इमारतों और प्रकृति के बीच तालमेल

वन लोगों को सुरक्षित आवास (safe housing) देने के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन सच तो यह है कि आजकल जिस ढंग से इनका निर्माण व प्रबंधन किया जाता है, वह अक्सर पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुंचाता है। निर्माण कार्य से कार्बन उत्सर्जन (carbon emissions), जल प्रदूषण (water pollution) और कचरा उत्पन्न होता है। विश्व के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और कचरे का लगभग एक-तिहाई हिस्सा निर्माण कार्य से आता है। इससे यह स्पष्ट है कि हमारे लिए विकास की परिभाषा में प्रकृति शामिल ही नहीं है। हम प्रकृति को एक असीम संसाधन और कूड़ागाह की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी असंतुलन के कारण पर्यावरण को नुकसान और स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम (environmental health risks) बढ़ रहे हैं।

इस समस्या के समाधान के लिए अब केवल ‘टिकाऊ’ यानी नुकसान कम करने की सोच (sustainable development) से आगे बढ़कर ‘रीजनरेटिव डिज़ाइन’ की बात हो रही है। इसका मकसद ऐसे भवन और शहर बनाना है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की बजाय उसे सुधारें। यानी सिर्फ संसाधनों का कम इस्तेमाल नहीं, बल्कि प्राकृतिक चक्रों को फिर से मज़बूत करना, जैव विविधता बढ़ाना और पर्यावरण को स्वस्थ बनाना इसका लक्ष्य है। यह सोच प्रकृति से प्रेरित (nature inspired design)  है, जहां हर चीज़ संतुलन में रहती है और संसाधनों का बार-बार उपयोग होता है।

शहर एक जीवित तंत्र

रीजनरेटिव डिज़ाइन का एक अहम विचार यह है कि शहरों को एक जीवित तंत्र (urban ecosystem) की तरह देखा जाए। जैसे प्रकृति में एक ही समय पर कई काम होते हैं – पानी साफ करना, ऑक्सीजन बनाना, कार्बन थामना और जीवों को आश्रय देना – वैसे ही शहरों को भी इस तरह डिज़ाइन किया जा सकता है कि वे ये सब काम एक साथ कर सकें। इसके लिए योजनाकार किसी क्षेत्र के प्राकृतिक तंत्र (ecological planning) के काम करने के काम तरीके को समझकर उसके अनुसार शहर को विकसित करने की कोशिश कर सकते हैं।

इसका मतलब है कि हर क्षेत्र के शहर के लिए अलग-अलग तरीके (climate responsive design) अपनाए जाएं। जैसे ठंडे इलाकों में शहरों में ज़्यादा पेड़ लगाए जा सकते हैं ताकि हवा साफ हो और वायुमंडलीय कार्बन में कमी आए। वहीं सूखे इलाकों में ऐसे पौधे लगाए जा सकते हैं जो कम पानी में भी जीवित रह सकते हैं।

प्रकृति ने बदले शहर

दुनिया के कई उदाहरण (urban design examples) दिखाते हैं कि प्रकृति से प्रेरित डिज़ाइन शहरों को बेहतर बना सकती हैं। दक्षिण कोरिया के सियोल में एक बड़ी सड़क हटाकर उसके नीचे छिपी नदी को फिर से जीवित किया गया, जिससे शहर में एक हरा-भरा क्षेत्र बना। इससे न सिर्फ पर्यावरण सुधरा, बल्कि शहर का तापमान और ट्रैफिक भी कम हुआ। इसी तरह चीन में स्पंज सिटी मॉडल (sponge city concept) अपनाया गया, जहां पार्क, झीलें और ऐसी सतहें बनाई गईं जो बारिश का पानी सोख लेती हैं और बाढ़ रोकती हैं। इससे पानी की बचत (rainwater management) होती है, शहर ठंडा रहता है और लोगों के लिए बेहतर जगहें बनती हैं।

संसाधनों का पुनर्चक्रण

रीजनरेटिव डिज़ाइन का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत (circular economy) है कि शहरों में संसाधनों के उपयोग को नए तरीके से समझा जाए। अभी हमारी व्यवस्था ऐसी है कि चीज़ें निकाली जाती हैं, इस्तेमाल की जाती हैं और फिर फेंक दी जाती हैं (linear economy)। लेकिन प्रकृति में ऐसा नहीं होता – वहां हर चीज़ का बार-बार उपयोग होता है, यानी एक का कचरा किसी और का संसाधन बन जाता है। अगर यही तरीका शहरों में अपनाया जाए, तो कचरा कम हो सकता है और संसाधनों का बेहतर उपयोग (resource efficiency) हो सकता है।

डेनमार्क के कालुंडबर्ग (industrial symbiosis Kalundborg) में इसका अच्छा उदाहरण देखने को मिलता है, जहां उद्योग एक-दूसरे के संसाधनों का उपयोग करते हैं। एक जगह की बची हुई ऊर्जा या कचरा दूसरी जगह काम आ जाता है। इससे ऊर्जा, जल उपयोग और प्रदूषण तीनों में कमी आती है। इसी तरह ब्रिटेन और स्वीडन में भी कचरे को उपयोगी चीज़ों में बदलने (waste recycling) के प्रयास किए गए हैं, जिससे पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को फायदा हुआ है।

निर्माण सामग्री पर विचार

निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री (building materials) को भी प्रकृति के सिद्धांतों के अनुसार बदलने की ज़रूरत है। आज कई पारंपरिक सामग्री ज़हरीले रसायनों और ऊर्जा के भारी उपभोग से बनती हैं, जो इंसानों और पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक है। इसकी बजाय रीजनरेटिव डिज़ाइन ऐसी सामग्री (eco friendly materials) के उपयोग पर ज़ोर देता है जो सुरक्षित हों, दोबारा इस्तेमाल की जा सकें और स्थानीय रूप से उपलब्ध हों, ताकि वे आसानी से प्राकृतिक चक्र में वापस जा सकें।

प्रकृति हमें इसका अच्छा उदाहरण देती है। प्राकृतिक सामग्री (biomaterials) कुछ सीमित और सुरक्षित पदार्थों से बनती हैं, फिर भी वे मज़बूत और उपयोगी होती हैं। इन्हीं से सीखकर वैज्ञानिक नई सामग्री विकसित कर रहे हैं, जो टिकाऊ भी हों और अच्छा प्रदर्शन भी करें। जैसे पौधों के कचरे और कवक से बनी इंसुलेशन (fungal insulation) सामग्री, जो पेट्रोलियम से बने उत्पादों का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है।

प्रकृति से प्रेरित स्मार्ट निर्माण

प्रकृति हमें यह भी सिखाती है कि चीज़ें कम संसाधनों में और आसानी से कैसे बनाई जा सकती हैं (efficient construction)। जहां उद्योगों में सामान बनाने के लिए ज़्यादा तापमान, भारी मशीनें और अधिक ऊर्जा की ज़रूरत होती है, वहीं प्रकृति साधारण परिस्थितियों में ही मज़बूत चीज़ें बना लेती है। मसलन, मकड़ी का जाला (spider silk strength) सामान्य तापमान पर बनता है, लेकिन वह बहुत मज़बूत और लचीला होता है।

अब नई तकनीकें, जैसे 3-डी प्रिंटिंग (3D printing construction), इन सिद्धांतों को अपनाने में मदद कर रही हैं। प्रकृति में कम सामग्री का उपयोग करके उसे इस तरह व्यवस्थित किया जाता है कि वह ज़्यादा मज़बूत बने। इसी तरह इंजीनियर अब डिजिटल तकनीक से हल्की लेकिन मज़बूत संरचनाएं बना रहे हैं, जिनमें कम सामग्री और ऊर्जा लगती है। इस तरह बेहतर डिज़ाइन पर ध्यान देकर निर्माण को अधिक प्रभावी और टिकाऊ (smart architecture) बनाया जा सकता है।

मज़बूत और स्वस्थ शहर

अगर इमारतों और शहरों को प्रकृति के अनुसार बनाया जाए, तो इसके कई फायदे (green buildings benefits) मिल सकते हैं। इससे पर्यावरण को होने वाला नुकसान कम होगा, जलवायु परिवर्तन (climate change adaptation) के असर से निपटना आसान होगा और लोगों के रहने के लिए अधिक स्वस्थ परिवेश मिलेगा। हरित भवन शहरों का तापमान कम कर सकते हैं, हवा को साफ कर सकते हैं और लोगों के लिए बेहतर सार्वजनिक स्थान (urban green spaces) बना सकते हैं। साथ ही, संसाधनों का पुनर्चक्रित उपयोग खर्च घटा सकता है और नए आर्थिक अवसर भी पैदा कर सकता है।

लेकिन इसे सफल बनाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों – जैसे विज्ञान, इंजीनियरिंग, डिज़ाइन और नीति – के लोगों को मिलकर काम करना होगा। अंतत: शहरों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम प्रकृति से कितना सीखते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://media.nature.com/w580h326/magazine-assets/d41586-026-00971-5/d41586-026-00971-5_52209098.jpg

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