क्या कीटनाशकों से बढ़ रहा मधुमेह का खतरा?

क्रिय जीवनशैली (active lifestyle)  और छरहरी काया वाले किसी किसान को टाइप-2 डायबिटीज़ हो जाए, हैरानी स्वाभाविक है। वजह अभी साफ नहीं है, लेकिन खेतों में रोज़ाना कीटनाशकों से संपर्क (pesticide exposure) को एक संदिग्ध कारण मानते हुए कुछ शोध कार्य हुए हैं।

दुनिया भर में कीटनाशकों का इस्तेमाल बहुत तेज़ी से बढ़ा है और अब हर साल इनका उपयोग लाखों टन है। प्राय: वैज्ञानिक इनके असर को सिर्फ तात्कालिक नुकसान (ज़हर या मस्तिष्क पर असर) तक ही देखते थे। अब समझा जा रहा है कि ये रसायन हमारे शरीर के सूक्ष्मजीवों (microbiome impact) को कैसे प्रभावित करते हैं, जिसके दीर्घकालिक असर हो सकते हैं।

उदर का सूक्ष्मजीव संसार (gut microbiome) हमारे शरीर में मौजूद लाखों-करोड़ों सूक्ष्मजीवों का एक जटिल समूह है, जो पाचन, रोग प्रतिरोधक क्षमता और शरीर के चयापचय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें होने वाले बदलाव मधुमेह (diabetes risk)  और मानसिक समस्याओं को जन्म दे सकते हैं। हाल के शोध यह भी बताते हैं कि कीटनाशक इस संतुलन को बिगाड़ सकते हैं।

दक्षिण भारत के एक अध्ययन में एक दिलचस्प बात सामने आई। शहरों में डायबिटीज़ का सम्बंध मोटापे जैसे आम कारणों से दिखता है, लेकिन गांवों में बिना इन कारणों के भी मधुमेह के मामले काफी ज़्यादा थे। वैज्ञानिकों को लगा कि शायद पर्यावरण से जुड़े कारक (environmental factors) – जैसे कीटनाशक – इसमें भूमिका निभा रहे होंगे।

इसको और समझने के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों पर एक आम कीटनाशक (क्लोरपायरीफॉस) (chlorpyrifos pesticide) के साथ प्रयोग किया। उन्होंने थोड़े समय के लिए अधिक मात्रा देने की बजाय, कई महीनों तक कम मात्रा में देकर इसका असर देखा, जैसा कि असल जीवन में होता है। नतीजे चौंकाने वाले थे – कीटनाशक ने उदर के सूक्ष्मजीव संसार (gut bacteria imbalance) को बदल दिया; अच्छे बैक्टीरिया कम हो गए और हानिकारक बैक्टीरिया बढ़ गए। इसके साथ ही चूहों में रक्त शर्करा बढ़ गई और मधुमेह जैसे लक्षण दिखने लगे, जबकि उनके वज़न में कोई वृद्धि नहीं हुई थी।

आगे के अध्ययन (scientific findings) से यह भी संकेत मिला कि जब आंत के सूक्ष्मजीव इन कीटनाशकों को तोड़ते हैं, तो ऐसे पदार्थ बनते हैं जो लीवर में ग्लूकोज़ बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। जिससे रक्त शर्करा बढ़ सकती है।

अन्य अध्ययनों से यह भी पता चला है कि कीटनाशक सिर्फ आंत में मौजूद बैक्टीरिया की संख्या ही नहीं बदलते, बल्कि उनके काम करने के तरीके (microbial function) को भी प्रभावित करते हैं। जब इन बैक्टीरिया को अलग-अलग कीटनाशकों के संपर्क में रखा गया, तो यह देखा गया कि वे उन ज़रूरी पदार्थों का उत्पादन बदल देते हैं जो आंत की सेहत, शोथ को नियंत्रित करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने में मदद करते हैं। कुछ बैक्टीरिया तो इन कीटनाशकों को अपने अंदर जमा (bioaccumulation) भी कर लेते हैं, जिससे शरीर में उनका असर लंबे समय तक बना रह सकता है।

इन बदलावों का असर काफी दूर तक जा सकता है। हमारी आंत और मस्तिष्क के बीच एक सम्बंध (gut brain axis) होता है, जिसे ‘गट–ब्रेन एक्सिस’ कहा जाता है। अगर इसके कामकाज में गड़बड़ी आती है, तो यह हमारे मूड, व्यवहार और मस्तिष्क की सेहत को प्रभावित कर सकता है। जंतुओं पर किए गए कुछ अध्ययनों में यह भी देखा गया है कि कीटनाशकों के संपर्क से अवसाद जैसे लक्षण (depression symptoms) उभर सकते हैं।

हालांकि ये नतीजे महत्वपूर्ण हैं, वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्यों में इनके पुख्ता सबूत (human studies) अभी नहीं मिले हैं। आंतों का सूक्ष्मजीव-संसार खान-पान, जीवनशैली और जीन्स से प्रभावित होता है, इसलिए यह तय करना मुश्किल है कि कीटनाशकों का असर कितना है। इसके अलावा, लोग लंबे समय तक कई तरह के रसायनों के संपर्क (chemical exposure) में रहते हैं, जिससे साफ निष्कर्ष निकालना और कठिन हो जाता है।

फिर भी, शुरुआती मानव अध्ययनों (early research evidence) से कुछ संकेत मिलते हैं। एक अध्ययन में सभी लोगों के शरीर में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए, खासकर उन लोगों में जो ज़्यादा फल और सब्ज़ियां (fruit vegetable intake) खाते थे। इन अवशेषों का सम्बंध आंतों के सूक्ष्मजीव-संसार में बदलाव से भी देखा गया। इस संदर्भ में और शोध ज़रूरी है।

एक बड़ा सवाल अभी भी बाकी है – क्या सूक्ष्मजीव-संसार को पहुंचे नुकसान को फिर से ठीक किया जा सकता है? लोग अक्सर सोचते हैं कि प्रोबायोटिक्स (probiotics benefits) या खान-पान बदलकर इसे ठीक किया जा सकता है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि आंतों का सूक्ष्मजीव-संसार बहुत जटिल (complex microbiome) होता है और इसे आसानी से बहाल करना संभव नहीं है।

फिलहाल विशेषज्ञ यही सलाह देते हैं कि कीटनाशकों से संपर्क कम से कम (reduce pesticide exposure) किया जाए। इसके लिए खेती के तरीकों में बदलाव (sustainable farming), खाने की आदतों में सुधार या सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं। लेकिन खासकर किसानों के लिए इससे पूरी तरह बचना आसान नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.ztfhacd/full/_20260409_nid_pesticides_gut.jpg

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