ब्रिटेन का युरोप से अलगाव पहले भी हुआ है – एस. अनंतनारायण

ब्रिटेन के अधिकांश टापू चूने (चॉक) के टीले हैं। यह चूना प्राचीन ठोस चट्टानों पर जमा होता गया है और इसके ऊपर मिट्टी की परत है। सिर्फ सेलिसबरी और डॉवर में ही चूने की इस परत पर मिट्टी की परत नहीं है और यहां इन चट्टानों की सफेदी दिखाई पड़ती है। चॉक की यह दीवार इंग्लिश चैनल के नीचे-नीचे पूर्व की ओर फैली हुई है और फ्रांस के तट पर कैप ग्रिस नेज़ में एक बार फिर ऊपर उभरती है। माना जाता है कि कभी डॉवर से लेकर कैप ग्रिस नेज़ तक यह एक पूरी पर्वत श्रृंखला रही होगी। इस पर्वत  श्रृंखला में दरार कैसे पड़ी, इसको लेकर अटकलें ही रही हैं।

जिस सप्ताह प्रधान मंत्री टेरेसा मे ने युरोपीय संघ से ब्रिटेन के आर्थिक अलगाव का प्रस्ताव रखा था, उसी सप्ताह संजीव गुप्ता और उनके साथी शोधकर्ताओं ने नेचर कम्युनिकेशंस पत्रिका में रिपोर्ट किया था कि इस मामले में हमारी समझ बेहतर हुई है कि कैसे भौतिक चॉक कनेक्शन में टूटन हुई और यूरोप और ब्रिटेन के बीच इंगलिश चैनल के लिए जगह तैयार हुई थी। गुप्ता व साथियों के अनुसार, यह ब्रेक्सिट 1.0 था जिस पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया था।

उत्तर-पूर्वी फ्रांस तक फैली हुई डॉवर की सफेद क्लिफ लगभग दस करोड़ वर्ष पूर्व नीचे की चट्टानों पर जमना शुरु हुई थी। उस वक्त दुनिया अपेक्षाकृत गर्म थी और यह इलाका समुद्र में डूबा हुआ था। एक-कोशिकीय समुद्री शैवाल की कैल्शियम कार्बोनेट से बनी खोल (कोकोलिथ) समुद्र की तलछटी में जमने लगी और धीरे-धीरे चॉक के बड़े-बड़े टीले बन गए जो आज ब्रिटेन के अधिकांश हिस्से में पाए जाते हैं। जब पृथ्वी की ऊपरी परत (भू-पर्पटी) ऊपर उठने लगी और तापमान में गिरावट की वजह से समुद्र का पानी उतरने लगा तो ये टीले दिखाई देने लगे। इस तरह ब्रिटेन द्वीप चॉक की पर्वत श्रृंखला से युरोप से जुड़ गया। और लगभग साढ़े चार लाख वर्ष पूर्व हिमयुग के दौरान पानी और भी कम होता गया और इंग्लिश चैनल सूख-सी गई और बर्फीली ज़मीन पर झाड़ियां पनपने लगीं।

चॉक की पर्वत श्रृंखला और इंग्लिश चैनल कैसे बनी, इसके बारे में वर्तमान समझ यह है कि आइसबर्ग (हिमपर्वतों) के पिघलने के कारण उत्तरी सागर में विशाल तालाब बन गया होगा और चूने की दीवार ने पानी को दक्षिण की ओर, युरोप व ब्रिटेन के बीच पहुंचने से रोक दिया होगा। बर्फ के लगातार पिघलने और नदियों के बहाव के कारण पानी छलकने लगा होगा और दीवार टूट गई होगी। दीवार के टूटने से ढेर सारा पानी बहने लगा होगा, जिसे महाबाढ़ कहते हैं। गुप्ता व साथियों के उक्त शोध पत्र के अनुसार इंग्लिश चैनल की तलछटी में बनी कई घाटियां इस ओर इशारा करती हैं कि वे पानी के तेज़ बहाव के कारण बनी होंगी। शोध पत्र के अनुसार पूर्व में इन घाटियों की व्याख्या पिघलते हिमनदों से उत्पन्न पानी की वजह से आई ‘विनाशकारी बाढ़’ के परिणाम के आधार पर की गई थी।

इस बारे में कुछ अन्य मॉडल भी हैं जो कम विनाशकारी हैं और अचानक चूने की दीवार टूटने पर आधारित नहीं हैं। इन मॉडल्स में चूने की चट्टान के उत्तर में किसी झील बनने का विचार नहीं है। या इन मॉडल्स में निचले इलाके में बनी घाटियों की भी अन्य व्याख्याएं हैं। अलबत्ता, इन मॉडल का परीक्षण नहीं हो पाया है क्योंकि जिन जगहों पर चूने की पर्वत श्रृंखला फूटने की बात कही जा रही है, वहां के समुद्री पेंदे के बारे में भूगर्भीय जानकारी बहुत कम है।

इंग्लिश चैनल के समुद्री पेंदे के बारे में पहली महत्वपूर्ण जानकारी तब पता चली जब इंग्लैंड और फ्रांस के बीच समुद्र के अंदर से रेल सुरंग बनाने के लिए सर्वेक्षण किया जा रहा था। इंग्लैड और फ्रांस को जोड़ती हुई इंग्लिश चैनल में यह सुरंग समुद्र के पेंदे से 75 मीटर नीचे है। सर्वेक्षण के दौरान चट्टान में कई किलोमीटर लंबे-लंबे गड्ढों के बारे में पता चला। ये गड्ढे रेत और बजरी से भरे हुए थे। इन गड्ढों को फोसे डेनगीयर्ड (फोसे का मतलब होता है गहरा) नाम दिया गया। ये गड्ढे कैसे पड़े यह तो समझ में नहीं आया लेकिन सुरंग के मार्ग में बदलाव करना पड़ा। चट्टान में इन गड्ढों के होने के पीछे एक कारण जल प्रपातों को बताया गया। यह विचार लगभग सही था किंतु उस समय ज़्यादा प्रमाण या जानकारी ना होने की वजह से इस विचार को छोड़ दिया गया था।

 

जानकारी की राह

नेचर कम्युनिकेशंस में लेखकों ने अब किया यह है कि समुद्री पेंदे के मानचित्रों, भूभौतिकी सूचनाओं और चट्टानी धरातल के मानचित्र से प्राप्त सारी नवीनतम जानकारियों को एक साथ रखकर देखा है। ये जानकारियां समुद्र के पेंदे पर शॉक तरंगें भेजकर परावर्तित होकर आई तरंगों के आधार पर प्राप्त की गई हैं। शोधकर्ताओं ने इन सारी जानकारियों को जोड़कर एक व्याख्या विकसित करने का प्रयास किया है।

विभिन्न स्थानों पर समुद्र की गहराइयों का नक्शा समुद्र के पेंदे का सोनार सर्वेक्षण करके बनाया गया था। दूसरी ओर, धरातल की चट्टानों का नक्शा परावर्तित भूकंपीय तरंगों का उपयोग करके बनाया गया था। समुद्री पेंदे से होकर गुज़रने वाला कम्पन्न जब धरातल की चट्टानों से टकराता है तो आंशिक रूप से परावर्तित होता है। परावर्तित तरंगों की मदद से परावर्तन करने वाली सतह की संरचना बना ली जाती है।

समुद्र पेंदे की गहराई के मानचित्र से बहाव के पथ – लोबोर्ग चैनल  – पता चलता है। लोबोर्ग चैनल डॉवर जलडमरुमध्य से होती हुई घाटियों का एक नेटवर्क कुरेदते हुए आगे दक्षिण-पश्चिम में जाती है। लोबोर्ग चैनल और घाटियों के नेटवर्क से लगता है कि वे एक ही ड्रेनेज सिस्टम का हिस्सा हैं। इसके आगे डॉवर जलडमरुमध्य के बीच में 1 कि.मी. से 4 कि.मी. चौड़े रहस्यमय गड्ढे हैं। फोसे डेनगीयर्ड नामक इस समूह में सात मुख्य गड्ढे हैं जो लगभग 140 मीटर गहरे हैं और इनकी ढ़लान 15 डिग्री की है।

लंदन स्थित बैडफोर्ड कॉलेज के प्रोफेसर एलेक स्मिथ का कहना है कि इन गड्ढों में जमी तलछट की जमावट और संघटन से पता चलता है कि वे कई कि.मी. लंबे जलप्रपात के कारण बने होंगे। इतने गहरे गड्ढों का बनना पानी के बहाव या लहरों के कारण अपरदन से संभव नहीं है। शोध पत्र के अनुसार, इन गड्ढों की गहराई को देखते हुए लगता है कि जल-प्रपात काफी ऊंचाई से नीचे गिरता होगा।

तो तस्वीर कुछ इस तरह है – चूने की एक पर्वत श्रृंखला थी जो ब्रिाटेन को फ्रांस से जोड़ती थी। यह पर्वत श्रृंखला साइबेरिया के बर्फीले टुंड्रा प्रदेश की तरह दिखती थी जबकि आज यह काफी हरी-भरी है। यह एक ठंडी दुनिया थी जिसमें जगह-जगह ऊंचाई से डॉवर की सफेद चॉक चट्टान पर जलप्रपात गिरते थे। गिरते जलप्रपात की यह धारणा चट्टान में गड्ढों की व्याख्या कर देता है। मगर यह शायद पहला चरण मात्र था। इसके बाद दूसरा चरण आया जब दीवार टूटी और बाढ़ आई। इसके कारण उत्पन्न तेज़ बहाव के कारण घाटियों का नेटवर्क बना। ऐसा प्रतीत होता है कि शायद बर्फ की चादर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर झील में गिर गया था जिसकी वजह से पानी में तेज़ हिलोरें उठी होगी जिससे चूने की पर्वत  श्रृंखला के ऊपर से पानी के गिरने का रास्ता बना होगा… भूकंप ने पर्वत श्रृंखला को कमज़ोर कर दिया… और वह टूट गई होगी।

डॉवर जलडमरुमध्य के बनने की बेहतर समझ से यह समझने में मदद मिली है कि उत्तर पश्चिमी युरोप से पिघला हुआ पानी उत्तरी अटलांटिक में कैसे पहुंचा होगा। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह समझना भी मददगार होगा कि ब्रिटेन युरोप के मुख्य भूभाग से कब अलग हुआ और इंसानों ने यहां कब बसना शुरू किया। ((स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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प्लास्टिक का भविष्य: खराब और अच्छा – किम पिकरिंग

प्लास्टिक मुख्य रूप से दो कारणों से बदनाम है: अधिकांश प्लास्टिक पेट्रोलियम से बने होते हैं और अंतत: वे पर्यावरण में कचरे के रूप में बिखरे रहते हैं।

अलबत्ता, इन दोनों समस्याओं से बचा जा सकता है। जैवपदार्थ से निर्मित और विघटन योग्य सम्मिश्र पर ध्यान दिया जाए और साथसाथ रीसायक्लिंग पर ध्यान केंद्रित किया जाए तो प्रदूषण को कम किया जा सकता है और प्लास्टिक पर्यावरण में सचमुच सकारात्मक योगदान भी दे सकता है।

प्लास्टिक की बुराई

प्लास्टिक का टिकाऊपन उन्हें अत्यंत उपयोगी बनाता है। किंतु उनका यही गुण (टिकाऊपन) उन्हें धरती पर, और खासकर समुद्रों में, स्थायी (और तेज़ी से बढ़ता हुआ) बदनुमा दाग बना देता है।

यह काफी समय से पता रहा है कि थोक प्लास्टिक महासागरों को दूषित कर रहे हैं। समुद्री धाराओं के केंद्रित होने के कारण प्रशांत महासागर में कचरा एक जगह इकट्ठा होता गया है और एक तैरता प्लास्टिक द्वीप अस्तित्व में आया है ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच। यह आज ग्रीनलैंड से भी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। प्लास्टिक के बड़ेबड़े टुकड़े समुद्री जीवन और समुद्री पक्षियों के लिए खतरनाक हैं। प्लास्टिक के ऐसे टुकड़े स्तनधारी जीवों और पक्षियों के पेट और आंतों में जमा हो जाते हैं और उनका गला भी घोंट सकते हैं। 

हाल ही में, खाद्य श्रृंखला में सूक्ष्मप्लास्टिक्स की सर्वव्यापी उपस्थिति होने की जानकारी ने चिंता को जन्म दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि 2050 तक समुद्र में उतना ही प्लास्टिक होगा जितनी मछलियां हैं। तो मछुआरे क्या मछली की बजाय प्लास्टिक पकड़ने समुद्र में जाएंगे?

इसके अलावा, प्लास्टिक उत्पादन वर्तमान में पेट्रोलियम पर निर्भर है। इसने स्वास्थ्य से जुड़े खतरों के मुद्दों को उठाया है, जो आम तौर पर पेट्रोलियम आधारित उत्पादों के उत्पादन, उपयोग और निपटान से जुड़े होते हैं।

भला प्लास्टिक

प्लास्टिक कई तरीकों से पर्यावरण में सकारात्मक योगदान कर सकते हैं:

भोजन की कम बर्बादी

सभी खाद्य पदार्थों के उत्पादन का एकचौथाई से एकतिहाई हिस्सा खराब होने के कारण बर्बाद हो जाता है। लेकिन प्लास्टिक पैकेजिंग के बिना, यह मात्रा और अधिक होगी और उसके कार्बन पदचिंह और ज़्यादा होंगे।

मैं कई रीसायक्लिंग समर्थकों को जानता हूं जो खराब भोजन को फेंकने से पहले सोचते नहीं हैं, जबकि इस भोजन की रोपाई, कृषि, कटाई और परिवहन में ऊर्जा खर्च हुई थी, और इसने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान दिया होगा।

हल्काफुल्का परिवहन

परिवहन (कार, ट्रेन और विमान) में प्लास्टिक का उपयोग र्इंधन की खपत को कम करेगा। हवाई यातायात में पारंपरिक मिश्रधातुओं के विकल्प के रूप में (फाइबर से पुष्ट करके) प्लास्टिक के उपयोग ने पिछले कुछ दशकों में र्इंधन दक्षता में बहुत इज़ाफा किया है।

उदाहरण के लिए, बोइंग 787 ड्रीमलाइनर में फाइबरयुक्त प्लास्टिक के उपयोग से र्इंधन दक्षता साधारण पारिवारिक कार के तुल्य हो गई है (तुलना प्रति व्यक्ति तय की गई दूरी के आधार पर)। वैसे, हवाई यातायात की पसंदीदा सामग्री, कार्बन फाइबर, प्लास्टिक से ही बनाया जाता है।

पर्यावरण के लिए लाभ सहित प्लास्टिक के बारे में कई अच्छी चीज़ें हैं। किंतु क्या यह संभव है कि अच्छेअच्छे को ले लें और बुरे से बच जाएं?

भविष्य का प्लास्टिक

रासायनिक रूप से प्लास्टिक लंबी श्रृंखलाएं या बड़ी क्रॉसलिंक्ड संरचनाएं हैं जो आम तौर पर कार्बन परमाणुओं के ढ़ांचे से बनी होती हैं।

जैविक स्रोतों से प्राप्त प्लास्टिक का उपयोग हम लंबे समय से कर रहे हैं जैसे चमड़ा, पशुओं की आंतें और लकड़ी। प्लास्टिक के ये रूप जटिल रासायनिक संरचनाएं हैं जिन्हें फिलहाल केवल प्रकृति में ही बनाया जा सकता है।

कुछ शुरुआती कृत्रिम प्लास्टिक केसिन (डेयरी से प्राप्त) जैसे प्राकृतिक पदार्थों से बनाए गए थे। इनका उपयोग बटन जैसी साधारण वस्तुएं बनाने में होता था। पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक का विकास हमें तेज़ी से ऐसे पदार्थों से दूर ले गया।

वैसे, पिछले दो दशकों में, जैविक स्रोतों से प्राप्त प्लास्टिक उपलब्ध हो रहा है और पेट्रोलियमआधारित प्लास्टिक का स्थान ले रहा है। इनमें पॉलिलेक्टाइड (पीएलए) जैसे स्टार्चआधारित प्लास्टिक शामिल हैं, जो मकई स्टार्च, कसावा की जड़ों या गन्ने से बनाया जाता है और पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक के समान ही प्रोसेस किया जाता है। इस तरह के प्लास्टिक का फोम बनाया जा सकता है या पेय पदार्थ की बोतलें बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है।

पर्यावरण पर बोझ को कम करने की दिशा में प्लास्टिक रीसायक्लिंग एक और आवश्यक कदम है। हमें स्वीकार करना होगा कि कचरा लोग फैलाते हैं, न कि प्लास्टिक खुद। अपशिष्ट संग्रह के अधिक प्रयास किए जा सकते हैं और इनाम/दंड की नीति का उपयोग भी किया जा सकता है जिसमें कचरा फैलाने को निरुत्साहित करने की व्यवस्था हो और प्लास्टिक टैक्स भी लगाया जाए, और  रीसायकल्ड प्लास्टिक को इस टैक्स से मुक्त रखा जाए।

ऐसे उत्पादों के विकास को प्रोत्साहन देना भी ज़रूरी है जिनमें उत्पाद के पूरे जीवन चक्र को ध्यान में रखा जाए। उदाहरण के लिए, युरोप में कानूनन ऑटोमोटिव उद्योग के लिए यह अनिवार्य किया गया कि किसी भी कार का कम से कम 85 प्रतिशत हिस्सा रीसायकल किया जाए। इस कानून से उद्योग में उपयोग की जाने वाली सामग्रियों और डिज़ाइन पर नाटकीय प्रभाव पड़ा है।

अच्छे से अच्छे प्रयासों के बावजूद यह तो संभव नहीं होगा कि हम सारे प्लास्टिक को रीसायक्लिंग के लिए इकट्ठा कर लें। पर्यावरणीय क्षति को रोकने के लिए जैवविघटनशील  प्लास्टिक एक उपयोगी साधन हो सकता है। पीएलए (पॉलिलेक्टाइड) जैवविघटनशील है, हालांकि यह धीरेधीरे सड़ता है। अन्य विकल्प भी उपलब्ध हैं।

इससे जैवविघटनशीलता को नियंत्रित करने में अधिक शोध की आवश्यकता उजागर होती है, जिसमें विभिन्न अनुप्रयोगों को ध्यान में रखा जाए। जैवविघटनशील प्लास्टिक के जीवन के अंत में उससे निपटने के लिए आधारभूत संरचना की भी आवश्यकता है। जाहिर है, हम नहीं चाहेंगे कि हमारे विमान 20 साल की सेवा के दौरान जैवविघटित हो जाएं, लेकिन एक बार उपयोग में ली जाने वाली प्लास्टिक की बोतल को अवश्य जल्दी ही विघटित हो जाना चाहिए।

यह ज़रूरी नहीं कि हमारी पृथ्वी ज़हरीले कचरे का कूड़ादान बन जाए। अल्पावधि में, इसके लिए सरकार को जैविक स्रोतों से प्राप्त, रीसायकल करने योग्य और जैवविघटनशील प्लास्टिक को प्रोत्साहन प्रदान करना होगा ताकि वे पेट्रोलियम आधारित उत्पादों के साथ प्रतिस्पर्धा कर पाएं।

सुधार के कुछ संकेत नज़र आ रहे हैं: प्लास्टिक द्वारा होने वाली हानि के बारे में जागरूकता बढ़ रही है और उपभोक्ताओं में प्लास्टिक बैग के लिए भुगतान करने या प्रतिबंध को स्वीकार करने की तैयारी दिख रही है। हमें अपने पिछवाड़े में डंपिंग को रोकना होगा। याद रखें, पर्यावरण वह जगह है जहां हम रहते हैं। इसे नजरअंदाज करके हम संकट मोल ले रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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मानव भ्रूण में संयोजक कोशिकाएं पहचानी गई

प्रत्येक स्तनधारी, पक्षी और सरीसृप के भ्रूण की प्रारंभिक अवस्था में कोशिकाओं का एक ऐसा समूह होता है जिनमें कुछ खास क्षमता होती है। कोशिकाओं का यह समूह अन्य कोशिकाओं को संकेत देता है कि उन्हें कौन-सा अंग बनना है। ये ‘संयोजक’ कोशिकाएं कहलाती   हैं। जीव विज्ञानियों ने अब तक मेंढक, पक्षियों और चूहों के भ्रूण में इन संयोजक कोशिकाओं का पता कर लिया था किंतु नैतिकता सम्बंधी नियमों के चलते मानव भ्रूण में इन संयोजक कोशिकाओं को देख पाना संभव नहीं हुआ था। हाल ही में प्रयोगशाला में मानव स्टेम कोशिकाओं में इन संयोजकों को देखा गया है।

1920 की शुरुआत में जर्मन भ्रूण विज्ञानी हैंस स्पैमैन और उनके स्नातक छात्र हिल्डे मैंगोल्ड इस पर अध्ययन कर रहे थे कि कैसे कशेरुकी जानवरों के भ्रूण, कोशिकाओं की खोखली गेंद से हाथ-पैर-सिर बनने वाली संरचना में परिवर्तित हो जाते हैं। परिवर्तन के दौरान भ्रूण एक संकरी नाली नुमा लकीर बनाता है जिसे प्रारंभिक लकीर कहते हैं। स्पैमैन और मैंगोल्ड को सेलेमैंडर के भ्रूण में प्रारंभिक लकीर के एक छोर पर कोशिकाओं का एक खास समूह दिखा। उन्होंने इन्हें जब सैलेमेंडर की एक अन्य प्रजाति के भ्रूण पर आरोपित किया तो इन कोशिकाओं ने अपने आसपास की अन्य कोशिकाओं को मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी बनने के संकेत दिए। यह अध्ययन वैकासिक जीव विज्ञान में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके लिए स्पैमैन को 1935 में कार्यिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने इसी तरह की संयोजक कोशिकाएं, जिन्हें ‘स्पैमैन संयोजक’ भी कहते हैं, मेंढक, पक्षियों और चूहों के भ्रूण में देखीं। लेकिन मानवों में इन्हें देखने के लिए भ्रूण को 14 दिन से ज़्यादा जीवित रखना होता है। यू.के. में नियमों के मुताबिक भ्रूण को 14 दिन तक ही रखा जा सकता है।

उक्त नियम से बचने के लिए न्यूयार्क स्थित रॉकफेलर विश्वविद्यालय के स्टेम कोशिका जीव विज्ञानी ब्रिवनलो की टीम ने प्रयोगशाला में मानव भ्रूण से ली गई स्टेम कोशिकाओं को कल्चर किया है। इस प्रयोग में शोधकर्ताओं ने कोशिकाओं का संपर्क भ्रूण विकास में महत्वपूर्ण दो प्रोटीन्स से कराया। इससे कुछ ऐसी कोशिकाएं विकसित हुर्इं जिनमें संयोजक कोशिका के आनुवंशिक लक्षण थे। इसके बाद उन्होंने इन संयोजक कोशिकाओं को चूज़े के भ्रूण पर आरोपित किया। ऐसा करने पर पाया गया कि चूज़े के अपने तंत्रिका तंत्र के साथ ही साथ तंत्रिका ऊतकों की एक और लकीर उभर रही थी। इसे शोधकर्ताओं ने नेचर पत्रिका में रिपोर्ट किया है। अध्ययन के वरिष्ठ लेखक ब्रिवनलो का कहना है कि यह काफी अश्चर्यजनक है कि दो अलग-अलग प्रजातियों की कोशिकाएं विकास सम्बंधी संकेतों या निर्देशों को साझा कर सकती है।

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के विकास जीव विज्ञानी क्लॉडियो स्टर्न ने इसे  ‘एक अच्छी तकनीकी पहल’ की संज्ञा दी है। मानव भ्रूण के बाहर संयोजक कोशिकाओं को बनाने में मिली सफलता यह समझने में मदद कर सकती है कि इनमें अन्य कोशिकाओं को संकेत देने की क्षमता कहां से आती है। इससे भ्रूण विकास के समय कोशिकाओं की संकेत प्रणाली को समझने में भी मदद मिल सकती है। शोधकर्ता प्रयोगशाला में तैयार की गई भ्रूण कोशिकाओं के उपयोग से प्रारंभिक विकास के चरणों को समझने की तैयारी कर रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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अंडे के छिलके की महत्वपूर्ण भूमिका – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

मुर्गी का अंडा और उसका छिलका वैज्ञानिकों के विभिन्न समूहों के लिए शोध का विषय रहा है। आम तौर पर एक मुर्गी प्रति वर्ष 300 अंडे देती है, अंडे और उसके छिलके को पूरी तरह से बनने में 25-26 घंटों यानी करीब एक दिन का समय लगता है। अंडा देने के बाद उसे सेने में लगभग 21 दिन का समय लगता है। कनाडा के वैन्कूवर ब्रिाटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के डॉ. मार्विन ए. टुंग्स ने 1967 में अपनी पीएच.डी. थीसिस में मुर्गी के अंडे के भौतिक, रासायनिक और पदार्थ सम्बंधी गुणधर्मों के बारे में बताया था। उन्होंने बताया था कि अंडे को खड़ा रखा जाए तो उस पर 4 किलोग्राम तक भार रखा जा सकता है और अंडे को टूटने से बचाने में उसके छिलके की कठोरता सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मुर्गी के एक अंडे का वज़न 60 ग्राम के लगभग होता है और छिलके में लगभग 6 ग्राम खनिज होता है जो उसे कठोरता प्रदान करता है।

लगभग 200 वर्ष पूर्व, जर्मन खनिज वैज्ञानिक फ्रेडरिक मो ने सामग्रियों की कठोरता का अनुमान लगाने के लिए एक मानक पैमाना तैयार किया था। हीरे को इस पैमाने पर 10 अंकों पर रखा गया है, कीमती पत्थर पुखराज को 8, क्वार्ट्ज़ को 7 और एपेटाइट खनिज पत्थर (कैल्शियम फास्फेट) को 5 अंक पर रखा गया है। इस पैमाने पर हमारे दांतों के एनेमल की कठोरता 5 है, क्योंकि यह मूलत: हाइड्रॉक्सी-एपेटाइट से बना होता है। इस प्रकार यह हमारे शरीर का सबसे कठोर खनिजीकृत ऊतक है। इस पैमाने पर उंगलियों के नाखून की कठोरता केवल 2.5 है जबकि कैल्साइट (कैल्शियम कार्बोनेट) अधिक कठोर है जो मो पैमाने पर 3 है। मुर्गी के अंडे के छिलके में कैल्साइट होता है और यह अंडे को टूटने से बचाता है। लेकिन फिर कैसे चूज़ा बड़ी आसानी से अपनी चोंच से अंडे के छिलके को तोड़कर बाहर आ पाता है?

इस पहेली का जवाब खोज निकाला है क्यूबेक (कनाडा) के मैकगिल विश्वविद्यालय में दंत चिकित्सा, शारीरिकी और कोशिका जीव विज्ञान के प्रोफेसर मार्क मैकी की टीम ने। उनका यह जवाब साइंस एडवांसेस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। मेकी की टीम ने अंडे के छिलके की बारीक संरचना निर्धारित करने के लिए इसी विश्वविद्यालय में खनन व पदार्थ विभाग के रिचर्ड क्रोमिक और कनाडा, स्पेन, जर्मनी और यूएस के अन्य वैज्ञानिकों के साथ सहयोग किया। छिलके की मोटाई 0.36 मि.मी. होती है, लेकिन इसमें कई उप-परतें होती हैं और प्रत्येक का प्रोटीन संघटन और संरचना अलग-अलग होती है।

अंडे के छिलके की संरचना, संघटन और खनिज तत्व का विस्तृत अध्ययन फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और कनाडा के सहयोगियों के साथ मिलकर कनाडा के ओटावा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मैक्सवेल हिन्के के नेतृत्व में एक अंतर्राष्ट्रीय समूह पहले ही कर चुका था। उनके अलावा अन्य शोधकर्ताओं के कार्य से अंडे के छिलके में 500 प्रोटीन्स की पहचान की गई है। और उन्होंने विशेष रूप से प्रमुख प्रोटीन ओवोक्लेडिन और ओवोकेलिक्सिन की पहचान की है। और एक तीसरा है जिसे ओस्टियोपोन्टिन कहते हैं।

इस प्रकार छिलका एक जटिल मिश्रित पदार्थ है जिसमें खनिजों का सम्मिश्रण होता है (जिसमें वज़न के हिसाब से कैल्साइट 96 प्रतिशत होता है)। शेष 4 प्रतिशत अन्य अल्पमात्रिक तत्वों और तथाकथित मैट्रिक्स प्रोटीन्स से बना होता है। सहस्त्राब्दियों से, डायनासौर के समय से और यहां तक कि जब समुद्री जीव स्थलीय जीवों के रूप में विकसित हो रहे थे उसके पहले से, छिलके में निरंतर सुधार होता रहा है। कैल्साइट क्रिस्टल में सतह पर धनात्मक आवेशित कैल्शियम ऋणात्मक आवेश वाले मैट्रिक्स प्रोटीन से जुड़ जाते हैं। ये सब मिलकर क्रियात्मक संश्लिष्ट जैव-खनिज बनाते हैं।

शोधकर्ताओं ने अंडे के छिलके की एक पतली कटान काटकर देखा तो उन्हें उसकी पांच उप-परतें मिलीं। उन्होंने प्रत्येक परत का अवलोकन उन्नत सूक्ष्मदर्शी तकनीकों से किया और कठोरता के परीक्षण भी किए। उन्होंने खोजा कि बहुत ही पतली कटानों में भी जैव-खनिज की एक नैनो-स्तर की संरचना थी। नैनो संरचना अंडे के सबसे बाहरी छिलके में सबसे सूक्ष्म (30 नैनोमीटर) से लेकर सबसे अंदर की परत में 68 नैनोमीटर तक मोटी थी। ये सारी परतें अंडे को सटकर घेरे रहती हैं जहां चूज़े की वृद्धि और विकास होता है। सबसे आंतरिक पर्त को मैमिलरी परत कहते हैं। यह बहुत ही मुलायम होती है और इसकी नैनोसंरचना चूज़े के विकास में कंकाल-निर्माण हेतु कैल्शियम की ज़रूरत को पूरा करती है। इस प्रकार छिलका न केवल बढ़ते चूज़े की रक्षा करता है बल्कि ज़रूरी कैल्शियम भी प्रदान करता है। छिलके का इस तरह घुल-घुलकर पतला होते जाना चूज़े को अंडे का छिलका तोड़कर बाहरी दुनिया में आने में मदद करता है।

करीब 50 साल पहले, जापानी वैज्ञानिकों की एक टीम ने अंडे में चूज़े के संपूर्ण विकास की एक फिल्म तैयार की थी। इसमें दिखाया गया था कि 21 दिनों के विकास में प्रतिदिन क्या-क्या होता है और अंडे में चूज़ा कैसे बनता है और बाहर कैसे आता है। दुख की बात है कि अब यह फिल्म आसानी से उपलब्ध नहीं है। अलबत्ता, ऑस्ट्रेलिया में पौल्ट्री हब द्वारा बनाई गई एक छोटी फिल्म (2 मिनिट) ‘चिकन एम्ब्रियो डेवलपमेंट’ यूट्यूब पर उपलब्ध है। यह फिल्म देखने लायक है। इसे देखकर पता चलता है कि जैव-विकास ने कैसे यह सुनिश्चित किया है कि अंडे के अंदर नई पीढ़ी की शुरुआत, वृद्धि और विकास सुरक्षित ढंग से हो पाएं। अंडे के छिलके की प्रत्येक परत की बारीक समझ के साथ, हमारे पास इस उल्लेखनीय सुरक्षात्मक संरचना की बेहतर समझ है जिसके भीतर एक नया जीवन जन्म लेता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

 

 

प्रयोगशाला मे अंग निर्माण संभव है – डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

पिछले कुछ समय से प्रशासन एवं सामाजिक संगठनों के जागरूकता अभियानों के चलते कॉर्निया और त्वचा के दान में काफी वृद्धि हुई है। ब्रेन डेड व्यक्ति के महत्वपूर्ण अंगों जैसे हृदय, गुर्दे, लीवर को मरीज़ों के परिजनों की सहमति से निकालकर, ज़रूरतमंदों को दान देने की अनूठी पहल ने कई लोगों को जीवन दान दिया है।

भारत में प्रत्यारोपण के लिए अंगों की मांग और उपलब्धता के बीच बहुत बड़ी खाई है। प्रति वर्ष देश में करीब 5 लाख लोग अंगों की अनुपलब्धता की वजह से मर जाते हैं। उपरोक्त निराशाजनक आंकड़े न केवल अंगदान करने के लिए समाज में जनचेतना के महत्व को रेखांकित करते हैं अपितु शोध द्वारा प्रयोगशाला में अंग-निर्माण की कल्पना को साकार करने के लिए भी प्रेरित करते हैं।

विश्व के कुछ चुनिंदा वैज्ञानिक 1996 से ही प्रयोगशाला में मानव अंगों के निर्माण का सपना बुनने लगे थे। स्कॉटलैंड स्थित रोसलिन इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों को वयस्क कोशिकाओं की सहायता से डॉली नामक भेड़ को क्लोन करने में सफलता प्राप्त हुई थी। उन्होंने अनिषेचित अंडे का केंद्रक हटाकर दूसरी भेड़ की सामान्य कोशिका का केंद्रक उस अंडे में डाला और एक भेड़ (डॉली) को जन्म दिया। डॉली के जन्म के बाद से ही मानव क्लोन और मानव अंग निर्माण जैसे विषयों पर कई वैज्ञानिक उत्साहित हैं तो कई समूह इस प्रकार के प्रयोगों की नैतिकता से जुड़े प्रश्न भी उठाने लगे हैं।

वैज्ञानिक शोध तथा खोज कदम-दर-कदम आगे बढ़ने वाली धीमी किंतु निरंतर प्रक्रिया है। 1996 में देखे गए स्वप्न निश्चित ही अभी पूरे नहीं हुए हैं परंतु वैज्ञानिक शोधों ने कई मील के पत्थर पार किए हैं।

विश्व भर के वैज्ञानिक तीन तरीकों से मानव अंग बनाने के लिए प्रयासरत हैं – पहला आर्गेनॉइड बैंक द्वारा; दूसरा, मानव कोशिका या पालतू पशुओं में संवर्धन के द्वारा; और तीसरा, 3D प्रिंटर की सहायता से अंगों का निर्माण करके।

आर्गेनॉइड बैंक

1900 के प्रारंभ में ही भ्रूण वैज्ञानिक जान चुके थे कि पानी में रहने वाले अल्प विकसित पोरीफेरा (स्पंज) वर्ग के जीवों के शरीर की कोशिकाओं को अलग कर दिया जाए तो कुछ ही समय में ये कोशिकाएं आपस में जुड़कर पूरे स्पंज का निर्माण कर लेती हैं। स्टार फिश की भुजाएं, प्लेनेरिया के शरीर के भाग और छिपकली की पूंछ के पुनर्निर्माण की क्षमता के उदाहरण वैज्ञानिकों को मानव अंग बनाने के लिए प्रेरित करते रहे हैं।

सन 2008 में जापानी वैज्ञानिकों ने बताया कि उन्होंने मानव भ्रूण की स्टेम कोशिका को प्रेरित कर कई परतों वाले सेरेब्राल कॉर्टेक्स (मस्तिष्क का एक भाग) बनाने में सफतता प्राप्त कर ली है। तब से ही स्टेम कोशिकाओं से अंग विकसित करने के प्रयासों को पंख लग गए हैं।

2011 की एक सुबह मेडलीन लेन्केस्टर ने सामान्य सुबह की तरह प्रयोगशाला में अपनी कल्चर प्लेट्स का निरीक्षण करते हुए प्रारंभ की थी। कई सप्ताह से वे मानव के भ्रूण की स्टेम कोशिका से तंत्रिकागुच्छ प्राप्त करना चाह रही थीं। तंत्रिकागुच्छ विभिन्न प्रकार की तंत्रिका कोशिकाओं का समूह होता है जो आगे चलकर तंत्रिकाओं का निर्माण करती हैं। अज्ञात कारणों से तंत्रिका कोशिकाएं कल्चर प्लेट की सतह से चिपकने की बजाय दूधिया रंग की छोटी गेंदों के रूप में दिख रही थीं। अनेक गेंदों में से एक अन्य से अलग तथा गहरे रंग की दिख रही थी। जब इसे सूक्ष्मदर्शी में देखा तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गर्इं। भ्रूण के प्रारंभिक मस्तिष्क में ये गहरे रंग की कोशिकाएं  रेटिना (आंख का एक हिस्सा) बना रही थीं। रासायनिक संकेत, वृद्धि कारकों के नियत समय पर उपयोग करके विश्व की कुछ प्रयोगशालाएं आंख, लीवर, किडनी, अग्न्याशय, आमाशय, फेफड़े, स्तन तथा प्रोस्टेट जैसी रचना वाले त्रि-आयामी ऊतक बनाने में सफल रही हैं। ऊतक के इन छोटे समूहों को अंगाभ (ऑर्गेनॉइड) कहते हैं। पूर्ण रूप से विकसित वास्तविक अंगों की संरचना एवं कार्यों की नकल करने वाले ये ऊतक अपूर्ण तथा अल्प-विकसित अंग ही होते हैं। इन अंगाभों का इस्तेमाल उस अंग की बीमारियों का मॉडल बनाने में किया जा सकता है जिससे बीमारी को समझने में मदद मिलती है।

फिलहाल ऑर्गेनाइड पूर्ण मानव अंगों जैसे तो नहीं है और शोधकर्ता इन्हें परिष्कृत करने में जुटे हुए हैं ताकि अधिक जटिल, परिपक्व और संपूर्ण अंग बना सकें। महत्वपूर्ण बात यह समझना है कि कोशिकाओं को वह कौन-सा उद्दीपन (संकेत) चाहिए कि वे आपस में जुड़कर मस्तिष्क बना सकें। कोशिकाओं की स्वयं संगठित होने की कुदरती खूबी के कारण ही अंगों का निर्माण होता है।

कोशिकाओं की इसी खूबी के चलते जापानी वैज्ञानिक सासाई ने सेरेब्राल कॉर्टेक्स बनने के बाद प्रारंभिक ऑप्टिक लोब और पियूष ग्रंथि बनाने में भी सफलता प्राप्त की है। 2007 में क्लेवर्स और साथियों ने पाया कि आंत की स्टेम कोशिकाओं में विभाजन करने और पुरानी कोशिका के बदले नई कोशिका बनाने की असीमित क्षमता होती है। स्टेम कोशिकाएं प्राय: शरीर के भीतर त्रि-आयामी जगह में बेहतर कार्य कर पाती है किंतु कांच की प्लेट में सपाट माध्यम में वे अपने संरचनात्मक लक्षण और कार्य भूल जाती हैं। क्लेवर्स और साथियों ने स्टेम कोशिकाओ को एक तरल माध्यम में कल्चर करने का प्रयास किया। आंत की स्टेम कोशिकाओं को जेल में बिलकुल वैसा ही वातावरण मिला जैसा शरीर में में होता है। कुछ ही समय में विभाजित और विभेदित कोशिकाओं की खोखली गेंद बनती दिखने लगी। इसके भीतर की सतह पर आंत के समान ही भोजन को सोखने के लिए झालर भी दिखाई दी। यह वास्तविक आंत का ही एक छोटा रूप था। इस प्रकार विकसित आंत-अंगाभ भविष्य में आंत की बीमारियों से लड़ने का प्रभावी उपाय रहेगा।

उदाहरण के लिए एक आनुवंशिक बीमारी ‘सिस्टिक फाइब्रोसिस’ में कोशिका में ऐसे विकार पैदा हो जाते हैं कि फेफड़ों तथा आंत के अस्तर में पानी का प्रवाह बाधित हो जाता है। इसके कारगर इलाज के लिए गुदा के भीतरी अस्तर से कोशिकाएं निकालकर अंगाभ बनाकर उपयोग किए जाते हैं।

आंत-अंगाभ के समान अब कैंसर उपचार के लिए लीवर-अंगाभ भी उपलब्ध हैं। क्लेवर्स ने अंगाभ बनाने में वयस्क स्टेम कोशिकाओं का उपयोग किया किंतु एक और वैज्ञानिक वेल्स ने भ्रूणीय स्टेम कोशिका का उपयोग करते हुए आमाशय व अन्य छोटे अंगों के अंगाभ बनाए हैं। वेल्स व उनके साथियों ने प्रयोगों के लंबे अनुभव से उन रसायनों का पता लगा लिया है जिनसे भ्रूणीय स्टेम कोशिका से अंगाभ बनाए जा सकते हैं।

दस वर्षों के अथक प्रयास से  2013 में मेलिस्सा ने सही वृद्धि कारकों का पता लगाकर गुर्दा विकसित कर लिया जिनमें खून को छानकर मूत्र एकत्रित करने वाली रचनाएं बनाने वाली कोशिकाएं भी थीं। अनेक प्रयोगों के बाद वैज्ञानिक टेबेके ने छ: सप्ताह के भ्रूण के समान लीवर कलिका का निर्माण करने में सफलता प्राप्त की। उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि यदि ‘लीवर ऑर्गेनाइड’ को चूहे के अक्रियाशील लीवर में पहुंचा दिया जाए तो वे लीवर कोशिकाओं का सामान्य कार्य करने में सक्षम हो जाती हैं। चूहों पर किए गए इन प्रयोगों से मानव परीक्षण में भी सफलता की उम्मीदें बंधी है। वैज्ञानिकों का दीर्घकालिक लक्ष्य अभी भी यही है कि अंगाभ वास्तविक मानव अंग के कार्यो की नकल करने में सक्षम हो जाएं।

पालतू पशुओं में संवर्धन

बेलेमोंटे के जुआन कार्लोस लम्बे समय से मेंढक, मछली तथा सेलेमेण्डर में क्षतिग्रस्त अंगों को फिर से बनाने की क्षमता के कायल हैं। इस अद्भुत क्षमता से प्रभावित होकर उन्होंने खोए भाग को पुन: बनाने की प्रक्रिया को समझने में दशकों खपा दिए हैं। अब उन्होंने अपना पूरा ध्यान गाय, भेड़, बकरी तथा सूअर जैसे पालतू पशुओं पर केंद्रित किया है। वे मानव ऊतकों को पशुओं के भ्रूण में विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि ह्मदय, किडनी, लीवर जैसे मानव अंगों को पालतू पशुओं के भीतर विकसित करके प्रत्यारोपण के लिए अंगदान की कमी को पूरा किया जाए।

स्टेम कोशिकाओं को शरीर के बाहर तश्तरी में विकसित करने की प्रक्रिया में कठिनाइयां आती हैं क्योंकि कोशिकाएं शरीर के बाहर परिवर्तित वातावरण में असहज हो जाती हैं और वयस्क कोशिकाओं में विकसित न होकर ऑर्गेनाइड्स बनाती हैं। अगर मानव स्टेम कोशिआओं का पशुओं के साथ सामंजस्य बैठा सके तो मानव अंग बनाए जा सकेंगे।

यह विज्ञान की काल्पनिक कथा जैसा लगेगा पर वर्जीनिया की एक कम्पनी ने ‘गालसेफ’ नामक सूअर तैयार किए हैं जो मनुष्य से समानता रखते हैं। कंपनी ने मानव में सामान्य सूअर के अंग को अस्वीकार करने को उकसाने वाले एक महत्वपूर्ण जीन, अल्फा-गाल को काबू में कर लिया है। साथ ही, उन्होंने सूअर के लीवर, किडनी और हार्ट में पांच मानव जीन जोड़ दिए हैं। वैज्ञानिक आशांवित हैं कि इस सूअर के अंग मानव में प्रत्यारोपित किए जा सकेंगे।

मानवेतर अंग या कोशिकाओं का मानव शरीर में प्रत्यारोपण ज़ेनोट्रांसप्लांट कहलाता है। वैज्ञानिकों ने आनुवंशिक रूप से परिवर्तित सूअर के हृदय को बैबून में प्रत्यारोपित कर दिया। बैबून के शरीर में यह हृदय 945 दिनों तक जीवित रहा। गौरतलब है कि बैबून मानव से 90 प्रतिशत समानता रखते हैं।

भारत में 22 लाख लोग गुर्दा प्रत्यारोपण और 1 लाख लोग लीवर प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे हैं मगर गुर्दा मात्र 15,000 को और लीवर 1000 लोगों को ही मिल पाता है। शायद जीन परिवर्तित जानवरों के अंगों को मानव में प्रत्यारोपण के उपयुक्त बनाने में वैज्ञानिकों को कुछ और समय लगेगा। यह कितना नैतिक है? प्रत्यारोपण से क्या उन्हें होने वाले रोग मानव में आ जाएंगे?

अंगों का 3D प्रिटिंग

क्या यह संभव है कि हम स्वयं की कोशिका से, शरीर के बाहर अंग का निर्माण करने का प्रयास करें और फिर उन अंगों को आवश्यकतानुसार शरीर में प्रत्यारोपित कर दें। मान लीजिए कि एक व्यक्ति की दोनों किडनी काम नहीं कर रहीं हैं और उसे सप्ताह में दो बार डायलिसिस कराना पड़ता है। क्या यह संभव है कि शरीर के बाहर उस व्यक्ति की स्टेम कोशिकाओं को किडनी बनाने के लिए प्रेरित किया जाए और नई किडनी बनते ही उसे प्रत्यारोपित कर दिया जाए?

3D प्रिटिंग में उपयुक्त पदार्थ की कई परतें सही आकार में एक के ऊपर बिछाकर वस्तु बनाई जा सकती है। उदाहरण के लिए यदि आप एक छोटा ताजमहल बनाना चाहते हैं तो 3D प्रिटिंग मशीन यह काम बखूबी पूरी नक्काशी के साथ पूरा कर देगी। आप को केवल ताजमहल का एक डिजिटल त्रि-आयामी मॉडल चाहिए और वह पदार्थ जिसका उपयोग आप ताजमहल बनाने में करना चाहते हैं। 3D प्रिटिंग में स्याही की बजाय ताजमहल बनाने के लिए उपयुक्त मिश्रण का पतला घोल एक पतली नली या पाइप के मुंह से निकलेगा और त्रि-आयामी आकृति के अनुसार एक के ऊपर एक कई परतें बिछाकर पूरा ताजमहल बना देगा। 3D प्रिटिंग का सबसे पहले उपयोग 1980 में हुआ था। परंतु 2009 में कुछ पेटेंट समस्या से मुक्त होने के बाद अब यह सार्वजनिक उपयोग के लिए प्रयुक्त होने लगा है।

जिस प्रिंटर का उपयोग मानव अंग बनाने में किया जा सकता है उसे 3D बायो प्रिंटर कहते हैं। मानव अंगों के निर्माण के लिए इंक की जगह जीवित कोशिकाएं सामान्य रूप से एक जेली में मिलाकर अंग के सांचे पर डाली जाती हैं। एक के बाद एक परत डाल कर अंग के सांचे का निर्माण किया जाता है। सांचा जैव-विघटनशील जेली या जैविक पदार्थ से बना होता है। चूंकि प्रिटिंग के समय तथा पूरा सांचा या संरचना बनने तक कोशिकाओं को जीवित रखना बेहद ज़रूरी है इसलिए शरीर के समान वातावरण, वृद्धिकारक और ऑक्सीजन भी जेली में होते हैं। सांचे पर कोशिका की परत बनते ही उसे इनक्यूबेटर में रखा जाता है। धीरे-धीरे अंग का निर्माण करनें वाली कोशिकाएं फैलकर पूरे सांचे को ढंक लेती है तथा अंग का सामान्य कार्य प्रारंभ कर देती है। सांचा धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है और वास्तविक अंग बचा रह जाता है। उपरोक्त तकनीक का उपयोग कर अब लीवर, हार्ट, किडनी जैसी बहुत सी जटिल संरचनाएं बनाना संभव हो गया है। लीवर बनाने के लिए उसी मनुष्य के लीवर का कुछ हिस्सा काट कर अलग कर लिया जाता है। कटे हुए टुकड़े से कोशिकाओं को पृथक कर एक सांचे पर डालने से लीवर बन जाता है।

कुछ ही दशकों में इस प्रकार की तकनीक से बहुत बड़ा परिवर्तन आने की संभावना है। आपके शरीर पर कौन-सी दवा कारगर है, यह देखने के लिए ऐसी कोशिका या अंग का उपयोग किया जा सकता है। नई दवा को चुनने या  खोजने में लगने वाले कई वर्षों का समय और पैसा बचाया जा सकता है। लगता तो है कि कुछ ही वर्षों में हम अपने पुराने या खराब हो चुके अंग को भी बदल पाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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लोग, पर्यावरण और तूतीकोरिन – जाहिद खान

मिलनाडु सरकार ने आखिरकार तूतीकोरिन (तूतूकुड़ी) स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनी वेदांता स्टरलाइट के तांबा संयंत्र को स्थायी तौर पर बंद करने का आदेश जारी कर दिया है। यही नहीं तमिलनाडु उद्योग संवर्धन निगम ने भी इस संयंत्र के प्रस्तावित विस्तार के लिए ज़मीन के आवंटन को रद्द कर दिया है। इससे पहले मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने अपने एक अंतरिम आदेश में संयंत्र की विस्तार योजना पर रोक लगाने का निर्देश दिया था।

सरकार के इस फैसले के बाद निश्चित तौर पर स्थानीय लोगों ने राहत की सांस ली होगी, जिनकी जि़ंदगी इस ज़हरीले संयंत्र से नरक बनी हुई थी। अन्नाद्रमुक सरकार ने जो फैसला आज लिया है, यदि पहले ही ले लिया गया होता, तो इलाके के इतने सारे लोगों को पुलिस की गोलीबारी से अपनी जान न गंवाना पड़ती और हज़ारों लोग जानलेवा बीमारियों से ग्रसित न होते।

तूतीकोरिन में वेदांता समूह का स्टरलाइट तांबा संयंत्र पिछले 20 साल से चल रहा था। इस संयंत्र की सालाना तांबा उत्पादन की क्षमता 70 हज़ार से 1.70 लाख टन है, लेकिन यह सालाना 4 लाख टन तांबे का उत्पादन कर रहा था। गौरतलब है कि गुजरात, गोवा और महाराष्ट्र विवादास्पद स्टरलाइट संयंत्र को पर्यावरण को होने वाले खतरे के चलते नामंज़ूर कर चुके थे। अंतत: इसे तमिलनाडु में लगाया गया।

तूतीकोरिन हत्याकांड के बाद, कंपनी द्वारा की गई कई अनियमितताएं एक के बाद एक सामने आ रही हैं। मसलन, कंपनी ने पर्यावरणीय मंज़ूरी लेते वक्त, सरकार को पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की गलत जानकारी दी थी। यही नहीं, नियमों के मुताबिक संयंत्र को पारिस्थितिक तौर पर संवेदनशील क्षेत्र के 25 किलोमीटर के दायरे में नहीं होना चाहिए। लेकिन यह संयंत्र ‘मुन्नार मरीन नेशनल पार्क’ के नज़दीक स्थित है। इसके अलावा कंपनी ने बिना स्थानीय लोगों को सुने गलत पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट पेश की।

जैसी कि आशंकाएं थीं, कुछ ही दिनों में संयंत्र का असर पर्यावरण और स्थानीय लोगों पर होना शुरू हो गया। साल 2008 में तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज की ओर से जारी एक रिपोर्ट ‘हेल्थ स्टेटस एंड एपिडेमियोलॉजिकल स्टडी अराउंड 5 किलोमीटर रेडियस ऑफ स्टरलाइट इंडस्ट्रीज़ (इंडिया) लिमिटेड’ में इलाके के बाशिंदों में सांस की बीमारियों के बढ़ते मामलों के लिए इस तांबा संयंत्र को जि़म्मेदार ठहराया गया था। इस शोध में करीब 80 हज़ार से ज़्यादा लोग शामिल हुए थे। रिपोर्ट के मुताबिक तूतीकोरिन स्थित कुमारेदियापुरम और थेरकु वीरपनदीयापुरम के भूमिगत जल में लौह की मात्रा तय सरकारी मानक से 17 से 20 गुना ज़्यादा पाई गई, जो कि लोगों में कमज़ोरी के अलावा पेट व जोड़ों में दर्द की मुख्य वजह थी। यही नहीं, स्टरलाइट तांबा संयंत्र के आसपास के इलाकों में पूरे राज्य और गैर-औद्योगिक क्षेत्रों के मुकाबले 13.9 फीसदी अधिक सांस रोगियों की संख्या दर्ज की गई। दमा व ब्राॉन्काइटिस के मरीज़ राज्य औसत से दोगुना ज़्यादा मिले। साइनस और फैरिन्जाइटिस समेत आंख, नाक व गले की दीगर बीमारियों से जूझ रहे लोगों की तादाद भी काफी अधिक पाई गई।

इससे पहले 2005 में सुप्रीम कोर्ट की एक कमेटी ने भी अपनी जांच में पाया था कि संयंत्र ने ज़हरीले आर्सेनिक युक्त कचरे के निपटान के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं की है। प्लांट से निश्चित मात्रा से ज़्यादा सल्फर डाईऑक्साइड वातावरण में छोड़ी जा रही है जिसकी वजह से लोग गंभीर रूप से बीमार हो रहे हैं। शीर्ष अदालत ने आगे चलकर 2013 में कंपनी द्वारा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के चलते, उस पर 100 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया था। अलबत्ता, कंपनी ने अपने काम में कोई सुधार नहीं किया।

संयंत्र के खिलाफ जब लोगों का विरोध सामने आया, तो राज्य की तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री जयललिता ने 2013 में संयंत्र को बंद करने का आदेश दे दिया। लेकिन कंपनी नेशनल ग्रीन ट्रायबूनल (एनजीटी) में चली गई, जिसने राज्य सरकार का फैसला उलट दिया। इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी अर्जी लगाई हुई है, जो कि अभी विचाराधीन है। राज्य सरकार ने इसके अलावा पिछले साल पर्यावरण नियमों का पालन नहीं करने के लिए तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से कंपनी को नवीनीकरण न देने की अपील भी की थी। इसमें तांबा कचरे के निपटान न करने की बात कही गई थी।

एक तरह से, कंपनी लगातार सरकारी आदेशों और स्थानीय जनता की शिकायतों की अनदेखी कर रही थी। तमाम निर्देशों के बाद भी कंपनी ने तांबे का मलबा नदी में डालना बंद नहीं किया था और ना ही वह प्लांट के आसपास के बोरवेलों में पानी की क्वॉलिटी की रिपोर्टें साझा कर रही थी। राज्य सरकार की सख्ती के बाद भी कंपनी के रवैये में कोई फर्क नहीं आया। वह पहले की तरह अपना काम बिना रोक-टोक करती रही।

सरकारी और अदालती कार्रवाइयों की कछुआ गति को देखते हुए स्थानीय निवासियों ने कंपनी के खिलाफ मोर्चा खोल लिया। लोगों का कहना था कि संयंत्र से होने वाले प्रदूषण की वजह से जि़ले के लोगों के लिए सेहत से जुड़ी गंभीर समस्याएं पैदा हो गई हैं। लिहाज़ा, संयंत्र को बंद किया जाए।

उनकी मांग पूरी तरह संवैधानिक थी। संविधान देश के हर नागरिक को जीने का अधिकार देता है। जीने का अधिकार, जिन कारणों से प्रभावित होता है, एक जि़म्मेदार सरकार को इनका निराकरण करना होता है। तमिलनाडु और केंद्र सरकारें लोगों की समस्याओं पर ध्यान देने की बजाय कंपनी को संरक्षण और सुरक्षा देती रहीं। आंदोलनकारियों का विरोध तब और भी बढ़ गया, जब साल की शुरुआत में इस प्लांट के विस्तार की योजना सामने आई। आंदोलनकारी पिछले 100 दिन से लगातार प्रदर्शन कर रहे थे। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं जिसमें 10 से ज़्यादा लोगों की दर्दनाक मौत हो गई और 50 से ज़्यादा लोग ज़ख्मी हो गए।

जैसा कि इस तरह के हत्याकांडों के बाद होता है, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ए. पलनीसामी ने हत्याकांड की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं और दावा कर रहे हैं कि हत्याकांड के दोषी बख्शे नहीं जाएंगे। इतना सब कुछ हो जाने के बाद, केंद्र सरकार भी हरकत में आई है। गृह मंत्रालय ने तमिलनाडु सरकार से इस पूरी घटना की रिपोर्ट तलब की है। इसके अलावा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मीडिया रिपोर्टों का संज्ञान लेते हुए, राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी को नोटिस जारी कर इस सम्बंध में जवाब मांगा है।

राज्य सरकार ने घटना में मारे गए लोगों के परिजनों को दस-दस लाख रुपए, गंभीर रूप से घायल लोगों को तीन-तीन लाख और मामूली रूप से घायल लोगों को एक-एक लाख रुपए मुआवज़ा देने का ऐलान किया है। लेकिन हत्याकांड की न्यायिक जांच और मुआवज़े के ऐलान से ही तूतीकोरिन के लोगों को इंसाफ नहीं मिलेगा। इस बर्बर हत्याकांड के लिए जो जि़म्मेदार हैं, उन्हें तो सज़ा मिलनी ही चाहिए, साथ ही पर्यावरण नियमों की अनदेखी कर इलाके में भयंकर प्रदूषण फैलाने वाली वेदांता कंपनी पर भी कड़ी कार्यवाही हो। वेदांता और उसकी सहायक कंपनियां पहले भी देश के अलग-अलग हिस्सों में पर्यावरण नियमों को ताक में रखकर देश के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों का ज़बर्दस्त दोहन करती रही हैं और आज भी उसे ऐसा करने से कोई गुरेज नहीं। उद्योग-धंधों को बढ़ावा देना सरकारों का काम है, लेकिन इसके लिए कंपनियों द्वारा नियम-कानूनों की अनदेखी और सरकारों का इससे आंखें मूंदे रहना आपराधिक गलती है। पर्यावरण और प्रदूषण सम्बंधी कानूनों का यदि कहीं पर भी उल्लंघन हो रहा है, तो यह सरकार और सम्बंधित मंत्रालयों की जि़म्मेदारी बनती है कि वे इन कानूनों का सख्ती से पालन कराएं। यदि कंपनियां फिर भी न मानें, तो उन पर बिना किसी भेदभाव के कड़ी कार्रवाई हो। विकास हो, पर अवाम की जान और पर्यावरण की शर्त पर नहीं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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पी. सी. वैद्य: एक गांधीवादी भौतिक शास्त्री – अपराजित रामनाथ

क भारी-भरकम गोलाकार तारे पर विचार कीजिए जो बाह्य अंतरिक्ष में विपुल मात्रा में विकिरण छोड़ रहा है। ऐसे किसी तारे के आसपास गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र का व्यवहार कैसा होगा? अल्बर्ट आइंस्टाइन द्वारा 1915 में प्रतिपादित क्रांतिकारी सामान्य सापेक्षता सिद्धांत को लागू करके कई सवालों को संबोधित किया जा सकता था। उपरोक्त सवाल उनमें से एक महत्वपूर्ण सवाल था। और इसका समाधान सबसे पहले गणितज्ञ और खगोलविद पी.सी. वैद्य (1918-2010) ने निकाला था। इसे वैद्य मेट्रिक्स के नाम से जाना जाता है। मई में उनकी जन्म शती थी।

सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत को दस ‘क्षेत्र समीकरणों’ द्वारा व्यक्त किया जाता है जो समूचे ब्रह्मांड में वैध हैं। ये समीकरण कतिपय सरलीकृत मान्यताओं के अंतर्गत कुछ सटीक समाधान की गुंजाइश प्रदान करते हैं। पहला सटीक समाधान सिद्धांत के प्रतिपादन के फौरन बाद सामने आया था जब जर्मन वैज्ञानिक कार्ल श्वाजऱ्चाइल्ड ने अंतरिक्ष में विकिरण का उत्सर्जन न करने वाले किसी गोलाकार पिंड के आसपास के क्षेत्र का विवरण प्रस्तुत किया था।

इसके पूरे 26 साल बाद वैद्य ने 1943 में विकिरण करते गोलाकार पिंड के क्षेत्र की गणना की थी। 1960 के दशक में रेडियो दूरबीनों की मदद से दूरस्थ निहारिकाओं के मध्य में क्वासर (क्वासी-स्टेलर रेडियो स्रोतों) की खोज की गई जो विशाल मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। वैद्य ने बाद में याद करके बताया था, “न्यूटन का (गुरुत्वाकर्षण) सिद्धांत इन पिंडों के अत्यंत तीव्र गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के संदर्भ में अपर्याप्त साबित हुआ था और (इनके विवरण के लिए) आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत की आवश्यकता थी।”

वैद्य का समाधान इन परिस्थितियों के अध्ययन के लिए आदर्श था, और इसके चलते वे उच्च-ऊर्जा खगोल-भौतिकविदों की दुनिया में शामिल कर लिए गए।

महान, अनोखे

आने वाले दशकों में उन्होंने सामान्य सापेक्षता और खगोल-भौतिकी के संगम बिंदु पर कई महत्वपूर्ण योगदान दिए। उन्होंने सटीक समाधानों के अलावा अति-विशाल पिंडों और ब्लैक होल्स जैसे विषयों पर काम किया। अकेले या अपने शोध छात्रों के साथ काम करते हुए उन्होंने नेचर, फिजि़कल रिव्यू लेटर्स, एस्ट्रोफिजि़कल जर्नल और करंट साइन्स जैसी शोध पत्रिकाओं में कई शोध पत्र प्रकाशित किए।

वैद्य एक संस्था-निर्माता भी थे। इंडियन एसोसिएशन फॉर जनरल रिलेटिविटी के संस्थापक सदस्य के रूप में उन्होंने भारत में इस क्षेत्र में काम कर रहे वैज्ञानिकों को साथ लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। इन वैज्ञानिकों में सी.वी. विश्वेश्वरा, नरेश दधीच और जयंत नार्लीकर जैसे वैज्ञानिक शामिल थे। जयंत नार्लीकर आगे चलकर इंटरयुनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजि़क्स (IUCAA, पुणे) के प्रथम निदेशक बने।

हालांकि भारत में सामान्य सापेक्षता अनुसंधान के शुरुआती केंद्र जयंत नार्लीकर के पिता वी.वी. नार्लीकर और एन. आर. सेन के नेतृत्व में स्थापित हुए थे, अगली पीढ़ी पर वैद्य का ज़बर्दस्त प्रभाव रहा। सामान्य सापेक्षता के क्षेत्र में कार्यरत वैज्ञानिक कलकत्ता (अब कोलकाता) के गणितज्ञ अमल कुमार रायचौधरी के साथ-साथ वैद्य को अपना मार्गदर्शक मानते थे और 1985 में इन दोनों वैज्ञानिकों के सम्मान में पुस्तिका का प्रकाशन किया गया था।

इस बात में कोई संदेह नहीं कि पी. सी. वैद्य अव्वल दर्जे के वैज्ञानिक थे और आइंस्टाइन से लेकर स्टीफन हॉकिंग और गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज करने वाली लिगो टीम तथा अन्य प्रायोगिक वैज्ञानिकों की परंपरा के हिस्से थे। और फिर भी – हालांकि मैं प्रशिक्षण और पेशे से विज्ञान का इतिहासकार हूं – मैंने चंह महीनों पहले तक पी.सी. वैद्य का नाम तक नहीं सुना था। मैंने उनका नाम पहली बार तब सुना जब एक मित्र ने हॉकिंग के जीवन और कार्य पर व्याख्यान देते हुए उनका जि़क्र किया।

यह मेरे अज्ञान का द्योतक हो सकता है किंतु एक गैर-वैज्ञानिक जनमतसंग्रह से लगता है कि बात इतनी ही नहीं है। गुजरात का यह महान व्यक्तित्व भारत के घर-घर में सी.वी. रामन, मेघनाथ साहा, एस.एस. भटनागर, सुब्रामण्यन चंद्रशेखर या होमी भाभा जैसा नाम नहीं बन पाया।

इसे कैसे समझें? इसका कुछ सम्बंध तो इस बात से है कि जिस परिवेश में उन्होंने अपना कैरियर बनाया और जिस असाधारण जीवन शैली को उन्होंने अपनाया। कई स्रोतों से हम उस कैरियर को पुनर्निर्मित कर सकते हैं। इनमें उनकी गुजराती स्मरण पुस्तिका चॉक एंड डस्टर तथा उनके सम्बंधियों और सहकर्मियों द्वारा लिखे गए जीवन वृत्त शामिल हैं।

शुरुआती वर्ष

प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य (कुछ लोगों के लिए वैद्य साहेब) का जन्म 1918 में जूनागढ़ रियासत के एक गांव शाहपुर में हुआ था। वे एक डाक अधिकारी के द्वितीय पुत्र थे। बचपन में ही उनके माता-पिता गुज़र गए और उनका लालन-पालन भावनगर के नज़दीक कुछ रिश्तेदारों ने किया, जहां 1933 तक वे अल्फ्रेड हाई स्कूल में पढ़े।

उनके भाई मधुसूदन को बंबई (अब मुंबई) में स्कूल शिक्षक की नौकरी मिल गई और पी. सी. वैद्य ने अपनी स्कूल शिक्षा वहीं पूरी की। रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्स से बी.एससी. (और आगे चलकर एम.एससी.) करने से पहले वे जोगेश्वरी स्थित इस्माइल यूसुफ कॉलेज में पढ़े। स्नातक शिक्षा के दौरान उन्हें डिस्टिंक्शन मिला और स्नातकोत्तर परीक्षा में बंबई विश्वविद्यालय के टॉपर रहे।

इस दौर में उनके व्यक्तित्व पर एक गहरी छाप बंबई विश्वविद्यालय में 1937 में वी.वी. नार्लीकर (कैंब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर) द्वारा दिए गए व्याख्यानों ने डाली। यहीं पी.सी. वैद्य ने पहली बार सुना था कि विकिरण करते तारों के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र का विवरण अब तक सामान्य सापेक्षता के परिप्रेक्ष्य में नहीं दिया गया है।

उनके अकादिमक कैरियर के बावजूद, जिस ढंग से पी.सी. वैद्य का शोध कैरियर शुरू हुआ, उसमें संयोग का कुछ पुट अवश्य है। भावनगर में पी. सी. वैद्य और उनके भाई पर गांधी के विचारों का काफी असर पड़ा था। अब राजकोट में एक कॉलेज शिक्षक के रूप में थोड़े दिन काम करने के बाद उन्होंने अपने कैरियर में एक गैर-परंपरागत कदम उठाया। 1941 में उन्होंने बंबई लौटकर एक गांधी-प्रेरित स्वैच्छिक संस्था स्थापित की। अहिंसक व्यायाम संघ नामक यह संस्था सत्याग्रहियों के प्रशिक्षण के लिए बनाई गई थी।

यह कई भारतीय युवाओं के लिए जुनून का दौर था क्योंकि इसी समय भारतीय नेताओं ने ब्रिटेन द्वारा भारत को एकतरफा ढंग से द्वितीय विश्व युद्ध में झोंकने के निर्णय के खिलाफ संघर्ष करते हुए भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा कर दी थी। यह पी. सी. वैद्य के लिए निराशा का कारण बना कि व्यायाम संघ की प्रेरक शक्ति पृथ्वी सिंह की वैचारिक उलझनों के चलते संस्था को समेट दिया गया। सिंह का वैचारिक झुकाव कम्यूनिज़्म की ओर था और वे ब्रिटिशों का विरोध करने में खुद को असमर्थ पा रहे थे क्योंकि ब्रिटिश तब सोवियत संघ के सहयोगी थे।

खुद को मझधार में पाकर, पी. सी. वैद्य ने वी.वी. नार्लीकर का रुख किया। उन्होंने बनारस में नार्लीकर को चिट्ठी लिखकर पूछा कि क्या वे एक अनौपचारिक शोध छात्र के रूप में उनके साथ काम कर सकते हैं। अपनी बचत के भरोसे पी.सी. वैद्य अपने परिवार को लेकर बनारस आ गए, जहां उन्होंने नार्लीकर के मार्गदर्शन में काम करते हुए 1942 से कई शोध पत्र प्रकाशित किए। इनमें से एक – इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्स द्वारा प्रकाशित करंट साइन्स में 1943 में प्रकाशित शोध पत्र – उनकी पहली बड़ी सफलता थी। इस शोध पत्र का शीर्षक था: दी एक्सटरनल फील्ड ऑफ ए रेडिएटिंग स्टार इन जनरल रिलेटिविटी। इस पर्चे ने विज्ञान जगत को वैद्य मेट्रिक्स की सूचना दी।

वैद्य ने 1950 के शुरुआती दशक में प्रकाशित शोध पत्रों में इसे विस्तार दिया। ऐसे में कोई अचरज नहीं कि पी.सी. वैद्य ने नार्लीकर के साथ बिताए अपने वर्षों को ‘काशी यात्रा’ की संज्ञा दी जिसने उन्हें अगले जीवन के लिए नहीं बल्कि इसी जीवन के शेष वर्षों के लिए तैयार किया।

संस्था निर्माण

जब बचत के पैसे चुक गए, तो वैद्य ने सूरत के एक कॉलेज में अध्यापक की नौकरी ले ली। आगे चलकर उन्होंने नवोदित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) में एक शोध छात्र के रूप में दाखिला लिया और 1948 में पीएच.डी. पूरी की। टीआईएफआर उस समय विकसित हो रहा था और वैद्य को होमी भाभा के साथ काम करने का मौका मिला। यह बात शायद अविश्वसनीय लगे किंतु पी.सी. वैद्य को बंबई छोड़ना पड़ा था क्योंकि परिवार के रहने के लिए वहां उन्हें मकान नहीं मिला।

तब पी. सी. वैद्य गुजरात में आनंद के नज़दीक उभरते शैक्षणिक शहर वल्लभ विद्यानगर में नए-नए खुले विट्ठलभाई पटेल कॉलेज में प्रोफेसर बने। उनके जीवन पर बनी आयूका-विज्ञान प्रसार की एक फिल्म में उन्होंने बताया है कि उस समय वे बगैर छत के कमरे में पढ़ाया करते थे। मगर वहां उन्होंने अपने छात्रों की जो बुनियाद तैयार की वह बहुत मज़बूत थी। जैसा कि उनके भतीजे अरुण वैद्य (जो स्वयं एक प्रतिष्ठित गणितज्ञ हैं) ने बताया, पी. सी. वैद्य न सिर्फ अपने शोध कार्य के लिए बल्कि उनके द्वारा आयोजित खेलकूद शिविरों व अन्य गतिविधियों के लिए भी याद किए जाते हैं। लगता है व्यायाम संघ के उनके दिन फालतू नहीं गए।

अन्य कॉलेजों में अध्यापन करने के बाद, वैद्य ने गुजरात विश्वविद्यालय में गणित विभाग स्थापित करने में योगदान दिया (1959)। यहीं उन्होंने अपना शेष कार्य-जीवन व्यतीत किया। यहां उन्होंने कई शोध छात्र तैयार किए। आगे चलकर उन्हें प्रशासनिक जि़म्मेदारियां सौंपी गई। 1971 में वे गुजरात लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष बने और 1977 में संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य निर्वाचित किए गए। इसके बाद वे गुजरात विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे।

वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में अपनी हैसियत और उच्च पदों पर आसीन रहने के बावजूद, पी. सी. वैद्य कभी अपनी जड़ें नहीं भूले। आजीवन गांधीवादी रहे वैद्य की पहचान खादी के कुर्ते, सफेद गांधी टोपी और सायकिल से जुड़ी रही। जिन संस्थाओं की स्थापना को लेकर वे गर्व महसूस करते थे वे हर स्तर पर गणित शिक्षण को बेहतर बनाने से सम्बंधित थीं। इनमें गुजरात गणित मंडल (स्थापना 1963) शामिल है जो आज भी एक जीवंत संस्था है। इसी वर्ष उन्होंने एक पत्रिका सुगणितम की स्थापना की थी जो शिक्षकों व छात्रों के लिए गणित का एक उम्दा संसाधन है।

विनम्रता

वैद्य उस समय तक एक परिपक्व शोधकर्ता बन चुके थे जब नव-स्वतंत्र भारत विज्ञान में भारी निवेश कर रहा था। वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी अनुसंधान परिषद (CSIR) प्रयोगशालाओं के अपने नेटवर्क में विस्तार कर रहा था, अंतरिक्ष कार्यक्रम आकार ले रहा था और परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम पर पैसे और प्रतिष्ठा की बौछार की जा रही थी। मगर इन सबका एक उपयोगितावादी रुझान था जबकि वैद्य ज़्यादा ‘बुनियादी’ अनुसंधान कर रहे थे।

जैसा कि एक भौतिक शास्त्री साथी ने मुझे बताया था, पी. सी. वैद्य का क्षेत्र (सामान्य सापेक्षता) अपेक्षाकृत गूढ़ था। यह विषय भारत में स्नातकोत्तर स्तर भी कहीं-कहीं ही पढ़ाया जाता था। ज़ाहिर है, इसने लोगों का ध्यान उस तरह नहीं खींचा जैसे परमाणु ऊर्जा या रॉकेट खींचते हैं। परिणाम यह रहा कि वैद्य ने अपना लगभग पूरा कैरियर विज्ञान के मान्य केंद्रों से दूर ही व्यतीत किया और शोध में उनके योगदान को बहुत थोड़े से वैज्ञानिक ही समझते हैं।

अलबत्ता, वैद्य का कैरियर सिर्फ इन परिस्थितियों का नहीं बल्कि उनके निर्णयों का भी परिणाम था। वैद्य ने कभी सार्वजनिक परिदृश्य में रहने की इच्छा नहीं की। वे एक ‘जड़ें जमाए विश्व नागरिक’ थे जो पूरी दुनिया से संवाद करते थे किंतु सबसे प्रसन्न अपनी धरती पर ही रहते थे। वे अपनी मातृभाषा और अपने आसपास के लोगों की भाषा की मदद से ज्ञान का प्रजातांत्रीकरण करना चाहते थे। वे गांधीवादी परंपरा में ‘रचनात्मक कार्यकर्ता’ थे।

1990 के दशक के अंतिम वर्षों में भी, बुलेटिन ऑफ दी एस्ट्रॉनॉमिकल सोसायटी ऑफ इंडिया के संपादक के पत्र के जवाब में अपनी निशस्त्र कर देने वाली विनम्रता के साथ उन्होंने कहा था, “मैं हमेशा से स्वयं को एक शिक्षक मानता आया हूं और इतने वर्षों तक गणित पढ़ाकर ही अपनी जीविका अर्जित की है। यदि प्रतिष्ठित खगोल शास्त्रीय सोसायटी मुझे एक प्रतिष्ठित खगोल शास्त्री मानती है, तो मुझे गर्व महसूस हुआ और मैंने सोचना शुरू किया कि यह गणित शिक्षक एक खगोल शास्त्री के रूप में कैसे तबदील हो गया।” शायद यह तबदीली सितारों पर अंकित थी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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प्रोफेसर सी.वी. विश्वेश्वरा – टी.वी. वेंकटेश्वरन, दिनेश शर्मा एवं नवनीत कुमार गुप्ता

ब्लैक होल एवं आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत पर महत्वपूर्ण शोधकार्य करने वाले प्रोफेसर सी. वी. विश्वेश्वरा का पिछले वर्ष निधन हो गया। उन्होंने कई वर्षों तक गुरुत्व तरंगों और ब्लैक होल के सिद्धांत पर शोध कार्य कर नई संकल्पना का विकास किया था।

सन 1970 में विश्वेश्वरा ने ब्लैक होल और गुरुत्व तरंगों सम्बंधी नई संकल्पना को प्रस्तुत कर सैद्धांतिक भौतिकी में योगदान दिया। बाइनरी ब्लैक होल में, गुरुत्व तरंगें दोगुनी गति से उत्पन्न होती हैं। इस प्रक्रिया में यह प्रणाली अपनी घूर्णन ऊर्जा खो देती है जिससे दो ब्लैक होल पास आते हैं और बहुत अधिक विकिरण उत्सर्जित करते हैं जिससे भंवरसा बनता है। इससे तरंगों का गुंजन पैदा होता है। इन तरंगों का आयाम और आवृत्ति तब तक बढ़ती है जब तक ये दोनों पिंड आपस में मिल न जाएं। पिंडों के आपस में मिलने से पहले सापेक्ष वेग प्रकाश की गति के नज़दीक पहुंचने लगता है।

विलय के परिणामस्वरूप एक नए ब्लैेक होल का निर्माण होता है। यह नया ब्लैक होल गुरुत्व विकिरण उत्सर्जित करता है जिसका द्रव्यमान और घूर्णन सम्बंधी गुणधर्म निर्णायक ब्लैक होल की तरह होता है। इसे अर्ध सामान्य मोड या रिंगडाउन संकेत कहते हैं। रिंगडाउन संकेत हथौड़े की चोट से उत्पन्न विकिरण के जैसा होता है।  

विश्वेश्वरा के सैद्धांतिक योगदान से हम समझ पाए कि किस प्रकार दो ब्लैक होल आपस में एक दूसरे से टकरा सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार से ब्लैक होल से फैलने वाली गुरुत्व तरंगों में रिंगडाउन संकेत के गुणधर्म हो सकते हैं। इसमें वही लचीलापन होता है जो कि गुरुत्व तरंगों में पाया जाता है। उनका यह शोध पत्र सन् 1970 में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुआ था।

16 मार्च, 1936 को जन्मे विश्वेश्वरा का आरंभिक जीवन बैंगलुरु में बीता और उनकी प्राथमिक शिक्षा भी इसी शहर में हुई। उनके स्कूल के शिक्षक द्वारा भौतिकी को रोचक तरीके से समझाए जाने के कारण उन्हें भौतिकी विषय से लगाव हो गया। इसी तरह गणित विषय में भी उनकी दिलचस्पी थी। भौतिकी को विशेष विषय लेकर उन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की।

बैंगलुरु में एम.एससी. करने के बाद, वे उच्च शिक्षा के लिए कोलंबिया विश्वविद्यालय गए। मैरीलैंड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर चाल्र्स मिसेनर के मार्गदर्शन में उन्होंने ब्लैक होल की स्थिरता पर काम करते हुए पीएच.डी. की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने ब्लैक होल स्थिरता के साथ ही ब्लैक होल भौतिकी में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

अमेरिका में कई विश्वविद्यालयों के विभागों में कार्य करने के बाद उन्होंने भारत आकर बैंगलुरु के रामन अनुसंधान संस्थान में अपनी सेवाएं दीं। बाद में उन्होंने भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान में वरिष्ठ प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया। वे बैंगलुरु स्थित जवाहरलाल नेहरू तारामंडल एवं विज्ञान केंद्र के संस्थापकनिदेशक थे।

इन विषयों पर लिखी गई उनकी लोकप्रिय पुस्तकों, ‘आइंस्टाइन्स एनिग्मा ऑर ब्लैक होल इन माय बबल बाथऔर युनिवर्स अनवाइल्ड दी कॉस्मॉस इन माय बबल बाथको दुनिया भर में काफी पढ़ा और सराहा गया। (स्रोत फीचर्स)

 

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। 

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पौधे की तरह दवा उत्पादन में खमीर की भूमिका – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

पौधे औषधियों के समृद्ध स्रोत होते हैं। यह बात तब से ज्ञात है जब से मनुष्यों ने समुदायों के रूप में मिल-जुलकर रहना शुरू किया था। (वास्तव में, लगता तो यह है कि चिम्पैंज़ी भी दवा के रूप में चुनकर विशेष पौधे खाना पसंद करते हैं)। आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, आदिवासी औषधियां, प्राच्य चिकित्सा और होम्योपैथी में वनस्पति-आधारित यौगिकों का इस्तेमाल दवाइयों और टॉनिक के रूप में होता रहा है। कार्बनिक रसायन शास्त्र में खास तौर से प्राकृतिक उत्पाद और औषधि रसायन जैसी विशेष शाखाएं हैं। इस विधा में शोधकर्ता चुनिंदा पौधे इकट्ठा करते हैं और उनमें से विशेष अणुओं को अलग करने की कोशिश करते हैं। इसके बाद उनकी रासायनिक संरचनाओं का अध्ययन करके बीमारियों के खिलाफ उनकी प्रभाविता की जांच करते हैं (इस क्षेत्र को औषधि रसायन कहते हैं)।

किसी भी पौधे में हज़ारों अणु अलग-अलग मात्राओं उपस्थित होते हैं। अक्सर जिस दवा अणु की तलाश कर रहे हैं वह बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। एक मायने में यह मात्र घास के ढेर में सुई ढूंढने जैसी समस्या नहीं है बल्कि मनचाहे यौगिक तक पहुंचने के लिए ऐसे कई ढेरों की ज़रूरत होती है ताकि काम करने के लिए ठीक-ठाक मात्रा (कुछ ग्राम) मिल सके। इस प्रकार प्राकृतिक उत्पाद रसायन काफी चुनौतीपूर्ण क्षेत्र रहा है और सफल शोधकर्ताओं को हीरो माना जाता है और सम्मान व पुरस्कार से नवाज़ा जाता है। इसका एक हालिया उदाहरण चीन की महिला वैज्ञानिक डॉ. यूयू तू का है। उन्हें 2015 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। उन्होंने दशकों के परिश्रम के बाद मलेरिया के लिए चीनी जड़ी-बूटी क्विंगहाओ से आर्टेमिसीनीन नामक अणु को अलग किया था।

एक बार जब प्राकृतिक उत्पाद रसायनज्ञ दवा के अणु को अलग करके उसकी रासायनिक संरचना को निर्धारित कर लेता है, तब वह इस अणु को प्रयोगशाला में बनाने (संश्लेषण) का प्रयास करता है। अभी तक यह एक चुनौतीपूर्ण और कमरतोड़ काम रहा है। चूंकि अणु का आकार त्रि-आयामी होता है तो इसमें परमाणुओं की जमावट काफी जटिल हो सकती है। प्रयोगशाला में इस तरह के जटिल अणुओं का निर्माण कुछ हद तक एक आर्किटेक्ट के काम के समान है जो र्इंट-गारा जोड़कर इमारत बनाता है। इस मामले में भी हीरो को सम्मान दिया जाता है।

ऐसे ही एक हीरो हारवर्ड के स्वर्गीय प्रोफेसर रॉबर्ट वुडवर्ड थे जिन्होंने दशकों तक सफलतापूर्वक कई जटिल अणुओं का संश्लेषण किया था और इस काम के लिए उन्हें 1965 में रसायन में नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया था। आर्किटेक्ट उपमा को आगे बढ़ाते हुए महान कार्बनिक रसायनज्ञ स्वर्गीय प्रोफेसर सुब्रामण्य रंगनाथन ने एक मोनोग्राफ लिखा था जिसका शीर्षक था ‘दी आर्ट ऑफ आर्गेनिक सिंथेसिस’ (कार्बनिक संश्लेषण की कला)।

क्विंगहाओ आर्टेमिसीनीन कैसे बनाता है? पूरी प्रक्रिया एक दर्जन से ज़्यादा चरणों में सम्पन्न होती है। इनमें से कई चरण एंज़ाइम द्वारा उत्प्रेरित होते हैं जो प्रोटीन अणु होते हैं। हमने इनमें से प्रत्येक चरण का खुलासा कर लिया है और यह भी समझ लिया है कि पादप कोशिकाओं में इन एंज़ाइम्स को बनाने में कौन से जीन्स शामिल हैं (दरअसल यह जीन का पूरा समूह है)। अब इस जानकारी के दम पर, और जेनेटिक्स और जेनेटिक इंजीनियरिंग में हुई प्रगति की मदद से क्या हम कार्बनिक रसायन की विधियों की बजाय जेनेटिक इंजीनियरिंग की विधियों का इस्तेमाल करके आर्टेमिसिनिन को प्रयोगशाला में बना सकते हैं? और यदि हम इस जीन समूह को किसी सूक्ष्मजीव (जैसे खमीर) में प्रविष्ट कराएं तो क्या वह आर्टेमिसिनिन बनाने लगेगा? यदि ऐसा कर पाते हैं तो हमें टनों जड़ी-बूटी उगाने और काटने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी; खमीर के विशाल कल्चर में किलोग्राम के हिसाब से दवा बनाई जा सकेगी।

आर्टेमिसिनिन बनाने के लिए किसी सूक्ष्मजीव का इस्तेमाल एक नवाचारी विचार है। यदि हमें सफलता मिलती है तो हम खमीर को एक पौधे में तबदील कर देंगे जिसका इस्तेमाल हम कम से कम पांच सहस्त्राब्दियों से घरों और बेकरियों में करते आए हैं। लेकिन इसके लिए खमीर कोशिकाओं में उनके अपने जीनोम के साथ-साथ पौधे में उस दवा को बनाने के लिए ज़िम्मेदार जीन समूह भी होना चाहिए।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जे. केसलिंग और एमायरिस कंपनी के डॉ. नील रेनिंगर का तर्क है कि जेनेटिक्स और जेनेटिक इंजीनियरिंग में हुई प्रगति की बदौलत अब यह विचार बड़बोलापन नहीं है बल्कि काम करने के लायक है। गेट्स फाउंडेशन के अनुदान से उनकी टीम ने दवा उत्पादन के लिए पौधे द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पूरे जीन समूह का रासायनिक संश्लेषण किया और उसे खमीर कोशिकाओं के अनुरूप संशोधित किया, और खमीर कोशिकाओं में प्रविष्ट करा दिया। उन्होंने प्रयोगशाला में इस जेनेटिक रूप से परिवर्तित खमीर का कल्चर बनाया और पाया कि वह खमीर आर्टेमिसिनिन बना सकता है। इस समूह ने 2013 तक इस विधि में काफी सुधार करके प्रति लीटर कल्चर माध्यम से 25 ग्राम एंटी-मलेरिया दवा का उत्पादन किया है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान, कई अन्य दवाइयों, जो प्राकृतिक रूप से पौधों और जड़ी-बूटियों में मिलती है, का उत्पादन खमीर की मदद से किया गया है। हाल ही में पीएनएएस पत्रिका में ली व साथियों ने अपने शोध पत्र में उन्होंने बताया है कि उन्होंने खमीर की मदद से कैंसर-रोधी दवा नोस्केपाइन का उत्पादन किया है। यह कुदरती रूप से अफीम के पौधे में पाई जाती है। तिकड़म यह है कि पादप कोशिका में यह अणु बनाने वाले जीन समूह की पहचान की जाए, इन्हें प्रयोगशाला में बनाकर खमीर में डाल दिया जाए और अनुकूल परिस्थितियां निर्मित की जाएं। तब यह पौधा-रूपी खमीर उस अणु का उत्पादन करेगा। पांच हज़ार से अधिक वर्षों से जाना-माना जो खमीर ब्रोड और शराब बनाने के काम आता रहा है, अब एक नई भूमिका निभाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट : यह लेख वेबसाइट पर 7 जून 2018 तक ही उपलब्ध रहेगा|

इटली में तीन हज़ार वर्ष पूर्व वाइन उद्योग – एस. अनंतनारायण

हा जा रहा है कि वाइन बनाने की शुरुआत संगठित खेती से पहले हो गई थी। यह संभव भी लगता है क्योंकि कुछ किस्मों के फल भंडारण के दौरान सड़ जाते हैं या पिलपिला जाते हैं तो उनमें किण्वन की प्रक्रिया होने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप वाइन बनती है। किंतु अनाजों से वाइन या बीयर बनाना अलग बात है। इसके लिए काफी मात्रा में अनाज चाहिए और एक पूरी प्रक्रिया चाहिए। फलों के सड़ने-गलने से संयोगवश वाइन बनती भी है तो इतनी-सी वाइन से एक पूरा उद्योग पनपना संभव नहीं है। वह तो तभी होगा जब उत्पादन काफी मात्रा में हो और इसे संग्रहित करके बाद में उपयोग के लिए रखा जा सके।

दक्षिण फ्लोरिडा और इटली स्थित विश्वविद्यालयों व संस्थानों के शोधकर्ताओं ने माइक्रोकेमिकल जर्नल में रिपोर्ट किया है कि साक्ष्यों से पता चला है कि पहली सहत्राब्दी ईसा पूर्व से ही इटली में शराब (वाइन) का उत्पादन और संग्रहण होता रहा है। सिसली के दक्षिण-पश्चिमी तट पर चूने के पहाड़ मॉन्टे क्रोनियो की खुदाई में सिरेमिक (चीनी मिट्टी) पात्रों के हिस्से मिले हैं। इन पात्रों पर जैविक पदार्थ के अवशेष मिले हैं। शोधकर्ताओं ने पुरातात्विक अन्वेषण में प्रयोगशाला विधियों के उपयोग का एक नया दृष्टिकोण दिया है जिससे प्राचीन सभ्यताओं की पाक कला और आहार सम्बंधी व्यवहार को समझने में मदद मिल सकती है ।

निश्चित तौर पर प्राचीन काल में शराब उत्पादन के और भी प्रमाण मिलते हैं। मसलन फ्रांस स्थित रॉकप्रट्यूस में 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व बीयर बनाई जाती थी। इससे भी कई वर्ष पूर्व, लगभग 3000 ईसा पूर्व, चीन के शान्क्सी ज़िले में बीयर उत्पादन के साक्ष्य मिले हैं। 2011 में ह्यूमन बायोलॉजी नामक जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार सीएनआरएस, मॉन्टपेलियर के वैज्ञानिकों को सेल्टिक मठ के पुरातात्विक स्थल की खुदाई में बीयर बनाने में प्रयुक्त कच्चा माल और उपकरण मिले हैं। एक निवास स्थान के फर्श से अधजले जौं के दाने मिले हैं जिससे पता चलता है कि ये बीयर बनाते हुए दानों को सुखाने की प्रक्रिया में भट्टी में अधजले छूट गए होंगे।

उसी जगह पर ऐसे बर्तन मिले हैं जिनमें जौं को अंकुरित करने से पहले भिगोया जाता होगा। साथ ही भट्टी के अवशेष मिले हैं जो अंकुरित जौं सुखाने के काम आती होगी। वहां चक्की के पाट, भट्टी और संग्रहण के पात्रों की मौजूदगी से लगता है कि यहां बीयर बनाई जाती थी जो उनकी परंपरा का हिस्सा होगी। साथ ही साथ, अन्य समुदाय के लोगों के साथ व्यापार की वस्तु और संचार का ज़रिया होगी।

चीन में येलो रिवर घाटी में मिले अवशेष और भी प्राचीन हैं। माना जाता है कि चीनी सभ्यता की शुरुआत येलो रिवर के किनारे ही हुई थी। इस घाटी में कई पुरातात्विक खोजें हुई हैं। 2013 में पीएनएएस में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक दो गड्ढों से कुछ कलाकृतियां मिली हैं, जिनकी कार्बन डेटिंग से पता चला है कि ये 3400 से 2900 ईसा पूर्व की हैं। कलाकृतियों में चौड़े मुंह वाली कीप सही-सलामत मिली है। इसके अलावा चौड़े मुंह वाले घड़े, सकरे मुंह वाले लंबे घड़े (एम्फोरा) और चूल्हे के हिस्से मिले हैं। इन्हें देख कर लगता है कि ये विशेष रूप से मदिरा बनाने, छानने और उसके भंडारण के लिए और गर्म करने एवं तापमान नियंत्रण के लिए उपयोग किए जाते होंगे।

इन बर्तनों पर जो अवशेष मिले हैं वे मंड के कण हैं, जो अनाजों के कारण पड़े होंगे। साथ ही फाइटोलिथ जैसे खनिजों के कण भी इन बर्तनों पर मिले हैं जो आम तौर पर विघटित पौधों के अवशषों में पाए जाते हैं। मंड की जांच से पता चला है कि यह मोटे अनाज, कुछ किस्म के गेहूं, जौं या यैम जैसे कुछ कंदों से आया होगा। ये इस क्षेत्र में पाए भी जाते हैं। प्राप्त मंड के अवशेष एक तो शक्तिशाली, टिकाऊ और खुशबूदार बीयर बनाने की विधि का संकेत देते हैं वहीं मंड के कणों में क्षति के प्रमाण भी मिले हैं। इस तरह की क्षति अनाज को अंकुरित करने, भिगोने, सुखाने की प्रक्रिया में हुई होगी। अंकुरित अनाज को गर्म हवा से सुखाने (माल्टिंग) के दौरान एंज़ाइम मंड को शर्करा में तोड़ते हैं जिसके कारण मंडयुक्त अनाज में छेद हो जाते हैं। फिर जब कचूमर बनाने के लिए अनाज के दानों को गर्म पानी में डालते हैं तो वे फूलते हैं और उनका आकार बिगड़ जाता है।

पीएनएएस पेपर के मुताबिक “इस प्रकार, पुरातात्विक खोज में मिले विकृत आकार के मंडयुक्त अनाज को देखकर कहा जा सकता है कि ये अनाज मदिरा बनाने की प्रक्रिया के अवशेष हैं।” अवशेष के रासायनिक विश्लेषण में कैल्शियम ऑक्ज़लेट के अवशेष भी दिखे। कैल्शियम ऑक्ज़लेट बीयर बनाने के पात्र में बीयरस्टोन के रूप में नीचे बैठ जाता है। यह बीयर बनाने की प्रक्रिया का द्योतक है। अवशेषों में कैल्शियम ऑक्ज़लेट की उपस्थिति से इस बात की पुष्टि होती है कि प्रागैतिहासिक पात्रों का उपयोग बीयर बनाने में किया जाता था।

इटली के सिसली के दो प्रागैतिहासिक स्थलों से प्राप्त बर्तनों पर कार्बनिक अवशेष पाए गए थे। खुदाई में मिले इन बर्तनों के अध्ययन के दौरान कार्बनिक अवशेषों की विस्तृत प्रयोगशाला जांच की गई। यह अध्ययन माइक्रोकेमिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन का उद्देश्य “कुछ विशेष आकार के सिरेमिक पात्रों के उपयोग को समझना और प्राचीन आहार सम्बंधी आदतों के बारे में कुछ अनुमान लगाना” था। अध्ययन में मध्य कांस्य युग (1550-1250 ईसा पूर्व) से प्रारंभिक लौह युग (1050-950 ईसा पूर्व) तक के अवशेष शामिल थे।

शोधकर्ताओं के समूह ने उपलब्ध पारंपरिक तरीकों और नवीनतम तरीकों का उपयोग करके पुरातात्विक सामग्री का विस्तृत विश्लेषण किया। उन्होंने नए सिरे से कार्बन डेटिंग, पशु कंकाल के अवशेषों के संरचनात्मक अध्ययन और सिरेमिक पात्रों और कार्बनिक अवशेषों के रासायनिक और अन्य विश्लेषण किए। बाद में अपना अध्ययन उन्होंने प्रारंभिक लौह युग के खाना पकाने के मर्तबान तक सीमित रखा। इसके लिए उन्होंने एनएमआर, इंफ्रारेड वर्णक्रम तथा स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप जैसी कई आधुनिक विधियों का उपयोग किया।

इन विधियों से प्राचीन लोगों के भोजन और आहार सम्बंधी आदतों के बारे में काफी जानकारी पता लगी है। लेकिन इस अध्ययन से एक जो महत्वपूर्ण चीज़ मिली वह है टारटरिक एसिड। मॉन्टे क्रोनियो की खुदाई में पाए गए पात्रों में से एक पात्र में टारटेरिक एसिड और इसके सोडियम लवण के निशान मिले हैं। टारटेरिक एसिड वाइन का एक महत्वपूर्ण घटक है और वाइन की रासायनिक स्थिरता सुनिश्चित करने में भूमिका निभाता है। टारटरिक एसिड ज़्यादातर फलों और पौधों में नहीं पाया जाता लेकिन अंगूर में विशेष रूप से पाया जाता है। निश्चित रूप इसी कारण से वाइन अक्सर अंगूर से ही बनाई जाती है।

मॉन्टे क्रोनियो के पात्रों पर अवशेष में टारटेरिक एसिड और इसके लवण की उपस्थिति इस बात का संकेत देते हैं कि लगभग 1000 ईसा पूर्व के सिरेमिक पात्र अंगूर से बनी वाइन के भंडारण के काम आते थे। इटली आज दुनिया का सबसे बड़ा वाइन निर्यातक है। लगता है, उन्होंने इसकी शुरुआत काफी पहले कर ली थी। (स्रोत फीचर्स)

नोट : यह लेख वेबसाइट पर 7 जून 2018 तक ही उपलब्ध रहेगा|