गैलीलियो की हस्तलिखित टिप्पणियों से एक विचार प्रक्रिया पर रोशनी

हाल ही में हुई एक खोज (historical discovery) से इस बात पर नई रोशनी पड़ी है कि गैलीलियो गैलीली (Galileo Galilei) एक वैज्ञानिक क्रांति के अगुआ कैसे बने। यह खोज एक इतिहासकार इवान मलारा ने फ्लोरेंस स्थित इटली की नेशनल सेंट्रल लायब्रेरी (National Central Library Florence) में की है। मलारा उस पुस्तकालय में दुनिया की सबसे प्राचीन खगोल शास्त्रीय पुस्तक के पन्ने पलट रहे थे। यह पुस्तक थी क्लॉडियस टोलेमी द्वारा दूसरी शताब्दी में लिखी गई अल्माजेस्ट (Almagest)।

अल्माजेस्ट में भूकेंद्रित ब्रह्मांड (geocentric model) की दृष्टि पेश की गई थी और यह अगली कई सदियों तक इस विषय की मार्गदर्शक पुस्तक बनी रही थी। मलारा के हाथ में जो प्रति थी वह सोलहवीं सदी   में छपी थी।

पन्ने पलटते-पलटते मलारा का ध्यान एक विचित्र बात पर गया। उसके एक लगभग खाली पन्ने पर बाइबल (Bible scripture) का एक सूक्त (Psalm 145) हाथ से लिखा गया था। और इसकी लिखावट बहुत जानी-पहचानी लग रही थी। उनको पूरा यकीन था कि यह मशहूर खगोल शास्त्री (astronomer) गैलीलियो की       लिखावट है।

और पन्ने पलटते हुए मलारा को समझ में आया कि अल्माजेस्ट की उस प्रति पर हाशियों में गैलीलियो ने भरपूर टिप्पणियां (marginal notes) दर्ज की हैं। उन्होंने इस खोज का विवरण जर्नल फॉर दी हिस्ट्री ऑफ एस्ट्रॉनॉमी (history of astronomy journal) में प्रकाशन के लिए प्रस्त्तुत किया है। यह पर्चा विज्ञान के इतिहास में एक निहायत (या शायद सबसे अहम) परिवर्तन की प्रक्रिया पर प्रकाश डालता है।

मलारा का कहना है कि वैसे तो गैलीलियो की टिप्पणियों से सजी कोई भी पुस्तक दुर्लभ ही होगी लेकिन अल्माजेस्ट तो दुर्लभ में भी दुर्लभ है। आज के दौर में गैलीलियो के गुण गाए जाते हैं कि उन्होंने प्राचीन ज्ञान को खारिज करने में मदद की। अल्माजेस्ट 14 सदियों तक इस प्राचीन ज्ञान का साकार रूप थी। लेकिन अल्माजेस्ट का टीकायुक्त संस्करण (annotated version) एक ज़्यादा बारीक तस्वीर पेश करता है।

गैलीलियो की ये टिप्पणियां संभवत 1590 में अंकित की गई थीं – यानी उनके द्वारा चंद्रमा और बृहस्पति के दूरबीनी अवलोकनों (telescope observations) से लगभग दो दशक पूर्व। ये एक ऐसे व्यक्ति का परिचय देती हैं जो एक ओर तो टोलेमी का सम्मान करता था तथा दूसरी ओर उनकी रचना की चीरफाड़ भी कर रहा था। मलारा का तर्क है कि गैलीलियो टोलेमी के विचारों से अलग हट पाए क्योंकि वे पारंपरिक ब्रह्मांड (classical cosmology) की तस्वीर के तर्कों से भली-भांति परिचित थे और उनके विश्लेषण ने उन्हें आश्वस्त कर दिया था सूर्य-केंद्रित प्रणाली (heliocentric model) स्वयं टोलेमी के गणितीय तर्क को ज़्यादा पूर्णता देगी।

आम तौर पर इतिहासकार गैलीलियो का चित्रण इस तरह करते हैं कि वे मूलत: दार्शनिक या शायद राजनैतिक कारणों (philosophical debate) से प्रेरित थे। लेकिन अल्माजेस्ट के पन्नों पर अंकित टिप्पणियों ने मलारा को आश्वस्त कर दिया कि गैलीलियो किसी सनक पर सवार होकर ब्रह्मांड के नए विचार तक नहीं पहुंचे थे, बल्कि पारंपरिक गणितीय खगोल शास्त्र (mathematical astronomy) पर महारत रखने और उसका गहन विश्लेषण करने के बाद पहुंचे थे।

इसके बाद तो मलारा ने ज़्यादा व्यवस्थित और विस्तृत छानबीन (archival research) शुरू कर दी। उन्होंने बरसों तक वे उद्धरण इकट्ठे किए जिनमें गैलीलियो टोलेमी की रचना की तकनीकी बारीकियां उभारते हैं    और अपना तर्क विकसित करते हैं। इसी क्रम में उन्हें फ्लोरेंस में अल्माजेस्ट की टीकासहित प्रति (annotated manuscript) हाथ लगी।

जब उन्होंने इसके एक पन्ने पर सूक्त 145 मिला तो उनकी आंखों से नींद उड़ गई। दरअसल ये सूक्त ईश्वर की स्तुति (religious text) में लिखे गए हैं। उन्होंने तत्काल ईमेल से इसकी सूचना गैलीलियो के दो मुख्य अध्येताओं (Galileo scholars) को दी। और उन्होंने पुष्टि कर दी कि लिखावट सचमुच गैलीलियो की है। इसके लिए उन्होंने लिखावट विशेषज्ञ से सलाह ली थी।

मलारा के लिए यह अत्यंत रोमांच का क्षण था। पहली बात यह थी कि पहली बार उन्होंने अल्माजेस्ट की प्रति देखी थी जिसमें बाइबल के किसी सूक्त का ज़िक्र था और वह भी गैलीलियो की लिखावट में। यह साफ तौर पर गैलीलियो की उस रूढ़ छवि (scientist vs church debate) को चुनौती दे रहा था जिसमें उन्हें धार्मिक सत्ता को ललकारते ही बताया जाता है। फिर मलारा को गणितज्ञ अलेसांद्रो मार्चेटी द्वारा 1673 में लिखा गया एक पत्र (historical letter) याद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि गैलीलियो जब भी अल्माजेस्ट लेकर बैठते तो वे प्रार्थना ज़रूर करते थे।

मलारा का कहना है कि हम जब गैलीलियो के बारे में सोचते हैं, तो जो एक तस्वीर सामने आती है वह होती है एक वैज्ञानिक सेलेब्रिटी (science icon) की जो चर्च और हज़ारों वर्षों के संचित ज्ञान दोनों का विरोध करता है। लेकिन यह विचार कभी नहीं आता कि इतिहास का सबसे मशहूर मूर्तिभंजक (paradigm shift thinker) कैसे इस क्रांतिकारी नज़रिए तक पहुंचा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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