कितना माइक्रोप्लास्टिक है वातावरण में ?

माइक्रोप्लास्टिक (microplastic pollution) अब धरती के लगभग हर हिस्से में फैल चुका है – सहारा रेगिस्तान से लेकर आर्कटिक की बर्फ तक। लेकिन एक सवाल अब तक बना हुआ है: हवा में कितना माइक्रोप्लास्टिक (airborne microplastics) तैर रहा है? एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इसका जवाब बेहद चिंताजनक बताया है।

नेचर में प्रकाशित शोध (Nature journal study) के अनुसार, हर साल भूमि पर होने वाली मानवीय गतिविधियां लगभग 600 क्वाड्रिलियन (6 शंख या 6×1017) माइक्रोप्लास्टिक कण हवा में छोड़ती हैं। यह मात्रा समुद्रों से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक से करीब 20 गुना अधिक है। इससे यह धारणा गलत साबित होती है कि हवा में फैलने वाले माइक्रोप्लास्टिक का मुख्य स्रोत समुद्र हैं; वास्तव में तो भूमि से होने वाला प्रदूषण (land-based pollution) कहीं बड़ा कारण है।

शोध में, भूमि के ऊपर की हवा के हर घन मीटर में औसतन 0.08 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए, जबकि समुद्र के ऊपर यह संख्या केवल 0.003 कण थी। आसान शब्दों में कहें तो हम जो हवा सांस के साथ अंदर ले रहे हैं, उसमें मौजूद ज़्यादातर माइक्रोप्लास्टिक मानव गतिविधियों से आ रहे हैं – जैसे यातायात (vehicular emissions), कारखाने, शहरों की धूल, सिंथेटिक कपड़ों के रेशे और कचरे से।

माइक्रोप्लास्टिक बहुत सूक्ष्म प्लास्टिक कण होते हैं, जिनका आकार एक माइक्रॉन से लेकर पांच मिलीमीटर तक होता है। ये इतने हल्के होते हैं कि हवा इन्हें आसानी से उड़ा ले जाती है और ये दूर- दूर तक फैल सकते हैं। एक बार पर्यावरण में पहुंच जाने के बाद इन्हें हटाना लगभग असंभव होता है और ये सालों तक बने रहते हैं (persistent environmental pollution)।

पहले हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक को लेकर किए गए अनुमान बहुत अलग-अलग थे – कहीं बहुत कम कण बताए गए थे, तो कहीं सैकड़ों। इस नए अध्ययन (global microplastic study) से यह समझ में आता है कि ऐसा क्यों हुआ। पहले के शोध अक्सर सीमित इलाकों के आंकड़ों या प्लास्टिक उपयोग के मोटे-मोटे अनुमानों पर आधारित थे। इसके विपरीत, इस अध्ययन में दुनिया भर के 283 स्थानों से जुटाए गए 2782 आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिससे अब तक का सबसे व्यापक वैश्विक डैटा (global data analysis) तैयार हो सका है।

अध्ययन के प्रमुख लेखक और विएना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एंड्रियास स्टोल के अनुसार इस शोध से एक बात तो साफ है कि हवा में फैलने वाले माइक्रोप्लास्टिक का मुख्य स्रोत भूमि है, न कि समुद्र। हालांकि अभी भी कुछ जानकारियों की कमी है, लेकिन दिशा अब स्पष्ट है। उम्मीद है कि यह अध्ययन आगे होने वाले शोध (future climate research) के लिए आधार बनेगा। बहरहाल, प्लास्टिक प्रदूषण सिर्फ पानी और मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस हवा में भी मौजूद है जिसमें हम सांस लेते हैं, और इसके लंबे समय के असर (health impact) क्या होंगे यह एक बड़ा सवाल है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/dam/m/bdee1cd6db608e69/original/Microplastics-Cleanup-GettyImages-1251038155.jpg?m=1769026222.762&w=900

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