हाल ही में राष्ट्र संघ ने पहली अंतर्राष्ट्रीय सायबर अपराध (cyber crime) संधि को मंज़ूरी दे दी है। जैसा कि सर्वविदित है, आजकल काफी सारा कामकाज इंटरनेट (internet) के माध्यम से होता है और इसका दुरुपयोग करके कई अवैध कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है। जहां एक ओर, इंटरनेट ने आर्थिक लेन-देन को सुगम बनाया है, वहीं इसने ऐसी गुंजाइश पैदा की है कि कुछ लोग अपने गलत इरादों को कार्यरूप दे सकें। इसी के चलते सायबर अपराधों की रोकथाम एक प्रमुख सरोकार के रूप में उभरा है और राष्ट्र संघ संधि इसी को संबोधित करने का एक साधन है।
राष्ट्र संघ ने 2017 में इस संधि को अंतिम रूप देने के लिए एक समिति का गठन किया था। तीन साल के विचार-विमर्श और न्यूयॉर्क में दो सप्ताह लंबे सत्र के बाद अंतत: सदस्यों ने सर्व सम्मति से राष्ट्र संघ सायबर अपराध निरोधक संधि को मंज़ूरी दे दी। अब इसे अनुमोदन के लिए आम सभा के समक्ष पेश किया जाएगा। ऐसा माना जा रहा है कि अनुमोदन के बाद यह संधि सायबर अपराधों से ज़्यादा कारगर ढंग से निपटने में मदद करेगी, खास तौर से मनी लॉन्ड्रिंग (money laundering) और बच्चों के विरूद्ध यौन अपराध (child exploitation) जैसे मामलों में।
आम तौर पर देशों ने इस संधि का स्वागत किया है। खास तौर से उन देशों के लिए यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव है जिनके पास अपना सायबर इंफ्रास्ट्रक्चर (cyber infrastructure) बहुत विकसित नहीं है क्योंकि संधि में ऐसे देशों के लिए तकनीकी मदद का प्रावधान है। लेकिन कई संगठन संधि के आलोचक भी हैं। इनमें मानव अधिकार संगठन और बड़ी टेक कंपनियां (tech companies) प्रमुख हैं।
विरोधियों का मत है कि इस संधि का दायरा बहुत व्यापक है और यह सरकारों को निगरानी (surveillance) को सख्त करने की छूट देने जैसा है। जैसे, संधि में यह व्यवस्था है कि यदि कोई अपराध होता है, जिसके लिए किसी देश के कानून में चार साल से अधिक कारावास का प्रावधान है, तो वह देश किसी अन्य देश के अधिकारियों से मांग कर सकता है कि वे उस अपराध से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (electronic evidence) उपलब्ध कराएं। वह इंटरनेट सर्विस प्रदाताओं (internet service providers) से भी डेटा की मांग कर सकता है।
मानव अधिकार संगठन ह्यूमैन राइट्स वॉच ने कहा है कि यह निगरानी का एक बहुपक्षीय औज़ार है और एक मायने में दमन का कानूनी साधन है। इसका उपयोग पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, एलजीबीटी (LGBT) लोगों, स्वतंत्र चिंतकों वगैरह के खिलाफ राष्ट्रीय सरहदों के आर-पार हो सकता है। टेक कंपनियों के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह संधि डिजिटल कामकाज (digital operations) और मानव अधिकारों के लिहाज़ से हानिकारक होगी।
दूसरी ओर, कई देशों का मत है कि इस संधि में मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिए ज़रूरत से ज़्यादा प्रावधान जोड़े गए हैं। उदाहरण के लिए, रूस जो ऐतिहासिक रूप से इस मसौदे के लेखन का हिमायती रहा है, उसने कुछ दिन पहले यह शिकायत की है कि मसौदा मानव अधिकार सुरक्षा के प्रावधानों से लबरेज़ है। इसी तरह, अंतिम दौर में इरान ने कुछ ऐसी धाराओं को हटवाने का प्रयास किया जो ‘निहित रूप से गलत’ हैं। ऐसा एक पैरा था जिसमें यह कहा गया था कि “इस संधि की किसी भी बात की व्याख्या इस रूप में नहीं की जाएगी जिससे मानव अधिकारों तथा बुनियादी स्वतंत्रता के दमन” का आशय प्रकट हो। जैसे “अभिव्यक्ति, अंतरात्मा, मत, धर्म या आस्थाओं की आज़ादी”। विलोपन के इस प्रस्ताव के पक्ष में रूस, भारत, सूडान, वेनेज़ुएला, सीरिया, उत्तर कोरिया, लीबिया सहित 32 वोट पड़े जबकि विरोध में 102 वोट पड़े। 26 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया था। बहरहाल इस संधि को सर्व-सम्मति से पारित कर दिया गया। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.eff.org/files/issues/un-cybercrime-1b.jpg
हाल ही में साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन का निष्कर्ष है कि दुनिया भर के लगभग 4.4 अरब लोग असुरक्षित पानी (unsafe drinking water) पीते हैं। यह संख्या पूर्व अनुमानों से लगभग दुगनी है। अनुमानों में अंतर का कारण संभवत: परिभाषाओं में है और सवाल यह है कि किस अनुमान को यथार्थ का आईना माना जाए हालांकि कोई भी आंकड़ा सही हो, स्थिति चिंताजनक और शर्मसार करने वाली तो है ही।
दरअसल, राष्ट्र संघ 2015 से इस बात का आकलन करता आया है कि कितने लोगों को सुरक्षित ढंग से प्रबंधित पेयजल (safe drinking water) उपलब्ध है। इससे पहले राष्ट्र संघ सिर्फ इस बात की रिपोर्ट देता था कि क्या वैश्विक जल स्रोत उन्नत हुए हैं। इसका मतलब शायद इतना ही था कि क्या पेयजल के स्रोतों को कुओं, पाइपों और वर्षाजल संग्रह (rainwater harvesting) जैसे तरीकों से बाहरी अपमिश्रण से बचाने की व्यवस्था की गई है। इस मानक के आधार पर लगता था कि दुनिया की 90 प्रतिशत आबादी के लिए ठीक-ठाक पेयजल की व्यवस्था है। लेकिन इसमें इस बात को लेकर जानकारी ना के बराबर होती थी कि क्या जो पानी मिल रहा है वह सचमुच स्वच्छ है (clean drinking water)।
2015 में ऱाष्ट्र संघ ने टिकाऊ विकास के लक्ष्य (sustainable development goals) निर्धारित किए थे। इनमें से एक लक्ष्य था: वर्ष 2030 तक “सबके लिए स्वच्छ व किफायती पेयजल (affordable drinking water) की सार्वभौमिक तथा समतामूलक पहुंच सुनिश्चित करना।” राष्ट्र संघ ने इसी के साथ सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल स्रोतों (safely managed water sources) के मापदंडों को भी फिर से निर्धारित किया: जल स्रोत बेहतर होने चाहिए, लगातार उपलब्ध होने चाहिए, व्यक्ति के निवास स्थान पर पहुंच में होने चाहिए और संदूषण-मुक्त होने चाहिए।
इस नई परिभाषा को लेकर जॉइन्ट मॉनीटरिंग प्रोग्राम फॉर वॉटर सप्लाई, सेनिटेशन एंड हायजीन (JMP) ने 2020 में अनुमान लगाया था कि दुनिया भर में ऐसे 2.2 अरब लोग हैं जिन्हें स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है। जेएमपी (Joint Monitoring Program) विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और युनिसेफ का संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रम है। इस अनुमान तक पहुंचने के लिए कार्यक्रम ने देशों की जनगणना, नियामक संस्थाओं व सेवा प्रदाताओं की रिपोर्ट्स और पारिवारिक सर्वेक्षणों से प्राप्त आंकड़ों को आधार बनाया था।
लेकिन जेएमपी का तरीका स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ एक्वेटिक साइंस एंड टेक्नॉलॉजी की शोधकर्ता एस्थर ग्रीनवुड के तरीके से अलग था। जेएमपी ने किसी भी स्थान की स्थिति के आकलन के लिए चार में से कम से कम तीन मापदंडों को देखा था और फिर सबसे कम मूल्य को उस स्थान के पेयजल की समग्र गुणवत्ता का द्योतक माना था। उदाहरण के लिए, यदि किसी शहर के लिए इस बाबत कोई डैटा नहीं है कि क्या जल स्रोत लगातार उपलब्ध हैं लेकिन यह पता है कि वहां की 40 प्रतिशत आबादी को साफ पानी (clean water) उपलब्ध है, 50 प्रतिशत के पास उन्नत जल स्रोत (improved water sources) हैं और 20 प्रतिशत को घर पर ही पानी पहुंच में है तो जेएमपी का आकलन होगा कि उस शहर में 20 प्रतिशत लोगों को सुरक्षित ढंग से प्रबंधित पेयजल (safely managed drinking water) मिलता है। इसके बाद इस आंकड़े से सरल गणितीय तरीके का उपयोग करके पूरे देश के बारे में आकलन कर लिया जाता था।
दूसरी ओर, साइंस में प्रकाशित अध्ययन में 27 निम्न व मध्यम आमदनी वाले देशों में 2016 से 2020 के बीच किए गए सर्वेक्षणों को आधार बनाया गया है। इन सर्वेक्षणों में उन्हीं चार मापदंडों का इस्तेमाल करते हुए 64,723 परिवारों से जानकारी जुटाई गई थी। यदि किस परिवार के संदर्भ में 4 में से एक भी मापदंड पूरा नहीं होता था तो माना गया कि उसे स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है। इसके बाद टीम ने एक मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म (machine learning algorithm) को प्रशिक्षित किया व कई अन्य क्षेत्रीय कारक (औसत तापमान, जलवैज्ञानिक हालात, भूसंरचना और आबादी के घनत्व) भी जोड़े। इस आधार पर उनका अनुमान है कि दुनिया में 4.4 अरब लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है। और इनमें से भी आधे लोग जो पानी पीते हैं उसमें रोगजनक बैक्टीरिया ई. कोली (E. coli bacteria) पाया जाता है।
वैसे यह तय करना मुश्किल है कि इनमें से कौन-सा यथार्थ के ज़्यादा करीब है लेकिन इतना स्पष्ट है कि वैश्विक आबादी के एक बड़े हिस्से को स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा (basic water facility) भी उपलब्ध नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.unicef.org/eap/sites/unicef.org.eap/files/styles/press_release_feature/public/UN0260388.jpg.webp?itok=mye8RPkX
मई, 2024 में नेचर पत्रिका में एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसका शीर्षक था: ‘सुमात्रा के एक नर ओरांगुटान द्वारा जैविक रूप से सक्रिय पौधे से चेहरे के घाव का सायास स्व-उपचार’ (‘Active self-treatment of a facial wound with a biologically active plant by a male Sumatran orangutan’)।
इस शोधपत्र में मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल बिहेवियर [Animal Behavior Research] की इसाबेल लॉमर और उनके साथियों ने बताया था कि इंडोनेशिया में इस प्रायमेट जंतु [Primates in Indonesia] ने किस तरह एक स्थानीय पौधे फाइब्रौरिया टिंक्टोरिया का लुग्दीनुमा लेप बनाया और इसे अपने चेहरे के घाव पर लगाकर घाव का इलाज किया।
इसी तरह 2012 में नेचर पत्रिका में मैट कापलान ने एक लेख प्रकाशित किया था जिसका शीर्षक था: ‘(स्वस्थ रहने के लिए) निएंडरथल हरी पत्तेदार सब्ज़ियां खाते हैं’ (Neanderthals ate their greens)। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने उत्तरी स्पेन के कुछ निएंडरथलों के दांतों के प्लाक का विश्लेषण किया और पाया कि वे संक्रमण वगैरह से निजात पाने और सामान्य स्वास्थ्य के लिए येरो (संभवत: सहस्रपर्णी) और कैमोमाइल जैसे पौधों का इस्तेमाल करते थे।
ऐसे कई पौधों का इस्तेमाल दुनिया भर के लोगों द्वारा पारंपरिक चिकित्सा [Traditional Medicine] में, संक्रमण से उबरने के लिए और स्वस्थ रहने के लिए किया जाता है। मार्च 2009 के रेज़ोनेंस के अंक में आर. रमन और एस. कंदुला की एक विस्तृत समीक्षा प्रकाशित हुई थी, जो बताती है कि पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के पारिस्थितिकीविद डी. एच. जैनज़ेन ने एक शब्द गढ़ा था ‘ज़ुओफार्मेकोग्नॉसी’। (यानी जंतुओं द्वारा औषधीय गुणों वाली वनस्पतियों, कीटों या मिट्टी से स्वयं का उपचार करने का व्यवहार)। डी. एच. जैनज़ेन वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने उन जंतुओं की सूची तैयार की थी जो विशिष्ट पौधों, मिट्टी या कीटों को खाकर या उनका लेप लगाकर खुद का उपचार कर लेते हैं।
ब्राज़ील के बाहिया के डॉ. ई. एम. कोस्टा-नेटो ने 2012 में एनवायरमेंटल साइंस, बायोलॉजी [Environmental Science, Biology] में ‘ज़ुओफार्मेकोग्नॉसी: जानवरों का स्व-उपचार का व्यवहार’ (Zoopharmacognosy: the self-medication behaviour of animals)’ शीर्षक से, और बाल्टीमोर के जोएल शर्किन ने प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में कई ऐसे पौधों और उनकी जड़ों, पत्तियों और फलों की सूची प्रकाशित की है जिन्हें वानर, बंदर, बारहसिंगा, भालू और कुछ पक्षी (स्टारलिंग) स्वस्थ रहने के लिए खाते हैं। कुत्ते पेट के संक्रमण से छुटकारा पाने के लिए घास खाकर और उसे उल्टी करके खुद को ठीक करते हैं। गर्भवती लीमर दूध बनने में सहायता के लिए इमली के पत्ते कुतरती हैं, और केन्या में गर्भवती हथिनी प्रसव को शुरू करने के लिए बोरागिनेसी कुल के कुछ पौधों की पत्तियां खाती हैं।
रोमन प्रकृतिविद प्लिनी ने 2000 वर्ष पहले बताया था कि कई जानवरों ने कुछ पौधों के चिकित्सीय/औषधीय गुण [Medicinal Properties] खोजे थे, जो स्थानीय लोगों के लिए उपयोगी ज्ञान बन गया। इनमें से कई औषधीय पौधों के बारे में अफ्रीका, मिस्र, मध्य पूर्व, भारत और चीन में 3000 से अधिक वर्ष पहले से पता है, और आज भी इनका उपयोग किया जाता है।
पारंपरिक दवाएं
सुमात्रा के ओरांगुटान द्वारा घाव भरने में इस्तेमाल किए जाने वाले औषधीय पौधे फाइब्रौरिया टिंक्टोरिया में शोथ-रोधी अणु बर्बेराइन होता है। इस पौधे का स्थानीय नाम ‘अकर कुन्यी’ है, और इसका उपयोग वहां की पारंपरिक चिकित्सा [Traditional Medicine in Sumatra] में किया जाता है। दक्षिणी उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में, इसी पौधे जैसा कनेर (ओलिएंडर) पौधा मिलता है, जिसका उपयोग पीलिया के उपचार [Jaundice Treatment] में किया जाता है। भारत में और एशिया व अफ्रीका के कई हिस्सों में पाई जाने वाले ग्वारपाठा (एलो वेरा) में रोगाणु-रोधी, शोध-रोधी और घाव भरने वाले गुण होते हैं।
कई सभ्यताओं ने हज़ारों वर्षों से प्राकृतिक चिकित्सा प्रणालियों [Natural Medicine Systems] को समझा है/दर्ज किया है और उनका उपयोग किया है। चीन में पिछले 5000 वर्षों से झोंग्यी प्रणाली है, अरेबिया 4000 वर्षों से है और भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली 5000 वर्षों से है। इन सभी में उपचार के लिए विभिन्न पौधों, फलों और जड़ों का उपयोग किया जाता है। जैसे सर्पगंधा (Rauwolfina serpentina), तुलसी, एलो वेरा, जंगली लहसुन, प्याज़, अजवायन, आर्टिचोक, कपूर, नारियल और अरंडी का तेल। च्यवनप्राश भारत में लोकप्रिय है; इसको बनाने का एक नुस्खा लगभग 700 ईसा पूर्व से चरक संहिता में दर्ज है। अब हम नए प्राकृतिक उत्पाद अणुओं के बारे में बताने के लिए जैव रसायनज्ञों और दवा कंपनियों [Biochemists and Pharmaceutical Companies] से उम्मीद रखते हैं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://th-i.thgim.com/public/incoming/d0xn4p/article68537183.ece/alternates/LANDSCAPE_1200/orangutan.jpg
पिछले सप्ताह भारत सरकार ने 156 औषधि के नियत खुराक संयोजनों यानी फिक्स्ड डोज़ कॉम्बिनेशन्स (Fixed Dose Combinations – FDCs) के उत्पादन, विपणन और वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया। इनमें आम तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले एंटीबायोटिक्स (Antibiotics), दर्द-निवारक (Painkillers), एलर्जी-रोधी दवाइयां तथा मल्टीविटामिन्स (Multivitamins) शामिल हैं।
यह निर्णय केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक विशेषज्ञ समिति तथा औषधि तकनीकी सलाहकार बोर्ड (Drug Technical Advisory Board – DTAB) की अनुशंसा के आधार पर लिया गया है। प्रतिबंध की अधिसूचना (21 अगस्त 2024) में इन FDC पर प्रतिबंध के मूलत: दो कारण दिए गए हैं:
1. सम्बंधित FDC में मिलाए गए अवयवों का मिश्रण तर्कहीन है। इन अवयवों का कोई चिकित्सकीय औचित्य नहीं है।
2. सम्बंधित FDC के उपयोग से मनुष्यों को जोखिम होने की संभावना है जबकि उक्त औषधियों के सुरक्षित विकल्प (Safer Alternatives) उपलब्ध हैं।
वैसे तो FDC के मामले में देश के चिकित्सा संगठन कई वर्षों से चिंता व्यक्त करते आए हैं। इस विषय पर विचार के लिए केंद्र सरकार के स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 2013 में सी. के. कोकाटे की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था। समिति ने FDC के मुद्दे पर विस्तृत विचार-विमर्श के बाद कई FDC को बेतुका घोषित किया था।
उस दौरान चले विचार-विमर्श का सार कई वर्षों पूर्व लोकॉस्ट नामक संस्था द्वारा प्रकाशित पुस्तक आम लोगों के लिए दवाइयों की किताब में प्रस्तुत हुआ था। आगे की चर्चा उसी पुस्तक के अंशों पर आधारित है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization – WHO) की विशेषज्ञ समिति के अनुसार सामान्यतः मिश्रित दवाइयों का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। इनका उपयोग तभी किया जाना चाहिए जब वैकल्पिक इकहरी दवाइयां (Single Drug Alternatives) किफायती न हों। FDC से “साइड प्रभावों का खतरा बढ़ता है और अनावश्यक रूप से लागत भी बढ़ती है तथा तुक्केबाज़ीनुमा बेतुकी चिकित्सा को बढ़ावा मिलता है।” जब FDC का उपयोग किया जाता है, तब प्रतिकूल प्रतिक्रिया का खतरा अधिक होता है और यह पता करना मुश्किल होता है कि प्रतिक्रिया किस अवयव की वजह से हुई है। FDC इसलिए भी बेतुकी हैं कि उनकी स्थिरता (Stability) संदिग्ध है। लिहाज़ा कई मामलों में समय के साथ इनका प्रभाव कम हो जाता है।
जैसे, स्ट्रेप्टोमायसिन (टी.बी. की दवाई) और पेनिसिलीन के मिश्रित इंजेक्शन (अब प्रतिबंधित) का उपयोग बुखार, संक्रमणों और छोटी-मोटी बीमारियों के लिए बहुतायत से किया गया है। यह गलत है क्योंकि इसकी वजह से टी.बी. छिपी रह जाती है। इसके अलावा, हर छोटी-मोटी बीमारी में स्ट्रेप्टोमायसिन के उपयोग का एक परिणाम यह होता है कि टी.बी. का बैक्टीरिया (Mycobacterium Tuberculosis) इस दवाई का प्रतिरोधी हो जाता है। इसी प्रकार से स्ट्रेप्टोमायसिन और क्लोरेम्फिनेकॉल के मिश्रण का उपयोग (दुरुपयोग) दस्त के लिए काफी किया जाता था। इस पर रोक लगाने के प्रयासों का दवा कंपनियों ने काफी विरोध किया था मगर 1988 में अंततः इस पर रोक लग गई थी। दरअसल यह मिश्रण निरी बरबादी था क्योंकि दस्त के 60 प्रतिशत मामले तो वायरस की वजह से होते हैं और मात्र जीवन रक्षक घोल (Oral Rehydration Solution – ORS) से इन पर काबू पाया जा सकता है, बैक्टीरिया-रोधी दवाइयों की कोई ज़रूरत नहीं होती। क्लोरेम्फिनेकॉल का अंधाधुंध उपयोग भी खतरनाक है क्योंकि इससे एग्रेनुलोसायटोसिस जैसे जानलेवा रक्त दोष पैदा हो सकते हैं। जब इसका उपयोग मिश्रण के रूप में किया जाता है, तो टायफॉइड बैक्टीरिया इसका प्रतिरोधी होने लगता है।
कई अन्य FDC को चिकित्सकीय दृष्टि से बेतुका पाया गया है। जैसे, विभिन्न एंटीबायोटिक्स के मिश्रण या उनके साथ कार्टिकोस्टीरॉइड्स या विटामिन जैसे पदार्थों के मिश्रण; बुखार और दर्दनिवारकों के मिश्रण जैसे इबुप्रोफेन+पेरासिटेमॉल (Ibuprofen+Paracetamol), एस्पिरिन+पेरासिटेमॉल (Aspirin+Paracetamol), डिक्लोफेनेक+पेरासिटेमॉल (Diclofenac+Paracetamol); दर्द निवारकों के साथ लौह, विटामिन्स या अल्कोहल के मिश्रण; कोडीन (Codeine) (जिसकी लत लगती है) के अन्य दवाइयों के साथ मिश्रण।
FDC के उपयोग के खिलाफ कुछ तर्क और भी हैं। एक है कि कई बार ऐसे मिश्रणों में दो एक-सी दवाइयों को मिलाकर बेचा जाता है जिसका कोई औचित्य नहीं है। इसके विपरीत कुछ FDC में दो विपरीत असर वाली औषधियों को मिला दिया जाता है।
FDC अलग-अलग औषधियों की मात्रा के स्वतंत्र निर्धारण की गुंजाइश नहीं देती। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि FDC में मिलाई गई दवाइयों के सेवन का क्रम भिन्न-भिन्न होता है (जैसे एक दवाई दिन में दो बार लेनी है, तो दूसरी दवाई दिन में तीन बार)। ऐसे में मरीज़ को अनावश्यक रूप से दोनों दवाइयां एक साथ एक ही क्रम में लेना होती है।
WHO के अनुसार FDC को निम्नलिखित स्थितियों में ही स्वीकार किया जा सकता है:
1. जब चिकित्सा साहित्य में एक साथ एक से अधिक दवाइयों के उपयोग को उचित बताया गया हो।
2. जब मिश्रण के रूप में उन दवाइयों का सम्मिलित असर अलग-अलग दवाइयों से अधिक देखा गया हो।
3. जब मिश्रण की कीमत अलग-अलग दवाइयों की कीमतों के योग से कम हो।
4. जब मिश्रण के उपयोग से मरीज़ द्वारा अनुपालन में सुधार हो (जैसे टी.बी. मरीज़ को एक से अधिक दवाइयां लेनी पड़ती हैं, और वे एकाध दवाई लेना भूल जाते हैं)।
भारत में वर्तमान में जो FDC बेचे जाते हैं उनमें से ज़्यादातर तर्कसंगत नहीं हैं क्योंकि उनके चिकित्सकीय फायदे संदिग्ध हैं। उदाहरण से तौर पर निमेसुलाइड के नुस्खों की भरमार का प्रकरण देखा जा सकता है। सन 2003 में फार्माबिज़ (Pharmabiz) के संपादकीय में पी.ए. फ्रांसिस ने लिखा था:
“…देश में निमेसुलाइड के 200 नुस्खे भारतीय औषधि महानियंत्रक (Drug Controller General of India – DCGI) की अनुमति के बगैर बेचे जा रहे हैं। इन 200 नुस्खों में से 70 तो निमेसुलाइड के सस्पेंशन हैं जबकि शेष 130 विभिन्न अन्य दवाइयों के साथ निमेसुलाइड के मिश्रण हैं। इस समूह में सबसे ज़्यादा तो निमेसुलाइड और पेरासिटेमॉल के मिश्रण हैं जिनकी संख्या 50 है। निमेसुलाइड और मांसपेशियों को शिथिल करने वाली दो दवाइयों (टिज़ेनिडीन और सेराशियोपेप्टिडेज़) के मिश्रण भी काफी प्रचलित हैं, इनके 52 ब्रांड्स उपलब्ध हैं। हैरत की बात यह है कि निमेसुलाइड के इतने सारे बेतुके मिश्रण देश में बेचे जा रहे हैं जबकि स्वयं निमेसुलाइड की सुरक्षा सवालों के घेरे में है…”
कुल मिलाकर, FDC पर रोक का निर्णय स्वास्थ्य के क्षेत्र में सही दिशा में एक कदम है हालांकि स्वास्थ्य क्षेत्र के कई कार्यकर्ता और जानकारी मिलने तक कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते। वर्तमान निर्णय के साथ एक दिक्कत यह है कि प्रत्येक FDC को लेकर विशिष्ट रूप से कोई विवरण नहीं दिया है। (स्रोत फीचर्स)
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कॉफी कई लोगों को सुबह की नींद से जगाने का एक लोकप्रिय पेय (morning beverage) है। लेकिन कई लोग मानते हैं कि जगाने के साथ-साथ यह भूख को भी शांत कर देती है (appetite control)। हाल ही में, सोशल मीडिया चलन (social media trend) के कारण वज़न घटाने में कॉफी का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है। इस चलन को ‘कॉफी लूपहोल’ (coffee loophole) का नाम दिया गया है जिसमें कॉफी में मसाले या पूरक मिलाने या फिर भूख लगने पर इसे तुरंत पीने से वज़न घटाने में मदद मिल सकती है। लेकिन यह कितना सच है?
फिलहाल इस विषय पर कोई सीधे हां या ना में उत्तर मौजूद नहीं है, और शोधकर्ता अभी भी यह पता लगा ही रहे हैं कि कॉफी, विशेष रूप से इसमें मौजूद कैफीन (caffeine effects), वज़न को कैसे प्रभावित करता है। कुछ लोगों का मानना है कि कॉफी पाचन (digestion) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कैफीन बड़ी आंत की मांसपेशियों के संकुचन को तेज़ कर सकता है, जिससे मल त्याग आसानी से हो जाता है। इसके अलावा यह मूत्रवर्धक के रूप में भी काम करता है, जिससे मूत्र उत्पादन बढ़ता है, और शरीर के पानी का वज़न अस्थायी तौर पर कम हो सकता है (water weight)। लेकिन ये प्रभाव अल्पकालिक होते हैं और स्थायी वज़न घटाने (permanent weight loss) की ओर नहीं ले जाते हैं।
बहरहाल, वज़न घटाने में कॉफी के स्थायी प्रभाव का अभी भी अध्ययन किया जा रहा है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि किसी भी संभावित लाभ के लिए सिर्फ एक कप कॉफी से काम नहीं चलेगा (weight loss benefits)। (स्रोत फीचर्स)
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जर्मनी में एक 60 वर्षीय व्यक्ति (HIV treatment) वायरस से मुक्त घोषित कर दिया गया है। वह दुनिया का ऐसा सातवां व्यक्ति है। लेकिन इस व्यक्ति के संदर्भ में एक विशेष बात यह है कि वह ऐसा दूसरा व्यक्ति है जिसे ऐसी स्टेम कोशिकाएं (stem cell transplant) प्रत्यारोपित की गई थीं जो वायरस की प्रतिरोधी नहीं हैं। दरअसल इस उपचार के संयोजक कैंब्रिज विश्वविद्यालय के रविंद्र गुप्ता स्वयं अचंभित हैं कि इसने काम कर दिखाया।
ऐसा पहला व्यक्ति टिमोथी रे ब्राउन था जिसे रक्त कैंसर (blood cancer) के उपचार के लिए अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण (bone marrow transplant) दिया गया था। इस प्रत्यारोपण के बाद वह एच.आई.वी. मुक्त हो गया। प्रसंगवश उसे अब बर्निल मरीज़ के नाम से जाना जाता है। ब्राउन व चंद अन्य मरीज़ों को जो स्टेम कोशिकाएं दी गई थीं उनमें एक जीन में उत्परिवर्तन था। यह जीन सामान्यत: CCR5 नामक ग्राही का निर्माण करवाता है। CCR5 वह ग्राही है जिसकी मदद से एड्स वायरस प्रतिरक्षा कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं। इस प्रयोग के निष्कर्ष से कई शोधकर्ताओं को लगा कि शायद CCR5 ही एच.आई.वी. उपचार (HIV cure) के लिए सही लक्ष्य है।
और अब यह नया मामला म्यूनिख में पच्चीसवें अंतर्राष्ट्रीय एड्स सम्मेलन (International AIDS Conference) में रिपोर्ट हुआ है। इसमें शामिल मरीज़ को नेक्स्ट बर्लिन मरीज़ कहा जा रहा है। नेक्स्ट बर्लिन मरीज़ को एक ऐसे व्यक्ति की स्टेम कोशिकाएं दी गई थीं जिसकी कोशिकाओं में गैर-उत्परिवर्तित जीन की एक ही प्रतिलिपि थी – यानी ये कोशिकाएं CCR5 बनाती तो हैं लेकिन सामान्य से कम मात्रा में। इसका मतलब है आपको ऐसा दानदाता ढूंढना ज़रूरी नहीं है जिसमें जीन पूरी तरह काम न करता हो। अर्थात दानदाता ढूंढना कहीं ज़्यादा आसान हो जाएगा। कहते हैं कि युरोपीय मूल के लोगों में मात्र एक प्रतिशत ऐसे होते हैं जिनके CCR5 जीन की दोनों प्रतिलिपियां उत्परिवर्तित होती हैं जबकि एक उत्परिवर्तित जीन वाले लोग आबादी में 10 प्रतिशत हैं।
किस्सा यह है कि नेक्स्ट बर्लिन मरीज़ में एच.आई.वी. का निदान 2009 में हुआ था। वर्ष 2015 में उसमें रक्त व अस्थि मज्जा के कैंसर (acute myeloid leukemia) का पता चला। उसके डॉक्टरों को ऐसा मैचिंग दानदाता मिला ही नहीं जिसकी कोशिकाओं में CCR5 जीन की दोनों प्रतिलिपियां उत्परिवर्तित हों। अलबत्ता, उन्हें एक ऐसी महिला दानदाता मिल गई जिसकी एक CCR5 प्रतिलिपि में उत्परिवर्तन था। तो हमारे नेक्स्ट बर्लिन मरीज़ को 2015 में प्रत्यारोपण मिला।
जहां तक कैंसर का सवाल था तो उसका उपचार ठीक-ठाक हो गया। एक माह के अंदर मरीज़ की अस्थि मज्जा की स्टेम कोशिकाओं का स्थान दानदाता की कोशिकाएं ले चुकी थीं। फिर 2018 में मरीज़ ने एच.आई.वी. का दमन करने वाली एंटी-रिट्रोवायरल औषधियां लेना बंद कर दिया। और आज लगभग 6 साल बाद उसके शरीर में एच.आई.वी. का कोई प्रमाण नहीं है।
अतीत में भी प्रत्यारोपण के प्रयास किए गए हैं लेकिन उनमें नियमित CCR5 जीन वाले दानदाताओं की स्टेम कोशिकाएं दी जाती थीं। इनमें जैसे ही मरीज़ एंटी-रिट्रोवायरल दवा लेना बंद करते, चंद सप्ताह या महीनों के बाद एच.आई.वी. पुन: सिर उठा लेता था। मात्र एक मामले में व्यक्ति 32 महीने बाद तक वायरस-मुक्त रहा था। यह मामला पेरिस के पाश्चर इंस्टीट्यूट के एसियर सेज़-सिरिऑन ने प्रस्तुत किया था – उसे जेनेवा मरीज़ कहा गया था।
अब शोधकर्ता यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि क्यों यही दो प्रत्यारोपण सफल रहे। इसके लिए कई परिकल्पनाएं प्रस्तुत की गई हैं। (HIV research) (स्रोत फीचर्स)
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हाल ही में एड्स 2024 सम्मेलन (AIDS 2024 Conference) में दक्षिण अफ्रीका की शोधकर्ता लिंडा-गेल बेकर ने एक परीक्षण का विवरण प्रस्तुत किया जिसमें सहभागियों को 100 प्रतिशत सुरक्षा मिली है। इस परीक्षण के दौरान 2000 से ज़्यादा अफ्रीकी महिलाओं को एक एंटीवायरस औषधि (Antiviral Drug) लेनाकापेविर साल में दो बार दी गई थी। यह औषधि दरअसल संपर्क-पूर्व रोकथाम (Pre-exposure Prophylaxis) के तौर पर दी गई थी। इनमें से एक भी महिला एड्स वायरस (HIV Virus) से संक्रमित नहीं हुई। यह परीक्षण सिस-जेंडर महिलाओं पर किया गया था। सिस-जेंडर मतलब वे महिलाएं जो पुरुषों के साथ यौन सम्बंध बनाती हैं।
फिलहाल इस क्षेत्र के अन्य शोधकर्ता अगले परीक्षण के नतीजों की प्रतिक्षा करना चाहते हैं जो यूएस व अन्य 6 देशों में ऐसे पुरुषों पर किए जाएंगे जो अन्य पुरुषों से यौन सम्बंध रखते हैं। इस परीक्षण के परिणाम 2025 में मिलने की उम्मीद है।
वैसे तो दुनिया भर में नए एच.आई.वी. संक्रमणों (New HIV Infections) की संख्या में गिरावट आई है लेकिन राष्ट्र संघ का कहना है कि यह प्रगति धीमी पड़ गई है। उस लिहाज़ से नई औषधि महत्वपूर्ण है। हालांकि संपर्क-पूर्व रोकथाम औषधियां आज भी मौजूद हैं लेकिन उनका असर सीमित ही रहा है। कुछ औषधियां ऐसी हैं जिनकी एक गोली रोज़ाना लेनी होती है। ऐसा करना सामाजिक लांछन (Social Stigma) और प्रायवेसी के अभाव में संभव नहीं हो पाता।
एक इंजेक्शन कैबोटाग्रेविर (Cabotegravir Injection) भी उपलब्ध है जो दो महीने में एक बार दिया जाता है। इसे 2022 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) ने जोखिमग्रस्त समूहों के लिए अनुशंसित किया था। सिस-जेंडर महिलाओं में इसने गोली की तुलना में संक्रमण की रोकथाम 88 प्रतिशत दर्शाई थी।
पर्पज़-1 परीक्षण (Purpose-1 Trial) में दक्षिण अफ्रीका और यूगांडा की 2134 किशोरियों व युवा महिलाओं को हर 6 माह में लेनाकापेविर का इंजेक्शन दिया गया था। यह परीक्षण तब समाप्त कर दिया गया जब आधे सहभागियों को शामिल किए 1 वर्ष पूरा हो गया और 100 प्रतिशत सुरक्षा देखने को मिली। इसी परीक्षण के दो अन्य समूहों के 3000 सहभागियों को या तो प्रतिदिन एमट्रिसिटाबिन/टेनोफोविर (Emtricitabine/Tenofovir) की एक-एक गोली प्रतिदिन दी गई थी या इसी दवा का एक कम साइड इफेक्ट वाला संस्करण दिया गया था। इन समूहों में 50 नए एच.आई.वी. संक्रमण सामने आए जो सामान्य से बहुत कम नहीं था। ऐसे 10 प्रतिशत सहभागियों के खून की जांच से पता चला कि इन्होंने रोज़ाना एक गोली की बजाय शायद प्रति सप्ताह तीन या उससे भी कम गोलियां खाई थीं जो शायद संक्रमण का मुख्य कारण रहा।
लेनाकापेविर इंजेक्शन के माध्यम से दी जाती है और यह सवाल खड़ा है कि क्या लंबे समय तक नियमित रूप से इंजेक्शन लेते रहना आसान होगा। लेनाकापेविर इंजेक्शन त्वचा के नीचे के ऊतक में दिया जाता है। यदि सावधानीपूर्वक न दिया जाए तो यह काफी दर्दनाक हो सकता है। परीक्षण के दौरान ही (जहां बहुत सावधानी बरती जाती है) कुछ सहभागियों को इस तरह की तकलीफ हुई थी। बड़े पैमाने पर यह एक बड़ी समस्या हो सकती है। दूसरी समस्या है कि लेनाकापेविर महंगी (Expensive Drug) है, हालांकि इसके समाधान के प्रयास चल रहे हैं।
लेनाकापेविर एक नए किस्म की औषधि है। यह वायरस की जेनेटिक सामग्री के आसपास बने आवरण (कैप्सिड) से जुड़ जाती है और वायरस के जीवन चक्र को छिन्न-भिन्न कर देती है। वैसे अभी तक वायरस में इसके खिलाफ प्रतिरोध (Resistance) विकसित करने का कोई मामला सामने नहीं आया है लेकिन लंबे समय तक बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से बात अलग हो सकती है। (स्रोत फीचर्स)
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हाल ही में स्पेसएक्स कंपनी (SpaceX Company) का फाल्कन रॉकेट (Falcon Rocket) अंतरिक्ष में पर्याप्त ऊंचाई तक नहीं पहुंच सका था। तब 11 जुलाई के दिन इसके द्वारा छोड़े गए 20 स्टारलिंक उपग्रह (Starlink Satellites) यहां-वहां बिखर गए और दो दिन बाद ही वे पृथ्वी के वायुमंडल (Earth’s Atmosphere) में गिरकर भस्म हो गए।
यह तो चलो, दुर्घटना का मामला हो गया लेकिन इस तरह से उपग्रहों को उनकी कक्षा से बाहर करना उनसे निजात पाने का एक नियमित तरीका है ताकि वे अंतरिक्ष में भटकते हुए वहां मलबे (Space Debris) में इज़ाफा न करें। अब आज की स्थिति पर नज़र डालते हैं – कई अंतरिक्ष कंपनियां (Space Companies) हज़ारों उपग्रह कक्षा में स्थापित करने की योजना बना रही हैं। चिंता का विषय यह है कि जब ये उपग्रह बड़ी संख्या में अपना कार्यकाल पूरा कर लेंगे तो क्या होगा।
हाल के अनुसंधान से पता चला है कि ऐसे उपग्रहों से निकले धात्विक कण और गैसें हमारे वायुमंडल के समताप मंडल (Stratosphere) में वर्षों तक बने रह सकते हैं और शायद ओज़ोन (Ozone) के क्षय का कारण बन सकते हैं।
अभी तक उपग्रहों को ठिकाने लगाना कोई चिंता की बात नहीं थी क्योंकि ऐसे उपग्रहों की तादाद बहुत कम थी। प्रति वर्ष करीबन सौ उपग्रहों को उनकी कक्षा से बेदखल किया जाता था। समतापमंडल (Stratosphere) काफी विशाल है – यह धरती से 10 किलोमीटर से लेकर 50 किलोमीटर की ऊंचाई तक फैला है। लेकिन जब स्पेसएक्स कंपनी ने स्टारलिंक उपग्रहों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करके उन्हें अंतरिक्ष में भेजना शुरू किया, तो चिंता की स्थिति बनी। आज 6 हज़ार से भी ज़्यादा स्टारलिंक उपग्रह कक्षाओं में चक्कर लगा रहे हैं। कुल कामकाजी उपग्रहों (Operational Satellites) की संख्या तो लगभग 10,000 है। और तो और, स्पेसएक्स ने 30,000 और उपग्रह प्रक्षेपण (Satellite Launch) की अनुमति मांगी है। अन्य भी कहां पीछे रहने वाले हैं। अमेज़ॉन (Amazon) 3200 उपग्रहों के पुंज पर काम कर रहा है जबकि चीन इस अगस्त में 12,000 उपग्रह प्रक्षेपित करेगा। एक अनुमान के मुताबिक जल्दी ही उपग्रह-संचालकों (Satellite Operators) को प्रति वर्ष 10,000 उपग्रहों को ठिकाने लगाना होगा।
एक तुलनात्मक अध्ययन में लिओनार्ड शूल्ज़ और उनके साथियों ने बताया है कि फिलहाल ऐसे उपग्रहों को नष्ट करने पर जो पदार्थ पैदा होता है वह पृथ्वी पर होने वाली कुदरती उल्कापात (Meteor Showers) का मात्र 3 प्रतिशत होता है। लेकिन भविष्य में जब 75,000 उपग्रह कक्षाओं में होंगे तो यह पदार्थ उल्कापात की तुलना में 40 प्रतिशत तक हो जाएगा। एक तथ्य यह भी है कि उल्काओं की अपेक्षा उपग्रह बड़े होते हैं और धीमी गति से जलते हैं। तो उनके द्वारा जनित कणीय पदार्थ कहीं ज़्यादा होगा।
उपग्रह जब वायुमंडल में वापसी करते हैं, तो जो असर समताप मंडल पर होता है, उसकी एक झलक यूएस के नेशनल ओशिएनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) की रसायन प्रयोगशाला के डैनियल मर्फी तथा उनके साथियों ने पेश की है। नासा (NASA) के आंकड़ों के आधार पर उन्होंने बताया है कि समताप मंडल में गंधकाअम्ल (Sulfuric Acid) की महीन बूंदें तैर रही हैं जिनमें 20 अलग-अलग तत्व मौजूद हैं जो शायद उपग्रहों और रॉकेटों से आए हैं।
चिंता का मसला एल्यूमिनियम (Aluminum) है जो उपग्रहों में प्रयुक्त सबसे आम धातु होती है। यदि यह एल्यूमिनियम ऑक्साइड (Aluminum Oxide) या हायड्रॉक्साइड के रूप में तबदील हो जाए, तो यह हाइड्रोजन क्लोराइड (Hydrogen Chloride) से क्रिया करके एल्यूमिनियम क्लोराइड (Aluminum Chloride) बनाएगा। सूर्य के प्रकाश (Sunlight) के कारण एल्यूमिनियम क्लोराइड आसानी से टूटकर क्लोरीन (Chlorine) उत्पन्न कर सकता है जो ओज़ोन के लिए घातक होगी। इसके अलावा, धात्विक एयरोसॉल (Metallic Aerosols) समतापमंडल के बादलों पर आवेश पैदा कर सकते हैं जो क्लोरीन को मुक्त करके ओज़ोन को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
फिलहाल कई अन्य अनजाने असर भी सामने आ रहे हैं। जैसे उपग्रह के पुन:प्रवेश (Re-entry) पर एल्यूमिनियम के जलने की अनुकृति प्रयोगों का निष्कर्ष है कि 250 ग्राम के किसी उपग्रह के चलने पर 30 किलोग्राम एल्यूमिनियम ऑक्साइड नैनो कण (Nano Particles) पैदा होंगे। वर्ष 2022 में 2000 उपग्रहों को कक्षा से अलग किया गया था जिनमें एल्यूमिनियम ऑक्साइड का वज़न 17 टन था। इसी आधार पर देखें तो जब अंतरिक्ष में उपग्रहों के महा-नक्षत्र होंगे तो इसकी मात्रा प्रति वर्ष 360 टन आंकी जा सकती है।
उपग्रहों की बढ़ती संख्या की वजह से कई पर्यावरणीय असर (Environmental Impact) हो सकते हैं। इसके मद्देनज़र विचार करने की ज़रूरत है। जैसे इस बात पर विचार हो सकता है कि उपग्रह किन पदार्थों से बनाए जाएं या यह भी सोचा जा सकता है कि क्या कक्षा में सर्विसिंग (Satellite Servicing) या मरम्मत करके या ईंधन की व्यवस्था करके उपग्रहों का जीवनकाल बढ़ाया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)
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नासा (NASA) ने घोषणा की है कि उसके परसेवरेंस रोवर (Perseverance Rover) द्वारा मंगल ग्रह (Mars) पर खोजी गई एक चट्टान पर ऐसे चिंह मिले हैं जो इस बात के प्रमाण हो सकते हैं कि मंगल पर अतीत में कभी सूक्ष्मजीवी जीवन (Microbial Life) रहा होगा। नासा के मुताबिक यह चट्टान इस बात का स्पष्ट प्रमाण देती है कि कभी यहां पानी (Water), कार्बनिक पदार्थ (Organic Matter) थे और ऐसी अभिक्रियाएं हुई थीं जो ऊर्जा का स्रोत हो सकती हैं।
लेकिन…जी हां लेकिन। इस निष्कर्ष को लेकर कई अगर-मगर हैं और सभी वैज्ञानिक इससे सहमत नहीं हैं। कइयों का तो कहना है कि मंगल की खोजबीन (Mars Exploration) के इतिहास में ऐसे कई ‘रोमांचक’ क्षण आए और गए हैं। ऐसी सबसे मशहूर चट्टान एलन हिल्स 84001 (Allan Hills 84001) रही है। यह दरअसल अंटार्कटिका में खोजी गई एक उल्का (Meteorite) थी। 1996 में साइंस पत्रिका में शोधकर्ताओं ने दावा किया था कि इसमें बैक्टीरिया के नैनो-जीवाश्म (Nano-Fossils) मौजूद थे। अलबत्ता, आज अधिकांश शोधकर्ता मानते हैं कि इस पर मिली ‘जीवाश्मनुमा’ रचनाएं जीवन के बगैर भी बन सकती हैं। इसी प्रकार का शोरगुल तब भी मचा था जब मार्स रोवर (Mars Rover) ने गेल क्रेटर (Gale Crater) में तमाम किस्म के कार्बनिक अणु (Organic Molecules) खोज निकाले थे। मार्स रोवर पर एक रासायनिक प्रयोगशाला भी थी।
लेकिन परसेवरेंस पर ऐसी कोई प्रयोगशाला नहीं है। वह जो भी चट्टानी नमूने (Rock Samples) खोदता है उन्हें एक कैप्सूल में भरकर जमा करता रहता है, जिन्हें बाद में मार्स सैम्पल रिटर्न मिशन (Mars Sample Return Mission) द्वारा पृथ्वी पर भेजा जाएगा। फिलहाल वह मिशन टल गया है। तो बगैर प्रयोगशाला के, महज़ चेयावा फॉल्स (Jezero Crater) से खोदी गई चट्टान के अवलोकनों के आधार पर सारा हो-हल्ला है। माना जा रहा है कि इस स्थान पर कभी कोई नदी (River) बहती थी। उसके साथ आई गाद ही अश्मीभूत हो गई है। इस चट्टान में कैल्शियम सल्फेट (Calcium Sulfate) से बनी शिराओं के बीच-बीच में चकत्ते हैं जैसे तेंदुओं की खाल पर होते हैं। नासा से जुड़े वैज्ञानिकों का मत है कि ये चकत्ते ऐसी रासायानिक अभिक्रियाओं के संकेत हैं जो धरती पर सूक्ष्मजीवों को ऊर्जा मुहैया कराती हैं।
रोवर पर लगे स्कैनर से चट्टान में कार्बनिक यौगिकों (Organic Compounds) की उपस्थिति का भी पता चला है। यह तो सही है कि ऐसे कार्बन यौगिक (Carbon Compounds) जीवन की अनिवार्य निर्माण इकाइयां होते हैं लेकिन ये गैर-जैविक प्रक्रियाओं से भी बन सकते हैं। सबसे रहस्यमयी तो तेंदुआ चकत्ते हैं – इन मिलीमीटर साइज़ के चकत्तों में फॉस्फोरस (Phosphorus) व लौह (Iron) पाए गए हैं। पृथ्वी पर ऐसे चकत्ते तब बनते हैं जब कार्बनिक पदार्थ जंग लगे लोहे से क्रिया करते हैं। यह क्रिया सूक्ष्मजीवों को ऊर्जा प्रदान कर सकती है। लेकिन इस तथ्य की अन्य व्याख्याएं भी हैं। जैसे चट्टान में पाए गए खनिज यह भी दर्शाते हैं कि यह ज्वालामुखी के लावा (Volcanic Lava) से बनी हैं और लावा का उच्च तापमान किसी जीवन को पनपने नहीं देगा।
बहरहाल, परसेवरेंस अब तक 22 चट्टानें इकट्ठी कर चुका है। इनमें से कई में ऐसे पदार्थ मिले हैं जो पृथ्वी पर सूक्ष्मजीवों को सहारा दे सकते हैं। लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या ये नमूने पृथ्वी पर पहुंच पाएंगे क्योंकि यह काम बहुत महंगा (Expensive) है। कुछ लोगों का तो कहना है कि यह सारा हो-हल्ला फंडिंग (Funding) जारी रखने के लिए है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.nasa.gov/wp-content/uploads/2024/07/1-pia26368-perseverance-finds-a-rock-with-16×9-1.jpg?resize=1024,576
यूएस में जनगणना हर 10 वर्ष में होती है। इसमें नागरिकों को यह आश्वासन दिया जाता है कि उनसे सम्बंधित आंकड़े गोपनीय (confidential) रहेंगे। लेकिन यह आश्वासन रस्सी पर चलने जैसा होता है – जितनी सशक्त प्रायवेसी (privacy) होगी, आंकड़ों की सटीकता (accuracy) उतनी ही कम होती जाएगी।
इनके बीच संतुलन बनाना विवाद का विषय बन गया है। आंकड़ों को अनाम बनाए रखने के लिए जिस तकनीक का उपयोग प्रस्तावित है, वह है डिफरेंशियल प्रायवेसी (differential privacy) और इसी के समर्थकों और विरोधियों के बीच विवाद चल रहा है। विरोधियों का मत है कि डिफरेंशियल प्रायवेसी जैसी तकनीक से महत्वपूर्ण आंकड़ों की विश्वसनीयता (reliability) प्रभावित हो सकती है। तो पहले यह देखते हैं कि डिफरेंशियल प्रायवेसी क्या है और कैसे काम करती है। इसे समझने के लिए हम टेक कंपनियों (tech companies) का उदाहरण लेंगे। ये कंपनियां अपने मकसद से उपयोगकर्ताओं की जानकारी एकत्रित करने के लिए मशहूर हैं।
आजकल ये कंपनियां अपने उत्पादों और सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए हमसे मिली जानकारी का अधिकाधिक उपयोग कर रही हैं। कंपनी के दृष्टिकोण से देखें तो यह काफी मददगार होता है। लेकिन उपभोक्ता की नज़र से देखें तो यह खतरनाक हो सकता है। उपभोक्ता का वैसे भी इस बात पर कोई नियंत्रण नहीं होता कि किस तरह की जानकारी जुटाई जा रही है। समस्या तब आएगी जब इन कंपनियों पर कोई सायबर हमला (cyber attack) सफल हो जाए और सारी संग्रहित सूचनाएं लीक हो जाएं। हाल ही में सोनी कंपनी के साथ ऐसा हो चुका है।
अर्थात उपभोक्ताओं और कंपनियों के बीच हितों का टकराव है। हितों के इसी टकराव के चलते डिफरेंशियल प्रायवेसी तकनीक का विकास हुआ है। डिफरेंशियल प्रायवेसी के चलते यह संभव हुआ है कि कंपनियां सूचनाएं एकत्रित करती रहें और उपभोक्ता की प्रायवेसी का उल्लंघन भी न हो। आप सोच रहे होंगे कि इतना सब तामझाम करने की बजाय हम सारे आंकड़ों को अनाम (anonymize) बनाकर काम क्यों नहीं चला सकते।
आंकड़ों के अनामीकरण का उपयोग उद्योगों में किया जाता रहा है, और यह सोचना सही है कि हम उपयोगकर्ताओं के आंकड़ों को पूरी तरह अनामीकृत कर सकते हैं। इसके लिए करना यह होगा कि हर आंकड़े में से व्यक्ति की पहचान करने वाले चिन्हों (आइडेंटिफायर्स) को हटा दिया जाए। आइडेंटिफायर सूचना के वे अंश होते हैं जिनकी मदद से यह पहचाना जा सकता है कि वह सूचना किस व्यक्ति-विशेष की है। अलबत्ता, आंकड़ा अनामीकरण की अपनी समस्याएं हैं।
एक बड़ी समस्या यह है कि अनामीकरण की प्रक्रिया कंपनी के सर्वर (servers) पर की जाती है और यह कहना मुश्किल है कि इन सर्वर्स पर कितना भरोसा करें। और फिर यह मुद्दा भी है कि अनामीकरण में कम-ज़्यादा का क्या अर्थ होता है।
वर्ष 2006 में नेटफ्लिक्स (Netflix) ने नेटफ्लिक्स प्राइज़ नामक एक पुरस्कार की शुरुआत की थी। इस पुरस्कार के लिए विभिन्न टीम्स को एक एल्गोरिद्म (algorithm) का निर्माण करना था जो यह भविष्यवाणी कर सके कि कोई व्यक्ति किसी फिल्म की क्या रेंटिंग करेगा। इसमें मदद के लिए नेटफ्लिक्स ने एक डैटासेट उपलब्ध कराया था जिसमें 1700 फिल्मों के 10 करोड़ रेंटिंग्स दिए गए थे। ये रेटिंग्स 4,80,000 उपयोगकर्ताओं से प्राप्त हुए थे।
नेटफ्लिक्स ने आंकड़ा अनामीकरण की उपरोक्त प्रक्रिया की मदद ली थी। इसके तहत हर आंकड़े में से उपयोगकर्ता का नाम हटा दिया गया था और कुछ रेंटिंग की जगह झूठे रेंटिंग्स डाल दिए गए थे। लगता तो है कि आंकड़े काफी अनामीकृत हैं लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। टेक्सास विश्वविद्यालय के दो कंप्यूटर वैज्ञानिकों – अरविंद नारायणन और विताली श्मतिकोव ने एक शोध पत्र में दावा किया था कि उन्होंने उपरोक्त ‘अनामीकृत’ आंकड़ों को इंटरनेट मूवी डैटाबेस (IMDb) के साधारण आंकड़ों के साथ जोड़कर देखा तो वे एक-एक व्यक्ति को पहचान पाए थे। IMDb डैटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है।
इस तरह के हमले को लिंकेज अटैक (linkage attack) कहते हैं और यहां तथाकथित अनामीकृत आंकड़ों को गैर-अनामीकृत आंकड़ों के साथ जोड़कर व्यक्ति की पहचान उजागर की जा सकती है।
ऐसा ही एक अन्य उदाहरण है जो ज़्यादा परेशान करने वाला है। यह उदाहरण है गवर्नर विलियम वेल्ड का। 1990 के दशक में अमेरिका सरकार के समूह बीमा आयोग ने तय किया कि वह सरकारी कर्मचारियों के अस्पताल जाने से सम्बंधित आंकड़े सार्वजनिक कर देगा। आयोग ने आंकड़ों को अनामीकृत करने के लिए उनमें से व्यक्ति के नाम, पते तथा अन्य पहचान चिन्ह हटा दिए थे।
एक कंप्यूटर वैज्ञानिक नातन्या स्वीनी (Natanya Sweeney) ने यह दर्शाने का निर्णय लिया कि अनामीकरण की इस प्रक्रिया को उलटना कितना आसान है। उन्होंने उपरोक्त प्रकाशित स्वास्थ्य रिकॉर्ड को वोटर रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड (voter registration records) के साथ जोड़कर देखा। उन्होंने पाया कि इस डैटा में मात्र एक व्यक्ति ऐसा था जिसके निवास का ज़िप कोड, जिसका जेंडर और जिसकी जन्म तिथि गवर्नर से मेल खाते थे। इस तरह गवर्नर वेल्ड का स्वास्थ्य रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उजागर हो गया था।
अपने अगले शोध पत्र में स्वीनी ने दावा किया कि 87 प्रतिशत अमरीकियों को मात्र तीन जानकारियों के आधार पर पहचाना जा सकता है: ज़िप कोड, जन्म तिथि और जेंडर।
स्पष्ट है कि आंकड़ा अनामीकरण उतना अनामीकारक नहीं है, जितना हम सोचते हैं। और यहीं डिफरेंशियल प्रायवेसी का प्रवेश होता है। डिफरेंशियल प्रायवेसी का एक फायदा यह बताया जाता है कि इसकी मदद से उपरोक्त किस्म के सायबर हमलों को नाकाम किया जा सकता है। इसे समझने के लिए हम एक अजीबोगरीब उदाहरण का सहारा लेंगे। जैसे, यह पता करना है कि कितने लोग नाक में उंगली डालते रहते हैं।
हम एक सर्वेक्षण करते हैं जिसमें मात्र एक सवाल पूछा गया है:
“क्या आप अपनी नाक में उंगली डालते हैं?
क – हां
ख – नहीं।”
इस सवाल के जो भी उत्तर मिलेंगे, उन्हें हम एक सर्वर पर संग्रहित कर लेंगे। लेकिन इसमें हम वास्तविक उत्तर को रिकॉर्ड करने की बजाय उसमें कुछ शोरगुल (नॉइज़) जोड़ देंगे।
मान लीजिए, सर्वेक्षण के एक उत्तरदाता अनीष का जवाब है ‘हां’। यहां डिफरेंशियल प्रायवेसी का एल्गोरिद्म यह है कि एक सिक्का उछाला जाएगा। यदि सिक्का चित गिरता है तो यह एल्गोरिद्म अनीष का वास्तविक जवाब सर्वर को भेज देगा। लेकिन यदि पट आता है तो सिक्का फिर से उछाला जाएगा। इस बार यदि चित आता है तो उत्तर के रूप में ‘नहीं’ भेजा जाएगा और पट आने पर वास्तविक उत्तर सर्वर में जाएगा।
ध्यान रखें कि डिफरेंशियल प्रायवेसी का एल्गोरिद्म चित-पट पर आधारित नहीं बल्कि कहीं अधिक जटिल हो सकता है। कुल मिलाकर एल्गोरिद्म आंकड़ों में नॉइज़ जोड़ने का काम करता है।
सर्वर पर जो आंकड़े आते हैं उनमें यह नॉइज़ शामिल होता है और इसलिए हम एक-एक व्यक्ति की सूचना प्राप्त नहीं कर सकते। हो सकता है कि अनीष का जवाब ‘हां’ रहा हो लेकिन रिकॉर्ड में वह ‘नहीं’ लिखा जाएगा। दरअसल लगभग 25 प्रतिशत संभावना है कि हमारा व्यक्तिगत आंकड़ा गलत होगा। यानी आप किसी व्यक्ति के जवाब को लेकर यकीनी तौर पर कुछ नहीं कह सकते और इस वजह से आप व्यक्तियों को लेकर फैसले नहीं सुना सकते। यह बात खास तौर पर अवैध या प्रतिबंधित गतिविधियों के बारे में महत्वपूर्ण है।
चूंकि आपको पता होता है कि नॉइज़ किस तरह से शामिल किया गया है और कैसे आंकड़ों में वितरित है, तो आप इसकी भरपाई करके काफी सटीकता से यह पता लगा सकते हैं कि किसी आबादी में कितने लोग नाक में उंगली डालते हैं, हालांकि एक-एक व्यक्ति के बारे में कुछ नहीं कह पाएंगे।
हमने अपने उदाहरण को सरल रखने के लिए सिक्का उछालने वाला एल्गोरिद्म लिया था, लेकिन वास्तव में डिफरेंशियल प्रायवेसी के एल्गोरिद्म में लाप्लेस वितरण का उपयोग किया जाता है। इस एल्गोरिद्म की मदद से आंकड़ों को एक बड़े परास में फैला दिया जाता है जिससे अनामीकरण में वृद्धि होती है।
डिफरेंशियल प्रायवेसी के इस संक्षिप्त परिचय के आधार पर हम समझ सकते हैं कि इस तकनीक की खूबी यह है कि यह व्यक्तिगत सूचना की प्रायवेसी सुनिश्चित करती है जबकि उस डैटासेट के समग्र परिणामों पर कोई असर नहीं डालती। अर्थात चाहे डिफरेंशियल प्रायवेसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाए या न किया जाए, अंतिम परिणाम समान रहेगा।
लेकिन इसके साथ दिक्कत यह है कि इसका क्रियांवयन बहुत पेचीदा होता है और इसे आंकड़ों के विशाल भंडार पर ही लागू किया सकता है। तभी आंकड़ों की सटीकता से समझौता किए बगैर इसका उपयोग किया जा सकता है।
इसकी एक और कमज़ोरी यह है कि कतिपय संवेदनशील मामलों में आंकड़ों की सटीकता तो महत्वपूर्ण होती ही है, साथ में उन आंकड़ों से जुड़े नैतिक मूल्य भी महत्वपूर्ण होते हैं। जैसे, मतदाता आंकड़ों में नॉइज़ जोड़ना स्वीकार्य नहीं हो सकता, हालांकि अंतिम परिणाम शायद एक से हों। ऐसे मामलों में डिफरेंशियल प्रायवेसी शायद सर्वोत्तम विधि न हो। अब देखते हैं कि यूएस जनगणना के संदर्भ मे गोपनीयता बनाम सटीकता की बहस क्या है।
यूएसजनगणना
हर दशक में की जाने वाली जनगणना के दौरान नागरिकों को आश्वस्त किया जाता है कि उनके द्वारा दिए गए जवाब गोपनीय रहेंगे अर्थात कोई नहीं जान पाएगा किसी व्यक्ति-विशेष ने क्या जवाब दिए थे। लेकिन यूएस सेंसस ब्यूरो के इस आश्वासन में एक अगर-मगर जुड़ा है। बहुत सशक्त गोपनीयता आंकड़ों की सटीकता को कम कर सकती है। यह मुद्दा खास तौर से इसलिए महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि सरकार ने 2020 की जनगणना में गोपनीयता-सुरक्षा की नई विधि शामिल की। इसकी वजह से जनांकिकीविदों के बीच यह चिंता फैली कि इसकी वजह से डैटा में घटियापन बढ़ेगा। जनगणना से प्राप्त डैटा अकादमिक अनुसंधान, संसदीय क्षेत्रों के निर्धारण और संघीय बजट के आवंटन की दृष्टि से महत्व रखता है। पुरानी विधि बनाम नई विधि के बीच बहस चलती रही, जब तक कि साइन्सएडवांसेस नामक शोध पत्रिका में एक अध्ययन प्रकाशित न हो गया। इस अध्ययन ने उपरोक्त चिंताओं के संदर्भ में स्वतंत्र आंकड़े प्रस्तुत किए। विशेषज्ञों का मत है कि इस पर्चे के निष्कर्ष 2030 की यूएस जनगणना में संशोधन करके मताधिकार सम्बंधी कानूनी मुद्दों को प्रभावित करेंगे।
जनगणना के आंकड़े शोधकर्ताओं और सरकार दोनों को देश में हो रहे जनांनिक परिवर्तनों को समझने में मदद करते हैं। ये आंकड़े सरकार को स्वास्थ्य, पोषण, आवास तथा इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी चीज़ों को लेकर नियोजन में भी मदद करते हैं। यूएस जनगणना का प्रमुख संवैधानिक कारण यह है कि इसके आधार पर यूएस संसद में प्रांतवार सीटों का आवंटन किया जाता है। इसके लिए ज़रूरी होता है कि आपके पास सबसे छोटी मतदान इकाई तक के आंकड़े उपलब्ध हों ताकि वोटिंग राइट्स एक्ट, 1965 का समुचित क्रियांवयन हो सके।
जनांकिकीविद काफी समय से आंकड़ों की सटीकता और गोपनीयता के बीच संतुलन के महत्व को जानते आए हैं। उन्होंने 1990, 2000 और 2010 में इस्तेमाल की गई विधि के कारण उत्पन्न विकृतियों से तालमेल बनाना सीख लिया था। इन तीनों जनगणनाओं में जिस विधि का सहारा लिया गया था उसे अदला-बदली (swapping) कहते हैं।
साइन्स में एक लेख प्रकाशित हुआ है: “यूएस में गोपनीयता के नाम पर जनगणना के आंकड़ों को पर्दे में रखने का एक नया तरीका आया है। यह सटीकता को कैसे प्रभावित करेगा?” इसमें अलग-अलग जनगणना ब्लॉक्स के बाशिंदों के उम्र, नस्ल, जनजातीयता और पारिवारिक गुणधर्मों सम्बंधी जवाबों की परस्पर अदला-बदली की जाएगी ताकि उनकी गोपनीयता बनी रहे। ऐसे ब्लॉक्स की संख्या लगभग 1.1 करोड़ है और प्रत्येक की औसत आबादी 23 व्यक्ति है। इसके बाद इनके आंकड़ों को ज़्यादा बड़े क्षेत्र के डैटा के रूप में समेकित कर दिया जाएगा। शोधकर्ताओं का मत है कि ऐसी अदला-बदली उन व्यक्तियों को निशाना बनाती है, जिनके जनांकिक लक्षण निराले हैं और इनकी पहचान ज़्यादा आसानी से की जा सकती है। वैसे सेंसस ब्यूरो ने यह नहीं बताया है कि उसने इस विधि का उपयोग कितनी अधिक बार किया है।
2020 की जनगणना के संदर्भ में अधिकारियों ने माना कि अदला-बदली गोपनीयता सुनिश्चित करने की दृष्टि से पर्याप्त नहीं है। अधिकारियों को लगता था कि कोई ज़िद्दी हैकर सेंसस के आंकड़ों को अन्य सार्वजनिक सूचनाओं के साथ जोड़कर व्यक्तियों की पहचान कर सकता है। जिसे हम पहले ही लिंकेज अटैक के रूप में परिभाषित कर चुके हैं।
लिहाज़ा, सेंसस ब्यूरो ने पूर्ण गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए अदला-बदली के स्थान पर डिफरेंशियल प्रायवेसी को अपनाया है। इस तरीके में आंकड़ों में सांख्यिकीय नॉइज़ जोड़ दिया जाता है; अधिक संवेदनशील आंकड़ों में अधिक नॉइज़ डाला जाता है।
डिफरेंशियल प्रायवेसी का आंकड़ों की गुणवत्ता पर क्या असर होगा? इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं के एक समूह ने सेंसस ब्यूरो से निवेदन किया कि वह 2020 की जनगणना की नॉइज़युक्त मापन फाइल जारी कर दे। इस फाइल में मूल आंकड़ों पर डिफरेंशियल प्रायवेसी एल्गोरिद्म लागू करने के बाद के आंकड़े होते हैं।
काफी जद्दोजहद के बाद ब्यूरो ने 2010 की वह फाइल उपलब्ध करवाई जिसमें अदला-बदली का इस्तेमाल किया गया था और साथ ही वह फाइल दी जिसमें प्रायोगिक तौर पर 2010 के आंकड़ों पर डिफरेंशियल प्रायवेसी लागू की गई थी।
इन फाइलों का विश्लेषण करके हारवर्ड, न्यूयॉर्क और येल विश्वविद्यालय के शोधकर्ता यह तुलना कर पाए कि इन दो तरीकों का आंकड़ों की सटीकता पर क्या असर होता है। अध्ययन का नतीजा था कि डिफरेंशियल प्रायवेसी और अदला-बदली दोनों ही बड़ी आबादी (जैसे समूचे प्रांत) के संदर्भ में आंकड़ों की सटीकता बनाए रखने में बराबर कारगर हैं। लेकिन सेंसस ब्लॉक जैसी छोटी भौगोलिक इकाइयों के मामले में डिफरेंशियल प्रायवेसी ज़्यादा त्रुटियों को जन्म देती है। ये त्रुटियां खास तौर से हिस्पेनिक तथा बहु-नस्लीय आबादियों के लिए ज़्यादा होती हैं। कई बार तो त्रुटि का परिमाण किसी समूह की कुल आबादी से भी अधिक होता है। जैसे, तीन हिस्पेनिक बाशिंदों वाले ब्लॉक में डिफरेंशियल प्रायवेसी द्वारा शामिल किए गए शोर की वजह से हो सकता है कि बाशिंदों की संख्या शून्य हो जाए या छ: हो जाए।
एक मायने में अदला-बदली और डिफरेंशियल प्रायवेसी के बीच का अंतर दरअसल ब्लॉक स्तर पर नज़र आने लगता है। यह अंतर इन दो विधियों के एक मूल अंतर में निहित है। अदला-बदली के अंतर्गत किसी भी ब्लॉक की कुल और मतदान उम्र की आबादी को वैसा ही रखा जाता है। अर्थात यदि किसी ब्लॉक की जनसंख्या 23 है, तो अदला-बदली के बाद भी 23 ही रहेगी। इसके विपरीत डिफरेंशियल प्रायवेसी में ऐसी कोई गारंटी नहीं होती। इसमें जोड़ा गया नॉइज़ कुल जनसंख्या में भी परिवर्तन कर सकता है और कभी-कभी तो असंभव से आंकड़े निकल सकते हैं – जैसे बाशिंदों की ऋणात्मक संख्या या बगैर वयस्क के रह रहे बच्चे, या किसी ब्लॉक में मकान की अनुपस्थिति।
इस तरह की विसंगतियों से बचने के लिए सेंसस अधिकारी आंकड़े जारी करने से पहले इन विचित्र स्थितियों को समायोजित करते हैं। अलबत्ता, सुधार की यह प्रक्रिया नई विकृतियां पैदा कर सकती है।
बहरहाल, डिफरेंशियल प्रायवेसी बेतरतीब नॉइज़ जोड़कर बेहतर नतीजे देती है, खास तौर से इसलिए कि इस नॉइज़ के सांख्यिकीय गुणधर्म सुस्पष्ट होते हैं। इसके चलते विकृतियों को संभालना अपेक्षाकृत आसान होता है जबकि अदला-बदली विधि में विकृतियां बहुत बेतरतीब होती हैं। लेकिन कुछ शोधकर्ताओं का मत है कि यदि ऋणात्मक आंकड़ों को शून्य में तबदील कर दिया जाता है तो यह एक बड़ा नुकसान है।
यूएस सेंसस ब्यूरो 2030 की जनगणना की तैयारी कर रहा है। ऐसे में उपरोक्त निष्कर्ष डैटा की सटीकता और प्रायवेसी सुरक्षा की विधियों पर विचार-विमर्श की ज़रूरत को रेखांकित करते हैं। एक तरीका यह हो सकता है कि सेंसस ब्यूरो थोड़े कम विस्तृत आंकड़े जारी करे। इसमें अनावश्यक रूप से सांख्यिकीय त्रुटियां जोड़ना नहीं पड़ेगा। लेकिन डैटा की बारीकियां सीमित करने से शोधकर्ताओं के लिए जनांकिक परिवर्तनों का विश्लेषण करना मुश्किल होगा और नीतिगत निर्णय प्रक्रिया भी बाधित होगी।
एक महत्वपूर्ण असर यह होगा कि विभिन्न सर्वेक्षण कार्य बाधित होंगे। किसी भी आबादी के प्रतिनिधिमूलक नमूने चुनने के लिए विस्तृत आंकड़े एक अनिवार्यता होती है। इन्हीं के आधार पर तय होता है कि क्या कोई नमूना समूची आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। और ऐसे अध्ययनों के दम पर सार्वजनिक नीतियों, आर्थिक नियोजन, सामाजिक कार्यक्रमों वगैरह का मार्गदर्शन होता है।
तो हमारे सामने डैटा की प्रायवेसी सुनिश्चित करने और सटीकता अक्षुण्ण रखने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। उपरोक्त कारणों से इनके बीच संतुलन काफी महत्वपूर्ण है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://miro.medium.com/v2/resize:fit:786/format:webp/1*ZIHUABQCdmkT0bv6yx6oTw.png