
यूं तो किसी भी जश्न (celebration culture) की जान होते हैं उससे जुड़े व्यंजन। लेकिन जश्न मनाने का एक चलन ‘पार्टी’ करने का भी है, जिसमें लोग शौकिया शराब पीते हैं। हज़ारों सालों से मद्यपान (drinking habit) की प्रवृत्ति मनुष्य ने दिखाई है और यदा-कदा त्यौहारों या जश्न में शराब पी जाती है। जैसे होली, शिवरात्रि में भांग तो घोटी जाती है लेकिन आजकल शराब की ओर भी काफी रुझान (alcohol trend) है। ऐसा ही एक सामूहिक जश्न अक्टूबरफेस्ट जर्मनी (Oktoberfest Germany) में मनाया जाता है, जिसमें लोग कई दिनों तक छककर शराब पीते हैं। लेकिन पीने की भी एक हद होती है, जिसके बाद पीने वाला कहता है अब बस। लेकिन ऐसा किसी को पता कब और कैसे चलता है कि बस अब बहुत पी ली है, अब और नहीं?
यही सवाल डेनमार्क (Denmark research) के वैज्ञानिकों का शोध विषय बना। उनके शोध नतीजे बताते हैं कि जो हार्मोन गर्भावस्था के दौरान मॉर्निंग सिकनेस (सुबह—सुबह मितली) जैसा एहसास कराता है वही हार्मोन ‘बहुत हो गया’ का संकेत भी देता है।
दरअसल, गर्भावस्था के शुरुआती दौर में मॉर्निंग सिकनेस (morning sickness) का अनुभव होता है; ऐसा देखा गया है कि यह गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में ग्रोथ डिफरेंशिएशन फैक्टर-15 (GDF15) नामक हार्मोन के तेज़ी से बढ़ने के कारण होता है। वैसे तो यह हार्मोन शरीर के सारे ऊतक लगातार थोड़ी मात्रा में बनाते हैं लेकिन गर्भावस्था में अपरा यानी गर्भनाल इसका निर्माण काफी मात्रा में करने लगती है।
एक मत है कि मॉर्निंग सिकनेस सुरक्षा की दृष्टि से होती है: यह इशारा होता है कि गर्भवती मां खराब भोजन न खाए वरना भ्रूण को नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन GDF15 उन लोगों में भी मौजूद होता है जो गर्भवती नहीं हैं; लिहाज़ा, इसे भूख दबाने से भी जोड़ा गया है। दवा उद्योग इसे संभावित मोटापे-रोधी दवा के रूप में देख रहा है।
दरअसल युनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन (University of Copenhagen) के हार्मोन रोग विशेषज्ञ मैथ्यू गिलम पूर्व में एक अध्ययन में शामिल थे। उस अध्ययन में रॉकस्लाइड संगीत समारोह (music festival study) में जश्न मनाने वालों युवकों में विभिन्न हार्मोन्स के स्तरों की जांच की गई थी। जश्न में शामिल युवकों ने लगातार एक हफ्ते तक खूब ‘खाया-पीया’ था। अध्ययन में उनमें कई बदलाव दिखे थे; जिनमें से एक था GDF15 के स्तर में वृद्धि। इस अध्ययन ने गिलम को शराब के सेवन (alcohol effects) पर इस हार्मोन के प्रभाव के बारे में सोचने पर प्रेरित किया।
इस बारे में समझने के लिए गिलम और उनके साथियों (scientific study) ने कई अध्ययन किए। इस शृंखला में सबसे पहले उन्होंने एक बहुत छोटा अध्ययन किया। इसमें उन्होंने अक्टूबरफेस्ट में शामिल तीन लोगों के पार्टी से पहले और बाद के नमूने लिए। तीनों ने 3 दिन तक हर दिन लगभग 1 लीटर बीयर पी थी। विश्लेषण में इन लोगों में GDF15 का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया। हालांकि, अध्ययन बहुत छोटा था और यह भी स्पष्ट नहीं था कि यह बदलाव शराब पीने की वजह से ही हुआ है या अन्य अस्त-व्यस्त दिनचर्या की वजह से।
इसके बाद उन्होंने 12 मेडिकल विद्यार्थियों पर परीक्षण (clinical trial) किया, जिन्होंने पांच मानक पेग (60X5 मि.ली.) पिए थे। इन लोगों में GDF15 का स्तर बिल्कुल नहीं बढ़ा था। इससे ऐसा लगता है कि शराब के प्रति इस हार्मोन की प्रतिक्रिया शायद लगातार लंबे समय तक शराब पीने (chronic alcohol use) के बाद होती है, न कि थोड़े समय के लिए ज़्यादा शराब पीने से।
इस विचार को जांचने के लिए शोधकर्ताओं (alcohol addiction study) ने उन लोगों में GDF15 के स्तर को मापा जिन्हें शराब की लत थी। जिन वयस्कों को यह लत नहीं थी, उनकी तुलना में ज़्यादा शराब पीने वाले लोगों में GDF15 का स्तर औसतन लगभग पांच गुना ज़्यादा दिखा।
फिर उन्होंने लोगों के जेनेटिक और जीवनशैली से जुड़े डैटा का विश्लेषण किया। यूके बायोबैंक (UK Biobank data) से लिए गए इस डैटा का विश्लेषण करने पर उन्हें एक और दिलचस्प सम्बंध दिखा: जिन लोगों में एक ऐसा जेनेटिक उत्परिवर्तन होता है जो GFRAL (एक प्रोटीन रिसेप्टर जो GDF15 से जुड़ता है) को निष्क्रिय कर देता है, उन्होंने उत्परिवर्तन-रहित लोगों की तुलना में हर हफ्ते 26 मिलीलीटर ज़्यादा नीट शराब पी (250 मिलीलीटर वाइन या 500 मिलीलीटर बीअर के तुल्य)।
गिलम कहते हैं कि कुल मिलाकर ये नतीजे इस विचार (biological mechanism) की पुष्टि करते हैं कि लंबे समय तक शराब पीने की प्रतिक्रिया के रूप में GDF15 का स्तर बढ़ता है, और स्वस्थ लोगों में यह शराब पीने की मात्रा को नियंत्रित करता है। उनका अनुमान है कि जिन लोगों में जेनेटिक उत्परिवर्तन के कारण यह तंत्र काम नहीं करता या जिनमें शराब की लत के कारण GDF15 असंवेदी हो गया है, उनमें यह ‘फीडबैक लूप’ (feedback loop mechanism) काम नहीं करता, जिसकी वजह से शायद वे ज़्यादा शराब पीते हैं।
इसके बाद टीम ने चूहों (mouse experiment) पर भी परीक्षण किया। देखा कि क्या GDF15 शराब पीने की मात्रा कम कर सकता है, या यह सिर्फ भूख शांत करने में भूमिका निभाता है। उन्होंने चूहों को GDF15 का इंजेक्शन लगाया और मापा कि वे सादा पानी ज़्यादा पीते हैं या इथेनॉल (शराब) (ethanol alcohol) मिला हुआ। जैसी कि उम्मीद थी GDF15 ने चूहों की भूख तो कम की ही, साथ ही उनकी शराब पीने की मात्रा में भी कमी (reduced alcohol consumption) आई। यह कमी खाने में आई कमी से कहीं ज़्यादा थी। अन्य शोधकर्ताओं कहना है कि यह प्रयोग शराब पीने में GDF15 की भूमिका जानने की दिशा में एक अच्छा कदम है। लेकिन यह पुख्ता करने के लिए कि यह हार्मोन विशेष तौर पर शराब के प्रति कितना प्रभावी है, अलग-अलग तरह के खाद्य पदार्थों पर परीक्षण करने की ज़रूरत है।
एक संभावना यह भी है कि लगातार कई दिनों तक शराब पीने (liver damage risk) से लीवर को होने वाले नुकसान की वजह से GDF15 बन सकता है, लेकिन दूसरे अंग भी यह हार्मोन बना सकते हैं। इंसान हज़ारों सालों से शराब पीते आ रहे हैं, इसलिए यह मुमकिन है कि किसी चीज़ भी चीज़ की अति रोकने के लिए शरीर में कुछ तरीके (body regulation system) विकसित हुए हों।
शोधकर्ताओं को लगता है कि bioRxiv प्रीप्रिंट (bioRxiv research paper) में प्रकाशित इन नतीजों की मदद से शराब की लत का इलाज में करने में मदद मिल सकती है। लेकिन अभी वे गर्भवती महिलाओं में GDF15 का स्तर, जेनेटिक परिवर्तन और खान-पान में बदलाव (शराब सहित) (diet and alcohol behavior) का अध्ययन करने की योजना बना रहे हैं, ताकि यह देखा जा सके कि GDF15 क्रियामार्ग और शराब से तुष्टि के बीच कोई कार्य-कारण सम्बंध है या नहीं। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zt6ovpi/full/_20260320_on_gdf15_oktoberfest.jpg