खुद का भोजन बनाने वाले पौधे शिकारी कैसे बन गए?

डॉ. किशोर पंवार

लाखों-करोड़ों पौधों की दुनिया में कुछ पौधे ऐसे भी हैं जो अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते बल्कि जंतुओं की तरह शिकार करते हैं। इन्हें हम मांसाहारी पौधों (carnivorous plants) के नाम से जानते हैं। चार्ल्स डार्विन ने 1875 में जब अपनी किताब इन्सेक्टीवोरस प्लांट (कीटभक्षी पौधे) (Darwin Insectivorous Plants) प्रकाशित की थी तब तहलका मच गया था कि ऐसे भी पौधे होते हैं। तभी से ये विचित्र शिकारी पौधे आश्चर्य और कौतूहल का विषय रहे हैं। इन पौधों को लेकर तमाम भ्रम फैले या फैलाए गए। खासकर कुछ फिल्मों ने यह दर्शाया कि ऐसे पौधे भी होते हैं जो मनुष्यों को पकड़कर खा जाते हैं जबकि सच्चाई यह है कि ये पौधे छोटे-मोटे कीटों को दबोच (insect eating plants) पाते हैं।

दरअसल, डारविन ने 16 साल तक व्यवस्थित प्रयोगों के बाद दर्शाया था कि कुछ पौधों की पत्तियां इस तरह ढल गई हैं कि वे न सिर्फ छोटे-मोटे जंतुओं को कैद कर लेती हैं, बल्कि उन्हें पचा भी लेती हैं और उनसे मुक्त पोषक पदार्थों का अवशोषण भी कर लेती हैं।

अब आणविक जीव वैज्ञानिकों (molecular biology research) ने इस रहस्य से पर्दा उठाया है कि इन पत्तियों में यह महत्वपूर्ण परिवर्तन कैसे संभव हुआ।

फूलधारी पौधों के विकास के 14 करोड़ से भी ज़्यादा सालों में मांसाहारी गुण बार-बार विकसित हुआ है (evolution of carnivory) और ऐसा कम से कम 12 विभिन्न कुलों में देखा गया है। पर हर बार मांसाहार के विकास की प्रेरक शक्ति एक ही थी – कुछ महत्वपूर्ण पोषक तत्वों के वैकल्पिक स्रोतों की खोज की ज़रूरत। मांसाहारी पौधे अक्सर दलदल और दलदली भूमि में पोषक तत्वों से रहित जलाशयों या हल्की उष्णकटिबंधीय मिट्टी पर ही उगते हैं। यहां पौधों के विकास और वृद्धि के लिए आवश्यक नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे तत्वों की कमी होती है। और ये उपलब्ध होते हैं प्रोटीन से भरपूर कीट-पतंगों और छोटे-छोटे जीवों में। ऐसा नहीं है कि ये मांसाहारी पौधे अपने पूरे पोषण (nutrient absorption from insects) के लिए शिकार पर निर्भर होते हैं। अन्य पौधों की तरह ये भी प्रकाश संश्लेषण करते हैं और कार्बोहायड्रेट वगैरह बना लेते हैं। लेकिन अपने आवास में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस जैसे तत्वों के अभाव की पूर्ति ये कीड़ों-मकोड़ों से करते हैं।

प्राय: पेड़-पौधे अपनी जड़ों के ज़रिए नाइट्रोजन व फॉस्फोरस मिट्टी से लवणों के रूप में प्राप्त करते हैं। अब यदि जमीन में ये तत्व न हों तो? कोई चिंता नहीं, हवा में तो प्रोटीन से भरपूर कीट पतंगे उड़ रहे हैं जो नाइट्रोजन का बढ़िया स्रोत है। और यहां उगने वाले कुछ पौधों ने इसी स्रोत का लाभ उठाया और बन गए मांसाहारी। परंतु सवाल तो यह है कि यह परिवर्तन हुआ कैसे कि ये पौधे प्रोटीन को पचाने लगे जबकि सामान्यत: पौधे प्रोटीन बनाते हैं, पचाते नहीं।

वर्तमान में लगभग 800 मांसाहारी पौधे ज्ञात (800 carnivorous plant species) हैं। इनमें पिचर प्लांट (कलश पादप) और ड्रॉसेरा हैं जो शिकार को अपने गतिहीन ट्रैप यानी पाश में फंसाते हैं। दूसरी ओर, कुछ शिकारी पौधों के पाश में गति होती है। जैसे वीनस फ्लाईट्रैप और यूट्रीकुलेरिया जिनके संवेदनशील रोम और खटके से बंद होने वाले पिंजड़े शिकार की उपस्थिति को भांपकर एक साथ प्रतिक्रिया करते हैं और पाश झटके से बंद हो जाते हैं।

पत्तियों से ही बने हैं सभी पाश

आकार, प्रकार और शिकारी को फंसाने के तरीकों में काफी भिन्नता होने के बावजूद, सभी शिकारी फंदे या तो पत्तियों से या पत्तियों (leaf-based traps) के कुछ भाग से बने होते हैं। जैसे ड्रॉसेरा पूरी पत्ती है, वहीं नेपेंथीज़ का कलश पत्ती के शीर्ष  से बना होता है। दरअसल, इन पौधों की पत्तियां थ्री-इन-वन हैं जो हाथ, मुंह और पेट सभी काम करती हैं, बारी-बारी। यहां तक कि वे जड़ों का भी काम करती है – नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे लवण उपलब्ध करवाकर जो काम सामान्यत: जड़ें करती हैं।

इन मांसाहारी पौधों की पत्तियां अपने सामान्य कार्य के अलावा अन्य कार्य कैसे करने लगी इस रहस्य का खुलासा आणविक जीव विज्ञान की नवीनतम तकनीकों (जैसे जीनोमिक्स, ट्रांसक्रिप्टोमिक्स और प्रोटीयोमिक्स) (plant genomics research) से हो पाया।

जीनोमिक्स जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत किसी जीव में मौजूद समस्त जीन्स का मानचित्रण किया जाता है। इससे यह पता चलता है कि उस जीव में कौन-कौन-सी क्षमताएं हैं। लेकिन ज़रूरी नहीं कि सारी क्षमताएं साकार हों। जीन्स के आधार पर प्रतिलेखन (ट्रांसक्रिप्शन) होकर आरएनए बनते हैं जो प्रोटीन बनवाने या कुछ अन्य कार्यों को अंजाम देते हैं। किसी भी कोशिका में उपस्थित समस्त आरएनए के समुच्चय को ट्रांस्क्रिप्टोम कहते हैं। लेकिन सारे आरएनए प्रोटीन बनाने का काम नहीं करते। किसी कोशिका में बनने वाले सारे प्रोटीन्स के समूह को प्रोटीयोम कहते हैं और इसके विश्लेषण को प्रोटियोमिक्स (proteomics protein study)।

तो मांसाहारी पौधों के जीनोम-आरएनए ट्रांसक्रिप्ट की तुलना सामान्य पौधों से करके यह पता लगाया जा सकता है कि कौन-कौन-से जीन पौधे के किस भाग में और कब सक्रिय होते हैं। प्रोटीयोमिक्स विश्लेषण से पता चल जाता है कि भोजन के समय फंदे में कौन से विशेष प्रोटीन बनते हैं।

जीन्स वही, काम नया

पौधों में मांसाहार की दो खास क्रियाओं (पाचन और अवशोषण – digestion & nutrient absorption) के अध्ययन से पता चला है कि कैसे जैव विकास के दौरान मौजूदा जीन्स को ही नए काम पर लगाया गया है। इसके अलावा कुछ जीन्स को नई भूमिकाओं (gene repurposing evolution) के अनुकूल बनाने के लिए उनमें अजीबोगरीब बदलाव किए गए हैं। मांसाहारिता पर काम करने वाले विशेषज्ञ विक्टर अल्बर्ट कहते हैं कि मांसभक्षिता के विकास के केंद्र में दरअसल पौधों की सहस्राब्दियों पुरानी रक्षा प्रणाली ही थी।

1970 के दशक में शोधकर्ताओं ने आजकल की त्वरित और सस्ती जीन अनुक्रमण तकनीक से देखा कि मांसाहारी पौधों के फंदों में पाए जाने वाले एंज़ाइम सिर्फ पत्तियों में ही बनते हैं। आणविक जीव वैज्ञानिकों ने इन पाचक एंज़ाइम्स (digestive enzymes in plants) को कोड करने वाले कई जीन्स की पहचान कर ली है। एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि इन पौधों ने मांसाहारिता से सम्बंधित जीन्स जाल में फंसने वाले जंतुओं से हासिल नहीं किए हैं बल्कि ये जीन्स पौधों में पहले से उपस्थित जीन्स को नए कामों में उपयोग करके या उनमें फेरबदल करके पैदा हुए हैं।

1970 के दशक में जीव वैज्ञानिक यह पता कर पाए थे कि इन फंदों में जो एंज़ाइम पाए जाते हैं, वे वैसे ही काम करते जैसे पौधे बैक्टीरिया, फफूंद और कीटों के खिलाफ अपनी रक्षा के लिए करते हैं। काफी शोध के बाद पता चला है कि ऐसे एंज़ाइम पौधे स्वयं बनाते हैं और कुछ नए एंज़ाइम भी बनाते हैं।

पाचक एंज़ाइम्स की सूची में कायटीनेस, प्रोटीएस और पर्पल एसिड फॉस्फेटेस (पीएपी) शामिल हैं। कायटीनेस वे एंज़ाइम होते हैं जो कीटों के कायटीन से बने बाह्य कंकाल को पचाने में काम आते हैं। प्रोटीएस प्रोटीन को पचाने का और पीएपी फॉस्फोरस प्राप्त करने में मदद करते हैं।

ये सभी एंज़ाइम फूलधारी पौधों की प्राचीन सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे और आज भी निभा रहे हैं। जैसे, संभवत: कायटीनेस फफूंदों से रक्षा करते होंगे क्योंकि फफूंदों की भित्ती कायटीन से ही बनी होती है। आगे चलकर कीटों के कंकाल के कायटीन को पचाने-गलाने में इन्हीं जीन्स का उपयोग किया गया।

जीन्स को नई भूमिका में इस्तेमाल करना जैव विकास में एक महत्वपूर्ण चालक रहा है। इसकी शुरुआत प्राय: संयोगवश किसी जीन के दोहराव से होती है। अधिकांश ऐसे दोहरे जीन्स कोई काम नहीं करते। मगर यदि किसी ऐसे जीन में कोई उपयोगी उत्परिवर्तन हो जाए, तो वह नई भूमिका अख्तियार कर सकता है। अल्बर्ट के मुताबिक मांसाहारिता का विकास शायद इसी प्रक्रिया से हुआ है। 

मौजूदा संसाधनों को नई भूमिकाओं के लिए ढालने की यह प्रवृत्ति कीटों के पाचन से कहीं आगे पोषक तत्वों के अवशोषण तक ले जाती है। जब पाचन प्रक्रिया के फलस्वरुप काइटिन, प्रोटीन और डीएनए छोटे-छोटे अणुओं में टूटते हैं, ये विशेष पत्तियां उन्हें पौधों के अंदर ले लेती हैं। सामान्य पौधों में पोषक तत्वों का अवशोषण जड़ों द्वारा किया जाता है। ट्रांसपोर्टर प्रोटीन उन्हें मिट्टी से पौधे में पहुंचाते रहते हैं।

आश्चर्य की बात है कि वैज्ञानिक सोन्के शेरज़र ने नाइट्रोजन और पोटेशियम के लिए ट्रांसपोर्टर प्रोटीन की खोज वीनस फ्लाईट्रैप की इन शिकारी पत्तियों में की है। ऐसा लगता है कि पत्ती को इन पोषक तत्वों को अवशोषित करने में सक्षम बनाने के लिए जैव विकास ने जड़ों के जीन्स को उठाया और नई जगह पर काम पर लगा दिया है। जड़ों में तो ये ट्रांसपोर्टर जीन्स हमेशा सक्रिय रहते हैं लेकिन शिकारी पत्तियों के ट्रांसपोर्टर जीन्स तभी सक्रिय होते हैं जब शिकार किए गए जंतु का पाचन होकर पोषक तत्व बाहर निकलने लगते हैं।

विक्टर अल्बर्ट और अन्य शोधकर्ताओं द्वारा एक ऑस्ट्रेलियाई मांसाहारी पौधे सीफेलोटस फॉलिकुलेरिस (Cephalotus follicularis) के जेनेटिक विश्लेषण से पता चला कि कैसे परस्पर असम्बंधित पौधों (नेपेंथीस एलाटा, सेरासेनिया पर्प्य़ूरिया, ड्रॉसेरा एडेलेNepenthes alata, Sarracenia purpurea,  Drosera adelae) ने एक-से जीन्स को अपनाकर उनको नए काम में उपयोग करके मांसाहारी कौशल विकसित किया है।

इसी सिलसिले में यह भी पता चला है कि जब कोई एंज़ाइम नई मांसाहारी भूमिका निभाने लगता है तो उसका विकास चलता रहता है ताकि वह बेहतर ढंग से काम कर सके। इसके लिए एंज़ाइम में अमीनो अम्लों को बदला जाता है। आश्चर्य की बात है कि विभिन्न असम्बंधित पौधों में एक-से अमीनो अम्लों की अदला-बदली हुई है।

मांसाहारी ट्रैप के समान जैस्मोनेट्स का उत्पादन सामान्य पौधों में भी होता है। उनमें कोशिकाएं कीटों के हमलों के जवाब में सिग्नल प्रेषित करके आसपास की कोशिकाओं को सचेत करती हैं। इस तरह शाकाहारी आक्रमण से बचने के लिए यह पौधे रक्षात्मक प्रोटीन का उत्पादन शुरू कर देते हैं।

यह प्रतिरक्षा प्रणाली सभी फूलधारी पौधों में मौजूद है। जैस्मोनेट्स की यह बदली हुई भूमिका मांसाहारी पौधों के विकास में एक प्रमुख कारण हो सकती है।

सचमुच पौधों की दुनिया अजब गजब है। यह कुदरत का कमाल ही तो है कि जो पत्तियां सामान्य पौधों में भोजन बनाने का काम करती है, वही इन खनिज लवणों की कमी से जूझते दलदली आवासों में फूलों जैसी रंगीन, रसीली व आकर्षक बन गई हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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फफूंद पर परजीवी पौधे यानी चोर के घर में चोरी

डॉ. किशोर पंवार

ह तो जानी-मानी बात है कि पौधे हवा की कार्बन डाईऑक्साइड (carbon dioxide) और ज़मीन से सोखे गए पानी का उपयोग करके अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। इस क्रिया को अंजाम देने के लिए उनके पास क्लोरोफिल (chlorophyll) होता है और इस प्रक्रिया के लिए ऊर्जा वे सूर्य की रोशनी से प्राप्त करते हैं। इसलिए पेड़-पौधों को स्वपोषी (ऑटोट्रॉफ- autotrophs) कहते हैं। दूसरी ओर सारे जंतु अपना भोजन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पौधों से प्राप्त करते हैं। इन्हें हम परपोषी (हेटरोट्रॉफ – heterotrophs) कहते हैं। इस मोटी-मोटी परिभाषा के बाद थोड़ा बारीकी पर चलें।

क्या आपने कभी परपोषी पौधों (heterotrophic plants) के बारे में सुना है? चौंकिए मत, बहुत थोड़े से ही सही मगर परजीवी पौधे (parasitic plants) होते हैं। अमरबेल जैसे पौधे परजीवी हैं। ये किसी अन्य पौधे पर लिपटते हैं और अपनी विशेष चूषक जड़ें (होस्टोरियम- haustorium) उसमें घुसा देते हैं और उसके अंदर से भोजन व पानी प्राप्त करते रहते हैं। मेज़बान पौधा स्वपोषी होता है। अलबत्ता किसी अन्य पौधे का सहारा लेने वाले सभी पौधों को परजीवी नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि वे सिर्फ सहारा लेते हों, भोजन-पानी नहीं। कई सारी लताएं, पेड़ों पर उगने वाले ऑर्किड्स (orchids) इस श्रेणी में आते हैं।

अब परपोषी पौधों के एक अनोखे समूह की चर्चा करते हैं। ऊपर हमने देखा कि परजीवी पौधे किसी अन्य स्वपोषी पौधे से भोजन चुराते हैं। लेकिन पौधों का एक समूह है जो फफूंद से भोजन-पानी की चोरी करते हैं। अब दिलचस्प बात यह है कि फफूंद स्वयं अपना भोजन नहीं बनातीं; उनमें क्लोरोफिल का अभाव जो होता है। फफूंद यानी कवक किसी अन्य स्वपोषी पौधे से भोजन की चोरी करती हैं (हालांकि वे बदले में कुछ देती भी हैं)। और अब हम जिन पौधों की बात करने जा रहे हैं वे फफूंद से भोजन चुरा लेते हैं – यानी चोर के घर में चोरी!

इन पौधों को कवक-परपोषी या मायकोहेटरोट्रॉफ (mycoheterotrophs) कहते हैं। दुनिया भर में पाए जाने वाले ये पौधे अपनी जड़ों को मिट्टी में मौजूद कवक के धागों (कवक-तंतु यानी हाइफा) के साथ जोड़ते हैं।

पेड़-पौधों और कवकों का सम्बंध काफी प्राचीन और पेचीदा है। मायकोराइज़ा (mycorrhiza) के रूप में ये कवक पेड़-पौधों से कार्बन प्राप्त करते हैं और बदले में पोषक तत्व भी प्रदान करते हैं। यानी कवकों को परजीवी कहने की बजाय सहजीवी (symbiotic organisms) कहना बेहतर है। मायकोराइज़ा दरअसल एक सम्बंध का नाम है – फफूंद-तंतुओं और पेड़-पौधों की जड़ों के बीच परस्पर लाभदायक सम्बंध (mutualism)। इसमें फफूंद का दूर- Text Box: कुछ कवक-परपोषी पौधे
1. मोनोट्रॉपेस्ट्रम किरीशिमेन्स (Monotropastrum kirishimense): अपनी गुलाबी पंखुड़ियों के कारण, एम. किरीशिमेन्स को लंबे समय से सफेद एम. ह्यूमाइल का एक प्रकार माना जाता था जो पूरे एशिया में आम तौर पर पाया जाता है। लेकिन दो दशक पहले, वनस्पतिशास्त्री केंजी सुएत्सुगु ने पाया कि दोनों पौधों में फूल अलग-अलग समय पर आते हैं। जांच से पता चला कि एम. किरीशिमेन्स एक नई प्रजाति है जो केवल जापान में पाई जाती है। और इसमें हल्के सफेद रंग के फूल आते हैं।
2 स्पिरैन्थेस हचिजोएन्सिस (Spiranthes hachijoensis): आर्किड वंश के पौधों को आम तौर पर ‘लेडीज़ ट्रेसेस' कहा जाता है क्योंकि उनके छोटे फूल तने के चारों ओर सर्पिलाकार रूप में चोटी की तरह गुंथे होते हैं। वैज्ञानिकों का लंबे समय से मानना था कि जापान में केवल एक ही स्पिरैन्थेस प्रजाति मौजूद है, जब तक कि वनस्पतिशास्त्रियों ने यह नहीं देखा था कि कुछ पौधे दूसरों की तुलना में पहले खिलते हैं। दस साल के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला कि जल्दी खिलने वाले पौधे नई प्रजाति, एस. हचिजोएन्सिस, के सदस्य हैं।
3. थिस्मिया कोबेन्सिस (Thismia kobensis): 1999 में विकास कार्यों के कारण इसके अंतिम ज्ञात नमूने का निवास स्थान नष्ट हो जाने के बाद इसे विलुप्त मान लिया गया था। लेकिन 2021 में एक शौकिया वनस्पतिशास्त्री को संयोग से 30 किलोमीटर दूर यह पौधा मिला। इस प्रजाति के पौधों की संख्या दो दर्जन से भी कम है।
4. ओरिऑर्चिस पेटेंस (Oreorchis patens): कुछ आर्किड प्रजातियां प्रकाश संश्लेषण और परजीवी कवक, दोनों का उपयोग करके फलती-फूलती हैं। इसका एक उदाहरण ओ. पेटेंस है। वैसे तो यह पौधा केवल प्रकाश संश्लेषण पर ही जीवित रह सकता है लेकिन अगर इसे सही जगह पर लगाया जाए, तो ओ. पेटेंस की जड़ें लकड़ी को विघटित करने वाले कवकों को खाती हैं। परिणामस्वरूप, एक अधिक मजबूत पौधा विकसित होता है।
5. रेलिक्टिथिस्मिया किमोट्सुकिएन्सिस (Relictithismia kimotsukiensis): 2022 में, एक जापानी यात्री को एक असामान्य पौधा दिखाई दिया। थिस्मियेसी कुल के पौधों को आम तौर पर फेयरी लैंटर्न (परियों का लालटेन) कहा जाता है। (जापान में इन्हें Tanuki-no-shokudai कहते हैं जिसका अर्थ होता है रैकून डॉग कैंडलस्टिक्स)। इस प्रजाति की प्रमुख विशेषता इसके भूमिगत फूल हैं।
दूर तक फैला नेटवर्क पौधों को पानी और खनिज लवण सोखने में मदद करता है, वहीं पौधे उन्हें प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) से बनी शर्करा उपलब्ध कराते हैं। यह सहजीवी सम्बंध लगभग 90 प्रतिशत थलीय पेड़-पौधों में पाया जाता है।

दरअसल, फफूंद तंतुओं (हायफा) (hyphal network)का एक जाल बनाती हैं जो मिट्टी में दूर-दूर तक फैला होता है। इसकी मदद से वे पानी के अलावा नाइट्रोजन (nitrogen) व फॉस्फोरस (phosphorus) जैसे अनिवार्य पोषक खनिज प्राप्त करती हैं। इनमें कुछ पानी तथा खनिज पौधे की जड़ों को मिल जाते हैं। बदले में पौधा शर्करा प्रदान कर देता है। माना जाता है कि पौधों की जड़ों का भूमिगत कवकों से सम्बंध पौधों के ज़मीन पर पहुंचने और बसने में निर्णायक रहा है।

लेकिन हम जिन कवक-परपोषियों की बात कर रहे हैं, वे प्रकाश संश्लेषण के लिए सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल पर निर्भर रहने की बजाय कवक से कुछ कार्बनिक पदार्थ चुरा लेते हैं। यानी यह सम्बंध सहजीवन का नहीं बल्कि परजीविता (parasitism) का है।

ऐसा अनुमान है कि 33,000 से ज़्यादा पादप प्रजातियां अंकुरण और प्रारंभिक विकास के दौरान कवक-परपोषी होती हैं। इनमें कुछ क्लब मॉस (club moss), फर्न, लिवरवर्ट (liverworts) और सभी ऑर्किड शामिल हैं। वनस्पति शास्त्रियों ने लगभग 600 ऐसी पादप प्रजातियों की भी पहचान की है जो जीवन भर कवक-परपोषी होती हैं। इनमें से लगभग आधी तो ऑर्किड प्रजातियां हैं। 10 वनस्पति कुलों की करीब 400 प्रजातियों में क्लोरोफिल पूरी तरह समाप्त हो चुका है और ये फफूंद के ज़रिए अन्य हरे पेड़-पौधों से कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करती हैं। इसके अलावा लगभग 20,000 प्रजातियां आंशिक रूप से कवक-परपोषी हैं, जो प्रकाश संश्लेषण भी करती हैं और कवक से भी कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करती हैं। ये अधिकांशत: अंकुरण के कुछ समय बाद तक ही फफूंदों पर निर्भर होती हैं।

वैसे ऑर्किड्स में फफूंद मायकोराइज़ा (orchid mycorrhiza) पर निर्भरता विवाद का विषय रही है। हालांकि सारे ऑर्किड्स अपने शुरुआती विकास के दौरान कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करने के लिए फफूंदों पर निर्भर रहते हैं लेकिन कई ऑर्किड्स वयस्क अवस्था में इस निर्भरता से मुक्त हो जाते हैं। रेडियोकार्बन ट्रेसिंग (radiocarbon tracing) के आधार पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि एक हरे ऑर्किड गुडयेरा रेपेन्स (Goodyera repens) का अपने फफूंद साथी (Ceratobasidium cornigerum) से सम्बंध परपोषिता का नहीं बल्कि सहजीविता का होता है।

कवक-परपोषी पौधे: इकॉलॉजी

कवक-परपोषिता एक प्रकार का परजीवी पोषण (parasitic nutrition) तरीका है जहां कुछ पौधे अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण की क्रिया की बजाय फफूंद से सीधे कार्बनिक पदार्थों (organic nutrients) के रूप में प्राप्त कर लेते हैं। यह सम्बंध कई वनस्पति समूहों में पाया गया है जो या तो केवल बीजों के अंकुरण के समय या जीवन भर के लिए होता है। क्लोरोफिल के अभाव वाले गैर प्रकाश संश्लेषी पौधों (non-photosynthetic plants) में यह पूर्णकालिक होता है और ये पीले या क्रीम रंग के होते हैं।

ये पौधे वहां अक्सर पाए जाते हैं जहां पोषक तत्वों की उपलब्धता कम होती है या घने जंगलों की तलहटी में पाए जाते हैं जहां प्रकाश नहीं पहुंचता।

कवक-परपोषी वस्तुत: जड़ फफूंद जाल (नेटवर्क) (fungal root network) को धोखा देते हैं और उनसे होने वाले कार्बन प्रवाह पर निर्भर रहते हैं जो सामान्यत: अन्य पौधों में परस्पर लेन-देन वाला होता है। कुल मिलाकर ये पौधे चोर हैं जो फफूंदों से सिर्फ लेते ही हैं, बदले में कुछ देते नहीं। किसी स्थान पर इनका पाया जाना प्रकाश की कमी और मिट्टी में पोषक पदार्थ के अभाव से सम्बंधित होता है। लगता है, मिट्टी में फॉस्फोरस की कमी (phosphorus deficiency) भी कवक-परपोषिता को बढ़ावा देती है।

आखिर क्यों?

जीव वैज्ञानिकों (evolutionary biologists) को यह सवाल सताता रहा है कि आखिर स्वपोषी पौधों में यह कवक-परपोषिता क्योंकर विकसित हुई होगी। वैकासिक जीव विज्ञानियों ने इस बात के प्रमाण पाए हैं कि जैव विकास की प्रक्रिया में पूर्ण कवक-परपोषिता कम से कम 50 से ज़्यादा बार स्वतंत्र रूप से विकसित हुई है। हो सकता है यह घने जंगलों, जहां प्रकाश कम होता है, में जीवित रहने के लिए एक अनुकूलन हो। लेकिन वैसे अभी कोई निश्चित कारण सामने नहीं आया है।

कोबे विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्री केन्जू सुएत्सुगु कहते हैं कि जवाब न मिलने का कारण शायद यह है कि कवक-परपोषी पौधों पर बहुत कम शोध (limited research) किया गया है।

दरअसल, कवक-परपोषी वनस्पतियों पर सुएत्सुगु के अद्भुत वैज्ञानिक कार्य के चलते आज उन्हें इस विषय का प्रमुख विद्वान माना जाता है। पिछले वर्षों में उन्होंने इन पौधों के अध्ययन के अभाव की पूर्ति करने का भरसक प्रयास किया है।

बीजों का बिखराव और परागण

एक सवाल यह भी था कि ऐसे पौधों में परागण कैसे होता है और इनके बीज दूर-दूर तक बिखरते कैसे हैं। ऐसा माना जाता था कि कई कवक-परपोषी अपने धूल के कणों के आकार के बीजों को बिखेरने के लिए हवा पर निर्भर करते हैं। लेकिन इसके विरुद्ध तर्क यह था कि यह थोड़ा जोखिम भरा होगा क्योंकि एक तो इन पौधों का कद छोटा है और घने जंगलों में हवाएं भी कमज़ोर होती हैं।

सुएत्सुगु ने तीन प्रजातियों – योनिया अमाजिएंसिस, फेसेलैंथस ट्यूबिफ्लोरस और मोनोट्रॉपेस्ट्रम ह्यूमाइल (Yoania amagiensis, Phacellanthus tubiflorus, Montropastrum humile) – का गति-संचालित कैमरों (motion-triggered cameras) से 190 घंटे तक अवलोकन किया। पता चला कि गुफा झींगुर और ज़मीनी गुबरैले इन पौधों के बीजों से लदे फल खा गए। प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों में पाया गया कि इन पौधों के सैकड़ों बीज गुफा झींगुरों के पेट से गुज़रने के बाद भी जीवनक्षम बने रहे; जबकि ज़मीनी भृंगों द्वारा निगले जाने पर एक भी बीज जीवित नहीं बचा। पता चला कि एक काष्ठ आवरण बीजों को झींगुर के पाचक रस से तो बचाता है, लेकिन भृंग के चबाने से नहीं।

सुएत्सुगु ने अन्य अप्रत्याशित परागणकर्ताओं और बीज बिखेरने वालों की पहचान की है। कैमरा ट्रैप में एक क्लबियोना मकड़ी को आर्किड नियोटिएन्थे क्यूकुलेटा (Neottianthe cucullata) का रस चूसते और अपने जबड़ों में परागकणों को चिपकाए फूलों के बीच घूमते हुए कैद किया गया। उनके समूह ने पहली बार दिखाया कि गुफा झींगुर (cave crickets) और ऊंट झींगुर तथा चींटियां परागण और बीज बिखेरने दोनों का  काम करते हैं। वुडलाउस (Porcellio scaber) एम. ह्यूमाइल के फल खाकर मल के साथ जीवनक्षम बीज उत्सर्जित कर सकते हैं। देखा जाए, तो ये वुडलाइस जीवजगत में सबसे नन्हे बीज प्रकीर्णक हैं। 

वैसे कवक-परपोषी पौधों में स्व-परागण भी होता है। जैसे एक आर्किड, स्टिग्मैटोडैक्टाइलस सिकोकिएनस (Stigmatodactylus sikokianus) स्व-परागण और पर-परागण दोनों आज़माता है। इसका फूल शुरू में तो खुला होता है, जिससे परागणकर्ताओं को मौका मिलता है। लेकिन कुछ ही दिन बाद, वर्तिकाग्र, यानी मादा अंग, संकुचित हो जाता है, जिससे एक छोटा, उंगली जैसा उपांग फूल के नर अंग (परागकोश) के संपर्क में आ जाता है और परागकण अंडाशय तक पहुंच जाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पुनर्जनन के दौरान अंग की मूल आकृति का निर्माण

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

चाहे सुंदर दिखने के लिए या सफाई और सहूलियत के लिए हम कभी-कभी नाखून काटते हैं (nail growth), लेकिन थोड़े दिनों बाद ही वे वापस बढ़ जाते हैं। किरेटिन नामक प्रोटीन (keratin protein) से बने नाखून हमें क्षति से सुरक्षित रखते हैं। यदि किसी नवजात शिशु की उंगली के ऊपरी पोर वाला हिस्सा (जोड़ के पहले तक की किसी जगह से) (finger regeneration) कट या टूट जाता है तो उंगली अपनी मूल आकृति में पुन: बन जाती है।

वर्ष 2013 में नेचर पत्रिका में मकोतो टेकिओ और उनके साथियों ने बताया था कि नाखूनों की तली में स्टेम कोशिकाएं (stem cells) होती हैं, जो न सिर्फ निरंतर सख्त और किरेटिनयुक्त नाखून बनाने वाली कोशिकाओं में बदलती रहती हैं, बल्कि वे ऐसे संकेत भी भेजती हैं जो उंगली के पुनर्जनन (finger healing) को गति देते हैं। गौरतलब है कि स्टेम कोशिकाएं कई प्रकार की कोशिकाओं में तब्दील और विकसित (cell regeneration) हो सकती हैं। ये कोशिकाएं Wnt संकेत मार्ग को सक्रिय करती हैं; यह प्रक्रिया पुनर्जनन के लिए आवश्यक तंत्रिकाओं को आकर्षित करती है।

छिपकली हमारे घरों में एक अनचाहा मेहमान है। हम अक्सर इसे मारने की कोशिश करते हैं, लेकिन अक्सर हाथ केवल इसकी पूंछ ही आती है। भगोड़ी छिपकली (lizard tail regeneration) अपनी पूंछ छोड़कर भाग निकलती है और उसे फिर से बना लेती है, ठीक नवजात शिशु की घायल उंगली की तरह।

इस प्रक्रिया की आणविक जैविकी का सार एलिज़ाबेथ हचिन्स और उनके साथियों ने 2014 में प्लॉसवन पत्रिका में प्रस्तुत किया था। इस प्रक्रिया को अंजाम देने में 300 से अधिक जीन शामिल होते हैं। और इस दौरान घाव को भरने और पूंछ वापस उगाने के लिए कई विकासात्मक और घाव-प्रतिक्रिया पथ सक्रिय होते हैं।

हालांकि जंतुओं और वनस्पतियों दोनों में घाव की मरम्मत सम्बंधी शोध पारंपरिक रूप से जीन-नियंत्रित क्रियापथों पर केंद्रित रहा है। लेकिन हालिया शोध विकासात्मक पादप विज्ञान (plant regeneration) में भौतिक संकेतों की महत्वपूर्ण भूमिका (mechanical signals in biology) पर प्रकाश डालता हैं। भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं शोध संस्थान (IISER, पुणे) की मेबेल मारिया मैथ्यू और कालिका प्रसाद ने हाल ही में करंट बायोलॉजी में प्रकाशित अपने एक अध्ययन में विकास और पुनर्जनन पर एक कम अध्ययन किए गए लेकिन महत्वपूर्ण कारक पर प्रकाश डाला है: कोशिकीय ज्यामिति(cell geometry)।

शोधकर्ताओं ने अध्ययन में देखा की कि कैसे शंक्वाकार आकृति का मूलाग्र कट जाने के बाद पुन: अपने आकार में पनप जाता है। उन्होंने पाया कि मौजूदा कोशिकाओं ने अपनी ज्यामिति को बदलकर नई बनी कोशिकाओं की कतार को एक तिरछे, झुके पथ पर संरेखित किया। अंतत: कोशिकाओं की इन तिरछी पंक्तियों ने जड़ की शंक्वाकार आकृति का पुनर्निर्माण किया। तकनीकी शब्दों में, इस प्रक्रिया को आकृति-जनन (morphogenesis process) कहा जाता है। आकृति-जनन वह जैविक प्रक्रिया (biological development) है जो किसी जीव को उसका आकार और संरचना विकसित करने में मदद करती है। इसमें कोशिकाओं की समन्वित वृद्धि, विभाजन, विभेदन और व्यवस्थापन शामिल होता है जिससे ऊतक, अंग और यहां तक कि एक संपूर्ण जीव का निर्माण होता है।

मूलाग्र पुनर्जनन की प्रणाली का अध्ययन सरसों परिवार के एरेबिडोप्सिस थैलिआना (Arabidopsis thaliana) पौधे पर किया गया था। इसमें यह समझा गया था कि कोशिका ज्यामिति में परिवर्तन आकृति-जनन में कैसे योगदान देते हैं और उसे सुगम बनाते हैं।

उन्नत सूक्ष्मदर्शी और उपकरणों (advanced microscopy) की मदद से टीम ने देखा कि जड़ों की सामान्य घनाकार कोशिकाओं की आकृति बदलकर समचतुर्भुज (rhomboid) हो गई। फिर ये परिवर्तित कोशिकाएं विकर्ण रेखा पर विभाजित हुईं जिससे त्रिकोणीय प्रिज़्म आकृति की कोशिकाएं बनीं। विकर्ण रेखा से विभाजन ने आस-पड़ोस की कोशिकाओं की वृद्धि (cell division) को एक तिरछे पथ पर मोड़ा, जिन्होंने मिलकर कटा हुआ पतला सिरा फिर से बनाया।

गणितीय और भौतिक विश्लेषण करने पर पता चला कि इन बदलावों के पीछे जो वास्तविक बल काम करता है वह है आंतरिक यांत्रिक तनाव (mechanical stress)। यह एक प्रकार का तनाव है जो कोशिकाओं को आकार बदलने और निर्धारित रूप से विभाजित होने (cell growth patterns) के लिए उकसाता है।

आकृति-जनन को समझने में जहां लंबे समय से स्टेम कोशिकाएं (stem cell research) और जेनेटिक क्रियापथ (genetic studies)  अध्ययन का केंद्र रहे हैं, वहां यह अध्ययन एक अनदेखे महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डालता है: कोशिकाएं तनाव में अपनी आकृति को कैसे ढालती हैं। यह दर्शाता है कि कोशिका की आकृति और ज्यामिति ऊतक पुनर्जनन (tissue regeneration) के दौरान आकृति-जनन में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

ये निष्कर्ष अन्य जैविक प्रणालियों पर भी लागू हो सकते हैं। ये जीवन को आकार देने में  भौतिक संकेतों, विशेष रूप से कोशिकीय ज्यामिति की भूमिका दर्शाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हेलिकोनिया: एक अद्भुत उष्णकटिबंधीय वनस्पति वंश

अंकुर ज्योति शईकीया

ष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले हेलिकोनिया वंश के पौधे अपनी चमकदार पुष्प संरचनाओं और घने पत्तों के लिए मशहूर हैं (tropical plants, heliconia flowers)। इन्हें ‘लॉब्स्टर क्लॉ'(lobster claw), ‘जंगली केला’ या ‘फाल्स बर्ड-ऑफ-पैराडाइज’ के नाम से भी जाना जाता है। ये पौधे न केवल देखने में सुंदर होते हैं बल्कि मध्य और दक्षिण अमेरिका, कैरेबियन और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों के वर्षावनों में पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा भी हैं (rainforest ecosystem plants)। हाल के वैज्ञानिक शोधों ने इनके विकास, पारिस्थितिक महत्व, संरक्षण की स्थिति और बागवानी व कृषि में बढ़ती भूमिका पर नई रोशनी डाली है।

हेलिकोनिया वंश में लगभग 200 प्रजातियां हैं, जिनकी पहचान वे खास सहपत्र (bracts) हैं – ये संरचनाएं चटख रंग (colorful bracts) की और मोम (wax like flower structure) जैसी होती हैं, जो अक्सर इनके वास्तविक फूलों से ज़्यादा आकर्षक होती हैं। सहपत्र लाल, नारंगी, पीले और गुलाबी रंगों में होते हैं, जिससे हेलिकोनिया बागवानों और फूल व्यापारियों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। लेकिन इनकी सजावटी सुंदरता के अलावा, ये पौधे उष्णकटिबंधीय पारिस्थितिकी तंत्र में भी गहराई से रचे-बसे हैं।

हेलिकोनिया का विकास अनुकूलन और सह-विकास की कहानी है। आणविक शोध से पता चला है कि इस वंश में प्रजातियों का तेज़ी से विविधीकरण (plant speciation) हुआ है। इसका मुख्य कारण है इनका हमिंगबर्ड्स के साथ घनिष्ठ सम्बंध। कई हेलिकोनिया प्रजातियों के फूल विशिष्ट हमिंगबर्ड्स द्वारा परागण (hummingbird pollination) के लिए अनुकूलित हैं – इनके लंबे, नलीनुमा फूल हमिंगबर्ड्स की लंबी चोंच के हिसाब से ढले हैं। इनका सम्बंध इतना विशिष्ट है कि इनमें से एक में भी बदलाव होने पर दूसरे में भी विकासात्मक परिवर्तन होते हैं; इसे सह-विकास कहते हैं।

विकास का सहगान

हमिंगबर्ड्स द्वारा हेलिकोनिया का परागण पारिस्थितिक विशेषज्ञता का उत्कृष्ट उदाहरण (ecological pollination systems) है। कुछ हेलिकोनिया प्रजातियां ‘ट्रैपलाइनर’ हमिंगबर्ड्स द्वारा परागित होती हैं – ये पक्षी दूर-दूर के, यहां तक कि अपने इलाके के बाहर के फूलों को भी परागित (trapliner hummingbirds) हैं। हेलिकोनिया टोर्टुओसा जैसी प्रजातियों की आनुवंशिक संरचना पर इस व्यवहार का गहरा प्रभाव पड़ता है, जिससे वनों के खंडित होने के बावजूद जनसंख्या में जीन प्रवाह बना रहता (gene flow in fragmented forests) है। अर्थात, जंगल के टुकड़ों में बंट जाने के बाद भी, इन पौधों के बीच उनके जीन्स एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते हैं और उनकी आबादी में विविधता बनी रहती है।

ये जटिल पारस्परिक सम्बंध पौधों और उनके परागणकर्ताओं दोनों के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करते (plant-pollinator conservation) हैं। एक के नुकसान से दूसरे की भी हानि हो सकती है, जिससे उष्णकटिबंधीय जैव विविधता का संतुलन बिगड़ सकता (tropical biodiversity loss) है।

संरक्षण संकट की आहट

अपनी पारिस्थितिक महत्ता और बागवानी में लोकप्रियता के बावजूद, जंगली हेलिकोनिया प्रजातियां गंभीर खतरे का सामना कर (threatened plant species) रही हैं। हाल ही में हुए एक व्यापक अध्ययन में पाया गया कि लगभग आधी हेलिकोनिया प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं। इसका मुख्य कारण है वनों की कटाई, कृषि विस्तार और शहरीकरण। कई प्रजातियां बहुत सीमित क्षेत्रों में पाई जाती हैं, जिससे वे और भी संवेदनशील हैं।

चिंता की बात यह है कि संकटग्रस्त हेलिकोनिया प्रजातियों का एक बड़ा हिस्सा संरक्षित क्षेत्रों या वनस्पति उद्यानों में संरक्षित नहीं है। संरक्षण के इस अंतर को दूर करने के लिए अध्ययन में प्राथमिकता वाली प्रजातियों की पहचान, संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार और हेलिकोनिया को पुनर्वनीकरण और कृषि परियोजनाओं में शामिल करने की सिफारिश की गई है।

जंगल से गुलदस्ते तक

हेलिकोनिया की आकर्षक बनावट और लंबे समय तक टिकने वाले फूलों ने इसे वैश्विक पुष्प उद्योग में लोकप्रिय बना दिया है। हाल के वर्षों में अनुसंधान ने हेलिकोनिया पुष्पों की ताज़गी बनाए रखने, निर्जलीकरण, फफूंदी, और परिवहन के दौरान होने वाले नुकसान को कम करने पर ध्यान केंद्रित किया है। उन्नत संरक्षण तकनीकों और विशेष पैकेजिंग के उपयोग से हेलिकोनिया की ताज़गी और बाज़ार में पहुंच बढ़ी है।

भारत में इसकी खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं। शोध से पता चला है कि नारियल के बागानों में हेलिकोनिया को अंतर-फसल के रूप में उगाने से किसानों को अतिरिक्त आय मिल सकती है और भूमि की पारिस्थितिकी व सुंदरता भी बढ़ती है। हेलिकोनिया आंशिक छाया में भी अच्छी तरह बढ़ता है और इसकी देखभाल आसान है, जिससे यह उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय कृषि प्रणालियों के लिए उपयुक्त है।

हालांकि हेलिकोनिया के व्यापारिक भविष्य की संभावनाएं उज्ज्वल हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। खेती में प्रयुक्त किस्मों की आनुवंशिक विविधता जंगली प्रजातियों की तुलना में कम है; जिससे वे कीट, रोग और पर्यावरणीय तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। जंगली हेलिकोनिया की आनुवंशिक सामग्री का संरक्षण और सतत उपयोग आवश्यक है, ताकि इनसे नई किस्मों का विकास हो सके।

इसके अलावा, फूलों के रूप में हेलिकोनिया की सफलता न केवल संरक्षण तकनीक पर निर्भर करती है बल्कि नई किस्मों के विकास पर भी निर्भर करती है; जिनमें आकर्षक रंग, सुगठित आकार और रोग प्रतिरोध जैसी विशेषताएं हों। इसके लिए जैव प्रौद्योगिकी, ऊतक संवर्धन और आणविक प्रजनन जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है।

हेलिकोनिया की कहानी उष्णकटिबंधीय जैव विविधता के समक्ष खड़ी चुनौतियों का प्रतीक है। यह वंश पौधों, जानवरों और मनुष्यों के बीच जटिल सम्बंधों और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव को दर्शाता है। संरक्षण विशेषज्ञ हेलिकोनिया को पुनर्वनीकरण, कृषि और सामाजिक वानिकी में शामिल करने की सलाह देते हैं, ताकि न केवल इस वंश की रक्षा हो, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र सुदृढ़ हों।

वनस्पति उद्यान और बाह्य-स्थान संरक्षण संग्रहालय इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं। हेलिकोनिया प्रजातियों की खेती और उन्हें शोधकर्ताओं व किसानों के लिए उपलब्ध कराने से ये वनस्पति उद्यान और संरक्षण संग्रहालय संरक्षण और व्यापार के बीच सेतु का कार्य कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक पादप मॉडल का अनदेखा पहलू

रसों परिवार (ब्रेसिकेसी) का एक छोटा सा पौधा है थेल क्रेस (Arabidopsis thaliana)। 20-25 से.मी. लंबे इस पौधे में अधिकतर पत्तियां ज़मीन से सटकर, फूलनुमा आकृति बनाते हुए लगती हैं और बहुत थोड़ी पत्तियां ऊपर तने पर भी लगती हैं। इसके फूल सफेद रंग के होते हैं। यह पौधा मूलत: युरेशिया और अफ्रीका (Eurasia native weed plant) में पाया जाता है। भारत में यह हिमालयी क्षेत्र में पाया जाता है। यह खाली पड़े मैदान, सड़क किनारे, रेललाइन किनारे, खेतों में, कहीं भी उगता देखा जा सकता है, इसलिए इसे खरपतवार की तरह देखा जाता है, हालांकि कुछ जगहों पर इसे खाया भी जाता है।

थेल क्रेस पौधे की कुछ खास बातें हैं। एक तो इसका जीवन चक्र छोटा होता है, अंकुरण से लेकर वापस बीज बनने तक का इसका चक्र 6 हफ्तों में पूरा हो सकता है; यह खरपतवार की तरह आसानी से फल-फूल जाता है; इसका पौधा साइज़ में छोटा तो होता ही है, साथ ही इसका जीनोम भी सरल होता है (simple genome model plant)। अपनी इन सभी खूबियों के कारण 1900 के दशक से ही पादप विज्ञान में थेल क्रेस पर अध्ययन किए जाने लगे थे(model organism in plant biology)। फूलदार पौधों की जेनेटिक, आणविक कार्यप्रणाली को समझने में थेल क्रेस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सबसे पहला संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण भी इसी पौधे का किया गया था(first plant genome sequencing)। और तो और, पादप विज्ञान का यह मॉडल पौधा 2019 में चांग ई-4 लैंडर के साथ चांद की भी सैर कर चुका है(Arabidopsis on Moon)।

और अब, इस पौधे के एक अनछुए पहलू का अध्ययन कर पादप विज्ञानी रियुशिरो कासाहारा और उनके दल ने इसकी एक ओर खासियत उजागर की है जो खेती के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है(crop yield improvement)। पता चला है कि (कम से कम) यह पौधा बड़ी चतुराई से अपने सिर्फ उन्हीं बीजांडों तक पोषण पहुंचने देता है जो निषेचित हो चुके होते हैं। और, अपने गैर-निषेचित बीजांड तक पोषण पहुंचने से रोकता है, जिससे पोषण का सदुपयोग होता है और बीज बड़ा बनता है(seed size enhancement)। और, बड़ा बीज यानी पैदावार में वृद्धि।

लेकिन अन्य फसलों में बीज कैसे बड़ा किया जाए? इस पर बात करने के पहले थोड़ा इस पर बात कर लेते हैं कि शोधकर्ताओं को यह बात पता कैसे चली। दरअसल, कासाहारा यह समझना चाह रहे थे कि पौधे बीज कैसे बनाते हैं(seed development in plants)? इसके लिए कासाहारा ने थेल क्रेस को अध्ययन के लिए चुना और अपना सारा ध्यान इसके फूल के उस स्थान पर केंद्रित किया जहां कई सारी नलिकाओं (फ्लोएम) के माध्यम से पोषक तत्व पहुंचकर विकासशील भ्रूण को पोषण देते हैं(phloem transport in plants)।

नीले रंजक का इस्तेमाल कर उन्होंने इस हिस्से में कैलोस का असर देखा। गौरतलब है कि कैलोस पौधों में अस्थायी कोशिका भित्ति बनाकर पौधों के लिए कई काम करता है और पौधों को सुरक्षा प्रदान करता है; जैसे यह पौधों के घावों को भरने में मदद करता है। पता चला कि फ्लोएम के अंतिम छोर पर बीजांड के पास की कोशिकाओं में कैलोस बन रहा था (callose formation in plants)। कैलोस ने फ्लोएम के सिरे के चारों ओर एक तश्तरी जैसा अवरोध (भित्ति) बना दिया था। फिर, अधिकांश निषेचित बीजांडों से वह अवरोध गायब हो गया था, और वहां मात्र एक छल्ला रह गया था – जल्द ही वह छल्ला भी लुप्त हो गया था। लेकिन जो बीजांड निषेचित नहीं हुए थे उनमें अवरोध जस-का-तस बना रहा। इससे समझ आया कि कैलोसयुक्त कोशिकाएं एक दीवार का काम करती हैं, जो फ्लोएम के पोषक तत्वों को गैर-निषेचित बीजांडों में जाने से रोकती हैं(nutrient regulation in fertilized ovules)। इस तरह पौधा गैर-निषेचित बीजांड में अतिरिक्त पोषण ज़ाया करने से बच जाता है।

अब सवाल था कि वह क्या शय है जो निषेचित बीजांड से कैलोस-अवरोध हटा देती है। शोधकर्ताओं की यह तलाश एक ऐसे एंज़ाइम, AtBG_ppap, पर जाकर खत्म हुई जो कैलोस को विघटित करने (या हटाने) की क्षमता रखता है(AtBG_ppap enzyme function)। और इसी एंज़ाइम को बनाने वाले जीन को अधिक सक्रिय कर कुछ फसलों की पैदावार बढ़ाई जा सकती है(gene expression for higher yield)।

इस बात का खुलासा भी थेल क्रेस पर किए गए अध्ययन से हुआ। शोधकर्ताओं ने जब इस पौधे में AtBG_ppap एंज़ाइम को बनाने वाले जीन को शांत किया तो पाया कि पौधे में सभी बीजांड (निषेचित और गैर-निषेचित) पर कैलोस भित्ति काफी हद तक वैसी की वैसी बनी रही थी। इसके कारण इस जीन के प्रभाव से मुक्त पौधों के बीज सामान्य पौधों के बीज के साइज़ की तुलना में 8 प्रतिशत छोटे बने थे। लेकिन जब टीम ने इन पौधों में AtBG_ppap एंज़ाइम के जीन को अति सक्रिय किया तो पाया कि ऐसा करने पर बीज सामान्य पौधों के बीजों की तुलना में 17 प्रतिशत बड़े विकसित हुए(enhanced seed size via gene editing)। संभवत: इसलिए कि निषेचित बीजांड की कैलोस-भित्ति आसानी से टूट गई होगी और अधिक पोषक तत्व निषेचित बीजांड तक पहुंचे होंगे।

ऐसा ही उन्होंने धान के पौधों पर भी करके देखा तो उन्हें ऐसे ही नतीजे मिले – AtBG_ppap एंज़ाइम के जीन को अधिक व्यक्त करवाने पर चावल के दाने की साइज़ 9 प्रतिशत बढ़ गई थी(larger rice grain size)। लेकिन चावल के बड़े दाने होने से शायद इसके स्वाद पर फर्क पड़े, हालांकि स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ने जैसी बात तो अध्ययन में सामने नहीं आई है। लेकिन बड़े बीज वाली फसलें सोयाबीन, मक्का और गेहूं जैसी फसलों के लिए फायदेमंद हो सकती हैं (yield optimization in soybean and maize)। (स्रोत फीचर्स)

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जगमगाते कुकुरमुत्ते

आमोद कारखानिस

केरल वन एवं वन्यजीव विभाग तथा मशरूम्स ऑफ इंडिया समुदाय से जुड़े कुछ विशेषज्ञों ने केरल के रानीपुरम जंगलों में एक सर्वेक्षण किया था। इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट से वनस्पति विज्ञान समुदाय बहुत उत्साहित है। इस क्षेत्र में मिलने वाले कुकुरमुत्तों (मशरूम) और कवकों की विभिन्न किस्मों का ब्यौरा देती इस रिपोर्ट में कुछ खास बात है जिसने वैज्ञानिक समुदाय को इतना उत्साहित कर दिया है।

हम सभी कुकुरमुत्ता (मशरूम) के बारे में जानते हैं। मानसून (monsoon season) में हमने कई बार सूख चुके पेड़ों के तनों पर सफेद छतरी जैसे मशरूम (wild mushrooms) उगते देखे हैं। ये अलग-अलग किस्मों, अलग-अलग रंगों के होते हैं। कुछ मशरूम खाने योग्य (edible mushrooms) भी होते हैं, और इन्हें खाने के लिए उगाया भी जाता है। अलबत्ता, कई मशरूम ज़हरीले (poisonous mushrooms) भी होते हैं। बताते हैं कि नारंगी रंग वाले मशरूम ज़हरीले होते हैं। प्राय: सफेद या काले रंग के मशरूम ही देखने को मिलते हैं।

रानीपुरम के इस जंगल (rainforest) में कई तरह के मशरूम हैं। तो क्या खास है यहां के मशरूम्स में?

ज़रा एक स्थिति की कल्पना कीजिए: घने बादलों से घिरी अंधेरी-काली रात है, बारिश अभी-अभी थमी है, और ऐसे में आप जंगल की किसी पगडंडी पर चले जा रहे हैं। यदि आप कोई शहरी व्यक्ति हैं जिसे शोर-शराबे की आदत है तो जंगल (dense forest) आपको बहुत निरव लगेगा, और जंगल का यह सन्नाटा भयावह। लेकिन जंगल में घुप सन्नाटा तो नहीं है; पत्तियों से पानी टपकने की टिप-टिप, सिकाडा (Cicada insect) का (कानफोड़ू) शोर, बीच-बीच में उल्लू की आवाज़। ये सब मिलकर एक अजीब सा माहौल बनाते हैं। और अचानक थोड़ी दूरी पर एक सफेद-सी आकृति दिखाई देती है। खैर, थोड़ा करीब जाकर देखेंगे तो वह आकृति कुल्लु (स्टर्कुलिया यूरेन्स) का पेड़ निकलती है। कोई आश्चर्य नहीं कि इसे भूतिया पेड़ (Ghost tree) कहते हैं।

जंगल के और अंदर चलिए। घने बादलों के तले, छोटी-सी टॉर्च के अलावा कोई और रोशनी नहीं है, वह भी सिर्फ पैरों के आसपास ही रास्ता दिखा पा रही है। जंगल के घुप अंधेरे को महसूस करने के लिए आप अपनी टॉर्च भी बंद कर लेते हैं। जैसे ही आंखें अंधेरे की आदी होती हैं कि फिर कुछ दिखाई देता है – कुछ हल्की हरी-सी चमक। इस चमक की तरफ बढ़कर देखते हैं तो पाते हैं कि जंगल के फर्श पर छोटी-छोटी टहनियां, पत्तों के डंठल, सबके सब चमकते हुए प्रतीत होते हैं। कहीं आप किसी आश्चर्यलोक में तो नहीं हैं? या किसी परी-लोक में? चारों ओर देखते हैं, तो पेड़ों की छाल की धारियां भी चमक रही हैं। मंत्रमुग्ध कर देने वाला नज़ारा है। एक चमकीला जंगल (glowing forest)!

यह कोई काल्पनिक नज़ारा या कहानी नहीं है, बल्कि यह वास्तविक अनुभव है। यदि कभी आप रात में जंगल में घूमे हों तो आपने भी शायद ऐसा अनुभव किया हो। मुझे यह अनुभव कई साल पहले महाराष्ट्र के भीमाशंकर के जंगलों में हुआ था। इस रोशनी को जैव-दीप्ति (बायोल्यूमिनेसेंस, Bioluminescence) कहा जाता है।

देखा जाए तो बायो-ल्यूमिनेसेंस (natural bioluminescence) हमारी जानी-पहचानी चीज़ है। हम सभी ने जुगनू (fireflies) देखे हैं। पश्चिमी घाट (Western Ghats) के आसपास रहने वालों के लिए यह एक सामान्य बात है। वैसे भी लगभग सभी जंगलों में जून के महीने में, मानसून की शुरुआत में सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में जुगनू दिखाई देते हैं: नर और मादा दोनों प्रकाश उत्सर्जित करते हैं और टिमटिमाते हैं, लेकिन उनकी टिमटिमाने की लय अलग-अलग होती है। लगता है कि इस तरह से वे एक-दूसरे को ढूंढते हैं, प्रजनन साथी तलाशते हैं।

यह कीटों में जैव-दीप्ति (bioluminescent insects) है। वैसे और भी जीवों में जैव-दीप्ति देखने को मिलती है। लेकिन वनस्पतियों में जैव-दीप्ति मिलना दुर्लभ (rare bioluminescent fungi) है। कुछ कवक (फफूंद) चमकती हैं। कवक (fungi) की लगभग 10,000 प्रजातियों में से केवल 60 के करीब प्रजातियों में ही जैव-दीप्ति होती है। और ऐसी अधिकांश प्रजातियां केवल समुद्र (marine bioluminescence) में पाई जाती हैं।

पश्चिमी घाट के पुराने (लगभग अनछुए) वर्षा वनों में कुछ जैव-दीप्त कवक (glowing mushrooms) पाए जाते हैं। ऊपर वर्णित भीमाशंकर के जंगल के नज़ारों में जो जैव दीप्ति देखी गई है वह आर्मिलेरिया मेलिया (Armillaria mellea) कवक थी। मशरूम दरअसल कवक ही होते हैं। भारत में मायसिन (Mycena) की कुछ ऐसी प्रजातियां पाई जाती हैं जो जैव-दीप्त होती हैं।

रानीपुरम वन सर्वेक्षण (Ranipuram forest survey) की रिपोर्ट में लगभग 50 से अधिक कवक प्रजातियों की सूची है; इनमें से दो भारत के लिए नई खोजी गई प्रजातियां हैं। लेकिन इनमें से सबसे दिलचस्प है फिलोबोलेटस मैनिपुलेरिस (Phylloboletus manipularis)। यह एक बहुत ही दुर्लभ जैव-दीप्त मशरूम (rare glowing mushroom) है। यह कवक आम तौर पर ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया और प्रशांत द्वीपों में पाई जाती है। तो फिर यह रानीपुरम तक कैसे पहुंची? सवाल दिलचस्प है और आगे अध्ययन की मांग करता है।

जैव-दीप्ति सजीवों में रासायनिक अभिक्रिया (chemical reaction in bioluminescence) के कारण होती है। यह काफी जटिल प्रक्रिया है, लेकिन इस प्रक्रिया में लूसिफेरिन (Luciferin) नामक रसायन की भूमिका होती है। (वास्तव में लूसिफेरिन रसायनों के एक समूह का नाम है। जैव-दीप्ति दिखलाने वाली हर प्रजाति में यह रसायन थोड़े-बहुत फर्क के साथ हो सकता है, लेकिन उनकी सामान्य संरचना एक-सी होती है।) लूसिफरेज़ (Luciferase) नामक एक एंज़ाइम की उपस्थिति में यह रसायन ऑक्सीकृत हो जाता है और ऑक्सीकरण की इस प्रक्रिया में कुछ ऊर्जा हरे या नीले प्रकाश (green or blue light emission) के रूप में निकलती है। दिलचस्प बात है कि इस रासायनिक अभिक्रिया में कोई ऊष्मा उत्पन्न नहीं होती है और अभिक्रिया कोशिका के सामान्य तापमान पर संपन्न होती है, इसलिए इसे शीत दहन (cold combustion) भी कहा जाता है।

महाराष्ट्र में पाए जाने वाले जैव-दीप्त कवक की रिपोर्ट एक पुराने, अछूते और बहुत नम वर्षावन (tropical rainforest) की है। लगभग 25 साल पहले भीमाशंकर के जंगल में मैंने जो कवक देखी थी, वह शिव ज्योतिर्लिंग मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित घने जंगल में थी। लेकिन अब यह जंगल घना नहीं रहा। बढ़ते पर्यटन और भक्तों की बढ़ती संख्या ने वहां की जैव-विविधता को प्रभावित किया है। लेकिन लोनावला, मुलशी-ताम्हिनी जैसे पश्चिमी घाट के कई अंदरूनी इलाकों (करीब-करीब अछूते इलाकों) और गोवा के कुछ जंगलों में इस कवक की मौजूदगी की सूचना मिली है।

इसी संदर्भ में केरल में एक बहुत ही दुर्लभ जैव-दीप्त मशरूम (rare Kerala glowing mushroom) का मिलना बहुत महत्वपूर्ण है। इस प्रजाति का मिलना इस बात की ओर भी इशारा करता है कि हम अभी भी पश्चिमी घाट के जंगल के बारे में सब कुछ नहीं जानते हैं। इन जंगलों में कई और नई प्रजातियां होंगी जिन्हें खोजा जाना बाकी है। हम काटे गए जंगलों की क्षतिपूर्ति के लिए वृक्षारोपण करके वृक्षाच्छादन तो बढ़ा सकते हैं, लेकिन जंगलों ने हज़ारों वर्षों में जो जैव-विविधता विकसित की है, उसे वैसा का वैसा पनपाना मुश्किल है। इसलिए हमें इनके संरक्षण का हर संभव प्रयास करना चाहिए। विकास की आड़ में विनाश कर हम इस बात से अनभिज्ञ हैं कि इस प्रक्रिया में हम क्या खोते जा रहे हैं! (स्रोत फीचर्स)

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वृक्षों का पलायन: हिमालय के पारिस्थितिक तंत्र में बदलाव

हालिया समय में भव्य हिमालय (The Himalayas) पर्वत एक मौन लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव के साक्षी बन रहे हैं। नेचर प्लांट्स में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण इस क्षेत्र के वृक्षों की सीमा में परिवर्तन हो रहा है, जिससे इसके नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का संतुलन प्रभावित हो रहा है। यह बदलाव केवल पेड़ों पर नहीं, बल्कि वन्यजीवों, चारागाहों और स्थानीय समुदायों की आजीविका पर भी असर डाल सकता है।

सदियों से, हिमालय के मध्य क्षेत्र में चट्टानी इलाकों पर भोजपत्र (Betula utilis) के पेड़ों का दबदबा रहा है, जबकि ऊंचे इलाकों में देवदार (Abies spectabilis) के पेड़ सह-अस्तित्व में रहे हैं। लेकिन हालिया डैटा से पता चला है कि देवदार के पेड़ धीरे-धीरे भोजपत्र पर हावी हो रहे हैं। हिमालय में वैश्विक औसत से अधिक गति से बढ़ रहे तापमान और सूखे की बढ़ती स्थिति ने देवदार के पेड़ों को भोजपत्र की तुलना में तेज़ी से फैलने का मौका दिया है। देवदार के पेड़ हर साल 11 सेंटीमीटर ऊंचे स्थानों तक फैल रहे हैं, जो भोजपत्र की गति से लगभग दुगना है। यह अंतर तापमान (temperature) में और अधिक वृद्धि के साथ तेज़ हो सकता है।

शोधकर्ताओं ने माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) और अन्नपूर्णा संरक्षण क्षेत्र (Annapurna conservation area) के पास के जंगलों का अध्ययन किया, जिसमें उन्होंने 700 से अधिक पेड़ों की उम्र और वृद्धि के पैटर्न को ट्रैक करने के लिए ट्री कोर सैंपलिंग (tree core sampling) जैसी तकनीकों का उपयोग किया। उनके निष्कर्ष बताते हैं कि भोजपत्र के पेड़ों का प्रजनन 1920 से 1970 के बीच अपने चरम पर था, लेकिन इसके बाद इसमें गिरावट आई है। वहीं, देवदार के पेड़ वर्तमान गर्म होते माहौल में तेज़ी से फल-फूल रहे हैं। अनुमान है कि 2100 तक, बदलते तापमान व जलवायु के विभिन्न परिदृश्यों में, देवदार के पेड़ ऊंचे इलाकों की ओर बढ़ते रहेंगे, जबकि भोजपत्र या तो स्थिर रहेंगे या कम हो सकते हैं। 

शोधकर्ता बताते हैं कि इस परिवर्तन के दुष्परिणाम भी सामने आएंगे। बर्फीले तेंदुए (snow leopard) जैसे प्राणियों को शिकार के लिए खुले स्थानों की ज़रूरत होती है। जंगल का विस्तार इनके प्राकृतवासों (habitat) को घटा रहा है। साथ ही, स्थानीय पशुपालकों के लिए आवश्यक चारागाहों (grazing land) पर पेड़ अतिक्रमण कर रहे हैं। लंगटांग घाटी जैसे क्षेत्रों में, स्थानीय लोग याक और भेड़ों के लिए ज़मीन वापस पाने के लिए पेड़ों को काट रहे हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे अध्ययन जंगल प्रबंधकों और स्थानीय समुदायों को इन बदलावों का अनुमान लगाने और उनके अनुसार खुद को ढालने में मदद करते हैं। यह शोध जलवायु परिवर्तन और इसके प्रकृति व मानवता पर पड़ने वाले प्रभावों को संभालने की ज़रूरत को रेखांकित करता है और हमें याद दिलाता है कि पारिस्थितिकी तंत्र के घटक परस्पर जुड़े हुए हैं और इन ऊंचे पहाड़ों में जीवन को बनाए रखने के लिए इनका संतुलन कितना महत्वपूर्ण है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक नर पेड़ के लिए वधू की तलाश

डॉ. ओ. पी. जोशी

सायकस पेड़ों की एक दुर्लभ प्रजाति है एनसेफोलार्टोस वुडी (Encepholartos Woodii)। सायकस के पेड़ खजूर के समान, धीमी गति से वृद्धि वाले, दीर्घजीवी तथा एकलिंगी होते हैं यानी नर और मादा पेड़ अलग-अलग होते हैं। नर पेड़ पर नर जननांग एक सघन शंकुरूपी रचना में जमे रहते हैं, जिसे कोन या स्ट्रॉबिलस (Strobilus) कहा जाता है। मादा पौधे में स्त्री जननांग शंकु समान रचना नहीं बनाते हैं। सायकस के पेड़ डायनासौर युग से पहले पृथ्वी पर काफी संख्या में फैले हुए थे। वनस्पति वैज्ञानिकों ने इन्हें वनस्पतियों के अनावृतबीजी (Gymnosperm) समूह में रखा है।

ई. वुडी (E. Woodii) के एकमात्र ज्ञात जंगली नर पेड़ की खोज डरबन वानस्पतिक उद्यान के क्युरेटर जॉन मेडले वुड (John Medley Wood) द्वारा दक्षिण अफ्रीका के क्वानज़ुलु नताल के ओंगोये जंगल में 1895 में की गई थी। उस समय पेड़ की ऊंचाई 5 मीटर थी। तना मज़बूत काष्ठीय प्रकृति का था, जिसका आधार पर व्यास 90 से.मी. आंका गया था। तने के ऊपरी सिरे पर 100 से ज़्यादा पत्तियों का एक मुकुट या छत्रक था। पत्तियां गहरे हरे रंग की चमकदार तथा 150 से 160 से.मी. लंबी थीं। पत्तियों के इस मुकुट के बीच 60 से.मी. का नर शंकु (Male Cone) लगा था। तने के आधार पर पुश्ता (बट्रेस) जड़ें चारों ओर फैली थीं जो भारी तने को सहारा प्रदान करती थीं।

वर्तमान में ई. वुडी के जो भी पेड़ विश्व के अलग-अलग भागों में लगे हैं, वे सभी ई. वुडी के मूल जंगली पेड़ के ही क्लोन (Clone) हैं, जो क्लोनिंग से तैयार किए गए हैं। इस विधि से किसी जीव की आनुवंशिकी रूप से हूबहू समान प्रतिलिपि बनाई जाती है। तो ई. वुडी का केवल नर पेड़ उपलब्ध होने के कारण लैंगिक प्रजनन (Sexual Reproduction) नहीं हो सकता, जिससे बीज बनें एवं नए पौधे जन्म लें।

इस अकेले नर पेड़ की वेदना को साउथेम्पटन विश्वविद्यालय (Southampton University) की शोधार्थी लॉरा सिंटी (Laura Sinti) ने समझा। लॉरा ने एक समूह बनाकर इसके मादा पेड़ को खोजने का कार्य वर्ष 2022 में शुरू किया था। इस कार्य में ड्रोन (Drone) और कृत्रिम बुद्धि (AI) तकनीक का सहारा लिया गया है। समूह को विश्वास है कि कहीं तो इस अकेले नर पेड़ की वधू (Female Tree) होगी एवं मिलेगी। इसके बाद नर एवं मादा पौधे की जोड़ी से बीज तैयार करने के प्रयास किए जाएंगे।

वनस्पति जगत में यह एक अद्भुत पहल है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नाइट्रोजन को उपयोगी रूप में बदलने वाली शैवाल – किशोर पंवार

कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, फॉस्फोरस के समान नाइट्रोजन भी एक ज़रूरी पोषक तत्व है। पृथ्वी के वायुमंडल में लगभग 80 प्रतिशत नाइट्रोजन है लेकिन मज़ेदार बात है कि पेड़-पौधे इसका उपयोग तब तक नहीं कर सकते जब तक कि इसे यौगिकों में न बदल दिया जाए। नाइट्रोजन स्थिरीकरण का यह अत्यंत महत्वपूर्ण काम पृथ्वी पर सिर्फ आर्किया और बैक्टीरिया समूह के सूक्ष्मजीव कर पाते हैं और इन्हीं की बदौलत नाइट्रोजन पेड़-पौधों को मिलती है। लेकिन हालिया अध्ययन से पता चला है कि एक शैवाल भी यह काम कर सकती है। 

हाल ही में वैज्ञानिकों ने पहली ऐसी शैवाल की खोज की है जो उसमें पाए जाने वाली एक छोटी कोशिका संरचना की बदौलत हवा की नाइट्रोजन को उपयोगी रूप में बदल सकती है। नाइट्रोजन सजीवों की वृद्धि एवं जीवन क्रियाओं के लिए एक अनिवार्य तत्व है लेकिन पेड़-पौधे, शैवाल वगैरह तात्विक नाइट्रोजन का उपयोग नहीं कर सकते, बल्कि तभी कर सकते हैं जब वह यौगिकों के रूप में मिले। शोधकर्ताओं ने इस शैवाल में पाई गई इस संरचना को अंगक यानी ऑर्गेनेल कहा है। और इसे नाम दिया गया है नाइट्रोप्लास्ट।

यह शोध अप्रैल 2023 में साइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ था। शोधकर्ताओं के अनुसार जेनेटिक इंजीनियरिंग की तकनीक से इस संरचना के जीन्स को पौधों में रोप दिया जाए तो वे स्वयं नाइट्रोजन को परिवर्तित करने में सक्षम हो सकते हैं। इससे फसलों की पैदावार बढ़ सकती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो सकती है।

अध्ययन के एक सह लेखक कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के समुद्री पारिस्थितिक वैज्ञानिक के. जोनाथन ज़ेहर कहते हैं कि अब तक पाठ्यपुस्तकों के अनुसार नाइट्रोजन स्थिरीकरण (यानी नाइट्रोजन तत्व को यौगिकों में बदलने) की क्षमता केवल बैक्टीरिया और आर्किया समूह में ही पता थी। ये प्रोकैरियोटिक जीव हैं। कोशिका बनावट के आधार पर जीव दो तरह के होते हैं – प्रोकैरियोट (जिनमें केंद्रक नहीं पाया जाता) और यूकैरियोट (जिनमें सुस्पष्ट केंद्रक पाया जाता है और जेनेटिक पदार्थ केंद्रक में होता है)। उनका अध्ययन बताता है कि शैवाल की यह प्रजाति पहला यूकैरियोटिक जीव है जिसमें नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्षमता है। यूकैरियोटिक जीवों में पौधे और जंतु शामिल हैं।

2012 में ज़ेहर के शोधदल ने बताया था कि ब्रारुडोस्फेरा बिगलोवी (Braarudosphaera bigelowii) नामक एक समुद्री शैवाल UCYN-A नाम के बैक्टीरिया से करीबी रूप से जुड़ा रहता है। लगता था कि यह बैक्टीरिया शैवाल की कोशिका के अंदर या उसके ऊपर रहता है। शोधकर्ताओं का अनुमान था कि यह बैक्टीरिया नाइट्रोजन गैस को अमोनिया जैसे यौगिकों में बदल देता है जिसका उपयोग शैवाल अपनी वृद्धि में करता है। माना गया था कि नाइट्रोजन के बदले में बैक्टीरिया को शैवाल से कार्बनिक ऊर्जा स्रोत अर्थात पोषक पदार्थ मिलते होंगे।

लेकिन नवीनतम अध्ययन के आधार पर शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि UCYN-A बैक्टीरिया को एक स्वतंत्र जीव के रूप में नहीं बल्कि इस शैवाल के अंदर रहने वाले एक अंगक के रूप में देखा जाना चाहिए।

ज़ेहर का कहना है कि एक पूर्व अध्ययन में किए गए जेनेटिक विश्लेषण के अनुसार इस शैवाल और बैक्टीरिया के पूर्वजों के बीच लगभग 10 करोड़ वर्ष पूर्व एक सहजीवी सम्बंध स्थापित हुआ था। इस सहजीवी सम्बंध ने अंतत: एक अंगक का रूप ले लिया है – नाइट्रोप्लास्ट। यह अब ब्रारुडोस्फेरा बिगलोवी शैवाल के अंदर विराजमान है।

इसे अंगक क्यो कहें?

आखिर किसी कोशिका के अंदर रहने वाले जीव को स्वतंत्र जीव न मानकर अंगक क्यों माना जाए? किसी मेज़बान कोशिका के अंदर रहने वाला बैक्टीरिया अंगक है या नहीं, यह तय करने के लिए दो प्रमुख मापदंडों का उपयोग किया जाता है। पहला तो यह है कि विचाराधीन कोशिका संरचना (बैक्टीरिया) मेज़बान कोशिका में पीढ़ी-दर-पीढ़ी साथ चलना चाहिए। अर्थात जब मेज़बान कोशिका विभाजित होकर दो कोशिकाएं बनें तो दोनों में वह संरचना पहुंचनी चाहिए।

दूसरी कसौटी यह है कि वह संरचना मेज़बान कोशिका द्वारा मिलने वाले प्रोटीन पर निर्भर होना चाहिए।

नाइट्रोप्लास्ट इन दोनों मापदंडों पर खरा पाया गया है। इस कोशिका के विभाजन के विभिन्न चरणों में दर्जनों शैवाल कोशिकाओं की इमेजिंग करके शोधकर्ताओं ने पाया कि मेज़बान कोशिका के विभाजन के ठीक पूर्व नाइट्रोप्लास्ट दो भागों में विभाजित हो जाता है। इस तरह यह नाइट्रोप्लास्ट मूल कोशिका से उसकी संतान कोशिकाओं में स्थानांतरित होता रहता है।

यह ठीक वैसा ही है जैसा कि कोशिका में उपस्थित अन्य अंगकों में होता है। उल्लेखनीय है कि क्लोरोप्लास्ट और माइटोकॉण्ड्रिया भी अंगक ही हैं और उनमें भी कोशिका विभाजन के दौरान ऐसा ही होता है। इसके अलावा क्रोमोप्लास्ट, एमायलोप्लास्ट आदि भी अंगक ही हैं। माना जाता है कि ये भी कभी स्वतंत्र रूप से रहने वाले जीव थे जो अब पौधों की कोशिकाओं में स्थाई रूप से बस गए हैं और पादप अंगक कहलाते हैं। क्लोरोप्लास्ट के कारण ही पौधों में प्रकाश संश्लेषण संभव हुआ है और माइटोकॉण्ड्रिया ऑक्सी-श्वसन क्रिया को संभव बनाता है।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि इस नाइट्रोप्लास्ट को सारे ज़रूरी प्रोटीन्स शैवाल की कोशिका से ही मिलते है। हालांकि नाइट्रोप्लास्ट मेज़बान कोशिका के आयतन का 8 प्रतिशत से ज़्यादा होता है लेकिन इसके पास वे मुख्य प्रोटीन ही नहीं होते जो प्रकाश संश्लेषण और आनुवंशिक पदार्थ बनाने के लिए ज़रूरी हैं। ये प्रोटीन उसे शैवाल से ही प्राप्त होते हैं।

आंतरिक सहजीवी

सर्व प्रथम एंड्रियास शिंपर ने सन 1883 में यह प्रस्ताव रखा था कि वर्तमान पेड़-पौधों की कोशिकाओं में पाया जाने वाला क्लोरोप्लास्ट कोशिकीय सहजीविता का एक उदाहरण है। इस परिकल्पना के अनुसार क्लोरोप्लास्ट उन सायनोबैक्टीरिया के वंशज हैं जो किसी जीव द्वारा भक्षण के दौरान कोशिका के अंदर ले लिए गए थे। किसी कारण से ये पचने से बच गए और अब वहां आंतरिक सहजीवी के रूप में निवास कर रहे हैं। सायनोबैक्टीरिया और क्लोरोप्लास्ट द्वारा निर्मित प्रोटीन में समानताओं के आधार पर इस परिकल्पना को बल मिलता है। समय के साथ यह आंतरिक सहजीवी स्वतंत्र रूप से रहने की क्षमता खो बैठे क्योंकि उनकी अनुवांशिक सूचनाओं (डीएनए) का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे मेज़बान कोशिका के केंद्रक में स्थानांतरित हो गया।

उपरोक्त तथ्यों के चलते क्लोरोप्लास्ट व माइटोकॉण्ड्रिया के लिए आंतरिक सहजीवी शब्द का उपयोग उचित ही लगता है। इन अंगों की आंतरिक झिल्ली प्रोटोक्लोरोफाइट की प्लाज़्मा झिल्ली से मिलती-जुलती है और बाहरी झिल्ली मेज़बान कोशिका की भित्ति से। यह सिद्धांत माइटोकॉण्ड्रिया की दोहरी दीवार की उपस्थिति को भी उचित रूप से समझाता है। माइटोकॉण्ड्रिया की बाहरी दीवार पर उपस्थित छिद्र (पोरिंस) भी इसका एक प्रमाण है। गौरतलब है कि पोरिंस कुछ बैक्टीरिया की बाहरी झिल्ली में भी पाए जाते हैं। इससे भी उनके आंतरिक सहजीवी होने की पुष्टि होती है। सायनोबैक्टीरिया सामान्य रूप से कई जंतुओं और पौधों के अंदर आज भी मिलते हैं।

पौधों में फेरबदल

ज़ेहर कहते हैं कि नाइट्रोप्लास्ट मेज़बान कोशिका के साथ कैसे तालमेल बैठाता है यह समझ में आने से जेनेटिक इंजीनियरिंग के प्रयासों में मदद मिलेगी। फसलों की पैदावार काफी हद तक नाइट्रोजन की सीमित उपलब्धि से प्रभावित होती है। जेनेटिक इंजीनियरिंग के ज़रिए यदि नाइट्रोप्लास्ट को कोशिकाओं में डाल दिया जाता है तो यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि होगी। नाइट्रोप्लास्ट युक्त पौधे अपनी नाइट्रोजन सम्बंधी ज़रूरतें स्वयं पूरी कर सकेंगे। यदि ऐसा हो जाता है तो नाइट्रोजन आधारित कृत्रिम उर्वरकों जैसे यूरिया, अमोनियम आदि की आवश्यकता कम हो जाएगी। साथ ही रासायनिक उर्वरकों के मृदा और पर्यावरण पर होने वाले हानिकारक प्रभावों से भी काफी हद तक बचा जा सकेगा।

लेकिन नाइट्रोप्लास्ट को फसली पौधों में रोपना कोई आसान काम नहीं होगा। नाइट्रोप्लास्ट के जीन्स युक्त पादप कोशिकाओं को इस तरह से इंजीनियर करने की आवश्यकता होगी कि नाइट्रोप्लास्ट पादप कोशिका के साथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होते रहें। ऐसा क्लोरोप्लास्ट और माइटोकॉण्ड्रिया में तो प्राकृतिक रूप से होता रहता है। यदि नाइट्रोप्लास्ट के मामले में भी ऐसा हो पाता है तो कृषि जगत में एक क्रांतिकारी परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होगा। (स्रोत फीचर्स)

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चंदन के पेड़ उगाने की जुगत – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

शायद ही किसी को चंदन के बारे में बताने की ज़रूरत पड़ेगी। इसके सुगंधित तेल, बेशकीमती लकड़ी और कई औषधीय गुणों के कारण इसे सदियों से महत्व मिलता रहा है। लेकिन चंदन का पेड़, जिससे यह सारी चीज़ें हमें मिलती हैं, उससे हम इतना वाकिफ नहीं हैं।

चंदन का पेड़ पतझड़ी जंगलों में उगने वाला पेड़ है। यह आंशिक या अर्ध-परजीवी वृक्ष है, जिसके चारों ओर चार-पांच अन्य तरह के पेड़ों की उपस्थिति ज़रूरी होती है। चंदन की जड़ें ज़मीन के नीचे एक हौस्टोरियम (चूषक-जाल) बनाती हैं। यह चूषक-जाल आसपास के मेज़बान पेड़ों की जड़ों पर ऑक्टोपस जैसी पकड़ बनाती हैं, और उनके ज़रिए पानी और अन्य पोषक तत्व प्राप्त करती हैं।

चंदन के फल से तो शायद हम और भी अधिक अपरिचित हैं। इसका फल लगभग 1.5 से.मी. व्यास का (करीब बेर/जामुन जितना बड़ा), रसीला-गूदेदार और पकने पर चमकदार जामुनी-काले रंग का होता है। इसके अंदर एक बीज होता है। इस बीज की रक्षा करने के लिए सख्त खोल नहीं होती बल्कि वह सूखी गिरी में कैद होता है। इस कारण बीज का एक मौसम से अधिक समय तक जीवित रहना मुश्किल होता है।

चंदन के उपरोक्त दोनों गुण – प्रारंभिक विकास चरण में अन्य पेड़ों की मदद की आवश्यकता, और अल्पकाल तक ही सलामत रहने वाले बीज जो संग्रहित नहीं किए जा सकते – के अलावा अत्यधिक दोहन किए जाने के चलते इन पेड़ों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इस वजह से दक्षिण भारत के जंगलों में चंदन के पेड़ों की संख्या में भारी गिरावट आई है। अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने चंदन को एक जोखिमग्रस्त प्रजाति की श्रेणी में रखा है। इसमें आश्चर्य की बात नहीं कि अब चंदन और चंदन के तेल का दुनिया का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता देश ऑस्ट्रेलिया है।

पक्षियों द्वारा फैलाव

इसका फल कड़वा होता है, इसका स्वाद मनुष्यों को नहीं भाएगा। लेकिन यह पक्षियों को प्रिय है। एशियाई कोयल और भूरा धनेश जैसी लगभग 10 प्रजातियां इसके फल को साबुत ही निगल जाती हैं, और समय के साथ बीज को उस पेड़ से काफी दूरी पर गिरा देती हैं। ये पक्षी भारत के बड़े फल खाने वाले (फलभक्षी) पक्षियों में से हैं। चंदन के पेड़ का फल कोयल और धनेश के लिए एकदम उपयुक्त है। जानी-मानी बात है कि चंदन के जिन पेड़ों के बीज बड़ी साइज़ के होते हैं, उनके बीज आम तौर पर मूल पेड़ के आसपास ही बिखरते हैं। हालांकि बड़े बीज अंकुरण के लिए बेहतर होते हैं, लेकिन पक्षी बड़े बीजों को निगल नहीं पाते हैं और गूदे पर चोंच मारने के बाद उन्हें वहीं नीचे गिरा देते हैं।

बीजों के अंकुरण के लिए अच्छा होता है कि वे पक्षियों के पाचन तंत्र से होकर गुज़रें। इससे गुज़रने के बाद बीज बहुत तेज़ी से अंकुरित होते हैं और उनके पेड़ बनने की संभावना अधिक होती है। यही कारण है कि हमें बड़े-बड़े परिपक्व चंदन के पेड़ जंगलों में देखने को मिलते हैं न कि वृक्षारोपण स्थलों (प्लांटेशन) में। अफसोस की बात है कि जंगलों के कम होने से पक्षियों की आबादी भी कम हो गई है, और इसलिए उचित बीज फैलाव की संभावना भी कम हो गई है।

इस मामले में, क्या मनुष्य पक्षियों की बराबरी कर सकते हैं? फॉरेस्ट जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में त्रिशूर के केरल कृषि विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने, युरोप के साथियों के साथ मिलकर चंदन के बीजों को अंकुरण के लिए विभिन्न तरीकों से तैयार करने की कोशिश की है। सर्वोत्तम परिणाम तब मिले जब ताज़े एकत्रित किए हुए बीजों को पॉलीएथिलीन ग्लाइकॉल-6000 के 5% घोल में दो दिनों के लिए भिगोया गया। यह दिलचस्प सिंथेटिक पदार्थ बीज की कोशिकाओं पर परासरण दाब पैदा करता है और अंकुरण प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है। इसे ऑस्मोप्रायमिंग कहा जाता है, और सही ढंग से करने पर यह बीजों को केवल पानी में भिगोने से अधिक प्रभावी होता है। ऑस्मोप्रायमिंग की प्रक्रिया से गुज़रने के बाद बीजों की अंकुरण दर 79 प्रतिशत थी जबकि सीधे बीज बोने में यह दर सिर्फ 45 प्रतिशत थी। (स्रोत फीचर्स)

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