
वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरल तैयार किया है जिसे रोशनी या अन्य किसी ऊर्जा स्रोत के संपर्क में रखा जाए तो वह एक ऊर्जा-सघन काली जेली में बदल जाता और इस ऊर्जा को वह महीनों तक कैद रख सकता है।
दरअसल, यह जेलीनुमा पदार्थ कुछ हद तक एक बैटरी की तरह काम करता है। जैसे ही इसका संपर्क ऑक्सीजन से कराया जाता है, तो संग्रहित ऊर्जा मुक्त हो जाती है।
हाल ही में केम नामक पत्रिका में प्रकाशित यह शोध अभी टेक्नॉलॉजी के स्तर पर नहीं पहुंचा है। यह तो एक अवधारणा का प्रदर्शन मात्र है कि कैसे एक धातु-रहित पदार्थ ऊर्जा का दोहन कर सकता है, उसे संग्रहित कर सकता है और फिर से उपयोग के लिए उपलब्ध करा सकता है। यदि यह प्रयोग टेक्नॉलॉजी में तबदील होता है तो यह तरल पदार्थ हमें सेमीकंडक्टर के लिए ऊर्जा का धातु-रहित स्रोत उपलब्ध कराने की क्षमता रखता है। यह टेक्नॉलॉजी खास तौर से चिकित्सा उपकरणों व यंत्रों में उपयोगी साबित होगी जहां धातु-उपकरणों के उपयोग में समस्याएं होती हैं।
दरअसल, इस नए पदार्थ का विचार कोशिकीय कंकाल के व्यवहार में से उपजा है। यह कोशिकीय कंकाल कोशिकाओं के अंदर प्रोटीन तंतुओं का लगातार बनता-टूटता नेटवर्क होता है। यह कोशिकाओं को गति करने और विभाजन में समर्थ बनाता है।
इस व्यवस्था को कृत्रिम तंत्र में विकसित करने के लिए नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय के सेमुअल स्टुप की टीम ने एक अणु की रंचना की जिसमें दो घटक थे: एक अमीनो नेफ्थलीन एरोमैटिक इकाई (ANI) जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील होती है; दूसरी इकाई मिथाइल वाइलोजेन (MV) की थी जो इलेक्ट्रॉन संग्रह कर सकती है। शुरुआत में यह पदार्थ एक पीला तरल होता है लेकिन जब इस पर रोशनी पड़ती है, तो ANI घटक ऊर्जा सोखता है और अपने इलेक्ट्रॉन MV को दान कर देता है। ऊर्जा के अवशोषण का परिणाम यह होता कि ये अणु टिकाऊ फीतों जैसे संकुलों में जम जाते हैं। यह जमावट काफी टिकाऊ होती है और महीनों तक बनी रह सकती है।
जैसे ही इस जेली का संपर्क ऑक्सीजन से होता है, यह वापिस तरल रूप में आ जाती है और इस प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉन मुक्त हो जाते हैं। इस दौरान मुक्त ऊर्जा का उपयोग रासायनिक क्रियाओं के संचालन में किया जा सकता है, अर्थात यह एक बैटरी है। स्टुप के शब्दों में, ‘यह रोशनी को बोतल में कैद करने जैसा है।’
वैसे देखा जाए तो कृत्रिम प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए प्रकाश को रासायनिक ऊर्जा में तबदील करने के साधन उपलब्ध हैं। जैसे फोटो-इलेक्ट्रिक सेल में प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जाता है। इन्हें फिर से जोड़ें तो ऊर्जा प्राप्त मिल सकती है या जलाकर भी ऊर्जा मिल जाएगी। लेकिन स्टुप के मुताबिक उनके द्वारा विकसित प्रक्रिया उत्क्रमणीय है और इसमें धातुओं का उपयोग भी नहीं करना होता। इस मायने में यह अतीत के प्रयासों से एकदम अलग है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.science.org/do/10.1126/science.z5lvljh/full/_20260619_on_liquid-energy.jpg