गर्भ में शिशु लात क्यों मारते हैं

र्भ के कुछ हफ्तों बाद गर्भवती महिलाओं को शिशु के लात मारने का एहसास होने लगता है। लेकिन सवाल यह है कि गर्भ में शिशु लात क्यों मारते हैं। इम्पीरियल कॉलेज लंदन की बायो-इंजीनियर नियाम नोवलन ने लाइव साइंस को बताया है कि गर्भ वैसे तो काफी तंग जगह होती है लेकिन लातें चलाना हड्डियों और जोड़ों के स्वस्थ विकास के लिए ज़रूरी व्यायाम है।

वास्तव में गर्भ के शुरूआती 7 हफ्ते के बाद भ्रूण हरकत करने लगता है जिसमें आहिस्ता-आहिस्ता वह अपनी गरदन घुमाने लगता है। जैसे-जैसे भ्रूण का विकास होता है वह हिचकी, हाथ-पैर हिलाना, अंगड़ाई लेना, उबासी लेना और अंगूठा चूसने जैसी हरकतें भी करने लगता है। लेकिन गर्भवती महिलाओं को हाथ-पैर हिलाने जैसी बड़ी हरकतें 16 से 18 हफ्तों के बाद ही महसूस होने लगती हैं।

हालांकि अध्ययनों में अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि गर्भ में शिशु की हरकतें स्वैच्छिक हैं या अनैच्छिक, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि जन्म के बाद शिशु के अच्छे स्वास्थ्य के लिए गर्भ में हाथ-पैर मारने जैसी ये हरकतें आवश्यक हैं, खासकर जोड़ों और हड्डियों के लिए। युरोपियन सेल एंड मटेरियल में प्रकाशित एक समीक्षा में नोवलन बताती हैं कि कैसे भ्रूण की कम हरकत के कारण कुछ जन्मजात विकार (जैसे छोटे जोड़ या पतली हड्डियां) हो सकते हैं, जिनकी वजह से फ्रैक्चर की संभावना अधिक रहती है।

लेकिन फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि गर्भ में शिशु की कितनी हरकत सामान्य कहलाएगी और कितनी कम या ज़्यादा क्योंकि भ्रूण की हरकतों पर निगरानी सिर्फ अस्पतालों में ही रखी जा सकती है और गर्भवती महिलाएं अस्पताल में तो थोड़े समय के लिए ही होती हैं। इसलिए भ्रूण की हरकत का तफसील से अध्ययन करना अब तक मुश्किल रहा है।

इस समस्या के समाधान के लिए नोवलन की टीम ने एक ऐसा मॉनीटर बनाया है जिसे महिलाएं दिन भर पहने रख सकती हैं और रोज़मर्रा के सारे काम भी करती रह सकती हैं। नोवलन के दल ने इस मॉनीटर को 24 से 34 सप्ताह के गर्भ वाली 44 गर्भवती महिलाओं पर आज़माया। इसकी मदद से वे शिशुओं की सांस लेने, चौंकने और अन्य सामान्य शारीरिक हरकतें सटीकता से रिकॉर्ड कर पाए। उनका यह अध्ययन प्लॉस वन नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

हालांकि शिशु की हरकत सम्बंधी कई अध्ययन किए जाना या निष्कर्षों की पुष्टि किया जाना अभी बाकी है – जैसे कौन-सी बार गर्भधारण किया है, क्या इससे शिशु के लात मारने पर कोई प्रभाव पड़ता है? या शिशु के लिंग और लात मारने के परिमाण के बीच कोई सम्बंध है? उम्मीद है कि इस नए विकसित मॉनीटर से शिशु की हरकत के बारे में और विस्तार से जानने में मदद मिलेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मीठा खाने का मस्तिष्क पर प्रभाव

मीठा खाना हम सबको पसंद है, लेकिन अधिक चीनी के सेवन से वज़न बढ़ने, मोटापे, टाइप-2 मधुमेह और दंत रोग जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मीठा खाने से खुद को रोक पाना इतना कठिन होता है कि मानो मस्तिष्क को मीठा खाने के लिए प्रोग्राम किया गया हो। वैज्ञानिक इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि मोटापा बढ़ाने वाला भोजन मस्तिष्क और व्यवहार को कैसे प्रभावित करता है और इससे निपटने के लिए क्या किया जा सकता है।       

ग्लूकोज़ मस्तिष्क कोशिकाओं सहित अन्य कोशिकाओं के लिए र्इंधन का काम करता है। हमारे आदिम पूर्वजों के लिए मीठे खाद्य पदार्थ ऊर्जा के बेहतरीन स्रोत थे जिसके चलते मनुष्य विशेष रूप से मीठे खाद्य पदार्थों को पसंद करने लगे। कड़वा, खट्टा स्वाद कच्चे फलों का या ज़हरीला हो सकता है।

मीठे का सेवन करने पर हमारे मस्तिष्क की डोपामाइन प्रणाली सक्रिय हो जाती है जो एक तरह के पारितोषिक का काम करती है। इस रसायन को मस्तिष्क एक सकारात्मक संकेत के रूप में दर्ज करता है। यह रसायन उसी कार्य को फिर से करने के लिए प्रेरित करता है और हमारा आकर्षण मिठास के प्रति बढ़ जाता है। लेकिन क्या चीनी का अत्यधिक सेवन मस्तिष्क पर कोई नकारात्मक प्रभाव डालता है?  

न्यूरोप्लास्टिसिटी नामक प्रक्रिया के माध्यम से मस्तिष्क खुद का पुनर्लेखन करता है। दवा या अधिक चीनी युक्त पदार्थों का बार-बार सेवन करने से यह प्रणाली मस्तिष्क को इस उद्दीपन के प्रति उदासीन कर देती है और एक तरह की सहनशीलता उत्पन्न होती है। इसके चलते वही असर प्राप्त करने के लिए आपको उस चीज़ का ज़्यादा मात्रा में सेवन करना होता है। इसे लत लगना कहते हैं। यह विवाद का विषय रहा है कि क्या भोजन की लत लग सकती है।        

ऊर्जा के स्रोत के अलावा कई लोगों में खाने की लालसा तनाव, भूख या भोजन के आकर्षक चित्र देखकर पैदा होती है। इस लालसा को रोकने के लिए हमें अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है। इसमें निषेध न्यूरॉन्स की प्रमुख भूमिका होती है। ये न्यूरॉन्स निर्णय लेने के साथ-साथ नियंत्रण तथा संतुष्टि को टालने का काम करते हैं। ये न्यूरॉन्स मस्तिष्क में ब्रेक की तरह काम करते हैं। चूहों में अध्ययन से पता चला है कि उच्च चीनी युक्त आहार लेने से निषेध न्यूरॉन्स में बदलाव आ सकता है। ऐसे चूहे अपने व्यवहार को नियंत्रित करने में और निर्णय लेने में कम सक्षम पाए गए। इससे लगता है हम जो भी खाते हैं वो इन प्रलोभनों का विरोध करने की हमारी क्षमता को प्रभावित कर सकता है और आहार में बदलाव करना मुश्किल हो सकता है।

हाल के अध्ययन से मालूम चला है कि जो लोग नियमित रूप से उच्च वसा, उच्च चीनी वाले आहार खाते हैं वे भूख न लगने पर भी खाने की लालसा महसूस करते हैं। यानी नियमित रूप से उच्च चीनी युक्त खाद्य पदार्थ खाने से लालसा बढ़ती जाती है।

अध्ययन से पता चला है कि उच्च मात्रा में चीनी आहार लेने वाले चूहों में याददाश्त की समस्या उत्पन्न हुई। चीनी के कारण हिप्पोकैम्पस में नए न्यूरॉन्स की कमी पाई गई जो याददाश्त बढ़ाने और उत्तेजना से जुड़े रसायनों में वृद्धि करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। 

अब सवाल यह है कि अपने मस्तिष्क को चीनी से कैसे बचाएं? विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हमें अपने दैनिक कैलोरी सेवन की मात्रा में शक्कर का सेवन केवल 5 प्रतिशत तक सीमित करना चाहिए जो लगभग 25 ग्राम (छह चम्मच) के बराबर है। इसके मद्देनज़र आहार में काफी परिवर्तन की आवश्यकता है। (स्रोत फीचर्स)

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बाल के एक टुकड़े से व्यक्ति की शिनाख्त

पराध विज्ञान में शिनाख्त की एक नई विधि जुड़ने वाली है जो बाल के विश्लेषण पर टिकी है। पहले भी बालों की मदद से व्यक्ति की पहचान की जाती रही है लेकिन वह विधि डीएनए के विश्लेषण पर आधारित रही है। उसके लिए ज़रूरी होता है कि बाल का वह हिस्सा आपके हाथ में आए जिसमें त्वचा का टुकड़ा जुड़ा हो। तथ्य यह है कि बाल का बाहर निकला हिस्सा तो मृत ऊतक होता है जिसमें डीएनए नहीं होता। नई तकनीक बालों में उपस्थित प्रोटीन के विश्लेषण पर आधारित है।

यह तो पहले से पता रहा है कि बालों में उपस्थित प्रोटीन की संरचना व्यक्ति-व्यक्ति में थोड़ी अलग-अलग होती है। प्रोटीन और कुछ नहीं, अमीनो अम्ल से जुड़कर बने पोलीमर होते हैं। अमीनो अम्ल एक खास क्रम में जुड़े होते हैं और इनका क्रम जेनेटिक कोड में विविधता के कारण अलग-अलग हो सकता है। यानी प्रोटीन में अमीनो अम्ल के क्रम से व्यक्ति की पहचान संभव है। लेकिन इसमें एक दिक्कत रही है।

बाल में से प्रोटीन प्राप्त करने की जो विधियां उपलब्ध हैं उनमें बाल को पीसने और तपाने के कई चरण होते हैं। इस दौरान अधिकांश प्रोटीन नष्ट हो जाता है। बचे-खुचे प्रोटीन से हमेशा इतनी विविधता को नहीं पकड़ा जा सकता कि शिनाख्त एकदम विश्वसनीय हो। लेकिन अब नज़ारा बदलने को है।

ज़ेंग ज़ांग के नेतृत्व में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्टैण्डर्ड्स एंड टेक्नॉलॉजी के वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक विकसित कर ली है। जर्नल ऑफ फॉरेंसिक साइन्सेज़ में प्रकाशित शोध पत्र में बताया गया है कि नई तकनीक में पिसाई की ज़रूरत नहीं है, मात्र डिटर्जेंट के घोल में बाल को उबालकर पर्याप्त प्रोटीन मिल जाता है। इसके बाद मास स्पेक्ट्रोमेट्री नामक तकनीक से प्रोटीन का विश्लेषण करके ज़ांग की टीम ने कई सारे पेप्टाइड्स (प्रोटीन के छोटे-छोटे खंड) प्राप्त करके उनमें विविधता को रिकॉर्ड किया है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि निकट भविष्य में यह तकनीक अदालतों में पहुंच जाएगी। लेकिन उससे पहले देखना होगा कि दो व्यक्तियों में एक-से प्रोटीन मिलने की संभावना कितने प्रतिशत है। इसके अलावा इस बात की भी जांच करनी होगी कि बालों को डाई करने का प्रोटीन पर क्या असर पड़ता है और उम्र के साथ प्रोटीन की संरचना कैसे बदलती है। कुल मिलाकर, ‘निकट भविष्य’ उतना निकट भी नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
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जेनेटिक परिवर्तित धान उगाएगा बांग्लादेश

धान की एक किस्म विकसित की गई है जिसमें ऐसे गुण जोड़ दिए गए हैं कि वह बचपन के अंधत्व की रोकथाम में मदद करता है। इसे गोल्डन राइस नाम दिया गया है। गोल्डन राइस का विकास लगभग 20 वर्ष पहले हुआ था और तब से ही यह जेनेटिक रूप से परिवर्तित फसलों की बहस का केंद्र रहा है। समर्थकों का दावा है कि अंधत्व निवारण में मदद करके यह मानवता के लिए लाभदायक साबित होगा, वहीं विरोधियों का मत है कि इसे उगाने में कई खतरे हैं और विकाससील देशों में स्वास्थ्य सुधार की दृष्टि से यह अनावश्यक है क्योंकि स्वास्थ्य सुधार के लिए अन्य उपाय अपनाए जा सकते हैं।

अब लग रहा है कि शायद बांग्लादेश गोल्डन धान को उगाने की अनुमति देने वाले पहला देश बन जाएगा। इंग्लैंड के रॉथमस्टेड रिसर्च स्टेशन के पादप बायोटेक्नॉलॉजी विशेषज्ञ जोनाथन नेपियर का कहना है कि बांग्लादेश इसे अनुमति देता है, तो स्पष्ट हो जाएगा कि सार्वजनिक पैसे से खेती में बायोटेक्नॉलॉजी का विकास संभव है। पर्यावरणविद अभी इस तरह की फसलों का विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसी फसलों को उगाना पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ करने जैसा है।

गोल्डन धान का विकास 1990 के दशक में जर्मन वैज्ञानिकों इंगो पॉट्राइकस और पीटर बेयर ने किया था। उन्होंने इसमें एक ऐसा जीन जोड़ा था जो धान के पौधे में विटामिन ए की मात्रा बढ़ाएगा। यह जीन उन्होंने मक्का से निकाला था। इस तरह विकसित पौधा उन्होंने सार्वजनिक कृषि संस्थानों को सौंप दिया था। विटामिन ए की कमी बचपन में होने वाले अंधत्व का एक प्रमुख कारण है। इसके अलावा, विटामिन ए की कमी से बच्चे ज़्यादा बीमार पड़ते हैं। बांग्लादेश जैसे जिन इलाकों में चावल मुख्य भोजन है, वहां विटामिन ए की कमी एक प्रमुख समस्या है। बांग्लादेश में लगभग 21 प्रतिशत बच्चे इससे पीड़ित हैं।

पिछले दो वर्षों में यू.एस., कनाडा, न्यूज़ीलैंड तथा ऑस्ट्रेलिया गोल्डन चावल के उपभोग की अनुमति दे चुके हैं किंतु इन देशों में इसे उगाने की कोई योजना फिलहाल नहीं है।

बांग्लादेश में जिस गोल्डन धान को उगाने की बात चल रही है वह वहीं की एक स्थानीय किस्म धान-29 में नया जीन जोड़कर तैयार की गई है। बांग्लादेश के कृषि वैज्ञानिकों का मत है कि इसे उगाने में कोई समस्या नहीं आएगी और गुणवत्ता में भी कोई फर्क नहीं है। बांग्लादेश राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (बी.आर.आर.आई.) ने अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंप दी है और जैव सुरक्षा समिति ने भी इसकी जांच लगभग पूरी कर ली है। लगता है जल्दी ही इसे मंज़ूरी मिल जाएगी। (स्रोत फीचर्स)

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विष्ठा प्रत्यारोपण से मौत?

विष्ठा प्रत्यारोपण यानी किसी स्वस्थ व्यक्ति की विष्ठा में उपस्थित सूक्ष्मजीव किसी ऐसे व्यक्ति की आंतों में प्रविष्ट कराए जाते हैं जो आंतों में सूक्ष्मजीव संसार के अभाव के कारण रोगग्रस्त है। फिलहाल विष्ठा प्रत्यारोपण जैसे उपचार का सहारा उन मामलों में लिया जा रहा है जहां कोई व्यक्ति क्लॉस्ट्रिडियम डिफिसाइल के संक्रमण से त्रस्त हो, जो जानलेवा भी साबित हो सकता है। अब विष्ठा प्रत्यारोपण को सामान्य रूप से ऐसी तकलीफों के लिए भी आज़माया जा रहा है जो क्लॉस्ट्रिडियम डिफिसाइल के कारण उत्पन्न न हुई हों।

पहले किसी स्वस्थ व्यक्ति की विष्ठा में से सूक्ष्मजीवों को पृथक किया जाता है और फिर इनकी गोली/कैप्सूल बनाकर या एनिमा के माध्यम से रोगी व्यक्ति की आंतों में पहुंचाया जाता है। इस उपचार के क्लीनिकल परीक्षण के दौरान काफी सावधानी की आवश्यकता होती है। यह क्लीनिकल परीक्षण मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल में किया जा रहा है। दी न्यू इंगलैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक इस परीक्षण में दो व्यक्ति शामिल थे और दोनों को एक ही व्यक्ति की विष्ठा प्रत्यारोपित की गई थी। जांच इस बात की हो रही थी कि लीवर के रोग के मामले में विष्ठा प्रत्यारोपण कितना कारगर हो सकता है।

प्रत्यारोपण के अंतिम चरण के आठ दिन बाद एक 73 वर्षीय मरीज़ को बुखार आ गया और ठंड लगने लगी। उसकी मानसिक हालत भी बिगड़ गई और पूरे शरीर में ऐसे लक्षण दिखने लगे जैसे उसका शरीर किसी संक्रमण से लड़ रहा हो। दो दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई। उसके रक्त में दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया ई. कोली पाया गया।

दूसरा मरीज़ 69 वर्षीय था। वह भी इसी प्रकार की अस्वस्थता का शिकार हुआ और उसके खून में भी दवा-प्रतिरोधी ई. कोली मिला लेकिन उसके संक्रमण को दवाइयों से काबू कर लिया गया। इस क्लीनिकल परीक्षण की सुनवाई करके तय किया जाएगा कि यदि आगे बढ़ना है तो कैसे कदम उठाने होंगे। (स्रोत फीचर्स)
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हम भाषा कैसे सीखते हैं – डॉ. डी. बालसुब्रामण्यन

हम मनुष्यों ने अपने शरीर की जैविक विशेषताओं और उनकी कार्य-प्रणाली को समझने के लिए कई जंतुओं को मॉडल के तौर पर उपयोग किया है। जैसे फल मक्खी (ड्रॉसोफिला) का अध्ययन कई जीन्स की पहचान करने और यह जानने के लिए किया गया है कि उनमें होने वाले उत्परिवर्तनों के शारीरिक और जैव-रासायनिक प्रभाव क्या होते हैं। सेनोरेब्डाइटिस एलेगेन्स नामक एक पारदर्शी कृमि के कई जीन मनुष्यों के जीन की तरह कार्य करते हैं। चूहा, मूषक और खरगोश इनसे थोड़े उच्च स्तर के जानवर हैं, जिन पर अध्ययन करके शरीर की कार्य-प्रणाली को और बेहतर समझने मदद मिलती है। प्रयोगशाला में इन जानवरों को पालना भी आसान होता है। इसके अलावा एक फायदा यह होता है कि इनका जीवनकाल छोटा होता है जिसके चलते जन्म से लेकर युवावस्था, वृद्धावस्था और मृत्यु तक प्रत्येक चरण का अवलोकन छोटी-सी अवधि में किया जा सकता है।

लेकिन जब मस्तिष्क या तंत्रिका सम्बंधी कुछ कार्यों के बारे में जानने की बात आती है तब उपरोक्त मॉडल जंतु उतने बेहतर साबित नहीं होते। जैसे – हम कैसे बोलते हैं, गाते हैं या अन्य भाषाओं और शब्दों को बोलते और उनकी नकल करते हैं। कुछ वैज्ञानिकों ने इन बातों को समझने के लिए हमारे करीबी चिम्पैंज़ी पर अध्ययन किए लेकिन ज़्यादा सफलता नहीं मिली। इसी तरह के एक अध्ययन में दो मनोवैज्ञानिकों सी. हेस और के. हेस ने एक मादा शिशु चिम्पैंज़ी (विकी) को गोद लिया और अपने बच्चे की तरह पाला और उसे इंसानी भाषा बोलना सिखाने की कोशिश की। लेकिन अफसोस कि विकी ‘मम्मा’, ‘पापा’, ‘अप’ और ‘कप’ बोलने की कोशिश करने के अलावा और कुछ नहीं बोल पाई। इस कोशिश के दौरान धीरे-धीरे जबड़ों और होंठों को आकार देकर बोलने की लाख कोशिश के बाद भी विकी इन शब्दों के अलावा और कुछ नहीं बोल पाई। इससे लगता है कि विकी अपने तंत्रिका तंत्र और शारीरिक संरचना के दम पर सिर्फ चिम्पैंज़ियों की ही आवाज़ निकाल सकती है, मनुष्य के बोलने की नकल नहीं कर सकती।

इसी तरह, एक अन्य वैज्ञानिक द्वय, गार्डनर दंपत्ति ने वाशो नामक चिम्पैंज़ी को अपने घर पर पाला। वाशो का प्रदर्शन विकी से इस मायने में थोड़ा बेहतर रहा कि वह एक विदेशी भाषा सीख सकी। यह विदेशी भाषा बोली जाने वाली भाषा नहीं बल्कि एक सांकेतिक भाषा थी – अमेरिकन साइन लैंग्वेज (ASL)। वाशो ने अधिकतम 250 ASL संकेत सीखे और इसी सांकेतिक भाषा में कुछ सवालों के जवाब भी दिए। इससे लगता है कि चिम्पैंज़ियों में बोलने सम्बंधी आवश्यक शारीरिक-संरचनात्मक ‘हार्डवेयर’ तो अनुपस्थित है लेकिन भाषा सीखने सम्बंधी ‘सॉफ्टवेयर’ कुछ हद तक मौजूद है। और हम मनुष्यों में इसके लिए उपयुक्त ‘हार्डवेयर’ और ‘सॉफ्टवेयर’ दोनों हैं।

जंतु मॉडल

लिहाज़ा, जंतुओं पर अध्ययन करके मनुष्य कैसे बोलते हैं, गाते हैं, विदेशी भाषा का उच्चारण करते और सीखते हैं, और इसी तरह की अन्य दिमागी गतिविधियों की कार्यप्रणाली को समझने के लिए हमें जैव विकास में और पीछे जाना होगा। हमें यह देखना होगा कि कौन-से अन्य जंतु इसी तरह की गतिविधियां करते हैं, उनके मस्तिष्क का कौन-सा हिस्सा इन गतिविधियों के लिए ज़िम्मेदार है, और मानव मस्तिष्क में इन समानताओं को पहचानना होगा। और इसके लिए सबसे बेहतर मॉडल जंतु हैं तोता, मैना, फिंच, हमिंगबर्ड जैसे गायक पक्षी (सॉन्गबर्ड)। हममें से कई लोग तोता पालते हैं और देखते हैं कि तोते ना सिर्फ स्वयं अपनी भाषा में शब्दों का उच्चारण करते, पुकारते या अपनी प्रजाति के गीत गाते हैं बल्कि वे हमारी भाषा के शब्दों और ध्वनियों की नकल करते हैं, दोहराते हैं और बात करने की भी कोशिश करते हैं। इससे लगता है कि पक्षियों के मस्तिष्क में एक ऐसा हिस्सा है जो उनमें ना सिर्फ उनकी अपनी प्रजातिगत भाषा (जो उन्हें अपने माता-पिता से वंशानुगत ढंग से मिलती है) बोलने-गाने की क्षमता विकसित करने के लिए ज़िम्मेदार है बल्कि अन्य भाषाओं की नकल करना सीखने के लिए भी ज़िम्मेदार है। इनसे हमें कुछ समझ और समांतर उदाहरण मिले हैं जो हमारे बोलने, गाना सीखने की क्षमता वगैरह पर प्रकाश डालते हैं।

इस संदर्भ में अमेरिकन साइंटिस्ट (1970:58:669-673) में प्रकाशित पीटर मार्लर का लेख पठनीय है (यह नेट पर उपलब्ध है)। बिल्ली हो या चिम्पैंज़ी, सभी जानवर अपनी प्रजाति की भाषा (जैसे घुरघुराना, इशारे) सीखने और सम्बंधित ध्वनियां उत्पन्न करने की निहित क्षमता रखते हैं, लेकिन सॉन्गबर्ड और मनुष्य अन्य भाषाएं बोलने और सीखने की क्षमता रखते हैं। सॉन्गबड्र्स लगभग पच्चीस करोड़ साल पहले अस्तित्व में आए थे जबकि मनुष्यों का पदार्पण 20-30 लाख साल पूर्व हुआ था। 

अन्य जानवरों की तरह, सॉन्गबर्ड भी अपनी भाषा प्रजाति के बड़े सदस्यों द्वारा उत्पन्न आवाज़ों की नकल करके सीखते हैं। इसके लिए वे अपनी आवाज़ को इस तरह परिवर्तित करते जाते हैं कि उनकी आवाज़ उन आवाज़ों से मेल खाए जो उन्होंने याद की हैं। नवजात सॉन्गबर्ड बड़बड़ाने जैसी आवाज़ें निकालते हैं, जो कुछ हफ्तों के बाद उनकी अपनी प्रजाति की भाषा में तब्दील हो जाती है। दूसरे शब्दों में, ये पक्षी-उपगीत आगे चलकर मुकम्मल पक्षी-गीत बन जाते हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह मनुष्य का नवजात शिशु शुरुआत में कई तरह की आवाज़ें निकालता रहता है, जो आगे चलकर घर में बोली जाने वाली उसकी अपनी भाषा का रूप ले लेती हैं।

2005 में प्लॉस बायोलॉजी में एफ. नोटलबोम द्वारा प्रकाशित समीक्षा बताती है कि इसके पीछे मस्तिष्क के अलग-अलग स्पष्ट हिस्सों, जिन्हें नाभिक कहते हैं, का एक समूह होता है और उनको जोड़ने वाले तंत्रिका मार्ग होते हैं। इस पूरी व्यवस्था को गीत-तंत्र या गीत-नाभिक कहते हैं। हमिंगबर्ड (या तोते जैसे अन्य सॉन्गबर्ड) के मस्तिष्क में 7 अलग-अलग संरचनाएं होती हैं जो गाने के दौरान सक्रिय होती हैं। इससे पता चलता है कि ये संरचनाएं भौतिक व कार्यात्मक वाणी-नाभिक हैं। भाषा सीखने में सक्षम पक्षियों में उनके मस्तिष्क का अग्रभाग दो उप-पथों में बंटा हुआ लगता है: पहला, सीखी हुई आवाज़ें पैदा करने के लिए ज़िम्मेदार क्रियाकारी हिस्सा और दूसरा एक लूप जो इन गीतों या आवाज़ों में परिवर्तन की गुंजाइश पैदा करता है। हमारे मस्तिष्क के अग्रभाग की संरचना भी इसी तरह की होती है।

इसी कड़ी में जापानी शोधकर्ता होंगदी वांग और उनके साथियों का एक दिलचस्प शोध पत्र प्लॉस बायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। उन्होंने दो फिंच पक्षी, ज़ेब्राा फिंच (z) और ऑउल फिंच (o), के गीतों के पैटर्न और उनके गीत-नाभिक में अभिव्यक्त होने वाले जीन्स का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि दोनों प्रजातियों (z और o) के जीन के व्यवहार में लगभग 10 प्रतिशत अंतर था, जो उनके भिन्न प्रजाति गीत के लिए ज़िम्मेदार था। इसके बाद उन्होंने दोनों प्रजातियों के बीच प्रजनन करवा कर दो संकर प्रजातियां, zo और oz, विकसित कीं और उनके द्वारा गाए जाने वाले गीतों को रिकार्ड किया। उन्होंने पाया कि zo ने अपने माता-पिता दोनों की प्रजाति, ज़ेब्रा और आउल, के गीत गाए। इसी तरह oz ने भी दोनों प्रजातियों के गीत गाए। ऐसी अन्य प्रजातियों के बीच प्रजनन करवाकर इस बारे में बेहतर समझ बनाने में मदद मिल सकती है। लेकिन, मनुष्यों के साथ इस तरह के अध्ययन नहीं किए जा सकते। (स्रोत फीचर्स)
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क्या पढ़ने की गति बढ़ाना संभव है?

आज के समय में, जब किताबों के अलावा अन्य स्रोतों जैसे इंटरनेट, ऐप्स वगैरह पर पढ़ने के लिए काफी सामग्री उपलब्ध है तब लोगों के पास पढ़ने के लिए पर्याप्त वक्त ही नहीं है। ऐसे में यदि आपके पढ़ने की गति बढ़ जाए तो क्या कहने। इसी इच्छा को पूरा करने का दावा कई कोचिंग क्लास, कोर्स, किताबें और ऐप्स कर रहे हैं। इनका दावा है कि वे आपके पढ़ने की गति बढ़ा सकते हैं। तेज़ गति से पढ़ने का मतलब है – पढ़ने की सामान्य गति की तुलना में कम से कम तीन गुना अधिक गति से, सही समझ के साथ पढ़ना। 

लेकिन इस मामले में, युनिवर्सिटी ऑफ साउथ फ्लोरिडा की संज्ञान विज्ञानी एलिज़ाबेथ शॉटर का कहना है कि वास्तव में पढ़ने की गति इतनी बढ़ाना संभव नहीं है। वे बताती हैं कि पढ़ना एक जटिल कार्य है जिसमें मस्तिष्क की कई कार्य-प्रणालियों के बीच तालमेल की आवश्यकता होती है। पढ़ने के लिए आंखें पहले शब्द देखती हैं; फिर उस शब्द का अर्थ और उससे जुड़ी अन्य जानकारियां निकाली जाती हैं; फिर वाक्य के साथ और व्यापक संदर्भ में उस शब्द का अर्थ जोड़ा जाता है; और इसके बाद तय किया जाता है आंखें अब कहां देखेंगी। पढ़ने में कभी-कभी पीछे जाकर दोबारा पढ़ने की भी ज़रूरत पड़ती है। यह सब काफी तेज़ गति से होता है। एक अच्छा पढ़ने वाला व्यक्ति प्रति मिनट 200 से 300 शब्द पढ़ सकता है।

असल में 1959 में एवलिन वुड्स ने एक रीडिंग डाएनामिक्स प्रोग्राम शुरू किया था जिसके अनुसार एक बार में पूरा पैराग्राफ को पढ़ने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित कर, पढ़ने की गति को बढ़ाया जा सकता है। उस वक्त उनका यह प्रोग्राम इतना लोकप्रिय हुआ था कि राष्ट्रपति कैनेडी, निक्सन और कार्टर ने अपने स्टाफ को यह कोर्स करने के लिए भेजा था। और तब से अब तक कई किताबें, क्लास, कोर्स, ऐप्स वगैरह अलग-अलग तरीकों से पढ़ने की गति बढ़ाने की पेशकश करते हैं।

लेकिन कई अध्ययन यह बताते हैं कि आंखें पूरे दृश्य क्षेत्र के कुछ हिस्से को ही स्पष्ट देखती हैं। जिसके कारण एक बार में पूरा पैराग्राफ देखना और पढ़ पाना असंभव है। पढ़ने की समझ शब्दों को पहचानने की क्षमता है, इसलिए आंखों को तेज़ी से पाठ पर फेरने से पढ़ने की गति बढ़ाने मदद नहीं मिलेगी। इसके अलावा पढ़ने के लिए शब्दों को एक क्रम में देखने की ज़रूरत होती है इसलिए बेतरतीब देखने से पढ़ने की गुणवत्ता में कमी ही आएगी।

पढ़ने की गति बढ़ाने के एक अन्य तरीके में सिखाया जाता है कि पढ़ते समय आने वाली अपनी खुद की आवाज़ को दबा देना चाहिए ताकि वह आपके पढ़ने की गति को धीमा ना करे। लेकिन शोध कहते हैं कि आवाज़ को दबाने से जो आप जो पढ़ रहे हैं उसे समझने में मुश्किल होती है।

एक अन्य तरीके में, एक ऐप की मदद से निश्चित गति से एक के बाद एक शब्द दिखाए जाते हैं। इससे आंखें एक बार में एक शब्द पर ही केंद्रित होती हैं। लेकिन इस तरीके के साथ समस्या यह है कि कई बार आपको कोई शब्द या वाक्य दोबारा पढ़ने की ज़रूरत होती है।

शॉटर का कहना है कि सभी के पढ़ने की गति अलग-अलग होती है। कई कारणों से कुछ लोगों के पढ़ने की गति ज़्यादा तेज़ होती है। मगर पढ़ने की गति तिगुनी करने या प्रति मिनट 15,000 शब्द पढ़ने के दावे संदेहपूर्ण हैं। (स्रोत फीचर्स)

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क्या आपका डीएनए सुरक्षित है?

शायद पहली बार एक यूएस न्यायाधीश ने सार्वजनिक डीएनए डैटाबेस, GED match, को आदेश दिया है कि वह पुलिस को उसके पास उपलब्ध 13 लाख डीएनए प्रोफाइल को खंगालने दे। वास्तव में यह अनुमति एक आदतन बलात्कारी को पकड़ने के लिए दी गई है। पुलिस चाहती है कि बलात्कारी व्यक्ति के दूर के रिश्तेदारों की जानकारी प्राप्त हो जाए ताकि संदिग्ध व्यक्ति को पहचाना जा सके।     

उपभोक्ताओं का मानना है कि इस तरह के अधिकार मिलने से ancestry.com और 23and Me ग्ड्ढ जैसी डीएनए साइट्स पर भी पुलिस द्वारा खोज की संभावना बन सकती है। गौरतलब है कि कंपनी की इन साइट्स पर लोग स्वेच्छा से अपने डीएनए का नमूना जमा करते हैं और यह जानकारी गोपनीय रहती है।

पुलिस ने पहले भी अपराध स्थल से मिले डीएनए की GEDmatch डैटाबेस से तुलना करके कई अन्य मामलों को सुलझाया है। लेकिन उपभोक्ताओं में इसकी वास्तविक चिंता डैटा की गोपनीयता को लेकर है। साथ ही ऐसी आशंका भी है कि जिन रिश्तेदारों ने कभी डीएनए परीक्षण नहीं करवाया है वो भी संदेह के दायरे में आ सकते हैं। ज्ञात रहे कि इससे पहले GEDmatch केवल उन्हीं लोगों के डीएनए प्रोफाइल उपलब्ध कराती थी जिसकी सहमति खुद लोगों ने दी थी। यू.एस. डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने भी एक संशोधन जारी करके केवल हिंसक अपराधों और उपभोक्ताओं की अनुमति से ही जानकारी देने की व्यवस्था कर दी। ताज़ा आदेश इस सबको अनदेखा करके आया है।      

मेरीलैंड केरी स्कूल ऑफ लॉ की प्रोफेसर नताली रैम से साक्षात्कार में कुछ बातें सामने आई हैं। इस मामले को एक विशेष परिस्थिति के रूप में लिया जा सकता है। लेकिन यदि 13 लाख लोगों के डैटाबेस में 60 प्रतिशत युरोपीय मूल के अमेरिकी हैं जिनका दूर का चचेरा भाई या बहन या कोई करीबी रिश्तेदार इस डैटाबेस में है तो उसको ट्रैक करना काफी आसान हो जाएगा। इस संदर्भ में केवल डीएनए के आधार पर कुछ गुनहगारों को पकड़ने के लिए पुलिस एजेंसियों के हाथ कई बेगुनाह लोगों का डीएनए होगा।

हालांकि GEDmatch तो एक छोटा मोटा डैटाबेस है लेकिन 23and Me और ancestry.com जैसी अन्य कंपनियों के पास यदि कोई ऐसा वारंट आता है तो वे इसे चुनौती देने के लिए तैयार हैं।

यदि कोई कंपनी इस वारंट का अनुपालन करने से मना कर देती है तब इस वारंट पर और अधिक कार्य किया जाएगा ताकि इसको वैध बनाया जा सके। वैकल्पिक रूप से यदि कंपनियां जानकारी दे भी देती हैं और किसी व्यक्ति के अभियोजन की संभावना भी बनती है तो व्यक्ति गैर-कानूनी खोज के खिलाफ आवाज़ उठाकर वारंट पर ही सवाल उठा सकता है। नताली का मानना है कि यह प्रक्रिया काफी जटिल है। इस विषय में यह स्पष्ट नहीं है कि डीएनए कंपनी या अपराधी गोपनीयता के अधिकार के तहत इस वारंट को चुनौती दे सकते हैं। ऐसी परिस्थिति में प्रभावी ढंग से वारंट को चुनौती देना मुश्किल है।

नताली का ऐसा मानना है कि यदि इस तरह के वारंट जारी होते रहे तो डीएनए डैटा रखने वाली साइट्स को काफी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। इसमें सबसे पहले तो सार्वजनिक आक्रोश का सामना करना पड़ सकता है। एक रास्ता है कि एक कानून बना दिया जाए जिसके तहत शासकीय एजेंसियों द्वारा फॉरेंसिक वंशावली खोजों पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस द्वारा आनुवंशिक वंशावली की खोज पर कुछ सीमाएं लगाई जा सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मनुष्य प्रजाति के सटीक जन्मस्थान का दावा

क नए आनुवंशिक अध्ययन का दावा है कि आधुनिक मनुष्य (होमो सेपियन्स) की उत्पत्ति का विशिष्ट स्थान पता चल गया है। जीवाश्म और डीएनए अध्ययनों के आधार पर यह तो पहले ही पता चल चुका है कि आधुनिक मानव की उत्पत्ति अफ्रीका में लगभग ढाई से तीन लाख वर्ष पहले हुई थी। लेकिन होमो सेपियन्स के प्राचीन जीवाश्म पूरे अफ्रीका में पाए जाते हैं और अफ्रीकी जीवाश्मों में डीएनए बहुत कम मिला है। इसलिए वैज्ञानिक एक विशिष्ट जन्मस्थान का पता लगाने में असमर्थ रहे हैं।

इस नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 200 जीवित लोगों के रक्त के नमूने लिए जिनके डीएनए के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। इनमें खोइसन भाषा बोलने वाले नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के शिकारी और संग्रहकर्ता भी शामिल थे। शोधकर्ताओं ने उनके माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (mtDNA) की तुलना डैटाबेस में उपलब्ध 1000 से अधिक अफ्रीकियों, खासकर दक्षिण अफ्रीकी लोगों, के माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए से की। गौरतलब है कि mtDNA एक ऐसा डीएनए है जो केवल माताओं से विरासत में मिलता है। इसके बाद शोधकर्ताओं ने सभी डीएनए नमूनों में आपस में सम्बंध देखने की कोशिश की। 

पूर्व में किए गए अध्ययनों के इस निष्कर्ष की पुष्टि इस अध्ययन से प्राप्त डैटा से हुई कि खोइसन भाषियों में पाया जाने वाला mtDNA क्रम – L0 – जीवित लोगों में सबसे पुराना mtDNA वंशानुक्रम है। नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इस शोध से L0 की उत्पत्ति का समय भी निर्धारित हो जाता है – आज से लगभग 2 लाख वर्ष पूर्व। चूंकि यह क्रम आज केवल दक्षिण अफ्रीका के लोगों में पाया जाता है तो इसका मतलब है कि L0 क्रम वाले लोग दक्षिण अफ्रीका में रहा करते थे और वही समस्त जीवित मनुष्यों के पूर्वज हैं। सिडनी स्थित गार्वन मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट की वेनेसा हेस और उनके साथियों का मानना है कि विशिष्ट रूप से यह स्थान आज के उत्तरी बोत्सवाना का कालाहारी क्षेत्र है। हालांकि इसका अधिकतर क्षेत्र रेगिस्तान में बदल चुका है लेकिन जलवायु आंकड़ों के अनुसार, डेढ़-दो लाख वर्ष पूर्व यह काफी हरा-भरा था जिसके नज़दीक अफ्रीका की सबसे बड़ी झील स्थित थी। टीम का मानना है कि L0 mtDNA वाले लोग लगभग 1.3 से 1.1 लाख साल पूर्व कालाहारी क्षेत्र में रहते थे।

बहरहाल, कई विशेषज्ञ दक्षिण अफ्रीका को मानव विकास का महत्वपूर्ण क्षेत्र तो मानते हैं लेकिन इस अध्ययन को इतना व्यापक नहीं मानते हैं कि जीवित लोगों के डीएनए से मानव प्रजाति के जन्मस्थान का सटीकता से पता लगाया जा सके। इन विशेषज्ञों का मानना है कि mtDNA के अलावा यदि शोधकर्ता पिता से प्राप्त वाय गुणसूत्र के विकास या माता-पिता से प्राप्त जीन का पता लगाते तो उन्हें अलग जवाब मिल सकते थे। हेस का मत है कि mtDNA भ्रूण के विकास के दौरान अन्य डीएनए की तरह नहीं बदलता है। इसलिए इसका उपयोग महिला पूर्वजों का पता लगाने के लिए किया जा सकता है।

कुछ आलोचकों का मानना है कि खोइसन बोलने वाली L0 mtDNA वाली महिला पूर्वज 2 लाख वर्ष पूर्व दक्षिण अफ्रीका की एक बड़ी आबादी का हिस्सा थीं जिनके वंशज दक्षिण अफ्रीका के बाहर फैल गए। लंदन स्थित फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट के आनुवंशिकीविद पोंटस स्कोग्लुंड का मानना है कि आबादियों में इतना अधिक मेलजोल होता है कि जीवित मनुष्यों के डीएनए से 70 हज़ार से 2 लाख वर्ष पहले की जनसंख्या के बारे में पता कर पानी काफी हद तक सीमित हो जाता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बोतल से दूध पिलाने की प्रथा हज़ारों सालों से है – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

ब्रिस्टल विश्वविद्यालय, ब्रिटेन की जूली डन के नेतृत्व में युरोप के  पुरातत्वविदों की एक टीम ने काफी दिलचस्प रिपोर्ट प्रस्तुत की है। “Milk of ruminants in ceramic baby bottles from prehistoric child graves” (बच्चों की प्रागैतिहासिक कब्रों में सिरेमिक बोतलों पर जुगाली करने वाले जानवरों के दूध के अवशेष) शीर्षक से यह रिपोर्ट नेचर पत्रिका के 10 अक्टूबर के अंक में प्रकाशित हुई है। इस टीम को बच्चों की प्राचीन कब्रों में शिशुओं की कुछ बोतलें मिली है जिनमें कुछ अंडाकार और हैंडल वाली हैं और कुछ बोतलों में टोंटी जैसी रचना है जिसके माध्यम से तरल पदार्थ को ढाला या चूसा जा सकता था। सबसे पुरानी बोतल युरोपीय नवपाषाण युग (लगभग 10,000 वर्ष पहले) की है जबकि अन्य बोतलें कांस्य और लौह युग (4000-1200 ईसा पूर्व) स्थलों से पाई गई हैं।       

नेचर की इस रिपोर्ट में एक दिलचस्प बात और है। सिरेमिक से बनी शिशु बोतलों के अंदरूनी हिस्से पर कुछ कार्बनिक रसायन के अवशेष चिपके मिले जिनका विश्लेषण संभव था। टीम ने उन अवशेषों को अलग करके नवीनतम रासायनिक और वर्णक्रमदर्शी विधियों की मदद से उनमें उपस्थित अणुओं का विश्लेषण किया। सभी अवशेषों में वसा अम्ल (जैसे पामिटिक और स्टीयरिक अम्ल) पाए गए जो आम तौर पर गाय-भैंस, भेड़ या अन्य पालतू जानवरों के दूध में तो पाए जाते हैं लेकिन मानव दूध में नहीं। इस आधार पर टीम का निष्कर्ष है कि “रासायनिक प्रमाण और बच्चों की कब्रों में पाए गए विशेष रूप से बने तीन पात्र दर्शाते हैं कि इनका उपयोग शिशुओं और पूरक आहार के तौर पर बच्चों को (मानव दूध की बजाय) पशुओं का दूध पिलाने के लिए किया जाता था।”                    

पशु दूध की शुरुआत

उपरोक्त शोध पत्र में राशेल हॉउक्रॉफ्ट और स्टॉकहोम युनिवर्सिटी, स्वीडन की पुरातात्विक अनुसंधान प्रयोगशाला के अन्य लोगों द्वारा पूर्व में प्रस्तुत एक दिलचस्प रिपोर्ट “The Milky Way: The implications of using animal milk products in infant feeding” (दुग्धगंगा: शिशु आहार में जंतु दुग्ध उत्पादों के उपयोग के निहितार्थ) का उल्लेख किया गया है। यह रिपोर्ट एंथ्रोपोज़ूओलॉजिका जर्नल में प्रकाशित हुई है [47-31-43 (2012)], जो नेट से फ्री डाउनलोड की जा सकती है। मेरी सलाह है कि इस विषय में रुचि रखने वाले इसे ज़रूर पढ़ें। प्रसंगवश बताया जा सकता है कि एंथ्रोपोज़ूओलॉजिका का अर्थ होता है मनुष्यों और अन्य जंतुओं के बीच अंतरक्रिया का अध्ययन।

मानव शिशुओं को पशुओं का दूध पिलाने की प्रथा जानवरों के पालतूकरण के बाद ही शुरू हुई होगी। पालतूकरण की शुरुआत तब हुई होगी जब मनुष्यों ने समुदाय में बसना शुरू किया तथा कृषि एवं अन्य कामों के लिए पशुओं का उपयोग करना शुरू किया। ऐसा माना जाता है कि इसकी शुरुआत लगभग 12,000 वर्ष पहले नव-पाषाण युग में हुई थी; सबसे पहले मध्य-पूर्व में और उसके बाद पश्चिमी और मध्य एशिया तथा युरोप के कुछ हिस्सों में। सामुदायिक जीवन, कृषि और खेती की शुरुआत के बाद से कुत्ते, मवेशियों, बकरियों, ऊंटों (बाद में घोड़ों) को पालतू बनाकर उनको मानवीय ज़रूरतों के लिए उपयोग में लाया गया। उस समय मनुष्य शिकारी-संग्रहकर्ता हुआ करते थे और शिशुओं को दो वर्ष की आयु तक सिर्फ मां का दूध ही पिलाया जाता था।       

नव-पाषाण युग ने मानव व्यवहार को बदल डाला। संतानों की संख्या में वृद्धि हुई, महिलाओं के कार्य करने के तरीकों में बदलाव आए तथा शिशुओं में मां का दूध छुड़ाने की प्रक्रिया भी जल्दी होने लगी। जैसा हॉउक्रॉफ्ट और उनके सहकर्मियों का तर्क है, इसका अर्थ यह हुआ कि इस समय तक मानव शिशुओं को पूरक भोजन के रूप में पशु का दूध दिया जाने लगा था। इसने माताओं को अपनी प्रजनन रणनीति को बदलने में भी समर्थ बनाया (कितने बच्चे, कितने समय में पैदा करें और कितनी जल्दी दूध छुड़ाएं)। 

हमने कुत्तों को लगभग 10,000-4400 ईसा पूर्व के आसपास, गाय और भेड़ों को लगभग 11,000-9000 ईसा पूर्व, ऊंटों तथा घोड़ों को लगभग 3000 ईसा पूर्व में पालतू बनाया। हालांकि ऊपर बताए गए जीवों में से हम केवल गायों, बकरियों और भेड़ों के दूध का उपयोग करते हैं लेकिन अफ्रीकियों द्वारा ऊंटनी के दूध का भी उपयोग किया जाता था। दूध के लिए जुगाली करने वाले जीवों को पसंद करना वास्तव में आज़माइश और उपयुक्तता के अनुभव से आया है। जुगाली करने वाले प्राणियों में गाय-भैंस, भेड़, बकरी और ऊंट आते हैं। इनका पेट अलग-अलग भागों में बंटा होता है, जिसमें भोजन जल्दी से निगल लिया जाता है और बाद में जुगाली के बाद प्रथम आमाशय में जाता है जो इन जीवों का मुख्य पाचन अंग है। ध्यान देने वाली बात यह है कि हमने कभी कुत्तों या घोड़ों के दूध का उपयोग नहीं किया है – पता नहीं क्यों?

जुगाली पशुओं का दूध

हॉउक्रॉफ्ट और उनकी टीम ने अपने पेपर में मानव और जुगाली करने वाले जीवों के दूध के संघटन की तुलना की है। मानव की तुलना में भेड़ के दूध में उच्च ठोस घटक होता है: कम पानी, कम कार्बोहाइड्रेट, अधिक प्रोटीन तथा लिपिड और भरपूर उर्जा। जहां उच्च प्रोटीन युक्त दूध बोतल से दूध पीने वाले शिशुओं में तेज़ विकास में मदद कर सकता है, वहीं यह एसिडिटी और अतिसार का कारण भी बन सकता है। भेड़ की तुलना में गाय के दूध में प्रोटीन और वसा की मात्रा थोड़ी कम होती है (हालांकि, मानव दूध की तुलना में तीन गुना अधिक होती है), फिर भी यह भेड़ के दूध के समान लक्षण पैदा कर सकता है। इसके साथ ही जुगाली करने वाले जीवों के दूध में कुछ ऐसे एंज़ाइम की कमी होती है जो मानव दूध में पाए जाते हैं। ये एंज़ाइम संक्रमण से लड़ने और ज़रूरी खनिज पदार्थों को अवशोषित करने में मदद करते हैं। कुछ सुरक्षात्मक और हानिकारक अंतरों के साथ, मानव दूध के स्थान पर पूरी तरह जुगाली-जीवों के दूध का उपयोग करने की बजाय इनका उपयोग पूरक के तौर पर करना बेहतर है। इसी चीज़ को शुरुआती मनुष्यों ने कर-करके सीखा होगा। इसी के आधार पर उन्होंने ‘फीडिंग बोतल’ और चीनी मिट्टी के पात्र बनाने तथा उपयोग करना शुरू किया होगा।    

शोधकर्ता आगे बताते हैं कि दूध से दही बनाकर इसे संरक्षित किया जा सकता है। यह लैक्टोज़ की मात्रा कम करता है और पाचन में मदद करता है। इसके पीछे एंज़ाइम लैक्टेज़ की भूमिका है। उनका निष्कर्ष है कि “प्रागैतिहासिक शिशुओं के लिए यह दुग्धगंगा शायद इतनी अच्छी न रही हो, लेकिन दही उनके लिए और लैक्टेज़ एंज़ाइम के प्रसार के लिए अच्छा रहा होगा।” 

गौरतलब है कि वसंत शिंदे और पुणे के कुछ सहयोगियों ने भारत में हड़प्पा सभ्यता के स्थानों का व्यापक सर्वेक्षण किया था। उन्होंने 2500 ईसा पूर्व के कालीबंगन के हड़प्पा स्थल से सिरेमिक फीडिंग बोतल के ठोस सबूत पाए थे। हड़प्पावासियों ने भी अपने बच्चों को जानवरों के दूध का सेवन करवाया था। लेकिन वह पशु कौन-सा था? यदि हम इन बोतलों से कोई अवशेष प्राप्त करके अपनी प्रयोगशालाओं में विश्लेषण करने में कामयाब होते हैं तो यह काफी रोमांचक होगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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