डायनासौर धरती पर हावी कैसे हो गए

नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक शोध पत्र इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करता है कि डायनासौर ने पूरी धरती पर दबदबा कैसे कायम किया था। इस बात का सुराग ट्राएसिक युग (25-20 करोड़ वर्ष पूर्व) के अंतिम दौर से लेकर प्रारंभिक जुरासिक युग (20-14.5 करोड़ वर्ष पूर्व) में डायनासौर की विष्ठा (fossilized dung analysis) और वमन जीवाश्मों (Bromalite study) के विश्लेषण से मिला है। डायनासौर के भोजन के अध्ययन से पता चलता है कि कैसे 23-20 करोड़ वर्ष पूर्व के समय में डायनासौर ने अपने सारे प्रतिद्वन्द्वियों को विस्थापित कर दिया था और स्वयं विविध आकारों और साइज़ों (Dinosaur dominance) में विकसित हुए थे। यह घटना प्राचीन सुपर महाद्वीप पैंजिया के एक हिस्से में घटी थी। यह शोध पत्र उपसला विश्वविद्यालय के पुराजीव वैज्ञानिक मार्टिन क्वार्नस्ट्रॉम (Martin Qvarnström ) और उनके साथियों का है।

क्वार्नस्ट्रॉम का कहना है कि आम तौर पर लोग जंतुओं के कंकालों के जीवाश्मों पर ध्यान देते हैं, उनकी विष्ठा पर नहीं, जबकि विष्ठा जानकारी का खज़ाना होती है।

पहले डायनासौर करीब 23 करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी पर अदना किरदारों के रूप में प्रकट हुए थे। उस समय की पारिस्थितिकी में तमाम अन्य किरदार मौजूद थे – विशाल शाकाहारी (डायसिनोडोन्टDicynodonts), बड़े-बड़े शिकारी सरिसृप (रौइसुकिड्सRauisuchids) और मगरमच्छ जैसे जीव। लेकिन 3 करोड़ सालों के अंदर डायनासौर धरती पर छा गए – उन्होंने अपने प्रतिद्वन्द्वियों द्वारा घेरे गए समस्त निशे पर कब्ज़ा कर लिया। पारिस्थितिकी में निशे का मतलब होता है कि कोई प्रजाति अपने परिवेश में क्या भूमिका निभाती है – यानी परिवेश के अन्य सजीव और निर्जीव घटकों से क्या सम्बंध निर्वाह करती है। यह बहस का विषय रहा है कि क्या डायनासौर इसलिए हावी हुए थे कि उनके पास खास किस्म के शारीरिक लक्षण थे या फिर उनके प्रतिद्वन्द्वी जलवायु में हुए बदलाव के कारण परास्त हो गए थे।

क्वार्नस्ट्रॉम और उनके साथियों को लगता था कि इसका सुराग डायनासौर के भोजन में मिलेगा। डायनासौर की खुराक का खुलासा करने के लिए वे पोलिश बेसिन में डायनासौर की विष्ठा और वमन के जीवाश्म की तलाश में जुट गए। यह वह इलाका है जहां से हड्डियों के जीवाश्म और पुराजलवायु सम्बंधी विस्तृत रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। टीम ने तीन मुख्य स्रोतों से प्राचीन भोजन शृंखला का पुनर्निर्माण किया: कोप्रोलाइट (coprolite -विष्ठा जीवाश्म), रीगर्जिएट (Regurgitated fossils – वमन के जीवाश्म) और कोलोलाइट्स (cololites – पाचन तंत्र के जीवाश्मित पदार्थ)। इन तीनों प्रकार के जीवाश्मों का मिला-जुला नाम है ब्रोमालाइट।

शोधकर्ताओं ने नौ जगहों से प्राप्त 532 ब्रोमालाइट्स की जांच की। इसके बाद उन्होंने इन ब्रोमालाइट्स को साइज़, आकृति और पदार्थों के आधार विभिन्न प्राचीन जंतु समूहों (Taxa – टैक्सा) में बांट दिया। उदाहरण के लिए, लंगफिश (Lungfish – फेफड़ों वाली मछलियां) और शार्क की आहार नाल सर्पिलाकार होती है और उनकी विष्ठा ऐंठे हुए भंवर के आकार की होती है। इससे अलग, उभयचर जीव अंडाकार विष्ठा छोड़ते हैं जिसमें मछलियों के शल्क बहुतायत में होते हैं।

खोज स्थल से भी कई सुराग मिले। जैसे कोप्रोलाइट्स प्राय: उससे सम्बंधित जीव की हड्डियों और पदचिंहों के बीच मिलते हैं। उदाहरण के लिए यदि आपको 30 से.मी. से ज़्यादा लंबी/बड़ी विष्ठा मिलती है और जहां आसपास डायनासौर के खूब पदचिंह हैं, तो पक्का है कि उसी की विष्ठा है।

इसके बाद रासायनिक विश्लेषण और सिन्क्रोट्रॉन टोमोग्राफी (Synchrotron tomography) जैसी तकनीकों की मदद से शोधकर्ताओं ने उस काल के भोजन की तहकीकात की। उदाहरण के लिए, जब उन्हें लंबी विष्ठा मिली जिसमें मछलियों के अवशेष भरपूर मात्रा में थे तो उन्होंने माना कि यह विष्ठा मगरमच्छ जैसे किसी सरिसृप ने छोड़ी होगी जिसकी थूथन लंबी होगी और दांत पैने होंगे (Paleorhinus – पैलियोराइनस)। दूसरी ओर यदि गोबर के जीवाश्म में गुबरैले हैं तो वह यकीनन कीटभक्षी सिलेसौरस की करतूत है। सिलेसौरस डायनासौर का निकट सम्बंधी था। आर्कोसौर स्मॉक की विष्ठा के जीवाश्म में उसके शिकार की चबाई हुई हड्डियां और दांत मिले। स्मॉक 5 मीटर लंबा दोपाया शिकारी था जिसके जबड़े निहायत शक्तिशाली और दांत आरीनुमा थे।

इस तरह शोधकर्ताओं ने समय के साथ भोजन में आए परिवर्तनों पर गौर किया तो उन्हें डायनासौर के दबदबा स्थापित होने के नए सुराग मिलते गए।

डायनासौर के पूर्वज छोटे-छोटे सर्वाहारी थे जो ट्राएसिक पारिस्थितिकी में गौण किरदार थे। इनसे शुरुआती डायनासौर का विकास हुआ – जैसे छोटे शिकारी थेरोपॉड्स (Theropods)। ये मूलत: कीट और मछलियां खाते थे। जुरासिक काल के उत्तरार्ध में जलवायु अपेक्षाकृत गर्म और नम होने लगी थी। इसके चलते वनस्पतियों का विस्तार हुआ और शाकाहारी डायनासौर (जाने-माने विशाल लंबी गर्दन वाले सौरोपॉड्स) (Sauropods) के लिए ज़्यादा भोजन उपलब्ध होने लगा। इन्होंने जो विष्ठा छोड़ी है उसमें वनस्पति अवशेष भरपूर मात्रा में पाए गए हैं। सारे संकेत यही दर्शाते हैं कि सौरोपॉड्स भारी मात्रा में बड़ी पत्तियों वाले फर्न खाते थे। धीरे-धीरे ये शाकाहारी विशाल हो गए और साथ ही इनका शिकार करने वाले थेरोपॉड भी।

ट्राएसिक काल के अंतिम दौर का विष्ठा रिकॉर्ड दर्शाता है कि डायनासौर पारिस्थितिकी तंत्र के हर स्तर पर छा चुके थे और उनके गैर-डायनासौर प्रतिद्वन्द्वी विस्थापित हो गए थे। यह पूर्व में अस्थि जीवाश्मों व अन्य प्रमाणों के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों की पुष्टि करता है। इस विषय के शोधकर्ता आम तौर पर स्वीकार कर रहे हैं कि विष्ठा के विश्लेषण से यह पता करना कि कौन किसको खाता था, पारिस्थितिकी तंत्र को समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण है। क्वार्नस्ट्रॉम को उम्मीद है कि यह शोध पत्र अन्य शोधकर्ताओं को भी इस दिशा में काम करने को प्रेरित करेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अथाह महासागर में ये जीव सूंघकर घर लौटते हैं – स्निग्धा दास

नाब, आप तो सूंघकर लज़ीज़ भोजन या किसी खुशबूदार या बदबूदार चीज़ का बखूबी पता लगा लेते होंगे पर कोई आपसे सूंघकर घर तक पहुंचने की बात कर दे तो? यह तो नामुमकिन ही लगेगा, भला कोई अपने घर तक सूंघकर कैसे पहुंच सकता है?

लेकिन कुछ ऐसे जीव हैं जो यह कर पाते हैं। हाल ही में एक और ऐसे ही जीव का पता चला है जो समुद्र की गहराइयों में अपने घर का पता सूंघकर लगा लेते हैं!

महासागर विशाल है और अगर आप एक ऐसे जीव हैं जो महज 1 मिलीमीटर लंबा है, तो वहां खो जाना आसान है। हालांकि, माईसिड्स नामक छोटे झींगा जैसे क्रस्टेशियन्स गहरे पानी में खोह, जो उनका घर होती है, का रास्ता अपनी सूंघने की क्षमता से ढूंढ सकते हैं। यह खोज उन समुद्री जीवों की सूची में एक और जीव जोड़ती है, जो रासायनिक संकेतों का उपयोग करके रास्ता खोजते हैं। इन जीवों में सैल्मन मछली भी शामिल है।

एंडोम मरीन स्टेशन के समुद्री पारिस्थितिकीविद और अध्ययन के लेखक थेरी पेरेज़ कहते हैं, “चौंकाने वाली बात यह थी कि हमने एक सच्चा घर वापसी व्यवहार देखा, माईसिड्स अपनी खोह का पता लगा सकते हैं, लेकिन हर किसी खोह का नहीं – बल्कि वह खोह जहां वे पैदा हुए थे।”

प्रत्येक रात भूमध्य सागर के कुछ हिस्सों में, लाखों माईसिड्स (Hemimysis margalefi) दैनिक प्रवास करते हैं। सूर्यास्त के समय, वे अपने गृह-खोहों को छोड़कर खुले समुद्र में भोजन की तलाश में निकल जाते हैं। शिकारियों से बचने के लिए, वे दिन उगने से पहले खोहों में लौट आते हैं। पिछले शोधों से यह पता चला था कि जब माईसिड्स अपनी खोहों को छोड़ते हैं, तो वे प्रकाश की मदद से मार्ग-निर्धारण करते हैं। लेकिन अंधेरे में ये जीव अपने घर का रास्ता कैसे ढूंढते होंगे?

पेरेज़ और उनके सहयोगियों का विचार था कि जैसे सैल्मन, रासायनिक संकेतों का अनुसरण करके उन नदियों तक पहुंचते हैं जहां वे पैदा हुए थे, वैसे ही माईसिड्स भी अपनी सूंघने की क्षमता का उपयोग करके अंधकार में अपना रास्ता खोजते होंगे।

इस विचार को परखने के लिए, शोधकर्ताओं ने फ्रांस के मार्सेल के पास दक्षिणी तट में पानी के नीचे की दो खोहों से माईसिड्स इकट्ठा किए। फिर, प्रयोगशाला में उन्होंने इनमें से एक-एक जंतु को छोटे Y-आकार के पात्र में रखा। कभी-कभी, Y की एक भुजा माईसिड्स के गृह-खोह से लिए गए समुद्री पानी की ओर जाती थी, जबकि दूसरी भुजा किसी अन्य खोह या स्थान से लिए गए समुद्री पानी की ओर। कभी-कभी ऐसा भी होता था कि दोनों ही भुजाएं गृह-खोह के पानी की ओर नहीं जाती थी। शोधकर्ताओं ने फ्रंटियर्स इन मरीन साइंस जर्नल में बताया है कि माईसिड्स अपनी गृह-खोह का पानी ताड़ लेते थे और उसी में रहना पसंद करते थे।

अपने अध्ययन के दूसरे भाग में, शोधकर्ताओं ने दिखाया कि प्रत्येक खोह से लिया गया पानी अपनी अलग रासायनिक पहचान रखता था, जो शायद माईसिड्स का मार्गदर्शन करता है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में प्रत्येक खोह को उसकी अनूठी ‘गंध’ किस चीज़ से मिलती है। शोधकर्ताओं का मत है कि शायद खोहों में रहने वाले स्पंज द्वारा छोड़े गए यौगिकों की इसमें कुछ भूमिका हो सकती है।

एक समुद्री पारिस्थितिकीविद फर्नांडो काल्डेरोन गुटिरेज़ का मत है कि “अध्ययन बहुत अच्छी तरह से किया गया है, और बहुत सरल है, जो इस अध्ययन की एक खूबसूरती है।” उनका कहना है कि इसी तरह के प्रयोगों से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि क्या अन्य जीव भी रास्ता खोजने के लिए गंध पर निर्भर हैं?

दूसरी ओर, पेरेज़ को कई खतरों का अंदेशा है। जैसे समुद्री प्रदूषण में वृद्धि और कुछ स्पंज प्रजातियों का खोहों से लुप्त होना वगैरह। ये अंततः समुद्र के रासायनिक परिदृश्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। तब, पेरेज़ को डर है कि, माईसिड्स ‘अथाह समुद्र के अंधकार में खो जाएंगे और अपने घर ढूंढने में असमर्थ हो जाएंगे।’ (स्रोत फीचर्स)

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चमकीले समुद्री घोंघे को नाम मिला

समुद्री घोंघे (Marine Snails), जिन्हें न्यूडिब्रांक (Nudibranchs) के नाम से भी जाना जाता है, मोलस्क (Mollusk) की श्रेणी में आते हैं। इनकी लगभग सभी प्रजातियां कोरल रीफ (Coral Reef) से लेकर समुद्री ज्वार (Tidal Pools) के चलते तटों पर बने पानी के पोखरों और उथले समुद्र के पेंदे में रेंगती पाई जाती हैं। लेकिन इनकी एक प्रजाति है जो समुद्र के गहरे और अंधेरे वातावरण (Deep-Sea Environment) में रहना पसंद करती है, ऐसा कहना है डीप-सी रिसर्च पार्ट-I (Deep-Sea Research Part-I) में प्रकाशित रिपोर्ट का।

दरअसल करीब 25 साल पहले मॉन्टेरे बे एक्वेरियम रिसर्च इंस्टीट्यूट (Monterey Bay Aquarium Research Institute) के वैज्ञानिकों ने मॉन्टेरे खाड़ी (Monterey Bay) में करीब ढाई किलोमीटर की गहराई में पहली बार इस जीव को देखा था। यह अपनी चौड़ी पूंछ की मदद से तैर रहा था और बीच-बीच में अपनी जैव-दीप्ति (Bioluminescence) बिखेर रहा था। और हैरत की बात थी कि यह उस गहराई पर रहने वाले किसी ज्ञात जीव जैसा नहीं था।

इसलिए अगले करीब 20-22 वर्षों तक वैज्ञानिक इस जीव पर नज़र रखे रहे। इस अवधि में उन्होंने इसे करीब 150 बार देखा और हर बार यह ओरेगन (Oregon) से लेकर दक्षिणी कैलिफोर्निया (Southern California) तक फैले तट से 1 से 4 किलोमीटर की गहराई पर तैरते हुए दिखाई दिया – इस गहराई पर सूरज की ज़रा भी रोशनी (Sunlight) नहीं पहुंचती। आकार में यह अनोखा जीव बेसबॉल (Baseball) की गेंद जितना बड़ा और पारदर्शी था। घोंघों (Snails) के समान इसका एक मांसल पैर था, इसलिए ऐसा लग रहा था कि यह शायद कोई घोंघा हो। लेकिन जहां समुद्री घोंघे अपने मांसल पैर के सहारे रेंगते हुए आगे बढ़ते हैं, वहीं यह अपने शरीर पर बनी भोंपू नुमा संरचना (Funnel-Like Structure) के सहारे तैरते हुए आगे बढ़ता था। खतरा महसूस होने पर इसकी कांटानुमा (Fork-Like) पूंछ का सिरा चमकने लगता और फिर पूंछ शरीर से छिटककर अलग हो जाती, संभवत: शिकारियों (Predators) का ध्यान भटकाने के लिए।

कुल मिलाकर इन अवलोकनों से वह घोंघों की किसी ज्ञात प्रजाति (Known Species) से मेल खाता नहीं लग रहा था। इसलिए वैज्ञानिकों ने 18 जीवों को पकड़ा और इनके शरीर की आंतरिक संरचना का बारीकी से अवलोकन और आनुवंशिक विश्लेषण (Genetic Analysis) किया। पाया गया कि यह जीव एक तरह का समुद्री घोंघा है, लेकिन ज्ञात प्रजातियों से इतने दूर का सम्बंधी है कि यह अपने कुल का एकमात्र सदस्य है। शोधकर्ताओं ने इसका नाम बेथीडेवियस कॉडेक्टाइलस (Bathydevius caudactylus) रखा है। इसकी मायावी खासियत के कारण जीनस का नाम बेथीडेवियस (Bathydevius) रखा गया है जिसका अर्थ है ‘घोर छलिया’ (Master of Disguise) और इसकी फोर्क जैसी पूंछ के कारण प्रजाति का नाम कॉडेक्टाइलस रखा गया है।

जांच-पड़ताल में इसके पेट में झींगा (Shrimp) के अवशेष भी मिले थे, हालांकि यह अभी पहेली ही है कि ये सुस्त घोंघे फुर्तीले झीगों (Agile Shrimps) का शिकार कैसे करते होंगे। संभवत: उनके शरीर पर बनी भोंपू समान रचना (Funnel Structure) उन्हें मदद करती होगी। बहरहाल, आगे अध्ययन जारी रहेंगे और इससे जुड़ी गुत्थियां सुलझती रहेंगी। (स्रोत फीचर्स)

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तोतों के आकर्षक रंगों का रहस्य

तोते अपने आकर्षक और सुंदर रंगों (bright parrot colors) के लिए मशहूर हैं, जिनमें चटकीले लाल (red), पीले (yellow), आकर्षक हरे (green), और नीले (blue) रंग भी शामिल हैं। वर्षों से, वैज्ञानिक (scientists) इस बात पर हैरान हैं कि ये पक्षी, कई अन्य जानवरों के विपरीत, ऐसे चटकीले रंग कैसे बनाते हैं। साइंस (Science) में प्रकाशित हालिया शोध (recent research) आखिरकार इन शानदार रंगों के पीछे अनोखे जैविक तंत्र (biological mechanism) पर प्रकाश डालता है। 

दरअसल, अधिकांश पक्षियों (birds) में रंग उनके अपने शरीर में नहीं बनते बल्कि उनके खानपान (diet) के साथ आते हैं। जैसे फ्लेमिंगो (flamingo) झींगा खाकर गुलाबी हो जाते हैं। लेकिन तोतों में मामला अलग है। वे अपने बढ़ते हुए पंखों में एक एंज़ाइम (enzyme) की मदद से सिटाकोफल्विन (psittacofulvins) समूह के रंजक (pigments) बनाने के लिए विकसित हुए हैं। इनमें छिटपुट परिवर्तनों (variations) के माध्यम से विभिन्न रंग (colors) पैदा होते हैं। वैसे कुछ रंग दो रंगों के मेल से भी पैदा होते हैं (जैसे हरा रंग नीले और पीले के मेल से)। इसके अलावा कई रंग पंखों की सूक्ष्म बनावट (feather texture) से भी नज़र आते हैं। जैसे नीला रंग (blue color) इस पंख की सतह पर मौजूद सूक्ष्म रचनाओं और प्रकाश (light) की अंतर्क्रिया से पैदा होता है। 

तोतों के विभिन्न रंगों (parrot colors) को समझने में असली सफलता तब मिली जब वैज्ञानिकों (scientists) ने रासायनिक स्तर पर सिटाकोफल्विन (psittacofulvin) का विश्लेषण (chemical analysis) किया। ये रंजक (pigments) कार्बन शृंखलाओं (carbon chains) से बने होते हैं। इन शृंखलाओं के अंतिम छोर पर एक हल्का-सा रासायनिक बदलाव (chemical change) रंग को बदल देता है। यदि अंतिम छोर पर एल्डिहाइड समूह (aldehyde group) है, तो पंख लाल (red) हो जाता है। यदि एल्डिहाइड की जगह कार्बोक्सिल समूह (carboxyl group) आ जाता है, तो पंख पीला (yellow) हो जाता है। 

इस खोज (discovery) से पता चलता है कि प्रकृति (nature) में अक्सर सरल अभिक्रियाओं (simple reactions) के नाटकीय परिणाम (dramatic results) होते हैं। इस शोध (study) ने तोते में रंगों के विकास (color evolution) को नियंत्रित करने के लिए ज़िम्मेदार जीन (gene) को भी उजागर किया है। यह जीन एक एंज़ाइम को कोड करता है जो एल्डिहाइड को कार्बोक्सिल समूह में परिवर्तित करके लाल रंजक (red pigment) को पीला (yellow) कर देता है। इस जीन द्वारा उत्पादित एंज़ाइम की मात्रा (enzyme quantity) निर्धारित करती है कि पंख कितना पीला (yellow) होगा। 

रंग उत्पत्ति की इस क्रियाविधि (color production mechanism) से पता चलता है कि क्यों कुछ तोतों की प्रजातियां (parrot species) विकास (evolution) के दौरान आसानी से लाल (red), पीले (yellow), और हरे (green) रंग में परिवर्तित हो जाती हैं। यह कई तरह के रंगों का उत्पादन (color production) करने का एक लचीला और कुशल तरीका (efficient method) है। पोर्टो विश्वविद्यालय (University of Porto) के जीवविज्ञानी (biologist) और अध्ययन के सह-लेखक रॉबर्टो आर्बोरे, इसे ‘वैकासिक नवाचार (evolutionary innovation) का एक अद्भुत मामला’ कहते हैं, जो तोतों को साथी को आकर्षित (mate attraction) करने और दूसरों के साथ संवाद (communication) करने के संकेतों पर नियंत्रण देता है।  लेकिन अभी भी कई रहस्य (mysteries) बने हुए हैं। वैज्ञानिक अभी भी रंग उत्पादन (color production) में शामिल कोशिकाओं (cells) को निर्धारित करने की कोशिश कर रहे हैं और साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि ये विशेष रंग (specific colors) सबसे पहले क्यों विकसित हुए थे। (स्रोत फीचर्स)

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हाथी की सूंड कुछ खास है

अर्पिता व्यास

हाथी की सूंड महज नाक से बढ़कर बहुत कुछ है। हाथी सूंड से न केवल खाना उठाते हैं बल्कि पानी और रेत को अपनी पीठ पर छिड़कते हैं ताकि गर्मी से राहत मिले। वे सूंड से गर्जन करते हुए दूसरे हाथियों को संदेश भी भेजते हैं। नन्हें हाथी सूंड से ही दूध चूसकर मुंह में डालते हैं। इस हरफनमौला प्रकृति को देखते हुए बर्लिन विश्वविद्यालय (Berlin University) के तंत्रिका वैज्ञानिक माइकल ब्रेख्त (Michael Brecht) इसे जंतु-जगत का सबसे अद्भुत पकड़ने वाला अंग कहते हैं।

लेकिन सूंड में हड्डियां तो होती नहीं, फिर मात्र मांसपेशियों से बनी यह रचना कैसे इतने सारे अलग-अलग काम कर पाती है?

शायद सूंड पर पाई जाने वाली झुर्रियां इसका एक कारण हो सकती हैं। सूंड हाथी के शरीर में मुंह से जुड़ी संरचना है। इस पर बनी झुर्रियां अलग-अलग कामों को करने में मदद करती हैं। देखा जाए तो एक-एक झुर्री (सिलवट) एक-एक कोहनी की तरह काम करती है, और सूंड हर सिलवट पर मुड़ सकती है।

जब मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट (Max Planck Institute) के एंड्रू शूल्ज़ (Andrew Schulz) ने सूंड की झुर्रियों पर विचार करना शुरू किया तो वे मानकर चले थे कि ये झुर्रियां तब विकसित होती हैं जब सूंड का उपयोग ज़्यादा होता है, जैसे हमारे चेहरे पर मुस्कान की धारियां बन जाती हैं। लेकिन उन्होंने देखा कि सूंड की झुर्रियां तो जन्म से ही होती हैं और इन्हें नवजात हाथियों की सूंड पर भी देखा जा सकता है।

मनुष्य सहित कई जीवों में बच्चों को जन्म से ही झुर्रियां होती हैं क्योंकि उनके शरीर पर त्वचा शरीर के आकार के हिसाब से ज़्यादा होती है। लेकिन वे झुर्रियां बेतरतीबी से फैली होती हैं। इसके विपरीत, हाथी की झुर्रियां एक जैसी बनी रहती हैं – आकार में भी और स्थान में भी। और ये जन्म से पहले बन जाती हैं। इससे लगता है कि ये किसी उद्देश्य से बनी हैं।

इसे और अधिक समझने के लिए शूल्ज़ और उनके साथियों ने एशियाई हाथी (Asian Elephant) और अफ्रीकी हाथी (African Elephant) की सूंड की तुलना की, जो सूंड का उपयोग अलग–अलग ढंग से करते हैं। अफ्रीकी हाथी की सूंड के सिरे पर कठोर उपास्थि से बनी दो उंगलीनुमा संरचनाएं होती हैं जिनसे वे छोटी चीज़ों को भी पकड़ सकते हैं। इसके विपरीत, एशियाई हाथी की सूंड के अंत में एक ही उंगलीनुमा संरचना होती है और साथ में एक फूली हुई रचना होती है, जिससे वे तरबूज़ जैसी बड़ी चीजों को उठाकर अपने मुंह में रख पाते हैं।

शोधकर्ताओं ने संग्रहालयों में रखे नमूनों और चिड़ियाघरों में जाकर और हाथियों के बहुत सारे फोटो देखकर पता लगाया कि एशियाई हाथी की सूंड पर औसतन 126 झुर्रियां होती हैं जबकि अफ्रीकी हाथी में 83। शूल्ज़ का कहना है कि अतिरिक्त झुर्रियों से एशियाई हाथी को ज़्यादा मज़बूत पकड़ मिलती है जिससे एक उंगलीनुमा संरचना न होने की क्षतिपूर्ति हो जाती होगी। अतिरिक्त झुर्रियां एशियाई हाथी की सूंड को ज़्यादा लचीला बनाती हैं। दोनों ही प्रजातियों में झुर्रियों के जोड़ मांसपेशीय कोहनी की तरह काम करते हैं, जिससे चीज़ों को सूंड में लपेटकर उठाया जा सकता है।

ये झुर्रियां कैसे बनती हैं? यह जानने के लिए टीम ने तीन अफ्रीकी और दो एशियाई हाथियों के संग्रहालय में रखे भ्रूणों का अध्ययन किया। भ्रूण के दर्जनों चित्रों का अलग–अलग चरणों में अध्ययन किया गया। फिर इन चित्रों को विकास के समय के अनुसार क्रम में जमाया गया जिससे उन्हें यह पता चला कि झुर्रियां सूंड के साथ–साथ ही विकसित होती हैं। ये हाथी की 22 महीने की गर्भावस्था में 20वें दिन दिखाई देने लगती हैं। और अगले 150 दिन तक ये झुर्रियां दोनों प्रजातियों में बढ़ती हैं। इनकी संख्या हर तीन हफ्ते में दुगनी हो जाती है। एशियाई हाथियों में इसके बाद और भी ज़्यादा झुर्रियां बनती रहती हैं। ज़्यादा झुर्रियां उन स्थानों पर बनती हैं जहां से सूंड को मोड़ा जाएगा।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने सूंड के बारे में और अध्ययन कर पता लगाया कि सूंड या तो बाईं ओर मुड़ने में दक्ष होती है या दाईं ओर। यानी कि हाथी अपनी सूंड को मुंह के एक तरफ ही घुमाकर उपयोग में लाते हैं, जैसे मनुष्यों में कुछ लोग खब्बू होते हैं। इससे सूंड में एक तरफ की अपेक्षा दूसरी तरफ ज़्यादा झुर्रियां हो जाती हैं।

बहरहाल, हाथी एक आदर्श उदाहरण है जिसमें नरम अस्थिरहित जोड़ों का अध्ययन किया जा सकता है। वैसे प्राइमेटस (Primates) और एलिफैंट सील (Elephant Seal) में ऐसे नरम अंग होते हैं जिनमें खून प्रवाहित करके उन्हें कड़ा किया जा सकता है लेकिन उनमें हाथी की सूंड की तरह घुमाव और चीज़ों को पकड़ने की क्षमता नहीं पाई जाती। (स्रोत फीचर्स)

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बीज बिखेरने वाले जंतु और पारिस्थितिकी की सेहत

1990 के दशक में जब शिकारियों ने पश्चिमी बोर्नियो के उष्णकटिबंधीय जंगलों से अधिकतर फलभक्षी पक्षियों (fruit-eating birds) का शिकार कर डाला तब वहां का आसमान तो सूना हो ही गया था, कुछ सालों के भीतर वहां का जंगल भी उजड़ गया था। बीज बिखेरने वाले पक्षियों (seed dispersing animals) के अभाव में फलदार पौधों (fruit-bearing plants) की विविधता में जो कमी आई उसने पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem health) की सेहत में बीज फैलाने वाले जीवों (seed dispersers) के महत्व को नुमाया किया था। लेकिन अब, समशीतोष्ण क्षेत्रों में भी पारिस्थितिकी तंत्र की सांसें उखड़ती नज़र आ रही हैं।

साइंस पत्रिका (Science journal) में प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि कम से कम एक तिहाई युरोपीय पौधों (European plant species) की प्रजातियां शायद सिर्फ इसलिए जोखिमग्रस्त की श्रेणी में आ जाएं क्योंकि या तो उनके बीजों को फैलाने वाले ज़्यादातर जानवर (seed dispersing animals) खतरे में हैं या कम होते जा रहे हैं। बीज फैलाने वालों (seed dispersers), जिनमें पक्षियों के अलावा स्तनधारी (mammals), सरिसृप (reptiles) और चींटियां (ants) भी शामिल हैं, की संख्या में गिरावट पौधों की जलवायु परिवर्तन (climate change adaptation) से निपटने या जंगल की आग के बाद उबरने की क्षमता को खतरे में डाल सकती है, खासकर युरोप के अत्यधिक खंडित परिदृश्य में।

कोइम्ब्रा विश्वविद्यालय (Coimbra University) की सामुदायिक पारिस्थितिकी विज्ञानी सारा मेंडेस ने यह पता लगाने का बीड़ा उठाया कि कौन-से जानवर कौन-से पौधे के बीज फैलाते हैं। इसके लिए पहले तो उन्होंने 26 भाषाओं में उपलब्ध हज़ारों अध्ययनों को खंगाला और उनमें से ऐसे अध्ययनों को छांटा जिनमें बीज प्रकीर्णन (seed dispersal) जैसे शब्दों का उल्लेख था, या जो युरोप के (900 से अधिक में से किसी एक) बीजभक्षी जानवर पर केंद्रित थे।

मेंडेस को इस छंटनी में ऐसे 592 स्थानिक पौधों (endemic plants) की सूची मिली जिनके फल गूदेदार थे, या यूं कहें कि जिन पौधों में बीज फैलाने वाले जानवरों को उनके फल खाने के लिए लालच देने का अनुकूलन था। साथ ही, उन्हें इन फलों को खाने वाले 398 जानवरों (fruit-eating animals) की सूची भी मिली। इनमें से फलभक्षी जानवर (frugivorous animals) एक से अधिक प्रकार के पौधों के फल/बीज खाते हैं। तो इस तरह उनके द्वारा तैयार डैटा सेट (dataset) में हरेक पौधे और उसके बीजों को फैलाने जानवरों की 5000 से अधिक जोड़ियां बनीं।

फिर शोधकर्ताओं ने इन बीज फैलाने वालों की हालिया स्थिति का जायज़ा लिया। उन्होंने पाया कि युरोप के सभी प्रमुख जैव-भौगोलिक क्षेत्रों में पाए जाने वाले एक तिहाई से अधिक ऐसे जंतु तो अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) द्वारा जोखिमग्रस्त (endangered) घोषित हैं, या उनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है। उदाहरण के लिए, एक आम प्रवासी पक्षी गार्डन वार्बलर (garden warbler – Sylvia borin) लगभग 60 पौधों के बीजों को फैलाता है, और इसकी संख्या पूरे युरोप में घट रही है। यही हाल रेडविंग (redwing – Turdus iliacus) का भी है। शोधकर्ताओं का कहना है कि जोखिमग्रस्त जानवरों की संख्या को देखते हुए संकट शब्द का उपयोग अनुचित न होगा।

अध्ययन में 60 प्रतिशत से अधिक पौधों के पांच या उससे कम बीज बिखेरने वाले जानवर पाए गए हैं। अब यदि इनमें से कोई भी महत्वपूर्ण बीज वितरक (seed disperser) विलुप्त हो जाता है तो स्थिति पौधे के लिए अति-असुरक्षित (highly vulnerable) बन सकती है। इसके अलावा सूची में लगभग 80 ऐसी ‘अति चिंतनीय’ अंतःक्रियाएं (critical interactions) भी शामिल हैं जिनमें पौधे और जानवर दोनों ही खतरे में हैं या तेज़ी से घट रहे हैं। इस सूची में युरोपियन फैन पाम (European fan palm – Chamaerops humilis) शामिल है। यह पौधा 10 जंतु प्रजातियों की बीज वितरण सेवाओं (seed dispersal services) के भरोसे फलता-फूलता है। इसके बीज वितरकों में युरोपीय खरगोश (European rabbit – Oryctolagus cuniculus) शामिल है जो IUCN द्वारा स्पेन और पुर्तगाल में ‘लुप्तप्राय’ (endangered) सूची में शामिल है।

बहरहाल, अध्ययन उजागर करें, न करें लेकिन वैश्विक स्तर पर भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। और इतना तो ज़ाहिर है कि जीव-जंतुओं का बेहतर संरक्षण (wildlife conservation) पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem restoration) को सुदृढ़ और स्वस्थ रख सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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टार्डिग्रेड में विकिरण प्रतिरोध

टार्डिग्रेड्स, जिन्हें अक्सर जलीय भालू (water bears) भी कहा जाता है, आठ पैरों वाले सूक्ष्म जीव (microscopic organisms) हैं जो अत्यंत कठिन परिस्थितियों (extreme conditions) में भी जीवित रहने के लिए जाने जाते हैं। इसमें स्वयं को अत्यधिक विकिरण (radiation) से सुरक्षित रखना भी शामिल है, जिस पर इन दिनों वैज्ञानिक गहरी समझ विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। गौरतलब है कि टार्डिग्रेड्स विकिरण की इतनी खुराक सहन कर सकते हैं जो इंसानों के लिए जानलेवा मात्रा से 1000 गुना ज़्यादा है।

छह वर्ष पूर्व, शोधकर्ताओं ने चीन के हेनान के फुनिउ पर्वत से मॉस के नमूने एकत्र किए थे, जिसमें टार्डिग्रेड की एक नई प्रजाति हाइप्सिबियस हेनानेंसिस (Hypsibius henanensis) मिली थी। इसके जीनोम अनुक्रमण (genome sequencing) से पता चला कि इसमें 14,701 जीन हैं, जिनमें से लगभग 30 प्रतिशत जीन मात्र टार्डिग्रेड्स में ही पाए जाते हैं।

टार्डिग्रेड्स में विकिरण झेलने की क्षमता की क्रियाविधि का पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने हाइप्सिबियस हेनानेंसिस को अत्यधिक विकिरण (radiation exposure) के संपर्क में रखा। इतना विकिरण मनुष्यों के लिए घातक होता। उन्होंने पाया कि ऐसा करने पर इनमें से 2801 जीन सक्रिय हो गए। ये जीन्स डीएनए की मरम्मत, कोशिका विभाजन और प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं से सम्बंधित थे। इनमें से एक जीन (TRID1) एक ऐसे प्रोटीन (protein) का निर्माण करवाता है जो क्षतिग्रस्त डीएनए की मरम्मत करता है। यह विकिरण से क्षतिग्रस्त कोशिकाओं के लिए एक महत्वपूर्ण कार्य है।

इसके अलावा, शोध से पता चला कि टार्डिग्रेड में 0.5-3.1 प्रतिशत जीन पार्श्व जीन हस्तांतरण (horizontal gene transfer) के ज़रिए आए हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें जीन का हस्तांतरण लैंगिक माध्यम से नहीं बल्कि एक से दूसरी प्रजाति को अन्य तरीकों से होता है। ऐसा ही एक जीन है DODA1, जो संभवत: बैक्टीरिया (bacteria) से टार्डिग्रेड में आया है। यह टार्डिग्रेड को बीटालेन (betalain) नामक रंजक का उत्पादन करने में सक्षम बनाता है जो ऑक्सीकरण-रोधी (antioxidants) के रूप में कार्य करते हैं और ऐसे हानिकारक रसायनों को हटाते हैं जो कोशिकाओं में विकिरण के प्रभाव से बनते हैं।

इस अध्ययन के निष्कर्षों का महत्वपूर्ण उपयोग हो सकता है। जब शोधकर्ताओं ने मानव कोशिकाओं को टार्डिग्रेड के एक बीटालेन से उपचारित किया तो कोशिकाएं विकिरण के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी (radiation-resistant) हो गईं। यह खोज कैंसर उपचार (cancer treatment) में उपयोग की जाने वाली विकिरण थेरेपी (radiation therapy) में सुधार की उम्मीद जगाती है, जिससे मानव कोशिकाएं विकिरण जोखिम को बेहतर ढंग से झेलने में सक्षम हो सकती हैं।

दीर्घकालिक अंतरिक्ष मिशनों (long-term space missions) के दौरान विकिरण अंतरिक्ष यात्रियों के लिए एक बड़ा जोखिम होता है। टार्डिग्रेड में विकिरण प्रतिरोध की क्रियाविधि की समझ अंतरिक्ष यात्रियों (astronauts) को हानिकारक अंतरिक्ष विकिरण से बचाने में मदद कर सकती है।

टार्डिग्रेड्स न केवल विकिरण बल्कि निर्जलीकरण, ठंड और भुखमरी जैसी चरम स्थितियों में भी जीवित रहने के लिए प्रसिद्ध हैं। इन स्थितियों को वे कैसे सहन करते हैं, इसका अध्ययन करके शोधकर्ताओं को और अधिक रहस्यों को उजागर करने की उम्मीद है। मसलन, इन तंत्रों को समझने से टीकों (vaccines) जैसे नाज़ुक पदार्थों की शेल्फ लाइफ (shelf life) में सुधार हो सकता है।

संभव है कि टार्डिग्रेड्स की अन्य प्रजातियां इसी तरह के रहस्य उजागर करने का इंतज़ार कर रही हों। टार्डिग्रेड्स की विभिन्न प्रजातियों की तुलना करके वैज्ञानिकों का लक्ष्य जीवित रहने की उन असाधारण रणनीतियों को समझना है जो इन नन्हे जीवों को इतना आकर्षक और मूल्यवान बनाती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मीठा खाने वाले चमगादड़ों को मधुमेह क्यों नहीं होती?

विपुल कीर्ति शर्मा

मिठाई कुछ लोगों की कमज़ोरी होती है। मिठाई देखते ही खुद को रोकना असंभव-सा हो जाता है। लगातार ज़्यादा चीनी वाला आहार मनुष्यों में कई समस्याओं को जन्म देता है जिनमें मोटापा (obesity) और मधुमेह (diabetes) प्रमुख हैं। अत: स्वस्थ रहने और अपनी कोशिकाओं को सीमित मात्रा में ईंधन देने के लिए शरीर में रक्त शर्करा सांद्रता (blood sugar levels) को नियंत्रित करना बहुत ज़रूरी है। रक्त में शर्करा की बहुत कम या बहुत अधिक मात्रा गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं का कारण बन सकती है। उच्च रक्त शर्करा (high blood sugar) मधुमेह की पक्की पहचान है।

ग्लूकोज़ कैसे मिलता है? 

ग्लूकोज़ मुख्य रूप से हमारे भोजन और पेय पदार्थों (शर्बत और फलों के रस) में मौजूद कार्बोहाइड्रेट (carbohydrates) से प्राप्त होता है। ग्लूकोज़ ही हमारे शरीर की ऊर्जा (energy source) का मुख्य स्रोत है। जब आहारनाल में भोजन का पाचन होता है, तो भोजन में मौजूद कार्बोहाइड्रेट (shugars and starch) एक अन्य प्रकार की शर्करा में टूट जाता है, जिसे ग्लूकोज़ (glucose) कहते हैं। यह ग्लूकोज़ रक्त वाहिनियों में छोड़ दिया जाता है।

रक्त का एक कार्य शरीर की सभी कोशिकाओं तक ग्लूकोज़ पहुंचाना है ताकि कोशिका ऊर्जा प्राप्त कर सकें। सामान्य भोजन के बाद बढ़ी हुई ग्लूकोज़ की मात्रा, इंसुलिन नामक हॉर्मोन (insulin hormone) द्वारा यकृत में जमा कर दी जाती है। किंतु यदि ऐसा न हो पाए तो रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ जाता है जिसे हम डायबिटीज़ (diabetes) या मधुमेह कहते हैं। लगातार लंबे समय तक (महीनों या सालों तक) उच्च रक्त शर्करा स्तर के कारण शरीर के अंगों (जैसे नेत्र, तंत्रिकाएं, गुर्दे और रक्त वाहिकाओं) को स्थायी नुकसान हो सकता है।

यदि हमारा रक्त शर्करा स्तर सामान्य से नीचे चला जाता है तो शरीर में कंपकपी होती है और धड़कन तेज़ हो जाती है, और यदि शर्करा स्तर बहुत कम हो जाता है तो यह जीवन के लिए खतरनाक हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मस्तिष्क को ठीक से काम करने के लिए ग्लूकोज़ की निरंतर आपूर्ति (constant glucose supply) की आवश्यकता होती है।

हाल ही में, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा नेचर कम्यूनिकेशंस एंड इवॉल्यूशन (Nature Communications and Evolution) में प्रकाशित शोधपत्र में बताया गया है कि मीठे फल खाने वाले फलाहारी चमगादड़ों के रक्त में चीनी की सांद्रता (sugar concentration) अन्य स्तनधारी जंतुओं की तुलना में बहुत अधिक होती है। इतनी अधिक शर्करा से अन्य स्तनधारियों के मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंचती है। वैज्ञानिक इस बात से हैरान थे कि उच्च रक्त शर्करा को संभालने के लिए फलाहारी चमगादड़ (fruit-eating bats) में कैसे ग्लूकोज़ सहनशीलता (glucose tolerance) विकसित हुई है। शोध के निष्कर्ष शरीर में उन अनुकूलनों की ओर इशारा करते हैं जो उनके चीनी युक्त आहार को हानिकारक बनने से रोकते हैं।

न्यू वर्ल्ड लीफ-नोज़्ड बैट 

न्यू वर्ल्ड लीफ-नोज़्ड बैट विशेष रूप से दक्षिण-पश्चिमी यूएस (Southwest US) से लेकर उत्तरी अर्जेंटीना तक पाए जाने वाले चमगादड़ हैं। तीन करोड़ साल पहले, नियोट्रॉपिकल लीफ-नोज़्ड बैट (Neotropical Leaf-Nosed Bat) के पूर्वज का आहार केवल कीट-पतंगे थे। तब से उद्विकास (evolution) के दौरान इन चमगादड़ों के आहार में बदलाव हुए और कई अलग-अलग प्रजातियां विकसित हुईं। उनमें से कुछ रक्ताहारी, मकरंदाहारी और फलाहारी जैसे विविध खाद्य स्रोतों पर जीवन यापन की विशेषज्ञता हासिल करने वाले हो गए हैं।

चमगादड़ों ने अपने आहार में विविधता कैसे अपनाई यह जानने के लिए टीम ने कई वर्षों तक मध्य अमेरिका (Central America), दक्षिण अमेरिका (South America) और कैरेबियन के जंगलों में फील्डवर्क किया। टीम ने 29 प्रजातियों के लगभग 200 जंगली चमगादड़ों को पकड़ा। टीम के सदस्य चमगादड़ों को पकड़ते और तीन प्रकार के आहार (कीट, मकरंद और फलाहार) में से कोई एक आहार चमगादड़ को एक बार देते थे, और उनके रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर को नाप कर उन्हें छोड़ देते थे।

वैज्ञानिकों ने पाया कि चमगादड़ों के शरीर में चीनी को अंगीकार (absorb) करने के विभिन्न तरीके मौजूद होते हैं। अवशोषण, संग्रहण और उपयोग की प्रक्रिया विभिन्न आहारों के कारण विशिष्ट हो गई है।

ग्लूकोज़ होमियोस्टेसिस (glucose homeostasis) एक ऐसी प्रक्रिया है जो शरीर की आंतरिक और बाहरी स्थितियों में परिवर्तन के बावजूद रक्त शर्करा के स्तर को स्थिर करती है। ग्लूकोज़ होमियोस्टेसिस का मुख्य कारण अग्न्याशय (पैंक्रियास) के आइलेट्स ऑफ लैंगरहैंस द्वारा इंसुलिन और ग्लूकागोन हार्मोन्स का स्राव है। मधुमेह में ग्लूकोज़ होमियोस्टेसिस गड़बड़ा जाता है।

लीफ-नोज़्ड बैट की विभिन्न प्रजातियां ग्लूकोज़ होमियोस्टेसिस के लिए अनुकूलन के विविध तरीके दर्शाती हैं। इनमें आंतों की संरचना में परिवर्तन से लेकर रक्त से कोशिकाओं तक शर्करा पहुंचाने वाले वाहक प्रोटीन में आनुवंशिक परिवर्तन भी शामिल हैं। फलाहारी चमगादड़ों में इंसुलिन सिग्नलिंग मार्ग (insulin signaling pathway) बेहतर हुआ है। दूसरी ओर मकरंदाहारी चमगादड़ों में उच्च रक्त शर्करा के स्तर को सहन कर सकने की काबिलियत विकसित हुई है। फलाहारी चमगादड़ों ने एक अलग तंत्र विकसित किया है जो इंसुलिन पर निर्भर नहीं लगता है। यद्यपि मकरंदाहारी चमगादड़ ग्लूकोज़ का प्रबंधन कैसे करते हैं, यह अभी भी जांच का विषय है फिर भी शोधकर्ताओं ने इस बाबत कई सुराग प्राप्त किए हैं जिनसे लगता है कि उनमें ग्लूकोज़ विनियमन के लिए वैकल्पिक चयापचय तरीका होता है।

भोजन से पोषक तत्वों के अवशोषण (nutrient absorption) के लिए मकरंदाहारी चमगादड़ों की आंतों में अधिक सतह वाली कोशिकाएं पाई गईं। इसके अलावा, इनमें ग्लूकोज़ परिवहन तंत्र (glucose transport mechanism) फलाहारी चमगादड़ों से भिन्न होता है, जिसके लिए ज़िम्मेदार जीन निरंतर अभिव्यक्त होते हैं। फलाहारी चमगादड़ों के अग्न्याशय और गुर्दे की संरचना (pancreatic and renal structure) भी परिवर्तित हुई है, जो उनके आहार को समायोजित करती है। अग्न्याशय में इंसुलिन का उत्पादन करने के लिए अधिक कोशिकाएं पाई गईं, जो शरीर में रक्त शर्करा को कम करने (lower blood sugar) में मददगार होती हैं। साथ ही ग्लुकागॉन हॉर्मोन (glucagon hormone) – जो रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर को बढ़ाता है –  का उत्पादन करने के लिए भी कोशिकाएं अधिक थीं। मकरंद पीने वाले चमगादड़ों जैसी ही विशेषताएं हमिंगबर्ड (hummingbird) पक्षी में भी देखी गई हैं, जो फूलों का मकरंद पीते हैं।

यह शोध न केवल विभिन्न आहार वाली चमगादड़ प्रजातियों की चयापचय विशेषताओं (metabolic characteristics) के बारे में एक बेहतर समझ विकसित करने में सहायक है, बल्कि आहार में अनुकूलन के कारण आंतों में संरचनात्मक परिवर्तन (intestinal adaptations), जीनोम और प्रोटीन के संरचनात्मक अंतरों को भी उजागर करता है। इस शोध में संलग्न कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि चमगादड़ के रूप में उन्हें तो एक ‘हीरो’ (model organism) मिल गया है, जो भविष्य में मधुमेह का बेहतर इलाज खोजने में मददगार साबित होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक पक्षी की अनोखी प्रणयलीला

वैसे तो कई सारे नर मादा को रिझाने के लिए तरह-तरह के तरीके अपनाते हैं। कई अपने रंग-रूप से लुभाते हैं, कुछ अपनी शक्ति से, कुछ गाकर (bird song), तो कुछ नाच कर (bird dance)। लेकिन बॉवरबर्ड कुल (Bowerbird species) के सदस्यों के नर की प्रणयलीला का अंदाज़ निराला है। अपनी मादाओं को नर बॉवरबर्ड रिझाते तो नाच-गाकर ही हैं, लेकिन इसके लिए वे पहले पूरा मंच (stage setup) बनाते हैं, उसे सजाते हैं। और तो और, हालिया अध्ययन बताता है कि वे अपने मंच में ऐसा इंतज़ाम करते हैं कि उनका गाना (song performance) मादाओं को मोहित करने के लिए एकदम सही सुरों में सुनाई दे। इतना ही नहीं, वे अपने दर्शकों (female birds) के लिए परफॉर्मेंस देखते-देखते खानपान की व्यवस्था भी करते हैं। यानी मूवी के साथ पॉपकॉर्न भी! 

वास्तव में, अनूठी प्रणयलीला के चलते बॉवरबर्ड के प्रदर्शन पर काफी अध्ययन (behavioral studies) हुए हैं। लेकिन ये सभी अध्ययन दृश्य इंतज़ामों और प्रदर्शन तक सीमित थे। पता चला था कि बॉवरबर्ड टहनियां वगैरह इकट्ठी करके मेहराबदार सुरंगनुमा बॉवर (bower structure) या ऊंची कुटिया बनाते हैं। इसके द्वार से सटे आंगन की सजावट वे कंकड़-पत्थर (pebbles), शंख (shells), हड्डियों और कांच या प्लास्टिक के रंगीन टुकड़ों से करते हैं। जब यह कुटिया बनकर तैयार हो जाती है तो नर तेज़, कर्कश आवाज़ें (loud calls) निकालकर इसके बारे में मादाओं को सूचना देते हैं। अगर कोई मादा इस पुकार को सुनकर चली आती है, और कुटिया की बनावट और सजावट उसे भा जाती है तो वह अंदर प्रवेश करती है। 

बस फिर क्या, नर उड़कर (flight display) आंगन में आ जाता है और अपनी कलाकारी का प्रदर्शन शुरू कर देता है। मादा सुरंगनुमा कुटिया के दरवाज़े से आंगन में खड़े नर बॉवरबर्ड का केवल सिर ही देख पाती है। नर का प्रदर्शन भी उसी के अनुरूप होता है। 

नर बॉवरबर्ड तेज़, कर्कश, हिस्स्सकारती हुई आवाज़ में गाना गाता है। गाने के साथ वह मादा को लुभाने के लिए संटियां, फल जैसी विभिन्न वस्तुएं चोंच से उछाल-उछाल कर दिखाता है, और गर्दन घुमाकर अपने सिर के पीछे बने गुलाबी पंखों का मुकुट (pink crest feathers) भी दिखाता है। 

लेकिन, जैसा कि ऊपर भी कहा गया है कि ये सारे अवलोकन बॉवरबर्ड की दृश्य गतिविधियों पर केंद्रित थे। डीकिन युनिवर्सिटी के प्रकृति-इतिहासकार जॉन एंडलर (John Endler) जानना चाहते थे कि क्या कुटिया की बनावट और आंगन की सजावट ‘गाने’ (courtship song) को मादा के लिए रुचिकर बनाने कोई भूमिका निभाते हैं? 

अपने अध्ययन के लिए उन्होंने उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के निवासी ग्रेट बॉवरबर्ड (Great Bowerbird – *Chlamydera nuchalis*) को चुना। पहले तो उनकी टीम ने उत्तरी क्वींसलैंड के वनों में नर बॉवरबर्ड्स के ‘प्रेमालाप’ (courtship behavior) की रिकॉर्डिंग की। इसके बाद, उन्होंने कुटिया के प्रवेश द्वार (जहां नर होता है) पर स्पीकर को रखकर इस रिकॉर्डिंग को चलाया, और जहां आम तौर पर मादा का सिर होता है वहां माइक्रोफोन लगाकर ध्वनियों को रिकॉर्ड किया ताकि यह समझा जा सके कि कुटिया के आकार (bower architecture) के कारण नर का प्रेमगीत मादा को कैसा सुनाई देता है।फिर, टीम ने व्यवस्थित रूप से कुटिया के आंगन में सजाई गई विभिन्न सजावटी वस्तुओं को हटाया और पता किया कि प्रत्येक सामग्री से कुटिया के अंदर सुनाई पड़ने वाली ध्वनि पर कैसा प्रभाव पड़ता है। 

बिहेवियोरल इकोलॉजी (Behavioral Ecology) में प्रकाशित नतीजे बताते हैं कि नर ग्रेट बॉवरबर्ड बेहतरीन साउंड इंजीनियर (sound engineers) होते हैं। कुटिया का आकार नर के गीत को ऊंचा कर देता है, जिससे अंदर मौजूद मादा को यह ज़्यादा तेज़ सुनाई देता है। आंगन की सजावट भी आवाज़ को प्रभावित करती है; शंख (shells) जैसी सख्त सतह भी टकराने वाली आवाज़ को तेज़ कर देती हैं। 

नर ग्रेट बॉवरबर्ड मादा के लिए न सिर्फ आकर्षक भवन, गीत और नृत्य प्रदर्शन (dance display) का इंतज़ाम करते हैं बल्कि वे शो के दौरान खाने की चीज़ों का इंतज़ाम भी करते हैं। वे कुटिया की दीवारों को लार और वनस्पतियों से रंगते हैं, और उनके प्रदर्शन को देखते हुए मादा इसे चबाती हैं। रिझाने के लिए एक और पैंतरा! 

देखा जाए तो यह अध्ययन अपने-आप में काफी दिलचस्प है लेकिन इस संदर्भ में कई और चीज़ें समझना बाकी हैं। जैसे मादा कर्कश या मृदु आवाज़ों या मोटी-पतली आवाज़ों में गाए गए प्रेमगीतों पर कैसी प्रतिक्रिया देती हैं।(स्रोत फीचर्स)

नर बॉवरबर्ड का प्रदर्शन यहां देखें : https://oup.silverchair-cdn.com/oup/backfile/Content_public/Journal/beheco/PAP/10.1093_beheco_arae070/1/arae070_suppl_supplementary_data.mp4?Expires=1731151727&Signature=eATlb5ZRlsI~yzL9ymUwXbQIxDbt95izhSI2-MwQwT9Dy1smV-O81-o6Uk~lswxmxr89jIXkc3WayCqFKcQP9L1QgME0Wq5jBxYbF0mpmgp9bZDEOOF~owdr-flr6rXJQeyvivY~SXUoEkrdyKvRPke3T43d4BIVrQW2NtcN0JszD5e8TjdfiiO2Qvhyq4iq6HnN71-qDJRIX-y65U~rb-V1CVKreVX5j0bfnskYpFhC6iO-PuJ6kBgW-fffREDQKjdPxyzxu46EAxHNDpHwBqFScu-wtA6dsWU6PeIaLFbgYXFJwAHVsojDLjcvtv9XpgexWlUO5q~sAaGwR-j6uA__&Key-Pair-Id=APKAIE5G5CRDK6RD3PGA

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चींटियों ने कीटभक्षी पक्षियों को ऊपरी इलाकों में खदेड़ा

दक्षिण एशिया के निचले इलाकों में, फलभक्षी (fruit-eating birds) और मकरंदभक्षी पक्षी तो खूब दिखाई देते हैं, लेकिन कीटभक्षी पक्षी (insect-eating birds) यहां दुर्लभ हैं। इकोलॉजी लेटर्स (Ecology Letters) में प्रकाशित एक अध्ययन ने इस विषय पर प्रकाश डाला है और बताया है कि कीटभक्षी पक्षियों के नदारद होने के पीछे बुनकर चींटियों (weaver ants) का हाथ है। निचले जंगलों में रहने वाली बुनकर चींटियां गुबरैले और पतंगों जैसे जीवों को खा जाती हैं। दिक्कत यह है कि यही जीव कीटभक्षी पक्षियों के भी भोजन (insect prey) हैं। चूंकि चींटियां इन पक्षियों के भोजन को खत्म कर देती हैं, मजबूरन पक्षी ऊंचे इलाकों (higher elevations) पर चले जाते हैं, जहां ये चींटियां नहीं पाई जातीं। 

दरअसल, कई पर्वत शृंखलाओं में समुद्रतल से लगभग 1000 से 1500 मीटर की ऊंचाई को ‘एंट लाईन’ (ant line) या चींटी रेखा कहा जाता है। इस रेखा के ऊपर छोटे अकशेरुकी जीव (invertebrates) कम मिलने लगते हैं। वैसे तो बुनकर चींटियां उत्तरी ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणपूर्वी एशिया से लेकर अफ्रीका तक व्यापक रूप से फैली हैं, लेकिन 2020 में, हिमालय क्षेत्र में किए गए एक अध्ययन ने ऐसा संकेत दिया था कि निचले इलाके के जंगलों में सात भाई (sibling species) और फुदकी जैसे कीटभक्षी पक्षियों के न होने का कारण संभवत: बुनकर चींटियां ही हैं। जब शोधकर्ताओं ने एशियाई बुनकर चींटियों (Oecophylla smaragdina) को अध्ययन क्षेत्र से हटाया और उन्हें पेड़ पर चढ़ने से रोक दिया, तो गुबरैले और पतंगों (beetles and moths) जैसे कीटों की संख्या बढ़ गई थी। ये कीट सॉन्गबर्ड्स (songbirds) जैसे कीटभक्षी पक्षियों के भोजन का मुख्य स्रोत हैं। 

इस आधार पर शोधकर्ताओं ने यह परिकल्पना (hypothesis) बुनी कि बुनकर चींटियों के साथ प्रतिस्पर्धा निचले इलाकों के जंगलों में कीटभक्षी पक्षियों की संख्या कम होने के लिए ज़िम्मेदार हो सकती है। 

इस परिकल्पना से प्रेरित होकर भारतीय विज्ञान संस्थान (Indian Institute of Science) के पारिस्थितिकीविद उमेश श्रीनिवासन और उनके दल ने यह देखने की कोशिश की कि क्या इसी तरह के पैटर्न अन्यत्र भी दिखते हैं। इसके लिए उन्होंने दुनिया भर के पहाड़ी पक्षियों (mountain birds) की ऊंचाई के मुताबिक उपस्थिति का विश्लेषण किया। इस विश्लेषण से पता चला कि जिन इलाकों में बुनकर चींटियां नदारद थीं, वहां कीटभक्षी पक्षियों की विविधता (bird diversity) कम ऊंचाई पर काफी अधिक होती है और ऊंचे इलाकों में कम होती जाती है। लेकिन बुनकर चींटियों की मौजूदगी वाले क्षेत्रों में, पक्षियों की विविधता 1000 मीटर से ऊंचे इलाकों में अत्यधिक थी। 

लेकिन फलभक्षी (fruit-eating birds) या अन्य भोजन पर आश्रित पक्षियों में ऐसा कोई पैटर्न नहीं दिखा। यह पैटर्न और नतीजे काफी दिलचस्प हैं, लेकिन वास्तविक परिस्थितियों में इस परिकल्पना को जांचकर देखने की ज़रूरत है कि क्या वास्तव में ऐसे नतीजे मिलते हैं। यदि यह पैटर्न सामान्य है, तो यह काफी रोचक है कि चींटियां जैव विविधता (biodiversity) को इस कदर प्रभावित करती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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