पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास में नया युग

अंतर्राष्ट्रीय भूगर्भ विज्ञान संघ ने हाल ही में घोषणा की है कि पृथ्वी के वर्तमान दौर को एक विशिष्ट काल के रूप में जाना जाएगा। यह होलोसीन युग का एक हिस्सा है जिसे नाम दिया गया है मेघालयन। भूगर्भ संघ के मुताबिक हम पिछले 4200 वर्षों से जिस काल में जी रहे हैं वही मेघायलन है।

भूगर्भ वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के लगभग 4.6 अरब वर्ष के अस्तित्व को कई कल्पों, युगों, कालों, अवधियों वगैरह में बांटा है। इनमें होलोसीन एक युग है जो लगभग 11,700 वर्ष पहले शुरू हुआ था। अब भूगर्भ वैज्ञानिक मान रहे हैं कि पिछले 4,200 वर्षों को एक विशिष्ट नाम से पुकारा जाना चाहिए भारत के मेघालय प्रांत से बना नाम मेघालयन।

दरअसल, भूगर्भीय समय विभाजन भूगर्भ में तलछटों की परतों, तलछट के प्रकार, उनमें पाए गए जीवाश्म तथा तत्वों के समस्थानिकों की उपस्थिति के आधार पर किया जाता है। समस्थानिकों की विशेषता है कि वे समय का अच्छा रिकॉर्ड प्रस्तुत करते हैं। इनके अलावा उस अवधि में घटित भौतिक व रासायनिक घटनाओं को भी ध्यान में रखा जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय भूगर्भ विज्ञान संघ ने बताया है कि दुनिया के कई क्षेत्रों में आखरी हिम युग के बाद कृषि आधारित समाजों का विकास हुआ था। इसके बाद लगभग 200 वर्षों की एक जलवायुसम्बंधी घटना ने इन खेतिहर समाजों को तहसनहस कर दिया था। इन 200 वर्षों के दौरान मिस्र, यूनान, सीरिया, फिलीस्तीन, मेसोपोटेमिया, सिंधु घाटी और यांगत्से नदी घाटी में लोगों का आव्रजन हुआ और फिर से सभ्यताएं विकसित हुर्इं। यह घटना एक विनाशकारी सूखा था और संभवत: समुद्रों तथा वायुमंडलीय धाराओं में बदलाव की वजह से हुई थी।

इस अवधि के भौतिक, भूगर्भीय प्रमाण सातों महाद्वीपों पर पाए गए हैं। इनमें मेघायल में स्थित मॉमलुह गुफा (चेरापूंजी) भी शामिल है। भूगर्भ वैज्ञानिकों ने दुनिया भर के कई स्थानों से तलछट एकत्रित करके विश्लेषण किया। मॉमलुह गुफा 1290 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और यह भारत की 10 सबसे लंबी व गहरी गुफाओं में से है (गुफा की लंबाई करीब 4500 मीटर है)। इस गुफा से प्राप्त तलछटों में स्टेलेग्माइट चट्टानें मिली हैं। स्टेलेग्माइट किसी गुफा के फर्श पर बनी एक शंक्वाकार चट्टान होती है जो टपकते पानी में उपस्थित कैल्शियम लवणों के अवक्षेपण के कारण बनती है। संघ के वैज्ञानिकों का मत है कि इस गुफा में जो परिस्थितियां हैं, वे दो युगों के बीच संक्रमण के रासायनिक चिंहों को संरक्षित रखने के हिसाब से अनुकूल हैं।

गहन अध्ययन के बाद विशेषज्ञों के एक आयोग ने यह प्रस्ताव दिया कि होलोसीन युग को तीन अवधियों में बांटा जाना चाहिए। पहली, ग्रीलैण्डियन अवधि जो 11,700 वर्ष पहले आरंभ हुई थी। दूसरी, नॉर्थग्रिपियन अवधि जो 8,300 वर्ष पूर्व शुरू हुई थी और अंतिम मेघालयन अवधि जो पिछले 4,200 वर्षों से जारी है। अंतर्राष्ट्रीय भूगर्भ विज्ञान संघ ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है।

मेघालयन अवधि इस मायने में अनोखी है कि यहां भूगर्भीय काल और एक सांस्कृतिक संक्रमण के बीच सीधा सम्बंध नज़र आता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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स्वायत्त जानलेवा रोबोट न बनाने की शपथ

कृत्रिम बुद्धि के क्षेत्र में कार्यरत कई सारे अग्रणी वैज्ञानिकों ने शपथ ली है कि वे ऐसे रोबोट-अस्त्र बनाने के काम में भागीदार नहीं होंगे जो बगैर किसी मानवीय निरीक्षण के स्वयं ही किसी व्यक्ति को पहचानकर मार सकते हैं। शपथ लेने वालों में गूगल डीपमाइंड के सह-संस्थापक और स्पेसएक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी समेत 2400 वैज्ञानिक शामिल हैं।

इस शपथ का मुख्य मकसद सैन्य कंपनियों और राष्ट्रों को लीथल ऑटोनॉमस वेपन्स सिस्टम (जानलेवा स्वायत्त अस्त्र प्रणाली) बनाने से रोकना है। संक्षेप में इन्हें लॉस भी कहते हैं। ये ऐसे रोबोट होते हैं जो लोगों को पहचानकर उन पर आक्रमण कर सकते हैं, इन पर किसी इन्सान का निरीक्षण-नियंत्रण नहीं होता।

हस्ताक्षर करने वाले वैज्ञानिकों और उनके संगठनों का कहना है कि जीवन-मृत्यु के फैसले कृत्रिम बुद्धि से संचालित मशीनों पर छोड़ने में कई खतरे हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसे हथियारों की टेक्नॉलॉजी पर प्रतिबंध की मांग की है जो जनसंहार के हथियारों की नई पीढ़ी बनाने में काम आ सकती है।

इस शपथ पर हस्ताक्षर अभियान का संचालन बोस्टन की एक संस्था दी फ्यूचर ऑफ लाइफ इंस्टीट्यूट कर रहा है। शपथ में सरकारों से आव्हान किया गया है कि वे जानलेवा रोबोट के विकास को गैर-कानूनी घोषित करें। यदि सरकारे ऐसा नहीं करती हैं तो हस्ताक्षरकर्ता वैज्ञानिक जानलेवा स्वायत्त शस्त्रों के विकास में सहभागी नहीं बनेंगे।

इस संदर्भ में मॉन्ट्रियल इंस्टीट्यूट फॉर लर्निंग एल्गोरिदम के योशुआ बेंजिओ का कहना है कि इस हस्ताक्षर अभियान के ज़रिए जनमत बनाने की कोशिश हो रही है ताकि ऐसे क्रियाकलापों में लगी कंपनियां और संगठन शर्मिंदा हों। उनका कहना है कि यह रणनीति बारूदी सुरंगों के मामले में काफी कारगर रही है हालांकि यूएस जैसे प्रमुख देशों ने उस मामले में हस्ताक्षर नहीं किए थे।

अधुनातन कंप्यूटर टेक्नॉलॉजी से लैस रोबोट शत्रु के इलाके में उड़ान भर सकते हैं, ज़मीन पर चहलकदमी कर सकते हैं और समुद्र के नीचे निगरानी कर सकते हैं। पायलट रहित वायुयान की टेक्नॉलॉजी विकास के अंतिम चरण में है। धीरे-धीरे इन रोबोटों को इस तरह विकसित किया जा रहा है कि ये बगैर मानवीय नियंत्रण के स्वयं ही निर्णय लेकर क्रियांवित कर सकेंगे। कई शोधकर्ताओं को यह अनैतिक लगता है कि मशीनों को यह फैसला करने का अधिकार दे दिया जाए कि कौन जीएगा और कौन मरेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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