्लेटिनम, इरिडियम)। यह संकेंद्रण परिशोधन के चरण में और भी गंभीर हो जाता है। उदाहरण के लिए, ग्रेफाइट व डिसप्रोसियम के परिशोधन की 100 प्रतिशत, कोबाल्ट की 70 प्रतिशत तथा लीथियम व मैगनीज़ की लगभग 60 प्रतिशत परिशोधन क्षमता चीन के पास है।

एक और मसला यह है कि खनन उद्योग पर मुट्ठी भर कंपनियों का वर्चस्व है। उदाहरण के लिए 61 प्रतिशत लीथियम तथा 56 प्रतिशत कोबाल्ट उत्पादन पांच शीर्ष कंपनियों के नियंत्रण में है।

फिलहाल, ऊर्जा संक्रमण के लिए ज़रूरी सामग्री का अधिकांश उत्पादन विकासशील देश कर रहे हैं। और तो और, कुल प्राकृतिक भंडार में भी उनका हिस्सा काफी ज़्यादा है हालांकि इसका पूरा अन्वेषण नहीं हो पाया है। उदाहरण के लिए, बोलीविया में 210 लाख टन लीथियम का भंडार है। यह किसी भी अन्य देश से ज़्यादा है लेकिन फिलहाल बोलीविया विश्व उत्पादन में मात्र 1 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। कई देश अपने खनिज संसाधनों के उपयोग के लिए उद्योगों को आकर्षित कर सकते हैं, जो परिशोधन तथा अंतिम उत्पादों (जैसे बैटरियां, विद्युत वाहन) के उत्पादन में भी मदद कर सकें।

जिस एक समस्या पर प्राय: ध्यान नहीं दिया जाता है, वह है कि अधिकांश ऊर्जा संक्रमण सम्बंधी सामग्री (लगभग 54 प्रतिशत) देशज समुदायों (आदिवासियों) की ज़मीनों पर या उनके आसपास स्थित है। 80 प्रतिशत से अधिक लीथियम परियोजनाएं और निकल, तांबा तथा जस्ते की आधी से ज़्यादा परियोजनाएं आदिवासी लोगों के इलाकों में हैं। इसी प्रकार से, ऊर्जा संक्रमण के लिए ज़रूरी खनिज की परियोजनाएं आदिवासी इलाकों या किसानों की ज़मीन पर या उनके नज़दीक हैं। यहां पानी का संकट, टकराव और खाद्यान्न सुरक्षा के मुद्दे उठना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए 90 प्रतिशत प्लेटिनम भंडार, 76 प्रतिशत मॉलिब्डेनम भंडार और 74 प्रतिशत ग्रैफाइट संसाधन ऐसी ज़मीनों में हैं।

इस संदर्भ में ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर हक जताने का प्रयास भी मौजूं है। दरअसल, आर्कटिक, बाह्य अंतरिक्ष और गहरे समंदरों में ऐसे क्रिटिकल संसाधनों के लिए भू-राजनीतिक संघर्ष संभावित है। जैसे, आर्कटिक क्षेत्र में निकल, जस्ता और दुर्लभ मृदा जैसी क्रिटिकल सामग्री प्रचुरता में है और यही इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व का कारण बन गया है। खास तौर से, अंतरिक्ष और गहरे समंदर में इस तरह की महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाना ज़रूरी है क्योंकि इसके पर्यावरणीय असर तथा नियामक ढांचे को लेकर अनिश्चितता है।

एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि आज तक खनन उद्योगों का इतिहास रहा है कि खनन गतिविधियों और प्रक्रियाओं का स्थानीय समुदायों पर काफी  प्रतिकूल असर होता है, भूमि बरबाद होती है, जल संसाधनों का ह्रास व संदूषण होता है, वायु प्रदूषण होता है। इसके अलावा, श्रम व मानव अधिकार के मुद्दे तो स्वाभाविक रूप से उभरते ही हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://hasetins.com/wp-content/uploads/2026/01/Rare-Earth-Pictures-845×684.png

तेहरान में ‘ब्लैक रेन’ से बढ़ा स्वास्थ्य संकट

हाल ही में ईरान की राजधानी तेहरान में मिसाइल हमलों (missile attacks) के बाद घना धुआं और काली बारिश (ब्लैक रेन-black rain) देखी गई है। इन हमलों में तेल भंडार और रिफाइनरियों को नुकसान पहुंचा, जिससे भारी प्रदूषण फैल गया। इसके चलते वर्षा पर्यावरण और मनुष्यों दोनों के लिए नुकसानदेह बारिश में बदल गई।

ब्लैक रेन का मतलब ऐसी बारिश से है जिसमें वायुमंडल में मौजूद प्रदूषक घुल जाते हैं। तेहरान में यह प्रदूषण जलते हुए तेल और ईंधन से पैदा हुआ है। जब ये पदार्थ जलते हैं, तो वायुमंडल में हाइड्रोकार्बन, सल्फर ऑक्साइड्स, नाइट्रोजन यौगिक और बेंज़ीन जैसे कई खतरनाक रसायन (toxic chemicals) फैल जाते हैं। जब बारिश इस प्रदूषित वायु से होकर गुज़रती है, तो ये कण उसमें घुल जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बारिश का पानी काला और हानिकारक बन जाता है।

बारिश का काला रंग मुख्य रूप से कालिख (soot) की वजह से होता है, जो अधूरी तरह से जलने पर बनने वाले बहुत छोटे कार्बन कण होते हैं। इसके अलावा, हमलों में टूटे-फूटे भवनों से निकली धूल और औद्योगिक कचरा भी इसमें मिल सकता है, जिससे यह और ज़्यादा हानिकारक बन जाता है। यानी ब्लैक रेन इस बात का संकेत है कि हवा अत्यधिक प्रदूषित (air pollution indicator) है।

तेहरान की भौगोलिक स्थिति ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है। यह शहर अल्बोर्ज़ पहाड़ों (Alborz mountains) के पास स्थित है, जहां तापमान व्युत्क्रमण (temperature inversion) की स्थिति बन जाती है। यानी गर्म हवा ऊपर और ठंडी हवा नीचे फंस जाती है, जिससे प्रदूषित हवा ऊपर नहीं उठ पाती और फैल नहीं पाती। नतीजतन, ज़हरीले कण भूमि के पास ही बने रहते हैं, जिससे खतरा और बढ़ जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों (health experts) की चिंता यह है कि लोग प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं और दूषित बारिश के संपर्क में आ रहे हैं। धुआं और बहुत बारीक कण सांस लेने में दिक्कत पैदा कर सकते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें पहले से दिल या फेफड़ों की बीमारी (heart and lung disease) है। गंभीर मामलों में यह हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण भी बन सकता है। शिशु और बच्चे सबसे अधिक जोखिम में हैं, क्योंकि उनका शरीर अभी विकसित हो ही रहा है।

एक बड़ी चिंता अतिसूक्ष्म (PM2.5) कणों की है। ये सूक्ष्म कण फेफड़ों के अंदर गहराई तक पहुंच जाते हैं और खून में भी मिल सकते हैं। इससे हृदयरोग, उच्च रक्तचाप (high blood pressure) के अलावा मस्तिष्क (brain health risk) पर भी असर पड़ सकता है। इसके अलावा, बारिश में मौजूद रसायन त्वचा और आंखों में जलन (skin and eye irritation) पैदा कर सकते हैं और अधिक मात्रा में होने पर गंभीर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।

बहरहाल, प्रशासन ने लोगों को सलाह दी है कि वे जितना हो सके घर के अंदर रहें और मौसम बदलने का इन्तज़ार करें।

तेहरान की यह स्थिति दिखाती है कि युद्ध (war environmental impact) के दौरान पर्यावरण को हुआ नुकसान बहुत जल्दी एक बड़े स्वास्थ्य संकट (public health crisis) में बदल सकता है, जिसके असर लंबे समय तक बने रह सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://media.nature.com/lw767/magazine-assets/d41586-026-00800-9/d41586-026-00800-9_52166314.jpg?as=webp

जलवायु परिवर्तन, अंतर्राष्ट्रीय तनाव और बढ़ता जल संकट

संयुक्त राष्ट्र (United Nations) द्वारा जारी चेतावनी के अनुसार पानी के ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की वजह से दुनिया की जल व्यवस्था दम तोड़ रही है। कई नदियां, ग्लेशियर और भूजल भंडार (groundwater depletion) अपनी प्राकृतिक सीमा से ज़्यादा दबाव में हैं, और संभव है कि वे पहले जैसी स्थिति में फिर कभी न लौट सकें।

ग्लेशियर तेज़ी से पिघल (glacier melting) रहे हैं, जिससे नदियों का बहाव बदल रहा है। राजनीतिक तनाव इस समस्या को और जटिल बना रहे हैं। कई देशों के बीच पानी बंटवारे से जुड़े समझौते दबाव में आ गए हैं। अप्रैल 2025 में भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया, जो 1960 से सिंधु नदी तंत्र (Indus river system) के इस्तेमाल को तय करती थी। दूसरी ओर, अफगानिस्तान कुनार नदी पर एक बड़े जलाशय निर्माण की योजना बना रहा है, जिससे पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी में कमी आ सकती है। इसी बीच भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे का समझौता (Ganga water treaty) भी दिसंबर में खत्म होने वाला है। नया समझौता न होने से नदी पर निर्भर लगभग 63 करोड़ लोग प्रभावित हो सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, पानी से सम्बंधित पुराने समझौतों (water agreements) को बनाए रखना ही काफी नहीं है बल्कि उन्हें आज की परिस्थितियों के अनुसार ढालना होगा। पहले के समझौते उस समय के स्थिर जल स्तर को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। लेकिन जलवायु परिवर्तन (climate change) के कारण बारिश, ग्लेशियर पिघलने और नदियों के बहाव के पैटर्न पहले जैसे नहीं रहे। नवीनतम जानकारी उपलब्ध हो, तो समस्याओं का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है।

आजकल वैज्ञानिक ‘डिजिटल ट्विन’ (digital twin technology) नामक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें कंप्यूटर पर नदी प्रणाली का एक आभासी मॉडल बनाया जाता है, जिससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन का नदी पर क्या असर पड़ेगा। चीन की यांग्त्से नदी घाटी में इस तकनीक का इस्तेमाल जल प्रबंधन (smart water management) को बेहतर बनाने के लिए किया जा चुका है।

सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) कई युद्धों और राजनीतिक तनाव के बावजूद दशकों तक चलती रही। इसका एक कारण यह था कि इसमें विश्व बैंक जैसे तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका थी और दोनों देशों के तकनीकी विशेषज्ञों की एक संयुक्त समिति भी बनाई गई थी। और पानी से जुड़े ढांचे और परियोजनाओं (water infrastructure projects) के लिए साझा वित्तीय व्यवस्था भी रखी गई थी।

ऐसी संस्थाओं को और मज़बूत होना चाहिए, ताकि वे पूरे नदी क्षेत्र (river basin management) के प्रबंधन में डैटा के आधार पर फैसले ले सकें। नदियों को केवल पानी के स्रोत के रूप में देखने की बजाय उन्हें समग्र प्राकृतिक तंत्र (ecosystem approach) के रूप में समझना होगा। बेहतर जानकारी, आपसी सहयोग और लचीले समझौतों की मदद से अभी भी आने वाले वैश्विक जल संकट (future water crisis) को टाला जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://media.nature.com/lw767/magazine-assets/d41586-026-00659-w/d41586-026-00659-w_51991024.jpg?as=webp

बढ़ती गर्मी से कीटों पर बढ़ता संकट

ष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (tropical regions) के गर्म और निचले स्थानों में रहने वाले कीट अत्यधिक गर्मी में भी जीवित रहने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है कि इनमें से कई कीट पहले ही अपनी सहनशक्ति के तापमान की सीमा (thermal tolerance limit) के करीब रह रहे हैं। ऐसे में अगर पृथ्वी का तापमान और बढ़ता है, तो इन प्रजातियों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। नेचर पत्रिका (Nature journal) में प्रकाशित इस शोध में यह देखा गया कि अलग-अलग कीट प्रजातियां गर्मी पर किस तरह प्रतिक्रिया देती हैं ताकि यह समझा जा सके कि जलवायु परिवर्तन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कीटों की विविधता को कैसे प्रभावित कर सकता है।

गौरतलब है कि स्तनधारियों के विपरीत, कीट अपने शरीर का तापमान खुद नियंत्रित नहीं कर सकते। उनके शरीर का तापमान लगभग पूरी तरह आसपास के वातावरण (ambient temperature) पर निर्भर करता है। इसलिए अधिक गर्मी से बचने के लिए वे छांव में चले जाना, मिट्टी में दुबक जाना या ठंडक के समय में ही सक्रिय रहना जैसे तरीके अपनाते हैं। उनके शरीर में कुछ खास प्रकार के प्रोटीन (heat shock proteins) भी बनते हैं, जो अधिक तापमान से कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। इन्हें ‘हीट शॉक प्रोटीन’ कहा जाता है। लेकिन इस सुरक्षा की भी एक सीमा है। जब तापमान एक हद से ऊपर चला जाता है, तो कीट हिलना-डुलना बंद कर देते हैं और अंतत: मर जाते हैं।

कीटों की अधिकतम ऊष्मा-सहनशीलता (thermal tolerance) सीमा को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने लगभग 2300 प्रजातियों पर एक बड़ा फील्ड अध्ययन किया। यह काम पर्यावरण वैज्ञानिक किम ली होल्ज़मैन के शोध (Kim Lee Holzman research)  से शुरू हुआ था। उन्होंने पेरू के एंडीज़ पर्वत क्षेत्र में अलग-अलग ऊंचाइयों से कई मौसमों के दौरान कीट इकट्ठा किए। हर कीट को एक छोटी ट्यूब में रखकर धीरे-धीरे बढ़ती गर्मी (temperature stress test) के संपर्क में लाया गया। वैज्ञानिक यह देखते रहे कि किस तापमान पर कीट हिलना-डुलना बंद कर देता है, क्योंकि यही उसकी गर्मी सहने की अधिकतम सीमा मानी जाती है। बाद में इसी तरह का प्रयोग केन्या के एक अन्य उष्णकटिबंधीय पर्वतीय क्षेत्र में भी किया गया।

अध्ययन से पता चला कि गर्म और निचले इलाकों में रहने वाले कीट आम तौर पर ठंडे और ऊंचे इलाकों के कीटों की तुलना में ज़्यादा तापमान सहन कर सकते हैं। लेकिन इसके साथ एक बड़ी समस्या भी है। निचले इलाकों का वातावरण पहले ही उस अधिकतम तापमान (heat threshold) के बहुत निकट है, जिसे वहां रहने वाले कीट सह सकते हैं। इसलिए अगर तापमान थोड़ा भी बढ़ता है, तो वे जल्दी ही अपनी सहनशीलता की सीमा (thermal limit exceed) पार कर सकते हैं।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि अलग-अलग कीट समूहों (insect groups comparison) की गर्मी सहने की क्षमता अलग होती है। उदाहरण के लिए, मक्खियां सबसे ज़्यादा संवेदनशील हैं और औसतन लगभग 39 डिग्री सेल्सियस पर ही उनकी गतिविधि रुकने लगती है। भृंग (बीटल) (beetles heat tolerance) थोड़े मज़बूत होते हैं और करीब 41 डिग्री सेल्सियस तक गर्मी सह सकते हैं। मधुमक्खियां और अन्य कॉलोनी बनाकर रहने वाले कीट इससे थोड़ी अधिक गर्मी झेल सकते हैं। टिड्डे (grasshoppers tolerance) और उनसे मिलती-जुलती प्रजातियां सबसे ज़्यादा सहनशील पाई गईं, जो लगभग 44 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सह सकती हैं।

इन समूहों के अंतर को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने सैकड़ों कीट प्रजातियों के जेनेटिक डैटा (genetic data analysis) का अध्ययन किया। कंप्यूटर मॉडल (computational modeling) की मदद से उन्होंने देखा कि कीटों के शरीर में मौजूद हीट शॉक प्रोटीन की संरचना किस तापमान पर बिखरने लगती है। नतीजे प्रयोगों से मिले परिणामों से मेल खाते थे; जिन प्रजातियों के प्रोटीन अधिक स्थिर थे, वे अधिक गर्मी सहन कर पाए। इससे संकेत मिलता है कि गर्मी सहने की यह सीमा कीटों की जैविक बनावट से जुड़ी है। और जैविक बनावट सहस्राब्दियों में बदलती है। अर्थात इन कीट प्रजातियों की स्थिति कमोबेश स्थिर रहेगी।

यह अध्ययन चिंताजनक है। जलवायु मॉडल (climate models) बताते हैं कि इस सदी के अंत तक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों का तापमान इतना बढ़ सकता है कि लगभग आधी कीट आबादियां कुछ घंटों तक भविष्य की गर्मी झेलने के बाद बेहोशी जैसी स्थिति में पहुंच सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी चरम स्थिति आने से पहले ही कीटों की संख्या घटने लग सकती है, क्योंकि लंबे समय तक गर्मी का दबाव (temperature stress) उनके जीवित रहने और प्रजनन की क्षमता को कम कर देता है।

कीट पर्यावरण (ecosystem balance) में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परागण, जैविक कचरे का विघटन करके वे खाद्य संजाल का एक ज़रूरी हिस्सा होते हैं। अगर उनकी संख्या घटती है, तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। शोधकर्ता कहते हैं कि यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि उष्णकटिबंधीय कीट बदलते मौसम (climate adaptation) के साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे। लेकिन अध्ययन दर्शाता है कि दुनिया के सबसे गर्म इलाकों में तापमान में थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी कई कीट प्रजातियों की सहनशीलता (species survival risk) को परास्त कर सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zpu8hyj/full/_20260304_on_insect_intolerance_1200.jpg

जलवायु परिवर्तन और पौधों का जल्दी फूलना

दुनिया भर में कई पौधों में अब पहले की तुलना में जल्दी फूल खिलने लगे हैं। पूरा ध्यान बढ़ते तापमान (global warming) पर जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार केवल गर्मी बढ़ना ही इसका कारण नहीं है। जैसे, ग्रीनहाउसों (greenhouse experiments) में सिर्फ ज़्यादा तापमान देने से फूल समय से पहले नहीं खिले। एक नए अध्ययन से पता चला है कि पत्तियों पर जमा होने वाली ओस की बूंदें (dew droplets on leaves) इस जल्दबाज़ी की वजह हो सकती हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, जब पानी की बहुत सूक्ष्म बूंदें (micro water droplets) पत्तियों पर जमती हैं, तो वे कुछ रासायनिक अभिक्रियाएं शुरू करवाती हैं। ये अभिक्रियाएं पौधे को संकेत देती हैं कि अब फूल बनाने का समय आ गया है। तो लगता है कि केवल बढ़ता तापमान नहीं, बढ़ती नमी के कारण बनने वाली ओस भी पौधों के व्यवहार (plant behavior) को प्रभावित कर सकती है।

पहले किए गए प्रयोगों से यह स्पष्ट था कि थोक पानी (bulk water) की तुलना में पानी की बहुत छोटी बूंदें अलग तरह से व्यवहार करती हैं। जब ऐसी सूक्ष्म बूंदें किसी ठोस अजैविक सतह पर बनती हैं, तो उनमें खास रासायनिक अभिक्रियाएं शुरू हो सकती हैं। देखा गया था कि इन अभिक्रियाओं के कारण वहां मूलक (free radicals)  बनते हैं जिनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉन (unpaired electrons) होते हैं। इस अवलोकन से यह सवाल पैदा हुआ कि यदि ऐसी ही बूंदें किसी सजीव सतह (जैसे पत्ती) पर जमें तो क्या परिणाम होगा।

इसको समझने के लिए वैज्ञानिकों ने एक छोटे फूलदार पौधे एरेबिडॉप्सिस थैलियाना (Arabidopsis thaliana plant)पर प्रयोग किए। यह ब्रेसिकेसी कुल (Brassicaceae family) का पौधा है।

विस्तृत प्रयोगों में पाया गया कि इस पौधे की पत्तियों पर ओस जमने पर, वहां होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप हाइड्रोजन परॉक्साइड (hydrogen peroxide)  और नाइट्रिक ऑक्साइड (nitric oxide molecule)  बनते हैं। नाइट्रिक ऑक्साइड पौधों और जंतुओं में एक जाना-माना महत्वपूर्ण संकेतक अणु है। यह बूंद से पौधे की कोशिकाओं में पहुंचकर ऐसी जैव-रासायनिक प्रक्रियाएं शुरू करवाता है, जो अंतत: पुष्पन की प्रक्रिया (flowering process) को सक्रिय कर देती हैं।

पुष्टि के लिए वैज्ञानिकों ने 30 से अधिक वर्षों में जुटाए गए ब्रेसिकेसी कुल के लगभग 1.2 करोड़ पौधों के पुष्पन रिकॉर्ड (plant flowering data) का विश्लेषण किया। उन्होंने फूल खिलने के समय की तुलना 11 अलग-अलग मौसम सम्बंधी कारकों से की। फूल खिलने के समय का सम्बंध तापमान (temperature change) और दिन की लंबाई के अलावा ओस बिंदु से भी देखा गया। ओस बिंदु हवा में उपस्थित नमी (air humidity) और हवा के तापमान से जुड़ा है।

हालांकि सभी वैज्ञानिक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं लेकिन यदि ये निष्कर्ष सही साबित होते हैं, तो वैज्ञानिकों की यह समझ बदल सकती है कि गर्माती जलवायु (climate change) में पौधे कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। यदि केवल तापमान ही नहीं, बल्कि हवा की नमी में छोटे बदलाव भी फूल आने के समय को प्रभावित कर सकते हैं, तो इस शोध का व्यावहारिक उपयोग (agricultural application) भी हो सकता है। भविष्य में किसान नियंत्रित फुहार या हल्की नमी देकर फूलने का समय बदल सकते हैं और फसल उत्पादन (crop yield improvement) बढ़ा सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zb76al3/full/_20260223_on_dew.jpg

कितना माइक्रोप्लास्टिक है वातावरण में ?

माइक्रोप्लास्टिक (microplastic pollution) अब धरती के लगभग हर हिस्से में फैल चुका है – सहारा रेगिस्तान से लेकर आर्कटिक की बर्फ तक। लेकिन एक सवाल अब तक बना हुआ है: हवा में कितना माइक्रोप्लास्टिक (airborne microplastics) तैर रहा है? एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इसका जवाब बेहद चिंताजनक बताया है।

नेचर में प्रकाशित शोध (Nature journal study) के अनुसार, हर साल भूमि पर होने वाली मानवीय गतिविधियां लगभग 600 क्वाड्रिलियन (6 शंख या 6×1017) माइक्रोप्लास्टिक कण हवा में छोड़ती हैं। यह मात्रा समुद्रों से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक से करीब 20 गुना अधिक है। इससे यह धारणा गलत साबित होती है कि हवा में फैलने वाले माइक्रोप्लास्टिक का मुख्य स्रोत समुद्र हैं; वास्तव में तो भूमि से होने वाला प्रदूषण (land-based pollution) कहीं बड़ा कारण है।

शोध में, भूमि के ऊपर की हवा के हर घन मीटर में औसतन 0.08 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए, जबकि समुद्र के ऊपर यह संख्या केवल 0.003 कण थी। आसान शब्दों में कहें तो हम जो हवा सांस के साथ अंदर ले रहे हैं, उसमें मौजूद ज़्यादातर माइक्रोप्लास्टिक मानव गतिविधियों से आ रहे हैं – जैसे यातायात (vehicular emissions), कारखाने, शहरों की धूल, सिंथेटिक कपड़ों के रेशे और कचरे से।

माइक्रोप्लास्टिक बहुत सूक्ष्म प्लास्टिक कण होते हैं, जिनका आकार एक माइक्रॉन से लेकर पांच मिलीमीटर तक होता है। ये इतने हल्के होते हैं कि हवा इन्हें आसानी से उड़ा ले जाती है और ये दूर- दूर तक फैल सकते हैं। एक बार पर्यावरण में पहुंच जाने के बाद इन्हें हटाना लगभग असंभव होता है और ये सालों तक बने रहते हैं (persistent environmental pollution)।

पहले हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक को लेकर किए गए अनुमान बहुत अलग-अलग थे – कहीं बहुत कम कण बताए गए थे, तो कहीं सैकड़ों। इस नए अध्ययन (global microplastic study) से यह समझ में आता है कि ऐसा क्यों हुआ। पहले के शोध अक्सर सीमित इलाकों के आंकड़ों या प्लास्टिक उपयोग के मोटे-मोटे अनुमानों पर आधारित थे। इसके विपरीत, इस अध्ययन में दुनिया भर के 283 स्थानों से जुटाए गए 2782 आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिससे अब तक का सबसे व्यापक वैश्विक डैटा (global data analysis) तैयार हो सका है।

अध्ययन के प्रमुख लेखक और विएना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एंड्रियास स्टोल के अनुसार इस शोध से एक बात तो साफ है कि हवा में फैलने वाले माइक्रोप्लास्टिक का मुख्य स्रोत भूमि है, न कि समुद्र। हालांकि अभी भी कुछ जानकारियों की कमी है, लेकिन दिशा अब स्पष्ट है। उम्मीद है कि यह अध्ययन आगे होने वाले शोध (future climate research) के लिए आधार बनेगा। बहरहाल, प्लास्टिक प्रदूषण सिर्फ पानी और मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस हवा में भी मौजूद है जिसमें हम सांस लेते हैं, और इसके लंबे समय के असर (health impact) क्या होंगे यह एक बड़ा सवाल है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/dam/m/bdee1cd6db608e69/original/Microplastics-Cleanup-GettyImages-1251038155.jpg?m=1769026222.762&w=900

अच्छा खाएं, पृथ्वी की सीमा में खाएं

अच्छा खाओ, सेहतमंद खाओ, जंक फूड मत खाओ, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (ultra processed food) मत खाओ। ऐसी बातें कहना-सुनना आम हैं – स्वास्थ विशेषज्ञों से लेकर शुभचिंतक तक ऐसा कहते हैं। लेकिन शायद ही कोई हमारे ग्रह – पृथ्वी – की सेहत (planetary health) को ध्यान में रखकर ऐसा कहता होगा। इस संदर्भ में पॉट्सडेम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के अर्थ-सिस्टम साइंटिस्ट जोहान रॉकस्ट्रॉम ने नेचर पत्रिका के एक लेख में बताया है कि किस तरह का खाना पृथ्वी की सेहत के लिए अच्छा है। उनका यह लेख ऐसे समय में और भी मौजूं है जब हमने सितंबर 2025 में पृथ्वी की नौ में से सात सीमा-रेखाओं (planetary boundaries)का उल्लंघन कर लिया है। यहां उन्हीं के लेख का सार प्रस्तुत किया जा रहा है।

म अपनी पसंद का या अपनी सेहत के लिए फायदेमंद भोजन खाते हैं। सलाह देने वाले सेहत के लिहाज़ से अच्छा खाने की सलाह देते हैं। लेकिन जोहान रॉकस्ट्रॉम कहते हैं भोजन का चुनाव सिर्फ हमारी जीवनशैली या सेहत का मामला नहीं है, बल्कि यह समाज और पृथ्वी दोनों की सेहत (earth system health) का मामला है। कैसे?

यदि आप इस पहलू को थोड़ा खंगालेंगे कि हम क्या खाते है, जो खाते हैं उसके उत्पादन (food production) में, और उसे बनाने में कितने संसाधन लगते हैं, तो बात शायद थोड़ी स्पष्ट हो जाए।

मोटे तौर पर हम तीन तरह का खाना खाते हैं

पहला, गैर-प्रोसेस्ड फूड। जैसा उपजा वैसा ही खा लिया, जैसे फल, सलाद वगैरह। (लेकिन यहां यह बात भी ध्यान में रखना होगा कि इन फलों, सब्ज़ियों को उगाने में संसाधन लगते हैं, पानी खर्च होता है, कीटनाशक से लेकर उर्वरक तक डाले जाते हैं। यह मायने रखता है कि इन चीज़ों की खेती के क्या तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं।)

दूसरा, प्रोसेस्ड फूड। खेत या बागानों से आने के बाद अनाज, फल, सब्ज़ी वगैरह को थोड़ा प्रोसेस करके खाना। जैसे गेंहूं, बाजरा आदि की रोटी बनाकर खाना, सब्ज़ियां पकाना वगैरह।

तीसरा, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड। इसमें खाने को अत्यधिक प्रोसेस किया जाता है ताकि वह ज़्यादा दिन तक चले, या झटपट तैयार कर खा लिया जाए। जैसे चिप्स, फ्रोज़न फूड, इंस्टेंट फूड, कोल्डड्रिंक, सॉफ्टड्रिंक्स वगैरह अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड में आते हैं।

मोटे तौर पर कहें, तो भोजन के उत्पादन व प्रोसेसिंग के दौरान कुल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (global greenhouse gas emissions) में लगभग 30 प्रतिशत योगदान होता है। और, दुनिया में हर साल इस्तेमाल होने वाले ताज़े पानी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा खेती में खर्च होता। खेती-बाड़ी न्यूट्रिएंट्स प्रदूषण (nutrient pollution) और जैव विविधता के नुकसान (biodiversity loss) का एक बड़ा कारण भी है। (न्यूट्रिएंट्स प्रदूषण, एक तरह का जल प्रदूषण जिसमें जल निकायों में खेती में इस्तेमाल होने वाले नाइट्रोजन, फॉस्फोरस आदि बहकर मिल जाते हैं और जलनिकायों में शैवाल बढ़ाते हैं।)

वर्तमान भोजन काफी हद तक अस्वस्थ की श्रेणी में आता है और सालाना लगभग डेढ़ करोड़ लोग अस्वस्थ भोजन (unhealthy diet) के चलते असमय मर जाते हैं जो वायु प्रदूषण से होने वाली सालाना मौतों से अधिक है। इसके अलावा, फिलहाल दुनिया Reserved: पृथ्वी की सीमा-रेखाएं
2009 में, जोहान रॉकस्ट्रॉम ने अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर पृथ्वी ग्रह पर मनुष्य के प्रभाव के पैमाने का अंदाज़ा लगाने के लिए प्लेनेटरी बाउंड्रीज़ (Planetary Boundaries) फ्रेमवर्क का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने नौ सीमाओं (प्लेनेटरी बाउंड्रीज़) की पहचान की थी, जिन्हें अगर लांघा गया तो पृथ्वी की कार्यप्रणाली डगमगा सकती है। हद में रहने का मतलब है हम सुरक्षित कामकाजी दायरे में रहेंगे। ये नौ सीमा रेखाएं हैं: जलवायु परिवर्तन, जैवमण्डल समग्रता, भू-प्रणाली परिवर्तन, मीठे पानी में बदलाव, जैव भू-रसायन चक्र, समुद्र अम्लीकरण, वायुमंडलीय एरोसोल (निलंबित कणीय पदार्थ) का भार, समतापमंडल में ओज़ोन क्षरण और नवीन कारक।
की एक प्रतिशत आबादी ही ऐसे दायरे में है जहां लोगों के अधिकार और भोजन की ज़रूरतें पृथ्वी की मर्यादाओं (safe operating space) के अंदर पूरी हो रही हैं।

ऐसे में हमें अपनी खानपान की आदतों में फौरन बदलाव लाने की ज़रूरत है। लेकिन कैसे? वैज्ञानिकों ने इस पर गंभीरता से काम किया है। 2025 के ईट–लैंसेट (EAT-Lancet) कमीशन में लगभग 35 देशों के पोषण, जलवायु, अर्थशास्त्र, स्वास्थ्य और कृषि विशेषज्ञ शामिल थे। इस कमीशन ने बताया है कि स्वस्थ भोजन क्या होता है, और एक उन्नत प्लैनेटरी हेल्थ डाइट (PHD) का सुझाव दिया है। PHD, ऐसा भोजन है जो मनुष्य और पृथ्वी दोनों के लिए स्वास्थ्यकर होगा। इसमें फल, सब्ज़ियां, गिरियां, फलियां और साबुत अनाज भरपूर मात्रा में लेने की सालह दी गई है; ये सभी मिलकर रोज़ाना की कैलोरी इनटेक का लगभग 65 प्रतिशत पूरा करें। PHD में हफ्ते में लगभग एक बार ही रेड मीट खाने और दो बार थोड़ी मात्रा में पोल्ट्री और मछली या शेलफिश खाने की सलाह दी गई है। PHD काफी लचीली है। कई पारंपरिक भोजन – जैसे मेडिटेरेनियन, दक्षिण और पूर्वी एशियाई, अफ्रीकन और लैटिन अमेरिकन भोजन – पहले से ही इसके मुताबिक हैं।

अभी, ज़्यादातर लोगों का आहार PHD से काफी अलग है। कई देशों में, खासकर अमेरिका में, लोग मीट बहुत ज़्यादा खाते हैं और सब्ज़ियां, फल, फलियां और गिरियां नहीं खाते हैं। इसके अलावा, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (processed food consumption) पूरी दुनिया में बहुत तेज़ी से अपनाया जा रहा है, जिसके चलते ऊपर से मिलाई गई शर्करा (added sugar), संतृप्त वसा और नमक का सेवन बढ़ रहा है।

कमीशन ने ग्रह की सभी नौ सीमा-रेखाओं में विभिन्न खाद्य प्रणालियों (food systems) के योगदान को मापा। और इनकी तुलना उस खाद्य प्रणाली से की जो मनुष्य और पृथ्वी दोनों के लिए स्वास्थ्यकर और वहनीय आहार (sustainable diet) दे सकती है। यह अनुमान लगाया गया कि क्या 2050 तक लगभग दस अरब लोगों को पृथ्वी की सीमाओं के अंदर पर्याप्त और स्वास्थ्यकर खाना खिलाया जा सकता है।

नतीजे चौंकाने वाले थे। स्वस्थ खाना खाने, खाने की बर्बादी कम करने (food waste reduction) और वहनीय उत्पादन के तरीकों (जैसे न्यूनतम जुताई) को अपनाकर 2050 तक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कमी की जा सकती है। लेकिन, अगर हमने अपने आहार और तरीकों में कोई बदलाव नहीं किया, तो यह उत्सर्जन 33 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा। यदि नीतिगत बदलाव (policy interventions) करने से रेड मीट की मांग में कमी आती है, तो जंगलों की कटाई (deforestation) में कमी आएगी और चारागाह बनाने के लिए ज़मीन पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाएगा।

सरकारों को ढांचे में बदलाव करने की ज़रूरत है – रेड मीट का उत्पादन (meat production) लगभग 33 प्रतिशत कम करना होगा, जबकि फल, सब्ज़ियों और गिरियों का उत्पादन (plant based food production) लगभग 60 प्रतिशत बढ़ाना होगा। ये बदलाव कई तरह की नीतियों के ज़रिए किए जा सकते हैं: वनस्पति-आधारित खेती के लिए सब्सिडी और इंसेंटिव देकर; ज़्यादा उत्सर्जन वाले मीट उत्पादन पर टैक्स या सीमा लगाकर; अलग-अलग फसलों के लिए आपूर्ति शृंखला में निवेश करके; तथा स्वास्थ्यप्रद व निर्वहनीय भोजन को प्राथमिकता देने वाले मानक बनाकर।

लेकिन यह बदलाव सस्ता नहीं होगा, इसके लिए हर साल लगभग 500 अरब डॉलर का खर्च आएगा। हालांकि इसका कुल फायदा (5-10 खरब डॉलर) (economic benefits) लागत से कहीं ज़्यादा है। यह स्वस्थ भोजन, कम जलवायु क्षति और कम पर्यावरणीय हानि की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में बचत करेगा।

यहां एक बात ध्यान में रखने की है कि दुनिया बाज़ार के प्रभाव (market influence) में है। इसलिए लोगों को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि वे क्या खाएं; नीतिगत स्तर पर स्वस्थ खाने के स्पष्ट दिशानिर्देश (dietary guidelines) तय करने होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://media.nature.com/w580h326/magazine-assets/d41586-026-00236-1/d41586-026-00236-1_51970322.jpg

सीपें: जलीय-दुनिया की गुपचुप नायिकाएं

कुमार सिद्धार्थ

दी की तलहटी में आधी गड़ी हुई, या समुद्र के किनारे चट्टानों से चिपकी हुई सीपों (oysters) में न तो कोई चमक-दमक है, न कोई तेज़ गति। फिर भी पूरी जलीय-दुनिया (aquatic ecosystem) बहुत हद तक इन्हीं पर टिकी हुई है।

सीपों को अगर एक पंक्ति में समझना हो तो कहा जा सकता है कि वे पानी की सफाईकर्मी (water filter species) हैं। बिना थके, बिना रुके सीप अपने शरीर में पानी खींचती है, उसमें से गंदगी, सूक्ष्म कण, बैक्टीरिया, शैवाल, रसायन और भारी धातु (heavy metals) तक को छानती है और अपेक्षाकृत साफ पानी बाहर छोड़ देती है। वैज्ञानिक बताते हैं कि एक सामान्य आकार की सीप एक दिन में 20 से 40 लीटर तक पानी छान सकती है। अब ज़रा कल्पना कीजिए, अगर किसी नदी या तट पर हज़ारों या लाखों सीपें हों, तो वे कितनी बड़ी मात्रा में पानी को साफ रखती होंगी।

दुनिया भर में सीपों की लगभग 1200 से अधिक प्रजातियां (oyster species) पाई जाती हैं। इनमें से करीब 1000 प्रजातियां मीठे पानी (freshwater mussels) में और बाकी समुद्री जल में रहती हैं। दिलचस्प बात यह है कि मीठे पानी की सीपों की सबसे अधिक विविधता उत्तरी अमेरिका में पाई जाती है। वहां अकेले लगभग 300 प्रजातियां हैं। युरोप में करीब 16 प्रमुख प्रजातियां हैं, जबकि एशिया में भी बड़ी संख्या में मीठे पानी की और समुद्री सीपें मिलती हैं। चीन, भारत, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश सीपों की जैव विविधता और खेती, दोनों के लिए जाने जाते हैं।

सीपों की बनावट बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली होती है। दो मज़बूत खोलों के भीतर उनका कोमल शरीर सुरक्षित रहता है। ये खोल कैल्शियम कार्बोनेट (calcium carbonate shell) से बने होते हैं, जिसे सीपें पानी से धीरे-धीरे लेकर परत-दर-परत जमा करती हैं। यही कारण है कि उनका खोल जीवन भर बढ़ता रहता है। मोती बनने की प्रक्रिया (pearl formation) भी इसी से जुड़ी है। जब कोई बाहरी कण उनके शरीर के भीतर फंस जाता है, तो सीप उसे ढंकने के लिए कैल्शियम की परतें चढ़ाती जाती है और धीरे-धीरे मोती बन जाता है।

सीपों का जीवन चक्र (oyster life cycle) और भी रोचक है। समुद्री सीपें अपने अंडे और शुक्राणु पानी में छोड़ती हैं। उनसे सूक्ष्म लार्वा बनते हैं, जो कुछ समय तक समुद्र में तैरते रहते हैं और फिर किसी सख्त सतह से चिपक जाते हैं।

मीठे पानी की कई सीपें तो और भी अनोखा तरीका अपनाती हैं। उनके लार्वा कुछ समय तक मछलियों के गलफड़ों या पंखों से चिपककर रहते हैं। इससे उन्हें सुरक्षित वातावरण (host fish dependency) मिलता है और वे दूर-दूर तक फैल पाती हैं। बाद में वे नदी की तलहटी में गिरकर स्वतंत्र जीवन शुरू करती हैं। यानी सीपें केवल पानी पर नहीं, मछलियों पर भी निर्भर करती हैं। मछलियां कम हों, तो सीपों का भविष्य भी संकट में पड़ जाता है।

सीपों की सबसे बड़ी खासियत उनकी उम्र (longevity) है। समुद्री सीपें आम तौर पर 10 से 20 साल तक जीवित रहती हैं, जबकि मीठे पानी की कई सीपें 50 से 100 साल तक जी सकती हैं।

हाल के दशकों में यह देखा गया है कि मीठे पानी की सीपों की लगभग एक हज़ार प्रजातियों में से अधिकांश या तो संकटग्रस्त (endangered species) हैं या तेज़ी से घट रही हैं। पोलैंड, क्रोएशिया और ब्रिटेन जैसे देशों में बड़े पैमाने पर सीपों की मृत्यु की घटनाएं दर्ज की गई हैं। लंदन की टेम्स नदी में पिछले 60 वर्षों में मीठे पानी की लगभग सारी सीपें मर चुकी हैं।

उत्तरी अमेरिका में मीठे पानी की 70 प्रतिशत से अधिक सीप प्रजातियां संकटग्रस्त या विलुप्ति की कगार पर हैं। युरोप में 16 में से 12 प्रजातियां खतरे में हैं और 3 को अत्यंत संकटग्रस्त माना गया है। इसके पीछे कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण है जलवायु परिवर्तन। पानी का तापमान बढ़ रहा है, ग्रीष्म लहरें आ रही हैं। जब नदी या समुद्र का पानी अचानक बहुत गर्म हो जाता है, तो सीपें उसे सहन नहीं कर पातीं और बड़े पैमाने पर मर जाती हैं। इसके साथ ही प्रदूषण, रासायनिक अपशिष्ट, माइक्रोप्लास्टिक, नदियों का बहाव बदलना, बांध, खनन और शहरी गंदा पानी इस संकट को और विकट बना रहे हैं।

महासागरों में एक और बड़ी समस्या है समुद्र का अम्लीकरण। कार्बन डाईऑक्साइड समुद्र में घुलकर पानी को अम्लीय बना रही है। इससे सीपों के खोल बनने की प्रक्रिया कमज़ोर हो जाती है। उनका खोल पतला और भुरभरा हो जाता है। छोटी-छोटी शिशु सीपें तो खोल बना ही नहीं पातीं!

समुद्री सीपें तटीय इलाकों के लिए जीवन-रेखा जैसी हैं। वे पानी साफ रखती हैं, तटों को कटाव से बचाती हैं, छोटी मछलियों और केकड़ों को आश्रय देती हैं और मत्स्य उत्पादन को स्थिर बनाए रखती हैं। जहां-जहां सीपों की चट्टानें होती हैं, वहां जैव विविधता कई गुना बढ़ जाती है।

एशियाई देशों में भी सीपों की स्थिति चिंताजनक है। अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे क्षेत्रों की समुद्री जैव विविधता पर सीपों की गिरावट का सीधा असर पड़ रहा है। इन द्वीपों के आसपास के प्रवाल भित्ति (कोरल रीफ) तंत्र में सीपों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे पानी की स्वच्छता बनाए रखने में मदद करती हैं, जिससे कोरल और मछलियों का जीवन संभव होता है। लेकिन समुद्र का बढ़ता तापमान, पर्यटन से उत्पन्न प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा और तटीय विकास की गतिविधियां इन नाज़ुक तंत्रों को कमज़ोर कर रही हैं।

एशिया में सीपों की खेती किसी आधुनिक उद्योग से कम नहीं है, बल्कि यह समुद्र और इंसान के बीच बने एक पुराने रिश्ते का विस्तार है। चीन, जापान, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में सीपों को ‘उगाया’ नहीं जाता, बल्कि उन्हें सही माहौल दिया जाता है, जहां वे अपने प्राकृतिक तरीके से पनप सकें। समुद्र के तट के पास बांस, लकड़ी या रस्सियों की कतारें लगाई जाती हैं। इन्हीं पर सीपों के लार्वा आकर चिपक जाते हैं। कुछ जगहों पर पुराने खोल, पत्थर या खास तरह की टाइलें भी डाली जाती हैं, ताकि छोटे-छोटे सीपों को पकड़ बनाने के लिए ठोस सतह मिल सके। फिर समुद्र अपना काम करता है। पानी के साथ आने वाला पोषण, शैवाल और खनिज तत्व सीपों के भोजन बनते हैं। इंसान को उन्हें खिलाना नहीं पड़ता, बस पानी को साफ और संतुलित बनाए रखना होता है। 

चीन इस क्षेत्र में सबसे आगे है। दुनिया में पैदा होने वाली समुद्री सीपों का बड़ा हिस्सा अकेले चीन से आता है। वहां के तटीय प्रांतों में हज़ारों किलोमीटर तक समुद्र में सीपों की खेती फैली हुई है। सैकड़ों सालों से मछुआरा परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस काम से जुड़े हैं। सुबह-सुबह छोटी नावों में निकलकर वे सीपों की कतारों की देखभाल करते हैं, टूटे हुए ढांचे ठीक करते हैं, ज़रूरत से ज़्यादा जमी सीपों को अलग करते हैं और परिपक्व सीपों को बाज़ार तक पहुंचाते हैं। यह खेती लाखों लोगों को रोज़गार देती है; नाविकों को, सफाई और पैकिंग करने वालों को, बाज़ार तक पहुंचाने वालों को और फिर होटल, रेस्तरां और निर्यात से जुड़े लोगों को भी।

जापान में सीपों की खेती तकनीकी रूप से काफी उन्नत है। वहां समुद्र की गहराई, पानी की गति और तापमान को ध्यान में रखकर खेती की जाती है। जापानी वैज्ञानिक सीपों की उन किस्मों पर काम कर रहे हैं जो ज़्यादा गर्म पानी में भी जीवित रह सकें। इससे जलवायु परिवर्तन के असर को कुछ हद तक संतुलित करने की कोशिश की जा रही है। जापान में सीपें केवल भोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा हैं। सूप, सुशी और कई पारंपरिक व्यंजनों में सीपों का इस्तेमाल होता है।

थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में सीपों की खेती छोटे-छोटे तटीय गांवों की रीढ़ है। वहां परिवार के परिवार इस काम से जुड़े हैं। महिलाएं और बुज़ुर्ग अक्सर सीपों को साफ करने, छांटने और बाज़ार के लिए तैयार करने का काम करते हैं। बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर के खर्च तक, बहुत कुछ इसी पर निर्भर करता है। इन देशों में सीपों की खेती गरीब समुदायों के लिए एक स्थिर आमदनी का साधन बन चुकी है।

सीपों का उपयोग केवल भोजन तक सीमित नहीं है। उनके खोलों का इस्तेमाल चूना बनाने में, खाद में कैल्शियम बढ़ाने में और निर्माण सामग्री में भी होता है। कुछ जगहों पर सीपों के खोलों से सड़क और तटीय बांध मजबूत किए जाते हैं। पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में भी सीपों के खोल का पावडर उपयोग में लाया जाता रहा है।

खाने के रूप में सीपें प्रोटीन, ज़िंक, आयरन और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर होती हैं। यही कारण है कि एशियाई देशों में इन्हें ‘समुद्र का पौष्टिक उपहार’ कहा जाता है। गरीब परिवारों के लिए यह सस्ता और पौष्टिक भोजन है, जबकि बड़े शहरों में यही सीपें महंगे रेस्तरां में विशेष व्यंजन के रूप में परोसी जाती हैं।

लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों जैसे इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम में भी सीपों की खेती और प्राकृतिक आबादी पर संकट गहराता जा रहा है। वहां सीपें न केवल पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका से भी जुड़ी हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री तूफानों की तीव्रता, समुद्र स्तर में वृद्धि और जल-तापमान में बदलाव इन क्षेत्रों में सीपों के अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। खेती भी जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से खतरे में पड़ रही है।

अगर सीपें सचमुच कम हो गईं, तो क्या होगा? सबसे पहले तो पानी की गुणवत्ता गिरेगी। नदियां और समुद्र अधिक गंदले होंगे। पीने योग्य पानी तैयार करना और महंगा हो जाएगा। फिर शैवाल विस्फोट बढ़ेंगे, जिससे मछलियां मरेंगी और दुर्गंध फैलेगी। और धीरे-धीरे पूरा पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित होने लगेगा। मत्स्य उद्योग को भी झटका लगेगा। तटीय समुदायों की आजीविका भी खतरे में पड़ेगी।

फिर भी आशा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। वॉशिंगटन डीसी से होकर बहने वाली एनाकोस्टिया नदी को साफ किया जा रहा है सिर्फ सीपों के लिए नहीं, बल्कि सीपों की मदद से। पुनर्प्रवेश कार्यक्रम का उद्देश्य सीवेज, ई.कोली और माइक्रोप्लास्टिक्स सहित अन्य प्रदूषकों को कम करना है।

एनाकोस्टिया नदी की तरह  कई लोग एक अलग रणनीति अपना रहे हैं। वे सीपों के संरक्षण के लिए धन जुटाने की बजाय, यह विचार सामने रख रहे हैं कि सीपों का उपयोग पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए किया जा सकता है।

पोलैंड की नीदा नदी में 1980 के दशक में सीपें पूरी तरह समाप्त हो गई थीं, लेकिन जब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स ने प्रदूषण को काफी हद तक कम कर दिया, तब मोटे खोल वाली नदी-सीप को सफलतापूर्वक फिर से बसाया गया।

इन उदाहरणों से यह साफ होता है कि अगर हम पानी को साफ करें, तो सीपें लौट सकती हैं। सीपों में एक और अद्भुत क्षमता है अनुकूलन की। हर सामूहिक मृत्यु के बाद कुछ सीपें बच जाती हैं। वही आगे चलकर नई पीढ़ी (adaptation ability)  बनाती हैं। यही विकास की प्रक्रिया है। यही उम्मीद है।

अगर हमने इन खामोश सफाईकर्मियों (ecosystem engineers) को बचा लिया, तो हम न केवल एक जीव-समूह को, बल्कि अपनी नदियों, अपने समुद्रों और अपने भविष्य (sustainable future) को बचा लेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://scx2.b-cdn.net/gfx/news/hires/2022/mussels.jpg

अवैध खनन से शोध कार्य को खतरा

पेरू स्थित अमेज़न जंगल (Amazon rainforest) के पंगुआना जैविक अनुसंधान केंद्र (Panguana Biological Research Station) ने अपने सभी फील्ड अध्ययन बंद कर दिए हैं। यह फैसला इलाके में सक्रिय अवैध सोना खनन करने वालों से मिल रही धमकियों के कारण सुरक्षा की दृष्टि से लिया गया। 1968 में स्थापित यह केंद्र पेरू का सबसे पुराना पर्यावरण शोध संस्थान है। यहां दुनिया भर के वैज्ञानिक वर्षावन, वन्यजीवों और जैव विविधता पर अध्ययन करते रहे हैं। यह केंद्र युयापिचिस नदी के किनारे बने 1600 हैक्टर के एक संरक्षित क्षेत्र (protected forest area) में स्थित है और अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है।

हाल के महीनों में अवैध खनन वाले लोग संरक्षित क्षेत्र के बहुत करीब पहुंच गए हैं। इन लोगों ने कर्मचारियों को जान से मारने की धमकियां दीं और कई बार संरक्षण क्षेत्र में घुसने की कोशिश भी की है। कुछ मौकों पर हथियारबंद टकराव (armed conflict) और गोलियां चलने की घटनाएं हुईं, जिससे वैज्ञानिकों के लिए सुरक्षित रहकर काम करना असंभव हो गया है।

आम तौर पर इस शोध केंद्र में लगभग 30 वैज्ञानिक और सहायक कर्मचारी काम करते थे। पिछले कई वर्षों में यहां किए गए शोध से 300 से अधिक वैज्ञानिक प्रकाशन (scientific publications) सामने आए हैं, जिनमें कीटों, पौधों और वर्षावन की पारिस्थितिकी (rainforest ecology) पर महत्वपूर्ण काम शामिल है। लंबे समय से जुटाए गए आंकड़ों से यह समझने में मदद मिली है कि उष्णकटिबंधीय जंगल पर्यावरणीय बदलावों पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं।

पंगुआना शोध केंद्र में पेरू के चार जलवायु निगरानी टावरों में से एक मौजूद है। ये टावर लगातार धरती और वातावरण के बीच कार्बन, नमी और ऊर्जा के आदान-प्रदान (carbon flux monitoring) को मापते हैं। यह जानकारी जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए बेहद ज़रूरी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार टावर बताता है कि एंडीज़ पर्वत (Andes mountains) कैसे अमेज़न के मौसम को प्रभावित करते हैं।

हालांकि टावर में लगे स्वचालित उपकरण दूर से अब भी डैटा (remote sensing data) इकट्ठा कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा कारणों से वैज्ञानिकों और वालंटियर्स को वहां जाने से मना कर दिया गया है। स्टेशन प्रबंधन को डर है कि पहले की गई शिकायतों के बदले में खनन करने वाले लोग इस टावर को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

पेरू में अवैध खनन एक गंभीर और बढ़ती हुई समस्या बन चुका है। अमेज़न कंज़र्वेशन (Amazon Conservation) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 1980 के बाद से खनन गतिविधियों ने 225 से ज़्यादा नदियों और झीलों को नुकसान पहुंचाया, करीब 1.4 लाख हैक्टर जंगल नष्ट किए, और कई आदिवासी समुदायों (indigenous communities) को प्रभावित किया है। यह काम अक्सर उन दूर-दराज़ इलाकों में फैलता है, जहां सरकार की मौजूदगी बहुत कम होती है। स्थानीय अभियोजक भी मानते हैं कि कमज़ोर निगरानी और कार्रवाई की कमी के कारण अवैध खनन लगातार बढ़ रहा है। हाल ही में पुलिस और सेना ने कुछ मशीनें नष्ट कीं, लेकिन इलाके में तनाव अब भी बना हुआ है।

फिलहाल क्षेत्रीय प्रशासन ने सीमित गश्त (security patrols) का सुझाव दिया है, लेकिन वैज्ञानिकों को चिंता है कि अगर मज़बूत सुरक्षा नहीं मिली, तो अमेज़न का यह महत्वपूर्ण वैज्ञानिक केंद्र लंबे समय तक बंद ही रह सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.z5w55jt/full/_20260114_on_peru_mining_lede.jpg

भवनों की मानकीकृत रिपोर्टिंग हरित विकल्पों को सशक्त बनाएगी

हर्षदा अकोलकर, श्वेता कुलकर्णी

भारत की बढ़ती आबादी के लिए आवास और बुनियादी निर्माण की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए देश में भवन निर्माण (construction sector) और निर्माण सामग्री तेज़ी से बढ़ रहे हैं। लेकिन यह बढ़त ऊर्जा खपत और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (greenhouse gas emissions) में भी काफी योगदान देती है। भवन-निर्माणों के पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए भारत सरकार ने ऊर्जा दक्षता और टिकाऊपन/वहनीयता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विभिन्न नीतियां, योजनाएं और कार्यक्रम लागू किए हैं।

सरकार की प्रमुख पहलों में से एक है ऊर्जा संरक्षण टिकाऊ भवन संहिता (Energy Conservation Sustainable Building Code, ECSBC)। इसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) द्वारा विकसित किया गया है और विद्युत मंत्रालय (MoP) द्वारा लागू किया गया है। ECSBC में नए वाणिज्यिक और आवासीय भवनों के लिए न्यूनतम ऊर्जा दक्षता मानक निर्धारित हैं, और मूलत: इन्हें ऊर्जा संरक्षण भवन संहिता (ECBC) के आधार पर विकसित किया गया है। इसमें ऊर्जा संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग और भवन के लिए अन्य हरित भवन आवश्यकताओं के मानदंड/मानक भी शामिल हैं। ECSBC के अलावा, कई निजी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा समर्थित स्वैच्छिक हरित बिल्डिंग रेटिंग सिस्टम्स भी व्यापक रूप से लागू हैं।

ये हरित बिल्डिंग रेटिंग सिस्टम ऊर्जा और जल दक्षता, टिकाऊ/वहनीय निर्माण सामग्री का उपयोग, अपशिष्ट प्रबंधन और भीतरी पर्यावरण गुणवत्ता सहित कई टिकाऊ/वहनीय मानकों के आधार पर परियोजनाओं का आकलन और प्रमाणन करते हैं। हालांकि ये रेटिंग सिस्टम्स आवासीय और वाणिज्यिक दोनों तरह के भवनों के लिए हैं, लेकिन इनका उपयोग अभी भी सीमित है – विशेष रूप से आवासीय क्षेत्र में। हालांकि न केवल केंद्र स्तर पर बल्कि नगर पालिकाओं के स्तर पर भी इन नीतियों को समर्थन हासिल है, लेकिन भारत की कुल भवन निर्माण/सामग्री का केवल 5 प्रतिशत हिस्सा ही हरित प्रमाणित है। हरित भवन निर्माण अपनाने में एक प्रमुख बाधा है हरित इमारतों के जीवनपर्यंत मिलने वाले लाभों के बारे में सीमित जागरूकता और समझ। पूरी जानकारी का अभाव उपभोक्ताओं की सोच-समझकर निर्णय लेने की क्षमता को सीमित करता है।

सूचना हस्तक्षेप

हमारा मानना है कि यदि उपभोक्ताओं को हरित प्रमाणन (green certification) के लाभ बताने वाली सही और प्रासंगिक जानकारी आसानी से उपलब्ध होगी तो हरित भवनों को अपनाने/बनाने में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

इस कमी को दूर करने के लिए हमारा सुझाव है कि मानकीकृत वहनीयता दर्शाने वाला एक प्रारूप (standard sustainability disclosure) बनाया जाए, जिसका उपयोग निर्माता अपनी परियोजनाओं का प्रचार-प्रसार करते समय करें। यह प्रारूप संभावित खरीदारों को भवन के पर्यावरणीय फायदों और टिकाऊ/वहनीय विशेषताओं के बारे में बताने का एक स्पष्ट, विश्वसनीय और तुलनीय तरीका होगा। ऊर्जा दक्षता, जल खपत, प्रयुक्त सामग्री और प्रमाणन जैसी महत्वपूर्ण जानकारी को सुलभ और समझने योग्य बनाकर यह प्रारूप रियल एस्टेट बाज़ार में पारदर्शिता (real estate transparency) बढ़ा सकता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उपभोक्ताओं को विकल्प चुनने में सक्षम बनाएगा और हरित भवनों के लाभों के बारे में उनकी जागरूकता बढ़ाएगा। जैसे-जैसे उपभोक्ताओं की जागरूकता बढ़ेगी, पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार निर्माण की मांग भी बढ़ सकती है, जिससे बाज़ार भी टिकाऊ/वहनीय प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रेरित होगा। भारत के तेज़ी से हो रहे शहरीकरण (urbanization in India) के मद्देनज़र, ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2047 तक 50 प्रतिशत से अधिक आबादी शहरी क्षेत्रों में रहेगी। यह तरीका हरित भवन प्रथाओं को मुख्यधारा में लाने और संसाधन-कुशल, कम कार्बन वाले शहरी भवन निर्माण को तेज़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

हरित भवन रेटिंग प्रणालियां

पिछले दो दशकों में, भारत में हरित भवन प्रमाणन की इकोसिस्टम (green building ecosystem)  अच्छी तरह से स्थापित हो चुकी है। भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) द्वारा शुरू की गई भारतीय हरित भवन परिषद (IGBC) पहली और व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली प्रणाली थी। इसके अलावा अन्य प्रमुख रेटिंग प्रणालियां हैं – दी एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (TERI) की GRIHA, एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (ASSOCHAM) की GEM और यूएस ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल की LEED। ये रेटिंग प्रणालियां विभिन्न प्रकार की इमारतों के लिए दिशानिर्देश देती हैं, जिनमें व्यक्तिगत भवनों से लेकर भवन परिसरों, आस-पड़ोस और यहां तक कि शहर-स्तरीय विकास परियोजनाएं भी शामिल हैं।

परियोजनाओं को हासिल टिकाऊ स्कोर के आधार पर प्रमाण-पत्र मिलता है। हर रेटिंग सिस्टम की रेटिंग वैधता अवधि अलग है; आम तौर पर किसी परियोजना को हासिल रेटिंग 3 से 5 वर्षों तक वैध रहती है। वैधता अवधि समाप्त होने के बाद परियोजनाओं को पुन: प्रमाणन लेना पड़ता है, जो पहले से विद्यमान इमारतों के लिए अलग होता है। पुन: प्रमाणन के समय रेटिंग बदल सकती है। इसमें रहवास-उपरांत ऑडिट के आधार पर परियोजना का मूल्यांकन किया जाता है, क्योंकि किसी परियोजना की वहनीयता की स्थिति समय के साथ बदल सकती है।

समस्त रेटिंग प्रणालियां ऊर्जा दक्षता, जल दक्षता, निर्माण सामग्री एवं संसाधन, अपशिष्ट प्रबंधन आदि जैसे प्रमुख क्षेत्रों में कुछ अनिवार्य और कुछ वैकल्पिक मानदंड निर्धारित करती हैं। इनमें से कुछ रेटिंग प्रणालियां कुछ मानदंडों के अनुपालन के लिए ECBC के उपयोग की भी अनुशंसा करती हैं। गौरतलब है कि हर रेटिंग सिस्टम का समान वहनीय उपायों के लिए वेटेज और स्कोर करने का तरीका अलग होता है। इसलिए, किसी भवन को मिली हरित रेटिंग बस यह बताती है कि वह पारंपरिक/सामान्य भवनों से बेहतर है। अत: यह संभव है कि हरित रेटिंग प्राप्त भवन, हरित भवन का प्रमाणन हासिल करने के लिए निर्धारित पर्याप्त हरित विशेषताओं को पूरा न करता हो।

हरित भवन पदचिह्न

भवन की हरित भवन पदचिह्न की नवीनतम जानकारी हरित भवन रेटिंग सिस्टम के पोर्टल (green building portal)  पर डाली जाती है, और उद्योग विशेषज्ञों द्वारा भवन स्टॉक संख्या का अनुमान भी लगाया जाता है। इन आंकड़ों के आधार पर, देश में कुल भवन निर्माणों में से 5 प्रतिशत भवन IGBC प्रमाणित हैं, 0.4 प्रतिशत GRIHA प्रमाणित भवन हैं और 0.04 प्रतिशत भवन LEED प्रमाणित हैं। यह दर्शाता है कि भारत में हरित भवनों का उपयोग/निर्माण अभी भी काफी कम है।

मानक वहनीयता प्रारूप

हरित विशेषताओं के प्रचार-प्रसार में सुधार और जागरूकता बढ़ाने का एक तरीका हो सकता है कि भवन विशेषताओं की रिपोर्टिंग का एक मानकीकृत प्रारूप (standard reporting format) बनाया जाए। इस प्रारूप से उपभोक्ता हरित रेटेड बनाम गैर-हरित रेटेड भवन की वहनीयता लागत की तुलना कर पाएंगे।

हरित बिल्डिंग काउंसिल भवन की हरित या वहनीय विशेषताओं को उजागर करने के लिए एक मानकीकृत प्रारूप बनाने में मदद कर सकती है। मानक प्रारूप दो महत्वपूर्ण उद्देश्यों को पूरा कर सकता है। एक तो यह किसी भवन की विशिष्ट वहनीय/टिकाऊ विशेषताओं के बारे में उपभोक्ताओं की समझ में सुधार कर सकता है। दूसरा यह तकनीकी रेटिंग को खरीदारों और उपयोगकर्ताओं के लिए स्पष्ट और सुलभ जानकारी के रूप में पेश कर सकता है, और सोचे-समझे निर्णय लेने में मदद कर सकता है।

वर्तमान में, IGBC, GRIHA, LEED और GEM जैसी विभिन्न ग्रीन बिल्डिंग प्रमाणन प्रणालियां हैं, जो वहनीयता का आकलन करने के लिए अलग-अलग वेटेज और स्कोर पद्धतियों का उपयोग करती हैं। मसलन, ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण या सामग्री के पुन: उपयोग जैसे मापदंड पर हर रेटिंग प्रणाली का ज़ोर अलग है। इसके अलावा, दक्षता लाभ या वित्तीय लाभ का अनुमान लगाने के लिए उपयोग की जाने वाली विधियां विभिन्न कारकों के आधार पर भी अलग-अलग होती हैं, जैसे परियोजना के चरण (डिज़ाइन बनाम रहवास-उपरांत), आधारभूत तुलना के लिए प्रयुक्त मान्यताओं और कार्यान्वित की जाने वाली तकनीकों या प्रथाओं के प्रकार के आधार पर।

मापदंडों और प्रचार प्रारूपों, दोनों में यह भिन्नता उपभोक्ताओं के लिए परियोजनाओं को दिए गए प्रमाणपत्र को पूरी तरह से समझना मुश्किल बना देती है। एक सुसंगत पैमाने या तुलना बिंदु की अनुपस्थिति में भवनों की हरित विशेषताओं की तुलना करना भ्रामक हो जाता है और अक्सर गलत समझ और निर्णय लेने में असमर्थता का कारण बनता है। इसलिए शब्दावली, मानकों को सुसंगत बनाने वाला मानकीकृत प्रारूप जानकारी को सरल बना सकता है, तुलना को आसान कर सकता है और हरित भवन के वादों पर उपभोक्ता का विश्वास बढ़ा सकता है।

टिकाऊ मानदंड

हरित रेटिंग सिस्टम द्वारा परिभाषित टिकाऊ मानदंडों का हमने विश्लेषण किया। इस आधार पर हम कुछ ऐसे चुनिंदा मानदंड सुझा रहे हैं जो उपभोक्ताओं को सोचे-समझे और पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार विकल्प चुनने में सक्षम बना सकते हैं। यही मानदंड मानकीकृत रिपोर्टिंग के प्रारूप भी बन सकते हैं।

1. दिनांक और वैधता के साथ हरित रेटिंग (rating validity): रेटिंग जारी करने की तिथि और वैधता की जानकारी उपभोक्ता के लिए अहम है। यह जानकारी उपभोक्ता को यह विश्वास दिलाती है कि प्रमाणपत्र हालिया है और यह भवन टिकाऊ है।

2. भवन के जीवनकाल में होने वाली बचत का अनुमानित आंकड़ा (lifecycle savings): भवन और इकाई दोनों स्तर पर ऊर्जा, जल और अपशिष्ट प्रबंधनों से होने वाली अनुमानित आर्थिक बचत दिखाई जा सकती है।

भवन स्तर पर – नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन, पानी की बचत और उसके पुनर्चक्रण एवं पुनर्उपयोग, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन आदि के लिए लगाई गई प्रणालियां बताई जा सकती हैं।

व्यक्तिगत इकाई स्तर पर – कुशल भवन आवरण बनाकर, नलों में पानी प्रवाह कम करने वाले उपाय लगाकर किए गए ऊर्जा संरक्षण के बारे में जानकारी देना। मौजूदा विभिन्न उपकरणों/सॉफ्टवेयर से हरित भवन की लागत का आकलन दर्शाया जा सकता है।

3. ऊर्जा दक्षता का मापन:

  • बिजली बचत की मात्रा द्वारा
  • सौर, SWH प्रणालियों द्वारा
  • कुशल उपकरणों द्वारा
  • नवीकरणीय प्रौद्योगिकियां अपनाकर और कुशल उपकरण लगाकर बिजली बिल कम आएगा।

4. तापीय आराम का मापन:

  • (एसी के साथ और बिना बिताए आरामदायक घंटे/वर्ष
  • दीवार और खिड़की की सामग्री के आधार पर
  • HVAC दक्षता (U value, WWR, RETV, EER) के आधार पर
  • एसी के बिना यदि भवन के भीतर आरामदायक वक्त बीतता है तो इससे बिजली बचेगी। दिए गए अंक उपभोक्ताओं को यह आकलन करने में मदद कर सकते हैं कि गर्मी से राहत पाने के लिए क्या वास्तव में एसी में ज़रूरी है?

5. ऊर्जा प्रदर्शन सूचकांक (Energy Performance Index – EPI): यह विभिन्न परियोजनाओं में ऊर्जा खपत की तुलना करने में मदद करता है – कम EPI यानी उच्च दक्षता।

6. जल दक्षता का मापन (water efficiency metrics)

  • प्रतिशत पानी की बचत
  • वर्षा जल संचयन की मात्रा
  • रीसायकल पानी की मात्रा और उसका उपयोग
  • यह मीठे पानी की बचत करेगा, स्थिरता को बढ़ाएगा और पानी का बिल कम करेगा

7. अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियां (on-site waste management): ऑन-साइट अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों और उनकी दक्षता के बारे में जानकारी देना।

8. सार्वजनिक परिवहन से निकटता (public transport accessibility): नज़दीकी सार्वजनिक परिवहन सेवा तक पैदल जाने में लगने वाला समय  – उपभोक्ताओं को रोज़ाना आने-जाने में लगने वाले समय की योजना बनाने में मददगार होगा।

9. सबकी पहुंच (universal accessibility): बुज़ुर्गों और विकलांग व्यक्तियों सहित सभी के लिए आसान पहुंच।

वर्तमान में भी कुछ हरित भवन सलाहकार और डेवलपर अपने-अपने प्रारूपों के ज़रिए (खासकर विपणन या प्रमाणन के दौरान) परियोजना की वहनीयता सम्बंधी विशेषताएं बताते हैं। हालांकि ये प्रयास पारदर्शिता के प्रति बढ़ती प्रतिबद्धता दर्शाते हैं लेकिन प्रारूपों में एकरूपता के अभाव के चलते उपभोक्ताओं के लिए विभिन्न परियोजनाओं के लाभों की तुलना करना और मूल्यांकन एक चुनौती बन जाता है।

आगे की राह

एक मानक प्रारूप से हरित और टिकाऊ भवन विशेषताओं के बारे में जागरूकता लाने में काफी मदद मिल सकती है, और प्रमाणित हरित भवनों को खरीदने/बनाने में तेज़ी आ सकती है। यह प्रारूप उपभोक्ताओं को पारंपरिक भवनों की तुलना में टिकाऊ भवनों के लाभों के बारे में विश्वसनीय, तुलनीय और समझने में आसान जानकारी दे सकता है। इसका उपयोग रियल एस्टेट परियोजनाओं के विपणन(real estate marketing), बिक्री और प्रचार सामग्री में किया जा सकता है।

यह प्रारूप भारतीय राष्ट्रीय भवन परिषद (National Building Council) द्वारा गठित एक अंतर-परिषद समिति द्वारा तैयार करके लागू किया जा सकता है। इस समिति में केंद्र सरकार, प्रमुख हरित भवन परिषद और रियल एस्टेट हितधारक और राज्य RERA प्राधिकरणों (Real Estate Regulatory Authority) के प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं।

प्रस्तावित समिति को ये प्रमुख नीतिगत कार्य सौंपे जा सकते हैं:

1. विभिन्न हरित भवन रेटिंग सिस्टम के मुख्य टिकाऊ मापदंडों का समन्वय करके एकरूप प्रारूप बनाना और अधिसूचित करना।

2. सभी मान्यता प्राप्त ढांचों में सामंजस्य बनाना, जिससे एकरूपता और तुलनीयता सुनिश्चित हो।

3. कार्यान्वयन दिशानिर्देश और अनुपालन प्रोटोकॉल स्थापित करना, जिसमें राज्य-स्तरीय RERA जैसे मौजूदा प्लेटफार्मों के साथ एकीकरण शामिल है, ताकि इसे अपनाना आसान हो।

4. वहनीयता के दावों को सत्यापित करने व गलतबयानी से सम्बंधित शिकायतों के समाधान के लिए एक निगरानी एवं शिकायत निवारण तंत्र बनाना।

5. प्रारूप की प्रभावशीलता की समीक्षा करने और इसके बेहतर होते वहनीयता मानकों, नियामकों और उपभोक्ता अपेक्षाओं के अनुरूप अपडेट करने के लिए सतत परामर्श करना।

प्रमुख हितधारकों के बीच समन्वय को बढ़ावा देकर समिति उपभोक्ता और डेवलपर्स के बीच मौजूदा सूचना अंतर को पाट सकती है। भारत तेज़ी से शहरीकृत हो रहा है। ऐसे प्रयास अधिक टिकाऊ निर्मित परिवेश (sustainable urban development) बनाने में मदद कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://img.etimg.com/thumb/width-1200,height-900,imgsize-28874,resizemode-75,msid-111003760/industry/services/property-/-cstruction/green-buildings-market-in-india-to-reach-39-billion-by-2025.jpg