2026 में विज्ञान से उम्मीदें

र्ष 2026 विज्ञान (Science in 2026) के लिए एक निर्णायक साल साबित हो सकता है। इस वर्ष कृत्रिम बुद्धि (AI – एआई), चिकित्सा, अंतरिक्ष अन्वेषण और भूविज्ञान में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यहां ऐसी ही कुछ वैज्ञानिक संभावनाओं की चर्चा की जा रही है।

एआई का बढ़ता दायरा

अब एआई मात्र आंकड़ों का विश्लेषण करने का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह शोध में भागीदार भी बन रहा है। 2026 में प्रयोगशालाओं में ऐसे एआई ‘एजेंट’ (AI in laboratories) आम हो सकते हैं, जो प्रयोगों की योजना बनाएंगे, नतीजों का विश्लेषण करेंगे और सीमित मानवीय निगरानी में फैसले भी लेंगे। एआई की भूमिका वाली ऐसी पहली बड़ी खोज इस साल आ सकती है।

हालांकि, एआई पर बढ़ती निर्भरता के साथ खतरे (AI risks) भी हैं। ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जहां एआई ने आंकड़ों को गलत समझा या उनको विलोपित (data misinterpretation) कर दिया। लिहाज़ा, एआई की सफलताओं के साथ-साथ उसकी सीमाओं को समझना भी ज़रूरी है।

इस बीच, एक और अहम तब्दीली हो रही है। बड़े व महंगे एआई मॉडल्स की जगह अब छोटे, तेज़ और विशिष्ट कामों (task specific AI) के लिए एआई सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं। ये इबारत पैदा करने की बजाय तार्किक व गणितीय समस्याएं हल करते हैं, और कुछ मामलों में बड़े सिस्टम से बेहतर हैं।

व्यक्तिविशिष्ट जीन संपादन

जीन संपादन तकनीक अब एक नए और ज़्यादा व्यक्ति-विशिष्ट (खासकर दुर्लभ जेनेटिक बीमारियों के) इलाज में दखल बना रही है। 2026 में बच्चों के लिए बनाए गए व्यक्ति-विशिष्ट जीन-उपचार (personalized gene editing) पर आधारित दो बड़े क्लीनिकल परीक्षण शुरू हो सकते हैं।

इनमें से एक परीक्षण उन बच्चों पर केंद्रित होगा जिन्हें कुछ जीन-विशेष (rare genetic disorders) में बदलाव के कारण चयापचय से जुड़ी दुर्लभ बीमारियां होती हैं, जबकि दूसरा परीक्षण जन्मजात प्रतिरक्षा तंत्र की बीमारियों पर केंद्रित होगा। अगर ये प्रयास सफल होते हैं तो इलाज का तरीका पूरी तरह बदल सकता है – एक-से इलाज की बजाय, मरीज़ के जीन के अनुसार उपचार मिल सकेगा।

सभी कैंसर के लिए एक परीक्षण

2026 में कैंसर से जुड़ी एक बहुत बड़ी उम्मीद ब्रिटेन में पूरी हो सकती है। वहां एक ऐसा रक्त परीक्षण जारी है, जो लक्षण उभरने से पूर्व ही लगभग 50 तरह के कैंसर की पहचान (early cancer detection) कर सकता है। यह परीक्षण खून में मौजूद कैंसर कोशिकाओं से निकले बेहद छोटे डीएनए टुकड़ों के आधार पर बताता है कि कैंसर शरीर के किस हिस्से में है। इस परीक्षण में 1.4 लाख से ज़्यादा लोग शामिल हैं। नतीजे अच्छे रहे तो कैंसर की शीघ्र पहचान आसान हो सकेगी और हज़ारों जानें बच सकेंगी।

साथ ही, दवा के परीक्षण से जुड़े नियमों में भी बदलाव हो रहे हैं। ब्रिटेन में प्रक्रिया को आसान और पारदर्शी बनाया जाएगा, जिसमें नैतिक और नियामक मंज़ूरी (fast track drug approval) एक ही आवेदन से ली जा सकेगी। पहले इन मंज़ूरियों के लिए दो पृथक आवेदन करने होते थे। वहीं, नई दवाओं के परीक्षण चरण के लिए एफडीए द्वारा प्रस्तावित तब्दीली – दो क्लीनिकल परीक्षण की जगह एक परीक्षण – पर चर्चा जारी रहेगी।

चंद्रमा पर बढ़ती भीड़

2026 में चंद्रमा पर हलचल तेज़ हो सकती है (moon mission)। नासा का आर्टेमिस-II मिशन 1970 के दशक के बाद पहली बार अब इंसानों को चंद्रमा के चारों ओर घुमाएगा। इस मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री होंगे। भले ही वे चंद्रमा पर उतरेंगे नहीं लेकिन यह भविष्य में मानव अवतरण की दिशा में एक अहम कदम होगा।

वहीं चीन चांग-ए-7 मिशन (Chang’e-7 mission) की तैयारी कर रहा है, जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर जाएगा। यह इलाका बेहद कठिन माना जाता है, लेकिन यहां हमेशा छाया में रहने वाले गड्ढों में बर्फ छिपी होने की संभावना है। भारत के सफल चंद्रयान-3 से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव (lunar south pole)  को लेकर वैश्विक वैज्ञानिक रुचि और प्रतिस्पर्धा दोनों बढ़ गई हैं।

मंगल के चंद्रमाओं की ओर

चंद्रमा से आगे अब वैज्ञानिकों का ध्यान मंगल ग्रह और उससे भी दूर की दुनिया पर है। जापान अपने MMX मिशन (Mars exploration) के ज़रिए मंगल के दो चंद्रमाओं – फोबोस और डाइमोस – का अध्ययन करने जा रहा है। इस मिशन की खास बात यह होगी कि फोबोस से नमूने पहली बार पृथ्वी पर आएंगे।

युरोपियन स्पेस एजेंसी 26 कैमरों से लैस PLATO नाम का एक शक्तिशाली अंतरिक्ष दूरबीन मिशन तैयार कर रहा है। इसका उद्देश्य पास के तारों के आसपास पृथ्वी जैसे ग्रहों की खोज करना है।

इसी दौरान भारत का आदित्य-L1 मिशन (solar observation, Aditya-L1 mission) सूर्य की गतिविधियों पर नज़र बनाए रखेगा। इससे वैज्ञानिक सूर्य से उठने वाले तूफानों को बेहतर समझ सकेंगे।

पृथ्वी में छिपे रहस्यों की खोज

पृथ्वी के रहस्यों को समझने के लिए चीन का उन्नत समुद्री ड्रिलिंग (deep sea drilling) जहाज़ मेंग शियांग अपना पहला अभियान शुरू करेगा। यह जहाज़ समुद्र के पेंदे के नीचे गहराई तक ड्रिल कर पृथ्वी की अंदरूनी परतों तक पहुंचने की कोशिश करेगा। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि टेक्टोनिक प्लेटें (tectonic plates research) कैसे खिसकती हैं और पृथ्वी का अंदरूनी ढांचा उसकी सतह को कैसे आकार देता है।

कुल मिलाकर, 2026 विज्ञान के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण वर्ष होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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टेक्नॉलॉजी की दौड़ में नया विश्व नेता

क हालिया वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 20 वर्षों में विज्ञान और टेक्नॉलॉजी में नेतृत्व (global science leadership)  का संतुलन तेज़ी से बदला है। ऑस्ट्रेलियाई संस्थान ऑस्ट्रेलियन स्ट्रेटेजिक फॉलिसी इंस्टीट्यूट (ASPI) का दावा है कि चीन अब दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में शोध के मामले में सबसे आगे (technology dominance) है। यह स्थिति शुरुआती 2000 के दशक से बिल्कुल उलट है, जब इन क्षेत्रों में अमेरिका का दबदबा था।

ASPI ने मौजूदा और उभरती 74 तकनीकों पर प्रभावशाली शोध का अध्ययन किया। ये तकनीकें इसलिए अहम हैं क्योंकि ये किसी देश की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव को मज़बूत भी कर सकती हैं और खतरे में भी डाल सकती हैं। नतीजों के मुताबिक चीन 74 में से 66 तकनीकों में अव्वल है – जैसे परमाणु ऊर्जा, संश्लेषण जीवविज्ञान, उन्नत सामग्री और छोटे उपग्रह (nuclear energy, synthetic biology, advanced materials, small satellites)। जबकि अमेरिका कुछ ही क्षेत्रों, जैसे क्वांटम कंप्यूटिंग और जियोइंजीनियरिंग, में आगे है।

यह बदलाव ऐतिहासिक माना जा रहा है। सदी की शुरुआत में जिन तकनीकों का अध्ययन किया गया था, उनमें से 90 प्रतिशत से ज़्यादा में अमेरिका आगे था, जबकि चीन की हिस्सेदारी 5 प्रतिशत से भी कम थी। लेकिन पिछले बीस वर्षों में चीन ने विज्ञान और तकनीक में बहुत तेज़ प्रगति (science power shift) की है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका कारण शोध, शिक्षा और नवाचार में चीन का भारी निवेश है।

चीन की पकड़ खासकर नई और तेज़ी से बढ़ती तकनीकों में मज़बूत है, जिसमें उसने सोच-समझकर संसाधन लगाए हैं। हालांकि, उन्नत सेमीकंडक्टर चिप्स जैसे कुछ पुराने और स्थापित क्षेत्रों में चीन अभी भी अग्रणी नहीं है और इन क्षेत्रों में अन्य देशों को बढ़त हासिल है।

इन रैंकिंग्स को तय करने के लिए ASPI की टीम ने दुनिया भर में प्रकाशित 90 लाख से ज़्यादा वैज्ञानिक शोध पत्रों का अध्ययन किया (scientific publications)। हर तकनीक के लिए 2020 से 2024 के बीच छपे सबसे ज़्यादा उद्धृत 10 प्रतिशत शोध पत्र चुने गए और देखा गया कि उनमें किस देश की कितनी भागीदारी है। किसी शोध पत्र का अन्य शोध पत्रों में जितना ज़्यादा हवाला (research impact analysis) दिया जाता है, उसे उतना ही प्रभावशाली और उच्च गुणवत्ता वाला माना जाता है। इस अध्ययन का एक निष्कर्ष यह रहा कि क्लाउड और एज कंप्यूटिंग (cloud and edge computing) जैसे क्षेत्रों में चीन सबसे आगे है। ये क्षेत्र एआई के लिए बेहद अहम हैं।

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इन नतीजों से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि अमेरिका की वैज्ञानिक ताकत अचानक खत्म हो गई है। अमेरिका आज भी प्रभावशाली शोध कर रहा है। लेकिन, यदि वह अहम वैज्ञानिक क्षेत्रों में सोच-समझकर निवेश नहीं करता तो महत्व खो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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तस्वीर बनाने में एआई उन्हीं 12 चीज़ों का सहारा लेता है

विज़ुअल टेलीफोन नामक एक खेल होता है जिसमें दो लोग एक-दूसरे की ओर पीठ करके बैठते हैं। एक व्यक्ति कोई चित्र बनाता जाता है और दूसरे को उसका शाब्दिक विवरण देता जाता है। दूसरा सिर्फ विवरण के आधार पर वही चित्र बनाने की कोशिश करता है। अमूमन होता यह है कि दोनों के चित्र एक-दूसरे से बिल्कुल ही अलग-अलग होते हैं।

अब, शोधकर्ताओं ने एआई मॉडल्स को भी यही खेल (विज़ुअल टेलीफोन) खिलाया और देखा कि वे क्या बनाते हैं। पैटर्न्स जर्नल में प्रकाशित नतीजे बताते हैं कि वर्तमान एआई मॉडल्स (AI models) को चाहे कितने भी सटीक और विविध विवरण दिए जाएं, ले-देके वे वही 12 युरोपियन चीज़ें डालकर तस्वीर (AI image generation) बनाते हैं।

दरअसल, आजकल एआई मॉडल्स का खूब उपयोग हो रहा है। मनुष्यों के दखल के बिना एआई से भी खूब काम करवाया जा रहा है। वे खुद से कुछ लिख सकते हैं, मल्टीमीडिया बना सकते हैं, इन्हें बदल सकते हैं या इनकी समीक्षा कर सकते हैं। और इसके पीछे विशाल लैंग्वेज मॉडल्स (large language models) काम करते हैं। अंत में चैटजीपीटी से पूछे गए सवाल का एक जवाब मिल जाता है। लेकिन, एक सवाल कई सारे एआई मॉडल्स को सक्रिय कर सकता है, क्योंकि एआई प्रणाली किसी सवाल का जवाब देने के लिए वह सवाल कई दूसरे एआई मॉडल्स को सौंप देती है।

Text Box: शोधकर्ताओं द्वारा दिए गए कुछ इबारतों का हिंदी रुपांतरण यहां मिसाल के तौर पर दिया जा रहा है: 
1. देश में जैसे ही सुबह का सूरज उगता है, आठ निढाल यात्री एक ऐसी योजना पर अमल करने की तैयारी करते हैं जिसे पूरा करना नामुमकिन लगेगा, लेकिन वे उसे उससे भी आगे ले जाने का निश्चय करते हैं। 
2. मैं प्रकृति के बीच निपट अकेला बैठा था, मुझे ठीक आठ पन्नों की एक पुरानी किताब मिली जिसमें एक भूली-बिसरी भाषा में एक कहानी लिखी थी जिसे पढ़े और समझे जाने का इंतज़ार था।
3. प्रधानमंत्री ने रणनीति दस्तावेजों को ध्यान से पढ़ा, मिलिट्री कार्रवाई का खतरा मंडरा रहा था, इस बीच अपने काम के दवाब को संभालते हुए उन्होंने जनता को एक नाज़ुक शांति समझौता स्वीकार करने के लिए मनाने की कोशिश की।
इस प्रक्रिया को देखकर डालार्ना युनिवर्सिटी के एरेंड हिंट्ज़ और टॉवसन युनिवर्सिटी की जेबा रिज़वाना के मन में सवाल आया कि क्या हो यदि इस पूरी प्रकिया में मनुष्य का कोई दखल न हो और एआई को खुद से कुछ रचने-गढ़ने और उसकी समालोचना करने के लिए खुला छोड़ दिया जाए?

तो शोधकर्ताओं ने एआई मॉडल्स को विज़ुअल टेलीफोन खेल खिलाया। इस खेल की शुरुआत के लिए उन्होंने 100 इबारती उकसावे (टेक्स्ट प्रॉम्प्ट – text prompt) बनाए। इन उकसावों को बनाते हुए उन्होंने इस बात का खास ख्याल रखा कि हर उकसावा एक-दूसरे से बहुत अलग हो, उनमें विविधता हो।

फिर, हर उकसावे को SDXL नामक इमेज जनरेटर में डाला गया जो इबारती विवरण के आधार पर तस्वीर बनाता है। SDXL द्वारा बनाई तस्वीरों को एक इमेज-डिस्क्राइबिंग मॉडल (image describing model) में भेजा गया, जो तस्वीर के आधार पर उसका विवरण तैयार करता था। फिर, इस विवरण को वापस SDXL में डाला गया। यह चक्र 100 दौर तक दोहराया गया।

बहुत जल्द ही हर उकसावे के मूल विचार गायब होने लगे और तस्वीरों में युरोपियन पुट (European bias) देखने को मिलने लगा। मसलन प्रधानमंत्री वाले उकसावे में, कुछेक राउंड के बाद शांति समझौता वाला गंभीर माहौल झाड़-फानूस से सजे एक भव्य बैठक व्यवस्था वाले बड़े से कमरे में तब्दील हो गया था। बाकी उकसावों की तस्वीरों में भी गोथिक कैथेड्रल, पेरिस की बारिश वाली रात, युरोपीय गांव के नज़ारे दिखने लगे। शोधकर्ताओं ने अन्य एआई मॉडल के साथ भी यह खेल खेला, लेकिन तब भी यही रुझान बने रहे।

इस पूरी प्रक्रिया के बाद एआई द्वारा बनाई गई तस्वीरों में मुख्यत: 12 आकृतियां दिखाई दीं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये तस्वीरें ‘पिक्चर पर्फेक्ट’ (आदर्श) तस्वीरों की तरह थीं – आकर्षक, स्वीकार्य और आपत्तिजनक सामग्री से मुक्त। दोहरावों की संख्या 100 से बढ़ाकर 1000 करने पर भी यही नतीजे मिले। बस एक मामले को अपवाद माना जा सकता है, जिसमें 100 चक्र के बाद बर्फ से ढंका घर बदलकर मैदान में गाय के दृश्य की ओर और फिर विलक्षण शहर की ओर मुड़ गया।

तस्वीरों में यह पैटर्न दिखाई देना कुछ हद तक विज़ुअल मॉडल्स (visual models) को प्रशिक्षित करने के लिए इस्तेमाल किए गए डैटा सेट को प्रतिबिंबित करता है। जो जानकारी और चीज़ें मॉडल्स के पास थीं, उन्होंने वही समझा, वही बनाया। इन नतीजों से एक जो चिंता उभरती है वह यह कि यदि एआई से मनुष्य का दखल पूरी तरह हट जाएगा तो यह रचनात्मक विविधता को घटा सकता है। बेलगाम एआई प्रणालियां मौजूदा पूर्वाग्रहों को बढ़ा सकती हैं, मज़बूत कर सकती हैं। जैसे तस्वीरों में एक ही तरह की संस्कृति दिखना और बाकियों का गायब रहना (cultural bias in AI) उनकी महत्ता को ओझल करता है।

देखा जाए तो हर सभ्यता का (या मनुष्यों का भी) कुछ जानी-पहचानी चीज़ों की ओर झुकाव होता है। जैसे कुछ तरह की कलाकृतियां या कुछ तरह की कहानियां हर संस्कृति में मिलेंगी। लेकिन मनुष्यों के बीच हमेशा ऐसे लोग होते हैं जो कुछ नया और कुछ अलग रचते (creative innovation) रहते हैं, उसे तरजीह देते हैं। और ऐसे लोग एकरूपता को तोड़कर विविधता बनाए रखते हैं।

वैसे जिस तरह से मॉडल्स अपडेट हो रहे हैं, हो सकता है कि जल्द ही एआई मॉडल्स की ये खामियां भी दूर हो जाएं। लेकिन सवाल रचनात्मकता का है। मनुष्य के लिए खुद को समझने (human creativity) और अर्थ देने के लिए रचनात्मक होना ज़रूरी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एआई की मदद से टेलीपैथिक बातचीत

सोचिए, कैसा हो कि आप गूगल (Google) से बिना कुछ बोले मौसम की जानकारी ले सकें या फिर कोई रिमाइंडर सेट कर सकें। हाल ही में AlterEgo नामक एक नए पहनने योग्य डिवाइस (wearable device) ने कुछ ऐसा ही दावा किया है। इसमें आप मन में ‘बोलते’ हैं और एआई (AI) उसे समझ लेता है।

AlterEgo के निर्माता और प्रमुख अर्नव कपूर ने बताया कि इसे कान (ear) पर आराम से लगाया जा सकता है। यह एलन मस्क के Neuralink के समान मस्तिष्कीय संकेतों को नहीं पकड़ता बल्कि चेहरे और गले की मांसपेशियों (facial muscles) में बोलते समय (या बिना आवाज़ निकाले होंठ हिलाने पर) बनने वाले छोटे-छोटे विद्युत संकेतों को पकड़ता है। एआई इन संकेतों को शब्दों में बदल देता है और जवाब बोन कंडक्शन हेडफोन (bone conduction headphones) के ज़रिए पहनने वाले को सुनाई देता है।

कपूर के अनुसार यह आपको टेलीपैथी (telepathy) की ताकत देता है, लेकिन सिर्फ उन्हीं विचारों के लिए जिन्हें आप साझा करना चाहते हैं।

इस उपकरण की विशेष बात यह है कि इसे लगाने के लिए किसी ऑपरेशन की ज़रूरत नहीं होती। यह बिल्कुल सुरक्षित है जो सिर्फ चेहरे और गले की नसों (nerves) से प्राप्त वाले संकेतों का इस्तेमाल करता है। इसी कारण इसे अपनाना बहुत आसान है।

यह सिस्टम 2018 में एमआईटी मीडिया लैब (MIT Media Lab) में एक भारी-भरकम प्रोटोटाइप (prototype) के रूप में शुरू हुआ था। क्योंकि उस समय एआई की स्पीच पहचान (speech recognition) तकनीक सीमित थी, इसलिए इसका इस्तेमाल सिर्फ साधारण कामों जैसे वेब सर्च करना या खाना ऑर्डर करने तक सीमित था। लेकिन अब एआई में हुई प्रगति से यह उपकरण एक आधुनिक और बाज़ार में उतरने लायक उत्पाद बन गया है।

सुविधा से परे, AlterEgo का असल फायदा स्वास्थ्य (healthcare) क्षेत्र में है। इसे ऐसे मरीज़ों पर आज़माया जा रहा है जिन्हें मोटर न्यूरॉन डिसीज़ (motor neuron disease) या मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसी बीमारियां हैं, जिनमें समय के साथ बोलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे मरीज़ जो पूरी तरह से ‘लॉक-इन’ नहीं हैं लेकिन बोलने में संघर्ष करते हैं, उनके लिए यह उपकरण परिवार, डॉक्टर और देखभाल करने वाले के साथ संवाद का एक अहम साधन बन सकता है।

बहरहाल, विशेषज्ञ अभी सतर्क हैं। वॉशिंगटन युनिवर्सिटी (Washington University) के इंजीनियर हावर्ड चिज़ेक का मानना है कि यह तकनीक बहुत स्मार्ट (smart technology) है और प्राइवेसी के लिए अमेज़न एलेक्सा (Amazon Alexa) जैसे उपकरणों से भी सुरक्षित है जो हमेशा सुनते रहते हैं। लेकिन एक मुख्य सवाल आम लोगों तक इसकी पहुंच का है क्योंकि इसका इस्तेमाल काफी हद तक चेहरे की मांसपेशियों पर उपयोगकर्ता के नियंत्रण (user control) पर निर्भर करता है। (स्रोत फीचर्स)

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हरित हाइड्रोजन की ओर बढ़ते कदम

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

भारतीय रेल्वे (Indian Railways) ने हाल ही में घोषणा की है कि हाइड्रोजन से चलने वाली एक ट्रेन (Hydrogen Train India) ने सभी परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं; यह ट्रेन चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्टरी में विकसित की गई है। यह कदम राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (Green Hydrogen Mission) की प्रगति का एक अच्छा संकेत है। इस मिशन का लक्ष्य वर्ष 2030 तक देश में प्रति वर्ष कम से कम पचास लाख मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन का उत्पादन करना है, जो 2070 तक देश में शून्य कार्बन उत्सर्जन (Net Zero Emission) के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।

यह ट्रेन जल्द ही हरियाणा में जींद और सोनीपत के बीच 89 किलोमीटर लंबे मार्ग दौड़ेगी। यह ट्रेन जींद में स्थित 1 मेगावाट के पॉलीमर इलेक्ट्रोलाइट मेम्ब्रेन इलेक्ट्रोलाइज़र (PEM Electrolyzer) द्वारा उत्पादित हाइड्रोजन पर निर्भर है, जहां प्रतिदिन 430 किलोग्राम हाइड्रोजन का उत्पादन होता है। ट्रेन के ईंधन टैंक में हाइड्रोजन भरी जाएगी, ईंधन सेल (Fuel Cell Technology) हाइड्रोजन को बिजली में बदलेगा जिससे ट्रेन की इलेक्ट्रिक मोटरें चलेंगी।

हाइड्रोजन बनाने का सिद्धांत (Hydrogen Production Process) काफी सरल है। विद्युत-अपघटक पानी के अणु को ऑक्सीजन, हाइड्रोजन आयन और इलेक्ट्रॉन में तोड़ता है। इस विद्युत-रासायनिक अभिक्रिया में ऋणात्मक इलेक्ट्रोड (एनोड – (Anode)) पर आणविक ऑक्सीजन मुक्त होती है, और मुक्त इलेक्ट्रॉन एक बाहरी परिपथ के माध्यम से धनात्मक इलेक्ट्रोड (कैथोड- (Cathode)) तक पहुंचते हैं। कैथोड और एनोड के बीच छन्ने के रूप में एक बहुलक विद्युत अपघटक झिल्ली होती है, जो केवल हाइड्रोजन आयन को कैथोड तक जाने देती है, जहां वे इलेक्ट्रॉनों के साथ मिलकर हाइड्रोजन अणु बनाते हैं। ये अणु गैस के रूप में ऊपर आते हैं। फिर इस गैस को संपीड़ित करके संग्रहित कर लिया जाता है। छन्ने के तौर पर इस्तेमाल झिल्ली आम तौर पर एक फ्लोरोपॉलीमर, जैसे नैफिऑन (टेफ्लॉन से सम्बंधित) (Nafion Membrane), से बनी होती है। यह झिल्ली विद्युत की उम्दा कुचालक होती है, जो अपने में से इलेक्ट्रॉन्स को गुज़रने नहीं देती। उत्पादित हाइड्रोजन और ऑक्सीजन एकदम अलग-अलग जगह बनते हैं।

हाइड्रोजन से चलने वाले वाहनों (Hydrogen Vehicles) में हाइड्रोजन ईंधन सेल में उपरोक्त अभिक्रिया विपरीत दिशा में होती है। हाइड्रोजन को एनोड तक लाया जाता है, जहां उत्प्रेरक (Catalyst) की उपस्थिति में प्रत्येक हाइड्रोजन अणु टूटकर दो हाइड्रोजन आयन और दो इलेक्ट्रॉन बनाता है। हाइड्रोजन आयन झिल्ली से होकर कैथोड तक जाते हैं जबकि इलेक्ट्रॉन इस झिल्ली को पार नहीं कर पाते और एक बाहरी परिपथ (External Circuit) के ज़रिए कैथोड तक पहुंचते हैं। कैथोड पर हाइड्रोजन आयन का संपर्क हवा में मौजूद ऑक्सीजन और एनोड तक बाहरी परिपथ के माध्यम से लाए गए इलेक्ट्रॉनों से होता है। इस प्रकार पानी बनता है। बाहरी परिपथ से प्रवाहित इलेक्ट्रॉन विद्युत धारा पैदा करते हैं जो वाहन को शक्ति प्रदान करती है।

ईंधन सेल (Hydrogen Fuel Cell) और विद्युत अपघटक में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं में एक महत्वपूर्ण अंतर है। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक अभिक्रिया स्वतःस्फूर्त होती है। दूसरी ओर, पानी अपने आप इन दो तत्वों में नहीं टूटता। इस विद्युत-रासायनिक अभिक्रिया को ऊर्जा देने के लिए विद्युत आपूर्ति आवश्यक होती है।

और, हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen Production) बनाने के लिए विद्युत-अपघटक को बिजली नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) स्रोतों से मिलनी चाहिए; जैसे, सौर (Solar Energy) या पवन ऊर्जा (Wind Energy)। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा के नए स्रोतों की ज़रूरत होगी। सूक्ष्मजीवों की इलेक्ट्रोलाइटिक कोशिकाओं (Microbial Electrolysis Cell) में हाइड्रोजन का उत्पादन करने के रोमांचक प्रयास भी चल रहे हैं। इसमें विद्युत-रासायनिक रूप से सक्रिय सूक्ष्मजीव एनोड पर फलते-फूलते हैं और कृषि अवशेषों, अपशिष्ट जल जैसे कार्बनिक पदार्थों का ऑक्सीकरण करते हैं, और इस प्रक्रिया में उत्पन्न इलेक्ट्रॉनों को एनोड तक पहुंचाया जाता है।

उत्प्रेरक (Hydrogen Catalyst) के तौर पर इसमें प्लैटिनम, इरिडियम जैसे महंगे पदार्थ चाहिए होते हैं। वर्तमान शोध का उद्देश्य महंगे तत्वों को निकल, कोबाल्ट, या लोहे जैसे सस्ते तत्वों से प्रतिस्थापित करना है। सस्ते हाइड्रोजन उत्पादन (Low-cost Hydrogen) के शुरुआती कार्य में जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (J.N.C.A.S.R.) के सी.एन.आर. राव के समूह ने प्लैटिनम इलेक्ट्रोड के बराबर जल-अपघटन क्षमता वाले निकल-निकल हाइड्रॉक्साइड-ग्रेफाइट इलेक्ट्रोड डिज़ाइन किए हैं। ऐसे शोध कार्यों को सौर ऊर्जा (Solar Hydrogen) और सूक्ष्मजीव-चालित प्रक्रियाओं के साथ जोड़कर एक ऐसा ईंधन तैयार किया जा सकता है जो पर्यावरण के अनुकूल भी हो और सस्ता भी। (स्रोत फीचर्स)

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खाद्य तेल की मदद से ई-कचरे से चांदी निकालें

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

सोने के बाद चांदी सबसे कीमती धातु मानी जाती है। कई परिवारों में खुशी के मौकों पर सोने-चांदी की चेन-अंगूठियां ली-दी जाती हैं (या पहनी जाती हैं)। बेशक, चांदी सोने से सस्ती है।

लेकिन जब उद्योग (silver in industry) और ऊर्जा उत्पादन (silver in clean energy) में उपयोग की बात आती है तो चांदी सोने को पछाड़ देती है। पूरे भारत में चांदी का इस्तेमाल छतों पर लगे सौर पैनलों (solar panels) के माध्यम से सौर ऊर्जा को कैद करने में किया जाता है। इससे पूरे देश में सालाना लगभग 108 गीगावॉट स्वच्छ एवं हरित बिजली पैदा होती है। यह मात्रा कोयले से पैदा होने वाली बिजली की लगभग 10 प्रतिशत है। इसके अलावा, भारत की लगभग 1.4 अरब आबादी द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मोबाइल फोन (silver in mobile phones) में विद्युत चालन और भंडारण के लिए चांदी का इस्तेमाल किया जाता है। हर मोबाइल फोन में लगभग 100-200 मिलीग्राम चांदी होती है। इसी तरह, एक सामान्य लैपटॉप में 350 मिलीग्राम चांदी उपयोग होती है, और वर्तमान में भारत में लगभग 5 करोड़ लैपटॉप हैं।

यदि भारत में मोबाइल फोन और लैपटॉप इतनी संख्या में हैं तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि पूरी दुनिया में इनकी संख्या कितनी होगी। अनुमान है कि मोबाइल-लैपटॉप या ऐसी ही अन्य चीज़ों में पूरे विश्व में लगभग 7275 मीट्रिक टन चांदी लगती है। लेकिन (इन उपकरणों के खराब होने पर इनसे) बमुश्किल 15 प्रतिशत चांदी ही वापस निकालकर पुनर्चक्रित (silver recycling) की जाती है। जब कोई फोन या कंप्यूटर खराब हो जाता है या फेंक दिया जाता है तो उसमें मौजूद चांदी भी कूड़े में चली जाती है। काश! हम इन बेकार उपकरणों से यह चांदी वापिस निकाल पाते…

यह तो साफ है कि स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में चांदी (silver in renewable energy) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस संदर्भ में मारिया स्मिरनोवा एक हालिया रिपोर्ट स्प्रॉट सिल्वर रिपोर्ट (Sprott Silver Report) में लिखती हैं कि जैसे-जैसे अधिकाधिक देश सौर पैनलों का उपयोग करके अक्षय ऊर्जा बनाएंगे, वैसे-वैसे चांदी की मांग (silver demand in solar industry) में लगातार वृद्धि होगी। वे आगे बताती हैं कि भले ही कुछ समूह सौर ऊर्जा के लिए अन्य धातुओं (जैसे लीथियम, कोबाल्ट और निकल) का उपयोग करने पर विचार कर रहे हैं, फिर भी स्वच्छ और हरित ऊर्जा उत्पादन में चांदी एक प्रमुख भूमिका निभाती है। और, इस साल चांदी की मांग में लगभग 170 प्रतिशत वृद्धि होने की उम्मीद है। इसके अलावा, कारों, बसों और ट्रेनों (electric vehicles) में ईंधन के रूप में पेट्रोल की जगह सौर ऊर्जा का उपयोग होना शुरू हुआ है। स्मिरनोवा आगे बताती हैं कि अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि 2035 तक, दुनिया भर में बिकने वाली हर दूसरी कार इलेक्ट्रिक होगी। इसका मतलब होगा कि हमें और चांदी चाहिए होगी।

इसी संदर्भ में, फिनलैंड के प्रोफेसर टिमो रेपो और उनके साथियों ने अपने शोधपत्र में चांदी को पुनःचक्रित करने की एक कुशल रासायनिक विधि (green silver recovery)  प्रस्तुत की है। इस विधि में कार्बनिक वसीय अम्लों (जैसे लिनोलेनिक या ओलिक एसिड) (fatty acids for silver extraction) का उपयोग चांदी निकालने में किया गया है। ये कार्बनिक वसीय अम्ल तिलहन, मेवों और वनस्पति तेलों (जैसे जैतून का तेल या मूंगफली का तेल) में पाए जाते हैं, जिनका दैनिक भोजन में उपयोग होता है।

गौरतलब है कि इलेक्ट्रॉनिक कचरे (e-waste silver recovery) से चांदी को पुन: प्राप्त करना आसान नहीं है: प्रबल अम्लों और साइनाइड के उपयोग की वजह से इस प्रक्रिया में विषाक्त पदार्थ पैदा हो सकते हैं। अन्य धातुओं और मिश्र धातुओं से चांदी को अलग करने की पारंपरिक विधियों का उपयोग करने की बजाय उपरोक्त समूह ने सूरजमुखी, मूंगफली और अन्य तेलों में प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाले साधारण असंतृप्त वसीय अम्लों के उपयोग से चांदी को अलग करके पुन: हासिल करने की एक विधि विकसित की है। समूह ने पाया कि इनका पुनर्चक्रण किया जा सकता है और इस प्रकार ये कार्बनिक विलायक और जलीय माध्यम से बेहतर हैं।

शोधकर्ताओं ने इस विधि को ‘शहरी खनन’ (urban mining of silver) में भी कारगर पाया है, जहां कबाड़ या कचरे में फेंके गए कंप्यूटर के मदरबोर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक पुर्ज़ों के कचरे से चांदी पुन: निकाली जा सकती है। शोध दल का निष्कर्ष है, “वसीय अम्ल बहुमूल्य बहु-धातु अपशिष्ट के निपटान का उन्नत माध्यम बन सकते हैं।” (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अब जानेंगे, पृथ्वी कैसे सांस ले रही है!

इरफान ह्यूमन

पेड़ और जंगल वातावरण से कार्बन डाईऑक्साइड अवशोषित करते हैं (carbon sequestration by forests) और उसे अपने तने, शाखा, पत्तियों वगैरह की सामग्री के रूप में समो लेते हैं। इसलिए यह जानना बहुत ज़रूरी है कि धरती पर कितना जैविक पदार्थ (बायोमास) (forest biomass estimation) मौजूद है और समय के साथ कैसे बदल रहा है। बायोमास का मतलब है पेड़ों के तने, शाखाओं, पत्तियों और जड़ों में सारे ठोस वनस्पति पदार्थ का कुल वज़न। अभी तक बायोमास का अनुमान लगाने के लिए केवल ज़मीनी सर्वेक्षण (ground survey methods) या साधारण उपग्रह तस्वीरों (basic satellite imagery) का सहारा लिया जाता था, जो सटीक नहीं था।

पृथ्वी पर मौजूद पेड़ों और जंगलों के जैविक द्रव्यमान को मापने के लिए युरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने ‘बायोमास’ नामक एक उपग्रह (ESA Biomass Satellite) लॉन्च किया है। मिशन अवधि लगभग 5 साल (2030 तक) है। यूके, फ्रांस, इटली और जर्मनी जैसे युरोप के कई देश इस मिशन में प्रमुख भागीदार हैं। इसका मुख्य उद्देश्य यह जानना है कि धरती पर कितनी मात्रा में कार्बन पेड़ों में जमा है (carbon stock in trees) और यह जलवायु परिवर्तन को किस तरह प्रभावित (climate change impact) करता है।

इस उपग्रह से 1.5 ट्रिलियन पेड़ों का बायोमास मापना संभव हो सकेगा। इसका डैटा यह समझने में मदद करेगा कि कितनी मात्रा में कार्बन वातावरण से अवशोषित किया गया है, कौन से क्षेत्र कार्बन स्रोत (उत्सर्जक) (carbon source regions)  और कौन से कार्बन सिंक (शोषक) (carbon sink regions) हैं। उदाहरण के लिए अगर अमेज़न के जंगल कट रहे हैं, तो वहां का बायोमास कम होगा और वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड बढ़ेगी। इससे हम जलवायु परिवर्तन (global climate change) और ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों को बेहतर समझ पाएंगे। वैश्विक बायोमास डैटा हर 6 महीने में अपडेट (biomass satellite data update) किया जाएगा।

यह डैटा काफी महत्वपूर्ण होगा: इसका उपयोग पेड़ों के कुल वज़न और मात्रा के आकलन, संग्रहित कार्बन भंडार के मूल्यांकन (carbon storage assessment), वनों की कटाई के वास्तविक प्रभाव, जलवायु मॉडलिंग में सुधार (climate modeling improvement), कार्बन सिंक के रूप में चिंहित क्षेत्रों के लिए पर्यावरण संरक्षण नीति बनाने (environmental policy planning), वैश्विक कार्बन चक्र को समझने और ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने की रणनीति बनाने में किया जा सकेगा। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन मॉडल्स को अधिक सटीक बनाने और वनों की कटाई और पुनर्वनीकरण की निगरानी (deforestation and reforestation monitoring)  करने में भी यह उपयोगी होगा। इससे पर्यावरण संरक्षण योजनाओं को मज़बूत बनाने, विकासशील देशों को वनों के प्रबंधन में मदद करने और कार्बन ट्रेडिंग (carbon trading) और जलवायु वित्त (climate finance) में सटीक डैटा प्रदान करने में मदद मिलेगी।

उपग्रह की विशेषताएं

1. कक्षीय डिज़ाइन: यह बायोमास उपग्रह पृथ्वी से लगभग 660 कि.मी. की ऊंचाई पर सूर्य-समकालिक ध्रुवीय कक्षा (sun-synchronous polar orbit) में चक्कर लगाएगा। यह कक्षा सुनिश्चित करती है कि उपग्रह नियमित अंतराल पर उत्तरी व दक्षिणी गोलार्धों पर पृथ्वी के सभी क्षेत्रों को कवर करेगा, जिसमें उष्णकटिबंधीय, समशीतोष्ण, और बोरीयल वन (tropical, temperate, and boreal forests) शामिल हैं। उपग्रह का पुनरावृत्ति चक्र ऐसा है कि यह हर 25 दिनों में एक ही क्षेत्र को दोबारा स्कैन करेगा, जिससे समय के साथ परिवर्तन की निगरानी संभव होगी।

2. अनूठी रडार तकनीक: सामान्य उपग्रह प्रकाशीय कैमरे या एल-बैंड (आवृत्ति 1000-2000 मेगाहर्ट्ज) रडार का उपयोग करते हैं। लेकिन बायोमास उपग्रह में पी-बैंड रडार (P-band radar technology) का इस्तेमाल हो रहा है, जो एक कम आवृत्ति माइक्रोवेव (300-1000 मेगाहर्ट्ज़) सिग्नल प्रेषित करता है, जिससे मिट्टी और घने जंगलों के अंदर तक पैठ बना सकती है। इसका मतलब, यह पेड़ की केवल ऊपरी नहीं बल्कि अंदर तक जानकारी जुटाता है, जैसे पेड़ की ऊंचाई, तने की मोटाई और घनत्व वगैरह।

यह तकनीक दिन-रात और मौसम से बेफिक्र डैटा संग्रह करने में सक्षम है, क्योंकि रडार बादलों और बारिश से अप्रभावित रहता है। यह पहला मौका है जब कोई उपग्रह इतनी कम आवृत्ति पर काम करेगा। गौरतलब है कि पी-बैंड रडार तकनीक को लेकर सुरक्षा सम्बंधी नियम भी हैं क्योंकि इसका उपयोग रक्षा और संचार में भी होता है। लेकिन पृथ्वी को बचाने के लिए यह डैटा इकट्ठा करने हेतु युरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी को पी-बैंड के उपयोग की विशेष अनुमति दी गई है (forest density mapping, tree height detection, forest structure analysis)।

3. पोलेरिमेट्रिक और इंटरफेरोमेट्रिक डैटा: इन तकनीकों का मदद से वन की संरचना (जैसे, पत्तियां, तने, ज़मीन) को अलग-अलग पहचाना जा सकता है। इंटरफेरोमेट्रिक तकनीक से सतह की ऊंचाई और 3-डी संरचना मापी जाती है। टोमोग्राफिक एसएआर से वन की ऊर्ध्वाधर परतों (चंदवे, तनों, ज़मीन) का 3डी मॉडल बनाया जाता है।

4. वैश्विक कवरेज: उपग्रह हर 6 महीने में पूरी पृथ्वी को स्कैन करेगा। लक्ष्य यह है कि धरती के लगभग 30 करोड़ वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को कवर किया जाए। सरल शब्दों में कहा जाए तो बायोमास उपग्रह धरती के पेड़ों का एक्स-रे स्कैन करेगा, ताकि हम जान सकें कि पृथ्वी पर कितने पेड़ हैं, उनमें कितना कार्बन है और जंगल किस गति से घट-बढ़ रहे हैं। यह उपग्रह इतनी बारीकी से स्कैन कर सकता है कि 20-20 वर्ग मीटर तक के छोटे इलाके में भी पेड़ के बायोमास का पता चल सकेगा। यह मिशन हमारे ग्रह को बचाने के बड़े अभियानों का एक अहम हिस्सा है।

कवरेज की बात करें तो बायोमास उपग्रह उष्णकटिबंधीय वर्षावनों (अमेज़ॉन, कांगो), समशीतोष्ण वनों (उत्तरी अमेरिका और युरोप के जंगल) और बोरीयल वनों (साइबेरिया और कनाडा के टैगा) को कवर करेगा। यद्यपि उपग्रह का प्राथमिक लक्ष्य वन हैं, यह मिट्टी और सतह की जानकारी (जैसे रेगिस्तान या बर्फीले क्षेत्र) भी एकत्र कर सकता है, लेकिन इन क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता सीमित है।

जैव पदार्थ सम्बंधी डैटा कार्बन चक्र को समझने और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने की रणनीतियों में मदद करता है। उपग्रह अवैध कटाई, वन क्षरण, और पुनर्जनन की वैश्विक निगरानी करेगा, जो नीति निर्माण और संरक्षण प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण है। वैश्विक डैटा पारिस्थितिकी, जैव-विविधता, और भू-विज्ञान के अध्ययन में उपयोगी है और अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के लिए आधार प्रदान करेगा। कुल मिलाकर यह मिशन धरती के जंगलों के एक्स-रे निरीक्षण (x-ray monitoring) जैसा है, जिससे हम जान पाएंगे कि पृथ्वी कैसे सांस ले रही है! (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पत्ती है या पतंगा?

हां दी गई तस्वीर को ध्यान से देखिए। आपके ख्याल से यह किसकी तस्वीर है? यदि आपका कहना है कि यह तो किसी सूखी सी, मुड़ी हुई पत्ती की तस्वीर है तो इस कीट की युक्ति सफल हुई है और आप धोखा खा गए हैं। वास्तव में, इस तस्वीर में जो दिखाई दे रहा है वह कोई पत्ती नहीं बल्कि एक तरह का पतंगा (Eudocima salaminia) (camouflage moth) है। इस पतंगे के पत्ती सरीखे शरीर का उद्देश्य ही है अपने शिकारियों को चकमा देना ([mimicry in insects], [natural camouflage]) और उनसे बचना। और, मज़ेदार बात यह है कि सिर्फ हम-आप या इसके शिकारी ही नहीं बल्कि एआई (कृत्रिम बुद्धि – artificial intelligence) भी इसके इस रूप-रंग के कारण धोखा खा गया और इसे पत्ती या पेड़ की छाल मान बैठा।

बताते चलें कि यह पत्तीरूपिया पतंगा मुख्यत: भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया (India and Southeast Asia insects) में पाया जाता है, और साइट्रस फलों (जैसे नींबू, संतरा, मौसंबी) को पसंद करता है।

अब आते हैं इस बात पर कि एआई ने इसे कहां देख लिया और कैसे धोखा खा गया। असल में शोधकर्ता डीप लर्निंग एआई (deep learning model, AI in biology) से छद्मावरणधारी छह तरह के पतंगों की 3-डी तस्वीर बनवाना चाह रहे थे। इसके लिए उन्होंने पैटर्न पहचानने में दक्षता रखने वाले एक डीप लर्निंग एआई को जानकारी के तौर पर उन्हीं पतंगों की 2-डी तस्वीरें दिखाई जिनकी 3-डी तस्वीर उन्हें बनवानी थी। इन्हीं छह पतंगों में Eudocima salaminia पतंगे की तस्वीरें भी शामिल थीं।

बस यहीं एआई पतंगे के शरीर का पैटर्न समझने में धोखा खा गया और उसने Eudocima salaminia की पतंगेनुमा तस्वीर बनाने की बजाय मुड़े हुए पत्ते या पेड़ की छाल जैसी 3-डी छवियां बना डालीं। यह खबर शोधकर्ताओं ने जर्नल ऑफ दी रॉयल सोसाइटी इंटरफेस (journal of royal society interface) में प्रकाशित की है।

अब आगे वैज्ञानिक एआई को अलग-अलग दिशा से आती रोशनी में खींची गई और अलग-अलग पृष्ठभूमि में खींची गई तस्वीरें दिखा कर देखना चाहते हैं कि क्या इन प्राकृतिक परिवेश (natural environments) में भी एआई धोखा खाता है या पत्ती और पतंगे में भेद कर पाता है। साथ ही वे शिकारियों को धोखा देने के उद्देश्य के अलावा अन्य उद्देश्य से छद्मावरण धारण करने वाले विभिन्न जीवों पर भी ऐसे प्रयोग करके देखना चाहते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक्सपांशन माइक्रोस्कोपी: सूक्ष्म अवलोकन के लिए जुगाड़

डॉ. भास बापट

मारी दृष्टि कई मामलों में सीमित है। पहला, हम प्रकाश वर्णक्रम (light spectrum) के केवल एक छोटे हिस्से को ही देख पाते हैं। हमारी देखने की क्षमता 400 नैनोमीटर (nanometer) (लाल प्रकाश) से 700 नैनोमीटर (बैंगनी) तरंगदैर्घ्य के बीच होती है। इसे दृश्यमान सीमा (visible spectrum) कहा जाता है। हम इसके बीच आने वाली तरंगदैर्घ्य के प्रकाश को ही देख पाते हैं। इससे कम तरंगदैर्घ्य (अवरक्त infrared, IR) या अधिक तरंगदैर्घ्य (पराबैंगनी ultraviolet, UV) के प्रति हम असंवेदनशील होते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि इस सीमा से बाहर का प्रकाश हमें प्रभावित नहीं करता – कहने का मतलब यह है कि हम इन तरंगदैर्घ्यों की सीमा के बाहर के प्रकाश को देख नहीं पाते।

दूसरा, हम लगभग 30 माइक्रॉन (micron) तक की साइज़ की वस्तु ही देख सकते हैं, इससे छोटी नहीं। अंदाज़े के लिए देखें कि 1 मि.मी. 1000 माइक्रॉन के बराबर होता है। इससे सूक्ष्म चीज़ों को न देख पाने की सीमा हमारी आंख की संरचना – लेंस (lens) और रेटिना (retina) – के कारण होती है।

इससे सूक्ष्म चीज़ों को देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी (microscope) का उपयोग किया जा सकता है। प्रकाश सूक्ष्मदर्शी (light microscope) किसी नमूने को हमें लगभग 100 गुना बड़ा (आवर्धित magnified) करके दिखा सकता है; इसकी मदद से हम 0.3 माइक्रॉन (0.0003 मिलीमीटर) साइज़ तक की चीज़ें देख सकते हैं।

मान लीजिए, हमारे सूक्ष्मदर्शी के लेंस बढ़िया हों और रेटिना भी बेहतर हो तब भी एक सीमा (साइज़) तक की ही सूक्ष्म चीज़ों को हम देख सकते हैं। भौतिकी के नियमानुसार, किसी तरंगदैर्घ्य का प्रकाश अपनी तरंगदैर्घ्य के लगभग आधी साइज़ की वस्तु की छवि बना सकता है। यह सीमा विवर्तन (डिफ्रेक्शन – diffraction) के कारण होती है। विवर्तन यानी किसी वस्तु या अवरोध से टकराकर उसके आसपास प्रकाश तरंगों का मुड़कर आगे निकल जाना।

सरल रूप में विवर्तन को इस तरह समझ सकते हैं। यदि आप किसी तालाब में पत्थर फेंकते तो उसके चारों ओर लहरें बनती हैं, और आगे फैलती जाती हैं। पानी पर पत्तियों या छोटी डंडियों जैसे छोटे अवरोधक तैरते रहते हैं, लेकिन इनकी उपस्थिति के बावजूद दूर खड़ा दर्शक इन लहरों को समान रूप से आगे बढ़ते हुए देख पाता है, उसे लहरों में कोई उथल-पुथल नहीं दिखेगी। लेकिन, यदि पानी पर तैरने वाला अवरोधक लहर की साइज़ (wavelength) (यानी दो क्रमागत लहरों के बीच की दूरी) से बड़ा होता है तो लहरें विकृत हो (टूट) जाती हैं। संक्षेप में, लहर की साइज़ से छोटी वस्तुएं लहरों में परिवर्तन नहीं कर पातीं, जबकि उससे बड़ी वस्तुएं ऐसा कर पाती हैं।

ऐसा ही प्रकाश (light waves) के साथ भी होता है। प्रकाश केवल तभी प्रतिबिंब (image formation) बना सकता है जब वह बाधित किया जाता है। इसलिए बहुत छोटी वस्तुओं (तरंगदैर्घ्य से छोटी वस्तुओं) का प्रतिबिंब नहीं बन सकता। और यह सीमा है 300 नैनोमीटर, यानी तरंगदैर्घ्य के लगभग आधे के बराबर।

इस विभेदन सीमा (resolution limit) से पार पाने के लिए वैज्ञानिकों ने कई जुगाड़ किए हैं। इनमें से एक है अत्यंत लघु तरंगदैर्घ्य के प्रकाश (short wavelength light) और विशेष स्क्रीन का उपयोग करना। अलबत्ता, यह तरकीब हमें बहुत दूर तक नहीं ले जा सकती। बहुत सूक्ष्म चीज़ों को फिर भी नहीं देख पाते। इसके अलावा, अत्यंत लघु तरंगदैर्घ्य (जैसे एक्स-रे) हानिकारक हो सकती हैं और इसलिए केवल निर्जीव वस्तुओं के अवलोकन में उपयोगी होती हैं।

दूसरी तकनीक है इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (electron microscope)। इसमें इलेक्ट्रॉन्स के तरंग गुणों का उपयोग करके छवि बनाई जाती है। (क्वांटम यांत्रिकी के मुताबिक इलेक्ट्रॉन से सम्बद्ध तरंग की तरंगदैर्घ्य लगभग 10-10 मीटर होती है।) लेकिन ये भी मृत कोशिकाओं (dead cells) या वायरस (virus imaging) जैसी निर्जीव वस्तुओं तक ही सीमित हैं।

फिर, पिछले करीब 10 सालों में लेज़र द्वारा उद्दीप्त उत्सर्जन (stimulated emission) और (जिसकी छवि बनानी है उस) वस्तु के अणुओं की कुछ क्वांटम यांत्रिक विशेषताओं का उपयोग करके सूक्ष्म चीज़ों की छवि बनाने का तरीका विकसित किया गया है। इस तकनीक को सुपररिज़ॉल्यूशन माइक्रोस्कोपी (super-resolution microscopy) कहा जाता है।

हाल ही में, इसी काम के लिए एक्सपांशन माइक्रोस्कोपी (expansion microscopy – विस्तार सूक्ष्मदर्शिकी) नामक एक और तकनीक विकसित की गई है। यह तकनीक एक सर्वथा अलग सिद्धांत पर आधारित है, जो काफी सरल है। मान लीजिए कि जिस सूक्ष्म वस्तु का अवलोकन करना है उसे किसी तरीके से, हर तरफ समान रूप से फैलाया जाए; जैसे हम किसी गुब्बारे में हवा भरकर उसे फुला कर फैलाते हैं। अब, जब यह गुब्बारा थोड़ा फूला हुआ हो तब हम इस पर तीन चिन्ह (बिंदु) अंकित करते हैं, और उन बिंदुओं के बीच की दूरी को माप लेते हैं। अब यदि गुब्बारे के आयतन को 125 गुना तक फैलाते हैं, और यदि गुब्बारा एक समान रूप से फैलता (फूलता) है तो प्रत्येक बिंदु के बीच की दूरी 5 गुना बढ़ जाएगी। इससे हम उन सूक्ष्म लक्षणों को देख पाएंगे जिन्हें पहले नहीं देख पाए थे।

सूक्ष्म वस्तुओं को देखने के लिए भी यही तरकीब अपनाई जा सकती है। ज़ाहिर है, गुब्बारे की तरह हम उन सूक्ष्म वस्तुओं में हवा भरकर फुला तो नहीं सकते। अलबत्ता हम कुछ ऐसे रसायन (chemical reagents) अवश्य खोज सकते हैं जो सूक्ष्म चीज़ों की संरचना को तोड़े बिना उनके अंदर प्रवेश कर जाएं और उनको फैला दें।

यदि वस्तु का फैलाव पर्याप्त हो जाता है तो वस्तु की बनावट की बारीकियों को साधारण प्रकाश और एक कॉन्फोकल माइक्रोस्कोप से देखा जा सकता है। हालांकि, यह सुनिश्चित होना चाहिए कि वस्तु में रसायन प्रवेश कराने पर वह सभी जगह से एक समान रूप से फैले। ऐसी स्थिति में ही इस तरह प्राप्त आवर्धित छवि विश्वसनीय होगी यानी सारे बिंदु मूल वस्तु के समान ही प्रदर्शित होंगे। यह सुनिश्चित करने के लिए हम इस संभावना का सहारा लेते हैं कि वस्तु में अणु किन्हीं बिंदुओं पर बाहरी रसायन से बंध जाएंगे। वस्तु और रसायन के बंधने के ये स्थान एंकर पॉइंट के रूप में काम करते हैं: कुछ-कुछ फुटबॉल के शीर्ष या जोड़ बिंदुओं की तरह (यानी वे बिंदु जहां फुटबॉल के काले और सफेद बहुभुज मिलते हैं), जो फुटबॉल में हवा भरने पर फुटबॉल की गोलाई (बनावट) को बनाए रखते हैं।

विस्तार माइक्रोस्कोपी एक बहु-चरणीय प्रक्रिया है। इसका मूल कार्य है – नमूने के अंदर एक बहुलक तंत्र का निर्माण करना और फिर इस बहुलक तंत्र को सममित ढंग से फुलाना।

विस्तार माइक्रोस्कोपी के क्रमवार चरण हैं – अभिरंजन (staining – स्टेन) करना, बंध बनाना (cross-linking), विगलित करना (digestion) और विस्तार करना (expansion)। स्टेन करने के चरण में फ्लोरोफोर (fluorophore molecules – दीप्ति बिखेरने वाले अणु) कोशिका में डाले जाते हैं। ये अगले चरण में बहुलक तंत्र से जुड़ जाते हैं। बंधन या लिंकिंग चरण में कोशिकाओं में बहुलक जेल डाला जाता है, जो पूरे नमूने में फैल जाता है। विगलन चरण में एक विलयन कोशिका में डाला जाता है जो कोशिका को पचा डालता और कोशिका से संरचना को हटाता है। यह चरण बहुत अहम चरण होता है, यदि यह चरण विफल हो जाता है तो नमूना ढह या टूट सकता है। अंत में, विस्तारण चरण में जेल सभी तरफ फैल जाता है। जेल से जुड़े फ्लोरोफोर अणु भी पूरे नमूने में फैल जाते हैं और फैले हुए नमूने में नया स्थान ग्रहण कर लेते हैं। चूंकि जेल चारों ओर एक समान रूप से फैलता है, फ्लोरोफोर के अणुओं के बीच एक आनुपातिक अंतराल बना रहता है।

उच्च विभेदन (high-resolution imaging) वाले प्रतिबिंब बनाने के अन्य तरीकों की तुलना में विस्तार माइक्रोस्कोपी का एक लाभ यह है कि इसके लिए जीवविज्ञान प्रयोगशालाओं (biology labs) में उपलब्ध सूक्ष्मदर्शी के अलावा अन्य किसी विशेष उपकरण की ज़रूरत नहीं होती है। इस तरीके की एक कमी यह हो सकती है कि नमूने को एक समान रूप से फैलाने वाले, नमूने को स्थिर रखने वाले, और चिन्हित करने वाले पॉलीमर या फ्लोरोफोर न मिलें। वर्तमान में एक्सपांशन माइक्रोस्कोपी से कॉन्फोकल माइक्रोस्कोप (confocal microscope) का उपयोग करके 70 नैनोमीटर तक की सूक्ष्म चीज़ें देखी जा सकती हैं, अन्य तरीकों से केवल 300 नैनोमीटर तक देख पाना संभव है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कृत्रिम बुद्धि की मदद से प्राचीन शिल्पों का जीर्णोद्धार

आमोद कारखानिस

म जगह-जगह पर कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस – AI) के इस्तेमाल के बारे में सुनते रहते हैं। आम लोगों के लिए एआई का मतलब अधिकतर रोबोट होता है। लेकिन ऐसे कंप्यूटर प्रोग्राम्स (computer programs) का उपयोग बहुत अलग-अलग क्षेत्रों में किया जाता है जो खुद सीखते हैं और सीख-सीखकर खुद को बेहतर बनाते जाते हैं।

हाल ही में मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया में हुए 32वें एसोसिएशन फॉर कंप्यूटिंग मशीनरी (ACM) इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन मल्टीमीडिया में प्रस्तुत एक पेपर में इसी तरह के एक नए उपयोग के बारे बताया गया था। कंबोडिया स्थित बोरोबुदुर चण्डी काफी प्रसिद्ध और पूजनीय बौद्ध विहार है। (इंडोनेशिया की जावा भाषा में बौद्ध मंदिरों को चण्डी कहा जाता है।) 1900 में इस चण्डी के संरक्षण (restoration) के लिए बड़े पैमाने पर कार्यक्रम शुरू किया गया था। इस संरक्षण कार्य के दौरान मंदिर के आधार पर ऐसी कई फर्शियां मिलीं जिन पर (संभवत:) बुद्ध के जीवन या जातक कथाओं के दृश्यों की नक्काशी (carvings) थी। इन फर्शियों के ऊपर पड़े मलबे को हटाकर साफ किया गया। लेकिन सुरक्षा कारणों से लगा कि ऊपरी भवन को सहारा देने के लिए एक नई दीवार बना दी जाए। नई दीवार के पीछे एक बार फिर ये फर्शियां छिप गईं। लेकिन दीवार बनाने के पहले सभी नक्काशियों का दस्तावेज़ीकरण (documentation) कर लिया गया था और उनकी बहुत सारी तस्वीरें खींची गई थीं।

सौ साल से अधिक का समय बीतने के बाद अब इन नक्काशियों की स्थिति क्या होगी कोई नहीं जानता। इसलिए यह ख्याल आया कि उपलब्ध तस्वीरों के आधार पर फर्शियों पर उन नक्काशियों को फिर से बनाना (reconstruction) चाहिए। लेकिन किसी शिल्पकार (sculptor) के लिए इतनी बड़ी संख्या में इतने बारीक विवरणों से तराशी करना बहुत भारी काम है। तो क्या इस काम में कंप्यूटर (computers)  मदद कर सकते हैं? क्या तस्वीरों से 3डी फर्शियां बनाना संभव है?

आजकल ड्राइंग सॉफ्टवेयर (drawing software)  में सामान्यत: दो आयामी तस्वीर से कोई आउटलाइन बनाने की क्षमता होती है। यह काम सॉफ्टवेयर द्वारा इस बात को मानकर किया जाता है कि तस्वीर में जब भी अचानक रंग बदलेगा (या गाढ़ा या गहरा रंग आएगा) तो उसके लिए एक आउटलाइन बना दी जाएगी। लेकिन नक्काशी में गहराई कैसे तय की जाए?

ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों में तो हम रंग का गाढ़ापन या गहरापन (डार्क) (darkness) देखकर दूरी या गहराई का अनुमान लगाते हैं। जो जगहें गाढ़े रंग की हैं वे अधिक गहराई में या नीचे की ओर हैं; और जो जगहें ऊपर की ओर हैं वहां अधिक रोशनी पड़ रही होगी और इसलिए वे अधिक उजली होंगी। इन नियमों के आधार पर काम करने वाले मौजूदा सॉफ्टवेयर ने चण्डी की फर्शियों की त्रि-आयामी रचना तो बना दी थीं, लेकिन इनमें फर्शियों की बारीक नक्काशियों या विवरणों (जैसे चेहरे पर आंखें और नाक) का अभाव था।

इसे बेहतर करने के लिए यह सुझाव दिया गया कि एक ऐसे एल्गोरिदम (algorithm) का उपयोग किया जाए जो उजले रंग से गहरे रंग में परिवर्तन की दर को ‘भांप’ सके। यह कुछ हद तक कंटूर मानचित्र (contour map) जैसा था, जिसका उपयोग भूगोलवेत्ता (geographers) करते हैं। यदि तीखी ढलान है तो कंटूर रेखाएं पास-पास आ जाएंगी। समाधान की ओर यह एक और कदम था लेकिन एक समस्या अब भी बनी हुई थी – चेहरे की हल्की गोलाइयों और सूक्ष्म विवरण को बनाने की। इसके समाधान के लिए शोधकर्ताओं ने यह देखना-समझना शुरू किया कि हम मनुष्य इसे कैसे समझते हैं। उदाहरण के लिए हो सकता है कि एक गोल चेहरे में और चेहरे की विशेषताओं के उजलेपन (या रंग) में बहुत अधिक अंतर न हो, लेकिन क्योंकि हम जानते हैं कि यह एक मूर्ति है इसलिए हम वे बारीकियां भांप लेते हैं।

कंप्यूटर के पास इस ज्ञान का अभाव होता है और वह केवल नियम से चल रहा होता है। यहीं से एआई का काम शुरू होता है। जापान के रित्सुमीकन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सातोशी तनाका की टीम ने कंप्यूटर को हल्की गोलाई को ‘समझने’ और उजलेपन में मामूली फर्क भी पहचानने के लायक बनाने के लिए न्यूरल नेटवर्क (neural network) का उपयोग किया। हाल ही में प्रकाशित शोधपत्र में इसके बारे में जानकारी और परिणाम दिए गए हैं।

यह एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण उपलब्धि है। हमारे पास कई ऐतिहासिक स्थलों (historical sites) की कई ऐसी पुरानी मूर्तियों या नक्काशियों की तस्वीरें होतीं है जो अब मौसम और समय की मार के कारण जीर्ण-शीर्ण हो चुकी हैं। इस तकनीक (technology)  की मदद से उन्हें पुर्नर्निमित कर सकने की आशा जगी है। हालांकि, फिलहाल इस सॉफ्टवेयर तकनीक का परीक्षण केवल नक्काशियों (उकेरन) को पुनर्निर्मित करने के लिए किया गया है, लेकिन भविष्य में इसका इस्तेमाल अन्य तरह से तराशी गई मूर्तियों या शिल्पों के जीर्णोद्धार के लिए भी किया जा सकेगा – उन्हें कम से कम उस अवस्था तक में तो लाया जा सकेगा जब उनकी तस्वीर ली गई थी।

अगला पड़ाव है जीर्ण-शीर्ण मूर्तियों के जीर्णोद्धार में मदद के लिए एआई की सीखने की क्षमता को बढ़ाना। इसमें ज़रूरत होगी इंडोलॉजी (Indology)  और आइकनोग्राफी (iconography) के मानवीय ज्ञान को कंप्यूटर तकनीकों के साथ जोड़ने की – यानी भारतीय उपमहाद्वीप की भाषाओं, ग्रन्थों, इतिहास एवं संस्कृति की जानकारी और प्रतीकों के अर्थ समझने के ज्ञान को कंप्यूटर तकनीकों से जोड़ने की। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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