आपातकालीन टीका: वैज्ञानिकों की दुविधा

कोविड-19 टीकों के शुरुआती क्लीनिकल परीक्षणों के सकारात्मक परिणामों के बाद से ही इनके ‘आपातकालीन उपयोग’ की स्वीकृति की मांग होने लगी है। इस तरह की मांग ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों की प्रमुख चिंता यह है कि इस तरह के उपयोग से चलते हुए क्लीनिकल परीक्षण खटाई में पड़ जाएंगे। दवा कंपनी नोवर्टिस के वैक्सीन डिज़ाइन के पूर्व प्रमुख क्लाउस स्टोहर इसे टीका विकास के लिए असमंजस के रूप में तो देखते हैं लेकिन आपातकालीन उपयोग के पक्ष में भी हैं क्योंकि शुरुआती चरणों में प्रभावशीलता स्थापित हो गई है।

इस संदर्भ में गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नवंबर माह में ही पोलियो टीकाकरण के लिए एक नए टीके को कुछ देशो में आपातकालीन उपयोग की मंज़ूरी दे दी है। जबकि इस टीके के तो तीसरे चरण के परीक्षण अभी शुरू भी नहीं हुए हैं।

इसी दौरान टीका निर्माता फाइज़र और बायोएनटेक ने तीसरे चरण के परीक्षणों के बाद इस तरह की विनियामक अनुमति की मांग की है। देखा जाए तो कोविड-19 के लिए यूएस एफडीए के नियमों के अनुसार आपातकालीन उपयोग में आधे प्रतिभागियों पर डोज़ देने के दो माह बाद तक निगरानी रखी जानी चाहिए। फिलहाल फाइज़र और बायोएनटेक इस लक्ष्य को पार कर चुके हैं।

लेकिन इससे जुड़ी कुछ नैतिक समस्याएं भी हैं। परीक्षण के दौरान आम तौर पर प्रतिभागियों को ‘अंधकार’ में रखा जाता है कि उनको टीका दिया गया है या प्लेसिबो। लेकिन एक बार जब टीका काम करने लगता है तो प्लेसिबो समूह के प्रतिभागियों को टीका न देकर असुरक्षित रखना अनैतिक लगता है। स्टोहर के अनुसार यदि इन परीक्षणों में बड़ी संख्या में प्रतिभागी पाला बदलकर ‘प्लेसिबो समूह’ से ‘टीका समूह’ में  चले जाएंगे तो क्लीनिकल परीक्षण से सही आंकड़े प्राप्त करना मुश्किल हो जाएगा और टीके के दीर्घकालिक प्रभावों की बात धरी की धरी रह जाएगी। अर्थात जल्दबाज़ी से टीके की प्रभाविता का पर्याप्त डैटा नहीं मिल पाएगा। इससे यह पता लगाना भी मुश्किल होगा कि टीका कितने समय तक प्रभावी रहेगा और क्या इससे संक्रमण को रोका जा सकता है या फिर यह सिर्फ लक्षणों में राहत देगा। फिर भी फाइज़र के प्रवक्ता के अनुसार कंपनी एफडीए के साथ प्रतिभागियों के क्रॉसओवर और प्रभाविता को मापने के लिए डैटा एकत्र करने की प्रकिया पर चर्चा करेगी।

कुछ वैज्ञानिकों का सुझाव है कि ऐसे प्रतिभागी जिनको शुरुआत में प्लेसिबो प्राप्त हुआ है और बाद में टीका लगवाते हैं, उनका निरीक्षण एक अलग समूह के रूप में किया जा सकता है। इस तरह से ऐसे समूहों के बीच टीके की दीर्घकालिक प्रभाविता और सुरक्षा की तुलना भी की जा सकेगी।

फिर भी, एक बार कोविड-19 टीके को आपातकालीन स्वीकृति मिलने से टीके का परीक्षण और अधिक जटिल हो जाएगा। ऐसे में नए परीक्षण शुरू करने वाली कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके टीके आपातकालीन स्वीकृति प्राप्त टीकों से बेहतर हैं। इसके लिए उनकी परीक्षण की प्रक्रिया और अधिक महंगी हो जाएगी। कुल मिलाकर बात यह है कि किसी भी टीके को मंज़ूरी मिलना, भले ही आपातकालीन उपयोग के लिए हो, टीकों के बाज़ार में आने के परिदृश्य को बदल देगा।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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छिपकलियां भी परागण करती हैं!

मकरंद पान करती स्यूडोकॉर्डिलस सबविरिडिस

साल 2017 के अंत में दक्षिण अफ्रीका के ड्रैकन्सबर्ग पहाड़ों में परागण पारिस्थितिकी विज्ञानी रूथ कोज़ियन की नज़र एक अजीब से पौधे पर पड़ी। इस पौधे के फूलों का रंग हरा था और वे पौधे की पत्तियों के बीच नज़र नहीं आ रहे थे। फूल की गंध बहुत तीखी थी, और उनमें इतना मकरंद था कि कोई कीट उसमें डूब ही जाए।

आम तौर पर फूल चटख रंग के होते हैं जो पक्षियों, मधुमक्खियों और तितलियों जैसे परागणकर्ताओं को आकर्षित करते हैं। लेकिन इस पौधे के फूल हरे रंग के थे जो पत्तियों के बीच दिखाई ही नहीं पड़ते थे, और ज़मीन से बहुत करीब खिले थे। कोज़ियन को लगा कि यह पौधा, गुथरीया कैपेंसिस, पौधों की उस प्रजाति से सम्बंधित होगा जिनका परागण चूहे, हाथीनुमा छछूंदर जैसे छोटे स्तनधारी जीव करते हैं।

इसलिए शुरुआत में उन्होंने कैमरे से रिकार्डिंग सिर्फ रात में की। लेकिन जब पांच दिन तक कैमरे की पकड़ में वह परागणकर्ता नहीं आ सका तो उन्होंने कैमरे की गति-संवेदनशीलता सेटिंग्स बदलकर पूरे 24 घंटों की रिकॉर्डिंग करना शुरू कर दिया।

ऐसा करने पर उन्हें फूलों पर आती-जाती छिपकली की छवि दिखाई दी। यह ड्रेकेन्सबर्ग में पाई जाने वाली 26 सेंटीमीटर लंबी स्यूडोकॉर्डिलस सबविरिडिस थी। शोधकर्ताओं ने फुटेज में पाया कि मकरंद पीने के लिए ये छिपकलियां फूलों में अपने थूथन को अंदर तक धंसा देती हैं।

वैसे गेको और छिपकलियों की लगभग 40 प्रजातियां देखी गई हैं जो फूलों का मकरंद पीती हैं। लेकिन मकरंद पीने और परागण करने में अंतर है। अक्सर छिपकलियां पूरा फूल ही खा जाती हैं।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने कुछ छिपकलियां पकड़ी तो पाया कि छिपकलियों के चिकने थूथन पर गुथरीया पौधे के पराग कण चिपके हुए थे। इसके बाद शोधकर्ताओं ने कुछ पौधों के पास छिपकलियों को जाने से रोका। तो उन्होंने पाया कि जिन पौधों के पास छिपकलियों को नहीं जाने दिया गया था, कुछ हफ्तों के बाद उन पौधों पर अन्य की तुलना में 95 प्रतिशत कम फल आए थे। फल बनने के लिए परागण आवश्यक होता है। फिर, शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में कुछ नर फूलों के पराग कोशों को साफ किया और उन पर रंगीन पावडर छिड़का, और देखा कि अब भी ये छिपकलियां मादा फूलों के प्रजनन अंग तक रंगीन पावडर ले जाती हैं।

गुथरीया फूल

परागण विशेषज्ञ आज भी यह समझने में लगे हैं कि छिपकलियों को इन फूलों की ओर क्या चीज़ आकर्षित करती है और सरिसृपों द्वारा परागण किन परिस्थितियों में विकसित होता है और यह कितना महत्व रखता है। कारण यह है कि छिपकली द्वारा परागण की प्रक्रिया कठिन पर्यावरणों में ही विकसित होती है।

गुथरिया अब तक का ज्ञात दूसरा ऐसा पौधा है जो परागणकर्ता के रूप में छिपकली जैसे सरीसृपों का उपयोग करता है। इसके पहले मॉरीशस द्वीप पर पाए जाने वाले ट्रोकेशिया ब्लैकबर्नियाना के बारे में पता चला था। ट्रोकेशिया ब्लैकबर्नियाना का पेड़ औसतन तीन मीटर ऊंचा होता है जिस पर सुर्ख लाल रंग के फूल खिलते है, इस पेड़ का परागण एक गेको द्वारा किया जाता है। यह दिलचस्प है कि ट्रोकेशिया के लाल फूलों का रंग गेको के शरीर के लाल धब्बों से मेल खाता है और गुथरीया के फूलों के नीचे के हिस्से का नारंगी रंग छिपकली के शरीर के नारंगी धब्बों से मेल खाता है। इससे लगता है पौधों के फूल परागणकर्ता के अनुरूप हो गए थे।

ट्रोकेशिया और गुथरीया के बीच सिर्फ यही समानता नहीं है, बल्कि दोनों पौधों के फूल कप के आकार के होते हैं जिनमें पीले-नारंगी रंग का मकरंद होता है। देखा गया है कि ट्रोकेशिया के फूलों का रंगीन मकरंद परागणकर्ता गेको को आकर्षित करता है, इसलिए ऐसा लगता है कि गुथरिया में भी मकरंद का यह रंग पत्थरों के नीचे भी फूलों को खोजने में परागणकर्ता की मदद करता होगा।

बहरहाल, शोधकर्ता इस अनपेक्षित परागणकर्ता की खोज को लेकर काफी उत्साहित हैं।(स्रोत फीचर्स)

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कोविड-19 और गंध संवेदना का ह्रास

कोविड-19 से ग्रस्त लगभग 80 प्रतिशत लोगों में गंध संवेदना के ह्रास की बात सामने आई है। समस्या इतनी आम है कि एक सुझाव है कि इसे एक नैदानिक परीक्षण के रूप में उपयोग किया जाए। इस महामारी की शुरुआत में सोचा गया था गंध संवेदना की क्षति का मतलब है कि वायरस नाक के माध्यम से मस्तिष्क में पहुंचकर गंभीर व दीर्घावधि क्षति पहुंचा सकता है। यह सोचा गया कि वायरस शायद गंध-संवेदी तंत्रिकाओं के ज़रिए मस्तिष्क तक पहुंचता होगा। लेकिन हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के न्यूरोसाइंटिस्ट संदीप रॉबर्ट दत्ता के हालिया अध्ययन से पता चला है कि गंध की क्षति का कारण नाक की उपकला की क्षति से है। यह कोशिकाओं की एक ऐसी परत होती है जो गंध को दर्ज करती है। दत्ता को लगता है कि वायरस सीधे-सीधे न्यूरॉन्स को नहीं बल्कि सपोर्ट कोशिकाओं और स्टेम कोशिकाओं पर हमला करता है।  

गंध संवेदी (घ्राण) तंत्रिकाओं में ACE2 ग्राही नहीं होते हैं। ACE2 ग्राही ही वायरस का कोशिकाओं में प्रवेश संभव बनाते हैं। लेकिन इन घ्राण तंत्रिकाओं से सम्बंधित सस्टेंटेक्यूलर कोशिकाओं में ये ग्राही बहुतायत में पाए जाते हैं। ये कोशिकाएं श्लेष्मा में आयन का नाज़ुक संतुलन बनाए रखती हैं। तंत्रिकाएं मस्तिष्क को संदेश भेजने के लिए इसी संतुलन पर निर्भर करती हैं। यह संतुलन गड़बड़ा जाए तो तंत्रिका संदेश ठप हो जाते हैं और साथ ही गंध संवेदना भी।

मामले को समझने के लिए पेरिस सैकले युनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट निकोलस मुनियर ने कुछ चूहों को सार्स-कोव-2 से संक्रमित किया। दो दिन बाद लगभग आधे चूहों की सस्टेंटेक्यूलर कोशिकाएं संक्रमित थीं लेकिन दो हफ्तों बाद भी घ्राण तंत्रिकाएं संक्रमित नहीं हुई थीं। यह भी देखा गया कि घ्राण उपकला पूरी तरह से अलग हो गई थी जैसे धूप से झुलसकर चमड़ी अलग हो जाती है। हालांकि घ्राण तंत्रिकाएं संक्रमित नहीं हुई लेकिन उनके रोम पूरी तरह से खत्म हो गए थे। इस तरह से घ्राण उपकला के विघटन से गंध संवेदना की क्षति की व्याख्या तो की जा सकती है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह क्षति वायरस के कारण हुई है या इसके लिए प्रतिरक्षा कोशिकाएं ज़िम्मेदार हैं। संक्रमण के बाद प्रतिरक्षा कोशिकाएं भी सस्टेंटेक्यूलर कोशिकाओं में देखी गर्इं। एक बात साफ है कि सामान्यत: श्वसन सम्बंधी संक्रमणों में घ्राण उपकला की सस्टेंटेक्यूलर कोशिकाओं में संक्रमण नहीं देखा गया है, यह सार्स-कोव-2 का विशेष लक्षण है।

अब तक यह समझ में नहीं आया है कि यह वायरस स्वाद संवेदना को कैसे ध्वस्त करता है। स्वाद संवेदना कोशिकाओं में तो ACE2 ग्राही नहीं होते लेकिन जीभ की अन्य सहायक कोशिकाओं में ये ग्राही उपस्थित होते हैं जो शायद स्वाद संवेदना के कम होने का कारण बनते हैं। यह भी हो सकता है कि गंध संवेदना जाने के कारण स्वाद प्रभावित हो रहा हो क्योंकि स्वाद की अनुभूति काफी हद तक गंध पर निर्भर करती है।

रासायनिक संवेदना की कमी, जैसे तीखी मिर्च या ताज़े पुदीने की संवेदना, का गायब होना भी अभी तक अस्पष्ट है। दरअसल, ये संवेदनाएं स्वाद नहीं हैं। इनके संदेश दर्द-संवेदना तंत्रिकाओं द्वारा भेजे जाते हैं। इनमें से कुछ में ACE2 ग्राही भी होते हैं।

गंध अनुभूति की क्षति अलग-अलग मरीज़ों में अलग-अलग अवधियों के लिए देखी गई है। कुछ में तो छ: माह बाद भी गंध महसूस करने की क्षमता लौटी नहीं है। कई शोधकर्ता इसका इलाज खोजने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन अब तक कोई सफलता नहीं मिली है। (स्रोत फीचर्स)

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पतंगों का ध्वनि-शोषक लबादा

ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के ध्वनि जीव विज्ञानी मार्क होल्डरीड और उनकी टीम ने हाल ही में पता लगाया है कि पतंगों के ध्वनि-शोषक पंख उन्हें चमगादड़ों का शिकार बनने से बचाते हैं। पतंगों के पंख से जुड़ी शल्कों की परतें चमगादड़ द्वारा भेजी गई पराध्वनि (यानी ऊंची आवृत्ति की ध्वनि) को सोख लेती हैं। जिससे प्रतिध्वनि चमगादड़ों तक नहीं पहुंच पाती और पतंगे बच जाते हैं। गौरतलब है कि चमगादड़ आवाज़ें फेंकते हैं और किसी वस्तु से टकराकर आई उनकी प्रतिध्वनि की मदद से वस्तुओं की स्थिति का अनुमान लगाते हैं।

टीम को ये शल्की लबादे पतंगों की दो प्रजातियां, चीनी टसर मोथ (एंथेरा पेर्नी) और अफ्रीकी पतंगा डैक्टिलोसेरस ल्यूसिना, में दिखे। कांटे (फोर्क) जैसी संरचना वाले इन शल्कों की कई परतें पतंगों के पंखों की झिल्ली से जुड़ी होती हैं। शिकारी चमगादड़ों द्वारा छोड़ी गई अल्ट्रासाउंड आवृत्तियां जब इन शल्कों से टकराती हैं तो वे मुड़ जाते हैं और ध्वनि की ऊर्जा गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। इससे वापस चमगादड़ों तक पहुंचने वाली प्रतिध्वनि बहुत दुर्बल होती है। अर्थात ये पतंगे चमगादड़ों के सोनार से ओझल या लगभग ओझल रहते हैं और शिकार होने से बच जाते हैं। इन दो पतंगों के चयन का एक विशेष कारण यह भी था कि इनमें चमगादड़ों द्वारा प्रेषित आवाज़ को सुनने के लिए कान नहीं होते। इन पतंगों में यह क्षमता शायद इसलिए विकसित हुई होगी क्योंकि ये निकट आते शिकारी चमगादड़ की ध्वनि को सुन नहीं सकते।

ये शल्क एक मिलीमीटर से भी छोटे होते हैं, और इनकी मोटाई केवल चंद सौ माइक्रोमीटर होती है। प्रत्येक शल्क ध्वनि की एक विशेष आवृत्ति पर अनुनाद करता है। लेकिन दसियों हज़ार शल्क मिलकर ध्वनि के कम से कम तीन सप्तक को अवशोषित कर सकते हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि प्रत्येक शल्क एक खास आवृत्ति पर अनुनाद करके उसे सोख लेता है लेकिन इनकी जमावट कुछ ऐसी होती है कि सब मिलकर एक महा-अवशोषक की तरह काम करते हैं।

पंख पर उभरे फोर्क जैसे शल्क

यह ध्वनि-शोषक लबादा 20 किलोहर्ट्ज़ से 160 किलोहर्ट्ज़ आवृत्ति के बीच काम करता है। और यह सबसे बढ़िया काम उन निम्नतर आवृत्तियों पर करता है जो चमगादड़ अपने शिकार का पता करने के लिए उपयोग करते हैं। लबादे ने 78 किलोहर्ट्ज़ पर सबसे अधिक ध्वनि, लगभग 72 प्रतिशत का अवशोषण किया।

पहले ये शोधकर्ता दर्शा चुके हैं कि कुछ पतंगों के पंखों पर उपस्थित रोम भी ध्वनि को सोखकर बचाव में मदद करते हैं। अब उन्होंने यह नई तकनीक खोज निकाली है। उम्मीद है कि ध्वनि अवशोषण की नई तकनीक से बेहतर ध्वनि अवशोषक उपकरण बनाने में मदद मिलेगी। घरों-दफ्तरों में ध्वनि-अवशोषक पैनल का स्थान ध्वनि-अवशोषक वॉलपेपर ले सकते हैं।(स्रोत फीचर्स)

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नरों को युद्ध करने पर मज़बूर करती मादाएं – डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

ब बेन्डेड नेवलों की दो सेनाएं आमने-सामने आती हैं तो उनके बीच वैसा ही युद्ध होता है जैसा मानव प्रतिद्वंद्वियों के बीच होता है। अक्सर विजेता समूह हारने वाले समूह के अड़ियल नेवलों को घेरकर खून से लथपथ कर देते हैं। जब नर युद्धरत होते हैं, एक मादा नेवला चुपके से अपने बच्चों के जीन में विविधता तथा जीवित रहने की संभावना बढ़ाने के लिए दुश्मन गुट में से अपना प्रजनन साथी तलाश लेती है।

प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित शोधपत्र के मुताबिक अफ्रीकी बेन्डेड नेवलों (मंगोस मंगो) के गुटों में आपसी संघर्ष आम घटना है। परंतु आश्चर्यजनक बात तो यह है कि इन लड़ाइयों के पीछे एक मादा नेवला होती है। नेवलों के इस झगड़े में हमेशा मादा के दोनों हाथों में लड्डू होते हैं। एक तो नरों के कत्लेआम के चलते उनकी आबादी संतुलित रहती है। दूसरा, मादा को दुश्मन गुट के बहादुर नरों से प्रजनन करके बेहतर जीन्स प्राप्ति का फायदा मिलता है।

उपरोक्त नतीजे युगांडा के क्वीन एलिज़ाबेथ नेशनल पार्क में 20 वर्षों के अध्ययन से मिले हैं। सवाना में पाए जाने वाले बेन्डेड नेवले औसतन 20-20 सदस्यों के समूहों में रहते हैं जिनमें नर, मादा एवं बच्चे सम्मिलित होते हैं। इनका आवास भूमिगत सुरंगों में होता है जिसके बहुत से द्वार होते हैं। ये अपने मूल गुट में बने रहते हैं। निष्कासन अथवा सदस्यों की अधिक संख्या के कारण समूह के कुछ सदस्य नए गुट बनाते हैं। मूल गुट के साथ बने रहने से सदस्यों की सुरक्षा तो होती है किंतु एक ही समूह में प्रजनन होने के कारण आनुवंशिक विविधता की हानि होती है। ऐसे में गुट की मादाएं प्रजनन के लिए दूसरे गुटों के नरों की ओर आकर्षित होती हैं। अपनी प्रजाति और संतति के अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए मादा अक्सर प्रतिद्वंद्वी समूहों के उपयुक्त नरों से प्रजनन करने के लिए अपने समूह के नरों को दूसरों के इलाके में ले जाकर युद्ध शुरू करवा देती है।

जब कोई मादा नेवला प्रजननशील होती है तो गुट के चौकीदार उसकी चौबीसों घंटे सुरक्षा करते हैं और गुट का प्रमुख नर ही उससे प्रजनन करता है। चौकीदारों की उपस्थिति में मादा का बाहरी गुट के नरों से प्रजनन करना असंभव होता है। ऐसी परिस्थितियों में चौकीदार नरों को दुश्मन गुट के इलाके में ले जाकर मादा उन्हें युद्ध में झोंक देती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि प्रजननशील मादाएं गुट के फैसलों को नरों की तुलना में अधिक प्रभावित करती हैं। मादा के नरों के साथ इस अनुचित व्यवहार को वैज्ञानिक ‘शोषणमूलक नेतृत्व’ कहते हैं, जहां मादा को शायद ही कभी नुकसान होता है और कई बार बहुत सारे नर मारे जाते हैं। वयस्क नरों में से 10 प्रतिशत की मृत्यु अक्सर इसी प्रकार होती है। जैव विकास के नज़रिए से मादा की करतूत उचित लगती है। वैज्ञानिकों का आकलन है कि गुट के बाहर के नरों से उत्पन्न बच्चों के जीवित रहने की संभावना समूह के नरों से उत्पन्न बच्चों से अधिक होती है। अन्य किसी सामाजिक स्तनधारी में ऐसी घटना नहीं देखी गई है। प्लिस्टोसिन तथा होलोसिन युग के प्रारंभ में मानव की शिकारी आबादी में भी ‘शोषणमूलक नेतृत्व’ के कारण गुटीय युद्धों के दौरान 14-18 प्रतिशत नर मारे जाते थे। क्या अफ्रीकी बेन्डेड नेवले के समान मनुष्यों में भी शीर्ष नेतृत्व, बाकी समुदाय को युद्ध में भेजकर खुद सुरक्षित व फायदे में नहीं बना रहता?(स्रोत फीचर्स)

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क्या व्हेल नौकाओं पर हमला करती हैं?

पिछले दिनों स्पेन और पुर्तगाल के तटों पर किलर व्हेल द्वारा नौकाओं पर हमले की लगभग 40 घटनाएं रिपोर्ट हुई हैं। एक घटना में पुर्तगाल तट से 30 कि.मी. दूर नाविकों की शुरुआती जिज्ञासा तब डर में बदल गई जब किलर व्हेल लगभग 2 घंटों तक उनकी 45 फीट लंबी नौका के पेंदे में ज़ोरदार टक्कर मारती रहीं। किशोर व्हेल सबसे अधिक सक्रिय थीं। और लगता था कि वे जान-बूझकर नौकाओं पर हमला कर रही हैं। 

इस वर्ष जुलाई से अक्टूबर के दौरान स्पेन और पुर्तगाल के तटों पर इन जीवों द्वारा नौकाओं पर हमला करने के कई मामले सामने आए हैं। फॉरेंसिक समुद्र वैज्ञानिक अभी भी इन जटिल, बुद्धिमान और अत्यधिक सामाजिक समुद्री स्तनधारियों (तथाकथित ‘दुष्ट किलर व्हेल’) के इस व्यवहार को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

अटलांटिक में किलर व्हेल का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ये हज़ारों वर्षों से पुर्तगाल और स्पेन से सैकड़ों किलोमीटर के तट पर प्रवास करती ब्लूफिन ट्यूना मछलियों का शिकार करती हैं। लेकिन जब से मनुष्यों ने ब्लूफिन ट्यूना का शिकार करना शुरू किया है तब से किलर व्हेल्स के साथ हमारे सम्बंध काफी तनावपूर्ण हो गए हैं। स्पैनिश संरक्षण संगठन के अनुसार मनुष्यों द्वारा ब्लूफिन ट्यूना के शिकार के कारण 2011 में किलर व्हेल की संख्या घटकर 39 रह गई थी। लेकिन 2010 में अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण के बाद से वार्षिक कैच में कमी के बाद से जैसे ही ब्लूफिन ट्यूना की संख्या में वृद्धि हुई वैसे ही किलर व्हेल की संख्या भी बढ़कर 60 हो गई। फिर भी यह विलुप्तप्राय प्रजाति की श्रेणी में है।

सितंबर माह से शोधकर्ताओं ने कुछ तथ्य जुटाने का प्रयास शुरू किया। उन्होंने इन जीवों की पहचान करने के लिए संरक्षण संगठन द्वारा ली गई तस्वीरों का उपयोग किया। गौरतलब है कि प्रत्येक किलर व्हेल के पृष्ठीय पंख के पीछे एक विशिष्ट मटमैला पैच होता है जो फिंगरप्रिंट के रूप में काम करता है। इन तस्वीरों और वीडियो से अधिकांश घटनाओं में तीन युवा किलर व्हेल – ब्लैक ग्लैडिस, वाइट ग्लैडिस और ग्रे ग्लैडिस – को अधिक सक्रिय पाया गया। आम तौर पर किलर व्हेल (Orcinus orca) अपने परिवार के साथ काफी निकटता से जुड़े होते हैं। ये परिवार मातृ-प्रधान होते हैं और कई की अपनी बोली होती है। हालांकि अब तक के अध्ययन से शोधकर्ता यह नहीं बता पाए हैं कि ये तीन किस परिवार से सम्बंधित हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी देखा है कि वाइट ग्लैडिस के सिर पर गंभीर चोट है जो शायद नौका की पतवारों को टक्कर मारने के कारण हो सकती है। ऐसी खबरें आते ही सोशल मीडिया पर कहा जाने लगा कि ये किलर व्हेल ‘बदले की कार्रवाई’ कर रही हैं। अलबत्ता, वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि यह किलर व्हेल्स का एक खेल है जिसमें वे नौकाओं को टक्कर मारती हैं।

व्हेल सैंक्चुअरी प्रोजेक्ट की प्रमुख और तंत्रिका वैज्ञानिक लोरी मरीनो और उनके सहयोगियों ने वर्ष 2004 में एक मृत किलर व्हेल के मस्तिष्क का अध्ययन किया था। लोरी बताती हैं कि हम अक्सर प्रजातियों के व्यवहार को अच्छे या बुरे, आक्रामक या चंचल जैसी सरल श्रेणियों में रखने का प्रयास करते हैं जो उनको समझने का गलत तरीका है। हम इन घटनाओं का विवरण देने के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं वही घटना को रंगत देती है। लोरी और उनकी टीम इन घटनाओं को हमला नहीं बल्कि अंतर्क्रिया का नाम देते हैं।

समुद्र वैज्ञानिक रेनॉड स्टेफैनिस कुछ अलग तरह के व्यवहारों का संकेत देते हैं। अपनी नौका में जाते समय वे बताते हैं कि एक किशोर किलर व्हेल उनकी नौका का ऐसे पीछा कर रहा था जैसे वह उसे अपने जैसा कोई जीव समझ रहा हो। ऐसा करते हुए वो अपने चेहरे को नौका के प्रोपेलर में धकेल रहा था। ऐसे व्यवहार का कारण जो भी हो लेकिन यह चिंता का विषय तो है क्योंकि यह स्वयं किलर व्हेल्स के लिए और मछुआरों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। रेनॉड का एक अंदाज़ा यह भी है कि ऐसी घटनाओं से इन जीवों का मछुआरों से सीधे संघर्ष भी हो सकता है क्योंकि मछुआरों को ये अपनी रोज़ी-रोटी और जान दोनों के लिए खतरा नज़र आएंगे। यह स्थिति वास्तव में ऐसी कई जगहों पर देखी जा सकती है जहां मनुष्य तेंदुओं, बाघों या भेड़ियों जैसे जीवों को अपने करीब होने पर मार देते हैं। यदि इस तरह की घटनाएं होती रहीं तो मनुष्य किलर व्हेल को भी अपने लिए जानलेवा मानते हुए उनकी जान ले सकते हैं।

अंत में यह एक ऐसी जैविक पहेली है जिसको हल करना काफी महत्वपूर्ण है। रेनॉड अभी भी किलर व्हेल द्वारा बदला लेने की भावना के आम विचार को खारिज करते हैं। वे दशकों के अनुसंधान का हवाला देते हुए कहते हैं की यह एक सांस्कृतिक बदलाव का हिस्सा हो सकता है जो वास्तव में जीवों को जीवित रहने में मदद करता है। उदाहरण के रूप में वे बताते हैं कि एक समय पर कुछ किलर व्हेल्स ने नौकाओं से ट्यूना चुराने का हुनर हासिल कर लिया था और ऐसे किलर व्हेल परिवारों की संख्या काफी बढ़ गई थी। उनके पास कोई प्रमाण तो नहीं है, लेकिन हो सकता है कि उक्त ग्लैडिस उसी कुल के सदस्य हों।(स्रोत फीचर्स)

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तंबाकू उद्योग की राह पर वैपिंग उद्योग

धूम्रपान से होने वाले नुकसान तो आज जगज़ाहिर हैं। भले ही अब टीवी-अखबारों या अन्यत्र आपको कहीं धूम्रपान को बढ़ावा देने वाले विज्ञापन देखने ना मिलें, लेकिन एक समय था जब सिगरेट कंपनियों और तंबाकू उद्योग ने सिगरेट का खूब प्रचार किया। विज्ञापनों में सिगरेट पीने वाले को खुशमिज़ाज, बहादुर और स्वस्थ व्यक्ति की तरह पेश किया गया और धूम्रपान को बढ़ावा दिया गया। और अब, इसी राह पर वैपिंग उद्योग चल रहा है। वैपिंग उद्योग की रणनीति को समझने के लिए हमें तंबाकू उद्योग का इतिहास समझने की ज़रूरत है।

वैपिंग या ई-सिगरेट एक बैटरी-चालित उपकरण है, जिसमें निकोटिन या अन्य रसायनयुक्त तरल (ई-लिक्विड या ई-जूस) भरा जाता है। बैटरी इस तरल को गर्म करती है जिससे एरोसोल बनता है। यह एरोसोल सिगरेट के धुएं की तरह पीया जाता है। बाज़ार में ई-सिगरेट के कई स्वाद और विभिन्न तरल रसायनों के विकल्प उपलब्ध हैं।

1950 के दशक में बड़े तंबाकू उद्योग का काफी बोलबाला था। उस समय तंबाकू उद्योग ने सिगरेट को ना सिर्फ मौज-मस्ती के लिए पी जाने वाली वस्तु बनाकर पेश किया बल्कि इसे विज्ञान की वैधता देने की भी कोशिश की। धीरे-धीरे शोध में यह सामने आने लगा कि धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक है। यह फेफड़ों के कैंसर, ह्रदय सम्बंधी तकलीफों व कई अन्य समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार है।

लेकिन तंबाकू उद्योग ने स्वास्थ्य सम्बंधी इन खतरों को नकारना शुरू कर दिया। तंबाकू उद्योग ने इन अनुसंधानों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और कहा कि सिगरेट को हानिकारक बताने वाले कोई साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। इससे भी एक कदम आगे जाकर तंबाकू उद्योग ने अनुसंधानों के लिए पैसा देना शुरू कर दिया, और ऐसे अनुसंधानो को बढ़ावा दिया जो धूम्रपान के हानिकारक असर को लेकर अनिश्चितता बनाए रखते थे। शोध में यह भी दर्शाया गया कि धूम्रपान स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालता। उद्योग के इस रवैये से धूम्रपान के नियमन में देरी हुई। नतीजा एक महामारी के रूप में हमारे सामने है।

और अब ई-सिगरेट विज्ञान के लिए चुनौती बना हुआ है। कई सालों से ई-सिगरेट को सिगरेट छोड़ने में मददगार और सुरक्षित कहकर, सिगरेट के विकल्प की तरह पेश किया जा रहा है। धीरे-धीरे वैपिंग उद्योग ई-सिगरेट को मज़े, फैशन और स्टाइल का प्रतीक बनाता जा रहा है और इसके उपयोग को बढ़ावा दे रहा है। अमेरिका व कई अन्य देशों में सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से वैपिंग किशोरों और यहां तक कि मिडिल स्कूल के बच्चों के बीच लोकप्रिय होती जा रही है। वैपिंग उद्योग दो तरह से फैल रहा है: एक तो किशोर उम्र के बच्चे इसके आदी होते जा रहे हैं, और दूसरा, जिन लोगों ने सिगरेट छोड़ दी थी वे अब ई-सिगरेट लेने लगे हैं।

शोध बताते हैं कि ई-सिगरेट के स्वास्थ्य पर लगभग वैसे ही दुष्प्रभाव होते हैं जैसे सिगरेट के होते हैं। अधिकतर ई-सिगरेट में निकोटिन होता है जो ह्रदय सम्बंधी समस्याओं को तो जन्म देता ही है, साथ ही किशोरों के मस्तिष्क विकास को भी प्रभावित करता है। इसके अलावा ई-सिगरेट के अन्य दुष्प्रभाव भी हैं। जैसे कुछ ब्रांड इसमें फार्मेल्डिहाइड का उपयोग करते हैं जो एक कैंसरकारी रसायन है, यानी फेफड़ों के कैंसर की संभावना भी बनी हुई है। वहीं एक शोध में पता चला है कि सिगरेट की लत छोड़ने से भी अधिक मुश्किल ई-सिगरेट की लत छोड़ना है। और, हाल ही में हुए एक शोध में संभावना जताई गई है कि ई-सिगरेट पीने वालों में फेफड़ों की क्षति के चलते कोविड-19 अधिक गंभीर रूप ले सकता है।

लेकिन वैपिंग उद्योग तंबाकू उद्योग के ही नक्श-ए-कदम पर चल रहा है। यह इन दुष्प्रभावों को झुठलाने की कोशिश कर रहा है। इसी प्रयास में इसने अपना एक शोध संस्थान भी स्थापित कर लिया है। वैपिंग उद्योग शोधकर्ताओं को अपने यहां शोध करने का आमंत्रण देकर अपने उत्पाद को वैध साबित करना चाहते हैं। और ई-सिगरेट पीने वालों में आलम यह है कि वे वैपिंग के दुष्प्रभाव बताने वाले शोधों के खिलाफ और वैपिंग के पक्ष में प्रदर्शन करते हैं।

युनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना में हेल्थ बिहेवियर के एसोसिएट प्रोफेसर समीर सोनेजी कहते हैं कि चिंता का विषय यह है कि फायदे-नुकसान की इस बेमतलब बहस में ई-सिगरेट के नियमन में देरी हो रही है और इस देरी के आगे गंभीर परिणाम हो सकते हैं। बहरहाल, भारत समेत कुछ देशों ने इसके उपयोग और व्यापार पर कुछ प्रतिबंध तो लगाया है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्यों कुछ सब्ज़ियां गले में खुजली पैदा करती हैं? – जितेश शेल्के एवं कालू राम शर्मा

ठंड के साथ ही मालवा में गराड़ू (Dioscoreaalata) मिलने लगते हैं। गराड़ू बहुत स्वादिष्ट होता है। इसका छिलका निकालकर तेल में तलकर, बस थोड़ा-सा नींबू निचोड़ो और नमक व मसाला बुरबुराओ। तैयार हो गई डिश! लेकिन गराड़ू को तलने के पहले छीलना व काटना एक झंझट भरा काम होता है। गराड़ू काटते हैं तो हाथों में खुजली होती है। लगता है मानो कुछ चुभन सी हो रही हो। मामला हाथों तक ही सीमित नहीं! अगर तलने में कच्चा रह जाए तो गराड़ू गले में भी खुजली मचाता है। कच्चा खाने का तो सवाल ही नहीं उठता।

सिर्फ गराड़ू ही नहीं अरबी के पत्ते व इसके कंद की सब्जी भी अगर कच्ची रह जाए तो गले में चुभती है। तो आखिर इनमें वह क्या चीज़ है जो चुभन व खुजली पैदा करती है।

इस सवाल का जवाब खोजने के लिए हमने अरबी के पत्ते के एक टुकड़े को अच्छे से मसलकर उसके रस को स्लाइड पर फैलाकर सूक्ष्मदर्शी में देखा। स्लाइड में सुई जैसी रचनाएं स्पष्ट दिखाई दीं। ये महीन सुइयां कोशिकाओं में गट्ठर के रूप में जमी होती हैं। चुभन का एहसास इन्हीं की वजह से होता है।

जब हम गराड़ू काटते हैं या उसका छिलका उतारते हैं तो ये सूक्ष्म सुइयां हमें चुभ जाती है और खुजली मचाती है। वैसे गराड़ू को काटने के पहले कई लोग हाथों में तेल लगा लेते हैं। ऐसा ही कुछ अरबी के मामले में भी होता है।

सूक्ष्मदर्शी में कुछ ऐसीं दिखती हैं सुइया यानी रैफाइड्स

मालवा के लोग इस बात से परिचित हैं कि गराड़ू और नींबू का चोली दामन का साथ है। नींबू जहां अपने खट्टेपन से स्वाद को बढ़ाता है वहीं चुभन व जलन से भी निजात दिलाता है। तो फिर से सवाल उठता है कि क्या नींबू मिलाने से वे सुइयां गायब हो जाती हैं? इस सवाल पर हम आगे बात करेंगे। लेकिन पहले हम यह समझ लेते हैं कि आखिर ये सुइयां क्या है?

ये सुइयां कैल्शियम ऑक्ज़लेट की बनी होती हैं। ये सुइयां जिन कोशिकाओं के अंदर होती है उन्हें इडियोब्लास्ट कोशिकाएं कहा जाता है। यह तो हम जानते हैं कि कोशिकाओं में कोशिकांग होते हैं। कोशिकाएं अपने सामान्य कामकाज के दौरान कई पदार्थों का निर्माण करती हैं। ये पदार्थ कोशिकाओं में एक खास आकृति में जमा हो जाते हैं। इन पदार्थों को कोशिका समावेशन (सेल इंक्लूज़न) कहा जाता है। यानी कोशिका में निर्जीव पदार्थों का समावेशन। जैसे आलू में स्टार्च के कण, नागफनी और अकाव में सितारे के आकार के कैल्शियम ऑक्ज़लेट के कण इत्यादि।

यह बताना प्रासंगिक होगा कि पौधों में कैल्शियम ऑक्ज़लेट के क्रिस्टल कई आकृतियों में पाए जाते हैं। जैसे, सुई के आकार में (रैफाइड), घनाकार (स्टायलॉइड्स), प्रिज़्म के आकार में, गदा के आकार में।

रैफाइड कैल्शियम ऑक्ज़लेट के सुई के आकार के क्रिस्टल होते हैं जो कुछ वनस्पति प्रजातियों के पत्तों, जड़ों, अंकुरों, फलों के ऊतकों में मौजूद होते हैं। ये किवी फ्रूट, अनानास, यैम या जिमीकंद और अंगूर सहित कई प्रजातियों के पौधों में पाए जाते हैं। यह देखा गया है कि रैफाइड आम तौर पर एकबीजपत्री वनस्पति कुलों में पाए जाते हैं और कुछेक द्विबीजपत्री कुलों में देखे गए हैं।

रैफाइड के व्यापक वितरण व विशिष्ट मौजूदगी के बावजूद इनकी प्राथमिक भूमिका को लंबे वक्त तक नहीं समझा गया था। कैल्शियम के नियमन, पौधों की शाकाहारियों से सुरक्षा जैसी बातें कही गई हैं। शाकाहारी जंतुओं से सुरक्षा के मामले में एक पुराना अवलोकन है। पहली बार एक जर्मन वैज्ञानिक अर्न्स्ट स्टॉल ने देखा था कि घोंघे उन पौधों को अपना आहार नहीं बनाते जिनमें रैफाइड होते हैं। उन्होंने यह भी देखा कि अगर उन पौधों की पत्तियों को मसलकर उसमें थोड़ा अम्ल डाल दिया जाए तो फिर घोंघे उसे अच्छे से खाते हैं। इसका अर्थ यह है कि अम्ल की कैल्शियम ऑक्ज़लेट से रासायनिक क्रिया से सुइयां गल जाती है। अब स्पष्ट हो गया होगा कि नींबू क्या करता है।

दरअसल, रैफाइड शाकाहारी जीव के खिलाफ पौधों की रक्षात्मक रणनीति है। पौधे अपने को बचाने के लिए कई तरीके अपनाते हैं। कहीं कांटे तो कहीं द्वितीयक उपापचय पदार्थ होते हैं। रैफाइड ऊतकों और कोशिका झिल्लियों में छेद करने का काम करते हैं। इसे सुई प्रभाव (निडिल इफेक्ट) कहा जाता है। यह देखा गया है कि जिन पौधों में रैफाइड मिलते हैं उनमें प्रोटीएज़ एंज़ाइम पाए जाते हैं। इन प्रोटीएज़ व रैफाइड की जुगलबंदी का ही कमाल है कि इनको काटने व खाने के दौरान चुभन व जलन होती है।

एक शोध में रैफाइड व प्रोटीएज़ के प्रभाव को देखने की कोशिश की गई। वैज्ञानिकों ने रैफाइड वाले किवी फ्रूट (एक्टिनिडिया डेलिसिओसा) से रैफाइड प्राप्त किए। सबसे पहले केवल रैफाइड का लेपन अरंडी की पत्ती पर किया और उस पर लार्वा को छोड़ा। इस स्थिति में लार्वा पर कोई प्रभाव नहीं दिखा और सभी लार्वा ज़िंदा रहे। जब रैफाइड सुइयों को अरंडी की पत्ती पर अधिक सांद्रता के साथ लेपन किया गया तो भी लार्वा पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं देखा गया। इसका अर्थ यह है कि केवल रैफाइड सुई की कोई भूमिका नहीं है।

फिर जब अरंडी की पत्ती पर केवल सिस्टाइन प्रोटीएज़ का लेपन किया गया तब भी लार्वा पर कोई असर नहीं हुआ। लेकिन जब अरंडी की पत्ती पर रैफाइड और सिस्टाइन प्रोटीएज़ दोनों का लेपन किया तो 69 फीसदी लार्वा का शरीर काला पड़ गया व लगभग दो घंटे में मर गए। नतीजों में यह भी पाया गया कि जब बहुत थोड़े रैफाइड के साथ सिस्टाइन प्रोटीएज़ की मात्रा को बढ़ाया गया तो विषाक्तता 16-32 गुना बढ़ गई।

बेशक, रैफाइड सुई का काम कोशिकाओं को पंचर करने का होता है। जब कैल्शियम ऑक्ज़लेट की सुइयों की बजाय अक्रिस्टलीय कैल्शियम ऑक्ज़लेट व साथ में सिस्टाइन प्रोटीएज़ का लेपन किया गया, तो भी लार्वा पर कोई असर नहीं हुआ। इससे साबित होता है कि कैल्शियम ऑक्ज़लेट से बनी सुई की भूमिका अहम है, न कि कैल्शियम ऑक्ज़लेट की। यह भी देखा गया है कि काइटिन पचाने वाले प्रोटीएज़ एंज़ाइम के साथ भी रैफाइड इसी प्रकार का व्यवहार प्रदर्शित करते हैं।

एक अनुभव और। घर के आंगन में डफनबेकिया का एक सजावटी पौधा गमले में लगा था। गमले में गुलाब, चांदनी जैसे और भी पौधे थे। अगर घर का गेट खुला रह जाता तो गमले के पौधों को बकरियां चट कर जाती। लेकिन वे डफनबेकिया के पौधे को नहीं खाती थीं। खोजबीन करने पर पता चला कि डफनबेकिया के पौधे की पत्तियों में भी रैफाइड सुइयां होती हैं।

कुल मिलाकर रैफाइड और प्रोटीएज़ की जुगलबंदी कुछ पौधों की रक्षा प्रणाली है। इसकी प्रबल संभावनाएं हैं कि रैफाइड और रक्षात्मक प्रोटीएज़ के बीच तालमेल से फसलों की कीट-प्रतिरोधी किस्मों के विकास में मदद मिल सकती है।(स्रोत फीचर्स)

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हरित पटाखे, पर्यावरण और स्वास्थ्य – सुदर्शन सोलंकी

दिवाली आई और निकल गई। कुछ राज्यों में पटाखों पर प्रतिबंध लगाए गए थे लेकिन कुछ राज्यों में समय-सीमा के अलावा और कोई रोक नहीं थी। वैसे तो इस बार दिवाली पर पटाखों का शोर पिछले सालों की अपेक्षा कम था और कुछ लोग शायद खुद को शाबाशी दे रहे होंगे कि उन्होंने हरित पटाखे जलाकर अपना पर्यावरणीय कर्तव्य पूरा किया। यह आलेख हरित पटाखों समेत पूरे मामले की पड़ताल करता है।

रित पटाखे राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) की खोज हैं, जो वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंघान परिषद (सीएसआईआर) के अंतर्गत आता है। हरित पटाखे दिखने, जलाने और आवाज़ में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं पर इनके जलने से प्रदूषण कम होता है। इनमें विभिन्न रासायनिक तत्वों की मौजूदगी और हानिकारक गैसों वाले धुएं का कम उत्सर्जन करने वाले तत्वों का इस्तेमाल किया गया है। इनको जलाने से हवा दूषित करने वाले महीन कणों (पीएम) की मात्रा में 25 से 30 प्रतिशत और पोटेशियम तत्वों के उत्सर्जन में 50 प्रतिशत तक की कमी का अनुमान है।

परंतु पर्यावरणविदों ने इन पटाखों के अधिक उपयोग को भी खतरनाक माना है। लोगों में हरित पटाखों को लेकर कई भ्रम हैं। लोग समझते हैं कि ये पूरी तरह प्रदूषण मुक्त हैं। इसलिए लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है क्योंकि अगर लोग इन्हें हरित समझकर अधिक जलाते हैं तो निश्चित ही त्यौहारों के बाद में प्रदूषण का स्तर बढ़ेगा।

प्रदूषण कम करने, विषैले रसायन और ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हरित पटाखों के इस्तेमाल के निर्देश दिए थे। अब शिवकाशी ने खुद को ऐसे पटाखों के लिए तैयार कर लिया है। जिस केमिकल को प्रतिबंधित किया गया है, उसका हरित विकल्प पोटेशियम परआयोडेट 400 गुना महंगा है। इसी वजह से हरित पटाखे काफी महंगे होते हैं।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के अनुसार सरकार को सभी परिवारों के पटाखे खरीदने की एक सीमा निर्धारित करनी चाहिए, जिससे लोग एक तय सीमा से अधिक इन पटाखों का इस्तेमाल ना कर सकें। लोग समूहों में पटाखे जलाएं जिससे कम से कम पटाखों में सबका जश्न हो सके। अधिकांश त्यौहारों में पटाखे जलाकर जश्न मनाया जाता है किंतु बढ़ते प्रदूषण स्तर के चलते इनके उपयोग को सीमित रखना बेहद आवश्यक है।

बड़े त्यौहारों पर व्यापक आतिशबाज़ी से बड़ी मात्रा में हानिकारक गैसें और विषाक्त पदार्थ वायुमंडल में पहुंचते हैं। परिणामस्वरूप, वायु प्रदूषित हो जाती है जो हमारे स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है। हाल ही के अध्ययन में दिल्ली और गुवाहाटी के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के शोधकर्ताओं ने दीपावली के दौरान पटाखों से होने वाले अत्यधिक वायु और ध्वनि प्रदूषण और स्वास्थ्य पर उनके प्रभाव का अध्ययन जर्नल ऑफ हेल्थ एंड पॉल्युशन में प्रकाशित किया है।

शोधकर्ताओं ने वर्ष 2015 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गुवाहाटी परिसर में दीपावली के त्यौहार के दौरान हवा की गुणवत्ता और शोर के स्तर का अध्ययन किया था। उन्होंने 10 माइक्रोमीटर या व्यास में उससे छोटे, हवा में तैरते कणों (पीएम-10) के घनत्व को मापा और शोर के स्तर को भी। उन्होंने दीपावली में 10 दिनों की अवधि के दौरान पीएम-10 में मौजूद धातुओं (जैसे कैडमियम, कोबाल्ट, लोहा, जस्ता और निकल) तथा आयनों (जैसे कैल्शियम, अमोनियम, सोडियम, पोटेशियम, क्लोराइड, नाइट्रेट और सल्फेट) की सांद्रता को नापा।

स्वास्थ्य पर इनके प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए, शोधकर्ताओं ने उस अवधि के दौरान संस्थान के अस्पताल में जाने वाले रोगियों के स्वास्थ्य का सर्वेक्षण भी किया। इस अध्ययन में प्रदूषकों के स्तर में वृद्धि देखी गई। शोधकर्ताओं के अनुसार दीपावली के दौरान पीएम-10 की सांद्रता अन्य समय की तुलना में 81 प्रतिशत अधिक थी, और धातुओं एवं आयनों की सांद्रता में भी 65 प्रतिशत की वृद्धि पाई गई। शोर का स्तर भी अधिक था। हालांकि शोधकर्ताओं ने पाया कि अन्य दिनों की तुलना में दीपावली के दौरान पीएम-10 में बैक्टीरिया की सांद्रता 39 प्रतिशत कम थी। सीसा, लोहा, जस्ता जैसी भारी धातुओं की उपस्थिति इसका कारण हो सकती है।

डब्लूएचओ ने सिफारिश की है कि पीएम-2.5 का वार्षिक औसत घनत्व 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से कम होना चाहिए, लेकिन भारत और चीन के शहरी क्षेत्रों में इसका स्तर छह गुना ज़्यादा (क्रमश: 66 और 59 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट से पता चला है कि वायु की गुणवत्ता के मामले में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में भारत और चीन हैं। पीएम-2.5 घनत्व में बीजिंग और नई दिल्ली दोनों ही शहर शामिल है। किंतु बीजिंग ने इसमें सुधार किया है।

वायु में अन्य गैसें और बगैर जले कार्बन कण मिश्रित होकर स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक बन जाते हैं। सूक्ष्म कण (पीएम-2.5) मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक माने जाते हैं क्योंकि ये फेफड़ों में काफी अंदर तक चले जाते हैं, और इनसे फेफड़ों का कैंसर भी हो सकता है। वर्ष 2015 में पीएम-2.5 के कारण विश्व भर में 42 लाख से भी अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी। इनमें से 58 प्रतिशत मौतें भारत और चीन में हुर्इं। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीज़ेस नामक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1990 से लेकर अब तक चीन में पीएम-2.5 के कारण असमय मौतों में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भारत में यह आंकड़ा तीन गुना अधिक है। पटाखों के अत्यधिक उपयोग से छोटी-सी अवधि में ही हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक बच्चा-चोर जंतु: नैकेड मोल रैट – डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

पूर्वी अफ्रीका के शुष्क घास के मैदानों के नीचे भूल-भूलैया जैसी सुरंगों में एक प्रकार की बदसूरत छछूंदर, नैकेड मोल रैट(Heterocephalusglaber) पाई जाती है। त्वचा पर बाल नहीं होते, इसलिए इन्हें नग्न मोल रैट कहते हैं। अधिकांश कृंतकों के विपरीत ये सामाजिक होती हैं। इनके समूहों में सदस्यों की संख्या 300 तक हो जाती है। पूरे समुदाय में केवल एक प्रजननशील जोड़ा रहता है और शेष सभी मज़दूर होते हैं।

हाल ही के शोध में पाया गया है कि चींटी और दीमकों के समान ही यह मोल रैट भी भोजन की उपलब्धता और इलाके में विस्तार करने के लिए आसपास मौजूद अन्य मोल रैट कॉलोनियों पर आक्रमण करते हैं और उनके बच्चों को चुराकर अपने समूह के मज़दूरों की संख्या में वृद्धि करते हैं। इनके इस व्यवहार से छोटी एवं कम एकजुटता वाली मोल रैट कॉलोनियां सिकुड़ती हैं और आक्रामक कॉलोनियों का विस्तार होता जाता है।

कीन्या के मेरु राष्ट्रीय उद्यान में शोध टीम को उपरोक्त व्यवहार नैकेड मोल रैट की गतिविधियों के अध्ययन के दौरान संयोगवश देखने को मिला।

एक दशक से चल रहे शोध में शोधकर्ताओं ने इनकी गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए दर्जनों कॉलोनियों से मोल रैट पकड़-पकड़कर उनकी त्वचा के नीचे एक बहुत छोटी रेडियो फ्रिक्वेन्सी ट्रांसपॉन्डर चिप लगा दी थी। नई कॉलोनी के सदस्यों में चिप लगाने के दौरान शोधकर्ताओं को वहां पड़ोसी कालोनी के वे सदस्य दिखाई दिए जिन पर वे पहले ही चिप लगा चुके थे। आगे खोजबीन करने पर ज्ञात हुआ कि नई कॉलोनी की रानी के चेहरे पर युद्ध के दौरान बने घाव थे। शोध से जुड़े सेन्ट लुईस की वाशिंगटन युनिवर्सिटी के स्टेन ब्राउडे के लिए यह बात आश्चर्यजनक और नई थी क्योंकि इनकी कॉलोनियों के बीच प्रतिस्पर्धा की कोई बात ज्ञात ही नहीं थी बल्कि उन्हें तो आपसी सहयोग की भावना से रहने वाले जीव ही माना जाता था। ब्राउडे और उनके साथियों ने शोध के दौरान पाया कि 26 कॉलोनियों ने अपनी सुरंग की सरहदों को विस्तार देकर पड़ोसी कॉलोनियों पर अधिकार जमा लिया है। आक्रमण के आधे मामलों में तो छोटी कॉलोनी के सभी मोल रैट बेदखल कर दिए गए थे तथा आधे मामलों में छोटी कॉलोनी के सदस्यों को सुरंगों के किनारों तक खदेड़ दिया गया था। इसी अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों को ऐसा लगा कि हमले के दौरान छोटी कॉलोनी के बच्चों को भी चुरा लिया गया है। परंतु तब उन्नत जेनेटिक तकनीक के अभाव में वंशावली ज्ञात कर पुख्ता तथ्य परखना कठिन था। लेकिन बाद के वर्षों में ज्ञात हुआ कि अन्य कॉलोनियों के बच्चे मज़दूर बनकर बड़ी कॉलोनी के अंग बन गए थे। वैज्ञानिकों ने इन पर निगाह रखी और इनके जेनेटिक विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि ये दूसरी कॉलोनी के चुराए हुए बच्चे थे। इन छछूंदरों के सामाजिक जीवन के अध्ययन से वैज्ञानिक यह जान पाए हैं कि इनके लिए सुरंगें बहुत मूल्यवान होती है। सुरंगों को खोदने के दौरान ही ज़मीन में पाए जाने वाले कंद इनका आहार होते हैं। कॉलोनी में जितने ज़्यादा मज़दूर होंगे सुरंगें उतनी ही बड़ी होंगी और अधिक भोजन उपलब्ध करा पाएंगी। इसलिए ये आस-पड़ोस की कॉलोनियों पर आक्रमण करके वयस्क सदस्यों को बेदखल कर देते हैं और केवल निश्चित उम्र के बच्चों को ही चुरा कर अपने समूह में सम्मिलित कर लेते हैं जो बड़े होकर इनके लिए मज़दूरी कर सकें।(स्रोत फीचर्स)

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