टीकों में एल्युमिनियम को लेकर छिड़ी बहस

डॉ. सुशील जोशी

हाल में इस बात को लेकर विवाद पैदा हो गया है कि टीकों में एल्युमिनियम (aluminum in vaccines) के उपयोग से शारीरिक नुकसान होता है और इसकी वजह से ऑटिज़्म (autism) जैसी तकलीफों में वृद्धि हो रही है। यह विवाद अमेरिका में चल रहा है। लेकिन उस विवाद में जाने से पहले यह देखना लाभप्रद होगा कि टीके काम कैसे करते हैं और उनमें एल्युमिनियम के उपयोग का आधार क्या है।

सरल शब्दों में कहें तो टीके (vaccination) किसी रोगजनक (pathogen) की नकल करते पदार्थ होते हैं जो रोग पैदा नहीं करते। तकनीकी शब्दों में इन टीकों पर उस रोगजनक का कोई अणु होता है जिसे एंटीजन कहते हैं। जब यह एंटीजन शरीर में पहुंचता है तो शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र (immune system) की कोशिकाएं इस पर हमला करती हैं और हमला करते हुए वे सीख जाती हैं कि यह कोई हानिकारक चीज़ है और इसे कैसे निष्क्रिय करना है। यही स्थिति तब भी होती है जब वास्तविक रोगजनक शरीर में पहुंचता है। प्रतिरक्षा तंत्र उससे निपटने की कोशिश करता है और कई बार निपट भी लेता है। टीके इसी संघर्ष के लिए प्रतिरक्षा तंत्र को तैयार करते हैं। हाल में टीकों पर जो शोध कार्य हुआ है उसे छोड़ दिया जाए तो टीके दो प्रकार के होते हैं – एक प्रकार वह है जिसमें वास्तविक रोगजनक को जीवित अवस्था में दुर्बल करके (सैबिन द्वारा विकसित पोलियो (oral polio vaccine) का जीवित दुर्बल टीका) या मारकर (सैबिन का मृत पोलियो वायरस टीका) इस्तेमाल किया जाता है और दूसरा प्रकार वह है जिसमें रोगजनक के एंटीजन को पृथक करके इस्तेमाल किया जाता है (जैसे डिफ्थीरिया-टिटेनस-पर्टूसिस (DPT vaccine) या हिपेटाइटिस (hepatitis vaccine) ए व बी के टीके)।

इसके बाद मामला आता है एल्युमिनियम (aluminum adjuvant) का। दरअसल, एल्युमिनियम टीके के साथ एक सह-औषध (एडजुवेंट- adjuvant) के तौर पर मिलाया जाता है। अलबत्ता, यही एकमात्र एडजुवेंट नहीं है। पिछले लगभग 40 सालों में वैज्ञानिकों ने शोध करके कई एडजुवेंट (vaccine adjuvants) पहचाने हैं और इस्तेमाल किए हैं। वैसे तो कई लोगों में टीकों को लेकर ही शंकाएं हैं और वे मानते हैं कि टीके हानिकारक होते हैं। खैर, फिलहाल बात करते हैं एडजुवेंट्स की चूंकि वर्तमान विवाद का मुद्दा यही है।

टीकों का उपयोग तो काफी पहले शुरू हो चुका था। इसका श्रेय एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) को दिया जाता है जिन्होंने 1796 में पहली बार एक लड़के को चेचक का टीका (smallpox vaccine) लगाया था। 1926 में एक प्रतिरक्षा वैज्ञानिक एलेंक्जेंडर थॉमस ग्लेनी (Alexander Glenny) ने एक महत्वपूर्ण अवलोकन किया था जिसने एडजुवेंट की बुनियाद रखी थी। उन्होंने देखा कि यदि टीकाकरण से पहले घुलनशील एंटीजन को फिटकरी (एल्यूमिनियम पोटेशियम सल्फेट) के साथ रखा जाए तो वह एंटीजन फिटकरी के साथ अवक्षेपित हो जाता है और इस प्रकार उपचारित एंटीजन कहीं बेहतर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। यह प्रक्रिया लगभग वैसी ही है जैसी मटमैले पानी को साफ करने के लिए फिटकरी का उपयोग। उन्होंने ये प्रयोग गिनी पिग पर किए थे और देखा था कि अवक्षेपित एंटीजन से उनमें एंटीबॉडी का उत्पादन अधिक होता है। इसी बाहर से मिलाए गए पदार्थ को एडजुवेंट कहते हैं।

इस खोज के बाद सबसे पहले एल्यूमिनियम लवण (aluminum salts) एडजुवेंट का उपयोग टिटेनस (tetanus vaccine) तथा डिफ्थीरिया टॉक्साइड के टीकों (diphtheria vaccine) में किया गया था। आजकल तो दुनिया भर में अघुलनशील एल्युमिनियम लवणों का उपयोग विभिन्न टीकों में किया जाता है।

वैसे 1940 के दशक में जूल्स फ्रायंड (Jules Freund) ने एडजुवेंट की एक और किस्म विकसित की थी। ये पानी और तेल के इमल्शन थे जो एंटीजन के साथ दिए जाने पर एंटीजन की उम्र बढ़ा देते हैं और वह काफी समय तक प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय रखता है। अलबत्ता, फ्रायंड के एडजुवेंट का उपयोग सीमित ही रहा है।

यहां एक सवाल यह उठता है कि ये एडजुवेंट करते क्या हैं। रोचक बात है कि एडजुवेंट्स (immune adjuvants) का उपयोग करते हमें एक सदी बीत चुकी है लेकिन आज भी इनकी क्रियाविधि (mechanism of action) को लेकर बहुत स्पष्टता नहीं है। काफी अनुसंधान के बाद यह समझ में आया है कि एडजुवेंट दो-तीन तरह से काम करते हैं और टीके की प्रभावशीलता या उनकी क्रियाशील अवधि को बढ़ाते हैं। एक तरीका तो यह है कि एडजुवेंट शरीर में एंटीजन के प्रसार में मदद करते हैं और इस तरह से प्रतिरक्षा तंत्र की ज़्यादा कोशिकाएं उसके संपर्क में आती हैं। इसके अलावा इमल्शन में घुले हुए एंटीजन अपेक्षाकृत धीरे-धीरे विघटित होते हैं। इसके चलते प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया देर तक बनी रहती है और दीर्घावधि प्रतिरक्षा (long-term immunity) प्राप्त होती है।

दूसरा तरीका यह है कि (खास तौर से एल्युमिनियम लवण जैसे एडजुवेंट (aluminum-based adjuvants)) एंटीजन से जुड़ जाते हैं और उसे प्रतिरक्षा कोशिकाओं में प्रवेश करने में मदद करते हैं। ये प्रतिरक्षा कोशिकाएं जन्मजात प्रतिरक्षा का हिस्सा होती हैं। जब एंटीजन इनमें प्रवेश करता है तो कोशिका उसे प्रोसेस करती है और परिणाम यह होता है कि वह कोशिका की सतह पर दिखने लगता है। अब ये कोशिकाएं अनुकूली प्रतिरक्षा (adaptive immunity) कोशिकाओं (जैसे टी कोशिकाओं) के संपर्क में आती हैं और टी कोशिकाएं उस एंटीजन को पहचानकर आगे की कार्रवाई शुरू कर देती हैं। कहने का मतलब है कि जन्मजात प्रतिरक्षा तंत्र अनुकूली प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय करता है और एडजुवेंट इसमें मदद करते हैं।

अर्थात कुल मिलाकर एडजुवेंट अनुकूली प्रतिरक्षा कोशिकाओं को सक्रिय करने में और एंटीजन को देर तक शरीर में टिके रहने में मदद करते हैं।

अब आते हैं एल्युमिनियम (aluminum exposure) पर। सबसे पहले तो यह जान लेना ज़रूरी है कि टीकों में एडजुवेंट के तौर पर एल्युमिनियम लवणों का उपयोग एक सदी से होता आया है। लिहाज़ा इनके उपयोग का परीक्षण और जांच भी सबसे अधिक हुई है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि एल्यूमिनियम से हमारा संपर्क कई तरह से होता है – खानपान (dietary aluminum) के साथ और हवा के ज़रिए। मानव शरीर में एल्युमिनियम का अवशोषण पाचन तंत्र और श्वसन तंत्र में होता है। फिर इसे बाहर निकालने का काम होता है। बहरहाल, एक इंसान द्वारा सांस के साथ लिए गए एल्युमिनियम में से 3 प्रतिशत और खानपान के रूप में लिए गए एल्युमिनियम में से 1 प्रतिशत पूरे शरीर में फैल जाता है। वैसे शरीर में जमा कुल एल्युमिनियम में से 95 प्रतिशत तो खानपान के साथ आता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization – WHO) ने कुल अंतर्ग्रहित एल्युमिनियम की मात्रा तय की है – 1 मिलीग्राम/प्रति किलोग्राम प्रतिदिन (safe intake limit)। यानी यदि आपका वज़न 60 किलो है तो अधिकतम 60 मि.ग्रा. एल्युमिनियम ले सकते हैं। इसके अलावा इंजेक्शन से दिया जाने वाला एल्युमिनियम तो खून के ज़रिए पूरे शरीर में फैल सकता है। इसलिए निर्धारित किया गया है कि ऐसे किसी भी घोल में एल्युमिनियम प्रति लीटर 25 ग्राम से कम होना चाहिए (vaccine safety)।

एक बार अवशोषित होने के बाद एल्युमिनियम हड्डियों, लीवर, फेफड़ों तथा तंत्रिका तंत्र (nervous system) में जमा हो जाता है। सामान्यत: यह धीरे-धीरे उत्सर्जित किया जाता है लेकिन गुर्दों की समस्याओं से ग्रस्त लोगों में उत्सर्जन बहुत प्रभावी नहीं होता। ऐसे लोगों में काफी सारा एल्युमिनियम मस्तिष्क में जमा हो सकता है। इसे लेकर कई प्रयोग हुए हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि वयस्कों में स्थायी रूप से जमा हुए एल्युमिनियम की मात्रा 30-50 मिलीग्राम ही पाई गई है।

टीके की प्रति खुराक में एल्युमिनियम की अधिकतम मात्रा भी निर्धारित की गई है। जैसे युरोप में यह मात्रा प्रति खुराक 1.25 मि.ग्रा. और यूएस में 0.85 मि.ग्रा. प्रति खुराक है। भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित मानकों का उपयोग होता है। गौरतलब है कि हम खानपान के ज़रिए प्रतिदिन इससे कहीं अधिक मात्रा में एल्युमिनियम का सेवन करते हैं। एक बड़ा अंतर यह भी है कि टीकों में एल्युमिनियम अघुलनशील लवणों के रूप में होता है जबकि खानपान में प्राय: घुलनशील लवण पाए जाते हैं। लिहाज़ा, टीकों के एल्युमिनियम का शरीर में अवशोषण अपेक्षाकृत कम होता है।

जंतुओं पर किए गए कुछ प्रयोगों में पता चला है कि 0.85 ग्राम एल्युमिनियम देने पर सीरम में एल्युमिनियम की मात्रा 2 माइक्रोग्राम प्रति लीटर रही जो सामान्य स्तर से महज 7 प्रतिशत थी। इस प्रयोग में यह भी देखा गया था कि मस्तिष्क में एल्युमिनियम की मात्रा (brain aluminum levels) कितनी रही। देखा गया कि मस्तिष्क में एल्युमिनियम 0.0001 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम बढ़ा जो मस्तिष्क में एल्युमिनियम के सामान्य औसत (0.2 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम) से 2000 गुना कम है। यह संभव है कि गुर्दों की दिक्कत से पीड़ित लोगों में यह स्तर ज़्यादा होता होगा। वैसे तंत्रिका-क्षति तथा उससे जुड़े रोगों के एल्युमिनियम से सम्बंध को लेकर कोई ठोस प्रमाण भी नहीं हैं।

कुछ समय से टीकों को लेकर एक और शंका जताई जा रही है। कहा गया है कि टीके प्रतिरक्षा तंत्र को स्वयं अपनी शरीर की कोशिकाओं के विरुद्ध सक्रिय कर सकते हैं। हालांकि यह भी सामने आया है कि ऐसी प्रतिक्रिया कतिपय अन्य कारकों (जैसे किसी संक्रामक इकाई) की उपस्थिति की वजह से होती है और उस कारक को हटाने पर वह प्रतिक्रिया भी समाप्त हो जाती है।

निष्कर्ष के तौर पर, एल्युमिनियम एडजुवेंट को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, उनका कोई वैज्ञानिक या ऐतिहासिक आधार नहीं है। दरअसल, टीकों ने और टीकों में जोड़े गए एडजुवेंट्स ने हमें कई रोगों से बचाया है। एडजुवेंट जोड़ने से एंटीजन की कम मात्रा इंजेक्ट करना होती है और वे दीर्घावधि सुरक्षा प्रदान करते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दृष्टि बहाली के लिए एक मॉडल जीव घोंघा

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

काश ऐसा कोई स्विच होता जो ऑन होकर हमें आंखों की रोशनी (vision restoration) जैसी असाधारण क्षमताएं वापिस दे सकता? मनुष्यों और कई अन्य प्रजातियों की आंखें कैमरे की तरह होती हैं; आंख में एक लेंस होता है जो प्रकाश को रेटिना पर फोकस करता है। पुनर्जनन (regeneration) आंखों की उस क्षमता को कहेंगे जिसमें वह पूरी तरह से हटाए जाने या घायल हो जाने के बाद फिर से अपना निर्माण कर सके। नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) में एलिस एकोर्सी और एलेज़ांद्रो सांचेज़ अल्वारेडो की टीम ने अपने हालिया काम में दिखाया है कि गोल्डन एप्पल घोंघे में आंख का ऐसा पुनर्निर्माण कैसे होता है।

घोंघा एक मोलस्क (mollusk) जीव है, यानी अकेशरुकी (invertebrate) जीव जिसके ऊपर खोल होती है और वह भूमि और पानी दोनों में अच्छी तरह से जीवित रह सकता है।

घोंघे में पुनर्जनन का यह कारनामा कोई जादू नहीं है, बल्कि सुंदर आणविक संयोजन (molecular mechanisms) का नतीजा है। जब घोंघा अपनी एक आंख खो देता है तो हज़ारों जीन स्विच (खटकों) की तरह ऑन हो जाते हैं: पहले वे स्विच ऑन होते हैं जो घाव भरने में मदद करते हैं, फिर वे जीन सक्रिय होते हैं जो कोशिकाओं के विकास और विभाजन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं, उसके बाद नई रेटिना कोशिकाओं, प्रकाशग्रहियों और लेंस के निर्माण के लिए ज़िम्मेदार अलग-अलग जीन/नेटवर्क सक्रिय होते हैं। इनमें से एक जीन, PAX6 (eye development gene), आंख के प्रारंभिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। घोंघे में, यह प्रक्रिया कई अन्य जीन्स द्वारा सावधानीपूर्वक प्रबंधित की जाती है। इसमें नई तंत्रिका कोशिकाओं को बनाने वाले जीन, तंत्रिका तंतुओं को उनके सही लक्ष्यों तक पहुंचाने वाले और प्रकाश को ताड़ने के लिए ज़िम्मेदार जीन शामिल हैं। आंख एकदम ठीक तरीके से विकसित हो, इसे सुनिश्चित करने के लिए इनमें से प्रत्येक जीन एकदम ठीक चरण पर सक्रिय हो जाता है।

फिलहाल, हम मनुष्य ऐसा नहीं कर सकते हैं, लेकिन इन जेनेटिक ट्रिगर्स (genetic triggers) को समझकर एक दिन हम अपनी सुप्त पुनर्निर्माण प्रणाली (regenerative system) को सक्रिय कर पाएंगे।

जिस तरह घोंघे अपनी आंखें फिर से विकसित सकते हैं, उसी तरह मेंढक, प्लेनेरिया (planaria) और अफ्रीकी कांटेदार चूहे (African spiny mouse) जैसे अन्य जीवों में भी मज़बूत पुनर्जनन क्षमताएं होती हैं। एक तरह के सैलेमेंडर (एक्सोलोट्ल- (axolotl)) में क्षतिग्रस्त ऊतक हरफनमौला स्टेम कोशिका (stem cells) जैसे बन सकते हैं और हड्डियों, मांसपेशियों और शरीर के अन्य अंगों का पुनर्निर्माण कर सकते हैं। क्रिस्पर (CRISPR gene editing)  एक जीन-संपादन तकनीक है, जिसकी मदद से हम अपनी वांछित जीनोम संरचना को फिर से डिज़ाइन कर सकते हैं, रीमॉडल कर सकते हैं और पुनर्निर्मित कर सकते हैं।

हैदराबाद के एल. वी. प्रसाद आई इंस्टीट्यूट (LV Prasad Eye Institute) में, वैज्ञानिकों ने ज़ेब्राफिश (zebrafish model) को जंतु मॉडल के तौर पर इस्तेमाल करके लेबर कॉन्जेनाइटल एमॉरोसिस (LCA) (Leber Congenital Amaurosis – LCA) और स्टारगार्ड्ट (Stargardt disease) जैसी आंखों की जेनेटिक बीमारियों को ठीक करने के लिए क्रिस्पर तकनीक का इस्तेमाल किया है।

जंतुओं से मनुष्यों तक

शुरुआती परीक्षणों में पहले से ही क्रिस्पर संपादन का इस्तेमाल करके मनुष्यों की जेनेटिक बीमारियों (genetic disorders) को दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं, जैसे सिकल सेल एनीमिया (sickle cell anemia); β-थैलेसीमिया (beta thalassemia), जन्मजात खून की कमी; और LCA (genetic blindness), जो एक तरह का जन्मजात अंधापन है।

हाल ही में, हार्वर्ड युनिवर्सिटी (Harvard University) की एक टीम द्वारा क्रिस्पर तकनीक का इस्तेमाल करके मनुष्यों में LCA के इलाज के लिए किए जा रहे पहले क्लीनिकल परीक्षण (clinical trials) के नतीजे सामने आए हैं। ये नतीजे दी न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुए हैं जिसमें जन्मांधता से पीड़ित लोगों की दृष्टि में सुधार दिखाई दिया है। यह प्रयास, जंतु मॉडल में पुनर्जनन को समझकर मानव कोशिकाओं में मरम्मत प्रोग्राम को फिर से सक्रिय कर सकने की उम्मीद जगाता है। यह जीन-निर्देशित पुनर्जनन चिकित्सा (gene-guided regenerative medicine) के लिए एक फ्रेमवर्क देता है।

ये उदाहरण हमें याद दिलाते हैं कि पुनर्जनन (biological regeneration) कोई दुर्लभ चमत्कार नहीं है। बल्कि यह एक प्राचीन जैविक कार्यप्रणाली (biological process) है जो अभी भी कई प्रजातियों के DNA (genetic code) में अंकित है, और जिसे विज्ञान धीरे-धीरे समझना और फिर से सक्रिय करना सीख रहा है।

गोल्डन एप्पल घोंघे (golden apple snail study) पर किए गए नए अध्ययन ने खुलासा किया है कि कैसे उसका जीनोम (genome memory) उस अंग को पुनर्निर्मित करना याद रखता है जिसे दोबारा बनाना हमें असाध्य लगता है। और, घोंघे की इस याददाश्त (biological memory) को डीकोड करके चिकित्सा विज्ञान मनुष्य की आंखों को बहाल करने की क्षमता के करीब पहुंच सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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उम्र के साथ मस्तिष्क में परिवर्तन

इंसानी मस्तिष्क उम्र के साथ लगातार बदलता (human brain aging) है। बचपन से बुढ़ापे तक हमारी सीखने, याद रखने, सोचने और अनुकूलन की क्षमता कई बार बदलती है। एक बड़े अध्ययन से पता चला है कि मस्तिष्क की आंतरिक ‘वायरिंग’ (brain connectivity) के विकास के चार प्रमुख पड़ाव होते हैं, जो लगभग 9, 32, 66 और 83 साल की उम्र के आसपास दिखाई देते हैं। शायद इसी वजह से बचपन में सीखना आसान लगता है, युवाओं की सोच तेज़ होती है, और उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त और मानसिक क्षमता घटने लगती है।

इस शोध में यूके और अमेरिका के करीब 3800 लोगों (सभी गोरे और किसी तंत्रिका क्षति से रहित) के एमआरआई स्कैन का विश्लेषण (MRI brain study) किया गया – इनमें नवजात शिशु से लेकर 90 वर्ष तक के लोग शामिल थे। पहले के अध्ययनों में माना जाता था कि शरीर में उम्र बढ़ने के बड़े बदलाव 40, 60 और 80 की उम्र पर दिखते हैं, लेकिन मस्तिष्क की जटिलता के चलते इन परिवर्तनों को समझना मुश्किल है। मस्तिष्क में मूलत: दो भाग होते हैं – व्हाइट मैटर और ग्रे मैटर (white matter, grey matter)। व्हाइट मैटर मुख्य रूप से तंत्रिकाओं से बना होता है जिनसे लंबे-लंबे तंतु निकलते हैं। इन तंतुओं को एक्सॉन कहते हैं। ग्रे मैटर के अलग-अलग हिस्से व्हाइट मैटर के इन्हीं एक्सॉन के ज़रिए जुड़े होते हैं। एक्सॉन ऐसे तंतु हैं जो सूचना को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचाते हैं। ये तंतु जितने लंबे, घने या मज़बूत होते हैं, उतना ही मस्तिष्क के हिस्से एक-दूसरे से बेहतर संवाद कर पाते हैं।

चरण 1: जन्म से 9 वर्ष – कई सारे नए कनेक्शन, लेकिन कम क्षमता

बचपन में मस्तिष्क के व्हाइट मैटर के एक्सॉन लंबे और उलझे हुए होते हैं, जिससे सूचना का प्रवाह धीमा और कम प्रभावी हो जाता है। लगता है कि मस्तिष्क धीरे-धीरे उन तंत्रिकाओं की छंटनी कर देता है जो उपयोगी नहीं हैं जबकि कुछ तंत्रिकाओं को प्राथमिकता देता है जो भाषा, गति, तर्क, और नई क्षमताएं सीखने (child brain development) में मददगार होती हैं।

चरण 2: 9 से 32 वर्ष तेज़ी, छंटाई, और सोचने की चरम क्षमता

लगभग 9 साल की उम्र के बाद स्थिति बदलने लगती है। किशोरावस्था और हार्मोनल बदलावों के प्रभाव से मस्तिष्क अपने नेटवर्क को व्यवस्थित करता है। गैर-ज़रूरी कनेक्शन हटने लगते हैं, और ज़रूरी कनेक्शन छोटे व तेज़ बन जाते हैं। इसी समय योजना बनाने, फैसले लेने, याद रखने और भावनाओं को संभालने जैसी क्षमताएं मज़बूत होती हैं। इस अवधि में संज्ञान क्षमता अपने चरम (cognitive peak performance) पर होती है।

चरण 3: 32 से 66 वर्ष – क्षमताओं में धीरे-धीरे गिरावट

30 से लेकर 60 की उम्र में बदलाव जारी तो रहता है, लेकिन बहुत धीमी गति से। कुल मिलाकर, अलग-अलग हिस्सों के बीच जानकारी पहुंचाने की क्षमता थोड़ी कम होने लगती है – यानी दिमाग के दूरस्थ हिस्सों के बीच संदेश पहुंचने में थोड़ा ज़्यादा समय लगता है। वैज्ञानिक अभी ठीक-ठीक नहीं जानते कि ऐसा क्यों होता है, लेकिन इसका कारण उम्र बढ़ना, लगातार तनाव, या जीवन की जिम्मेदारियां जैसे बच्चे, नौकरी का दबाव या कम नींद हो सकते हैं (brain aging slowdown)।

चरण 4: 66 से 83 वर्ष – पास के कनेक्शन मज़बूत, दूर के कनेक्शन कमज़ोर

66 वर्ष के बाद दिमाग में एक नया पैटर्न दिखाई देता है। किसी एक हिस्से के भीतर के कनेक्शन तो ठीक रहते हैं, लेकिन दूर-दराज़ के हिस्सों के बीच के कनेक्शन कमज़ोर होने लगते हैं। यही समय स्मृतिभ्रंश (डिमेंशिया- dementia risk) के बढ़ते जोखिम से भी जुड़ा होता है। इससे संकेत मिलता है कि लंबी दूरी के कनेक्शनों की कमज़ोरी बुज़ुर्गों में शुरुआती मानसिक गिरावट में भूमिका निभा सकती है।

चरण 5: 83 से 90 वर्ष – मस्तिष्क का कुछ केंद्रों पर निर्भर होना

इस अंतिम चरण में मस्तिष्क की वायरिंग और कमज़ोर हो जाती है। पहले जहां कई हिस्से सीधे-सीधे जुड़कर जानकारी भेजते थे, वहीं अब मस्तिष्क जानकारी को कुछ चुनिंदा और महत्वपूर्ण केंद्रों के ज़रिए भेजता है। यह इस बात को दिखाता है कि उम्र बढ़ने पर दिमाग के पास संसाधन कम हो जाते हैं और वह बची हुई क्षमता के साथ काम चलाने की कोशिश करता है (brain decline in old age)।

इन मुख्य पड़ावों को समझना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इससे पता चलता है कि मानसिक स्वास्थ्य की कई समस्याएं 25 साल से पहले क्यों उभरती हैं, और 65 के बाद डिमेंशिया का खतरा क्यों तेज़ी से बढ़ता है। साथ ही, यह जानकारी वैज्ञानिकों को ऐसी स्थितियों – जैसे शिज़ोफ्रेनिया, ऑटिज़्म या अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s disease) – में असामान्य दिमागी पैटर्न जल्दी पकड़ने में मदद कर सकती है। अलबत्ता, शोधकर्ता मानते हैं कि इन निष्कर्षों को दुनिया भर पर लागू करने से पहले अलग-अलग,  विविध आबादियों के अध्ययन की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

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प्यास लगना और बुझना

भीषण गर्मी में एक गिलास ठंडा पानी जितना सुकून (thirst relief) देता है, उसका कोई सानी नहीं। पहला घूंट हलक में जाते ही राहत मिलती है। तो इस राहत का राज़ क्या है?

कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के जीव वैज्ञानिक युकी ओका इस बात का अध्ययन करते हैं कि दिमाग शरीर में विभिन्न चीज़ों का संतुलन (होमियोस्टेसिस – homeostasis) कैसे बनाए रखता है, खासकर तरल पदार्थों का संतुलन कैसे बनाता है और इसके लिए पानी व खनिज लवणों का तालमेल कैसे बनाता (brain hydration mechanism) है।

दरअसल, हमारे शरीर में एक व्यवस्था है जो हमारी बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति का ख्याल रखती है। प्यास को बुझाना इनमें से एक व्यवस्था है। इस व्यवस्था की एक खासियत है कि इसके साथ ही पारितोषिक तंत्र जुड़ा होता है ताकि तरल संतुलन बना रहे। दिमाग में मौजूद प्यास तंत्रिका हमारे शरीर को एक स्पष्ट संकेत प्रेषित करती है – सूखा गला, और हलक के पिछले हिस्से में खराश जैसी संवेदना (thirst signal)। इस संवेदना का मकसद यह है कि आप पानी पीएं और खून में लवणों की सांद्रता सही स्तर पर पहुंच जाए।

पानी का पहला घूंट हलक में उतरते ही एक संतुष्टि का एहसास होता है क्योंकि ऐसा होते ही दिमाग में डोपामाइन का सैलाब आता है। डोपामाइन एक तंत्रिका-संप्रेषण रसायन है जो अच्छा महसूस (dopamine release) कराने का काम करता है। यह संतुष्टि का एहसास पानी गटकते ही महसूस होता है, हालांकि पानी पीने के 15-30 मिनट बाद ही खून पतला होने लगता है, उसकी सांद्रता सही स्तर पर पहुंचने लगती है।

युकी ओका कहते हैं कि इसका मतलब है कि पानी पीने से मिलने वाली तत्काल संतुष्टि और खून की सांद्रता का सही स्तर पर पहुंचना दो अलग-अलग एहसास (hydration process) हैं।

ओका के समूह ने प्यास बुझाने से सम्बंधित दो तरह की तंत्रिकाएं पहचानी हैं। एक होती हैं जो पानी गटकते ही सक्रिय हो जाती हैं और डोपामाइन मुक्त (dopamine neurons) करती है। दूसरी तंत्रिकाएं आंतों में पानी की सांद्रता (gut sensors) में हो रहे परिवर्तनों का ध्यान रखती हैं।

ओका ने पाया कि प्यास के पूरी तरह बुझने के लिए ज़रूरी है कि ये दोनों किस्म की तंत्रिकाएं सक्रिय हों। दोनों के सक्रिय होने पर ही पानी पीने का पारितोषिक संकेत मिलता है और पर्याप्त पानी पीने के बाद ही सांद्रता ठीक होने का संकेत मिलता (dual thirst pathway) है।

इन दो व्यवस्थाओं के सहयोगी कार्य को जांचने के लिए ओका के दल ने एक प्रयोग किया। उन्होंने पानी को सीधा आंत में पहुंचा दिया। ऐसा करने पर गटकने से मिलने वाला पारितोषिक संकेत नहीं मिला क्योंकि डोपामाइन मुक्त हुआ ही नहीं। यानी घूंट-दर-घूंट पानी मिलने पर दिमाग एक जश्न मनाता है (reward system) और प्यास तो बुझती ही है। (स्रोत फीचर्स)

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चर्बी की कोशिकाओं से हड्डी का निर्माण

डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर होना एक गंभीर स्थिति होती है (spinal fracture) जिससे ज़ख्मी व्यक्ति में पीठ में तीव्र दर्द, मांसपेशियों में जकड़न, पीठ का झुकना या टेढ़ा होना और अत्यंत गंभीर मामलों में मूत्र और मल नियंत्रण खो देना और निचले शरीर का लकवाग्रस्त होना भी देखा गया है। मरीज़ का उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि चोट कितनी गंभीर है और मेरु-रज्जु (स्पाइनल कॉर्ड) क्षतिग्रस्त (spinal cord injury) हुई है या नहीं। साधारण चोट को तो लंबे उपचार के बाद ठीक किया जा सकता है लेकिन पूरी तरह कट गई या नष्ट हो गई मेरु-रज्जु को पुन: ठीक करना फिलहाल संभव नहीं है।

इस संदर्भ में हाल ही में ओसाका मेट्रोपोलिटन युनिवर्सिटी के शोधार्थियों ने शरीर के वसा ऊतक (एडिपोज़ ऊतक) से निकाली गई स्टेम कोशिकाओं का इस्तेमाल करके स्पाइनल फ्रैक्चर को ठीक करने का एक नया और असरदार तरीका विकसित किया है (stem cell therapy)। इंसानों में अस्थिछिद्रता (ऑस्टियोपोरोसिस) से होने वाले फ्रैक्चर (osteoporosis fracture) जैसी स्थिति जब चूहों में दोहराई गई तो एडिपोज़ ऊतक उपचार के बाद रीढ़ की हड्डी और नसें सफलतापूर्वक ठीक होती देखी गई। ऐसा उपचार बुज़ुर्गों में ऑस्टियोपोरोसिस की देखभाल और हड्डियों के पुन:निर्माण में क्रांति ला सकता है।

अस्थिछिद्रता 

यह हड्डियों की एक बहुत आम लेकिन गंभीर बीमारी है, जो वृद्धों में, खासकर महिलाओं में अधिक पाई जाती है। इस रोग में हड्डियों में मौजूद कैल्शियम और खनिज कम हो जाते हैं जिससे हड्डियां धीरे-धीरे कमज़ोर और खोखली (bone density loss) हो जाती हैं, एवं पतली और नाज़ुक होकर आसानी से टूट जाती हैं। वृद्धों की आबादी बढ़ने के साथ अस्थिछिद्रता की वजह से होने वाले फ्रैक्चर, रीढ़ की हड्डी के फ्रैक्चर के मामलों (osteoporosis treatment) में भी वृद्धि दिखती है। इन चोटों से लंबे समय तक विकलांगता हो सकती है और जीवन की गुणवत्ता बहुत कम हो सकती है; इसलिए सुरक्षित और ज़्यादा असरदार इलाज की ज़रूरत है।

मेसेनकाइमल स्टेम कोशिकाएं

स्टेम कोशिकाएं ऐसी कोशिकाएं होती हैं, जो शरीर में किसी भी प्रकार की विशेष कोशिका (जैसे हड्डी, मांसपेशी, तंत्रिका, रक्त आदि) में बदलने की क्षमता (regenerative medicine) रखती है। मेसेनकाइमल स्टेम कोशिकाएं हड्डी, मांसपेशी, उपास्थि, और रक्तवाहिनी जैसी कई कोशिकाओं में बदलने की क्षमता रखती हैं। इन्हें शरीर की चर्बी से प्राप्त किया जाता है। इनका सबसे बड़ा लाभ यह है कि इन्हें काफी संख्या में आसानी से प्राप्त किया जा सकता है और प्रत्यारोपण के बाद शरीर इन्हें अस्वीकार भी नहीं करता।

हड्डी की मरम्मत

वसा ऊतक से मिलने वाली स्टेम कोशिकाओं में हड्डी की क्षति को ठीक करने की ज़बरदस्त क्षमता (bone regeneration) होती है। ये बहुसक्षम कोशिकाएं हड्डी समेत कई तरह के ऊतकों में बदल सकती हैं। सर्वप्रथम शरीर के किसी हिस्से (जैसे पेट या जांघ) से चर्बी निकाली जाती है। फिर चर्बी में से स्टेम कोशिकाओं को अलग किया जाता है और प्रयोगशाला में संख्या वृद्धि की जाती है। अब इन स्टेम कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त हड्डी में इंजेक्ट किया जाता है, या एक ढांचे के साथ लगाया जाता है। ये कोशिकाएं हड्डी जैसी कोशिकाओं में बदलकर नई हड्डी का निर्माण करती हैं।

टोकियो के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ मेडिसिन के विद्यार्थी यूटा सवाडा और डॉ. शिंजी ताकाहाशी के नेतृत्व में, ओसाका रिसर्च टीम ने एडिपोज़ टिश्यू से प्राप्त स्टेम कोशिकाओं को β-ट्राइकैल्शियम फॉस्फेट (β-TCP biomaterial) के साथ मिलाया, जो हड्डी के पुनर्निर्माण में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाला पदार्थ है। जब इस मिश्रण को रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर-ग्रस्त चूहों पर लगाया गया, तो हड्डी के ठीक होने और मज़बूती में काफी सुधार हुआ (spinal repair improvement)। इन स्टेम कोशिकाओं के साथ कुछ विशिष्ट प्रक्रियाएं करने पर उनकी प्रभाविता बढ़ गई। जैसे, जब इन कोशिकाओं की वृद्धि द्वारा गोलाकार संरचना (स्फेरॉइड) बनाई गई तो उनकी मरम्मत की क्षमता बेहतर रही।

चर्बी की कोशिकाओं से हड्डी का निर्माण सुरक्षित, सस्ता और अत्यधिक संभावनाओं वाला तरीका है (adipose stem cells)। भविष्य में यह फ्रैक्चर, अस्थिछिद्रता, हड्डी क्षति, और स्पाइनल इंजरी के उपचार में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सामूहिक हास-परिहास का जैविक जादू

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

जर्मन बाल रोग विशेषज्ञ विनफ्रेड बार्थलेन द्वारा किए गए एक अध्ययन में, मसखरों (hospital clowns) से अस्पताल में भर्ती ऐसे बच्चों के साथ मेलजोल करने को कहा गया जिनकी सर्जरी होने वाली थी (pre-surgery anxiety)। आश्चर्य की बात नहीं थी कि मसखरे के साथ एक खुशनुमा सत्र के बाद इन बच्चों में सर्जरी को लेकर चिंता कम देखी गई। फ्रंटियर्स इन पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित नतीजे बताते हैं कि उनके लार के नमूनों में ऑक्सीटोसिन का स्तर बढ़ा हुआ था।

ऑक्सीटोसिन को बॉन्डिंग ह़ॉर्मोन (bonding hormone oxytocin) भी कहा जाता है क्योंकि सामाजिक मेलजोल और शारीरिक स्पर्श से इसका स्तर बढ़ जाता है। इसकी उपस्थिति विश्वास की भावना को बढ़ाती है और यह संकेत देती है कि व्यक्ति सुरक्षित वातावरण में है। ऐसे तंत्रिका-रासायनिक परिवर्तन भावनात्मक रूप से स्वस्थ होने के पलों में होते हैं। सर्जरी को लेकर चिंतित बच्चों के लिए, मसखरे की करामातें न सिर्फ ध्यान भटकाने का ज़रिया थीं, बल्कि साझा हंसी का स्रोत भी थीं; दरअसल, मसखरे की उपस्थिति ने एक प्रामाणिक सामाजिक मेल-जोल को सुगम बनाया।

अन्य अध्ययनों से पता चला है कि जिन लोगों को हंसने के लिए उकसाया जाता है, खासकर जब वे उन लोगों के साथ होते हैं जिनके साथ उनके सामाजिक सम्बंध होते हैं, तो उनमें एड्रीनेलीन और कॉर्टिसोल का स्तर कम (stress hormones reduction) हो जाता है। इन हॉर्मोन का स्तर तब भी कम होता है जब प्रतिभागियों को अजनबियों के साथ हंसने के लिए प्रेरित किया जाता है।

एड्रीनेलीन और कॉर्टिसोल दोनों ही तनाव हार्मोन (stress hormones) हैं, लेकिन दोनों की क्रियाविधि अलग-अलग है। एड्रीनेलीन एक त्वरित प्रतिक्रिया वाला हार्मोन है: इसकी उपस्थिति रक्तचाप, हृदय गति और रक्त शर्करा के स्तर को बढ़ाती है। अपरिचित चेहरों से मुलाकात से उत्पन्न होने वाला हल्का सामाजिक तनाव एड्रीनेलीन के कम होने पर तुरंत निष्क्रिय हो जाता है, आप सहज हो जाते हैं। कॉर्टिसोल धीरे-धीरे काम करता है और इससे उत्पन्न तनाव लंबे समय तक रहता है। जब कॉर्टिसोल का स्तर कम होता है, तो चिंता की भावनाएं भी कम हो जाती हैं।

2017 में फिनलैंड के शोधकर्ताओं ने एक साथ कॉमेडी क्लिप देख रहे दोस्तों के समूहों का पॉज़िट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी (PET) की मदद से स्कैन किया था (brain activity study)। उन्होंने पाया कि थैलेमस और मस्तिष्क के अन्य भागों में एंडोजीनस ओपिऑइड (शरीर के अंदर बनने वाले अफीमनुमा रसायन) स्रावित होते हैं। एंडोजीनस ओपिऑइड दर्द निवारक के रूप में कार्य करते हैं और दर्द की अनुभूति को रोकते हैं, जिससे आप शांत रहते हैं। सामाजिक जुड़ाव के संदर्भ में, साथ में मौज-मस्ती करने से तनाव और दर्द कम होता है। यह एक पारितोषिक तंत्र के रूप में भी कार्य करता है, उत्साह की भावना आपको आनंददायक संगत में अधिक समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करती है।

चिम्पैंज़ी और अन्य पूंछविहीन वानर भी हंसी को एक सामाजिक स्नेहक के रूप में उपयोग करते हैं (chimpanzee behavior)। गहरी सांस लेने जैसी ध्वनि चिम्पैंज़ियों में हंसी-विनोद के खेल के दौरान पैदा होती है; जैसे पीछा करते समय या धींगामुश्ती करते समय, या जब उन्हें गुदगुदी की जाती है। उनके सामाजिक नेटवर्क आपसी देखभाल/साफ-सफाई (ग्रूमिंग) और खेल द्वारा पोषित होते हैं। चिम्पैंज़ी सामाजिक ग्रूमिंग में काफी समय व्यतीत करते हैं: जागने के 12 घंटों में से लगभग दो घंटे। किसी चिम्पैंज़ी की ‘संपर्क सूची’ में लगभग 80-100 परिचित होते हैं, जिनमें से 20 से कम मुख्य/अजीज़ साथी होते हैं।

लोगों की मोबाइल फोन संपर्क सूची में आम तौर पर 300 से 600 कॉन्टेक्ट होते हैं (social network size)। समय के साथ बनते जाने वाले संपर्कों में मनुष्य लगभग 1500 व्यक्तियों के नाम याद रख सकते हैं और उनके चेहरे पहचान सकते हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि मनुष्य का सामाजिक नेटवर्क प्रत्यक्ष टिकाऊ सामाजिक नातों के लिए उपलब्ध समय से कहीं अधिक विस्तृत हो गया है। ऑक्सफोर्ड के मानवविज्ञानी रॉबिन डनबर ने एक सिद्धांत प्रस्तावित किया है, जो कहता है कि मनुष्यों में सामाजिक हंसी संपर्क में आने वाले सभी सदस्यों के बीच साझा भावनात्मक अनुभव का साझा एहसास प्रदान करने के लिए विकसित हुई है।

जैसे-जैसे हमारा सोशल मीडिया उपयोग बढ़ता है, हमारा अकेले समय बिताना तेज़ी से बढ़ता है (social media loneliness)। यह सही है कि सोशल मीडिया पर फॉरवर्ड किए गए बिल्ली के बच्चे के वीडियो (या अन्य मनोरंजक पोस्ट) देखकर आप हंसते हैं और अच्छा महसूस करते हैं। लेकिन यहां आप अकेले हंसते हैं। जब सामाजिक माहौल में सबके साथ हंसते हैं, तो हंसी अधिक ज़ोरदार और अधिक बार होती है। कारण यह है कि पूरे समूह की मस्तिष्क गतिविधि सिंक्रोनाइज़ हो जाती है यानी ताल से ताल मिलाकर होने लगती है। यह तालमेल हमारे सामाजिक रिश्तों का मूल है। हमें अपने प्रियजनों के साथ ज़्यादा समय बिताना चाहिए! (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सांप के ज़हर से बचाएगा ऊंट-परिवार का एंटीवेनम

र साल ज़हरीले सांपों (snake bite deaths) के काटने से एक लाख से अधिक लोगों की मौत हो जाती है, और कई लाख लोग अपंग हो जाते हैं। WHO ने इसे एक ‘उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी’ (neglected tropical disease) कहा है। इससे सबसे अधिक प्रभावित गरीब और ग्रामीण इलाकों के लोग होते हैं, जहां सही इलाज की सुविधा नहीं होती। और मौजूदा एंटीवेनम (antivenom treatment) की प्रभाविता की सीमा आ चुकी है।

गौरतलब है कि पारंपरिक एंटीवेनम दवाएं घोड़ों या भेड़ों जैसे जीवों को थोड़ी मात्रा में सांप का ज़हर देकर तैयार की जाती हैं। इन जीवों के शरीर में ज़हर के खिलाफ बनी एंटीबॉडी (antibody therapy) का उपयोग इंसानों के इलाज में किया जाता है। लेकिन यह प्रक्रिया महंगी है और हर बार एक जैसी गुणवत्ता भी नहीं मिलती। हर बैच में कुछ एंटीबॉडी असरदार होती हैं, कुछ नहीं। इसलिए एक ही मरीज़ को ठीक करने के लिए कई खुराकें देनी पड़ती हैं। इसके अलावा, घोड़े से बनी एंटीबॉडी कई बार गंभीर एलर्जिक रिएक्शन (allergic reaction risk) पैदा कर देती हैं, जो कभी-कभी जानलेवा भी हो सकती है। इस डर से कई डॉक्टर दवा देने में झिझकते हैं।

बेहतर इलाज (effective snakebite cure) की तलाश में, डेनमार्क की टेक्निकल युनिवर्सिटी (Technical University of Denmark) के एंड्रियास लाउस्टसेन-कील और उनकी टीम ने लामा व अलपाका जीवों की ओर रुख किया। ये जीव बहुत छोटी और सरल एंटीबॉडी बनाते हैं, जिन्हें नैनोबॉडीज़ (nanobodies research) कहा जाता है। ये नैनोबॉडीज़ ज़हरीले तत्वों को बहुत सटीकता से पकड़ लेती हैं।

टीम ने अफ्रीका की 18 अलग-अलग सांप प्रजातियों (snake venom species)  (जैसे कोबरा, माम्बा और रिंकहॉल) के ज़हर को लामा और अलपाका में इंजेक्ट किया ताकि वे नैनोबॉडीज़ बना सकें। इसके बाद, उन्होंने इन नैनोबॉडीज़ के डीएनए को ई.कोली बैक्टीरिया (E. coli bacteria) के जीनोम में जोड़ा, जिससे ये सूक्ष्मजीव प्रयोगशाला में नैनोबॉडीज़ बनाने की ‘फैक्टरी’ बन गए।

हज़ारों नमूनों की जांच के बाद, वैज्ञानिकों ने आठ ऐसी नैनोबॉडीज़ चुनीं जो ज़हर को निष्क्रिय करने में सबसे प्रभावी थीं। जब चूहों को जानलेवा मात्रा में सांप का ज़हर देने के बाद ये नैनोबॉडीज़ दी गईं, तो वे लगभग सभी सांपों (सिवाय ईस्टर्न ग्रीन माम्बा) के ज़हर से बच गए।

मौजूदा प्रमुख एंटीवेनम Inoserp PAN-AFRICA की तुलना में, इस नए मिश्रण (new antivenom formula) ने ज़्यादा चूहों की जान बचाई और ऊतकों को कम नुकसान पहुंचाया। वैज्ञानिकों का मानना है कि बहुत छोटी होने के कारण ये नैनोबॉडीज़ शरीर के अंदर गहराई तक पहुंचकर ज़हर के फैलाव को अधिक प्रभावी ढंग से रोक सकती हैं।

इस तकनीक (biotech innovation) से लागत भी काफी कम हो सकती है। घोड़ों या भेड़ों की अपेक्षा बैक्टीरिया की मदद से नैनोबॉडीज़ तैयार करना सस्ता (low-cost biotech production) है। और यदि यह कम मात्रा में ज़्यादा कारगर हो, तो यह किफायती और ज़्यादा लोगों तक पहुंचने योग्य बन सकता है। एक और बड़ी बात यह है कि इसमें एलर्जी या सेप्टिक शॉक का खतरा बहुत कम है।

वैज्ञानिक अब कुछ और सांपों के ज़हर शामिल करके फार्मूले को और बेहतर बनाने में लगे हैं। अगर यह प्रयास सफल रहा, तो यह खोज अफ्रीका, एशिया और अन्य देशों में सांप के काटने के इलाज (global snakebite treatment)  को पूरी तरह बदल सकती है। (स्रोत फीचर्स)

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भूख मिटाकर मोटापा भगाने वाला प्रोटीन

डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

पेट में गुड़गुड़ाहट जैसी आवाज़ का एहसास भूख लगने का सीधा संकेत है। शरीर को भूख (hunger) तब लगती है जब शरीर में पोषक तत्वों की, विशेषत: रक्त शर्करा (blood sugar) की, कमी होती है। जैसे ही भोजन का समय होता है मस्तिष्क भूख का संदेश देता है जिसके फलस्वरूप आमाशय द्वारा उत्पन्न हार्मोन ग्रेलीन हमारे पेट और आंतों की मांसपेशियों में संकुचन पैदा करने लगता है और हमें भूख लगने लगती है। ग्रेलीन को भूख हॉर्मोन (हंगर हॉर्मोन – hunger hormone) भी कहते हैं। दूसरी ओर, पेट भरने पर लेप्टिन और कोलेसिस्टोकाइनिन (CCK) जैसे हॉर्मोन भूख को कम करने का काम करते हैं। लेप्टिन हमारे शरीर के वसा ऊतकों में बनता है और बताता है कि शरीर को पर्याप्त ऊर्जा वाला भोजन मिल गया है, जबकि कोलेसिस्टोकाइनिन छोटी आंत से निकलता है और पेट भर जाने का संकेत देता है, जिससे हमें तृप्ति का एहसास होता है। 

हाल ही में वैज्ञानिकों की एक टीम ने भूख मिटाने के लिए मस्तिष्क में छिपे हुए एक ‘स्विच’ का पता लगाया है। इसका नाम है मेलानोकॉर्टिन-4 रिसेप्टर (जीन MC4R)। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाया है कि MRAP2 नामक एक प्रोटीन (protein) भूख को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह प्रोटीन भूख रिसेप्टर MC4R को कोशिका की सतह पर पहुंचाने में मदद करता है। वहां यह ‘खाना बंद करो’ के मज़बूत संकेत देता है। वैज्ञानिकों को लगता है कि MRAP2 प्रोटीन द्वारा नियंत्रित यह स्विच – MC4R – मोटापे (obesity) से लड़ने, उसे कम करने और वज़न नियंत्रण में सुधार के लिए नए मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

मेलानोकॉर्टिन-4 रिसेप्टर

मेलानोकोर्टिन-4 (MC4R) रिसेप्टर एक महत्वपूर्ण रिसेप्टर है। यह पेप्टाइड-स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन (peptide hormone) द्वारा सक्रिय होता है। MC4R रिसेप्टर मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस (hypothalamus) में पाया जाता है और भूख, तृप्ति, तथा ऊर्जा चयापचय क्रिया को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह भूख को कम करता है जिससे मोटापा घटता है। यह ऊर्जा संतुलन (energy balance) भी बनाए रखता है।

MC4R के जीन में यदि उत्परिवर्तन (gene mutation) हो जाए तो भूख अधिक लगती है जिससे भोजन सेवन को नियंत्रित करने और वज़न कम करने में कठिनाई होती है। परिणामत: मोटापा बढ़ जाता है। मोटापे के इस कारण के लिए वर्तमान में कोई विशिष्ट उपचार नहीं है, हालांकि भविष्य में इस रिसेप्टर को लक्षित करने वाली नई औषधियां (medicines) विकसित की जा सकती हैं।

सेटमेलानोटाइड

वैज्ञानिक शोध से ज्ञात हुआ है कि सेटमेलानोटाइड (setmelanotide) नामक दवा लेप्टिन-मेलानोकॉर्टिन मार्ग (leptin-melanocortin pathway) में कुछ विशिष्ट आनुवंशिक विकारों या उत्परिवर्तनों के कारण होने वाले गंभीर आनुवंशिक मोटापे (genetic obesity) का उपचार करती है। यह मेलानोकॉर्टिन-4 रिसेप्टर को उत्तेजित करने का काम करती है, जो मस्तिष्क में भूख नियंत्रण से सम्बंधित होता है। यह दवा भूख को कम करती है, पेट भरा हुआ महसूस कराती है और शरीर द्वारा कैलोरी जलाने की दर भी बढ़ा सकती है, जिससे वज़न घटाने में मदद मिलती है। 

MRAP2 एक जीन है जो MC4R रिसेप्टर के सहायक प्रोटीन को एनकोड करता है, जो MC4R रिसेप्टर सिग्नलिंग को नियंत्रित करता है।

वैज्ञानिकों की टीम ने आधुनिक फ्लोरेसेंट माइक्रोस्कोपी (fluorescent microscopy) और सिंगल सेल इमेजिंग तकनीक का उपयोग करते हुए पाया है कि प्रोटीन MRAP2 कोशिकाओं के भीतर मस्तिष्क-रिसेप्टर MC4R के मौलिक स्थान और व्यवहार को बदल देता है। फ्लोरेसेंट माइक्रोस्कोपी और कॉन्फोकल इमेजिंग (confocal imaging) ने दर्शाया है कि MRAP2, MC4R को कोशिका की सतह तक पहुंचाने के लिए आवश्यक है, जहां यह भूख को दबाने या कम करने वाले संकेतों को अधिक प्रभावी ढंग से प्रसारित कर सकता है। उपरोक्त शोध के निष्कर्ष हाल ही में नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।

रिसेप्टर के कार्य करने के तरीके की समझ उन चिकित्सकीय रणनीतियों (therapeutic strategies) की ओर इंगित करती है जो MRAP2 की नकल या उसका नियमन करती हैं और मोटापे तथा सम्बंधित चयापचय विकारों (metabolic disorders) से निपटने की क्षमता रखती हैं। उपरोक्त शोध के निष्कर्ष भविष्य में विभिन्न दृष्टिकोणों और विविध प्रयोगात्मक विधियों द्वारा, चिकित्सकीय प्रासंगिकता वाले भूख नियमन के महत्वपूर्ण नए शारीरिक और पैथोफिज़ियोलॉजिकल (pathophysiological) पहलुओं की बेहतर समझ विकसित करने में मददगार होंगे। (स्रोत फीचर्स)

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वनस्पति-आधारित भोजन रोगों के जोखिम कम करता है

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल (Scientific Reports Journal)  के जुलाई 2024 के अंक में वी. वियालॉन और साथियों द्वारा एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी। इस रिपोर्ट में विशिष्ट रोगों के होने के जोखिम की जांच के लिए एक स्वस्थ जीवनशैली सूचकांक (Healthy Lifestyle Index -HLI) के उपयोग पर चर्चा की गई थी। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने देखा था कि हर जीवनशैली का रोगों का शिकार होने से क्या सम्बंध है। इसके लिए उन्होंने युरोपियन पर्सपेक्टिव इनवेस्टीगेशन इनटू कैंसर एंड न्यूट्रीशियन (EPIC) के डैटा और टाइप-2 डायबिटीज़, कैंसर और हृदय सम्बंधी विकारों से होने वाली अकाल मृत्यु के जोखिम का डैटा उपयोग किया था। इनमें से कुछ तरह की जीवनशैली में धूम्रपान करना, अत्यधिक मद्यपान करना, खान-पान की आदतें, मोटापा (शरीर में अतिरिक्त वसा) (obesity)  और अत्यधिक नींद जैसी अस्वास्थ्यकर चीज़ें भी शामिल थीं।

इसी सिलसिले में, स्पेन के रेनाल्डो कॉर्डोवा और डेनमार्क, दक्षिण कोरिया, और उत्तरी आयरलैंड-यूके के सह-लेखकों का एक शोधपत्र दी लैंसेट – हेल्दी लॉन्गेविटी (The Lancet Healthy Longevity) के अगस्त 2025 के अंक में प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था ‘वनस्पति-आधारित आहार पैटर्न एवं कैंसर तथा कॉर्डियोमेटाबोलिक रोगों की बहु-रुग्णता का आयु-विशिष्ट जोखिम: एक दूरदर्शी विश्लेषण (Plant-based dietary patterns and age-specific risk of multimorbidity of cancer and cardiometabolic diseases: a prospective analysis)। ‘मल्टीमॉर्बिडिटी’ का मतलब है एक ही व्यक्ति में दो या दो से अधिक जीर्ण (क्रॉनिक) रोग होना।

शोधकर्ताओं ने ऐसे मल्टीमॉर्बिड कैंसर (cancer research)  से पीड़ित लगभग 2.3 लाख लोगों का डैटा EPIC डैटा बैंक से लिया और 1.81 लाख लोगों का डैटा यूके बायोबैंक (UK Biobank)  से लिया और उसका विश्लेषण किया। उन्होंने चयापचय रोगों में इंसुलिन प्रतिरोध तंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका पाई। 35-70 वर्ष की आयु वाले विशिष्ट समूहों के लोगों की खान-पान की आदतों जैसी विशेषताओं तुलना करने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि वनस्पति-आधारित स्वाथ्यकर आहार (plant-based diet) कैंसर और कॉर्डियोमेटाबोलिक रोगों की बहु-रुग्णता का बोझ कम कर सकता है।

अध्ययन में इस बात के प्रमाण भी मिले हैं कि कैसे पशु उत्पाद (मांस, मछली, अंडे सहित) (animal products)  की अधिकता वाले आहार की तुलना में पादप-आधारित आहार (vegan diet)  पर्यावरण की दृष्टि से अधिक निर्वहनीय होता हैं। शोधकर्ताओं ने स्वास्थ्यकर वनस्पति-आधारित आहार के सेवन का कैंसर और (उच्च रक्तचाप, दिल का दौरा और टाइप-2 डायबिटीज़ सहित) हृदय रोगों (heart diseases) के कम जोखिम से मज़बूत सम्बंध पाया।

तंबाकू उत्पादों (tobacco consumption)  के सेवन से भी कैंसर होता है। बहुप्रशंसित भूमध्यसागरीय आहार (Mediterranean diet) को बहुत अच्छा बताया गया है, हालांकि भूमध्यसागरीय आहार में मछली, चिकन और रेड वाइन भी शामिल होती है। गौरतलब है कि शाकाहारी या वीगन आहार (जिसमें पशु-आधारित कोई भी वस्तु शामिल नहीं होती है) से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (greenhouse gas emission) भी कम होता है। शाकाहारी आहार में दूध और कभी-कभी अंडे का सेवन शामिल होता है। लेकिन वीगन आहार में दूध, जोकि एक पशु उत्पाद है, से भी सख्त परहेज़ किया जाता है।

भारत की स्थिति

भारत की बात करें तो लगभग 35 प्रतिशत लोग शाकाहारी (vegetarian population)  हैं; वे अपने दैनिक भोजन में अनाज और सब्ज़ियों के साथ दूध भी लेते हैं; इनमें से कुछ लोग अंडे भी खाते हैं। लगभग 10 प्रतिशत लोग वीगन हैं, जो दूध या कोई भी दुग्ध उत्पाद नहीं खाते।

किसी व्यक्ति में दो या उससे अधिक जीर्ण स्वास्थ्य स्थितियों (multiple chronic conditions) की उपस्थिति चिंताजनक है। अनुमान है कि 16.4 प्रतिशत शहरी आबादी डायबिटीज़ (diabetes) से पीड़ित है जबकि 8 प्रतिशत ग्रामीण आबादी डायबिटीज़-पूर्व स्थिति में है। लगभग 26 प्रतिशत शहरी भारतीय पुरुष और महिलाएं चयापचय विकारों के साथ इंसुलिन प्रतिरोधी भी हैं। दुर्भाग्य से, उनमें से लगभग 29 प्रतिशत लोग बीड़ी, सिगरेट और हुक्का पीते हैं, और इनमें मौजूद तंबाकू कैंसर का कारण बनता है। ग्रामीण आबादी न केवल धूम्रपान करती है बल्कि कई लोग सुपारी भी खाते हैं, जिसकी अधिकता से मुंह का कैंसर (oral cancer) हो सकता है। 60 वर्ष से अधिक आयु के 16 प्रतिशत लोग मधुमेह से पीड़ित हैं और इसके अलावा वे उम्र से सम्बंधित मनोभ्रंश और अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s disease)  जैसे रोगों से भी पीड़ित हैं।

वक्त रहते चिकित्सा समुदाय(healthcare community), राजनेता, केंद्र व राज्य सरकारों को ध्यान देकर कोई रास्ता निकालना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

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दीर्घायु की प्रार्थनाएं और पुरुषों की अल्प-आयु

डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

पुरुषों के लिए लंबी आयु (life expectancy in men) की सारी कामनाओं, प्रार्थनाओं के बावजूद मैं अपने परिजनों में पाता हूं कि पुरुष पहले स्वर्ग सिधारते हैं और अक्सर महिलाएं लंबी आयु प्राप्त करती हैं। तो क्या पुरुष जन्म से ही पहले मरने के लिए नियत है? सभी परिस्थितियां समान मिलें तो भी मेरे साथ पैदा हुई महिला की तुलना में मैं तीन वर्ष पूर्व मरने के लिए अभिशप्त हूं।

महिला-पुरुष के जीवनकाल (male vs female lifespan)  में अंतर बहुत पहले से ज्ञात है। यह केवल भारत में ही नहीं पूरे विश्व में पत्थर की लकीर-सा नियम है। तो पुरुषों में ऐसा क्या है कि वे महिलाओं की तुलना में अल्प आयु में मर जाते हैं। हाल ही के शोध कार्यों से हम इस तथ्य का कारण समझने के समीप पहुंचे हैं।

कुछ लोग पुरुषों के छोटे जीवनकाल का कारण व्यवहार में अंतर (lifestyle differences)  को मानते हैं। व्यवहार, जैसे पुरुष युद्ध लड़ते हैं, खदानों में कार्य करते हैं, श्रमयुक्त मज़दूरी करते हैं और इस प्रकार अपने शरीर पर अतिरिक्त दबाव डालकर भी मैदान में डटे रहते हैं। सामाजिक विज्ञान के कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि पुरुष आदतन झक्की होते हैं। वे अत्यधिक धूम्रपान (smoking habits)  करते हैं, अनियंत्रित पीते हैं और पेटू होते हैं इसलिए उनका वज़न ज़्यादा होता है। बीमार होने पर चिकित्सीय सहायता लेने में भी आना-कानी करते हैं और बीमारी का पता चल जाए तो भी अधिक संभावना इस बात की रहती हैं कि वे पूरा उपचार ना लें। साथ ही, वे गुस्सैल होते हैं और आपसी लड़ाई, दुर्घटना और अत्यधिक जोखिम भरे कार्य पसंद करते हैं। इस दौरान चोट अथवा बीमारी से उनका शरीर कमज़ोर हो जाता है। किंतु यदि ऐसा ही था तो पुरुषों को आरामदायक कार्य मिलने पर तो दोनों का जीवनकाल एक जैसा होना था।

तो क्या हमारे करीबी रिश्तेदार वानरों में भी ऐसा ही है? मानव को छोड़कर बाकी सभी प्रायमेट्स (primates study)  पर भी वैज्ञानिकों ने शोध किया। वे देखना चाहते थे कि क्या हमारे नज़दीकी रिश्तेदार वानरों में भी मादा की आयु नर से ज़्यादा होती है? वैज्ञानिकों ने 6 जंगली प्रायमेट्स (सिफाकास, मुरिक्विस, गोरिल्ला, चिम्पैंजी और बबून) के ऐसे समूह से उम्र सम्बंधी आंकड़े बटोरे जिनकी संख्या समूह में 400 से 1500 तक थी। फिर शोधकर्ताओं ने आधुनिक एवं ऐतिहासिक दोनों समय के छह मानव समूह की आबादी के आंकड़े भी देखे। वैज्ञानिकों ने पाया कि पिछली शताब्दी की तुलना में मानव आयु में बहुत वृद्धि होने के बावजूद पुरुष-महिला के जीवनकाल में अंतर कम नहीं हुआ। शोध से यह भी बात सामने आई कि मानव आबादी में यद्यपि महिलाएं ज़्यादा समय तक जीवित रहती हैं परंतु भौगोलिक वितरण के अनुसार यह अंतर अलग-अलग रहा था। उदाहरण के लिए आधुनिक रूस में पुरुष-महिला के जीवनकाल में अंतर लगभग 10 वर्ष का है जो सबसे अधिक है।

अधिक उम्र का जैविक कारण (biological reasons for longevity)

जीव विज्ञानी अल्पायु के लिए पुरुषों के गुणसूत्रों (chromosomes in men) को दोषी ठहराते हैं। महिलाओं को निश्चित रूप से जैविक लाभ जन्म के साथ ही प्राप्त होने लगता है। बाहरी प्रभावों के अभाव में भी लड़कों की मृत्यु दर लड़कियों से 25-30 प्रतिशत अधिक देखी गई है। आंकड़े भी महिलाओं के जन्मजात आनुवंशिक (genetic advantage in women)  लाभ दर्शाते हैं।

मनुष्यों तथा कई अन्य जंतुओं में लिंग का निर्धारण गुणसूत्रों द्वारा होता है। मनुष्यों की कोशिकाओं में कुल 23 जोड़ी गुणसूत्र पाए जाते हैं। इनमें 22 जोड़ियों में तो गुणसूत्र परस्पर पूरक होते हैं। लेकिन 23वीं जोड़ी में दो गुणसूत्र अलग-अलग किस्म के होते हैं। शुक्राणु दो प्रकार के होते हैं (X तथा Y), जबकि सारे अंडाणु एक ही प्रकार के होते हैं (X)। यदि व्यक्ति में दोनों गुणसूत्र X हों तो मादा यानी लड़की बनती है और जब एक गुणसूत्र X तथा Y दूसरा हो तो नर यानी लड़का।

जब इन X गुणसूत्रों के जीन्स में से एक जीन उत्परिवर्तित होता है तो महिलाओं में पाया जाने वाला दूसरा X गुणसूत्र उसके कार्य को संभाल लेता है या उसके दुष्प्रभाव को दबा देता है। जबकि पुरुषों में केवल एक X गुणसूत्र होने के कारण उसमें उत्परिवर्तन हो जाए तो गंभीर परिस्थिति उत्पन्न कर सकता है।

इस प्रकार दोनों लिंगों के बीच जेनेटिक अंतर (genetic difference) एक लिंग में उम्र बढ़ाता है तो दूसरे में कम कर देता है। इसके अलावा महिलाओं के हार्मोन (female hormones)  और प्रजनन में महिलाओं की अगली पीढ़ी में निवेश की महत्वपूर्ण भूमिका को भी दीर्घायु से जोड़ा गया है। उदाहरण के लिए महिलाओं में बनने वाला हार्मोन एस्ट्रोजन (estrogen hormone) खराब कोलेस्ट्रॉल को खत्म करने में कारगर है जिससे महिलाओं का शरीर हृदय सम्बंधी बीमारियों (heart disease risk)  से प्राय: सुरक्षित बना रहता है। दूसरी ओर केवल पुरुषों में बनने वाला टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन उनमें हिंसा और जोखिम लेने की उत्कंठा उत्पन्न करता है। आखिर में महिलाओं का शरीर गर्भावस्था (pregnancy health) और स्तनपान की ज़रूरतों के अनुसार भोजन का भंडारण करने के लिए बना होता है। वे भोजन की ज़्यादा मात्रा को भी उचित तरीके से संग्रहित या शरीर के बाहर निकालने के अनुरूप ढली हुई हैं। इसके अलावा भी अनेक आनुवंशिक एवं जैविक कारण ज्ञात हैं जिनका स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर पर समग्र प्रभाव को मापना असंभव है। पिछले कुछ दशकों में असाधारण आर्थिक और सामाजिक प्रगति से मातृत्व बोझ में नाटकीय कमी भी देखी गई है। इस प्रकार सभी परिस्थितियां महिलाओं को अनुकूल बनाती हैं।

एक परिकल्पना ‘जॉगिंग हार्ट’ (jogging heart hypothesis) के अनुसार माहवारी चक्र के उत्तरार्ध में, यानी अंडोत्सर्ग के बाद, हृदय की गति बढ़ जाती है। हृदय गति बढ़ने से वैसी ही लाभकारी परिस्थिति उत्पन्न होती है जैसी हल्का व्यायाम (light exercise benefits) करने पर या जॉगिंग करने पर होती है। बाद के जीवन में इसके लाभकारी असर देखे जा सकते हैं। इसलिए हृदय रोग का जोखिम भी महिलाओं को बेहद कम होता है।

अधिक कद भी एक महत्वपूर्ण कारक (height and aging factor) है। लंबे लोगों में अधिक कोशिकाएं होती हैं। इसलिए उन्हें अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अधिक कोशिकाओं में उत्परिवर्तन की संभावनाएं भी अधिक हो जाती है तथा ज़्यादा ऊर्जा खर्च करने से कोशिकाएं जल्दी बूढ़ी हो जाती हैं। अत: पुरुषों की अधिक ऊंचाई उन्हें अधिक दीर्घकालीन क्षति की ओर धकेलती है।

वे कारण जो महिलाओं को लंबी उम्र (women longevity reasons) देते हैं कई बार अटपटे, अनिश्चित और रहस्यमयी लगते हैं। लेकिन इतना तो तय है कि सारी प्रार्थनाएं और व्रत-उपवास इस खाई को पाट नहीं सके हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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