देखभाल के नाम पर त्वचा खराब तो नहीं कर रहे?

प्रतिका गुप्ता

आजकल लोग अपनी त्वचा का कुछ ज़्यादा ही ख्याल रख रहे हैं। त्वचा का ख्याल रखना अच्छी बात है, लेकिन यह जानना भी उतना ही ज़रूरी है कि जितने और जिन तरीकों से आप त्वचा की देखभाल कर रहे हैं वास्तव में वे कहीं आपकी त्वचा के लिए हानिकारक तो नहीं।

सोशल मीडिया से मुतासिर (social media influence) होकर लोग अपनी त्वचा की देखभाल के लिए रोज़ाना जाने क्या-क्या करते हैं। लोग क्लींज़र, फेसवॉश, टोनर, सीरम, तरह-तरह के विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट क्रीम (vitamin C cream), मॉइश्चराइज़र, सनस्क्रीन… वगैरह-वगैरह बाज़ार के उत्पाद तो लगाते ही हैं, साथ ही उनके द्वारा अपनाए जाने वाले घरेलू उबटनों और उपायों का भी अंत नहीं है। इसमें भी आंखों के लिए अलग, गले व गरदन के लिए अलग, हाथ-पैरों और बाहों के लिए अलग-अलग उत्पाद और देखभाल के तरीके सोशल मीडिया पर खूब छाए हैं। और सिर्फ बड़े ही नहीं, बच्चे भी सोशल मीडिया के प्रभाव क्षेत्र में हैं।

त्वचा रोग विशेषज्ञ (dermatologist advice) रजनी कट्टा बताती हैं कि उन्होंने पिछले पांच सालों में देखा है कि त्वचा की देखभाल के तरीके दिन-ब-दिन पेचीदा और कई-कई स्टेप्स वाले हो गए हैं। कोई-कोई मामलों में तो ये रोज़ाना 12-12 स्टेप्स तक जाते हैं। और लोग इनमें अधिकतर ऐसे उत्पाद लगा रहे होते हैं जिनके बारे में उन्होंने बस सोशल मीडिया पर देखा होता है, इनके बारे में कहीं कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं होती। लेकिन क्या वाकई इतने उत्पाद और इतने स्टेप्स ज़रूरी हैं?

यदि आप किसी अच्छे त्वचा विशेषज्ञ से यह सवाल पूछेंगे तो उनका जवाब होगा – सामान्यत: नहीं। त्वचा विशेषज्ञ कहते हैं कि चेहरे या त्वचा को अच्छे से धोना, मॉइश्चराइज़र (skin moisturizer) लगाना और (सनस्क्रीन या किसी अन्य तरीके से) धूप से बचाना स्वस्थ त्वचा के लिए पर्याप्त है। लेकिन साथ में स्वस्थ और नियमित जीवनशैली और पोषणयुक्त भोजन बहुत ज़रूरी है। बल्कि, विशेषज्ञ कहते हैं, अधिक (और गलत) उत्पाद और देखभाल के गलत तरीके त्वचा को अस्वस्थ और बेजान बना सकते हैं। कट्टा का कहना है कि अक्सर सोशल मीडिया पर बताए जाने वाले उत्पादों और उनके फायदों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। और सबसे बड़ी बात तो यह कि लोगों को यह एहसास ही नहीं होता कि वे ऐसे प्रोडक्ट लगा रहे हैं जो वास्तव में त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं।

दरअसल, आजकल दुनिया भर में त्वचा की देखभाल (स्किनकेयर) (global skincare trends) के प्रति पहले से कहीं ज़्यादा दिलचस्पी दिख रही है। टिकटॉक, इंस्टा, यूट्यूब-शॉर्ट्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों में जवां दिखने और चमकदार त्वचा पाने की चाहत बढ़ा रहे हैं, और फिर इसे पाने के लिए वे इसके उपाय और उत्पाद भी बता रहे हैं। लोगों में जवां दिखने की चाहत का आलम इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि #SkinTok जैसे हैशटैग को हर महीने एक अरब से ज़्यादा बार देखा जाता है। ऐसा अनुमान है कि 2026 तक यह इंडस्ट्री (beauty industry growth) दुनिया भर में 200 अरब डॉलर से ज़्यादा का कारोबार करेगी।

त्वचा की बनावट

एसिड मेंटल
लिपिड लेयर
स्ट्रैटम
कॉर्नियम
एपिडर्मिस
डर्मिस
सूक्ष्मजीवीय संसार

विशेषज्ञों की सुनें तो उनका कहना है कि स्वस्थ त्वचा का मतलब सिर्फ निखरी और दमकती त्वचा (glowing skin) नहीं है बल्कि इससे परे है। स्वस्थ त्वचा आपके संपूर्ण स्वास्थ्य (overall health) को दुरुस्त रखती है। तो स्वस्थ त्वचा का मतलब क्या? इसे समझने के लिए हम त्वचा, उसकी बनावट और भूमिका के बारे में समझते हैं।

त्वचा शरीर का सुरक्षा कवच है, जो बाहरी रोगाणुओं, रसायनों और पराबैंगनी विकिरण (UV) एवं अन्य खतरों को शरीर में प्रवेश नहीं करने देता। त्वचा मुख्यत: तीन परतों से बनी होती है: हाइपोडर्मिस (सबसे निचली परत), डर्मिस (मध्य परत) और एपिडर्मिस (सबसे बाहरी परत)। एपिडर्मिस में लगातार कोशिकाएं मरती रहती हैं और इनके बदले नई त्वचा कोशिकाएं बनती हैं: रोज़ाना लगभग 40,000 कोशिकाएं मिटती-बनती हैं।

एपिडर्मिस में भी कई परतें होती हैं। इसकी सबसे बाहरी परत है स्ट्रैटम कॉर्नियम, जिसे आम तौर पर ‘स्किन बैरियर (त्वचा अवरोध)’ कहा जाता है। यह केरेटिन-युक्त चपटी, मृत कोशिकाओं (कॉर्नियोसाइट्स) (corneocytes structure) से बनी होती हैं, जो मज़बूत और जलरोधी होती हैं। कॉर्नियोसाइट्स के चारों ओर ‘सेरामाइड्स’ नामक लिपिड्स होते हैं, जो नमी को अंदर रोके रखते हैं और बाहरी हमलावरों को त्वचा के अंदर आने से रोकते हैं। और इसके ऊपर होती है वसा अम्लों, अमीनो अम्ल और तेल की परत, जिसे एसिड मेंटल (acid mantle skin) कहते हैं। यहां त्वचा के लिए फायदेमंद सूक्ष्मजीव पनपते हैं। यानी त्वचा किसी निर्जीव ढाल समान नहीं है, बल्कि वह एक फलता-फूलता इकोसिस्टम है जिसमें भौतिक, रासायनिक, सूक्ष्मजीवीय और प्रतिरक्षा क्रियाएं चलती रहती हैं।

त्वचा जटिल चीज़ों का एक तंत्र ज़रूर है, लेकिन है बहुत नाज़ुक है। लापरवाहियां इसे आसानी से तबाह कर सकती है। उदाहरण के लिए, झुर्रियां कम करने वाली और मुंहासों के दाग-धब्बे हटाने के लिए की जाने वाली कुछ प्रचलित कॉस्मेटिक प्रक्रियाएं (जैसे, केमिकल पील्स, जिसमें त्वचा की परत हटाई जाती है) अगर गलत तरीके से या बहुत ज़्यादा बार की जाएं तो ये त्वचा अवरोध (स्किन बेरियर) को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती हैं और त्वचा को अतिसंवेदी बना सकती हैं। हालांकि, त्वचा खुद को ठीक कर सकती है, लेकिन कुछ उपचार इस क्षमता को भी खत्म कर सकते हैं। अस्वस्थ त्वचा अवरोध के लक्षण हैं त्वचा में रूखापन, खुजली, लाल चकते, मुंहासे और संक्रमण।

फिर, त्वचा अवरोध की क्षति न सिर्फ त्वचा को अस्वस्थ करती है बल्कि अधिक गंभीर बीमारियों का कारण भी बन सकती है – जैसे एटोपिक डर्मेटाइटिस, सोरायसिस और एलर्जी जैसी समस्याएं। अस्वस्थ त्वचा स्टैफिलोकॉकस ऑरियस जैसे बैक्टीरिया का त्वचा में प्रवेश करना आसान बना सकती है। स्टैफिलोकॉकस ऑरियस एक ऐसा बैक्टीरिया है जो फोड़े-फुंसी और रक्त संक्रमण पैदा करता है।

आम तौर पर लोग तीक्ष्ण साबुन, डिटर्जेंट और एस्ट्रिंजेंट का इस्तेमाल करते हैं। यह आम गलती शरीर के ऊतकों की नमी खत्म कर देती है। त्वचा से अतिरक्त तेल, मेकअप और मुंहासे पैदा करने वाले बैक्टीरिया हटाने के लिए लोग अल्कोहल और विच हेज़ल युक्त उत्पाद (जैसे मेकअप रिमूवर) इस्तेमाल करते हैं। लेकिन ये उत्पाद त्वचा से वे नैसर्गिक तेल भी हटा देते हैं जो स्किन बैरियर को सलामत रखते हैं। बहुत ज़्यादा गर्म पानी से नहाना भी त्वचा अवरोध को क्षति पहुंचा सकता है। अगर पानी इतना गर्म है कि उससे बर्तनों का तेल आसानी साफ हो जाता है, तो ज़ाहिर है, इतना गर्म पानी त्वचा के प्राकृतिक तेलों को भी हटा देगा। नतीजतन, त्वचा को नुकसान होगा।

एसिड मेंटल की परत त्वचा पर स्वस्थ सूक्ष्मजीवों को पनपने के लिए ज़रूरी स्थितियां बनाती है। यदि त्वचा साफ करने के लिए सख्त और तीक्ष्ण उत्पाद उपयोग करते हैं तो ये त्वचा का pH स्तर बढ़ा देते हैं। नतीजा यह होता है कि त्वचा पर फायदेमंद सूक्ष्मजीवों की कमी हो जाती है और नुकसानदेह सूक्ष्मजीव पनपने लगते हैं।

आजकल छोटे-छोटे बच्चे भी स्किन-केयर उत्पाद अपना रहे हैं। नॉर्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी के त्वचा विशेषज्ञ पीटर लियो कहते हैं कि बच्चों की त्वचा कोमल होती है। अच्छे से धोना, मॉइश्चराइज़ करना और सनस्क्रीन लगाना ही उनके लिए पर्याप्त और सुरक्षित है। बड़ों के लिए बने अन्य तमाम उत्पाद बच्चों की त्वचा पर बहुत बुरा असर डाल सकते हैं। अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी की सलाह है कि दिन में दो बार किसी सौम्य साबुन/फेसवॉश से चेहरा धोकर मॉइश्चराइज़र लगाना चाहिए। और, यदि दिन का समय है तो, सनस्क्रीन लगाना चाहिए और त्वचा को धूप से बचाने के लिए ढंककर रखना चाहिए (कपड़े, टोपी या छाते से)।

धूप से बचाव

नीदरलैंड्स कैंसर इंस्टीट्यूट की त्वचा विशेषज्ञ एल्समीक प्लास्मीइर बताती है कि लंबे समय तक त्वचा का सीधे और बहुत ज़्यादा अल्ट्रावॉयलेट (पराबैंगनी) विकिरण के संपर्क में रहना खतरनाक है, चाहे वह संपर्क सीधे धूप के ज़रिए हो या टैनिंग बेड के ज़रिए। अल्ट्रावॉयलेट विकिरण मेलेनोमा का मुख्य कारण है। मेलेनोमा एक तरह का त्वचा कैंसर है जो सबसे घातक कैंसरों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2022 में लगभग 60,000 लोगों की मृत्यु मेलेनोमा से हुई थी।

दरअसल, भारत में तो नहीं लेकिन, कुछ देशों में त्वचा को टैन करने का बहुत चलन है। लोग घंटों-घंटों समुद्र किनारे धूप सेंकते रहते हैं और त्वचा को टैन करते हैं। पृथ्वी तक पहुंचने वाली धूप में अल्ट्रावॉयलेट किरणें भी होती हैं; मुख्यत: दो प्रकार की अल्ट्रावॉयलेट विकिरण (UV) हम तक पहुंचते हैं, UVA और UVB। ये दोनों त्वचा को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करते हैं। UVA विकिरण ऑक्सीडेटिव तनाव पैदा करती हैं और कोलाजेन तथा इलास्टिन को तोड़कर त्वचा की डर्मिस को नुकसान पहुंचाते हैं। कोलाजेन और इलास्टिन ऐसे प्रोटीन हैं जो ऊतकों को आकार और लचीलापन देते हैं। और, UVB विकिरण केवल एपिडर्मिस तक पहुंचता है, लेकिन यह त्वचा को झुलसाता (सनबर्न) है और डीएनए को क्षति पहुंचाता है, जिससे त्वचा का कैंसर हो सकता है। इसके अलावा, दोनों प्रकार के UV विकिरण एक ऐसे प्रोटीन को बाधित करते हैं जो त्वचा की सुरक्षा परत में कोशिकाओं (कॉर्नियोसाइट्स) को आपस में जोड़े रखते हैं। नतीजतन, कॉर्नियोसाइट्स के आपसी जोड़ कमज़ोर हो जाते हैं, और त्वचा की सुरक्षा परत कमज़ोर पड़ जाती है।

कई लोग जो टैनिंग चाहते हैं, वे टैनिंग बेड निर्माता कंपनियों के झूठे दावों के झांसे में आ जाते हैं। कंपनियों का दावा रहता है कि टैनिंग बेड धूप की तुलना में ज़्यादा सुरक्षित हैं, क्योंकि वे डीएनए को नुकसान पहुंचाने वाले UVB विकिरण की तुलना में UVA विकिरण अधिक उत्सर्जित करते हैं। लेकिन नॉर्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी के त्वचा विशेषज्ञ पेद्राम गेरामी कहते हैं कि ये दावे अक्सर गलत साबित होते हैं। टैनिंग बेड से उत्सर्जित UVA की मात्रा धूप से मिलने वाले UVA की तुलना में लगभग 10 से 15 गुना ज़्यादा होती है।

गेरामी आगे बताते हैं कि जो लोग इनडोर टैनिंग बेड का इस्तेमाल करते हैं, उनमें मेलेनोमा होने की संभावना तीन गुना ज़्यादा पाई गई है। और तो और, टैनिंग बेड इस्तेमाल करने वालों के शरीर के उन हिस्सों में भी मेलेनोमा देखा गया जहां आम तौर पर धूप से कम नुकसान पहुंचता है, जैसे जांघों पर। WHO ने टैनिंग बेड को एस्बेस्टस और सिगरेट जितना हानिकारक बताया है और इसे कैंसर-कारी श्रेणी में रखा है।

लंबे समय तक किए गए कई क्लीनिकल ट्रायल से यह पता चला है कि सनस्क्रीन का इस्तेमाल करने से स्किन कैंसर का खतरा काफी कम हो जाता है। WHO लोगों को सन प्रोटेक्शन फैक्टर (SPF) 30 या उससे ज़्यादा वाले ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन (जो दोनों तरह की UV किरणों को रोकती है) इस्तेमाल करने की सलाह देता है। लेकिन सनस्क्रीन लगा लेने का मतलब यह नहीं कि अब आप पूरी तरह सुरक्षित हैं, और कितना भी धूप के संपर्क में रह सकते हैं। शरीर को अच्छी तरह से ढंकने वाले कपड़े, छतरी या छायादार टोपी का इस्तेमाल और सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच (जब सूरज सबसे तेज़ होता है) धूप में जाने से बचना भी ज़रूरी है। यह उपाय अपनाना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि सनस्क्रीन की क्वालिटी में काफी अंतर हो सकता है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में कई लोकप्रिय सनस्क्रीन को मार्च में बाज़ार से इसलिए हटा दिया गया था क्योंकि ड्रग रेगुलेटर टेस्ट में पता चला था कि उनके बेस फॉर्मूलेशन में गड़बड़ियों के चलते उनमें SPF दावे से काफी कम था।

वैसे, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर सनस्क्रीन के बारे में बहुत सारी गलत जानकारियां भी फैला रहे हैं। उनका कहना है कि सनस्क्रीन से स्किन कैंसर और विटामिन-डी की कमी होती है, जबकि वास्तविकता इसकी उलट है। ऐसी गलत बातें अक्सर उन लोगों को निशाना बनाती हैं, जो कभी त्वचा विशेषज्ञ के पास गए ही नहीं हैं। बल्कि सोशल मीडिया ने स्किनकेयर के नए-नए चलन चलाएं हैं – जैसे मॉइश्चराइज़र की जगह बीफ टैलो (जानवर की चर्बी) लगाना, रीजुरेन, ग्लास स्किन मास्क लगाना, रेड-लाइट थेरपी लेना, वगैरह-वगैरह।

लियो कहते हैं बाज़ार में हज़ारों ऐसे प्रोडक्ट मौजूद हैं जो उनमें मौजूद तरह-तरह के केमिकल का नाम लेकर दावा करते हैं कि वे आपकी त्वचा को जवां बनाए रखने और त्वचा को पहुंचे नुकसान को ठीक करते हैं। लेकिन उत्पादों में मौजूद तत्वों के पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण होने ज़रूरी हैं।

जैसे, मॉइश्चराइज़र के बारे में कई अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि वे त्वचा की देखभाल करते हैं। अध्ययन बताते हैं कि एक सामान्य और संतुलित मॉइश्चराइज़र त्वचा अवरोध की हर परत में नमी बरकरार रखता है और उसे ठीक करने में मदद करता है। सबसे असरदार मॉइश्चराइज़र में तीन मुख्य अवयव होते हैं – इमोलिएंट्स, ह्यूमेक्टेंट्स और ऑक्लूसिव्स। इमोलिएंट्स, जैसे तेल, जो  त्वचा को नर्म व मुलायम बनाते हैं और त्वचा कोशिकाओं तथा लिपिड्स के बीच की खाली जगहों को भरकर पानी की कमी को दूर करते हैं। हाइलूरोनिक एसिड जैसे ह्यूमेक्टेंट्स बाहर की हवा या डर्मिस से नमी खींचकर त्वचा की ऊपरी परत तक पहुंचाते हैं। और, पेट्रोलियम जेली जैसे ऑक्लूसिव्स त्वचा के ऊपर एक सुरक्षा कवच बना देते हैं जो नमी को बाहर जाने से रोकते हैं।

इसके अलावा मॉइश्चराइज़र में रेटिनॉइड्स, एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। रेटिनॉइड्स (विटामिन-ए से बने यौगिकों का एक समूह) कोशिकाओं के बनने और कोलाजेन के बनने को तेज़ करते हैं, जिससे झुर्रियां और काले धब्बे कम होते हैं, मुंहासों को थामते हैं। विटामिन-सी जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स ‘मुक्त मूलकों (फ्री रेडिकल्स)’ के प्रवेश को रोकते हैं, जो लिपिड्स, डीएनए और प्रोटीन्स को क्षति पहुंचाते हैं।

नॉर्थ कैरोलिना स्टेट युनिवर्सिटी के त्वचा विशेषज्ञ ज्यूसेपे वालाकी का कहना है कि आप कितना भी बढ़िया मॉइश्चराइज़र लगा लें, लेकिन यदि आपकी जीवनशैली और खान-पान अस्त-व्यस्त और अस्वस्थ है, तो वे भी आपकी त्वचा को स्वस्थ नहीं रख सकते और आपके अस्त-व्यस्तता के बुरे असर को बेअसर नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, धूम्रपान करने से कोलाजेन और इलास्टिन कमज़ोर पड़ जाते हैं, और त्वचा तक पोषक तत्व पहुंचाने वाला रक्त प्रवाह भी मंद पड़ जाता है।

इसके अलावा त्वचा को स्वस्थ रखने का एक बहुत ज़रूरी हिस्सा है – पोषक तत्वों से भरपूर भोजन करना, जिसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स, अमीनो एसिड्स और फैट्स शामिल हों। विशेषज्ञ कहते हैं कि त्वचा हमारे शरीर का आईना है, इसे देखकर पता चल सकता है कि आपके शरीर में किस पोषक तत्व की कमी है। इस बात के भी प्रमाण मिल रहे हैं कि त्वचा और पेट का आपस में बहुत गहरा सम्बंध है। कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि पेट के सूक्ष्मजीव संसार में बदलाव करने से त्वचा के लक्षण भी बदल जाते हैं।

इसलिए यदि आप अपनी त्वचा वाकई स्वस्थ रखना चाहते हैं तो सोशल मीडिया के झांसे या दुनिया के चलन में न आएं। और इन बातों का ख्याल रखें: अपनी दिनचर्या सही रखें; अच्छा भोजन खाएं; सौम्य साबुन या फेसवॉश से त्वचा धोएं; मॉइश्चराइज़र लगाएं; दिन के समय सनस्क्रीन लगाएं; और बाहर निकलते वक्त छाता, टोपी या कपड़े से शरीर को ढंककर रखें। ध्यान रहे, सोशल मीडिया से लेकर उत्पाद निर्माताओं को आपकी सेहत की बजाय पैसा बनाने की चिंता अधिक होती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://media.nature.com/w1248/magazine-assets/d41586-026-00700-y/d41586-026-00700-y_52147394.jpg?as=webp

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