गिद्धों पर नया खतरा

कुछ वर्षों पहले गिद्धों पर एक संकट आया था और गिद्धों की आबादी तेज़ी से घटी थी। 1990 के दशक में यह एक सामान्य अवलोकन था कि भारत में करोड़ों गिद्ध थे। इनके चलते जानवरों के शव तत्काल ठिकाने लग जाते थे। फिर अचानक गिद्धों की आबादी घटने लगी और काफी शोध के बाद पता चला था कि इसका कारण डिक्लोफेनेक नामक एक दवा थी। यह दवा पशुओं को दर्द निवारक के तौर पर दी जाती थी और इसके अवशेष इन पशुओं में जमा हो जाते थे। पशुओं के शव खाने पर डिक्लोफेनेक गिद्धों के शरीर में पहुंच जाती थी और उनके गुर्दों को नष्ट कर देती थी।

इस समस्या के मद्देनज़र भारत में 2006 में डिक्लोफेनेक के पशुओं में उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। कई देशों ने भारत का अनुसरण किया था। इससे परिस्थिति में थोड़ा ठहराव तो आया लेकिन नुकसान तो हो ही चुका था – देश के लगभग 90 प्रतिशत गिद्ध मारे जा चुके थे। अब दो ताज़ा अध्ययनों ने एक नए खतरे की ओर इशारा किया है। इन अध्ययनों का निष्कर्ष है कि गिद्धों की मौत निमेसुलाइड खाने से भी हो सकती है। निमेसुलाइड भी एक लोकप्रिय दर्द निवारक दवा है।

पर्यावरण समूह अब कोशिश कर रहे हैं कि सराकर निमेसुलाइड के पशुओं में उपयोग पर प्रतिबंध लगा दे। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के उप निदेशक विभु प्रकाश के अनुसार निमेसुलाइड का घातक प्रभाव चिंताजनक है। चिंता की बात यह भी है कि कई सारी दर्द निवारक दवाइयां गिद्धों के लिए जानलेवा पाई गई हैं। जैसे एसिक्लोफेनेक और कीटोप्रोफेन जैसी दवाइयां घातक साबित हो चुकी हैं और कई देशों में प्रतिबंधित हैं। लेकिन ज़्यादा चिंताजनक बात यह है कि ये प्रतिबंध सिर्फ पशुओं में इनके उपयोग पर लगाए गए हैं और बाज़ार में दवाइयां मिलती रहती हैं।

निमेसुलाइड के विरुद्ध कार्रवाई की मांग सबसे पहले 2016 में उठी थी जब कई गिद्धों के शवों में यह दवा पाई गई थी। यह चिंता तब गहरा गई जब सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री के सुब्रामण्यन मुरलीधरन की रिपोर्ट एन्वायरमेंटल साइन्स एंड पॉल्यूशन रिपोट्स में प्रकाशित हुई।

अब पर्यावरणविद अन्य दर्द निवारक दवाइयों की पैरवी कर रहे हैं। एक है टॉलफेनेमिक एसिड जो पशुओं में उपयोग की जाती है और एक रिपोर्ट के अनुसार यह गिद्धों के लिए सुरक्षित है। इसी प्रकार से, मेलोक्सीकैन भी सुरक्षित पाई गई है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बढ़ रही है जुड़वा बच्चों की संख्या

क नए अध्ययन का निष्कर्ष है कि पूरी दुनिया में जुड़वा बच्चों की संख्या बढ़ रही है। 1980 के दशक से शुरू करें तो जुड़वा बच्चों की संख्या 30 प्रतिशत बढ़ी है। जहां 1980 से 1985 के बीच 1000 प्रसवों में जुड़वा प्रसव 9 होते थे वहीं 2010 से 2015 के बीच की अवधि में हर 1000 प्रसवों में 12 जुड़वा प्रसव थे।

अध्ययन में यह भी बताया गया है कि सिर्फ प्रतिशत ही नहीं, जुड़वा प्रसवों की कुल संख्या भी बढ़ी है। 1980 के दशक के प्रारंभ में 11 लाख जुड़वा प्रसव हुए थे और 2010 के दशक की शुरुआत में ये बढ़कर 16 लाख हो गए – यानी जुड़वा प्रसवों में 42 प्रतिशत का इजाफा हुआ।

इसके कारणों पर विचार करते हुए अध्ययन में इसका प्रमुख कारण चिकित्सकीय सहायता प्राप्त प्रजनन को बताया गया है। इसके अंतर्गत इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (जिसे बोलचाल में टेस्ट ट्यूब बेबी कहते हैं) भी शामिल है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब निषेचन शरीर से बाहर करवाया जाता है और भ्रूण को गर्भाशय में पहुंचाया जाता है तो एक से अधिक भ्रूण पहुंचने की संभावना अधिक होती है। हालांकि अब शायद इसमें कमी आने लगेगी क्योंकि चिकित्सक अब एकाधिक भ्रूण प्रत्यारोपित करने से बचने लगे हैं।

जुड़वा प्रसव की संख्या में वृद्धि का एक कारण शायद यह भी है कि अब महिलाएं अधिक उम्र में बच्चे पैदा करने लगी हैं और बढ़ती उम्र के साथ जुड़वा गर्भ की संभावना बढ़ती है। इस अध्ययन के एक शोधकर्ता ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के समाज विज्ञानी क्रिस्टियान मोंडेन का कहना है कि इस समय दुनिया में जुड़वा बच्चों की संख्या शायद पिछले पचास सालों में सर्वाधिक है। उनके मुताबिक यह तथ्य इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि जुड़वा प्रसव के दौरान शिशु की मृत्यु की संभावना ज़्यादा होती है और मां के लिए प्रसव में पेचीदगियां पैदा होने की संभावना भी एकल प्रसव की अपेक्षा अधिक होती है। (स्रोत फीचर्स)

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दूध पीकर घुड़सवार चरवाहे युरोप पहुंचे

पांच हज़ार से अधिक वर्ष पहले आज यमनाया के रूप में पहचाने जाने वाले खानाबदोश वर्तमान रूस और यूक्रेन के घास के मैदानों से भारी बैल गाड़ियों में बाहर निकल पड़े थे। कुछ ही शताब्दियों में वे पूरे युरेशिया में फैल गए, और मंगोलिया से लेकर हंगरी तक की आबादी में अपने आनुवंशिक हस्ताक्षर छोड़ दिए। अब, 50 से अधिक कांस्य युगीन कंकालों के दांतों पर अश्मीभूत प्लाक बताता है कि संभवत: उनका विस्तार दूध के दम पर संभव हुआ था।

शोधकर्ताओं का काफी समय से यह अंदाज़ा था कि बग्घियों, डेयरी और घुड़सवारी के मेल ने यमनाया लोगों के लिए अधिक घुमक्कड़ जीवन संभव बनाया था। लेकिन शोधकर्ताओं के इस विचार का समर्थन करने वाले कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं थे, सिवाय कुछ दफन बग्घियों और मिट्टी के बर्तनों के।

यमनाया के फैलाव की सफलता का कारण जानने के लिए यूएसए, युरोप और रूस के शोधकर्ताओं ने दांतों के प्लाक में फंसकर सुरक्षित रह गए दूध प्रोटीन की जांच की। प्लाक के ये नमूने वर्तमान रूस के घास के मैदानों में 4600 ईसा पूर्व से 1700 ईसा पूर्व तक रहे लोगों के थे। शोधकर्ताओं ने कैस्पियन सागर के उत्तरी क्षेत्र के दो दर्जन से अधिक खुदाई स्थलों से प्राप्त 56 कंकालों की जांच की। संरक्षित प्रोटीन को प्लाक से अलग किया और फिर मास स्पेक्ट्रोमेट्री नामक तकनीक से हरेक प्रोटीन की पहचान की।

3300 ईसा पूर्व से पहले, वोल्गा और डॉन नदियों के किनारे रहने वाले लोगों के दांतों के प्लाक में दूध के कोई प्रोटीन नहीं थे। पूर्व अध्ययनों में देखा गया है कि इसकी बजाय ये यमनाया-पूर्व समूह मीठे पानी की मछली, जंगली शिकार, और कभी-कभार पालतू गाय, भेड़, या बकरी का मांस खाते थे।

फिर, लगभग 3300 ईसा पूर्व के बाद के प्लाक नमूनों में गाय, भेड़ और बकरी के दूध के प्रोटीन प्रचुर मात्रा में मिले। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि इस समय के ये लोग डेयरी उत्पादों का सेवन करते थे। कुछेक नमूनों में घोड़े के दूध की भी बहुत थोड़ी मात्रा मिली। ज्यूरिख इंस्टीट्यूट ऑफ इवॉल्यूशनरी मेडिसिन के जैव-आणविक पुरातत्वविद शेवन विल्किन कहते हैं कि कभी-कभी इन जानवरों को खाने की बजाय इन जानवरों को सदैव दोहना, यह एक सांस्कृतिक बदलाव है।

नेचर पत्रिका में प्रकाशित निष्कर्षों के अनुसार ये प्रोटीन संकेत देते हैं कि शिकारी-संग्रहकर्ताओं के तेज़ी से खानाबदोश चरवाहों में बदलने और महज़ 300 सालों में पूरे युरेशिया में फैल जाने में मुख्य भूमिका डेयरी और पशुपालन अपनाने की है। देखा जाए तो घोड़ों, मवेशियों और बकरियों ने घास को रोटी, कपड़ा और मकान में बदल दिया।

लेकिन यह सिर्फ डेयरी के कारण संभव नहीं हुआ; लगभग इसी समय बग्घियों की शुरुआत ने पानी लाना और जानवरों को दूर के चारागहों में चराने के लिए ले जाना संभव बनाया। पालतू घोड़ों ने नए यमनाया खानाबदोशों को जानवरों के बड़े-बड़े झुंडों का प्रबंधन करने में सक्षम बनाया होगा।

बहरहाल, एक रहस्य अब भी बना हुआ है। प्राचीन डीएनए के विश्लेषण बताते हैं कि यमनाया लोग लैक्टोज़ पचा नहीं पाते थे। यह संभव है कि आधुनिक मंगोलियाई लोगों की तरह यमनाया लोग भी किण्वित डेयरी उत्पाद जैसे दही या चीज़ का सेवन करते हों, जिनमें कोई लैक्टोज़ नहीं होता है। चाहे वे किसी भी रूप में वे डेयरी उत्पादों के सेवन करते हों लेकिन इतना साफ है कि इसके बगैर वे इतनी तेज़ी से, इतनी दूर तक नहीं फैल सकते थे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सार्स जैसे वायरस बार-बार आते हैं

पिछले दो दशकों में वैश्विक स्तर पर मात्र दो नए कोरोनावायरस उभरे हैं: सार्स-कोव (2003 में सार्स) और दूसरा सार्स-कोव-2 (कोविड-19)। लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार शायद ये चमगादड़ों से छलकने वाले ऐसे ही वायरसों की एक तुच्छ बानगी भर हैं। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि हर वर्ष लगभग 4 लाख लोग सार्स सम्बंधी कोरोनावायरस से प्रभावित होते हैं जो किसी बड़ी बीमारी का रूप नहीं लेते हैं। इस परिणाम को लेकर काफी अगर-मगर हैं लेकिन इसे एक चेतावनी के रूप में लेना चाहिए क्योंकि इससे पता चलता है कि जंतु-जनित संक्रमण काफी आम हो सकते हैं।        

अध्ययन में इकोहेल्थ अलायन्स के पीटर डज़ाक और एनयूएस मेडिकल कॉलेज, सिंगापुर के शोधकर्ता लिन्फा वांग और अन्य ने सार्स सम्बंधी कोरोनावायरस की वाहक 23 चमगादड़ प्रजातियों के आवासों का एक विस्तृत नक्शा तैयार किया। फिर उन्होंने इस मानचित्र पर उन स्थानों को चिंहित किया जहां मनुष्य भी बसे हैं। शोधकर्ता बताते हैं कि लगभग 50 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां भविष्य में कोरोनावायरस चमगादड़ों से छलककर मनुष्यों में आ सकते हैं। 

इस नक्शे की मदद से सार्स या कोविड वायरस के उभरने की संभावना देखकर भावी प्रकोप को रोकने के उपाय किए जा सकते हैं। और तो और, इसकी मदद से वायरस की उत्पत्ति के स्रोत का भी पता लगाने में मदद मिल सकती है।

शोधकर्ता एक कदम और आगे गए। कोविड-19 उभरने से पहले किए गए कुछ सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई थी कि दक्षिण एशिया के कुछ लोगों में सार्स-सम्बंधित कोरोनावायरस की एंटीबॉडीज़ मौजूद थीं। लोगों के चमगादड़ों के संपर्क में आने की संभावना और रक्त में एंटीबॉडी कितने समय तक बनी रहती हैं, इनके मिले-जुले विश्लेषण के आधार पर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि हर वर्ष लगभग 4 लाख लोग सार्सनुमा वायरस से संक्रमित होते हैं।

डज़ाक के अनुसार चमगादड़ों से हमारा संपर्क कल्पना से कहीं अधिक है। गुफाओं के आसपास रहने का मतलब है कि आप वायरस के निरंतर संपर्क में हैं। लोग गुआनो खाद निकालते हैं, चमगादड़ों का शिकार करते हैं और उनको खाते हैं। वैसे इस अध्ययन में  वन्यजीव व्यापार और अन्य जीवों के ज़रिए चमगादड़ से मनुष्यों में वायरस के प्रवेश करने की संभावना पर तो चर्चा ही नहीं की गई है।

वैसे इन नतीजों पर शंकाएं भी व्यक्त की गई हैं। एक आपत्ति तो यह है कि इस अध्ययन के परिणामों की वि·ासनीयता की रेंज बहुत अधिक है: 1 से लेकर 3.5 करोड़ अदृश्य संक्रमण प्रति वर्ष। इसके अलावा, एंटीबॉडी से प्राप्त डैटा चंद हज़ार लोगों का था और इसमें फाल्स पॉज़िटिव भी हो सकते हैं। 

कई संक्रमण इसलिए पता नहीं चलते क्योंकि वे अल्प-कालिक होते हैं और आगे नहीं फैलते। शायद ये वायरस व्यक्ति से व्यक्ति में संचरण के लिए पर्याप्त कोशिकाओं को संक्रमित नहीं कर पाते हों या ये मनुष्यों की प्रतिरक्षा को मात देने में सक्षम न हों। ये थोड़े-से लोगों को ही संक्रमित कर पाते हैं।  

एक कारण यह भी हो सकता है कि इन वायरसों से होने वाली बीमारियां पहचानी न गई हों। वैसे भी हल्के-मध्यम लक्षणों के चलते लोग शायद ही  अस्पताल जाएं। फिर भी यह अध्ययन भविष्य में वायरस के फैलने के जोखिमों को चिंहित करने की दिशा में छोटा मगर अच्छा प्रयास है। इस अध्ययन से एक बात तो साफ है कि जीवों से मनुष्यों में वायरस के छलकने-फैलने की घटनाएं जितनी मानी जाती थीं उससे कहीं अधिक होती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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विष्ठा प्रत्यारोपण से चूहों का दिल जवान होता है

ह तो जानी-मानी बात है कि बुढ़ापे के साथ दिमाग धीमा होने लगता है, आप भूलने लगते हैं और नए हुनर सीखने में परेशानी महसूस करते हैं। लेकिन अब चूहों पर किए गए प्रयोगों ने उम्मीद की एक धुंधली सी किरण दिखाई है। इस शोध ने दर्शाया है कि युवा चूहे के आमत के बैक्टीरिया (मल के रूप में) बूढ़े चूहों को देने पर बुढ़ाते दिमाग के कुछ लक्षण पलटे जा सकते हैं।

वैज्ञानिकों का मत है कि हमारी आंत में बसने वाले बैक्टीरिया हमारे मूड से लेकर आम तंदुरुस्ती तक हर चीज़ को प्रभावित करते हैं। और आंतों का यह सूक्ष्मजीव संसार उम्र के साथ बदलता रहता है। लेकिन इसका असर भलीभांति परखा नहीं गया था।

इसी असर को परखने के लिए शोधकर्ताओं ने 3-4 माह के चूहों की विष्ठा के नमूने लिए (3-4 माह चूहों की जवानी होती है) और इन्हें 20 माह उम्र के चूहों में प्रत्यारोपित कर दिया (20 माह के चूहे वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में आते हैं)। तुलना के लिए कुछ चूहों को उनकी ही उम्र के चूहों की विष्ठा दी गई थी (यानी युवाओं को युवाओं की तथा बूढ़ों को बूढ़ों की)।

शोधकर्ताओं ने सबसे पहले तो यह देखा कि युवा चूहों का सूक्ष्मजीव संसार पाने वाले बूढ़े चूहों का सूक्ष्मजीव संसार युवाओं के समान हो गया था। उदाहरण के लिए युवाओं की आंत में बहुतायत से पाए जाने वाले एंटरोकॉकस बैक्टीरिया बूढ़ो में भी प्रचुर हो गए।

और तो और, दिमाग पर भी असर देखा गया। दिमाग का हिप्पोकैम्पस नामक हिस्सा सीखने तथा याददाश्त से सम्बंधित होता है। युवा विष्ठा पाने के बाद बूढ़े चूहों में भी यह हिस्सा भौतिक व रासायनिक रूप से युवा चूहों जैसा हो गया। यह भी देखा गया कि युवा विष्ठा पाए बूढ़े चूहे भूलभुलैया वाली पहेलियां सुलझाने में भी बेहतर हो गए और भूलभुलैया के रास्तों को याद रखने में भी निपुण साबित हुए। युनिवर्सिटी कॉलेज कॉर्क के तंत्रिका वैज्ञानिक जॉन क्रायन और उनके साथियों द्वारा नेचर एजिंग नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित परिणामों के मुताबिक हमउम्र चूहों की विष्ठा के ऐसे कोई असर नहीं हुए।

शोधकर्ताओं ने बताया है कि कुछ चीज़ें नहीं बदलीं। जैसे इस उपचार के बाद बूढ़े चूहे ज़्यादा मिलनसार नहीं हुए थे। आंतों के कई बैक्टीरिया वैसे के वैसे बने रहे। वैसे अन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि इस टीम ने अभी प्रामाणिक रूप से यह नहीं दर्शाया है कि आंतों का सूक्ष्मजीव संसार किस हद तक बदला और क्या स्थायी रूप से बदल गया। वैसे क्रायन ने चेताया है अभी तुरंत मनुष्यों पर छलांग लगाने का वक्त नहीं आया है क्योंकि ऐसे अन्य अध्ययनों के परिणाम मिश्रित रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

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सार्स-कोव-2 की प्रयोगशाला-उत्पत्ति की पड़ताल

कोविड-19 वायरस के प्रयोगशाला से लीक होने की संभावना पर चर्चा जारी है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने तो इसे ‘चीनी वायरस’ तक कहा। दूसरी ओर, कई शोधकर्ताओं ने दी लैसेंट के माध्यम से प्रयोगशाला उत्पत्ति के सिद्धांत को खारिज कर दिया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के संयुक्त मिशन की रिपोर्ट में भी वायरस के प्रयोगशाला जनित होने के सिद्धांत को ‘असंभाव्य’ बताया गया था।  

फिर इस वर्ष के वसंत तक कुछ बदलाव देखने को मिले और ऐसा लगने लगा कि वायरस की प्रयोगशाला उत्पत्ति की परिकल्पना को सस्ते में खारिज कर दिया गया था। एक नोबेल पुरस्कार विजेता ने वैज्ञानिकों और मुख्यधारा के मीडिया पर ‘पर्याप्त साक्ष्य’ की अनदेखी करने का आरोप लगाया। डब्ल्यूएचओ के प्रमुख ने भी संयुक्त मिशन के निष्कर्षों पर शंका ज़ाहिर की और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने खुफिया समुदाय को वायरस के प्रयोगशाला से निकलने की संभावना का पुनर्मूल्यांकन करने का आदेश दिया। इसके साथ ही वायरोलॉजी और इवॉल्यूशनरी बायोलॉजी के जाने-माने विशेषज्ञों सहित 18 वैज्ञानिकों ने साइंस में प्रकाशित एक पत्र के माध्यम से ‘प्रयोगशाला उत्पत्ति’ का अधिक संतुलित मूल्यांकन करने का आह्वान किया। अलबत्ता, बाइडेन द्वारा गठित खुफिया समुदाय भी किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सका और फिलहाल वायरस उत्पत्ति प्राकृतिक स्रोत से ही नज़र आ रही है।

यह तो ज़ाहिर है कि इन सवालों की छानबीन के लिए साक्ष्य हेतु चीन का सहयोग ज़रूरी है लेकिन चीन की ओर से संयुक्त मिशन के दौरान उचित सहयोग नहीं मिल सका है। चीनी अधिकारियों ने वुहान की प्रयोगशालाओं के स्वतंत्र ऑडिट से भी इन्कार किया है। बढ़ते दबाव के चलते चीन ने संयुक्त मिशन द्वारा सुझाए गए अध्ययनों पर रोक लगा दी है जिनसे अलग-अलग प्रजातियों के बीच वायरस के संचरण का पता लगाया जा सकता था। अलबत्ता, मौजूदा साक्ष्य, महामारी के शुरुआती पैटर्न, सार्स-कोव-2 की जेनेटिक बनावट और वुहान पशु बाज़ार पर हालिया शोध पत्र के आधार पर कई वैज्ञानिकों का मानना है कि यह वायरस भी अन्य रोगजनकों के समान प्राकृतिक तौर पर जीवों से मनुष्यों में आया है।

युनिवर्सिटी ऑफ एरिज़ोना के इवॉल्यूशनरी जीव विज्ञानी माइकल वोरोबे इन साक्ष्यों के आधार पर प्रयोगशाला उत्पत्ति की बात से दूर हटे हैं। वोरोबे एचआईवी और 1918 के फ्लू की उत्पत्ति पर महत्वपूर्ण कार्य कर चुके हैं और उन्होंने उपरोक्त पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। उनका तथा एक अन्य हस्ताक्षरकर्ता फ्रेड हचिन्सन कैंसर रिसर्च सेंटर के जीव विज्ञानी जेसी ब्लूम का कहना है इस बहस ने राजनैतिक तनाव बढ़ाने का काम किया है और इसके चलते चीन से जानकारी प्राप्त करना मुश्किल हो गया है।      

देखा जाए तो प्रयोगशाला से उत्पत्ति की मूल परिकल्पना निकटता पर आधारित है – नया कोरोनावायरस एक ऐसे शहर में पाया गया जहां वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (डब्ल्यूआईवी) स्थित है। डब्ल्यूआईवी और दो अन्य छोटी प्रयोगशालाओं में काफी समय से चमगादड़ कोरोनावायरस पर अध्ययन किए जा रहे हैं। संभावना यह जताई गई है कि प्रयोगशाला के कुछ कर्मचारी दुर्घटनावश संक्रमित हुए और अन्य लोगों को भी संक्रमित किया। गौरतलब है कि प्रयोगशाला आधारित दुर्घटनाएं कोई नई बात नहीं है; सार्स का वैश्विक प्रकोप खत्म होने के बाद शोधकर्ता इससे 6 बार संक्रमित हुए हैं।          

ऐसा ज़रूरी नहीं कि शोधकर्ता का सार्स-कोव-2 से संक्रमण वुहान में हुआ हो। ब्रॉड इंस्टीट्यूट की शोधकर्ता और उपरोक्त पत्र की हस्ताक्षरकर्ता एलीना चैन ने 2018 के एक अध्ययन का हवाला दिया है जिसमें 218 लोगों के रक्त के नमूने लिए गए थे जो शहर से 1000 किलोमीटर दूर ऐसी गुफाओं के पास रहते थे जिनमें बड़ी संख्या में चमगादड़ पाए जाते हैं। इनमें से 6 लोगों में एंटीबॉडी की उपस्थिति से कोरोनावायरस संक्रमण की संभावना दिखी थी। यह कोरोनावायरस सार्स-कोव और सार्स-कोव-2 से काफी निकटता से सम्बंधित है। चैन के अनुसार वुहान के शोधकर्ता अक्सर वहां आते-जाते थे और यह वायरस संक्रमित लोगों से उनमें प्रवेश कर गया होगा।

हालांकि, डब्ल्यूआईवी की प्रमुख चमगादड़ कोरोनावायरस वैज्ञानिक शी ज़ेंगली ने कोविड-19 का प्रकोप शुरू होने के समय प्रयोगशाला में किसी के बीमार होने की बात से इन्कार किया है। दूसरी ओर, यूएस डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट ने 2019 की शरद ऋतु में डब्ल्यूआईवी में शोधकर्ताओं के बीमार होने की आशंका जताई थी। दी वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार एक अज्ञात यूएस इंटेलिजेंस रिपोर्ट में यह ज़ाहिर किया गया है कि नवंबर 2019 में डब्ल्यूआईवी के तीन शोधकर्ताओं ने अस्पताल में इलाज चाहा था। हालांकि रिपोर्ट में बीमारी के बारे में कोई जानकारी नहीं है और कई लोगों का कहना है चीन के अस्पताल सभी बीमारियों का इलाज करते हैं।

टूलेन युनिवर्सिटी के वायरोलॉजिस्ट रोबेरी गैरी वुहान के कर्मचारी के संक्रमित होने और शहर में वायरस के फैलाने की घटना को असंभव मानते हैं। जैसा कि डब्ल्यूआईवी का अध्ययन बताता है कि गुफाओं के पास रहने वाले लोगों में संक्रमण आम बात है। तो सवाल यह है कि यह वायरस कुछ शोधकर्ताओं को ही क्यों निशाना बनाएगा। हो सकता है कि इस वायरस ने भी मनुष्यों में प्रवेश करने से पहले किसी अन्य जीव में प्रवेश किया हो। फिर भी यह सवाल है कि इसने सबसे पहले प्रयोगशाला के कर्मचारी को कैसे संक्रमित किया? गैरी का यह भी कहना है कि डैटा से यह भी पता चला है कि कोविड-19 के शुरुआती मामलों का सम्बंध वुहान के विभिन्न बाज़ारों से था। इससे लगता है कि वायरस ने संक्रमित जीवों और पशु व्यापारियों के माध्यम से शहर में प्रवेश किया था।

लेकिन उपरोक्त पत्र के एक हस्ताक्षरकर्ता स्टेनफोर्ड युनिवर्सिटी के डेविड रेलमन के मुताबिक कोविड-19 के शुरुआती डैटा की बहुत कमी है जिसके कारण कोई स्पष्ट चित्र नहीं उभर पा रहा है। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार वायरस का लीक होना तभी संभव है जब जीवित वायरस को कल्चर किया जा रहा हो जो काफी मुश्किल काम है। शी के मुताबिक उनकी प्रयोगशाला में 2000 से अधिक चमगादड़ के विभिन्न नमूने हैं जिनमें से पिछले 15 वर्षों में केवल तीन वायरसों को अलग करके विकसित किया गया है और तीनों ही सार्स-कोव-2 से सम्बंधित नहीं हैं। कुछ लोगों ने शी पर सरकार के दबाव की बात कही है लेकिन चीन के बाहर के तमाम वैज्ञानिक शी की सत्यनिष्ठा पर पूरा भरोसा करते हैं।

महामारी के स्रोत सम्बंधी सारी अटकलें 6 व्यक्तियों पर केंद्रित है जिन्हें वर्ष 2012 में मोजियांग स्थित तांबे की खदान में चमगादड़ों का मल साफ करने के बाद गंभीर श्वसन रोग हुआ था। इनमें से तीन की तो मृत्यु हो गई थी। प्रयोगशाला से वायरस निकलने के सिद्धांत का समर्थन करने वालों का मानना है कि ये लोग कोरोनावायरस से संक्रमित हुए थे। उनका मानना है कि यह वायरस या तो सार्स-कोव-2 था या बाद में इसे आनुवंशिक रूप से परिवर्तित करके सार्स-कोव-2 को तैयार किया गया है। वास्तव में जब खदान के कर्मचारी बीमार हुए थे तब शी और उनके सहयोगियों ने विभिन्न समय पर चमगादड़ों के नमूने एकत्रित किए थे। उन्होंने इन नमूनों में नौ नए प्रकार के सार्स-सम्बंधित वायरस का पता लगाया था।

शी बताती हैं कि खदान में काम करने वाले कर्मचारियों के रक्त परीक्षण में कोरोनावायरस या एंटीबॉडी के साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए हैं। इस विश्लेषण में काम करने वाले आणविक जीवविज्ञानी लिन्फा वैंग के मुताबिक खदान में मिले सार्स-कोव-2 से सम्बंधित साक्ष्यों को दबाने की बात बेतुकी है क्योंकि वे तो यह सिद्ध करना चाहते थे कि यह बीमारी कोरोनावायरस के कारण हुई थी और यदि ऐसा पता चलता तो वे इसे तुरंत प्रकाशित करते। कई अन्य वैज्ञानिकों ने भी वैंग का समर्थन किया है लेकिन उनका मानना है कि अधिक पारदर्शिता से मामले को सुलझाया जा सकता है।

प्रयोगशाला उत्पत्ति के सबसे इन्तहाई तर्क के अनुसार सार्स-कोव-2 डब्ल्यूआईवी में जानबूझकर तैयार किया गया है। ऐसे में न सिर्फ चीन की निंदा होगी बल्कि वायरोलॉजी के क्षेत्र को भी गंभीर नुकसान होगा। पिछले एक दशक में ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ (जीओएफ) सम्बंधी शोध के वैज्ञानिक महत्व पर तीखी चर्चा हुई है। गेन-ऑफ-फंक्शन शोध में ऐसे रोगजनकों का निर्माण किया जाता है जो मनुष्यों में अधिक संक्रामक होते हैं। कुछ जीओएफ अध्ययन भविष्य में आने वाले खतरों की पहचान करने और उनको खत्म करने में मदद करते हैं लेकिन आलोचकों का मत है कि इसके फायदे नए रोगजनकों को बनाने और निकल भागने के जोखिम की तुलना में बहुत कम हैं।

पूर्व में शी ने कोरोनावायरस को विकसित करने में कठिनाइयों के कारण कुछ शिमेरिक (मिश्रित) वायरस तैयार किए थे। डब्ल्यूआईवी में विकसित इन मिश्रित वायरसों में ऐसे चमगादड़ कोरोनावायरस की जेनेटिक सामग्री का उपयोग किया गया जिसे प्रयोगशाला में कल्चर किया जा सकता था और नए कोरोनावायरस के स्पाइक प्रोटीन जीन्स जोड़े गए थे। वैज्ञानिक इसे जीओएफ शोध नहीं मानते। शी का कहना है कि उनकी टीम द्वारा तैयार किया गया वायरस किसी भी प्रकार से मूल वायरस से अधिक खतरनाक होने की आशंका नहीं थी। अलबत्ता, प्रयोगशाला-उत्पत्ति के समर्थकों का कहना है कि हो सकता है कि सार्स-कोव-2 शी द्वारा तैयार किया गया कोई मिश्रित वायरस ही हो। वे यह भी कहते हैं कि उसी समय प्रयोगशाला में जैव सुरक्षा सम्बंधी ढील भी दी गई थी। हालांकि शी इस बात पर ज़ोर देती हैं कि उन्होंने अपना काम चीनी नियमों के अनुसार किया है और किसी तरह की सुरक्षा ढील नहीं दी गई थी।

हालांकि अभी तक कोई भी ऐसा वायरस नहीं मिला है जो इसको तैयार करने की प्रारंभिक सामग्री के रूप में उपयोग किया जा सके। कुछ लोग मोजियांग खदान में मिले वायरस RaTG13 को सार्स-कोव-2 के मुख्य आधार के रूप में देखते हैं लेकिन सेल में प्रकाशित एक पेपर के अनुसार दोनों के बीच 1100 क्षार का अंतर है और ये अंतर पूरे आरएनए में बिखरे हुए हैं।

इस विषय में वायरोलॉजिस्ट और नोबेल पुरस्कार विजेता डेविड बाल्टीमोर द्वारा सार्स-कोव-2 को प्रयोगशाला में तैयार करने सम्बंधी साक्ष्य भी गैर-तार्किक हैं। उनका कहना था कि वायरस के स्पाइक पर एक क्लीवेज साइट होती है जहां फ्यूरिन नामक मानव एंज़ाइम प्रोटीन को तोड़ता है और सार्स-कोव-2 को कोशिकाओं को प्रवेश करने में मदद करता है। प्रयोगशाला उत्पत्ति के समर्थकों का मत है कि यह क्लीवेज साइट प्रयोगशाला में जोड़ी गई है। लेकिन यह आगे चलकर गलत साबित हुआ। गौरतलब है कि इस जीनस के कई सदस्यों में फ्यूरिन क्लीवेज साइट कुदरती रूप से मौजूद होती हैं और कई बार विकसित हुई हैं। यह बात सामने आने के बाद बाल्टीमोर ने अपना बयान वापिस ले लिया है।

प्रयोगशाला-उत्पत्ति के पक्ष में एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि वायरस को प्रयोगशाला में आनुवंशिक रूप से परिवर्तित करने की बजाय हो सकता है कि किसी वायरस को प्रयोगशाला में बार-बार संवर्धित किया गया होगा ताकि हर बार होने वाले उत्परिवर्तन इकट्ठे होते जाएं। लेकिन इसके लिए भी सार्स-कोव-2 के किसी निकट सम्बंधी से शुरुआत करनी होगी। इस तरह का कोई प्रारंभिक वायरस किसी प्रयोगशाला में उपस्थित नहीं है। दरअसल अमेरिकी खुफिया समुदाय भी सार्स-कोव-2 के मानव-निर्मित होने के सुझाव को खारिज कर चुका है। उसकी रिपोर्ट में भी कहा गया कि इस वायरस को आनुवंशिक रूप से तैयार नहीं किया गया है।  

हुआनन सीफूड बाज़ार में अचानक से निमोनिया के मामलों में वृद्धि के बाद 31 दिसंबर 2019 को आधिकारिक रूप से महामारी की घोषणा की गई थी। हालांकि डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट ने हुआनन व अन्य बाज़ारों पर काफी ध्यान दिया लेकिन अस्पष्टता बनी रही क्योंकि कई मामलों का किसी भी बाज़ार से कोई सम्बंध नहीं था।

लेकिन डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में बताया गया था कि वैज्ञानिकों ने वुहान बाज़ार के फर्श, दीवारों और अन्य सतहों से कई नमूने एकत्रित किए थे जिससे पता चला था कि बाज़ार वायरसों से भरा हुआ था। वैंग बताते हैं कि पर्यावरण के नमूनों से कोरोनावायरस को अलग करना एक मुश्किल कार्य है। इसके अतिरिक्त इस रिपोर्ट में कुछ बड़ी त्रुटियां भी हैं। जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है कि शुरुआती मामलों के सम्बंध में हुआनन और अन्य बाज़ार में 2019 में जीवित स्तनधारी बेचे जाने की सत्यापित रिपोर्ट नहीं मिली है। लेकिन चाइना वेस्ट नार्मल युनिवर्सिटी के ज़ाउ-ज़ाओ-मिन और उनके साथियों ने जून में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें इस तथ्य को चुनौती दी गई है। इस रिपोर्ट के अनुसार मई 2017 से नवंबर 2019 के बीच हुआनन और वुहान के तीन बाज़ारों की 17 दुकानों में 38 प्रजाति के लगभग 50,000 जीवित जीव बेचे गए थे।

गौरतलब है कि मांस की बजाय जीवित जीवों से श्वसन सम्बंधी वायरस के फैलने की अधिक संभावना होती है। इन जीवों में ऐसे जीव थे जो प्राकृतिक रूप से इस वायरस के वाहक होते हैं और प्रयोगशाला में इनको सार्स-कोव-2 से संक्रमित भी किया जा चुका है। यह अभी तक स्पष्ट नहीं कि डब्ल्यूएचओ के संयुक्त मिशन में शामिल चीनी सदस्यों ने बाज़ार में जीवित स्तनधारियों के बारे में कोई जानकारी क्यों नहीं दी।   

हो सकता है कि जीवों से मनुष्यों में जाने-आने की प्रक्रिया के दौरान वायरस लगातार नए मेज़बान के अनुसार ढलता गया। यह प्रक्रिया काफी समय तक चलती रही होगी जिसकी ओर ध्यान नहीं दिया गया और बीमारी का गंभीर रूप लेने के बाद यह उभरकर सामने आया। यह भी संभव है कि वायरस ने पहले किसी किसान को दूरदराज़ के ग्रामीण क्षेत्र में संक्रमित किया होगा और वहां से यह वुहान बाज़ार में प्रवेश कर गया। कुछ वैज्ञानिकों ने फर उद्योग की ओर भी ध्यान दिलाया है जहां मनुष्य रैकून डॉग और लोमड़ियों के संपर्क में आते हैं।

हालांकि कुछ भी स्पष्ट रूप से कहने के लिए वैज्ञानिक मनुष्यों में कोविड के शुरुआती मामलों के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं और डब्ल्यूआईवी से चमगादड़ कोरोनावायरस का जीनोम अनुक्रम हासिल करना चाहते हैं जिसको चीन ने वेबसाइट हैक होने का कारण बताकर सितंबर 2019 में इंटरनेट से हटा लिया था। यदि यह डैटा प्राप्त हो जाता है तो काफी जानकारी प्राप्त हो सकती है। चीन की ओर से भी यह दावा किया जा रहा है कि यह वायरस फ्रोज़न फूड के माध्यम से किसी अन्य देश से चीन में आया है और जिसका इल्ज़ाम झूठे प्रचार के माध्यम से अमेरिका द्वारा चीन पर लगाया जा रहा है। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार चीन हर संभव प्रयास कर रहा है जिससे यह साबित किया जा सके कि इस महामारी की शुरुआत चीन के बाहर से हुई है। इस संदर्भ में अन्य स्थानों पर किए गए अध्ययनों से काफी चुनौतीपूर्ण परिणाम सामने आए हैं। पड़ोसी देशों के चमगादड़ों में कोरोनावायरस मिला है जिससे सार्स-कोव-2 के उत्पन्न होने के जैव विकास मार्ग को देखने का सुराग मिलता है। दक्षिण-एशिया के जंगली पैंगोलिन से अधिक साक्ष्य मिलने की सभावना है। बहरहाल, उत्पत्ति को लेकर कई परिकल्पनाएं हैं लेकिन फिलहाल प्राकृतिक उत्पत्ति ही सबसे संभावित व्याख्या है।  (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दीर्घ कोविड: बड़े पैमाने के अध्ययन की ज़रूरत

ई लोगों में कोविड-19 से उबरने के बाद भी कई हफ्तों या महीनों तक थकान, याददाश्त की समस्या और सिरदर्द जैसे लक्षण बने रहते हैं। ऐसा क्यों होता और इसका उपचार क्या है यह पूरी तरह पता करने के लिए बड़े पैमाने पर अध्ययन की ज़रूरत है। और हाल ही में यूएस के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआईएच) ने ऐसे ही एक अध्ययन के लिए लगभग 47 करोड़ डॉलर के अनुदान की घोषणा की है। इस अध्ययन में कोविड-19 के संक्रमण उपरांत प्रभावों – जिसे दीर्घ कोविड कहते हैं – के कारण पता लगाने के अलावा उपचार और रोकथाम के उपाय पता  लगाए जाएंगे। यह अध्ययन सार्स-कोव-2 के संक्रमण से नए पीड़ित और पूर्व में इसका संक्रमण झेल चुके 40,000 वयस्कों और बच्चों पर किया जाएगा।

दीर्घ कोविड को सार्स-कोव-2 के विलंबित लक्षण भी कहते हैं। इसमें दर्द, थकान, याद रखने में परेशानी, नींद की समस्या, सिरदर्द, सांस लेने में तकलीफ, बुखार, पुरानी खांसी, अवसाद और दुÏश्चता जैसे लक्षण हो सकते हैं जो प्रारंभिक संक्रमण के चार सप्ताह से अधिक समय तक बने रहते हैं। कभी-कभी ये लक्षण इतने गंभीर होते हैं कि व्यक्ति काम नहीं कर पाता, उसे रोज़मर्रा के काम करने में भी मुश्किल होती है।

यूएस रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्रों (सीडीसी) का अनुमान है कि कोविड-19 के 10 से 30 प्रतिशत रोगियों में दीर्घ कोविड विकसित होता है। यह संभवत: वायरस के शरीर में छिप कर बैठे भंडार के कारण, अनियंत्रित प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण, या संक्रमण से उपजी किसी चयापचय समस्या के कारण होता है। लेकिन वास्तव में यह होता क्यों है, इसका सटीक और स्पष्ट कारण अब तक पता नहीं है।

एनआईएच ने फरवरी में दीर्घ कोविड अनुसंधान कार्यक्रम की अपनी प्रारंभिक योजना की रूपरेखा तैयार की थी। अब इसे रिसर्चिंग कोविड टू एनहान्स रिकवरी (RECOVER) इनिशिएटिव का रूप दिया गया है जिसके लिए न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय को 47 करोड़ का अनुदान मिला है। विश्वविद्यालय 35 संस्थानों के 100 से अधिक शोधकर्ताओं को शामिल करेगा जो एक साझे प्रोटोकॉल के तहत संक्रमितों को अध्ययन में शामिल करेंगे।

अक्टूबर से शुरू होने वाले इस कार्यक्रम का लक्ष्य 12 महीने में सभी 50 राज्यों की विविध आबादी से 30 से 40 हज़ार प्रतिभागियों को शामिल करना है। इसमें कुछ लोग जो दीर्घ कोविड से गुज़र रहे हैं, उन पर अध्ययन किया जाएगा लेकिन इसमें शामिल अधिकांश लोग कोविड-19 संक्रमित होंगे यानी वे लोग होंगे जो हाल ही में कोविड-19 से बीमार हुए हैं। अध्ययन में अस्पताल में भर्ती मरीजों के अलावा मामूली कोविड-19 से पीड़ित लोग भी शामिल होंगे – क्योंकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या शुरुआत में अधिक गंभीर संक्रमण दीर्घ कोविड की ओर ले जाता है?

इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड की मदद से और प्रतिभागियों को पहनने योग्य उपकरण देकर उनकी हृदय गति, नींद वगैरह की निगरानी की जाएगी। इस तरह यह अध्ययन उन लोगों के स्वास्थ्य की तुलना करेगा जो जल्दी ही ठीक हो जाते हैं और जिनके लक्षण लंबे समय तक बने रहते हैं। इसके आधार पर दीर्घ कोविड का जोखिम पैदा करने वाले कारकों और जैविक संकेतों का पता लगाया जाएगा। शोधकर्ता यह भी पता लगाएंगे कि क्या कोविड-19 का टीका लेने से दीर्घ कोविड के लक्षण कम होते हैं?

अध्ययन में लगभग आधे प्रतिभागी बच्चे होंगे और नवजात शिशु भी होंगे। भले ही आम तौर पर बच्चों में कोविड-19 के हल्के या कोई भी लक्षण नहीं होते हैं लेकिन यह चिंता उभरी है कि क्या उनमें विलंबित लक्षण पैदा होंगे। एक कारण यह भी है कि इस समय जितने बच्चे पीड़ित हैं, पूरी महामारी के दौरान इतने नहीं थे।

हालांकि यह अध्ययन दीर्घ कोविड के लिए नए उपचारों का परीक्षण नहीं करेगा। लेकिन शोधकर्ता उन प्रोटीन या आणविक प्रक्रियाओं की पहचान करेंगे जो दीर्घ कोविड में भूमिका निभाते हैं और मौजूदा औषधियों द्वारा इन्हें अवरुद्ध करने की संभावना जांचेंगे।

हालांकि इस अध्ययन के तरीके से इस क्षेत्र की एक प्रमुख कार्यकर्ता निराश हैं क्योंकि यह प्रयास बड़े पैमाने पर उन लोगों को अध्ययन में शामिल करेगा जिनमें अब तक दीर्घ कोविड विकसित नहीं हुआ है चूंकि वे हाल ही में संक्रमित हुए हैं। इनमें से बड़ी संख्या में लोग टीके ले चुके हैं। दरअसल इसमें उन लाखों लोगों को शामिल किया जाना चाहिए जो वर्तमान में इससे पीड़ित हैं। सर्वाइवर कोर की संस्थापक डायना बेरेंट का कहना है कि एनआईएच का यह अध्ययन छलावा है। इससे हम किसी नतीजे तक नहीं पहुंचेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हंसाता है, सोचने को विवश करता है इग्नोबेल पुरस्कार

र वर्ष की तरह इस वर्ष भी पहली नज़र में हास्यास्पद लेकिन महत्वपूर्ण खोजों को पुरस्कृत करने के लिए 31वां इग्नोबेल पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया। कोरोना महामारी के चलते इस वर्ष भी यह समारोह ऑनलाइन किया गया जिसमें संगीतमय बिल्लियां, औंधे गेंडे और पनडुब्बी में कॉकरोच से बचाव आकर्षण का केंद्र रहे। इस वर्ष की थीम इंजीनियरिंग थी और इग्नोबेल पुरस्कारों का वितरण फ्रांसिस अर्नाल्ड और एरिक मैसकिन सहित अन्य नोबेल विजेताओं ने किया।

कुल 10 इग्नोबेल पुरस्कारों में से जीव विज्ञान का पुरस्कार बिल्लियों की विभिन्न ध्वनियों के अध्ययनों की एक शृंखला को दिया गया है। ऐसा लगता है कि बिल्लियां इन ध्वनियों का उपयोग मनुष्यों को अपनी इच्छाओं से अवगत कराने के लिए करती हैं। लुंड युनिवर्सिटी की बिल्ली-वाणि शोधकर्ता सुज़ैन शॉट्ज़ 2011 से माइक्रोफोन को बिल्लियों के हाथ में देकर उनकी विभिन्न ध्वनियों को सुनने और उनकी म्याऊं का मतलब खोजने का प्रयास कर रही थीं।

शॉट्ज़ को यह सम्मान कई शोध पत्रों के लिए दिया गया है। इनमें वह शोध पत्र भी शामिल है जिसमें यह बताया गया है कि मनुष्य कितनी अच्छी तरह से बिल्लियों की म्याऊंसिकी को समझ पाते हैं। शॉट्ज़ बताती हैं कि जब बिल्लियों को अपने मालिकों से भोजन चाहिए होता है तो उनकी ध्वनि अंत में ऊंचे तारत्व की होती है। यदि वे चिकित्सक के पास जाने को लेकर डर रही होती हैं तब वे तारत्व को कम कर देती हैं। गौरतलब है कि तारत्व का सम्बंध आवाज़ के पतली-मोटी होने से है – अधिक तारत्व मतलब ज़्यादा पतली आवाज़। उन्होंने जब 30 लोगों के समूह को बिल्लियों की ध्वनियों के उतार-चढ़ाव सुनाए तो अधिकांश समय वे बिल्लियों की भावनाओं का अनुमान लगा पाए थे। इनमें बिल्लियों के मालिकों के अनुमान बेहतर रहे।

जीव विज्ञान के अन्य पुरस्कार ऐसे जीवों पर शोध करने के लिए दिए गए जिन्होंने आसमान की बुलंदियों को छुआ या समुद्र की गहराइयों में गोते लगाए।

ट्रांसपोर्टेशन पुरस्कार से उन शोधकर्ताओं को सम्मानित किया गया जिन्होंने यह पता लगाया कि हेलीकॉप्टर से गैंडों को लाने-ले जाने की सबसे अच्छी तकनीक उनको उल्टा करके (पीठ के बल) ले जाना है। यह तकनीक संरक्षणवादियों के लिए काफी उपयोगी साबित हुई है जो चाहते हैं कि गैंडों और हाथियों जैसे बड़े जीवों को शिकारियों से सुरक्षित रखा जाए या उनकी आनुवंशिक विविधता को बनाए रखा जाए। इसमें मज़ेदार बात यह है कि शोधकर्ताओं ने पुरस्कार लेते समय यह बताया कि गैंडों पर यह तकनीक अपनाने से पहले इसे वे खुद पर आज़मा चुके थे। अलबत्ता, पुरस्कार देने वाले नोबेल विजेता रिचर्ड रॉबट्र्स ने स्पष्ट कर दिया कि यदि उन्हें कभी कहीं ले जाना पड़े तो मेहरबानी करके सीधा ही ले जाएं।

कीट विज्ञान के पुरस्कार ने मानव-पशु तनावपूर्ण सम्बंधों को उजागर किया। मनुष्यों और तिलचट्टों की लड़ाई काफी प्राचीन रही है। इस पुरस्कार के लिए समिति ने विज्ञान साहित्य के संग्रहालय में डुबकी लगाकर 1971 का एक अध्ययन A new method of cockroach control on submarines (पनडुब्बियों में तिलटट्टा नियंत्रण की एक नई विधि) खोज निकाला। पुरस्कार अमेरिकी नौसेना के सेवानिवृत्त कमोडोर जॉन मुलरीनन जूनियर को दिया गया। उन्होंने नौसेना की पनडुब्बियों में तिलचट्टों से छुटकारा पाने के लिए डाइक्लोरवॉस नामक कीटनाशक का उपयोग किया था। इससे पहले एथिलीन ऑक्साइड गैस का उपयोग किया जाता था जिसके उपयोग से कोई बीमार हो गया था। उस समय तो नौसेना को यह तकनीक काफी उपयोगी व कारगर लगी थी, हालांकि कमोडोर मुलरेनिन ने कहा कि वे नहीं जानते कि क्या आजकल भी नौसेना इसका इस्तेमाल करती है।

भौतिकी पुरस्कार एक ऐसे शोध के लिए दिया गया जिसमें यह विश्लेषण किया गया था कि भीड़ में चलते समय लोग एक दूसरे से टकराते क्यों नहीं हैं और काइनेटिक्स पुरस्कार इस अध्ययन के लिए दिया गया कि लोग कभी-कभी टकरा क्यों जाते हैं।

इकॉलॉजी पुरस्कार एक बैक्टीरिया के विश्लेषण पर दिया गया जो उपयोग की गई च्युइंग गम पर पनपता है। इसके अलावा शांति पुरस्कार इस अध्ययन पर दिया गया कि दाढ़ी कितने प्रभावी ढंग से घूंसे से चेहरे की रक्षा करती है (यह झटके को कम कर देती है)। चिकित्सा पुरस्कार ऐसे अध्ययन के लिए दिया गया जिसमें यह बताया गया कि यौन चरमोत्कर्ष बंद नाक खोलने में प्रभावी हो सकता है (होता है, लेकिन असर सिर्फ एक घंटे रहता है)।

विजेताओं को एनल्स ऑफ इम्प्रॉबेबल रिसर्च के संपादक और इस समारोह के मेज़बान मार्क अब्राहम की ओर से एक नकली 10 ट्रिलियन ज़िम्बाब्वे डॉलर का नोट भी दिया गया। ट्राफी के रूप में खुद से बनाने के लिए एक घनाकार पेपर का गियर दिया गया जिस पर दांतों की तस्वीरें बनी थीं। (स्रोत फीचर्स)

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डायनासौर आपसी युद्ध में चेहरे पर काटते थे

ब जीव अपने लिए प्रणय-साथी, अधिकार क्षेत्र या स्थान के लिए एक-दूसरे से लड़ते हैं, तो नज़ारा दर्शनीय व डरावना होता है। हाल ही में वैज्ञानिकों को इस बात के सबूत मिले हैं कि टायरेनोसॉरस रेक्स जैसे डायनासौर भी ऐसा ही करते थे, और इस लड़ाई में वे एक-दूसरे के चेहरे पर काटते थे।

शोधकर्ताओं ने विभिन्न तरह के डायनासौर (थेरापॉड) की 528 जीवाश्मित खोपड़ियों का विश्लेषण किया। इनमें से 122 खोपड़ियों पर उन्हें काटने के गहरे निशान और ठीक हो चुके घावों के निशान मिले। ये निशान लगभग 60 प्रतिशत वयस्क डायनासौर में दिखाई दिए, लेकिन किसी भी कम उम्र डायनासौर में नहीं दिखे। पैलियोबायोलॉजी में शोधकर्ता बताते हैं कि इससे पता चलता है कि डायनासौर एक-दूसरे को तभी काटते थे जब वे किशोरावस्था पार कर जाते थे (यानी यौन परिपक्वता पर पहुंच जाते थे)। लगभग इसी समय वे अपने लिए प्रणय-साथियों की तलाश में होते थे या अपना सामाजिक प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश कर रहे होते थे।

काटने के निशान की जगह से पता चलता है कि लड़ाई में डायनासौर अधिकतर प्रतिद्वंदी को थोड़ा बाजू से काटते थे, जिसमें दोनों डायनासौर थोड़ा सिर झुकाकर अपने प्रतिद्वंद्वी की खोपड़ी या निचला जबड़ा दबोचते थे।

शोधकर्ताओं ने उन छोटे आकार के डायनासौर की खोपड़ी की भी जांच की, जिनसे आज के सभी पक्षी विकसित हुए हैं। लेकिन इनमें से किसी भी डायनासौर के चेहरे पर काटने के निशान नहीं थे। इससे लगता है कि अपने वंशज पक्षियों की तरह इन डायनासौर ने भी मादाओं के लिए हिंसक तरीके से लड़ना बंद कर दिया था, और इसकी बजाय वे मादाओं को अपने चमकदार पंखों से लुभाने लगे थे। (स्रोत फीचर्स)

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उपेक्षित न हों परंपरागत तिलहन – भारत डोगरा

भारत सरकार ने 18 अगस्त को घोषित 11,040 करोड़ रुपए की स्कीम में पाम आयल का घरेलू उत्पादन तेज़ी से बढ़ाने के लिए इसके वृक्ष बड़े पैमाने पर लगाने का निर्णय किया है। इसके लिए खासकर उत्तर-पूर्वी राज्यों और अंडमान व निकोबार द्वीप समूह पर ध्यान दिया जाएगा। इस दौर में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि खाद्य तेल का घरेलू उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों में परंपरागत तिलहनों की उपेक्षा न हो जाए।    

भारत में तिलहनों की समृद्ध परंपरा रही है व इन तिलहनों तथा इनसे प्राप्त तेलों का हमारी संस्कृति व पर्व-त्यौहारों में भी विशेष महत्व रहा है। विशेषकर सरसों, तिल, मूंगफली व नारियल का तो बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। इसके अतिरिक्त अपेक्षाकृत कम उत्पादन क्षेत्र के ऐसे अनेक तिलहन हैं जिनमें से कुछ का हिमालय क्षेत्र में, कुछ का आदिवासी क्षेत्रों में, कुछ का औषधि व अन्य विशिष्ट उपयोगों में महत्व रहा है। इसके अतिरिक्त कपासिया तेल का अपना महत्त्व है और यह अपेक्षाकृत सस्ता भी है।

जहां तक पोषण का सवाल है, तो देश के अलग-अलग क्षेत्रों के व्यंजनों के अनुसार हमारे परंपरागत तेल उपलब्ध हैं, व अच्छे पोषण व स्वाद की दृष्टि से इनका स्थान बाहरी तेल नहीं ले सकते हैं। इनसे केवल तेल नहीं मिलता है, अपितु मूंगफली, सरसों का साग, तिल, नारियल का पानी व गिरी भी मिलते हैं। पौष्टिक गजक, लड्डू, रेवड़ी, मिठाई आदि के रूप में इनका सेवन विशेषकर सर्दी के दिनों में अनुकूल है। अरंडी व अलसी के तेल औषधीय गुणों के लिए जाने जाते हैं। लोहड़ी के त्यौहार में रेवड़ी-गजक होना ज़रूरी है। सर्द शामों में गर्म मूंगफली खाने का अपना ही मज़ा है। ये सभी खाद्य स्वास्थ्य व स्वाद दोनों की दृष्टि से अच्छे हैं। सरसों के साग के बिना तो सर्दी के दिन कटते ही नहीं हैं, तो गर्मी व उमस के दिनों में सबसे अधिक राहत नारियल के पानी से ही मिलती है।

सवाल यह है कि तिलहन की इतनी समृद्ध विरासत के बावजूद हमारा देश खाद्य-तेलों के आयात पर इतना निर्भर क्यों हो गया? इसकी वजह यह है कि परंपरागत तिलहन के किसानों को उचित समर्थन व प्रोत्साहन नहीं मिल पाया। बाहरी सस्ते तेलों के आयात को एक सकल विकल्प मान लिया गया। हाइड्रोजिनेशन की तकनीक से यह समस्या सुलझा ली गई कि कोई तेल स्थानीय स्वाद के अनुकूल है या नहीं। पर हम यह भूल गए कि जहां तक स्वास्थ्य का सवाल है, तो स्थानीय शुद्ध तेल ही सर्वोत्तम हैं व खेती-किसानी की खुशहाली के लिए भी इनको प्रोत्साहित करना ही सबसे उचित है।

जब तिलहन-किसानों को अनुकूल माहौल दिया गया है, उन्होंने तिलहन उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पर जब प्रतिकूल स्थितियां मिलीं तो खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता बढ़ी। खाद्य तेलों के आयात का वार्षिक बिल असहनीय हद तक बढ़ गया क्योंकि 60 प्रतिशत या उससे अधिक खाद्य तेल आयात करना पड़ रहा था।

भारत में ढाई करोड़ हैक्टर भूमि पर तिलहन की खेती होती है। इससे पता चलता है कि तिलहन के किसानों की संख्या बहुत अधिक है। तिस पर यदि शुद्ध तेल देने वाली कुटीर व लघु प्रोसेसिंग इकाई कच्ची घानी व कोल्हू का उपयोग हो तो इससे भी तिलहन व खाद्य तेल क्षेत्र में रोज़गार बहुत बढ़ता है। इसी आधार पर स्थानीय स्तर पर खली की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है जिससे डेयरी कार्य व पशुपालन की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

आजीविका सुरक्षा व आत्म-निर्भरता दोनों के उद्देश्यों को समान महत्व देते हुए हमें तिलहन उत्पादन वृद्धि का एक ऐसा कार्यक्रम बनाना चाहिए जो मूलत: देश के स्थानीय तिलहनों पर आधारित हो, ऐसे तिलहनों पर जिनके बारे में हमारे किसानों के पास भरपूर ज्ञान पहले से उपलब्ध है, जो हमारी पोषण आवश्यकताओं के साथ मिट्टी, जल व जलवायु स्थिति के अनुकूल हों। इस खेती के साथ स्थानीय स्तर की कुटीर इकाइयों द्वारा तिलहन से तेल प्राप्त करने की पर्याप्त इकाइयां स्थापित करना चाहिए व साथ में खली की पर्याप्त उपलब्धता स्थानीय पशुपालकों को करनी चाहिए। मुख्य तिलहनों के अलावा जो औषधि व विशिष्ट उपयोगों के तिलहन हैं, उनके साथ जुड़े कुटीर व लघु उद्योगों को भी विकसित करना चाहिए। आर्गेनिक खेती को प्रोत्साहित करना चाहिए। इस राह पर चले तो भारत निकट भविष्य में तिलहन क्षेत्र में विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण व विशिष्ट स्थान बना सकता है।

यह बहुत ज़रूरी है कि हम अपनी क्षमताओं और विशिष्ट आवश्यकताओं को पहचानें व उनके अनुकूल कार्य करें। इस तरह तिलहन के क्षेत्र की जो प्रगति होगी वह अपने देश की मिट्टी, फसल चक्र, पोषण, जल, जलवायु की स्थिति के अनुकूल होगी व यही प्रगति की राह सफल व टिकाऊ सिद्ध होगी। (स्रोत फीचर्स)

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