पिछले दिनों सेल प्रेस रिव्यू में विज्ञान और समाज
शीर्षक के अंतर्गत एक पर्चा छपा था – दी एंड ऑफ बॉटनी। यह पर्चा संयुक्त
रूप से अर्जेंटाइना के वनस्पति संग्रहालय के जार्ज वी. क्रिसी, लिलियाना कैटीनास, मारिया एपीडोका और मिसौरी वनस्पति उद्यान
के पीटर सी. हॉच द्वारा लिखा गया है। इस पर्चे का शीर्षक वाकई चौंका देने वाला है
और हमें वनस्पति विज्ञान के वर्तमान यथार्थ से रू-ब-रू कराता है।
मैं स्वयं वनस्पति शास्त्र का शिक्षक रहा हूं। यह पर्चा पढ़ते हुए मुझे विक्रम
विश्वविद्यालय की वानस्पतिकी अध्ययन शाला में स्नातकोत्तर शिक्षा (1977-78) के
अपने दिन याद आ गए। 1982 तक वहीं मैं शोध छात्र भी रहा। बॉटनी डिपार्टमेंट में
एम.एससी. की कक्षाएं खचाखच भरी होती थीं। वनस्पति विज्ञान के प्रतिष्ठित
प्राध्यापकों द्वारा अध्यापन किया जाता था। फिर गिरावट का एक ऐसा दौर आया कि
विद्यार्थी लगातार कम होते चले गए। अध्यापकों की नई भर्ती हुई नहीं और जो थे वे एक
के बाद एक रिटायर होते गए। और वर्तमान में यहां एक ही स्थायी प्राध्यापक है। और
विभाग आज वनस्पति शास्त्र विषय लेने वाले विद्यार्थियों को तरसता है।
मुख्य विषय वनस्पति विज्ञान की उपेक्षा वर्तमान में एक विश्वव्यापी चिंता का
कारण बन चुकी है। इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार कारण कमोबेश वैश्विक हैं। दूसरी ओर, इसकी उप-शाखाएं (जैसे बायो-टेक्नोलॉजी, मॉलीक्यूलर
बायोलॉजी,
एनवायरमेंटल साइंस और माइक्रोबायोलॉजी आदि) फल-फूल रही हैं।
दुख की बात तो यह है कि इन तथाकथित नए प्रतिष्ठित विषयों को पढ़ाने वाले, चलाने वाले प्राध्यापक मूल रूप से वनस्पति विज्ञान के विद्यार्थी ही रहे हैं।
वैसे यह पर्चा अमेरिका के संदर्भ में लिखा गया है लेकिन समस्या अमेरिका तक
सीमित नहीं है,
दुनिया भर में यही स्थिति है। वनस्पति विज्ञान के कई
प्राध्यापक भी सामान्य पौधों तक को पहचानने में असमर्थ हैं। यह जानते हुए भी कि
पेड़-पौधे जीवन का आधार हैं, हम इस संकट तक कैसे पहुंचे, इसके कारण क्या हैं? इस परिस्थिति को बदलने के लिए
हम क्या कर सकते हैं? ऐसे ही कुछ सवाल उक्त पर्चे में उठाए गए
हैं जिनका उल्लेख यहां किया जा रहा है।
इस पर्चे में एक विधेयक की भी बात है जिसका शीर्षक है ‘दी बॉटेनिकल साइंस एंड
नेटिव प्लांट मटेरियर रिसर्च रीस्टोरेशन एंड प्रमोशन एक्ट’ जिसे ‘बॉटनी विधेयक’ भी
कहा जा रहा है। यह उन चेतावनियों का नतीजा है जो यूएस नेशनल पार्क सर्विसेज़ एंड
ब्यूरो आफ लैंड मैनेजमेंट जैसे संस्थानों द्वारा समय-समय पर दी गई थीं। इन
संस्थानों का कहना है कि उन्हें वर्तमान में ऐसे वनस्पति शास्त्री पर्याप्त संख्या
में नहीं मिल रहे हैं जो घुसपैठी पौध प्रजातियों, जंगल
की आग के बाद पुन:वनीकरण और आधारभूत भूमि प्रबंधन के क्षेत्र में मदद कर सकें।
विधेयक का उद्देश्य वनस्पति शास्त्र में शोध और विज्ञान क्षमता को बढ़ावा देना
और स्थानीय पौध सामग्री की मांग बढ़ाना है। बिल में त्वरित कार्रवाई की ज़रूरत बताई
गई है क्योंकि अगले कुछ वर्षों में सेवा निवृत्ति के चलते तथा नई भर्ती के अभाव
में यूएस अपने आधे से भी अधिक विशेषज्ञ वनस्पति शास्त्री गंवा देगा। यह टिप्पणी
यूं तो विशेषकर यूएस के लिए है, पर कमोबेश यही स्थिति सारी
दुनिया में है।
बॉटनी शब्द आठवीं शताब्दी के दौरान होमर द्वारा इलियड में दिया गया था। यह
धीरे-धीरे पूरे रोमन साम्राज्य में फैला और इसका व्यावहारिक महत्व रेनेसां काल में
काफी बढ़ा। बॉटनी ने आधुनिक विज्ञान में लीनियस और डारविन के विचारों को बढ़ावा देने
में मदद की और कई महान प्रकृतिविदों ने मिलकर 19वीं से लेकर 20वीं शताब्दी तक इसे
स्थापित किया। लेकिन इन 2700 वर्षों में पहली बार यह शब्द विलोप के खतरे से जूझ
रहा है। इसके लिए जाने-अनजाने स्वयं इससे जुड़े लोग ही ज़िम्मेदार हैं।
एक उदाहरण देखिए। वर्ष 2017 में शेनजेन में संपन्न हुए एक अंतर्राष्ट्रीय
सम्मेलन में दुनिया भर के लगभग 700 से अधिक वैज्ञानिकों ने भाग लिया था। यहां 14
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वनस्पति शास्त्रियों द्वारा वनस्पति विज्ञान पर एक
घोषणा प्रस्तुत की गई। जिसमें सात योजनाबद्ध प्राथमिकताएं बताई गई थीं। लेकिन
घोषणा के मजमून में बॉटनी शब्द कहीं नहीं था; इसका
स्थान पादप विज्ञान ने ले लिया था।
वनस्पति विज्ञान का ह्यास
वनस्पति विज्ञान के उपविषयों के प्रसार स्वीकार्य हैं, परंतु
एक असंतुलित दृष्टिकोण अपनाने से गड़बड़ी होती है। आणविक जीव विज्ञान, सूक्ष्मजीव विज्ञान और पर्यावरण विज्ञान जैसे विषय वर्गीकरण विज्ञान एवं
आकारिकी जैसे विषयों पर हावी हो जाते हैं। वस्तुत:, इन तथाकथित उच्च श्रेणी के
विषयों ने वनस्पति विज्ञान की बहुआयामी प्रकृति को तार-तार कर दिया है। गौरतलब है
कि आणविक जीव विज्ञान, सूक्ष्मजीव विज्ञान, जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसे विषय वनस्पति विज्ञान की बुनियाद के बिना अधूरे हैं।
उदाहरण के लिए,
पदानुक्रम के किसी भी स्तर पर कोई भी जैविक परियोजना बिना
वैज्ञानिक नाम के पूरी नहीं होती।
प्राकृतिक इतिहास के संग्रह खतरे में
हर्बेरिया तथा अन्य प्राकृतिक इतिहास के संग्रहों का रख-रखाव संग्रहालयों तथा
विश्वविद्यालयों द्वारा किया जाता है। ऐसे संग्रह समाज के लिए अमूल्य हैं। ये जैव
विविधता और इसके वितरण को समझने की नींव बनाते हैं। हर्बेरिया पौधों की फीनॉलॉजी
(ऋतुचक्र) के अध्ययन के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इनके आधार पर परागण के
इतिहास और शाकाहारियों के असर का आकलन किया जा सकता है। वर्तमान पौधों में पाए
जाने वाले स्टोमेटा की तुलना किसी हर्बेरिया के स्पेसिमेन से करके यह देखा जा सकता
है कि उनमें स्टोमेटा की संख्या में कितना बदलाव आया है। इनसे यह भी पता लगाया जा
सकता है कि प्रजातियां जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से कैसे तालमेल बैठाती हैं।
दुखद बात यह है कि प्राकृतिक इतिहास के ये संग्रह और सम्बंधित संस्थान तेज़ी से
बंद हो रहे हैं। दुर्भाग्य से बजट का अभाव इनके बंद होने के लिए ज़िम्मेदार है। इस
तरह के नकारात्मक सामाजिक परिणामों को व्यापक रूप से पत्र-पत्रिकाओं और संपादकों, यहां तक कि लोकप्रिय मीडिया ने भी व्यक्त किया है।
प्राकृतिक इतिहास संग्रह पर मंडराते इन वैश्विक खतरों का वनस्पति विज्ञान पर
गहरा प्रभाव पड़ा है क्योंकि कई वनस्पति अनुसंधान परियोजनाओं को हर्बेरिया आदि की
आधारभूत आवश्यकता होती है। यहां तक कि आणविक और पारिस्थितिकी विज्ञान सहित अधिकांश
जैविक अनुसंधान जीवों की सही-सही पहचान पर निर्भर करता है। प्राकृतिक इतिहास संग्रह
में जीवों के नमूनों (वाउचर) का संरक्षण आवश्यक है।
वनस्पति विज्ञान के क्षरण का एक और कारण वर्तमान में शोध पत्रों के महत्व को
आंकने का तरीका भी है। आजकल यह देखा जाता है कि किसी शोध पत्र का उल्लेख कितने
अन्य शोधकर्ताओं ने अपने शोध पत्रों में किया है। इसके चलते आणविक जीव विज्ञान या
सूक्ष्मजीव अनुसंधान की तुलना में वनस्पति विज्ञान के शोध पत्रों को कमतर आंका
जाता है।
वनस्पति विज्ञान में घटती रुचि का एक कारण कुछ गलतफहमियां भी हैं। उदाहरण के
लिए एक विचार प्रचलित है कि वर्गीकरण विज्ञान (टेक्सॉनॉमी) मूलत: एक विवरणात्मक
शाखा है,
जिसमें केवल अवलोकन होते हैं। यह गलतफहमी का एक स्पष्ट
उदाहरण है। वास्तव में वर्गीकरण विज्ञान में विवरणों की आवश्यकता तो होती है लेकिन
साथ ही सिद्धांत,
तथा आनुभविक और ज्ञान की मीमांसा की गहनता भी ज़रूरी होती
है। यह परिकल्पना आधारित होता है और इसमें मैदानी तथा प्रयोगशालाई विशेषज्ञता
ज़रूरी होती है।
तस्वीर कैसे बदल सकती है
इस समस्या का संभावित समाधान दो-तरफा है। पहला विज्ञान की वर्तमान संस्कृति का
रोना न रोते हुए यह सोचना होगा कि व्यक्तिगत तौर पर वनस्पति शास्त्री क्या कर सकते
हैं। दूसरी ओर वैज्ञानिक व्यक्तियों के रूप में क्या करते हैं इस पर न अटकते हुए
यह सोचना होगा कि विज्ञान की संस्कृति क्या कर सकती है।
व्यक्तिगत स्तर पर इस हेतु कुछ प्रयास किए जा सकते हैं, जैसे –
वनस्पति
विज्ञान शब्द का सम्मान करना और इसके निंदात्मक प्रयोग को अस्वीकार करना।
इस
क्षेत्र में जोखिमपूर्ण लेकिन नई ज़मीन तोड़ने वाले काम करना, जबकि फिलहाल यह फैशन में नहीं है।
असंतुलित
दृष्टिकोण को चुनौती देना। यह स्वीकार करना कि समकक्ष समीक्षित शोध पत्र काम के
मूल्यांकन का प्रमुख आधार हैं।
शोध
कार्य के मूल्यांकन में उल्लेखों की गिनती की विधि को अस्वीकार करना।
प्राकृतिक
इतिहास संग्रह का मूल्य समझना बहुत ज़रूरी है।
विज्ञान की संस्कृति के संदर्भ में भी कई कदम उठाए जा सकते हैं, जैसे –
सरकारों
को ऐसे कानून और नीतियां बनानी चाहिए जो वनस्पति विज्ञान के कद को बढ़ा सकें।
वैज्ञानिक
समुदायों को प्राकृतिक इतिहास के महत्व को समझना होगा और उन तरीकों को बदलना होगा
जिनसे वैज्ञानिक अनुसंधान के नतीजों का मूल्यांकन विभिन्न एजेंसियों द्वारा किया
जाता है।
जीव-स्तर
पर काम करने वाले वैज्ञानिकों के लिए रोज़गार के अवसर बढ़ाना होंगे।
प्राकृतिक
संग्रह को बोझ के रूप में नहीं बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रोत्साहित करने और
जैव विविधता का संरक्षण करने की संपदा के रूप में देखना होगा।
इसी
तरह फंडिंग एजेंसियों को उन मापदंडों में विविधता लानी होगी जिनके आधार पर वित्त
प्रदान करने के निर्णय किए जाते हैं। वनस्पति विज्ञान में अनुसंधान के महत्व को
पहचानना और विज्ञान की अन्य शाखाओं के लिए इसके मूल्य और प्राकृतिक इतिहास संग्रह
का समर्थन करना ज़रूरी है।
विश्वविद्यालय
स्तर पर वनस्पति विज्ञान के पाठ्यक्रमों को प्रोत्साहित करना और फैकल्टी को इस तरह
संतुलित करना कि उन पाठ्यक्रम को पढ़ाने और वनस्पति विज्ञान में अनुसंधान करने में
सक्षम वैज्ञानिकों की पर्याप्त संख्या हो।
वैज्ञानिक
पत्रिकाओं के संपादकों को वनस्पति विज्ञान की जीव-स्तर की पांडुलिपियों के खिलाफ
संभावित पूर्वाग्रह से बचना होगा और बिब्लियोमेट्रिक्स के आधार पर अपनी पत्रिकाओं
का महत्व स्थापित करने की प्रवृत्ति से बचना होगा।
विज्ञान
अकादमियों को अपने घटकों को बॉटनी पर चर्चा हेतु प्रोत्साहित करना होगा।
मीडिया
में आम जनता के लिये वनस्पति विज्ञान का कवरेज बढ़ाना। जिसमें पौधों के बारे में
हमारे ज्ञान और समाज में उनके महत्व और प्राकृतिक इतिहास संग्रह की प्रासंगिकता और
पौधों तथा अन्य जीवों की पहचान करने में सक्षम व्यक्तियों को महत्व देना शामिल है।
शिक्षकों
को हमारे युवाओं के बीच जीवन के अंतर-सम्बंधों की भूमिका और मानव के अस्तित्व के
लिए पौधों के महत्व और जैव विविधता के महत्व को समझाना होगा।
कुल मिलाकर पूरी दुनिया में वनस्पति विज्ञान के अध्यापन की मौजूदा स्थिति बहुत ही खराब है; हम सबके जीवन से सीधे तौर पर जुड़े इस विषय की महत्ता को पुन: स्थापित करने के लिए अभी से युद्ध स्तर पर गंभीर प्रयास करने होंगे। तभी कुछ अच्छे नतीजों की आशा की जा सकती है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://i2.wp.com/www.botany.one/wp-content/uploads/2020/12/EndOfBotany.jpg?resize=780%2C520&ssl=1
एक अध्ययन से पता चला है कि वैज्ञानिक साहित्य में कंप्यूटर
प्रोग्राम द्वारा रचे गए बेमतलब शोध पत्रों की संख्या काफी अधिक है। यदि प्रकाशकों
द्वारा कार्यवाही की जाती है तो 200 से अधिक शोध पत्र हटाए जा सकते हैं।
यह मुद्दा सबसे पहले तब सामने आया जब 2005 में तीन पीएचडी छात्रों ने शोध पत्र
बनाने वाला SCIgen नामक सॉफ्टवेयर तैयार किया।
वे बताना चाहते थे कि कुछ सम्मेलनों में अर्थहीन पेपर भी स्वीकार किए जाते हैं। यह
सॉफ्टवेयर बेतरतीब शीर्षकों, शब्दों और चार्ट्स के माध्यम
से शोध आलेख तैयार करता है। मानव पाठक इसकी निरर्थकता को बहुत ही आसानी से पकड़
सकते हैं।
वर्ष 2012 तक कंप्यूटर वैज्ञानिक सिरिल लेबे ने SCIgen की मदद से तैयार किए गए 85 नकली पत्रों का पता लगाया था जो
IEEE द्वारा प्रकाशित किए जा चुके
हैं। इसके अलावा एक अन्य प्रकाशक स्प्रिंगर द्वारा भी कई नकली शोध पत्र प्रकाशित
किए गए हैं। हालांकि, ये लेख या तो वापस ले लिए गए या हटा दिए गए
हैं। फिर भी लेबे ने एक वेबसाइट शुरू की है जिसमें कोई भी पेपर या शोध पत्र अपलोड
कर सकता है और पता लगा सकता है कि यह SCIgen की मदद से तैयार किया गया है या नहीं। स्प्रिंगर ने भी ऐसे पत्रों का पता
लगाने के लिए SciDetect नामक सॉफ्टवेयर तैयार किया
है।
इन कूट-रचित पर्चों का पता लगाने के लिए पहले तो लेबे ने SCIgen की शब्दावली के विशिष्ट शब्दों
का सहारा लिया। फ्रांस के एक अन्य वैज्ञानिक ने SCIgen रचित पर्चों में प्रमुख वैयाकरणिक तत्वों का पता लगाने का
काम किया। पिछले महीने ही दोनों ने डायमेंशन डैटाबेस में मौजूद लाखों पर्चों में
ऐसे वाक्यांशों की खोज की है। इस अध्ययन में उन्होंने 243 ऐसे लेख पाए जो पूर्ण या
आंशिक रूप से SCIgen की मदद से तैयार किए गए थे।
ये लेख 2008 से 2020 के दौरान प्रकाशित किए गए हैं और मुख्य रूप से कंप्यूटर साइंस
क्षेत्र के जर्नल, सम्मेलनों, प्रीप्रिंट
साइट्स में छपे हैं। इनमें से कुछ तो ओपन-एक्सेस जर्नल में प्रकशित हुए हैं। 46
पर्चों को वेबसाइटों से वापस ले लिया या हटा दिया गया है। पिछले वर्ष वैज्ञानिकों
ने 20 अन्य पेपर्स को भी हटाया है जो MATHgen (गणित) और SBIR प्रपोज़ल जनरेटर द्वारा रचे गए
थे।
गौरतलब है कि SCIgen की मदद से तैयार किए गए अधिकांश नवीनतम पेपर चीन (64 प्रतिशत) और भारत (22
प्रतिशत) के शोधकर्ताओं द्वारा लिखे गए हैं। कुछ लेखकों ने बताया कि उनका नाम उनसे
पूछे बगैर शामिल किया गया है। लेकिन कई लेख वास्तविक संदर्भ सूची के साथ प्रस्तुत
किए गए हैं। लगता है कि वैज्ञानिकों की प्रकाशन-प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए ऐसा किया
गया है।
SCIgen रचित दो ऐसे पेपर्स का पता
लगा है जिन्हें IEEE ने वापस नहीं लिया है। इसी
तरह स्प्रिंगर का भी एक पेपर वापस नहीं लिया गया है जिसमें कुछ भाग MATHgen द्वारा रचित है। इस पड़ताल से
कुछ प्रकाशक बहुत चिंतित हैं क्योंकि इससे यह भी पता चलता है कि इन सभी पेपर्स की
विशेषज्ञ समीक्षा के दौरान ये पेपर्स पकड़े नहीं जा सके थे। यानी इस प्रक्रिया के
साथ भी समझौता हुआ था।
SCIgen की मदद रचित सबसे अधिक
सामग्री को प्रकाशित करने वालों में स्विस ट्रांस टेक पब्लिकेशन्स (57), भारत स्थित ब्लू आईज़ इंटेलिजेंस इंजीनियरिंग एंड साइंस पब्लिकेशन (BEIESP, 54) और फ्रांस स्थित अटलांटिस
प्रेस (39) है। ट्रांस टेक और अटलांटिस ने लेखों को वापस लेते हुए इस पर जांच करने
की बात कही है जबकि BEIESP का
कहना है कि वह मूल सामग्री पर आधारित पेपर गहन समकक्ष समीक्षा और सभी तरह की जांच
के बाद ही प्रकाशित करता है।
एक अध्ययन में पता चला है कि समकक्ष समीक्षा के पहले पेपर साझा करने वाले एक
सर्वर (SSRN), पर भी SCIgen रचित 16 लेख प्रकाशित हुए हैं
जिनकी जांच जारी है। ऐसे में वैज्ञानिकों को अपारदर्शी तरीकों से शोध पत्रों को
प्रकाशित करने को लेकर काफी चिंता है। उदाहरण के लिए IEEE ने तो अपनी वेबसाइट से ऐसे शोध पत्रों को तो हटा लिया है
और अन्य प्रकाशकों को औपचारिक तौर पर ऐसे पत्र हटाने के संदेश भी दिए हैं। SSRN सर्वर से कुछ पेपर्स तो बिना
किसी रिकॉर्ड के हटा दिए गए हैं।
वैसे तो SCIgen की मदद से तैयार किए गए पेपर्स की संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है लेकिन इस तरह के पेपर्स का प्रकाशित होना वैज्ञानिक प्रकाशन की परंपरा के लिए काफी खतरनाक है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://media.nature.com/w1248/magazine-assets/d41586-021-00733-5/d41586-021-00733-5_18989362.jpg
मार्च 2020 में मिशिगन विश्वविद्यालय की कैंसर विज्ञानी रेशमा
जग्सी ने कोविड-19 महामारी के महिला वैज्ञानिकों के काम पर पड़ने वाले प्रतिकूल
प्रभाव के बारे में पूर्वानुमान लगाते हुए एक राय लिखी थी। डैटा न होने के कारण संपादकों
ने इस राय को प्रकाशित करने से मना कर दिया था। लेकिन इसके बाद से कई टिप्पणीकार
यही बात दोहराते आए हैं। अब अध्ययन से प्राप्त प्रमाणों से स्पष्ट हो गया है कि
कोविड-19 महामारी में पहले से व्याप्त असमानताएं और बढ़ गर्इं हैं, इस दौर ने महिला वैज्ञानिकों के लिए नई चुनौतियां खड़ी की हैं। खासकर जिन
महिला वैज्ञानिकों के बच्चे हैं उन्होंने अपना अनुसंधान कार्य करते रहने के लिए
अतिरिक्त संघर्ष किया है।
कुछ विषयों में किए गए अध्ययन के डैटा से पता चलता है कि कोरोना महामारी के
शुरुआती महीनों में भेजे गए प्रीप्रिंट्स, पांडुलिपियों, और प्रकाशित शोधपत्रों में महिला लेखकों की संख्या में कमी आई है। 20,000
शोधकर्ताओं पर वैश्विक स्तर पर किए गए सर्वेक्षण में पाया गया है कि इस दौरान
पिता-वैज्ञानिकों की तुलना में माता-वैज्ञानिकों के अनुसंधान कार्यों के घंटों में
33 प्रतिशत अधिक की कमी आई है। मई 2020 से जुलाई 2020 तक हुए सर्वेक्षण में यह भी
पाया गया कि माता-वैज्ञानिकों ने पिता-वैज्ञानिकों की तुलना में अधिक घरेलू
दायित्व निभाए और बच्चों की देखभाल करने में अधिक समय बिताया।
लेकिन इस दौरान थोड़ी सकारात्मक बातें भी दिखीं। एक फंडिंग एजेंसी ने महामारी
के दौरान बढ़ी लैंगिक असमानता को पहचाना और उसमें सुधार के प्रयास किए। दरअसल, फरवरी 2020 में केनेडियन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान ने कोविड-19 सम्बंधी शोध
कार्यों के लिए अनुदान की पेशकश की थी, जिसमें एजेंसी ने
शोधकर्ताओं को प्रस्ताव भेजने के लिए महज़ 8 दिन की मोहलत दी थी। यह कनाडा में
तालाबंदी के पहले की बात है। लेकिन उन्होंने देखा कि प्राप्त प्रस्तावों में से केवल
29 प्रतिशत प्रस्ताव ही महिला शोधकर्ताओं द्वारा भेजे गए थे, यह संख्या पूर्व में भेजे जाने वाले प्रस्तावों की संख्या से लगभग सात प्रतिशत
कम थी।
संख्या में इतना अंतर देखने के बाद संस्थान के इंस्टीट्यूट ऑफ जेंडर एंड हेल्थ
की निदेशक कारा तेनेनबॉम को लगा कि हमने कहीं कुछ गलती कर दी है। इसीलिए जब
संस्थान ने दो महीने बाद कोविड-19 शोध कार्यों के लिए दोबारा प्रस्ताव मंगाए तो
उन्होंने प्रस्ताव भेजने की समय सीमा को 8 दिन से बढ़ाकर 19 दिन कर दी और दस्तावेज़ी
कार्रवाइयां भी कम कर दीं। प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में
के अनुसार दूसरे दौर में महिलाओं द्वारा भेजे गए प्रस्तावों की संख्या बढ़कर 39
प्रतिशत हो गई थी।
संस्थान द्वारा मांगे गए प्रस्तावों के संदर्भ में लावल युनिवर्सिटी की
स्वास्थ्य शोधकर्ता होली विटमैन अपना अनुभव बताती हैं, “जब
पहली बार मैंने प्रस्ताव भेजने की समय सीमा महज़ 8 दिन देखी तो मैंने सोचा कि दो
बच्चों और अपनी स्वास्थ्य स्थिति के साथ इतने कम समय में अनुदान के लिए देर रात तक
बैठकर प्रस्ताव लिखना और भेजना संभव नहीं है। लेकिन जब अनुदान के लिए दोबारा
प्रस्ताव मांगे गए तो प्रस्ताव लिखने के लिए पर्याप्त समय था, जिसमें अंतत: मुझे अनुदान मिला भी।”
महामारी के दौर में अधिकांश शोधकर्ताओं के शोध कार्य के घंटों में कमी आई।
ताज़ा अध्ययन बताते हैं कि पालक-शोधकर्ताओं, खासकर
माता-शोधकर्ताओं के काम के घंटों में बहुत कमी आई है। पिता की तुलना में माताओं ने
बच्चे की देखभाल और गृहकार्य करने में अधिक समय बिताया। इस संदर्भ में सान्ता
क्लारा युनिवर्सिटी की रॉबिन नेल्सन बताती हैं कि पिछले साल की तुलना में
कोरोनाकाल में उनके काम के घंटे घटकर आधे हो गए हैं क्योंकि उनके दो बच्चे अब घर
पर होते हैं। कुछ शोधकर्ता अन्य की तुलना में अधिक बाधाओं में काम कर रहे हैं।
इसलिए हमें अब अनुदान की प्रक्रिया, समय सीमा, नीतियों आदि पर सवाल उठाने चाहिए।
बोस्टन विश्वविद्यालय के इकॉलॉजिस्ट रॉबिन्सन फुलवाइलर का कहना है कि विश्वविद्यालयों और फंडिंग एजेंसियों को वैज्ञानिकों को यह बताने का भी विकल्प देना चाहिए कि कोविड-19 ने उनके काम में किस तरह की बाधा डाली या प्रभावित किया। इसके अलावा नियोक्ताओं को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी शोधकर्ताओं को ठीक-ठाक झूलाघर जैसी सुविधाएं मिलें। फुलवाइलर और अन्य माता-वैज्ञानिकों ने प्लॉस बायोलॉजी में इस तरह की व कई अन्य सिफारिशें की हैं। कोरोनाकाल में और स्पष्ट होती असमानता को अब दूर करने के प्रयास करने का वक्त है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.sciencemag.org/sites/default/files/styles/article_main_image_-1280w__no_aspect/public/ca_0212NID_Mother_Child_online.jpg?itok=KtvdvK2V
सर आइज़ैक न्यूटन के मशहूर गति के तीन नियमों की व्याख्या करने वाली और उनके मौलिक काम को प्रस्तुत करने वाली एक किताब को 37 लाख डॉलर (करीब 25 करोड़ रुपए) में नीलाम किया गया है। इसके साथ ही यह किसी ऑक्शन में बेची गई अब तक की सबसे महंगी मुद्रित वैज्ञानिक किताब बन गई है। प्रिंसिपिया मैथमैटिका नामक यह किताब साल 1687 में लिखी गई थी। इस किताब की बिक्री का काम देखने वाले नीलामी घर क्रिस्टीस ने उम्मीद की थी कि बकरी की खाल के कवर वाली इस किताब के 10 से 15 लाख डॉलर मिल जाएंगे। बोली लगाने वाले एक व्यक्ति ने इसे लगभग 37 लाख डॉलर में खरीद लिया। लाइव साइंस की खबर के अनुसार, प्रिंसिपिया मैथेमेटिका में न्यूटन के गति के तीन नियमों की व्याख्या की गई है। इसमें बताया गया है कि किस तरह से चीज़ें बाहरी बलों के प्रभाव में गति करती हैं। लाल रंग की इस 252 पेज की किताब की लंबाई नौ इंच और चौड़ाई सात इंच है। इनमें कई पन्नों पर लकड़ी के चित्र भी हैं। पुस्तक में एक मुड़ सकने वाली प्लेट भी है। पिछले 47 साल में न्यूटन के सिद्धांतों की एक ही अन्य मौलिक प्रति बेची गई है। उस प्रति को किंग जेम्स द्वितीय (1633-1701) को उपहार स्वरूप दिया गया था। उसे दिसंबर 2013 में क्रिस्टीस न्यूयॉर्क में 25 लाख डॉलर में खरीदा गया था। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://thumbs-prod.si-cdn.com/vDBg2R4pc2DHkabowRC4eySOSrk=/fit-in/1600×0/https://public-media.si-cdn.com/filer/e6/a1/e6a17a66-bb80-4624-b2e7-4148867d7dbe/newtonsprincipia.jpg
पिछले 9 माह से देश के स्कूल कमोबेश बंद पड़े हैं। कहने को तो
रिमोट शिक्षा की व्यवस्था की गई है लेकिन उसकी अपनी समस्याएं हैं। वैसे तो केंद्र
सरकार ने अक्टूबर में आदेश जारी कर दिए थे कि राज्य अपने विवेक के अनुसार स्कूल
खोलने का निर्णय ले सकते हैं किंतु अधिकांश राज्यों ने स्कूल न खोलने या आंशिक रूप
से खोलने का ही निर्णय लिया है। इस संदर्भ में मुख्य सवाल यह है कि स्कूल खोलने या
बंद रखने का निर्णय किन आधारों पर लिया जाएगा।
पहले तो यह देखना होगा कि हमारे सामने
विकल्प क्या हैं। पहला विकल्प तो यही है कि सब कुछ सामान्य हो जाए और सारे स्कूल
पहले की भांति (जैसे लॉकडाउन से पहले थे) चलने लगें। इसका मतलब यह तो नहीं लगाया
जा सकता कि सब कुछ ठीक हो गया क्योंकि देश में शिक्षा की हालत को लेकर कई अन्य
चिंताएं तो बनी रहेंगी।
दूसरा विकल्प है स्कूलों को पूरी तरह बंद
रखना। और तीसरा विकल्प है स्कूलों को आंशिक रूप से खोलना यानी कुछ कक्षाएं शुरू कर
देना या प्रत्येक कक्षा में सीमित संख्या में छात्रों को आने देना। स्कूल बंद रखने
का मतलब होगा कि देश के 15 लाख से ज़्यादा स्कूलों में दाखिल 28 करोड़ बच्चे घरों
में बंद रहेंगे और संभव हुआ तो ऑनलाइन कुछ सीखने की कोशिश करेंगे। लेकिन इसके साथ
जुड़े कई मसले हैं।
सबसे पहला मुद्दा तो ऑनलाइन शिक्षा तक
पहुंच का है। युनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में मात्र 23 प्रतिशत घरों में
इंटरनेट कनेक्शन हैं जिनके माध्यम से ऑनलाइन शिक्षा तक पहुंच बनाई जा सकती है।
दुनिया भर में देखें तो ऐसे डिजिटल-वंचित बच्चों की संख्या 50 करोड़ के आसपास है।
इस मामले में विशाल ग्रामीण-शहरी अंतर भी है। इंटरनेट उपलब्धता में इस अंतर का
स्पष्ट परिणाम यह होगा कि सीखने के मामले में खाई और बढ़ेगी। स्मार्ट फोन वगैरह भी
काफी कम परिवारों के पास हैं और यदि हैं भी,
तो वे पूरे परिवार के
इस्तेमाल के लिए हैं। ज़ाहिर है, ग्रामीण बच्चे,
लड़कियां और शहरी गरीब
बच्चे पिछड़ जाएंगे।
यह सही है कि शासन की ओर से यह प्रयास किया
गया है कि इंटरनेट से स्वतंत्र प्लेटफॉम्र्स (जैसे टेलीविज़न) पर भी शिक्षा का
उपक्रम किया जाए लेकिन उसकी समस्याएं भी कम नहीं हैं। एक तो इस शैली में मानकर चला
जाता है कि पर्दे पर किसी जानकार को सुनकर शिक्षा पूरी हो जाती है। इस माध्यम में
बच्चों और शिक्षक के बीच किसी वार्तालाप के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती। दूसरी बात
यह है कि लगभग सारे शिक्षक बताएंगे कि बच्चे कक्षा में लगातार ध्यान केंद्रित नहीं
करते/कर पाते। शिक्षक की नज़र रहती है कि किसका ध्यान कब व कहां भटक रहा है।
टेलीविज़न जैसा माध्यम तो इसमें कोई मदद नहीं कर सकता। यानी यह रिमोट शिक्षा एक ओर
तो शिक्षा की गुणवत्ता को बिगाड़ेगी और साथ ही गरीब-अमीर,
ग्रामीण-शहरी बच्चों
के बीच तथा लड़के-लड़कियों के बीच असमानता को बढ़ाएगी।
युनिसेफ की उक्त रिपोर्ट में आगाह किया गया
है कि रिमोट शिक्षा के माध्यम उपलब्ध होने के बावजूद भी शायद बच्चे उतने अच्छे से
न सीख पाएं क्योंकि घर के परिवेश में कई अन्य दबाव भी काम करते हैं। यदि
बच्ची/बच्चा स्कूल चला जाए तो उतने घंटे तो समझिए,
‘सीखने’ के लिए
आरक्षित हो गए। लेकिन वह घर पर ही है तो कई अन्य प्राथमिकताएं सिर उठाने लगती हैं।
अधिकांश लोग शायद यह तो स्वीकार करेंगे कि
बच्चे स्कूल सिर्फ ‘पढ़ाई’ करने नहीं जाते। स्कूल हमजोलियों से मेलजोल का एक स्थान
भी होता है जहां तमाम तरह के खेलकूद होते हैं,
रिश्ते-नाते बनते
हैं। स्कूल बंद रहने से बच्चे इन महत्वपूर्ण सामाजिक अवसरों से वंचित हो रहे हैं।
यह बात कई अध्ययनों में उभरी है कि सतत माता-पिता की निगरानी में रहना और हमउम्र
बच्चों के साथ मेलजोल न होना बच्चों के लिए मानसिक दबाव पैदा कर रहा है और
मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी। माता-पिता के लिए जो समस्याएं सामने आ रही हैं, वे
तो सूद के रूप में हैं। वॉशिंगटन स्थित चिल्ड्रन नेशनल हॉस्पिटल की डॉ. डेनियल
डूली ने कहा है कि स्कूल बंद होने की वजह से शिक्षा का तो नुकसान हुआ ही है, मानसिक
स्वास्थ्य, कुपोषण वगैरह के खतरे भी बढ़े हैं।
एक मुद्दा मध्यान्ह भोजन यानी मिडडे मील का
भी है। मिडडे मील को दुनिया का सबसे बड़ा पोषण कार्यक्रम कहा गया है। इसके तहत दिन
में एक बार कक्षा 1 से 8 तक के सारे स्कूली बच्चों को पौष्टिक भोजन प्राप्त होता
है। इनकी संख्या करीब 6 करोड़ होगी। इतने ही बच्चों को आंगनवाड़ी से भोजन दिया जाता
है और वे भी बंद हैं। यह उनके पोषण स्तर को बेहतर करने में एक महत्वपूर्ण योगदान
देता है। हो सकता है यह योजना बहुत अच्छी तरह से लागू न हुई है, फिर
भी इसने स्कूली बच्चों की सेहत पर सकारात्मक असर डाला है। स्कूल बंद मतलब मिडडे
मील भी बंद। भारत में कुपोषण की स्थिति को देखते हुए यह एक बहुत बड़ा व महत्वपूर्ण
नुकसान है।
कुल मिलाकर स्कूल बंद रहने का मतलब बच्चों
के लिए संज्ञानात्मक विकास और तंदुरुस्ती में ज़बर्दस्त नुकसान। इसके साथ-साथ
खेलकूद का अभाव, हमउम्र बच्चों से मेलजोल के अभाव वगैरह का मनोवैज्ञानिक असर
तो हो ही रहा है। इसके अलावा, कई संस्थाओं ने आशंका व्यक्त की है कि यदि
यह साल इसी तरह गया तो 2021 में बड़ी संख्या में बच्चे शायद स्कूल न लौटें, नए
दाखिलों की तो बात ही जाने दें। स्कूलों में दाखिलों को लेकर जो प्रगति पिछले
एक-डेढ़ दशकों में हुई है वह शायद वापिस पुरानी स्थिति में पहुंच जाए। लैंसेट
के एक शोध पत्र में यह भी शंका व्यक्त की गई है कि इस तरह स्कूल बंद रहने से
बाल-विवाह में भी वृद्धि की संभावना है।
तो स्कूलों को जल्द से जल्द बहाल करने के
पक्ष में काफी दलीलें हैं। लेकिन यदि सरकारें स्कूलों को नहीं खोल रही हैं, तो
यकीनन कुछ कारण होंगे। सरकार तो सरकार, माता-पिता भी कह रहे हैं कि स्कूल खुलेंगे
तो भी वे अपने बच्चों को नहीं भेजेंगे। एक सर्वेक्षण में 70 प्रतिशत अभिभावकों ने
यह राय व्यक्त की है। वैसे यदि पालकों को कहा जाएगा कि वे बच्चों को स्कूल अपनी
ज़िम्मेदारी पर ही भेजें, तो पालकों का कोई अन्य जवाब हो भी नहीं
सकता। कई स्कूल प्रबंधन भी ऐसा ही सोचते हैं। और इन सबकी हिचक का प्रमुख (या शायद
एकमात्र) कारण है कि स्कूल में भीड़भाड़ होगी,
बच्चों के बीच निकटता
होगी, बच्चे मास्क वगैरह भूल जाएंगे और खुद संक्रमित होंगे, और
संक्रमण को घर ले आएंगे। कहा जा रहा है कि स्कूल संक्रमण प्रसार के अड्डे बन
जाएंगे। इसी मूल चिंता के चलते समाज में स्कूल खोलने के विरुद्ध माहौल बना है। तो
सवाल है कि यह चिंता कितनी जायज़ है।
पिछले दिनों कई देशों में स्कूल पूर्ण या
आंशिक रूप से खोले गए हैं। भारत में भी कुछ राज्यों ने स्कूल खोले हैं। कहना न
होगा कि स्कूल खोलने को लेकर केंद्र सरकार द्वारा प्रोटोकॉल जारी किए गए हैं और
शायद शत प्रतिशत नहीं लेकिन इनका पालन भी हुआ है। तो उनसे किस तरह के आंकड़े व अनुभव
मिले हैं।
स्विटज़लैंड स्थित इनसाइट्स फॉर एजूकेशन
नामक एक संस्था ने स्कूल खोलने के बाद के अनुभवों का एक अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन
किया था। उनके अध्ययन में 191 देशों के अनुभवों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट
का पहला चौंकाने वाला निष्कर्ष यह है कि कोविड-19 वैश्विक महामारी ने दुनिया भर
में बच्चों की शिक्षा के 3 खरब स्कूल दिवसों की हानि की है।
बहरहाल,
रिपोर्ट का सबसे
महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि स्कूलों के खुलने और संक्रमण दर में वृद्धि के बीच
कोई सम्बंध नहीं है। इनसाइट्स फॉर एजूकेशन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी रैण्डा
ग्रोब-ज़कारी का कहना है कि यह तो सही है कि स्कूल खोलने या ना खोलने का निर्णय तो
स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा लेकिन कुछ मान्यताओं की छानबीन आवश्यक है।
जैसे यह मान लिया गया है स्कूल खुले तो संक्रमण फैलने की दर में उछाल आएगा और
स्कूल बंद रखने से संक्रमण फैलने की दर कम रहेगी। देखना यह है कि विभिन्न देशों का
अनुभव क्या कहता है। इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने 191 अलग-अलग देशों में अपनाए
गए तरीकों और उनके परिणामों का विश्लेषण किया है।
जिन देशों का अध्ययन किया गया उनमें से कम
से कम 92 देशों में स्कूल खोले गए हैं। इनमें से कुछ देश तो ऐसे भी थे जहां
कोविड-19 काफी अधिक था। रिपोर्ट में बताया गया है कि फ्रांस व स्पैन समेत 52 देशों
में बच्चे अगस्त और सितंबर में स्कूल आने लगे थे। ये सभी वे देश हैं जहां लॉकडाउन
के दौरान संक्रमण दर बढ़ रही थी लेकिन स्कूल खुलने के बाद और नहीं बढ़ी थी। दूसरी ओर, यू.के.
व हंगरी में स्कूल खुलने के बाद संक्रमण दर बढ़ी थी। 52 देशों का विश्लेषण बताता है
कि संक्रमण दर बढ़ने का स्कूल खुलने से कोई सम्बंध नहीं दिखता। इसके लिए अन्य
परिस्थितियों पर विचार करना होगा। यूएस में भी स्कूल खुलने और संक्रमण दर में
वृद्धि का कोई सीधा सम्बंध स्थापित नहीं हुआ है।
भारत में कुछ राज्यों ने स्कूल खोलने का
निर्णय लिया है। अधिकांश राज्यों में कक्षा 9 तथा उससे ऊपर की कक्षाओं को ही शुरू
किया गया है। इस संदर्भ में आंध्र प्रदेश की रिपोर्ट है कि वहां स्कूल खुलने के
बाद राज्य के कुल 1.89 लाख शिक्षकों में से लगभग 71 हज़ार की जांच की गई और उनमें
से 829 (1.17 प्रतिशत) पॉज़िटिव पाए गए। कुल 96 हज़ार छात्रों की जांच में 575 (0.6
प्रतिशत) पॉज़िटिव निकले। राज्य के शिक्षा आयुक्त ने माना है कि ये आंकड़े कदापि
चिंताजनक नहीं हैं क्योंकि पहली बात तो यह है कि शिक्षकों की जांच स्कूल खुलने से
पहले की गई थी जिसके परिणाम स्कूल खुलने के बाद आए हैं।
मिशिगन विश्वविद्यालय चिकित्सा अध्ययन शाला
की संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रीति मालनी ने स्कूल खोलने के बारे में कहा है कि
अब तक उपलब्ध आंकड़ों से नहीं लगता कि स्कूल सुपरस्प्रेडर स्थान हैं। दरअसल ऐसा
लगता है कि स्कूल अपने इलाके के सामान्य रुझान को ही प्रतिबिंबित करते हैं। स्पैन
के पोलीटेक्निक विश्वविद्यालय के एनरिक अल्वारेज़ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि
स्पैन में दूसरी लहर में संक्रमणों में वृद्धि स्कूल खुलने से कई सप्ताह पहले शुरू
हो गई थी और स्कूल खुलने के तीन सप्ताह बाद गिरने लगी थी। कहीं भी यह नहीं देखा
गया कि स्कूल खुलने से संक्रमण के प्रसार में वृद्धि हुई हो। और उनके आंकड़े बताते
हैं कि स्कूल संक्रमण फैलाने के हॉट-स्पॉट तो कदापि नहीं बने हैं। अलबत्ता, उन्होंने
स्पष्ट किया है कि यह स्पैन की बात है जहां जांच और संपर्कों की खोज काफी
व्यवस्थित रूप से की जाती है। इसके अलावा स्पैन में मास्क पहनना, शारीरिक
दूरी बनाए रखना तथा साफ-सफाई का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है।
इसी प्रकार से थाईलैंड व दक्षिण अफ्रीका
में स्कूल पूरी तरह खोल दिए गए और संक्रमण के फैलाव पर इसका कोई असर नहीं देखा
गया। वियतनाम व गाम्बिया में गर्मी की छुट्टियों में मामले बढ़े लेकिन स्कूल खुलने
के बाद कम हो गए। जापान में भी पहले तो मामले बढ़े लेकिन फिर घटने लगे। इस पूरे
दौरान स्कूल खुले रहे। सिर्फ यू.के. में ही देखा गया कि स्कूल खुलने के समय के बाद
से संक्रमणों में वृद्धि हुई।
अधिकांश देशों में,
और खासकर यू.एस. व
यू.के. में वैज्ञानिकों का मत है कि कहीं-कहीं स्कूल खुलने के बाद संक्रमण दर में
वृद्धि हुई है लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ऐसा स्कूल खुलने के कारण हुआ
है। साथ ही वे कहते हैं कि इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि इसमें स्कूलों की
कोई भूमिका नहीं रही है।
महामारी और स्कूल खोलने के संदर्भ में एक
महत्वपूर्ण सवाल यह उठता रहा है कि क्या बच्चे कम संक्रमित होते हैं और संक्रमण को
कम फैलाते हैं। सामान्य आंकड़ों से पता चला है कि संक्रमित लोगों में बच्चे सबसे कम
हैं। इसकी कई व्याख्याएं प्रस्तुत की गई हैं और काफी मतभेद भी हैं। कुछ विशेषज्ञों
का मत है कि बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली अप्रशिक्षित होने की वजह से वे सुरक्षित
रहते हैं। इसके विपरीत कुछ लोगों का कहना है कि यदि ऐसा होता तो वे अन्य संक्रमणों
से भी सुरक्षित रहते लेकिन हकीकत अलग है। कुछ लोगों को कहना है कि बच्चों के
फेफड़ों की कम कोशिकाओं में वे ग्राही (ACE2 ग्राही) होते हैं जो कोरोनावायरस को
कोशिका में प्रवेश का रास्ता प्रदान करते हैं। यह भी कहा गया है कि बच्चे संक्रमण
को बहुत अधिक नहीं फैलाते क्योंकि उनके फेफड़े छोटे होते हैं और उनकी छींक या खांसी
के साथ निकली बूंदों में वायरस की संख्या कम होती है और ये बूंदें बहुत दूर तक
नहीं जातीं।
बहरहाल, मामला यह है कि अधिकांश आंकड़े दर्शाते हैं कि स्कूल कोविड-19 वायरस फैलाने के प्रमुख या बड़े स्रोत नहीं हैं। यह भी स्पष्ट है कि स्कूलों के बंद रहने का शैक्षणिक व स्वास्थ्य सम्बंधी खामियाजा खास तौर से गरीब व वंचित तबके के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। इसलिए इस मुद्दे को मात्र प्रशासनिक सहूलियत के नज़रिए से न देखकर व्यापक अर्थों में देखकर निर्णय करने की ज़रूरत है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://resize.indiatvnews.com/en/resize/newbucket/715_-/2020/08/schools-rep2-1597077148.jpg
जब भी मैं अखबार का बिज़नेस पेज पढ़ता हूं तो मुझे कुछ
एक्रोनिम (यानी संक्षिप्त रूप) मिलते हैं जिनका अर्थ मुझे पता नहीं होता, जैसे
NCLT या MCLR। इनका मतलब जानने के लिए मुझे इंटरनेट का सहारा लेना पड़ता है (NCLT यानी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल और MCLR यानी मार्जिनल कॉस्ट
ऑफ फंड्स-बेस्ड लेंडिंग रेट)। हालांकि उस पेशे से जुड़े लोगों के लिए ये शब्द
रोज़मर्रा की बात हैं। ज़ाहिर है, ये व्यवसाय की भाषा के अंग हैं, मेरी
भाषा के नहीं। इसी प्रकार से, हममें से कितने लोग सरकार द्वारा उपयोग किए
जाने वाले एक्रोनिम जैसे PMCARES fund, या ATAL,
या AYUSH का पूरा या विस्तारित रूप जानते हैं? ज़रा
पता करें। ATAL तो वास्तव में एक एक्रोनिम का भी एक्रोनिम
है।
प्रसंगवश बता दूं कि एब्रेविएशन या लघु-रूप का मतलब होता है किसी लंबे शब्द को छोटे
रूप में लिखना जैसे प्रोफेसर को प्रो. डॉक्टर को डॉ.। दूसरी ओर एक्रोनिम का मतलब
होता है कई शब्दों के प्रथम अक्षरों से मिलकर बना एक शब्द,
जैसे डीऑक्सीराइबो
न्यूक्लिक एसिड का DNA,
सेंट्रल ब्यूरो ऑफ
इंवेस्टीगेशन का CBI,
या न्यू डेल्ही
टेलीविज़न लिमिटेड का NDTV।
अफसोस कि ये एक्रोनिम वैज्ञानिक शोध पत्रों
और प्रस्तुतियों में खूब देखने को मिलते हैं। और इनका उपयोग बढ़ता ही जा रहा है। यह
बात तो समझ आती है कि खगोल भौतिकी के एक्रोनिम जीव विज्ञानियों की समझ में ना आएं, लेकिन
यह स्थिति तो जीव विज्ञान और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों के अंदर भी बन जाती
है!
एड्रियन बार्नेट और ज़ो डबलडे ने ईलाइफ
पत्रिका में हाल ही में एक पेपर प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है मेटा-अनुसंधान:
वैज्ञानिक साहित्य में एक्रोनिम का बढ़ता उपयोग। यह पेपर जीव वैज्ञानिकों और
चिकित्सा वैज्ञानिकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है और पठनीय है। (लिंक – DOI:
https://doi.org/10.7554/eLife.60080)
मेटा-अनुसंधान पूर्व में किए गए शोध
कार्यों के अध्ययन को कहते हैं। उस विषय पर पूर्व शोधकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत
रिपोर्ट, उनको दोहराने की संभाविता,
और मूल्यांकन। इस तरह
के मेटा-विश्लेषण काफी उपयोगी होते हैं। उदाहरण के लिए,
किसी दवा की यथेष्ट
खुराक तय करने के लिए।
उपरोक्त मेटा-विश्लेषण जो कहता है उसे मैं
यहां उद्धृत कर रहा हूं: “हर साल प्रकाशित होने वाले वैज्ञानिक शोध पत्रों की
संख्या जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे ये शोध पत्र तेज़ी से अपने आप में
विशिष्ट और जटिल होते जा रहे हैं। जानकारियों का यह अंबार ज्ञान-अज्ञान के बीच एक
विरोधाभास पैदा कर रहा है जिसमें जानकारी तो बढ़ती है लेकिन ऐसा ज्ञान नहीं बढ़ता
जिसे अच्छे उपयोग में लाया जा सके! ऐसे वैज्ञानिक शोध पत्र लिखना, जो
पढ़ने-समझने में स्पष्ट हों, इस खाई को पाटने में मदद कर सकते हैं और
वैज्ञानिक अनुसंधानों की उपयोगिता बढ़ा सकते हैं।”
एक्रोनिम का अत्यधिक उपयोग वैज्ञानिक शोध
पत्रों को पढ़ने और उनके संदेश समझने में मुश्किलें पैदा करता है। उक्त शोधकर्ताओं
ने 1950 से 2019 के बीच पबमेड के ज़रिए प्राप्त जीव विज्ञान और चिकित्सा
क्षेत्र में प्रकाशित कुल 2.40 करोड़ शोध पत्र और 1.8 करोड़ सार-संक्षेप देखे।
शोधकर्ताओं ने पाया कि इनमें से 11 लाख शोध
पत्रों में एकदम निराले एक्रोनिम उपयोग किए गए थे। यहां एक्रोनिम से तात्पर्य ऐसे
संक्षिप्त रूपों से है जिनमें आधे या आधे से अधिक अक्षर कैपिटल अक्षर हों – इस
परिभाषा के अनुसार mRNA और BRCA1
एक्रोनिम हैं, लेकिन N95 (मास्क जो हम पहनते हैं) वह नहीं है।
एक्रोनिम के उपयोग की भरमार अस्पष्टता, गलतफहमी और अकार्यक्षमता पैदा करती है।
उदाहरण के लिए एक्रोनिम UA के चिकित्सा जगत में 18 अलग-अलग मतलब हैं।
(उनमें से कुछ हैं: यूरैसिल एडेनाइन, अंबिलिकल एक्टिविटी, यूरिन
एनालिसिस, युनिवर्सल एनेस्थीसिया)।
लेखक कई ऐसे शोधपत्रों का भी हवाला देते
हैं जिनमें एक-एक वाक्य में कई एक्रोनिम होते हैं जो समझने में बाधा डालते हैं:
जैसे Applying
PROBAST showed that ADO, B-AE-D, B-AE-D-C, extended ADO, updated BODE , and a
model developed by Bertens et al were derived in studies assessed as being at
low risk of bias.
मैंने बहुत कोशिश की मगर इसका मतलब नहीं
समझ सका। इसलिए मैंने अपने जीव विज्ञान के साथियों को चुनौती दी कि वे मुझे इसका
मतलब समझाएं। (मैंने यह पद्यांश देश के 8 युवा साथियों को भेजा, और
कहा कि जो सबसे पहले इसका मतलब मुझे समझाएगा उसे इसके बदले एक गिलास वाइन या एक कप
कॉफी और मेरे लेख में इसका श्रेय मिलेगा। जिन्होंने सबसे पहले, 18
घंटों के भीतर, जवाब दिया वे थीं पोस्टग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल
एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ की मन्नीलुथरा गुप्तसर्मा। मैं उनका धन्यवाद करता
हूं और उनकी डॉक्टरेट थीसिस मार्गदर्शक के रूप में खुद को गौरवान्वित महसूस करता
हूं!)
कई विश्लेषकों ने इसके संभावित समाधान
सुझाए हैं:
(1) एक पेपर में 3 से ज़्यादा एक्रोनिम का
उपयोग ना करें।
(2) केवल सुस्थापित एक्रोनिम का उपयोग
करें। और उन एक्रोनिम का उपयोग ना करें जो भ्रम पैदा कर सकते हैं; जैसे, HR जिसका मतलब हार्ट रेट या हैज़ार्ड रेशियो हो सकता है। उचित
होगा कि पूरा शब्द ही लिखें।
(3) जब भी किसी नवनिर्मित एक्रोनिम का
उपयोग करें तो यह स्पष्ट करें कि इसका मतलब क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों है।
(4) लघु-रूप शब्द के प्रयोग करने के सम्बंध में, जहां तक संभव हो लघु-रूप शब्द ना लिखें। अक्सर लोगों या नीति निर्माताओं के लिए की गई वैज्ञानिक समीक्षा, और चिकित्सकीय शोध में कई एक्रोनिम और लघु-रूप शब्द उपयोग किए जाते हैं। तो बेहतर होगा कि इनमें शुरुआत या अंत में इन शब्दों की एक सूची दे दी जाए। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://th.thgim.com/sci-tech/science/pzhwt8/article32475028.ece/ALTERNATES/FREE_960/30TH-SCIAB-SARSjpg
भारत में विज्ञान के क्षेत्र में महिलाएं विषय पर अधिकांश साहित्य, विज्ञान में महिलाओं की ‘अनुपस्थिति’ ही दर्शाता है जबकि अब हालात ऐसे नहीं हैं। उपलब्ध प्रमाणों के व्यापक विश्लेषण के आधार पर यह आलेख बताता है कि विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, हालांकि अलग-अलग विषयों में स्थिति काफी अलग-अलग है। अलबत्ता, विज्ञान के क्षेत्र में भले ही महिलाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन अब भी उन्हें रुकावटों का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार से लिंग-आधारित ढांचा बरकरार है और वैज्ञानिक संस्थानों को आकार देता है। आलेख का तर्क है कि संस्थानों-संगठनों के मौजूदा मानदंडों और मानसिकता में बदलाव लाए बिना महिला-समर्थक नीतियां शुरू करना प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
साल 2017 की विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट बताती है कि 144
सर्वेक्षित देशों में से भारत, लैंगिक-असमानता के मामले में 87वें पायदान
से गिरकर 108वें पायदान पर आ गया था। स्वास्थ्य और औसत आयु के मामले में भारत
141वें पायदान पर और आर्थिक अवसरों के मामले में 139वें पायदान पर था। यहां तक कि
शिक्षा के मामले में भारत का स्थान 112वां था। कोई ताज्जुब नहीं कि भारत में
वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में भी लैंगिक-अंतर काफी अधिक है। युनेस्को
सांख्यिकी संस्थान (2017) के अनुसार वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में भले ही
लोगों की संख्या में 37.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है लेकिन महिला शोधकर्ताओं की
संख्या में मामूली कमी आई है, 2010 में महिला शोधकर्ताओं का प्रतिशत 14.3
था जो 2015 में गिरकर 13.9 प्रतिशत हो गया।
हो सकता है कि भारतीय मध्यम वर्ग इन आंकड़ों
को ‘अन्य’ भारत से जोड़कर देखे, जैसे कि ये ग्रामीण इलाकों और शहरी
झुग्गियों में रहने वाले हाशियाकृत और गरीब लोगों के हों। लेकिन भारतीय विज्ञान
समुदाय, या सामाजिक-आर्थिक मध्यम वर्ग और शिक्षित वर्गों के लिए इन
आंकड़ों के क्या मायने हैं? क्या भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान और शिक्षा
में महिलाओं की स्थिति वाकई चिंतनीय है? यदि है,
तो क्या इन आंकड़ों का
महिलाओं की उच्च शिक्षा या विज्ञान अनुसंधान प्रशिक्षण तक पहुंच में कमी से है, या
ये दर्शाते हैं कि कितनी महिलाएं इन क्षेत्रों को छोड़ देती हैं? क्या
कोई ऐसे खास विषय या खास क्षेत्र हैं जिनमें महिलाओं की उपस्थिति बेहतर है और इसके
क्या कारण हैं? क्या ढांचागत कारण विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं को बराबर
भागीदारी से रोकते हैं? क्या विज्ञान अनुसंधान समुदाय में महिलाओं को मिलने वाली
मान्यता, इन क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति से मेल खाती है? इस
सम्बंध में उपलब्ध प्राथमिक और द्वितीयक जानकारी के आधार पर यहां ऐसे कुछ सवालों
को जांचने का प्रयास है।
संक्षिप्त इतिहास और वर्तमान संदर्भ
स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारत सरकार ने
1948 में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की स्थापना की थी। अन्य उद्देश्यों के अलावा
एक उद्देश्य यह था कि भारत में विश्वविद्यालयीन शिक्षा और शोध के उद्देश्यों व
लक्ष्यों की छानबीन की जाए। स्पष्ट रूप से,
नवनिर्मित राष्ट्र
में ज़ोर सामाजिक परिवर्तन के लिए शिक्षा पर था। 1950 में आयोग द्वारा प्रस्तुत
रिपोर्ट का एक पूरा हिस्सा महिला शिक्षा पर केंद्रित था। इसमें अनुशंसाओं के खंड
में बताया गया था कि “कुछ क्षेत्र महिलाओं के लिए बहुत ही उपयुक्त हैं… जिनमें
महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में महिलाओं को शिक्षा दी जा सकती है।” समिति
द्वारा सुझाए गए विषय थे गृह अर्थशास्त्र,
नर्सिंग, अध्यापन
और ललित कलाएं। रिपोर्ट के इस हिस्से की प्रस्तावना में कई उत्कृष्ट नैतिक आदर्शों
का प्रतिपादन किया गया था, जैसे:
हमें कई सुझाव मिले हैं जो कहते हैं कि
महिलाओं की शिक्षा ड्राइंग, पेंटिंग या इसी तरह की अन्य सुंदर
‘उपलब्धियां’ हासिल करने के लिए होनी चाहिए ताकि जब उनके पति महत्वपूर्ण काम कर
रहे हों तब सम्पन्न महिलाएं अपना वक्त बिना किसी नुकसान के काट सकें। यह सोच अब
नहीं रहना चाहिए। महिलाएं पुरुषों के साथ जीवन और आज के ज़माने के विचार और रुचियों
में बराबर की हिस्सेदार होनी चाहिए। वे पुरुषों के समान शैक्षणिक कार्य करने के
योग्य हैं, उनमें विचारों और गुणवत्ता की कमी नहीं है।
महिलाओं की क्षमताएं पुरुषों के समान हैं। (1950 में जारी विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की रिपोर्ट, अध्याय
12, पृ. 343-344)
हालांकि,
इस दौर में कुशल
महिला वैज्ञानिक बनाने पर ज़ोर नहीं था। यह बात शुरुआती वर्षों में विभिन्न कोर्स
में हुए दाखिलों में भी झलकती है। वर्ष 1961-62 में ‘लड़कों और लड़कियों के
पाठ्यक्रम में भेद’ पर राष्ट्रीय महिला शिक्षा परिषद द्वारा गठित हंसा मेहता समिति
की सिफारिश के साथ दोनों के लिए ‘समान पाठ्यक्रम’ के मुद्दे पर गंभीरता से चर्चा
शुरू हुई। 1964-66 में कोठारी आयोग ने इससे एक कदम आगे बढ़कर आग्रह किया कि महिलाओं
को भी विज्ञान पढ़ने के लिए सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए।
कहने का मतलब यह नहीं है कि इस समय तक भारत
में उच्च शिक्षा या विज्ञान शिक्षा से महिलाएं नदारद थीं। कई अध्ययनों ने भारत में
औपनिवेशिक काल से आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान में महिलाओं की स्थिति की छानबीन की
है। कई अध्ययन, ना केवल महिला वैज्ञानिकों के व्यक्तिगत संघर्ष बयां करती
जीवनियां बताते हैं बल्कि उस समय के सामाजिक-राजनैतिक हालात के बारे में भी बताते
हैं। कमला सोहोनी, आसीमा चटर्जी या जानकी अम्मल जैसी कई महिला वैज्ञानिकों ने
नई ज़मीन तोड़ी थी और जाति और लिंग की दोहरी बाधाओं को पार करके प्रयोगशाला तक का
रास्ता तय किया और तमाम पाबंदियों की कठोर परिस्थितियों में भी काम करती रहीं।
लेकिन चूंकि इस समय तक इन क्षेत्रों में महिलाओं को शामिल करना राजकीय नीति का
हिस्सा नहीं था इसलिए उस समय जिन महिलाओं ने मुकाम हासिल किया वे दरअसल एक ज़्यादा
बड़ी लड़ाई लड़ रही थीं। जैसे कमला सोहोनी विज्ञान (जैव-रसायन शास्त्र) में पीएचडी की
डिग्री हासिल करने वाली पहली महिला बनीं। ग्रेजुएशन में अव्वल आने के बावजूद
उन्हें भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलौर में प्रवेश देने से इन्कार कर दिया
गया था। और इन्कार करने वाले कोई और नहीं,
नोबेल पुरस्कार
विजेता सी. वी. रमन थे। अंतत: जब रमन ने प्रवेश दिया तो उन्होंने प्रवेश के साथ
सख्त और अपमानजनक शर्तें रखीं – जैसे, पहले एक वर्ष में उन्हें नियमित छात्र नहीं
माना जाएगा; उनके मार्गदर्शक दिन में जिस समय कहेंगे, उन्हें
काम करना होगा, और उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी उपस्थिति अन्य
छात्रों को विचलित ना करे। जिन महिलाओं ने इन क्षेत्रों में काम करना संभव बनाया, उन्होंने
बहुत ही विषम परिस्थितियों में कार्य किया। लेकिन, इनमें
से कई महिलाओं ने तो यह माना ही नहीं कि उन्हें हाशिए पर धकेला गया था और इसे
लिंग-भेद की तरह देखने से इन्कार किया।
औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता और नए
संविधान (जो सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है) को अपनाने के बाद खेल के
नियमों में बुनियादी परिवर्तन हुए। लड़के और लड़कियों के लिए समान पाठ्यक्रम और
आधुनिक गणित और विज्ञान का अध्ययन करने के लिए महिलाओं को सक्रिय रूप से
प्रोत्साहन की सिफारिश करके हंसा मेहता समिति और कोठारी आयोग की रिपोर्टों ने इन
परिवर्तनों की नींव रखी थी। लेकिन हम इस दिशा में कितना आगे बढ़ पाए हैं, और
अभी मंज़िल और कितनी दूर है?
जैसा कि यह आलेख दिखाने की कोशिश करता है, पहले
की तुलना में आज स्थिति काफी बदल गई है। लेकिन आज भी,
मंशाओं और कार्रवाई
के बीच काफी अंतर हैं। उदाहरण के लिए प्रमुख विश्वविद्यालयों/कॉलेजों के स्नातक
कार्यक्रमों में विज्ञान की अपेक्षा कला और मानविकी जैसे विषयों तक महिलाओं की
पहुंच अधिक ‘आसान’ बनाई गई है। दिल्ली विश्वविद्यालय को ही देखें तो पता चलता है
कि स्नातक स्तर पर समाजशास्त्र और मनोविज्ञान विषय मात्र ‘महिला’ कॉलेजों में चलाए
जाते हैं, जबकि 22 महिला कॉलेजों में से सिर्फ 5 में स्नातक स्तर पर
भौतिकी विषय उपलब्ध है। मुंबई के भी कई महिला कॉलेजों में से कुछ ही बुनियादी
विज्ञान में स्नातक कोर्स चलाते हैं जबकि कई कॉलेजों में मनोविज्ञान और समाज
शास्त्र विषय हैं। चेन्नई के कई महिला कॉलेजों में विज्ञान के कई विषय समूह के रूप
में उपलब्ध हैं। जैसे, कुछ कॉलेजों में विज्ञान संकाय के नाम पर सिर्फ गणित के साथ
नागरिक शास्त्र और मनोविज्ञान विषय पढ़ाए जाते हैं (हालांकि, गणित
की प्रकृति दोहरी है – इसमें बीए और बीएससी दोनों कर सकते हैं)। दिल्ली, मुंबई
और चेन्नई में गृह विज्ञान के कोर्स अधिकांशत: महिला कॉलेजों में पढ़ाए जाते हैं।
यहां तक कि होम साइंस पढ़ाने के लिए खास महिला कॉलेज भी
हैं। यही स्थिति नर्सिंग और शिक्षा में भी
है, जिन्हें पारंपरिक रूप से महिलाओं के लिए उपयुक्त माना गया
है।
तालिका – 1:वर्ष 2015-16 में विभिन्न विषयों में दाखिले
भौतिक विज्ञान
पुरुष
स्त्री
कुल
%पुरुष
%स्त्री
गणित
50081
79523
129604
38.64
61.36
भौतिकी
25540
35349
60889
41.95
58.05
रसायन
44651
55237
99888
44.70
55.30
सांख्यिकी
3691
4618
8309
44.42
55.58
भू-भौतिकी
633
359
992
63.81
36.19
इलेक्ट्रॉनिक्स
2640
2055
4695
56.23
43.77
भूगर्भ शास्त्र
3518
2079
5597
62.86
37.14
जीव विज्ञान
प्राणि विज्ञान
13811
27214
41025
33.66
66.34
वनस्पति विज्ञान
12021
24715
36736
32.72
67.28
जैव-रसायन
2137
4447
6584
32.46
67.54
बायोटेक्नॉलॉजी
4579
9955
14534
31.51
68.49
सूक्ष्मजीव विज्ञान
3457
8607
12064
28.66
71.34
लाइफ साइंस
2460
4633
7093
34.68
65.32
आनुवंशिकी
351
487
838
41.89
58.11
जैव-विज्ञान
1650
2950
4600
35.87
64.13
कॉलेज/होस्टल के भेदभाव पूर्ण नियमों और
समय की पाबंदी को देखें, जिनका देश की अमूमन हर महिला छात्रा को
कॉलेज और विश्वविद्यालय में पालन करना होता है। महिला सुरक्षा के नाम पर बने ये
नियम-निर्देश पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं,
व्याख्यानों, सार्वजनिक
स्थानों और परिवहन तक महिलाओं की बराबर पहुंच के अधिकार को कुचल देते हैं।
राजस्थान सरकार द्वारा 2008 में स्थापित ज्योति विद्यापीठ महिला विश्वविद्यालय ने
होस्टल में रहने वाली छात्राओं के लिए अपनी वेबसाइट के ‘हॉस्टल लाइफ’ पेज पर कई
सख्त पाबंदियां लिखी हैं। जैसे होस्टल कैम्पस के अंदर और बाहर उनकी गतिविधियों पर
लगातार कड़ी नज़र रखी जाएगी जिसका ब्यौरा उनके अभिभावकों को दिया जाएगा, और
मोबाइल फोन या अन्य ऐसे उपकरण, जिनमें सिम कार्ड हो या उससे इंटरनेट चलाया
जा सकता हो, का उपयोग करते पाए जाने पर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
वनस्थली विद्यापीठ के नियम के मुताबिक विवाहित महिलाएं किसी भी कोर्स में प्रवेश
का आवेदन नहीं कर सकतीं, सिवाय कुछ ‘विशेष परिस्थितियों’ में
स्नातकोत्तर कार्यक्रमों में इसकी छूट है। 1983 में आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा
तिरुपति में स्थापित श्री पद्मावती महिला विश्वविद्यालय में छात्राओं को ‘डीन द्वारा
स्वीकृत साफ और सभ्य पोशाक’ पहनने की ही अनुमति है। इसके अलावा उन्हें कॉलेज या
कॉलेज अधिकारियों की नीतियों और कार्यों की आलोचना सम्बंधी बैठक करने की अनुमति भी
नहीं है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एक महिला कॉलेज का ऐसा ही एक मामला
सर्वोच्च नयायलय तक पहुंचा था। दायर की गई याचिका के अनुसार, छात्रावास
नियम वहां रहने वाली महिलाओं/रहवासियों को रात 8 बजे के बाद बाहर जाने, यहां
तक कि किसी कार्यक्रम में शामिल होने या विश्वविद्यालय परिसर की लायब्रेरी तक जाने
की अनुमति नहीं देते। छात्रावास के नियम लड़कियों को रात 10 बजे के बाद
टेलीफोन/मोबाइल फोन कॉल करने या सुनने की भी अनुमति नहीं देते हैं; उनके
होस्टल के कमरों में मुफ्त वाई-फाई और इंटरनेट भी उपलब्ध नहीं कराया जाता है। जबकि
पुरुष छात्रों पर इनमें से एक भी नियम लागू नहीं होता।
इन परिस्थितियों में जब हमें अखबारों में
इस तरह खबरें पढ़ने को मिलती हैं कि पीजी, एमफिल छात्रों में महिलाओं की संख्या
पुरुषों से अधिक हैं, तो थोड़ा ठहर कर इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है। यह स्थिति
सिर्फ सामाजिक विज्ञान और मानविकी विषयों में ही नहीं बल्कि बुनियादी विज्ञान
विषयों में भी है, जो कि सराहनीय है। मेनपॉवर प्रोफाइल ईयर बुक के साल 2000-01
के आंकड़े बताते हैं कि 2000-01 में विज्ञान में स्नातकोत्तर स्तर पर प्रति 100
पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 80.1 थी जो अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (AISHE) के ऑनलाइन सर्वे के अनुसार साल 2011-12 में बढ़कर 113 हो गई थी, और
साल 2015-16 में 157 तक पहुंच गई थी। यही नहीं,
हर विषय में हमें इसी
तरह के आंकड़े मिलते हैं। तालिका 1 में साल 2015-16 में भौतिक विज्ञानों और जीव
विज्ञानों में पोस्ट ग्रेजुएशन में दाखिला लेने वालों की संख्या दर्शाई गई है। इसे
देखें तो पता चलता है कि कई विषयों में महिलाएं पुरुषों की तुलना में काफी अधिक
हैं। यह स्थिति ना सिर्फ जीव विज्ञान से जुड़े विषयों में है, बल्कि
भौतिक विज्ञान के विषयों में भी है। ज़ाहिर है कि तमाम बाधाओं के बावजूद, भौतिक
विज्ञान की उच्च शिक्षा को अब महिलाएं अपनी पहुंच से बाहर नहीं मानतीं। लेकिन
आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि भौतिक विज्ञानों की तुलना में जीव विज्ञानों
में दाखिला लेने वाली महिलाओं की संख्या काफी अधिक है,
जो इस आम धारणा को
मज़बूत करती है कि महिलाएं गणित आधारित विषयों की तुलना में जीव विज्ञान से
सम्बंधित विषय लेना ज़्यादा पसंद करती हैं।
चलिए, इस मुद्दे को अच्छे से समझने के लिए और आंकड़े देखते हैं। तालिका 2 में साल 2015-16 के भौतिक विज्ञान के विषयों और जीव विज्ञान के विषयों में स्नातकोत्तर और उच्चतर शिक्षा में दाखिला लेने वाले और उत्तीर्ण करने वाले लोगों की संख्या एक साथ रखी गई है। तुलना करें तो पता चलता है कि स्नातकोत्तर में महिलाएं पुरुषों की तुलना में काफी अधिक हैं, लेकिन जब शोध संस्थानों या शोध कार्यों में दाखिले की बात आती है तो भौतिक विज्ञान में लिंग-भेद बरकरार है। ध्यान दें कि शोध कार्यक्रमों में दाखिला लेने वालों की संख्या, स्नातकोत्तर उत्तीर्ण करने वालों की संख्या से बहुत कम (बीसवें हिस्से से दसवें हिस्से के बराबर) है। अर्थात, पात्र उम्मीदवारों की संख्या उपलब्ध सीटों की संख्या से 10-20 गुना है। लेकिन 2015-16 के AISHE आंकड़ों के अनुसार भौतिक विज्ञान विषयों के एमफिल और पीएचडी कार्यक्रम में 63 प्रतिशत पुरुष और सिर्फ 37 प्रतिशत महिला छात्र थे।
वर्ष 2011-12 में,
हालांकि कुछ खास
विषयों में लैंगिक-असमानता अधिक देखी गई थी,
लेकिन भौतिक विज्ञान
के विषयों में एमफिल में प्रवेश लेने वाले कुल छात्रों में से सिर्फ 41 प्रतिशत और
पीएचडी में दाखिला लेने वाले कुल छात्रों में सिर्फ 33 प्रतिशत ही महिलाएं थीं।
तुलना के लिए देखें कि साल 2015-16 में, जीव विज्ञान के विषयों में स्थिति इसके
विपरीत थी: जीव विज्ञान में एमफिल में प्रवेश लेने वाले कुल छात्रों में सिर्फ 47
प्रतिशत पुरुष थे जबकि 53 प्रतिशत महिलाएं थीं और पीएचडी में प्रवेश लेने वालों
में 54 प्रतिशत महिला और 43 प्रतिशत पुरुष छात्र थे। यही स्थिति 2011-12 में भी थी, जीव
विज्ञान में एमफिल या पीएचडी में दाखिला लेने वाले छात्रों में से महिलाएं लगभग 60
प्रतिशत थीं।
पहले की तुलना में अब पीएचडी में अधिक
महिलाओं के प्रवेश लेने से पीएचडी पूरी करने की वाली महिलाओं की संख्या बढ़ना
चाहिए। AISHE वेबसाइट पर कुछ विशेष सालों के छात्रों का डैटा उपलब्ध नहीं है, साइट
पर 2011 के बाद के विभिन्न वर्षों का उत्तीर्ण करने सम्बंधित डैटा उपलब्ध है।
लेकिन इन आंकड़ों के अनुसार साल 2011-12 जीव विज्ञान में डॉक्टरेट हासिल करने वालों
में से सिर्फ 41 प्रतिशत ही महिलाएं थीं और साल 2015-16 में लगभग 46 प्रतिशत
महिलाएं थीं। कोई अचरज नहीं कि भौतिक विज्ञान में यह लैंगिक-अंतर और भी अधिक था।
2011-12 में, भौतिक विज्ञान में पीएचडी करने वालों में पुरुष 67 प्रतिशत
और महिलाएं केवल 33 प्रतिशत थीं। और 2015-16 में,
भौतिक विज्ञान में
पीएचडी करने वालों में पुरुष 70 प्रतिशत और महिलाएं 30 प्रतिशत थीं।
शोध और शिक्षण में कार्यरत महिलाएं
आंकड़ों को देखें तो जीव विज्ञान की उच्च
शिक्षा में लैंगिक-अंतर कम नज़र आता है लेकिन यह देखना उपयोगी होगा कि इन क्षेत्रों
के रोज़गार में महिलाओं की स्थिति क्या है। इसके लिए हमने देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों
और अनुसंधान/शोध संस्थानों के जीव विज्ञान विभागों में नियुक्ति के आंकड़े देखे।
तीन केंद्रीय विश्वविद्यालयों को जानबूझकर शामिल किया गया था, क्योंकि
ये ‘शोध विश्वविद्यालय’ हैं जहां फैकल्टी के सदस्य बड़ी तादाद में सक्रिय अनुसंधान
कार्य में संलग्न रहते हैं। इन विश्वविद्यालयों में बाहर से वित्त पोषित शोध
प्रोजेक्ट्स भी चलते हैं। यहां के वैज्ञानिक कमोबेश मात्र स्नातकोत्तर या
एमफिल/पीएचडी स्तर के शिक्षण कार्य में लगे होते हैं। दरअसल, पीएचडी
कार्यक्रम इन विश्वविद्यालयों का मुख्य फोकस है। कुछ शोध संस्थान या तो एकीकृत
स्नातकोत्तर-पीएचडी प्रोग्राम या सिर्फ पीएचडी प्रोग्राम संचालित करते हैं, लेकिन
उनमें भी इन कार्यक्रमों के तहत कक्षा-अध्यापन अनिवार्य है। अलबत्ता, जो
लोग भारत के वैज्ञानिक अनुसंधान वित्तपोषण के परिदृश्य से परिचित हैं वे जानते हैं
कि इन संस्थानों के बीच भी स्पष्ट ऊंच-नीच मौजूद है – अनुसंधान संस्थानों को बेहतर
वित्तपोषण मिलता है और उनका बुनियादी ढांचा बेहतर है। इस तरह हमारे पास तुलना के
लिए दो भिन्न व्यवस्थाओं के आंकड़े उपलब्ध थे। अध्ययन में शामिल संस्थानों में जीव
विज्ञान विभागों में साल 2018 के पूर्व तक रहे लिंगानुपात का पता लगाने के लिए इन
संस्थानों की वेबसाइट पर उपलब्ध डैटा का उपयोग किया। अध्ययन में शामिल शोध
संस्थान/विश्वविद्यालय हैं :
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से सम्बद्ध स्कूल ऑफ लाइफ
साइंसेज़ (SLS), स्कूल ऑफ बायोटेक्नॉलॉजी (SBT), स्पेशल
सेंटर ऑफ मॉलीक्यूलर मेडिसिन (SCMM);
हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय
से सम्बद्ध, स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज़ का जैव-रसायन विभाग, पादप
विज्ञान विभाग, प्राणि जीव विज्ञान,
जैव प्रौद्योगिकी और
जैव सूचना विज्ञान (बायोटेक) विभाग। दिल्ली विश्वविद्यालय का जैव-रसायन विभाग, जैव-भौतिकी
विभाग, सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग,
आनुवंशिकी विभाग और
पादप आणविक जीव विज्ञान विभाग।
पुणे, कोलकाता,
त्रिवेंद्रम और
मोहाली स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (IISER) के जीव विज्ञान विभाग। प्रत्येक IISER एक स्वायत्त संस्थान है और भारतीय संसद
द्वारा 2010 में पारित एनआईटी अधिनियम के अनुसार डिग्री प्रदान कर सकता है।
भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) का जैव रसायन विभाग, आणविक
जैव-भौतिकी इकाई, आणविक प्रजनन, परिवर्धन एवं आनुवंशिकी विभाग, सूक्ष्मजीव
विज्ञान और कोशिका जीव विज्ञान विभाग। IISc यूजीसी अधिनियम के अनुसार एक डीम्ड
युनिवर्सिटी है।
वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) देश के अनुसंधान और विकास कार्यों में तेज़ी लाने के उद्देश्य से गठित किया
गया था। एक समय में CSIR के संस्थान विश्वविद्यालयों से सम्बद्ध होकर छात्रों को
पीएचडी की उपाधि देते थे। 2010 के बाद से ये संस्थान एकेडमी फॉर साइंटिफिक एंड
इनोवेटिव रिसर्च (AcSIR) से सम्बद्ध हैं। इस अध्ययन में CSIR द्वारा वित्त पोषित
अनुसंधान संस्थानों में से कोलकाता स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायोलॉजी (IICB), चंडीगढ़ स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी
(IMTech), हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी
(CCMB), लखनऊ स्थित राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (NBRI), और दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव
बायोलॉजी (IGIB) शामिल हैं।
DBT द्वारा वित्त पोषित
अनुसंधान संस्थान भी इस अध्ययन में शामिल किए गए हैं: दिल्ली स्थित नेशनल
इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी (NII),
मानेसर स्थित नेशनल
ब्रेन रिसर्च इंस्टीट्यूट (NBRC)।
मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) का जीव विज्ञान विभाग और बैंगलुरु स्थित नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज़
(NCBS)। इस अध्ययन में inSTtem और CCAMP संकाय के शिक्षकों को शामिल नहीं किया गया
है।
इन संस्थानों से प्राप्त आंकड़ों को देखें
तो पता चलता है कि TIFR और NCBS को छोड़कर बाकी अन्य संस्थानों में महिलाएं
30 प्रतिशत से अधिक नहीं हैं। इन संस्थानों में बतौर वैज्ञानिक/शिक्षक लगभग 27
प्रतिशत महिलाएं और 73 प्रतिशत पुरुष हैं।
यह समझना महत्वपूर्ण था कि क्या इन
संस्थानों किन्हीं खास पदों पर भिन्न स्थिति दिखती है। इसके लिए एक विश्लेषण हरेक
संस्थान/विभाग के अलग-अलग स्तर के पदों का किया गया। यह देखते हुए कि पिछले कुछ
वर्षों में महिलाओं के प्रवेश लेने और उत्तीर्ण करने की संख्या में सुधार हुआ है, यह
उम्मीद थी कि भले ही वरिष्ठ पदों पर लिंग-भेद काफी अधिक दिखे लेकिन प्रवेश स्तर की
नौकरियों पर तो कम से कम लिंगानुपात की यह खाई कम हुई होगी। यानी CSIR संस्थानों में हमें सीनियर प्रिंसिपल साइंटिस्ट या चीफ साइंटिस्ट के पद की
तुलना में सीनियर साइंटिस्ट और साइंटिस्ट के पदों पर लिंगानुपात में अंतर कम दिखना
चाहिए। नियमित पदों के अलावा अध्ययन में शामिल,
जे. सी. बोस फेलोशिप
पाने वाले आम तौर पर सीनियर साइंटिस्ट होते हैं और ये सेवानिवृत्त वैज्ञानिक भी हो
सकते हैं। चूंकि यह एक फेलोशिप है, इसलिए यह सभी संस्थानों में नहीं होती।
एमेरिटस प्रोफेसर, सेवानिवृत्त वरिष्ठ शिक्षक होते हैं और वे भी हर संस्थान
में नहीं होते। डीबीटी-वेलकम अर्ली कैरियर फैलोशिप (ECF), डीएसटी-इंस्पायर
आदि एक निश्चित अवधि की फेलोशिप हैं, जो नियमित पद नहीं दर्शाते। हम इन फेलोशिप
पर बाद में लौटेंगे।
प्राप्त आंकड़ों से पता चलता है कि CSIR संस्थानों में सभी पदों पर महिलाओं की उपस्थिति समान रूप से कम है। यहां तक
कि साइंटिस्ट या सीनियर साइंटिस्ट जैसे प्रवेश स्तर के पदों पर भी महिलाओं की
उपस्थिति 30 प्रतिशत से कम है।
क्या DST/DBT से वित्त पोषित संस्थानों में स्थिति अलग
है? इसे जांचने के लिए हमने DST/DBT से वित्त पोषित दो संस्थानों, NII और NBRC, से
प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया। हमने पाया कि यहां भी वरिष्ठ पदों (VI-VII ग्रेड के वैज्ञानिक)
पर महिला वैज्ञानिकों की तुलना में पुरुष वैज्ञानिक अधिक थे। और तो और, साइंटिस्ट
पदों (IV-V
ग्रेड के वैज्ञानिक) पर भी पुरुषों का पलड़ा भारी था।
जैसा कि पहले भी बताया गया है, DAE द्वारा संचालित TIFR और NCBS में स्थिति अलग है।
यहां प्रवेश स्तर और मध्य स्तर के पदों पर महिलाओं की संख्या अधिक दिखती है।
क्या वे संस्थान जो मास्टर और पीएचडी
कार्यक्रम भी चलाते हैं (और इस वजह से उनमें शिक्षण/अनुसंधान विभाग हैं) उनमें
महिलाओं की स्थिति अलग है? यह देखना इसलिए भी दिलचस्प होगा क्योंकि
शुरुआत में महिलाओं के लिए पहचाने गए ‘उपयुक्त’ कार्यों में से एक शिक्षण था। इस
विश्लेषण में ना सिर्फ IISc और DU, JNU और HCU जैसे पुराने विश्वविद्यालय या संस्थान शामिल हैं बल्कि IISER जैसे नए संस्थान भी शामिल हैं। इन नए संस्थानों में भर्तियां भले ही वरिष्ठ
पदों के लिए की गर्इं हों, लेकिन इन भर्तियों से हमें मौजूदा रुझानों
का अंदाज़ा मिलेगा। गौरतलब है कि IISc और IISERs
स्वयं को अनुसंधान संस्थान मानते हैं, ना कि विश्वविद्यालय। उनकी वेतन संरचना, शिक्षकों
की स्वायत्तता और कार्य परिवेश केंद्रीय विश्वविद्यालयों से बहुत अलग है।
IISc में, जीव विज्ञान से सम्बंधित विभागों में महिलाओं की संख्या 20
प्रतिशत से कम है। जैसी कि उम्मीद थी प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर लिंग-अंतर
अधिक था। लेकिन प्रवेश-स्तर के पद, असिस्टेंट प्रोफेसर, पर
तो यह अंतर और भी अधिक था।
सबसे हाल में स्थापित हुए संस्थान IISER में प्रोफेसरों की संख्या कम है। IISER कोलकाता में सिर्फ एक महिला प्रोफेसर थी
और इस पद पर पुरुष नियुक्तियां नहीं थी। अन्य तीन IISER संस्थानों में
प्रोफेसर के पद पर सिर्फ पुरुष कार्यरत थे और एक भी महिला इस पद पर नहीं थी। सभी IISER संस्थानों में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर पुरुषों का ही वर्चस्व था। कोलकाता IISER को छोड़कर बाकी तीनों में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर भी महिलाओं की संख्या
बहुत कम थीं। कोलकाता IISER में प्रवेश स्तर के पद (असिस्टेंट प्रोफेसर) के पद पर
लिंगानुपात ठीक था।
JNU में प्रोफेसर के पद पर पुरुषों की ही भरमार थी और असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों
पर भी झुकाव थोड़ा पुरुषों के प्रति था, हालांकि यह उतना अधिक नहीं था।
दिल्ली युनिवर्सिटी के लाइफ साइंस संकाय
में प्रोफेसर व एसोसिएट प्रोफेसर पदों पर पुरुषों की अधिक संख्या दर्शाती है कि
वहां भी यही स्थिति है। हालांकि असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर महिलाओं की स्थिति
बेहतर दिखती है। यहां का डिपार्टमेंट ऑफ जेनेटिक्स एक अपवाद की तरह दिखता है जहां
महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक हैं।
HCU में भी प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर पुरुषों का ही दबदबा दिखता है।
बायोटेक्नॉलॉजी और बायोइंफॉरमेटिक्स विभाग को छोड़कर बाकी अन्य विभागों में अपवाद
स्वरूप असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर लैंगिक-संतुलन बेहतर दिखता है। इनमें भौतिक
विज्ञान विभाग के आंकड़ों को शामिल कर लिया जाए तो यह लैंगिक खाई और भी चौड़ी हो
जाती है।
आंकड़े बताते हैं कि विज्ञान अध्ययन शालाओं
में भौतिक विज्ञानों में महिलाओं की तुलना में पुरुष काफी अधिक हैं।
विभिन्न संस्थानों के जीव विज्ञान संकाय के
शिक्षक सम्बंधी डैटा देखें पता चलता है कि –
TIFR और NCBS को छोड़कर शेष सभी शोध संस्थानों के वरिष्ठ पदों पर लिंग-भेद झलकता है।
इन शोध संस्थानों के प्रवेश स्तर और मध्य स्तर के पदों पर
भी लिंग-भेद झलकता है, यहां भी TIFR और NCBS अपवाद हैं।
IISc और IISER दोनों संस्थानों के वरिष्ठ और प्रवेश स्तर,
दोनों पदों पर लैंगिक
अंतर काफी अधिक है। यह IISc जैसे पुराने संस्थान के जीव विज्ञान
विभागों में भी झलकता है, और IISER जैसे नए संस्थानों
में भी है। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया था,
इन संस्थानों की
पहचान शिक्षण संस्थान के रूप में होने के बावजूद इन संस्थानों की आत्म-छवि, वित्त
व्यवस्था और शिक्षकों की स्वायत्तता शोध संस्थानों जैसी है, इसलिए
हो सकता है कि इन संस्थानों में नियुक्तियों का पैटर्न भी शोध संस्थानों जैसा हो।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश-स्तर के पदों पर तो
महिला-पुरुष की संख्या में बहुत कम अंतर दिखता है लेकिन वरिष्ठ पदों पर, उम्मीद
के मुताबिक, पुरुष ही अधिक दिखते हैं। जबकि ये संस्थान ऐसे संस्थान हैं
जहां स्पष्ट रूप से शोध या अनुसंधान कार्यों के साथ शिक्षण कार्य भी ज़रूरी है। इन
संस्थानों में मुख्य ज़ोर शिक्षण कार्य पर
होता है।
नियुक्तियों में झलकने वाला यह लिंग-भेद
क्या दर्शाता है? क्या यह वास्तव में समाज में व्याप्त लिंग पूर्वाग्रहों का
परिणाम है, खासकर भारतीय परिवारों में,
जहां माता-पिता अपनी
बेटियों को कैरियर-उन्मुख विज्ञान कार्यक्रमों में दाखिला लेने की अनुमति नहीं
देते या प्रोत्साहित नहीं करते? या,
क्या यह इसलिए है
क्योंकि महिलाएं पर्याप्त प्रतिभा नहीं रखतीं या कम महत्वाकांक्षी हैं? या, क्या
महिलाएं ऐसे पदों को चुनती हैं जहां शोध कार्य की बजाय शिक्षण पर अधिक ज़ोर होता है? या, क्या
उन्हें उन दरबानों और चयन प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ता है जो पूर्वाग्रहों के
चलते शोध या अनुसंधान पदों पर तो पुरुषों का चुनाव करते हैं लेकिन शिक्षण पदों पर
महिलाओं के साथ कम भेदभाव करते हैं? या क्या यह इन सभी का मिला-जुला परिणाम है?
इस संदर्भ में उपलब्ध डैटा जटिल लग सकता है
लेकिन इसे समझना मुश्किल नहीं है। इसे समझने के लिए हमने पिछले सात सालों में दो
सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी प्रारंभिक कैरियर रिसर्च फैलोशिप,
DST-INSPIRE फैकल्टी स्कीम और भारत एलायंस डीबीटी-वेलकम अर्ली कैरियर फैलोशिप, पाने
वालों के लैंगिक डैटा को खंगाला। ये फैलोशिप (पोस्ट-डॉक्टरल रिसर्च अवार्ड्स) 5
साल की निश्चित अवधि के लिए दी जाती हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि 2013 के बाद से
इन्हें पाने वालों में महिलाओं की संख्या बढ़ी है और किन्हीं-किन्हीं सालों में तो
यह पुरुषों से अधिक भी है। इसका एक संभावित कारण यह हो सकता है कि ये फैलोशिप एक
नियमित पद प्रदान नहीं करतीं इसलिए ये पुरुषों को इतना आकर्षित नहीं करतीं।
हालांकि, यह कारण असंभव सा जान पड़ता है क्योंकि इन फैलोशिप को पाना, कैरियर
में उन्नति करने में मदद करता है और नियमित पदों पर दावेदारी की संभावना बढ़ाता है।
इसकी ज़्यादा संभावित व्याख्या यह हो सकती है कि वर्तमान पीढ़ी में जीव विज्ञान में
प्रवेश करने वाली महिलाएं शीर्ष पर पहुंचने के लिहाज़ से वाकई पर्याप्त सक्षम और
महत्वाकांक्षी हैं।
सहकर्मी मान्यता और पुरस्कार
अब सवाल यह उठता है कि मान्यता और
पुरस्कारों के मामले में महिलाएं कितना आगे बढ़ पाई हैं?
यहां विशेषकर यह
बताना उचित होगा कि 2000 के बाद से कई भारतीय विज्ञान अकादमियों ने लैंगिक समावेश
के लिए कई अध्ययन, उच्च कोटि की कार्यशालाएं और जागरुकता सत्रों का आयोजन
करवाया है। तो यही देखें कि विज्ञान अकादमियों में महिलाओं के चयन की क्या स्थिति
है? उदाहरण के लिए भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA) में विभिन्न विषयों में चयनित महिला सदस्यों (फेलो) के आंकड़ों को ही लें। हम
पाते हैं कि अधिकांश विषयों में, लैंगिक-समानता ना केवल एक दूर का सपना है
बल्कि सक्रिय दखल दिए बिना इस लैंगिक-खाई को पाटना शायद संभव ना होगा। वैसे, जीव
विज्ञान में महिलाओं की स्थिति, अन्य विषयों से थोड़ी बेहतर दिखती है।
ऐसी ही निराशाजनक स्थिति प्रतिष्ठित
पुरस्कारों में भी दिखती है। जैसे, वर्ष 1958 में शुरु किए गए शांति स्वरूप
भटनागर पुरस्कार (जो विज्ञान के सात विषयों के लिए दिए जाते हैं) और हाल ही में
शुरू किए गए इन्फोसिस पुरस्कार (जो साइंस और इंजीनियरिंग के 4 विषयों में दिए जाते
हैं) की स्थिति पर गौर कीजिए। 2016 तक इन पुरस्कार को पाने वाले कुल 525 लोगों में
सिर्फ 16 महिलाएं (यानी 3.04 प्रतिशत) थीं। 2017 में पुरस्कृत लोगों की कुल संख्या
535 हो चुकी थी लेकिन इनमें महिलाओं की संख्या 16 (यानी 2.99 प्रतिशत) रह गई थी।
साल 2017 तक इंजीनियरिंग और कम्प्यूटर साइंस में इन्फोसिस पुरस्कार प्राप्त करने
वाले आठ लोगों में से केवल एक महिला थी, लाइफ साइंस में पुरस्कृत नौ में 2 महिलाएं
थीं और भौतिक विज्ञान में पुरस्कृत नौ लोगों में सिर्फ एक महिला थी।
पूरे विश्व में समकक्ष लोगों द्वारा
मान्यता के रुझान बताते हैं कि दुर्भाग्यवश,
यह समस्या वैश्विक
है। साल 2017 में नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित एक शोध पत्र में केपलर और
उनके साथियों ने इस बात का विश्लेषण किया था कि महिलाओं द्वारा लिखित शोध पत्रों
और पुरुषों द्वारा लिखित शोध पत्रों को कितनी बार अन्य शोध पत्रों में उद्धरित
किया जाता है। इसके लिए उन्होंने 1950 से 2015 के बीच 5 मुख्य एस्ट्रोनॉमी जर्नल्स
में प्रकाशित 1,50,000 लेखों का विश्लेषण किया था। उन्होंने पाया कि पुरुषों की
तुलना में महिलाओं द्वारा लिखे गए पर्चों को लगभग 10 प्रतिशत कम उद्धरण प्राप्त
हुए।
साल 2018 में प्लॉस बॉयोलॉजी में
प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में हॉलमैन और उनके साथियों ने इस बात की जांच की कि
वैज्ञानिक शोध दलों की अगुवाई करने वालों में कितनी महिलाएं दिखती हैं। इसे जांचने
के लिए उन्होंने वैज्ञानिक शोध पत्रों के मुख्य लेखक या पत्राचार करने वाले लेखक
के जेंडर का विश्लेषण किया। उन्होंने साल 2002 से अब तक पबमेड में प्रकाशित
लगभग 91.5 लाख शोध पत्रों के लगभग 3.5 करोड़ लेखकों और 1991 से अब तक arXiv preprints में प्रकाशित 5 लाख शोध पत्रों का विश्लेषण किया। उनका
निष्कर्ष था कि भौतिकी विषय में लैंगिक समता लाने में अभी 258 साल और लगेंगे, और
जीव विज्ञान में भी 75 साल से भी अधिक वक्त लगेगा। उन्होंने यह भी पाया कि पुरुषों
की तुलना में महिलाओं को शोध पत्र लिखने के लिए कम ‘आमंत्रित’ किया जाता है। जीव
विज्ञान प्रबंधक विशेषज्ञ खोजने वाली एक कंपनी लिफ्टस्ट्रीम ने एक अध्ययन किया था
और बताया था कि बायोटेक प्रबंधन समितियों में महिलाओं को इसलिए कम आंका जाता है
क्योंकि वहां आसीन पुरातन-सोच वाले पुरुष मौजूद हैं जो इन पदों पर महिलाओं को
शामिल नहीं करते, और यदि यहि रफ्तार रही तो साल 2056 तक इन स्थानों पर लैंगिक
समानता नहीं आ सकेगी।
विज्ञान में लैंगिक ढांचा और पूर्वाग्रह
लिंग (जाति भी) सूक्ष्म और व्यापक दोनों
स्तरों पर पारस्परिक सम्बंधों और संस्थागत ढांचों,
दोनों को प्रभावित
करता है। लैंगिक ताना-बाना सांस्कृतिक पूर्वाग्रह भी बनाता है कि किसी स्थिति में
हम कैसी प्रतिक्रिया देंगे, या किसी अन्य व्यक्ति से कैसी प्रतिक्रिया
की उम्मीद रखेंगे। इसके बाद संस्थागत सांस्कृतिक कायदे बनाए जाते हैं ताकि जेंडर
आचार संहिता के उल्लंघन पर दंड दिया जा सके या उस व्यवहार को हतोत्साहित किया जा
सके।
2012 में येल के मॉस-रेकुसिन और उनके
साथियों का एक बहुत ही दिलचस्प डबल-ब्लाइंड अध्ययन प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल
एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित हुआ था। इसमें नियुक्ति के समय
वैज्ञानिकों की लैंगिक पहचान के प्रति ‘निष्पक्षता’ को जांचा गया था। 127 विज्ञान
शिक्षकों (पुरुष और महिला दोनों) को लैब मैनेजर के पद के लिए लिखे गए दो में से एक
आवेदन दिया गया था। दोनों आवेदन एकदम समान थे,
एकमात्र अंतर लिंग
(जॉन बनाम जेनिफर) का था। वैज्ञानिकों को योग्यता,
नियुक्ति की पात्रता, संभावित
वेतन और मार्गदर्शन करने की क्षमता के आधार पर आवेदकों को अंक देने के लिए कहा गया
था। अध्ययन में उन्होंने पाया कि पुरुष आवेदक को ना केवल योग्यता, नियुक्ति
की पात्रता और मार्गदर्शन करने की क्षमता के संदर्भ में उच्च आंका गया बल्कि उसे
महिला आवेदक की तुलना में अधिक वेतन का भी प्रस्ताव दिया गया (30,238.10 डॉलर बनाम
26,507.94 डॉलर)। चयनकर्ता के महिला या पुरुष होने का उनके आकलन पर कोई असर नहीं
दिखा; पुरुष चयनकर्ता की तरह महिला चयनकर्ता ने भी, पुरुष
आवेदक को महिला आवेदक से अधिक आंका।
अब यह बात व्यापक रूप से स्वीकार कर ली गई
है कि विज्ञान के क्षेत्र में विभिन्न लिंगों के छात्रों में रूढ़ छवियां
(स्टीरियोटाइप) और अनजाने में बने लैंगिक पूर्वाग्रह होते हैं। इस बारे में गंभीर
खोजबीन जारी है कि ये काम कैसे करते हैं। साल 2015 में हैंडले द्वारा पीएनएएस में
प्रकाशित एक अध्ययन में यह विचार किया गया था कि विज्ञान में लैंगिक पूर्वाग्रह के
प्रमाणों का मूल्यांकन महिला और पुरुष कैसे अलग-अलग करते हैं। उन्होंने कुल तीन
डबल-ब्लाइंड अध्ययन किए – दो समूह आम लोगों के थे जबकि एक समूह विश्वविद्यालय
फैकल्टी का था जिसमें STEM (साइंस, टेक्नॉलॉजी,
इंजीनियरिंग और
मेथेमेटिक्स) और non-STEM दोनों विषयों के लोग थे। यहां हम सिर्फ यह देखेंगे कि STEM और non-STEM विषय के 205 लोगों को जब मॉस-रेकुसिन के शोध पत्र का सारांश मूल्यांकन के लिए
दिया गया तो उनकी क्या प्रतिक्रिया रही। उन्हें non-STEM विषयों के पुरुष और महिला शिक्षकों की
प्रतिक्रियाओं में कोई खास अंतर नहीं दिखा। दूसरी ओर,
STEM विषय की महिलाओं की तुलना में STEMसंकाय के पुरुषों ने सारांश को कमतर आंका। non-STEM विषय के सारे लोगों द्वारा किए गए मूल्यांकन और STEM विषय की महिलाओं
द्वारा किए गए मूल्याकंन में भी कोई खास अंतर नहीं था। इन नतीजों के आधार पर
शोधकर्ताओं का निष्कर्ष था कि यह इस वजह से नहीं है कि STEM विषय की महिलाओं ने
अतिशयोक्ति पूर्ण आकलन दिया बल्कि इसलिए है कि STEM विषय के पुरुष अपने
कार्यक्षेत्र में लिंग पूर्वाग्रह की संभावना को स्वीकार करने के इच्छुक नहीं होते; यदि
वे इसे स्वीकार करेंगे तो हो सकता है कि उन्हें प्राप्त विशेष दर्जे पर सवाल उठ
जाएं।
2010 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस
स्टडीज़ के सहयोग से इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज़ की अनीता कुरुप और उनके साथियों
द्वारा किए गए प्रशिक्षित वैज्ञानिक महिला कर्मियों के सर्वेक्षण में कुछ चौंकाने
वाले निष्कर्ष सामने आए थे। उनके अध्ययन में 794 पीएचडी कर चुके लोग शामिल थे, जिसमें
लगभग 40 प्रतिशत पुरुष थे। शोधकर्ताओं ने इन लोगों को चार श्रेणियों में बांटा था:
अनुसंधान में संलग्न महिलाएं (WIR),
अनुसंधान ना करने
वाली महिलाएं (WNR), काम ना करने वाली महिलाएं (WNW) और अनुसंधान में
संलग्न पुरुष (MIR)। पता चला कि पीएचडी करने वाली 87 प्रतिशत महिलाओं ने विज्ञान में काम करना
जारी रखा, लेकिन इनमें से लगभग 63 प्रतिशत महिलाएं ही शोध कार्य (WIR) कर रहीं थीं। बाकी महिलाओं का शोध कार्य में ना होने का सबसे प्रमुख कारण था
नौकरी ना मिलना। काम ना करने वाली महिलाएं (WNW) नियमित पद ना मिलने
या केवल अस्थायी पद मिलने के कारण विज्ञान के क्षेत्र में कैरियर बनाने से पीछे हट
गई थीं। यह स्थिति विशेष रूप से उन महिलाओं के साथ थी जिनके पति उसी या उसके
प्रतिस्पर्धी वैज्ञानिक क्षेत्रों में पीएचडी थे,
या वैज्ञानिक
अनुसंधान में संलग्न थे। इन महिलाओं को मिलने वाली नौकरी की अस्थायी प्रकृति ने
अक्सर परिवार की ज़रूरतों, जैसे बुज़ुर्र्ग या बच्चों की देखभाल, के
लिए इन्हें ही घर पर रहने को मजबूर किया। दिलचस्प बात यह है कि शोधकार्य करने वाली
महिलाओं में से 14 प्रतिशत महिलाओं ने शादी नहीं की थी जबकि शोधकार्य करने वाले
केवल 2.5 प्रतिशत पुरुषों ने शादी नहीं की थी। यह भी पता चला कि प्रति सप्ताह
प्रयोगशाला में 40-60 घंटे बिताने वालों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं (WIR) की संख्या अधिक थी। और कई पुरुषों ने उनके बच्चे बड़े होने पर प्रयोगशाला में
सप्ताह में 40 घंटे से भी कम समय बिताया। फिर भी महिलाओं के प्रति यह रूढ़िवादी सोच
बनी हुई है कि महिलाएं शोध के लिए प्रतिबद्ध नहीं होती या उनमें परिवार और कैरियर
की प्राथमिकता को लेकर द्वंद्व चलता रहता है।
विज्ञान अकादमियों और वित्त पोषण एजेंसियों
की पहल
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया था, सदी
की शुरुआत में भारत की कई विज्ञान अकादमियों ने विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की
अनुपस्थिति, उनको मान्यता में कमी जैसे मुद्दों को पहचाना, और
यथास्थिति को बदलने के लिए आवश्यक कदम उठाने की शुरुआत कर दी थी। लेकिन ये कदम
कितने प्रभावी रहे? 2004 में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA) की रिपोर्ट के बाद नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (NAS) और इंडियन एकेडमी
ऑफ साइंसेज़ (IAS) ने कार्यशालाएं आयोजित की और विज्ञान में महिलाओं को शामिल करने के लिए कई
पहल की। साल 2005 में DST ने विज्ञान में महिलाओं के लिए एक राष्ट्रीय टास्क फोर्स
की स्थापना की। ये ठोस कदम विज्ञान में महिला मुद्दों को सामने लाए और इनसे इन
क्षेत्रों में महिलाओं के दाखिले और नियुक्ति के बीच की खाई (यानी तथाकथित रिसाव
की समस्या) को पहचानने में मदद मिली। अकादमियों ने नियुक्ति प्रक्रियाओं की
दिक्कतों, पारंपरिक घरेलू व्यवस्था में महिलाओं के ऊपर पड़ने वाले
दोहरे बोझ और वरिष्ठ पदों या निर्णायक पदों पर महिलाओं की अनुपस्थिति पहचानी।
महिलाएं विज्ञान क्षेत्र को बतौर पेशा चुनें,
इसे प्रोत्साहित करने
के लिए DST ने, इस क्षेत्र में काम करने की परिस्थितियों में सुधार की
सिफारिशें की हैं। जैसे, उनके लिए लचीली समय व्यवस्था, बच्चों
के लिए झूलाघर, सुरक्षित परिवहन, कैंपस आवास,
फेलोशिप, और
जागरूकता कार्यक्रम आदि।
लागू करने के लिए इनमें से सबसे आसान सुझाव
था फेलोशिप योजनाएं, जो किसी भी तरह से यथास्थिति को चुनौती नहीं देतीं। उदाहरण
के लिए DST की महिला वैज्ञानिक योजना को ही लें। यह कार्यक्रम उन पीएचडी धारी महिलाओं को
अनुसंधान कार्यों में वापस जोड़ने के लिए चलाया गया था जिनके कैरियर में किन्हीं
कारणों से अंतराल आ गया था। लेकिन उनके लिए नियमित रोज़गार के अवसर प्रदान करने की
योजना के बिना, ऐसी अधिकांश योजनाएं सिर्फ एक,
अनिश्चित वादे के साथ, पोस्ट-डॉक्टरल
फेलोशिप भर बनकर रह गर्इं। कई साल पहले 1984 में,
UGC ने तकनीकी रूप से प्रशिक्षित लोगों को आकर्षित करने और इस क्षेत्र में बनाए
रखने के लिए रिसर्च साइंटिस्ट स्कीम शुरू की थी। विदेश में अच्छे पदों पर कार्यरत
कई लोग इस स्कीम का लाभ पाने के लिए देश लौट आए थे। 1999 आते-आते UGC इस योजना को जारी रखने का इच्छुक नहीं था,
और इस योजना से
सम्बंधित मेज़बान संस्थान इन शोध वैज्ञानिकों को अपने यहां लेने के लिए तैयार नहीं
थे। कई UGC-शोध वैज्ञानिक कानूनी कार्रवाइयों की मदद से सेवानिवृत्ति तक अपने पद पर बने
रह सके जबकि कई लोगों ने इन संस्थानों में वैमनस्य का सामना किया। यही हश्र 2008
में शुरू हुए DST-INSPIRE फैकल्टी प्रोग्राम या 2013 में शुरू हुए यूजीसी फैकल्टी रिचार्ज प्रोग्राम का
भी होता दिख रहा है, यदि मेज़बान संस्थान इन कार्यक्रमों के तहत नियुक्त किए गए शिक्षकों
को फंडिंग खत्म होने के बाद भी अपने संस्थानों में रखने का कोई तरीका नहीं निकाल
लेते।
दुर्भाग्य से,
अक्सर फंडिंग योजनाओं
की घोषणा शीर्ष स्तर से की जाती है। पुरानी योजनाओं के सटीक आकलन करने वालों और
संस्थानों के बीच इस पर चर्चा की कमी रहती है। यहां,
विभिन्न फंडिंग
एजेंसियों द्वारा शुरु किए गए पीएचडी अनुसंधान योजनाओं के हितधारकों के साथ
बमुश्किल ही कोई उचित चर्चा होती है, और नौकरशाह अक्सर इन कार्यक्रमों को अपने
नियंत्रण में रखते हैं और हितधारकों के हाथ में कुछ नहीं होता।
इससे भी अधिक मुश्किल है ऐसे कार्यक्रमों
या समाधानों को लागू करना जो स्थापित एकछत्र सत्ता को चुनौती देते हैं। इस देश में
कई वर्ष एक छात्र के रूप में और अलग-अलग संस्थानों में एक शिक्षक के रूप में
बिताने के बाद, आज भी मैं ऐसे किसी लैंगिक संवेदीकरण कार्यक्रम के बारे में
नहीं जानती जो विज्ञान-कर्मियों, छात्रों या शिक्षकों के लिए स्वैच्छिक या
अनिवार्य रूप से चलाया जाता हो। मैंने ऐसे कई कार्यक्रमों में भाग लिया है, जिनका
उद्देश्य विज्ञान में कैरियर के लिए अधिक महिलाओं को आकर्षित करना है, लेकिन
इनमें से एक भी कार्यक्रम ऐसा नहीं रहा जो गंभीरता से विज्ञान के विभागों या
संस्थानों को ज़्यादा समावेशी, ज़्यादा विषमांगी बनाने पर मंथन करता है।
मैंने शायद ही कभी किसी संस्थान को इन कार्यशाला की सिफारिशों को अपनाते देखा है, और
आकलन करते देखा है कि ये कदम कितने सफल रहे?
अधिकांश
संस्थानों/विभागों में, यहां तक कि जीव विज्ञान विभाग में (जहां पीएचडी प्रवेश में
लैंगिक-अनुपात अब उलट चुका है) आज भी औसतन केवल 25 प्रतिशत महिला शिक्षक हैं। कुछ
संस्थान महिलाओं को शिक्षकों के तौर पर नियमित करने वाली नीतियों की वकालत करते
हैं, या लचीले समय की सुविधा या आवास सुविधा देने का वायदा करते
हैं। लेकिन इस सबके बावजूद, अनीता कुरुप और उनके साथियों का अध्ययन
बताता है कि ये सब महिलाओं में उनके कैरियर के प्रति प्रतिबद्धता में कमी नहीं
लाती हैं। इनमें से अधिकांश महिलाएं विवाहित थीं और अपने परिवार के साथ रहती थीं
जहां बच्चों या बुज़ुर्गों की देखभाल उनकी ही ज़िम्मेदारी रहती है। इनके लिए कुछेक
संस्थान ही अच्छे झूलाघर या सुरक्षित परिवहन जैसी सहायता मुहैया करा सके। इनमें से
अधिकांश संस्थानों में आज भी यही स्थिति है। लचीले समय की सुविधा देने की बजाय कई
संस्थाओं ने अधिक बाज़ारोन्मुख, और मुनाफा केंद्रित तरीके अपनाएं हैं जिसके
चलते कार्यस्थल पर उपस्थिति के अधिक कठोर नियम बने हैं। जैसे आधार-लिंक्ड
बायोमेट्रिक्स प्रणाली, जिससे महिला वैज्ञानिकों को और भी मुश्किल हालात का सामना
करना पड़ता है।
यह हमारे सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि
क्या इस बात से कोई फर्क पड़ता है कि ये नीतियां कौन बनाता है? क्या
इससे फर्क पड़ता है कि हितधारक कौन है? या क्या ‘स्थान’ (location) पूरी तरह
अप्रासंगिक है? इसे समझने के लिए हम UGC की महिलाओं को
विज्ञान अनुसंधान कार्यों की ओर आकर्षित करने के लिए बनाई हालिया नीति को देखते
हैं। यूजीसी नियमन 2016 के अनुच्छेद 4.4 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “महिलाओं
और 40 प्रतिशत से अधिक विकलांगता वाले उम्मीदवारों को एमफिल पूरी करने के लिए
अधिकतम एक साल और पीएचडी पूरी करने के लिए अधिकतम दो साल की अवधि की छूट दी जा
सकती है। इसके अलावा, महिला उम्मीदवारों को एमफिल/पीएचडी के दौरान एक बार 240
दिनों का मातृत्व अवकाश या बाल देखभाल अवकाश दिया जा सकता है।” पहली नज़र में, यह
पहल महिलाओं को उनकी पीएचडी पूरी करने में मदद करने की नज़र से बहुत ही उदार लगती
है, इससे हमारे पास नियुक्त करने के लिए प्रशिक्षित लोगों का एक
बड़ा पूल तैयार होगा। सभी महिलाएं, चाहे वे विवाहित हों या ना हों, अपनी
पीएचडी पूरी करने के लिए दो अतिरिक्त वर्षों की हकदार हैं। यदि महिलाओं को 40
प्रतिशत विकलांग लोगों के समकक्ष देखना अपमानजनक ना भी लगे तो जिन लोगों ने इस नीति को बनाया है उन्होंने इससे एक कदम आगे जाकर
बच्चों की देखभाल का सारा बोझ महिलाओं के कंधों पर डाल दिया है। और तो और, शादी
और उससे जुड़े समझौतों का सारा बोझ भी महिलाओं पर डाल दिया है। यूजीसी रेग्यूलेशन
2016 का अनुच्छेद 6.6 कहता है कि “विवाह या अन्य किसी कारण से यदि महिला को
एमफिल/पीएचडी स्थानांतरण करना पड़े तो, रेग्यूलेशन में उल्लेखित सभी
सुविधाओं/शर्तों के साथ अनुसंधान डैटा उस युनिवर्सिटी को हस्तांतरित करने की
अनुमति होगी जिसमें वे जाने का इरादा रखती हैं,
और यह अनुसंधान मूल
संस्थान या मार्गदर्शक का नहीं कहलाएगा। हालांकि,
पीएचडी करने वाले को
मूल मार्गदर्शक और शोध संस्था को उचित श्रेय देना होगा।” इन नियमों को देखते हुए, क्या
यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि विज्ञान में शोध पर्यवेक्षक (चाहे पुरुष हो या
महिला) अपनी प्रयोगशाला में पुरुष की बजाय किसी महिला शोधार्थी को पीएचडी के लिए
वरीयता देंगे?
जैसा कि पहले ही बताया गया था कि विज्ञान
क्षेत्र में महिलाओं की कमी, प्रशिक्षित महिलाओं की कमी के कारण नहीं
है। इस क्षेत्र में बाधाएं अक्सर इसके बाद आती हैं – रोज़गार के अवसरों की कमी, बुनियादी
सुविधाओं की कमी और संस्थानों द्वारा सहयोग में कमी,
ये सब मिलकर महिलाओं
को इस क्षेत्र से बाहर रखते हैं। ऐसी नीतियां जो उन्हीं लोगों को शामिल नहीं करतीं
जिनके लिए वे बनाई जा रही हैं, तो अंतत: अक्सर उन लोगों के जीवन और
अनुभवों में कोई खास परिवर्तन नहीं आता है जिन्हें ध्यान में रखकर वे बनाई गई थीं।
लेकिन बात तो तब बिगड़ जाएगी जब अंत में कोई नीति उनके लिए ही विनाशकारी या
अहितकारी साबित हो जिनके हित में यह बनाई गई है।
इसके अलावा,
इसमें शामिल संस्थाओं
के ढांचे में बदलाव किए बिना इन नीतियों को लागू करना,
विपरीत परिणाम दे
सकता है और परिणामस्वरूप व्याप्त रूढ़ियों और पूर्वाग्रहों को मज़बूत कर सकता है। यह
स्पष्ट है कि क्यों कई महिलाएं लिंग आधारित आरक्षण को लेकर शंका व्यक्त करती हैं, या
कई महिलाएं लचीली समय सुविधा लेने में या प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में जहां पुरुषों
की अधिकता है वहां घर से काम करने की सुविधा लेने में हिचकती हैं। अंतर्निहित लैंगिक
सोच संस्था के ढांचे में झलकता है। इस प्रकार,
इन संस्थाओं के ढांचे
में सक्रिय बदलाए किए बिना, हम उन्हीं को दोहराने की संभावना बनाते
हैं। जैसा कि IISERs जैसे संस्थान को देख कर समझ आता है कि क्यों इन नए संस्थानों में भी पुराने
संस्थानों जैसा ही लैंगिक असंतुलन दिखाई देता है।
निष्कर्ष के तौर पर
पिछले सत्तर सालों में भारत के विज्ञान
परिदृश्य में बहुत कुछ बदला है। आज़ादी के बाद,
भारत ने विज्ञान
शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए काफी संसाधन लगाए हैं। साठ के दशक के मध्य से विज्ञान
में लिंग समानता बढ़ाना भी इसके उद्देश्यों में से एक है। वैश्विक और राष्ट्रीय
दोनों स्तरों पर ही विज्ञान के विभिन्न कामों और वैज्ञानिक संस्थानों की आंतरिक
प्रक्रियाओं में भी काफी बदलाव आए हैं। शायद इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण
सकारात्मक उपलब्धि है कि विज्ञान में अध्ययन और शोध में प्रवेश लेने वाली महिलाओं
की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। और यह केवल विज्ञान के कुछ विषयों या देश
के कुछ हिस्सों तक ही सीमित नहीं है। पुरुषों की तुलना मे उच्च शिक्षा के हर
क्षेत्र में लगातार महिलाओं के दाखिला लेने और उत्तीर्ण होने की संख्या बढ़ रही है।
साठ के दशक में विज्ञान के अधिकांश विषयों में महिलाओं की पूर्ण अनुपस्थिति को
देखें तो वर्तमान स्थिति तक आना सराहनीय बात है। जैसा कि कई लोगों ने कहा है, बीसवीं
शताब्दी के सामाजिक सुधार और उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष,
दोनों ने एक ऐसा
इतिहास रचा जहां महिलाओं की शिक्षा की एक सकारात्मक छवि बनी। हालांकि, उनका
यह कदम लिंग भेद पर टिका था – उद्देश्य महिलाओं को इसलिए शिक्षित करना नहीं था कि
वे एक कुशल पेशेवर की तरह सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनें बल्कि इसलिए था कि वे
भावी पीढ़ी के लिए सक्षम माताएं बन सकें। हालांकि इन प्रयासों ने महिलाओं के लिए उन
आधुनिक औपचारिक शिक्षा स्थानों को खोल दिया जिनके दरवाज़े उनके लिए बंद थे। यह खास
तौर से उन वर्गों के लिए खुले, जो खुद को सक्रिय रूप से नए राष्ट्र
निर्माता के रूप में देख रहे थे, यानी नवोदित मध्यम वर्ग। खुद को नए राष्ट्र
के संरक्षक के रूप में देखते हुए उन्होंने माना कि यह नया राष्ट्र एक गरिमामयी
इतिहास और उत्कृष्ट आध्यात्मिक सभ्यता का वाहक है जिसमें आधुनिकमूल्यों का समावेश
करना है। इनमें से पहली और दूसरी पीढ़ी के कई शिक्षित अभिजात्य वर्ग ने भी शिक्षा
को आध्यात्मिकता और तपस्या के बराबर माना था। इस प्रकार,
भारतीय संस्कृति के
संदर्भ में समय के साथ शिक्षा ने अधिक वैधता हासिल की।
बहरहाल,
वैज्ञानिक
कार्यस्थलों में खासकर वैज्ञानिक संस्थानों और उच्च पदों पर पर्याप्त संख्या में
महिलाओं की मौजूदगी होने में अभी भी काफी लंबा वक्त लगेगा। विज्ञान अकादमियों और
पुरस्कार पाने वालों में भी महिलाएं कम संख्या में है। वर्तमान व्यवस्था जिस तरह
बनी है, यह एक ऐसी बिसात की तरह है जिसे महिलाएं कभी नहीं जीत
सकतीं। कॉर्पोरेट अर्थ व्यवस्था की तरह वैज्ञानिक संस्थानों में भी लैंगिक ढांचे
के तहत ‘जान-पहचान’ के आधार पर काम होता है। यह तो सर्वविदित है कि भारत में ऐसे
नेटवर्क या जान-पहचान द्वारा ही नियुक्तियां,चुनाव,
नामांकन, पुरस्कार
के पात्र चुने जाते हैं, जिन तक महिलाओं की आसान पहुंच नहीं होती
है।
इससे भी महत्वपूर्ण है कि यह सिर्फ
गतिशीलता या काबिल महिला वैज्ञानिकों को मान्यता की बात नहीं है। विज्ञान की
दुनिया में प्रवेश करने वाले युवा शोधकर्ताओं को अनुकरणीय उदाहरणों के रूप में
पर्याप्त महिलाएं नहीं दिखतीं, जो इस रूढ़ि को बल देता है कि वैज्ञानिक तो
पुरुष ही होते हैं और इस तरह एक नकारात्मक छवि का चक्र चलता रहता है और विज्ञान
में महिलाओं के लिए आत्म-पराजय की स्थिति बनाता है। सार्वजनिक दायरे में महिलाओं
की बढ़ती उपस्थिति इन स्थानों को अन्य महिलाओं के लिए अधिक सुलभ और सुरक्षित
बनाएगी। यह वैज्ञानिक प्रतिष्ठान में सभी पदों पर महिलाओं की मौजूदगी को भी बढ़ाएगा, इसके
अलावा उच्च पदों पर महिलाओं की मौजूदगी प्रयोगशाला और कक्षाओं में युवा महिला
शोधार्थी को सहज करेगी, और उनके उत्साह और वैज्ञानिक क्षमता दोनों को बढ़ाएंगी।
हालांकि, सांकेतिकता इसका जवाब नहीं होना चाहिए। सांकेतिक अल्पसंख्यक, चाहे
जाति के मामले में हो या लिंग के, अक्सर बहुसंख्यकों की राय को मज़बूत करता है
और समितियों में इस बात का दिखावा भर करता है कि ये समितियां सामाजिक पूर्वाग्रहों
से मुक्त है। जैसा कि कोठारी समिति का आव्हान था,
लगातार विविधता को
प्रोत्साहित करना मात्र सामाजिक न्याय का तकाज़ा नहीं है,
बल्कि यह विज्ञान के
लिए अनिवार्य है और उसकी प्रगति के अग्रदूत वाली आत्म-छवि का भी सवाल है। जिन
देशों और संस्थानों ने विविधता को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया है, उन्हें
इसके साथ आने वाले ज्ञान, अनुभवों और विचारों की विविधता का लाभ मिला
है।
वैज्ञानिक संस्थानों के लिए इन सहज तथ्यों को पहचानना इतना कठिन क्यों है? विज्ञान और तार्किकता का मज़बूत रिश्ता होते हुए भी वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों को अपने कामकाज के तरीकों या कार्यप्रणाली में ‘लिंग-आधारित समस्याएं’ पहचानने में मुश्किल आती है। तार्किकता के मुद्दे पर वैज्ञानिकों को कैसे चुनौती दी जा सकती है? वैज्ञानिकों को तो तार्किक रूप से सोचने और कार्य करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, तो वे इसके विपरीत कैसे हो सकते हैं? चूंकि वे ज़्यादातर जिन विषयों पर शोध करते हैं उन विषयों का सम्बंध जेंडर से कम होता है, उनके पाठ्यक्रम/प्रशिक्षण में एक विषय के रूप में ‘जेंडर’ को शामिल करना अक्सर एक बड़ी चुनौती होती है। थोड़ा उकसाने वाले अंदाज़ में कहें, तो वैज्ञानिकों में लैंगिक-अंधत्व स्वाभाविक रूप से होता है। फिर भी जैसे-जैसे इसके ‘वैज्ञानिक साक्ष्य’ सामने आते जाते हैं तो यह ज़रूरी होता जाता है कि वैज्ञानिक अपने अंदर के घोषित-अघोषित दोनों पूर्वाग्रहों की जांच करें, उन नीतियों पर चर्चा करें जो वास्तव में अधिक महिला समावेशी हैं, वरिष्ठ और निर्णायक पदों के साथ शिक्षकों के तौर पर महिलाओं को शामिल करने के बेहतर और अधिक पारदर्शी तरीके खोजें। महिलाओं की मौजूदगी बढ़ाना, निष्पक्षता बढ़ाने और विज्ञान में उत्पादकता और उत्कृष्टता बढ़ाने जैसा है। यह दोनों हाथों में लड्डू का खेल है!(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://indiabioscience.org/media/articles/IndianWomeninScience.jpg
हाल ही में एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन द्वारा ‘लचीले
खाद्य, पोषण और आजीविका के लिए विज्ञान: समकालीन चुनौतियां’ विषय
पर एक वर्चुअल कसंल्टेशन आयोजित किया गया था। इसमें कैलिफोर्निया युनिवर्सिटी के
ब्रूस एल्बर्ट्स ने विज्ञान शिक्षा पर बहुत ही प्रासंगिक व्याख्यान दिया।
व्याख्यान का विषय था विज्ञान संप्रेषण। यह विषय हमारे यहां निकट भविष्य में लागू
की जाने वाली नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संदर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक है।
प्रो. एल्बर्ट्स विज्ञान संप्रेषण में
भागीदारी के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। वे साइंस पत्रिका के मुख्य
संपादक रह चुके हैं। उनकी किताब मॉलीक्यूलर बॉयोलॉजी ऑफ सेल (कोशिका का
आणविक जीव विज्ञान) जीव विज्ञान के किसी भी स्नातक छात्र के लिए ‘बाइबल’ है। मैं
यहां उनके उपरोक्त व्याख्यान की कुछ मुख्य बातों का ज़िक्र करूंगा।
विज्ञान शिक्षा पर बात करने से पहले प्रो.
एल्बर्ट्स भौतिक विज्ञानी पियरे होहेनबर्ग के कथन की याद दिलाते हैं, “किसी
भी वैज्ञानिक का काम छोटे एस (‘s’) से शुरू होने वाला
साइंस (विज्ञान) होता है, स्वतंत्र वैज्ञानिकों द्वारा कई बार
परीक्षण किए जाने के बाद यह छोटा एस (‘s’)
सामूहिक सार्वजनिक ज्ञान के रूप में बड़े एस (‘S’)
में बदलता है जो विरोधाभास से मुक्त और सार्वभौमिक होता है।” (किसी वैज्ञानिक
द्वारा किया गया दावा जब तक अन्य वैज्ञानिकों द्वारा उसी प्रक्रिया से पुन:प्राप्त
नहीं किया जाता, तब तक वह सिर्फ दावा रहता है सत्य नहीं)। उदाहरण के लिए, नॉर्मन
बोरलॉग ने खोज की थी कि मेक्सिकन बौने किस्म के गेहूं के पौधे उच्च पैदावार देते
हैं; इसका एम.एस. स्वामीनाथन द्वारा स्वतंत्र रूप से परीक्षण
किया गया और सत्य साबित किया गया। इस खोज ने आगे चलकर भारत में हरित क्रांति का
मार्ग प्रशस्त किया; या यूं कहें कि इस प्रक्रिया में नॉर्मन बोरलॉग की खोज
साइंस के ‘s’ से ‘S’
में बदल गई, और सामाजिक रूप से मूल्यवान के रूप में पहचानी और स्वीकार
की गई। इसे एक ट्रांसलेशनल रिसर्च के रूप में भी जाना जाता है (बेशक, ‘s’ का तात्पर्य यहां STEM के सभी क्षेत्रों,
यथा चिकित्सा, कृषि
और सामाजिक विज्ञान से भी है)।
प्रो. एल्बर्ट्स विज्ञान शिक्षा पर अपनी
बात की शुरुआत इस कथन से करते हैं कि हरेक बच्चा एक वैज्ञानिक है। कितनी सही बात
है! चाहे शिशु हो या स्कूली छात्र हों, वे अपने आसपास के परिवेश, आसपास
के लोगों, जानवरों, पेड़-पौधों,
मिट्टी और धूल से
वाकिफ होते हैं। बच्चे उत्सुक प्रेक्षक होते हैं। जानकारी इकट्ठी करना उनके स्वभाव
में होता है। उनकी इस क्षमता को बढ़ावा देने और फलने-फूलने का मौका देने के लिए
अमेरिका के कई स्कूलों में ‘व्हाइट सॉक्स’ नामक प्रयोग किया गया था।
व्हाइट सॉक्स प्रयोग
इस प्रयोग में 5 साल की उम्र के स्कूली
बच्चे शामिल थे। प्रयोग में शामिल हरेक बच्चे से अपने जूते उतारने के लिए कहा गया
और सिर्फ सफेद मौज़े (जो उनकी युनिफॉर्म का हिस्सा थे) पहनकर पूरे परिसर में घूमने
को कहा गया। इसके बाद उन्हें उनके मौज़ों पर चिपके हुए कणों को इकट्ठा करने और
उन्हें वर्गीकृत करने को कहा गया: इनमें से कौन-से बीज हैं, और
कौन-से महज़ धूल-मिट्टी? इसके बाद शिक्षक ने हरेक छात्र से स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी
द्वारा विकसित कम लागत वाले माइक्रोस्कोप का उपयोग कर इन कणों का विश्लेषण कर इस
बात की पुष्टि करने के लिए कहा कि बीज और धूल के लिए जो उनके निष्कर्ष थे क्या वे
सही हैं। (माइक्रोस्कोप के लिए देखें https://www.foldscope.com/)। कई छात्रों ने माइक्रोस्कोप विश्लेषण कर अपने अनुमान की पुष्टि की कि नियमित
आकार वाले कण वाकई बीज हैं। वे माइक्रोस्कोप में अपने दोस्तों के नमूनों को देखकर
इस बात की जांच भी कर सकते थे कि उनके दोस्तों के निष्कर्ष सही हैं या नहीं।
‘व्हाइट सॉक्स’ अध्ययन ऐसे ही सरल प्रयोगों का एक समूह था जिसमें तकनीक का उपयोग, अनुमान
की जांच और आपस में समीक्षा शामिल थी।
भारत का डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नॉलॉजी
(डीबीटी) प्रो. मनु प्रकाश की प्रकाश लैब से कम लागत वाले फोÏल्डग माइक्रोस्कोप
खरीदकर कई छात्रों को देने की तैयारी कर रहा है। (देखें <ted.com/talk by Manu Prakash>)
भारत में अमल
यह अच्छी बात है कि पूरे भारत में कई
भाषाओं में काम करने वाले कई एनजीओ हैं जो विज्ञान को आसान/लोकप्रिय बनाने का
प्रयास कर रहे हैं, और राज्य और राष्ट्रीय विज्ञान अकादमियां और सरकारी
एजेंसियां इन प्रयासों का समर्थन भी कर रही हैं। ये संस्थाएं व्हाइट सॉक्स प्रयोग
में स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से परिवर्तन कर इसे आसानी से अपना सकती हैं।
मीडिया भी छात्रों और नवाचारियों के स्थानीय प्रयासों को उजागर करने में अपनी
भूमिका निभा सकता है। नई शिक्षा नीति के तहत,
अब इस तरह के नवाचारी
प्रयोग 5+3+3+4 के स्तर (आंगनबाड़ी से लेकर कक्षा 12 तक) से लेकर विश्वविद्यालयों
के माध्यम से स्नातक और उच्च शिक्षा तक किए जाने चाहिए। और, जैसा
कि 4 अगस्त के दी हिंदू के अंक में प्रकाशित लेख स्कूल्स विदाउट फ्रीडम
में कृष्ण कुमार कहते हैं, इन योजनाओं को बनाने व क्रियांवयन का काम
स्थानीय परिवेश से परिचित शिक्षकों द्वारा किया जाना चाहिए ना कि किसी सरकारी फतवे
के द्वारा।
उपयोगी संसाधन
विश्वविद्यालयों के लिए नैन्सी कोबर की
किताब Reaching students: what research
says about effective instruction in undergraduate science and engineering (यानी छात्रों तक पहुंचना: स्नातक स्तर पर
कारगर विज्ञान व इंजीनियरिंग शिक्षण को लेकर शोध क्या कहता है) काफी उपयोगी संसाधन
है। इस किताब का पीडीएफ संस्करण www.nap.edu पर मुफ्त उपलब्ध है। और वर्ल्ड साइंस एकेडमीस द्वारा शुरू किया गया एक नया प्रोजेक्ट ‘स्थानीय प्रयासों से
संचालित विज्ञान’ स्मिथसोनियन साइंस एजुकेशन सेंटर के माध्यम से उपलब्ध है। इसके
लिए डॉ. कैरोल ओ’डॉनेल से संपर्क कर सकते हैं: O’Donnell@si.edu।
युवा अकादमियों की भूमिका
प्रो. एल्बर्ट्स युवा वैज्ञानिकों के लिए अकादमियों की आवश्यकता पर भी ज़ोर देते हैं, जो इस प्रयास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। अब तक 40 देशों में इस तरह की विज्ञान युवा अकादमियां स्थापित की गई हैं, जिनमें से भारत की भारतीय राष्ट्रीय युवा विज्ञान अकादमी (INYAS) एक है। आम तौर पर युवा वैज्ञानिक ‘दकियानूसी बुज़ुर्गों’ के मुकाबले अधिक सुलभ और स्वीकार्य होते हैं। तो, INYAS यह है आपकी भूमिका!(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://th.thgim.com/sci-tech/science/d6x9ui/article32363645.ece/ALTERNATES/FREE_960/16TH-SCICHILD-SCIENCE
आज़ादी के बाद के दशकों में हमारे देश ने काफी विकास किया है, फिर भी उच्च शिक्षा और विज्ञान व टेक्नॉलॉजी सम्बंधी नीतियों के निर्माण और
संशोधन के बाद अभी भी काफी कुछ करना बाकी है। यह आलेख उच्च शिक्षा की पिछली
नीतियों और सीखने के परिणाम आधारित उच्च शिक्षा से सम्बंधित है। यहां एक विशिष्ट
उदाहरण की मदद से परिणाम आधारित यूजी और पीजी शिक्षा के बारे में कुछ सुझाव दिए गए
हैं।
“विज्ञान और वैज्ञानिकों से समाज एवं सरकार को तथा सरकार व समाज से
वैज्ञानिकों को क्या उम्मीदें हैं,” यह सवाल जितना महत्वपूर्ण है
उतना ही महत्वपूर्ण महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षण की गुणवत्ता का
सवाल भी है। देश के युवाओं को उच्च शिक्षा का उद्देश्य अस्पष्ट है। क्योंकि उच्च
शिक्षा या तो बेहतरीन कैरियर हेतु प्रमाण पत्र हासिल करने की एक प्रक्रिया बनकर रह
गई है या फिर इसने ऐसा मानव संसाधन पैदा किया है जो एक अनुपयोगी संपदा बनकर रह गया
है। जनता की राय भी इस दृष्टिकोण का समर्थन करती है।
व्यवहार में उच्च शिक्षा को विज्ञान और प्रौद्योगिकी (एसएंडटी) नीतियों से अलग
करना,
खास तौर से विज्ञान शिक्षा और उसके अपेक्षित परिणामों के
सम्बंध में,
काफी निराशाजनक रहा है। इसके अलावा राजनीतिक, शैक्षिक,
वैज्ञानिक, सामाजिक और यहां तक कि
नौकरशाही संस्थानों जैसे कई स्तरों पर स्पष्टता और निष्पक्षता की काफी कमी रही है।
नाभिकीय उर्जा व अंतरिक्ष और कुछ हद तक डेयरी एवं कृषि के क्षेत्र को छोड़ दें तो
हमारे पास,
खासकर जीव विज्ञान में, ज़्यादा
नया ज्ञान उत्पन्न नहीं हुआ है। आम तौर पर जिस ज्ञान का दावा किया जा रहा है वह
दरअसल पुराने ज्ञान का पुनर्निर्माण भर है।
जीव विज्ञान की इस स्थिति का कारण कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित
वैज्ञानिक-राजनीतिज्ञ सम्बंधों के इतिहास में दफन है जिसके चलते चुनिंदा क्षेत्रों
में वैश्विक दृश्यता हासिल हुई है। इसके अलावा, 1980 व
1990 के दशक में संस्था निर्माता खुद को प्रभावी ढंग से स्थापित करने और अपने
पूर्ववर्तियों की तरह सफलता अर्जित करने में विफल रहे हैं। कुछ अन्य कारण रहे हैं
– जैसे टुकड़ा-टुकड़ा योगदान जो विश्व स्तर पर जीव विज्ञान में स्थायी प्रभाव छोड़ने
के लिए पर्याप्त नहीं है और देश में मात्र गिने-चुने लोगों द्वारा कुछ ही
क्षेत्रों में किए जा रहे छिटपुट प्रयास।
दुर्भाग्यवश,
उचित दिशा और मार्ग के अभाव के अलावा, एक कारण यह भी रहा है कि इन संस्थानों में राष्ट्रीय की बजाय निजी उद्देश्यों
पर ज़ोर देने के चलते बहुत सारी प्रतिभाएं बेकार पड़ी रह गई हैं। 40 वर्षों के कार्य
अनुभव के आधार पर मेरी निजी राय है कि इसके परिणामस्वरूप, कुछ
व्यक्तियों को छोड़कर, लगभग एक पीढ़ी का योगदान बिलकुल नहीं मिल
सका है। इसका दोष सरकारों और प्रशासन से जुड़े उन लोगों पर जाता है जो जीव विज्ञान
के विषय में एक ‘विशाल-विज्ञान’ के लिए गुंजाइश विकसित नहीं कर पाए, जैसा कि नाभिकीय ऊर्जा और अंतरिक्ष विज्ञान में संभव हो सका था।
इस बहु-आयामी समस्या का एक दिलचस्प परिणाम यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर
स्पष्टता की कमी है और व्यक्तिगत कारक प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इसलिए, जीव विज्ञान के लिए ‘विशाल-विज्ञान’ का स्थान बनाने के लिए एक ऐसा
परिप्रेक्ष्य विकसित करने की आवश्यकता है जिसके तहत मौजूदा प्रतिभा का उपयोग किया
जा सके। साथ ही विज्ञान में उच्च शिक्षा को आकार देने की चुनौतियों का सामना करने
के लिए एसएंडटी नीति को विकसित करने की भी आवश्यकता है।
इस बात से तो कोई इन्कार नहीं कर सकता कि एक अच्छा विज्ञान कर्म उपलब्ध मानव
संसाधन की गुणवत्ता पर और निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इसे तैयार
करने के तरीकों पर निर्भर है। इन लक्ष्यों का निर्धारण व्यापक भागीदारी और गंभीर
मंथन के आधार पर किया जाना चाहिए। हमें अपनी मौजूदा शक्तियों का उपयोग वर्तमान
परिस्थितियों के अनुसार करना होगा और बार-बार पहिए का आविष्कार करने की कवायद से
बचना होगा।
कोई भी देख सकता है कि जीव विज्ञान के क्षेत्र में, अपनी
नीतियों को धरातल पर उतारने और उनके द्वारा निर्धारित आत्म निर्भरता, टिकाऊपन और न्यायसंगत विकास के लक्ष्य को हासिल करने में हम कितने सफल रहे
हैं। अतीत में प्रधान मंत्रियों और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रियों के तमाम
बयानों में ‘टिकाऊपन’ तथा ‘आत्म-निर्भरता’ जैसे नारे कई बार मुखरित हुए हैं लेकिन
ज़मीनी हकीकत निराशाजनक बनी हुई है।
स्वास्थ्य के संदर्भ में समाज की बुनियादी न्यूनतम आवश्यकताओं, जैसे जल जमाव रोकना, जल निकासी का प्रबंधन, ठोस एवं इलेक्ट्रॉनिक कचरे के कुशल और कम लागत वाले प्रभावी निपटान के अलावा
प्रदूषण नियंत्रण, पर पिछले कई दशकों से प्रभावी रूप से कोई
ध्यान नहीं दिया गया है। आज जब स्वच्छ भारत से लेकर स्किल्ड और डिजिटल इंडिया जैसे
कई अभियान चल रहे हैं, यह देखना बाकी है कि क्या इनसे ज़मीनी हकीकत
में बदलाव आएगा और क्या वैज्ञानिक और शिक्षित वर्ग इनमें अपेक्षित भागीदारी करेगा।
अब हमें प्रशिक्षित मानव संसाधन के बारे में ‘रटंत विद्या और उसके आधार पर सफल
कैरियर’ से आगे बढ़कर भविष्य में ऐसे पाठ्यक्रम के बारे में सोचना चाहिए जिसमें
सीखने के परिणामों को मापा जा सके। इस प्रकार प्राप्त किए गए ज्ञान का उपयोग उपरोक्त
मुद्दों का हल निकालने के साथ-साथ नए ज्ञान के सृजन के लिए करना चाहिए।
यदि आप इस बात का अध्ययन करें कि क्या उच्च शिक्षा नीतियों, खासकर विज्ञान की उच्च शिक्षा नीतियों को एसएंडटी नीतियों के अनुरूप ढालने की
कोशिश हुई है,
तो आपको पता चलेगा कि ऐसा कोई विचार ही नहीं है। इसके अलावा, हमारी नीतियों के कारण उच्च शिक्षा में महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के
बीच अधोसंरचना की संस्थागत असमानता पैदा हुई है और ये अलग-अलग रोडमैप के साथ काम
करते हैं। नतीजा यह है, अलग-अलग पाठ्यक्रम हैं, अलग-अलग शिक्षण विधियां हैं, प्रायोगिक प्रशिक्षण में अंतर
हैं और सीखने के परिणाम भी अलग-अलग हैं। जब भी और जहां भी एकरूपता लाने की कोशिश
की गई,
हर बार असफलता ही हाथ लगी है।
इसके साथ ही,
उभरते हुए ज्ञान के साथ कदम मिलाकर चलने में असफलता, अन्य विषयों से सम्बद्धता और एकीकरण का अधमना प्रयास, और
छात्रों की बदलती ज़रूरतों के हिसाब से आवश्यक कौशल प्रदान करने में असफलता ने पाठ्यक्रम
में क्रमिक संशोधनों की बजाय यकायक परिवर्तन को आवश्यक बना दिया है। विषय विशेष की
पाठ्यक्रम संरचना को बदलने और मापन योग्य परिणाम हासिल करने के लिए यह दृष्टिकोण
और रवैया आवश्यक है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि नए कलेवर में वही पुरानी चीज़
भर दी जाए,
जिसमें पाठ्यक्रमों में टुकड़ा-टुकड़ा संशोधन करके उन्हें
सीखने के परिणामों पर आधारित शिक्षा का नाम दे दिया जाता है।
शिक्षा नीतियों के माध्यम से समय-समय पर शिक्षा सम्बंधी बहसें होती रही हैं:
विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1948); माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952); राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (डी. एस. कोठारी, 1964-66), राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1968); राष्ट्रीय शिक्षा नीति का
मसौदा (1979),
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति
(1992)। हालांकि,
ये नीतियां कागज़ पर प्रशंसनीय दिखती थीं तथा अपने समय के
लिए प्रासंगिक दिशा प्रदान करती थीं, लेकिन खराब क्रियान्वयन
और निगरानी के कारण उत्कृष्टता लाने में विफल रहीं।
हाल ही में,
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर प्रबंधन के लिए नियामक
एजेंसियों में सुधार की घोषणा की गई है। इसके लिए 2018 में उच्च शिक्षा आयोग का
गठन किया गया है ताकि महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की निगरानी और धन आवंटन के
नियामक ढांचे में सुधार किया जा सके। इसने यूजीसी, अखिल
भारतीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) जैसी स्थापित संस्थाओं के स्वतंत्र कामकाज
से सम्बंधित मुद्दों को उजागर किया है जो अपेक्षित कार्य नहीं कर रही हैं। एक
विचार यह भी रहा है कि इन संस्थाओं को हटाकर नई संस्थाएं बनाने की बजाय इनसे सही
तरह से काम करवाया जाए और इन्हें जवाबदेह बनाया जाए। डर इस बात का है कि मौजूदा
संस्थाओं की तरह,
कहीं यह विशालकाय उच्च शिक्षा आयोग भी उन्हीं बुराइयों का
शिकार न हो जाए। लिहाज़ा इसका समाधान यह है कि मौजूदा संस्थाओं के कामकाज को सुधारा
जाए और उन्हें चुस्त बनाया जाए, ताकि हम फिर से वही बातें
सीखने में समय न बर्बाद करें।
एक देश के रूप में प्रतिभा को खोजने, उसे पोषित करने तथा
सहायता करने में हमने बहुत कम काम किया है। हां, इक्का-दुक्का
अपवाद हैं लेकिन उनकी संख्या काफी कम है। अर्थात जिस पैमाने पर यह काम किया जाना
है वह नहीं हुआ है और विभिन्न ज़रूरतों के लिए ज़रूरी क्षमता का निर्धारण करना भी
बाकी है। सत्ता के गलियारों में अधिकतर लोग एक उबड़-खाबड़ रास्ते पर हैं। सभी के लिए
समान रूप से आवश्यक डिज़ाइन और क्रियान्वयन के लिए उन्हें गहरे चिंतन और मनन की
ज़रूरत है।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के माध्यम से देश के सामने अवसर है कि यूजीसी को
एक अंग के रूप में शामिल करके स्वयम के माध्यम से मुफ्त ऑॅनलाइन शिक्षा आसानी से
उपलब्ध कराई जा सकती है। अभी सबसे बड़ा कार्य, विभिन्न
विषयों में यूजी और पीजी के लिए बड़े पैमाने पर ऑॅनलाइन कोर्सेज़ और लर्निंग आउटकम
आधारित पाठ्यक्रम फ्रेमवर्क के तहत ऑॅनलाइन मॉड्यूल विकसित करना है। यह प्रक्रिया
काफी समय से कई देशों में लागू है। इसकी रूपरेखा विकसित करने के लिए कोर समिति और
विषय विशेषज्ञों की बैठक हुई थी जिसका उद्देश्य रूपरेखा तैयार करके उसे चर्चा, संशोधन और आखिर में अपनाने के लिए प्रसारित करना था। मुझे लगता है कि यह
(स्वयम) विज्ञान के विभिन्न विषयों में पाठ्यक्रम संरचनाओं में गुणात्मक बदलाव
लाने का उपयुक्त मौका है, जिसमें सीखने के परिणामों को
सटीक रूप से परिभाषित किया जाए और मूल्यांकन किया जाए ताकि इन्हें देश की एसएंडटी
नीति में व्यक्त आकांक्षाओं के अनुरूप बनाया जा सके। पाठ्यक्रम संरचनाओं को एकीकृत, बहु-विषयी और अंतर-विषयी तरीके से तैयार करने की आवश्यकता है ताकि वैज्ञानिक
विषयों के एक बड़े परास को साथ लाया जा सके और जटिल समस्याओं को हल करने के लिए नई
विधियों,
अवधारणाओं और दृष्टिकोणों का विकास हो सके। एसएंडटी और उच्च
शिक्षा नीतियों में संतुलन बनाने के लिए यदि और जब इस दृष्टिकोण को अपनाया जाता है
तो इस बदलाव का विरोध करने वाले शिक्षकों और छात्रों के बीच अभिमत उत्पन्न हो सकते
हैं। दूसरी ओर,
इसे सामाजिक आवश्यकताओं के लिए प्रासंगिक एवं नई खोजों और
नवाचारों के लिए मानव संसाधन तैयार करके उच्च शिक्षा को आकार देने के एक अवसर के
रूप में भी देखा जा सकता है।
उदाहरण के तौर पर मैं यहां एक विषय क्षेत्र की झलक प्रदान करता हूं कि किस तरह
एसएंडटी में नवाचार के घोषित लक्ष्य को पाठ्यक्रम में सीखने के सुपरिभाषित व
सार्थक परिणामों के अनुरूप फेरबदल करके प्राप्त किया जा सकता है। एक अध्ययन के तौर
पर मैं जंतु विज्ञान को चुन रहा हूं जो हमारे पारंपरिक महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों
में पढ़ाया जाता है। यूजी और पीजी पाठ्यक्रम में कुछ बदलाव लाने के लिए हमें जंतु
विज्ञान को आधुनिक जैविक परिप्रेक्ष्य में समझना होगा जिसमें जीवों को परमाणु स्तर
पर देखा जाता है। जीवों की प्रणालियों के तुलनात्मक अध्ययन हेतु रासायनिक, भौतिक,
गणितीय और आणविक पहलुओं का कारगर तरीके से एकीकृत अध्ययन
करने की आवश्यकता है ताकि विभिन्न जीवों के आंतरिक कामकाज को आकारिकी, कोशिकीय,
आणविक, परस्पर क्रियात्मक एवं जैव
विकास जैसे विभिन्न स्तरों पर समझा जा सके।
पाठ्यक्रम को संस्था में उपलब्ध संसाधनों और भौगोलिक स्थिति के आधार पर
अलग-अलग आकार दिया जा सकता है। लेकिन, इसे सीखने के कमोबेश
एकरूप परिणामों के अनुरूप होना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, विभिन्न
भौगोलिक क्षेत्रों में, विभिन्न कौशलों के साथ शिक्षण और प्रायोगिक
प्रदर्शन में जैव विकास के विभिन्न सोपानों की क्षेत्रीय प्रजातियों का उपयोग किया
जा सकता है और फिर भी तुलनात्मक जीव विज्ञान की समझ एक जैसी हो सकती है। आखिरकार, इसका उद्देश्य अकशेरुकी और कशेरुकी जीवों यानी एकल कोशिकीय प्रोटोज़ोआ से लेकर
बहुकोशिकीय मनुष्यों तक में विभिन्न प्रणालियों की तुलना करते हुए जीव जगत के
आंतरिक कामकाज को समझने में मदद देने का होना चाहिए। इसमें सूचना व संचार
टेक्नॉलॉजी (आईसीटी) के औज़ारों की मदद ली जा सकती है तथा प्रायोगिक कार्य और
मैदानी अध्ययन को भी जोड़ा जा सकता है। दूसरे शब्दों में, यदि
विभिन्न फायलम को समझने के लिए एक ही सैद्धांतिक ढांचे का इस्तेमाल किया जाए और
आकारिकी और आणविक औज़ारों के आधार पर वर्गीकरण को जैव विकास के आधार पर समझने की
कोशिश हो और साथ में उपयुक्त मैदानी व प्रयोगशाला कार्य को जोड़ा जाए तो छात्र रटंत
प्रणाली से मुक्त रहेंगे।
यदि कोई छात्र जंतु विज्ञान में उद्यम स्थापित करने में रुचि रखता है तो उसे
जीवन के विभिन्न रूपों में विविधता को एक सामाजिक-आर्थिक संपदा के रूप में देखने
की आवश्यकता होगी। इसमें प्राणि विज्ञान के प्रयुक्त पहलुओं को ध्यान में रखना
होगा। शोध को अपना कैरियर बनाने में रुचि रखने वाले छात्र के लिए ज़रूरी होगा कि वह
रासायनिक और भौतिक सिद्धांतों को अणुओं से लेकर स्व-संगठित एवं संगठित जीवों पर
इन्हें लागू करना समझे। जीन, जीनोम, कोशिका, ऊतक,
अंग और तंत्रों के स्तर पर संरचना व कार्य के परस्पर
सम्बंधों का व्यापक व समग्र ज्ञान सीखने के परिणामों में और अधिक योगदान देगा।
इसके अलावा ज्ञान का यह आधार औद्योगिक अनुप्रयोग एवं विशुद्ध शोध कार्य, दोनों के लिए जीन एवं जीनोम संपादन के संदर्भ में भी काफी उपयोगी होगा।
छात्रों को प्रायोगिक अनुभव प्रदान करने तथा भविष्य में उपयोग के लिए कौशल प्रदान
करने के लिए इन समस्याओं से जुड़े लघु शोध प्रबंध हाथ में लिए जा सकते हैं। अर्जित
ज्ञान का संश्लेषण और उससे हासिल परिणाम भविष्य में यूजी एवं पीजी के छात्रों के
सीखने के परिणामों को परिभाषित करेंगे।
इस तरह जो मानव संसाधन तैयार होगा वह भविष्य की ज़रूरतों, बुनियादी तथा अनुप्रयुक्त दोनों, को पूरा करने के लिए
भली-भांति तैयार होगा। वैसे भी अब बुनियादी तथा अनुप्रयुक्त शोध को अलग-अलग करके
देखना मुनासिब नहीं है। प्रसंगवश बता दें कि यदि इस दृष्टिकोण को अपनाया जाता है
तो शिक्षकों का अध्यापन बोझ अनुकूलित और कम किया जा सकता है, हालांकि शुरू में पाठ्यक्रम की सामग्री को आकार देने के लिए थोड़ी मेहनत करना
होगी। शिक्षकों को इसके लिए तथा एकरूप तरीका अपनाने के लिए प्रशिक्षित करने की
आवश्यकता होगी।
हालांकि उपरोक्त विशेषताओं की उम्मीद जंतु विज्ञान के यूजी/पीजी के ऐसे समस्त
छात्रों से की जा सकती है, जो एक एकीकृत और अंतर-विषयी
तरीके से पारिस्थितिक तंत्र के भीतर के अंतर्सम्बंधों के आधार पर विषय का अध्ययन
करेंगे लेकिन संस्थान-संस्थान में इसका पैमाना, प्रकृति
और गहनता को लेकर भिन्नता हो सकती है। अन्य विषयों के लिए भी ऐसा ही होने की
संभावना है।
विषय कोई भी हो, अध्ययन के विषय और उससे जुड़े ‘सामाजिक
कौशल’ से सम्बंधित सीखने के परिणामों में एकरूपता लाना अनिवार्य है। विषय से जुड़े
कौशलों की एक व्यापक श्रेणी के के भीतर ज़रूरत इस बात की है कि आलोचनात्मक चिंतन, विश्लेषणात्मक और वैज्ञानिक तर्क, तार्किक सोच, सूचना एवं डिजिटल साक्षरता, और समस्याएं सुलझाने की
क्षमताएं प्रदान की जाएं एवं उनका आकलन किया जाए। ये वे गुण हैं जो यूजीसी की कोर
समिति द्वारा यूजी/पीजी के प्रत्येक छात्र के लिए निर्धारित किए गए हैं।
यदि विज्ञान के विभिन्न विषयों के विभिन्न टॉपिक्स को पढ़ाने के इन तरीकों को अपनाया जाता है, जिसमें विषयों को अनुप्रयोगों के एक दायरे से जोड़ा जाएगा, तो उससे लोगों और भावी पीढ़ियों में विश्वास पैदा होगा क्योंकि इससे उनकी सामाजिक ज़रूरतों की पूर्ति होगी। जो लोग खोजी अनुसंधान की क्षमता दर्शाते हैं उन्हें किसी अप्रासंगिक खोज को दोहराते रहने की बजाय अपनी जिज्ञासा से उभरे अनूठे सवालों के जवाब खोजने का मौका दिया जा सकता है। आखिरकार, प्राप्त शिक्षा और इसके सीखने के परिणाम या तो नए ज्ञान के रूप में होना चाहिए या फिर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सामाजिक लाभों के रूप में या शायद दोनों रूपों में होने चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए कि आज का तथाकथित ‘बुनियादी’ ज्ञान कल एक अनुप्रयोगी मूल्य प्राप्त कर सकता है। विषय क्षेत्रों की बुनियादी और एकीकृत वैचारिक समझ में स्पष्टता आविष्कारों, खोजों और नवाचार का आधार है। यह समय एसएंडटी मिशन और राष्ट्र निर्माण को पूरा करने के लिए उच्च शिक्षा प्रणाली में पाठ्यक्रम और सीखने के परिणामों को आकार देने का है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://dailytimes.com.pk/assets/uploads/2018/02/14/Science-education.jpg
विश्वविद्यालय महज़ डिग्री और डिप्लोमा प्रदान करने वाली
संस्था नहीं होती। यह समाज का वह हिस्सा है जहां ज्ञान का सृजन, नए विचारों का विकास, नवाचार और गहन चिंतन का पोषण
होता है। उच्च गुणवत्ता वाले विश्वविद्यालय एक ऐसा माहौल प्रदान करते हैं जहां
छात्र महान वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, सामाजिक विचारकों और प्रशासकों के रूप में तैयार होते हैं। अधिकांश विकसित
देशों में विश्वविद्यालयों की प्रयोगशालाएं वे स्थान होती हैं जहां नवाचार के साथ
नई प्रक्रियाओं और उत्पादों का विकास होता है जिससे उद्योगों को बढ़त हासिल करने
में मदद मिलती है। संक्षेप में, किसी समाज की प्रगति का अनुमान
विश्वविद्यालयों की मज़बूती से लगाया जा सकता है जो युवाओं को भविष्य के नेताओं, शोधकर्ताओं और शिक्षकों में बदल सकते हैं।
भारतीय युवाओं की एक बड़ी आबादी, खासकर समाज के गरीब तबकों और
ग्रामीण क्षेत्रों की आबादी, को राज्य द्वारा वित्त-पोषित
विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के माध्यम से प्रदान की जाने वाली उच्च शिक्षा से
अत्यधिक लाभ होता है। सी.वी. रमन, हर गोबिंद खुराना, वी. रामकृष्ण और अमर्त्य सेन जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भी अपनी शिक्षा
राज्य द्वारा वित्त-पोषित विश्वविद्यालयों से प्राप्त की है। आज भी गरीब वर्ग के
छात्र केवल ऐसे ही विश्वविद्यालयों में अध्ययन का खर्च वहन कर सकते हैं। आज़ादी के
बाद,
इन विश्वविद्यालयों ने ही देश के विकास के लिए ज़रूरी बड़ी
संख्या में शिक्षित जनशक्ति की आवश्यकता को पूरा किया। भारतीय विश्वविद्यालयों और
उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षित एवं प्रशिक्षित लोगों के दम पर ही देश कृषि, अंतरिक्ष,
परमाणु ऊर्जा और स्वास्थ्य सेवा में उपलब्धियां हासिल कर
सका है। अलबत्ता,
जब अनुसंधान, नए ज्ञान के सृजन और नवाचार की
बात आती है,
तो हमारे विश्वविद्यालय पिछड़े मालूम होते हैं। वैश्विक
चुनौतियों का सामना करने के लिए उन्हें काफी सुधार की आवश्यकता है।
प्रतिष्ठित शिक्षाविद, अर्थशास्त्री और टेक्नोक्रैट
इस बात से सहमत हैं कि एक शिक्षित समाज, शिक्षित अर्थव्यवस्था के
लिए महत्वपूर्ण चालक शक्ति है। उच्च शिक्षा के साथ जब अनुसंधान जुड़ जाता है, तो वह ज्ञान का निर्माण करता है और ज्ञान के आधार के सतत विकास को संभव बनाता
है। रचनात्मकता के साथ ज्ञान का ठोस आधार नवाचार का पोषण करता है। समाज को उच्च आय
वाली अर्थव्यवस्थाओं में बदलने की इस महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता देते हुए
तथाकथित ‘उभरती हुई अर्थव्यवस्था’ वाले देशों ने अपने विश्वविद्यालयों में
अनुसंधान की गुणवत्ता में काफी सुधार किया है। विश्व के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों
में चीन,
दक्षिण कोरिया और ब्राज़ील के कई विश्वविद्यालय हैं। इन
देशों के अन्य विश्वविद्यालय शीर्ष रैंकिंग पर पहुंचने के लिए हर आवश्यक प्रयत्न
कर रहे हैं। हालांकि भारत में भी हमने महसूस किया है कि विश्वविद्यालय ज्ञान और
नवाचार की पौधशालाएं हैं लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि अकादमिक नेतृत्व इसको हासिल
करने के तरीकों को लेकर अनभिज्ञ है।
35 वर्ष से कम आयु वाले युवाओं की सबसे बड़ी संख्या के साथ अपनी विशाल जनांकिक
क्षमता के दम पर भारत अनुसंधान के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्रदान
करके अपनी इस क्षमता का उपयोग कर सकता है। इस तरह का योग्य मानव संसाधन, ज्ञान-आधारित और विनिर्माण दोनों तरह के उद्योगों, के
विस्तार के लिए अनिवार्य है। यदि हम अपने विश्वविद्यालयों में शिक्षण और अनुसंधान
को बरबाद होने की अनुमति देते हैं, तो हमें या तो अपने छात्रों को
विदेश भेजना होगा या फिर विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में लाना होगा। ये दोनों
ही विकल्प काफी महंगे हैं जिनमें विदेशी धन की निकासी अधिक होगी और लाभ आबादी के
छोटे-से हिस्से को मिलेगा। इसलिए, हमारे विश्वविद्यालयों द्वारा
दी जाने वाली शिक्षा और अनुसंधान की गुणवत्ता में सुधार लाने तथा उन्हें विश्वस्तरीय
बनने के लिए प्रोत्साहित करने की तत्काल आवश्यकता है। इससे हम विदेशी छात्रों को
अपने विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के लिए आकर्षित कर पाएंगे जिससे ज्ञान के सृजन को
और बढ़ावा मिलेगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए (1) उच्च शिक्षा संस्थानों/विश्वविद्यालयों
के प्रमुख की नियुक्ति को पारदर्शी तथा योग्यता आधारित होना चाहिए और (2) विश्वविद्यालयों
की मुख्य पहचान अनुसंधान और नए ज्ञान के निर्माण में भूमिका के लिए होनी चाहिए और
इसके लिए पर्याप्त धन मिलना चाहिए।
देश के कई उच्च शिक्षा संस्थानों का अनुभव है कि किसी भी विश्वविद्यालय को
बनाना या बिगाड़ना कुलपति (वीसी) के हाथ में होता है। सभी शैक्षणिक विभागों में
फैकल्टी की नियुक्ति वीसी की अध्यक्षता वाली चयन समिति के ज़रिए की जाती है। इस बात
से यह तो स्पष्ट है कि वीसी के रूप में एक अयोग्य व्यक्ति फैकल्टी चयन करते समय
कबाड़ा कर सकता है। इस तरह विश्वविद्यालय आने वाले दो से तीन दशकों के लिए बरबाद हो
जाएगा। वीसी की भूमिका कई अन्य मामलों में भी महत्वपूर्ण होती है: विभिन्न यूजी और
पीजी पाठ्यक्रमों में उत्कृष्टता सुनिश्चित करना, उन्हें
अद्यतन बनाए रखना, अग्रणी अनुसंधान की सुविधाएं जुटाना, विभिन्न कार्यक्रमों के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विद्वानों को
लघु या दीर्घकालिक रूप से आमंत्रित करना आदि।
विश्वविद्यालयों में इस सुधार की शुरुआत सबसे शीर्ष से, कुलपति की नियुक्ति के साथ, होनी चाहिए। कुलपति नियुक्त
करने की वर्तमान प्रथा काफी पुरानी हो चुकी है और वांछनीय परिणाम नहीं दे रही है; इसलिए इसको बदलने की आवश्यकता है। वर्तमान में, प्रत्येक
वीसी के चयन के लिए एक ‘सर्च कमिटी’ का गठन किया जाता है जिसके सदस्य कुछ वरिष्ठ
शिक्षाविद होते हैं। संभावित उम्मीदवारों को या तो नामांकित किया जाता है या फिर
वे सीधे आवेदन करते हैं। इसके बाद ‘सर्च कमिटी’ तीन से पांच नामों की लघु-सूची
कुलाधिपति (या केंद्रीय विश्वविद्यालय के मामले में विज़िटर) को भेज देती है, जिनमें से एक का चयन कर लिया जाता है। वर्षों पुरानी यह प्रणाली तब अपनाई जाती
थी जब (i) केवल मुट्ठी भर विश्वविद्यालय थे; (ii) राजनीतिक हस्तक्षेप कम से कम था; और (iii) ‘सर्च कमिटी’ सच्चाई और
ईमानदारी से चयन प्रक्रिया का संचलन करने में सक्षम थी। देखा जाए तो यह पूरी
प्रक्रिया अपारदर्शी है जहां यह पता नहीं होता कि नामांकित, या फिर आवेदन करने वाले उम्मीदवार कौन-कौन हैं और लघु सूची बनाने में किन
मापदंडों का पालन किया गया है। ‘सर्च कमिटी’ द्वारा न तो कोई न्यूनतम मानक मानदंड
प्रकाशित किए जाते हैं और न ही उनका पालन किया जाता है, जिससे
राजनीतिक और मौद्रिक आधारों पर कुलपति के रूप में अयोग्य व्यक्तियों के चुने जाने
की गुंजाइश रहती है। हाल ही में विभिन्न अदालतों द्वारा सुनाए गए फैसले उपरोक्त
वास्तविकता का प्रमाण हैं। इस तरह के एक मामले में बॉम्बे के माननीय उच्च न्यायालय
ने सवाल किया था कि क्या सर्च कमिटी के सदस्य अंधे थे। पिछले कुछ दशकों के दौरान
भारत में विश्वविद्यालयों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है और कुलपतियों को
नियुक्त करने की प्रथा ने स्पष्ट रूप से यह वांछनीय परिणाम नहीं दिया है कि
वास्तविक अकादमिक नेता हमारे विश्वविद्यालयों के मुखिया बनें। हमें कुलपतियों के
चयन और उनकी नियुक्ति के लिए एक नई पद्धति विकसित करने की आवश्यकता है। और इसकी
शुरुआत केंद्र सरकार द्वारा वित्त-पोषित विश्वविद्यालयों से की जा सकती है।
विश्वविद्यालय प्रत्येक कुलपति चयन के लिए ‘सर्च कमिटी’ गठन की प्रथा को खत्म
कर सकते हैं। एक उच्च शिक्षा नियुक्ति समिति (HEAC) का गठन किया जाना चाहिए जिसमें कम से कम 20 प्रतिष्ठित शिक्षाविद सदस्य हों।
HEAC सदस्यों का नामांकन विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, मानविकी एवं भाषा, इंजीनियरिंग और चिकित्सा अकादमियों द्वारा
किया जा सकता है। सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए एक ही समिति होगी और किसी
भी विश्वविद्यालय के कुलपति का चयन विज्ञापन के द्वारा अनिवार्य रूप से प्रतिष्ठित
विद्वानों और शिक्षाविदों को आवेदन करने के लिए आमंत्रित करके किया जाएगा। एक
निश्चित न्यूनतम मानदंड निर्धारित और प्रकाशित किया जाना चाहिए और जो इन मानदंडों
को पूरा करते हैं तथा जिनके पास शिक्षण और अनुसंधान में उत्कृष्टता के गुण हैं
केवल उन्हीं को HEAC द्वारा शार्टलिस्ट किया जाना चाहिए। इसमें से पांच शार्टलिस्ट किए गए
उम्मीदवारों का पूरा बायोडैटा प्रकाशित किया जाना चाहिए और आम लोगों को आपत्तियां
दाखिल करने को आमंत्रित किया जाना चाहिए। यदि वैध कारणों और प्रमाणों के साथ किसी
उम्मीदवार को लेकर कोई आपत्ति है तो उसे सार्वजनिक रूप से ज़ाहिर किया जाना चाहिए।
इसके बाद प्राप्त आपत्तियों का HEAC द्वारा मूल्यांकन करके
पैनल से उम्मीदवारों को स्वीकार या अस्वीकार किया जा सकता है। शार्टलिस्ट किए गए
उम्मीदवारों की अंतिम सूची उस विश्वविद्यालय को भेजी जाएगी जिसके लिए कुलपति का पद
भरा जाना है। अकादमिक परिषद या सीनेट और प्रोफेसरों, एसोसिएट
प्रोफेसरों और सहायक प्रोफेसरों के निकाय को कुलपति के रूप में उनमें से एक का
चुनाव करना चाहिए। कार्यकारी परिषद या विश्वविद्यालय के सर्वोच्य प्रशासनिक निकाय
को वीसी के रूप में निर्वाचित उम्मीदवार को नियुक्त करने का अधिकार होना चाहिए।
उपर्युक्त तंत्र के माध्यम से कुलपति की नियुक्ति से पारदर्शिता और लोकतांत्रिक
पद्धति को बढ़ावा मिलेगा और नौकरशाही और राजनैतिक हस्तक्षेप से छुटकारा मिलेगा।
इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि हमारे विश्वविद्यालयों का नेतृत्व संजीदा
शिक्षाविदों के हाथों में होगा जिसका परिणाम बेहतर शिक्षा और अनुसंधान के रूप में
सामने आएगा। मोटे तौर पर ऊपर सुझाया गया तरीका अधिकांश विकसित देशों में विश्वविद्यालयों
के कार्यकारी प्रमुखों की नियुक्ति में अपनाया जाता है।
आज़ादी के तुरंत बाद अनुसंधान संस्थानों और प्रयोगशालाओं की स्थापना तो की गई
लेकिन विश्वविद्यालयों में अनुसंधान की बड़े पैमाने पर उपेक्षा की गई। विश्वविद्यालयों
को प्रयोगशालाएं स्थापित करने के लिए धन से वंचित किया गया और फैकल्टी तथा छात्रों
को अनुसंधान संस्थानों और प्रयोगशालाओं में विकसित सुविधाओं तक काफी कम पहुंच
हासिल है। विश्वविद्यालय ऊर्जा से भरपूर युवाओं और जिज्ञासु छात्रों से भरे पड़े
हैं जो विशेषज्ञ फैकल्टी के उचित मार्गदर्शन में शोध एवं नवाचार करने में सक्षम
हैं। छात्रों द्वारा रचनात्मक अनुसंधान कार्य स्नातक-पूर्व तथा स्नातक कार्यक्रमों
के तहत न्यूनतम वित्तीय सहायता के साथ किया जा सकता है। विश्वविद्यालयों और उच्च
शिक्षण संस्थानों को पर्याप्त बुनियादी संरचना, प्रयोगशाला
और उपकरण उपलब्ध कराने से वे ज्ञान सृजन के केंद्र बन जाएंगे।
भारत में स्नातक शिक्षा ज़्यादातर उन कॉलेजों के हवाले छोड़ दी जाती है जहां शोध
करने की सुविधाएं कम या बिलकुल भी नहीं होती हैं। अघिकांश मामलों में स्नातक
शिक्षा की गुणवत्ता आवश्यक स्तर से भी नीचे होती है जिसके चलते विश्वविद्यालयों
में स्नातकोत्तर (पीजी) कार्यक्रमों में भर्ती होने वाले छात्रों को पीजी की पढ़ाई
शुरू करने के पहले मूलभूत सिद्धांत पढ़ाए जाते हैं। इसके कारण उनको अपने पीजी
कार्यक्रम के तहत शोध करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता है। इसलिए यह ज़रूरी है
कि भारतीय विश्वविद्यालयों में स्नातक कार्यक्रम शुरू किए जाएं और उन्हें पीजी
कार्यक्रमों के साथ जोड़ा जाए। इस नज़रिए को प्रोफेसर के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता
में एक समिति द्वारा नई शिक्षा नीति प्रारूप में शामिल किया गया है।
यूजी कार्यक्रम के छात्रों को अपनी शिक्षा में शोध कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अनुसंधान को पाठ्यक्रम में उसी तरह जोड़ा जा सकता है जैसे थ्योरी समझने के लिए प्रैक्टिकल या प्रयोगशाला कार्य किया जाता है। इसके अलावा, अनुसंधान पर एक अलग कोर्स होना चाहिए (जैसे प्रोजेक्ट) जिसको चार से छह क्रेडिट दिए जा सकते हैं। इस प्रकार युवा स्नातक छात्रों को अवधारणाओं और अनुसंधान की कार्यप्रणाली से परिचित कराया जा सकता है जिससे उनको अनुभवात्मक शिक्षा मिल सकती है। विश्वविद्यालय के विभागों, आईआईटी, एनआईटी और सीएसआईआर प्रयोगशालाओं में यूजी छात्रों के लिए ग्रीष्मकालीन इंटर्नशिप की सुविधा होनी चाहिए। जब ऐसे छात्र पीजी कार्यक्रमों में दाखिला लेंगे तो वे उन्नत शोध करने के लिए तैयार होंगे। इस प्रकार विश्वविद्यालयों और चयनित कॉलेजों में उपलब्ध सक्षम और योग्य फैकल्टी सदस्यों के मार्गदर्शन में काफी बड़ी मात्रा में अनुसंधान किया जा सकता है। शोध की ऐसी व्यापक बुनियाद नवाचार के लिए आवश्यक ज्ञान का सृजन करेगी। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://akm-img-a-in.tosshub.com/indiatoday/images/story/201606/collage-647_062216121838.jpg