कोविड-19 महामारी बनाम डिजिटल महामारी – अनुराग मेहरा

लेख की शुरुआत मैं एक गुज़ारिश के साथ करना चाहता हूं। हम अचानक ही मुश्किल और अनिश्चित दौर से घिर गए हैं। अनजाने भविष्य का डर और आशंका बेचैनी पैदा कर रहे हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस डर को बढ़ाने में हमारा कोई योगदान ना हो, हमें ध्यान देना चाहिए कि हम दूसरों के साथ कैसी जानकारी साझा कर रहे हैं, खासकर सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स के ज़रिए। जब भी आप कुछ देखें या पढ़ें तो अपने आप से ये सवाल ज़रूर करें: क्या मुझे इस जानकारी पर भरोसा है? अगर यह जानकारी किसी खास विषय से सम्बंधित है तो क्या मैं इसे परखने के लिए पर्याप्त जानकार हूं? क्या दी गई जानकारी के पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत हुए हैं? क्या कहीं और भी यह बात कही गई है? विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) या स्वास्थ्य मंत्रालय इस बारे में क्या कहता है? क्या आपने व्हाट्सएप पर प्राप्त सरकारी आदेश का उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर जारी आदेश से मिलान किया है? यदि थोड़ी भी शंका हो तो हमें संदेश साझा करने और आगे बढ़ाने से बचना चाहिए। वरना हम लोगों को गलत जानकारी देंगे जो उन्हें जोखिम में डाल सकती है।

कोविड-19 महामारी कई लोगों के लिए एक वरदान के रूप में आई है कि वे अपने अज्ञान को समझ व ज्ञान रूपी हथियार का रूप देकर, प्राय: सांस्कृतिक गर्व का मुलम्मा चढ़ाकर दुनिया के समक्ष पेश कर सकें। डिजिटल टेक्नॉलॉजी ने कई लोगों को विशेषज्ञ, विद्वान, डॉक्टर और सर्वज्ञ बना दिया है। मोबाइल फोन और कुछ अन्य माध्यमों के ज़रिए वे इंटरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग बेतुकी और भ्रामक जानकारी फैलाने में कर रहे हैं। इनमें कई बार ऐसी बकवास भी शामिल होती है जो आज़माने वालों के लिए घातक हो सकती है।

कोरोनोवायरस (SARS-CoV-2), कोविड-19 की शारीरिक महामारी के साथ जुड़ी जानकारी की महामारी के बारे में काफी कुछ लिखा गया है। सबसे अधिक बेतुकी बातें संक्रमण के इलाज और इससे बचाव के उपायों के बारे में कही जा रही हैं। जिससे एक सवाल यह उठता है: गड़बड़ क्या है और ऐसा क्यों हो रहा है? सरल स्तर पर देखें तो, सनसनीखेज़ सामग्रियां डर और उम्मीद के चलते फैल रही हैं, और जीवित रहने के लिए हमारे दिमाग की एक प्रवृत्ति खतरों को बड़े रूप में देखने की है। ऐसा अक्सर महामारी, आपदाओं और युद्ध के समय होता है। पर इस समय हालात को अधिक जटिल और खतरनाक बनाने वाले तीन कारक हैं: पहला, इंटरनेट पर मौजूद असत्यापित अथाह ‘ज्ञान’ के भंडार तक आसान पहुंच; दूसरा, डिजिटल मीडिया की बदौलत प्रसार की तीव्र गति और आसान पहुंच; और तीसरा, सामाजिक और राजनैतिक ध्रुवीकरण जो साज़िश की परिकल्पनाओं को तथा भयंकर पक्षपाती अभिमान से भरे छद्म वैज्ञानिक कथनों को जन्म देता है।

इनमें सबसे प्रचलित हैं खांसी और ज़ुकाम या सामान्य प्रतिरक्षा को बढ़ाने के लिए आज़माए जाने वाले घरेलू नुस्खों का विस्तार। इनमें से कुछ उपाय तो गर्म पानी से गरारे करने और गर्मागरम रसम पीने जैसे साधारण सुझाव हैं। इनका एक अन्य स्तर है स्व-परीक्षण; जैसे एक संदेश कहता है कि यदि आप 10 सेकंड के लिए अपनी सांस रोक सकते हैं तो आप संक्रमित नहीं हैं। इंटरनेट गलत सूचनाओं से भरा पड़ा है, जिनसे आप चलते-चलते टकरा जाएंगे। गलत सूचनाओं तक संयोगवश पहुंचना कहीं आसान है बनिस्बत प्रामाणिक जानकारी तक पहुंचने के, जिसे खोजना पड़ता है और प्रामाणिकता को परखने के लिए प्रयास करने पड़ते हैं।

गलत सूचनाएं अक्सर आधिकारिक दिखने वाले दस्तावेज़ों और सील-ठप्पों के साथ पेश की जाती हैं। इनमें से कुछ नामी पेशेवरों के हवाले से आती हैं; जैसे एक प्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट को यह कहते सुना गया था कि जिन व्यक्तियों में संक्रमण के लक्षण दिख रहे हैं उन्हें, परीक्षण किट की कमी के चलते, आठ दिनों के बाद ही परीक्षण के लिए जाना चाहिए। इसके अलावा फेसबुक, ट्विटर और सबसे कुख्यात व्हाट्सएप पर कई हास्यास्पद चीज़ें चल रही हैं। जैसे लहसुन कोरोनावायरस को ठीक कर सकता है, या हर 15 मिनट में गर्म पानी पीने से संक्रमण से बचा जा सकता है। सबसे अधिक रोमांचक सलाह शराब और गांजा का सेवन करने की है; दावा है कि दोनों ही वायरस को मार सकते हैं। अमेरिका में काफी प्रचलित सलाह है कि ‘चमत्कारी मिनरल घोल’ यानी ब्लीच वायरस का सफाया कर सकता है। प्रसंगवश बता दें कि यह आपका भी सफाया हमेशा के लिए कर देगा।

मेसेजेस ने इस विचार को भी बढ़ावा दिया है कि मास्क लगाने से वायरस से पूरी तरह सुरक्षित रहा जा सकता है – यह एक खतरनाक विचार है क्योंकि यह विचार एक मिथ्या आत्मविश्वास पैदा करता है और फिर आपसे मूर्खतापूर्ण व्यवहार करवाता है। इसके चलते उन लोगों के लिए मास्क की कमी भी हो गई जिन्हें इनकी वाकई ज़रूरत थी। और अंत में, निश्चित ही यह झूठी घोषणा थी कि सरकार ने पूरे इलाके में छिड़काव करके हवा में ही वायरस के खात्मे का इंतजाम किया है।

यह तब और भी चिंताजनक हो जाता है जब ये मूर्खतापूर्ण बातें आधिकारिक नीति बन जाती हैं: स्वास्थ्य मंत्रालय सलाह देता है कि आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथिक उपचार कोरोनोवायरस के ‘लक्षणों से निपटने’ में मददगार हैं! जबकि इस तरह के दावों का रत्ती भर वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। फिर भी ये सरकार की ओर से ज़ारी किए गए हैं। विशेषज्ञों द्वारा इस पर आपत्ति उठाने पर मंत्रालय ने ‘स्पष्टीकरण’ दिया है कि यह सलाह ‘सामान्य’ वायरस संक्रमण के संदर्भ में जारी की गर्इं है।

यदि कोई इन ‘उपचारों’ को अपना ले तो परिणाम भयावह होंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कोरोनोवायरस के इलाज के लिए क्लोरोक्वीन और हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के उपयोग की वकालत की है। जब उनसे इस बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने जवाब दिया कि “मैं एक ऐसा आदमी हूं जो बहुत सकारात्मक सोच रखता हूं, विशेष रूप से इन दवाओं के मामले में। यह सिर्फ एक एहसास है, सिर्फ एक एहसास है। मैं एक स्मार्ट आदमी हूं।”

इन दवाओं की प्रभाविता के बारे में केवल कहे-सुने प्रमाण उपलब्ध हैं और इन्हें लेकर परीक्षण चल रहे हैं लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा पहले ही इस ‘उपचार’ की पैरवी ने मुश्किल खड़ी कर दी है: इन दवाओं की जमाखोरी से इनकी उपलब्धता उन लोगों के लिए कम हो गई है जिन्हें अन्य बीमारियों के इलाज में इनकी ज़रूरत है। लोग कोरोनोवायरस से अपने को बचाने के लिए अब खुद ही इन अत्यधिक ज़हरीली दवाओं का सेवन रहे हैं, जिसके कारण एरिज़ोना और नाइजीरिया में मौतें भी हो चुकी हैं। इसी तरह के हालात भारत में भी बन सकते हैं।

साज़िश परिकल्पनाओं की भी कोई कमी नहीं है। एक प्रचलित बयान यह है कि कोरोनावायरस 5-जी मोबाइल तकनीक के परिणामस्वरूप उपजा है; यह वायरस के माध्यम से लोगों को बीमार करता है। मलेशियाई सरकार को अपने नागरिकों को आश्वस्त करना पड़ा कि यह वायरस लोगों को रक्त-पिपासु दैत्य में नहीं बदलेगा। संयुक्त राज्य अमेरिका में दक्षिणपंथी लोगों ने सोशल मीडिया पर इस तरह की पोस्ट की बाढ़ लगा दी है कि कोरोनावायरस ट्रम्प विरोधी हिस्टीरिया पैदा करने की और ‘देश को अस्थिर करने’ की साज़िश है। इस डर को हवा दी जा रही है कि डब्लूएचओ ‘राष्ट्रों को नियंत्रित कर रहा है और कई लोगों को मारने के लिए जबरन टीके लगाए जाएंगे।’ इसका एक परिणाम इस रूप में सामने आ रहा है कि दक्षिण-पंथी रुझान वाले नागरिक इस महामारी को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, और लापरवाही भरा व्यवहार कर रहे हैं, जैसे बाहर खाना खाना या हाथ मिलाना (यह साबित करने के लिए कि वे सख्त हैं)।

ज़्यादा गहरे स्तर पर दक्षिणपंथी लोग “वायरस के कारण और उसकी उत्पत्ति के बारे में साज़िश-सिद्धांत पेश कर रहे हैं, और इन मनगढ़ंत कहानियों का उपयोग आप्रवासियों, अल्पसंख्यकों या उदारवादी लोगों को बलि का बकरा बनाने हेतु कर रहे हैं।” चीनी मूल के अमेरिकी नागरिकों के साथ दुव्र्यवहार की खबरें तो सामने आ भी चुकी हैं क्योंकि ट्रम्प ने “चीनी वायरस” शब्द प्रचलित कर दिया है। भारत में भी, पूर्वोत्तर राज्यों के नागरिकों पर इसी तरह के नस्लवादी हमले किए गए हैं। चीन को एक दैत्य साबित करने के लिए कहा जा रहा है कि वह अपने ही नागरिकों के प्रति अमानवीय और क्रूर व्यवहार कर रहा है, और ऐसी (झूठी) रिपोर्टें पेश की जा रही हैं कि चीन संक्रमित लोगों को मार रहा है।

लेकिन यह पुराना सवाल बरकरार है: लोग इन बकवास बातों में क्यों आ जाते हैं? एक अन्य लेख में इस बात की चर्चा की गई है कि कैसे क्राउडसोर्सिंग द्वारा बकवास भी ‘ज्ञान’ बन जाता है। मोटे तौर पर कहा जाए तो विभिन्न कारणों से आबादी के एक बड़े हिस्से के लोगों में समीक्षात्मक कौशल की कमी के चलते कितनी भी हास्यास्पद या बकवास बात ‘विश्वसनीय’ बन जाती है। सही शिक्षा तक लोगों की पहुंच के अभाव और आधारभूत वैज्ञानिक सिद्धांतों की जानकारी की कमी के कारण उनके पास लगातार मिल रही इन सूचनाओं की वैधता जांचने का कोई तरीका नहीं होता। इसके अलावा सवाल करने की मानसिकता की अनुपस्थिति, जो वैज्ञानिक स्वभाव का अंतर्निहित हिस्सा है, के कारण वे जो भी देखते, पढ़ते और सुनते हैं उसकी गहन पड़ताल नहीं कर पाते।

यहां स्पष्ट रूप से दो तरह के परिदृश्य हैं

पहली श्रेणी उन लोगों की है जो तार्किकता से शुरुआत तो करते हैं लेकिन एक समय बाद प्रामाणिक से दिखने वाले नकली दस्तावेज़ों या वैज्ञानिक लगने वाले तर्कों में फंस जाते हैं। इसका एक अच्छा उदाहरण यह बयान है कि होम्योपैथी कोरोनोवायरस से लड़ने के लिए सभी अद्भुत दवाएं उपलब्ध करा रही है। इस तरह के दावे वैसी ही भाषा शैली का उपयोग करते हैं जैसी कि आधुनिक चिकित्सा में उपयोग की जाती है, जिससे होम्योपैथी चिकित्सा बिल्कुल इसके समान और इसका विकल्प लगने लगती है। यह उस छद्म विज्ञान को ढंक देती है जिस पर होम्योपैथी आधारित है। कोरोनोवायरस महामारी के इलाज और उसके टीके सम्बंधी ये दावे इस संक्रमण के खिलाफ अजेयता का भ्रम पैदा कर सकते हैं।

‘जनता कर्फ्यू’ के मामले में सोशल मीडिया पर एक छद्म वैज्ञानिक व्याख्या काफी प्रचलित है: किसी एक स्थान पर कोरोनोवायरस 12 घंटे जीवित रहता है और जनता कर्फ्यू 14 घंटे का है। इसलिए सार्वजनिक स्थलों या बिंदुओं को, जहां कोरोनावायरस पड़ा रह गया होगा, यदि 14 घंटे तक छुआ नहीं जाएगा तो इससे कोरोनावायरस की शृंखला टूट जाएगी। यह ना केवल अजीबो-गरीब तर्क है बल्कि यह वायरस के जीवन काल के तथ्य के आधार पर भी गलत है। इस प्रकार के कर्फ्यू वायरस के संपर्क में आने में कमी ला सकते हैं, और आपातकालीन उपायों के हिसाब से यह एक अच्छा कदम हो सकता है, लेकिन यह नहीं होगा कि ‘कोरोनावायरस की शृंखला टूट जाएगी’।

व्हाट्सएप पर एक और बेतुका तर्क दिया जा रहा है कि भारत के 130 करोड़ लोग यदि एक समय, एक साथ ताली और शंख बजाएंगे तो इतना कंपन पैदा होगा कि वायरस अपनी सारी शक्ति खो देगा। यदि कुछ ट्वीट्स की मानें तो ऐसा करके हमें पहले ही बड़ी सफलता मिल चुकी है क्योंकि “नासा SD13 तरंग डिटेक्टर ने ब्राहृाण्ड स्तरीय ध्वनि तरंग डिटेक्ट की हैं और हाल ही में बनाए गए बायो-सैटेलाइट ने दिखाया है कि कोविड-19 स्ट्रेन घट रहा है और कमज़ोर हो रहा है” और वह भी सामूहिक शंखनाद के कुछ मिनटों बाद।

इससे ज़्यादा ऊटपटांग बात कोई हो नहीं सकती। दूसरी ओर, सामाजिक दूरी का विचार, जिसे सरकारें जी-जान से बढ़ावा देने में जुटी हैं, तब हवा में उड़ गया जब कई लोग राजनेताओं के आव्हान से उत्साहित होकर संक्रमण से लड़ने वाले कार्यकर्ताओं के सम्मान में लोग ताली-थाली बजाने के लिए अपने-अपने घरों से बाहर निकल कर एक साथ जमा हो गए। लेकिन ज़मीनी हकीकत बिल्कुल अलग है, हम वास्तव में अपने आसपास इन कार्यकर्ताओं को नहीं चाहते क्योंकि इनके संक्रमित होने की संभावना है। मकान मालिकों ने एयरलाइन कर्मचारियों और यहां तक कि चिकित्सा पेशेवरों को घर खाली करने को कहा है – यह काफी निराशाजनक स्थिति दिखती है कि हम दूसरों की ज़िंदगी को महत्व नहीं देते हैं, उनकी भी जो संकट के समय हमारी सेवा करते हैं। जिन लोगों को क्वारेंटाइन किया गया है उनके प्रति सहानुभूति में कमी और उनकी निजता पर आक्रमण और भी शर्मनाक है।

हम वास्तव में सबसे भौंडा इतिहास बनते देख रहे हैं

दूसरा, हमारे यहां कई ऐसे लोग हैं जो निहित रूप से अंधविश्वासों और अतार्किक विश्वासों के प्रति संवेदी हैं। इसके लिए विचित्र धार्मिकता से लेकर इन विश्वासों को मानने वाली संस्कृति में परवरिश जैसे कई कारण ज़िम्मेदार हैं। इन मामलों में ज्ञान और जानकारी बुज़ुर्गों, समुदाय प्रमुखों और धार्मिक गुरुओं से आंख मूंदकर प्राप्त की जाती है, उस पर सवाल नहीं उठाए जाते; दिमागों को सवाल उठाने या प्रमाण खोजने के लिए तैयार नहीं किया जाता। इसलिए इन लोगों को जो कुछ भी सूचनाएं मिलती हैं, उसे मान लेते हैं, और इससे भी अधिक तत्परता से उन सूचनाओं को मान लेते हैं जो किसी भी किस्म के अधिकारियों – राजनीतिक नेताओं, धार्मिक हस्तियों – से प्राप्त हुई हैं। ‘गो कोरोना गो’ का एक वीडियो बीमारी से लड़ने में एक आशावादी मनोस्थिति बनाने का अच्छा साधन हो सकता है लेकिन यह वीडियो एक मुगालता भी पैदा करता है कि कोरोनोवायरस को जाप से, खासकर सामूहिक जाप से भगाया जा सकता है।

कोरोनावायरस सम्बंधी इस तरह की बेतुकी बयानबाज़ी करने वाले अधिकतर वे लोग हैं जो धार्मिक और राष्ट्रवादी गौरव से भरे होते हैं। यह वक्त, जो महान राजनीतिक ध्रुवीकरण और तीव्र सामाजिक आक्रोश का गवाह है, ने सांस्कृतिक श्रेष्ठता के आख्यानों से पूर्ण दंभ के उग्रवादी रूप को जन्म दिया है।

इसी के चलते, गोमूत्र का उपयोग कीटाणुनाशक के रूप में किया जा रहा है और बिना सोचे-समझे लोगों पर इसका छिड़काव किया जा रहा है। दक्षिणपंथी राजनेताओं का दावा है कि गोमूत्र और गोबर कोरोनोवायरस का इलाज कर सकते हैं, और हवन वायरस को मार सकता है। इनमें से कुछ ने विशेष सभाओं का आयोजन किया जहां आमंत्रित लोगों को गोमूत्र पीने के लिए दिया गया। कई ज्योतिष हमें बताते हैं कि हम अस्तित्व के संकट का सामना क्यों कर रहे हैं, और यह कब दूर होगा। एक अन्य दावा कहता है कि प्राचीन भारतीय योग के श्वसन का तरीका कोरोनावायरस के संक्रमण से बचा सकता है, और यह भी कि आयुर्वेदिक चिकित्सा में प्रयुक्त अश्वगंधा ‘मानव प्रोटीन से कोरोना प्रोटीन को जुड़ने नहीं देगी।’ इंडोनेशिया में मीडिया पोस्ट्स में दावा किया गया है कि वजू करना वायरस को मार सकता है।

जो लोग इनमें से किसी भी कथन को गंभीरता से लेते हैं और मानते हैं कि उनके पास कोरोनोवायरस से लड़ने के लिए उपाय है तो हो सकता है कि वे खुद को और दूसरों को गंभीर खतरे में डाल रहे हैं।

हमें घेरती जा रही इस अज्ञानता के और भी अधिक भयावह और दीर्घकालिक प्रभाव हैं। आक्रामक शाकाहार-श्रेष्ठता के उन्माद में स्वनामधन्य ज्ञान उड़ेला जा रहा है: कोरोनावायरस की उत्पत्ति चीन के ‘मांस बाज़ार’ से हुई, जहां मारे गए जंगली जानवरों की विभिन्न प्रजातियां एक साथ होती हैं, जिससे वायरस एक प्रजाति से होते हुए दूसरी प्रजाति और अंतत: मनुष्य में आ गया। यह बात मांसाहार की कटु आलोचना के रूप में इस्तेमाल की जा रही है। मांस खाने वालों को दोष देते हुए कतिपय सभ्यता की श्रेष्ठता के दावे किए जा रहे हैं और सभ्यता के घोर अनुयायी मांग कर रहे हैं कि चीनी राष्ट्रपति कोरोनावायरस की प्रतिमा से क्षमा याचना करें कि उन्होंने मांस खाया। संक्रमित मटन बाज़ार दिखाने वाले वीडियो भावनाओं को और भड़का रहे हैं। इस प्रकार कोरोनावायरस मांस खाने वालों के खिलाफ प्रकृति का प्रतिशोध बन गया है। इससे भारत में मुर्गियों की कीमत बहुत कम हो गई है, और यह उद्योग आर्थिक संकट झेल रहा है।

सिर्फ अनुशंसित वेबसाइटों (जैसे डब्ल्यूएचओ) से जानकारी प्राप्त करने की सलाह और गुज़ारिश किसी भी तरह से लोगों को गलत सूचना मानने और आगे बढ़ाने से रोक नहीं रही है। हमें यह याद रखना चाहिए कि बहुत सी गलत सूचनाएं जानबूझकर बरगलाने के लिए प्रचारित की जाती हैं, अक्सर दक्षिणपंथी सांस्कृतिक लोगों द्वारा। जब तक हम इस सूचना की महामारी के “प्रसार की शृंखला” को नहीं तोड़ेंगे तब तक यह जारी रहेगी।

लिहाज़ा, डिजिटल मीडिया कई मायनों में उन मासूम लोगों के लिए एक उपहार है जो उनको बताई गई किसी भी बकवास पर, और उसे रचने वालों पर यकीन कर लेते हैं। फेसबुक से लेकर यूट्यूब तक के तमाम प्लोटफार्म, जिन पर कोई भी कुछ भी कह या लिख सकता है, वास्तव में इन्हें उपयोग करने वाले सर्वज्ञाताओें (चाहें नादान हों या किसी मत के) के लिए मुफ्त में उपलब्ध हथियार की तरह है जिसे किसी पर भी चलाया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि पहले के ज़माने में दुनिया में किसी तरह की मूर्खता नहीं थी लेकिन मूर्खता को सर्वव्यापी बनाने के साधन अनुपस्थित थे, जिससे किसी बेतुकेपन के निर्माण और प्रसार की गति सीमित थी।

बड़ी टेक कंपनियां गलत सूचना के प्रसार को रोकने की कोशिश कर रही हैं लेकिन इस बात की संभावना बहुत कम है कि वे खुद के बनाए गए विशालकाय जाल को नियंत्रित कर पाएंगी। आधुनिक तकनीक और दुनिया के असमीक्षात्मक, रूढ़िवादी सोच की जुगलबंदी हमें यह याद दिलाती है कि जो समाज अंधविश्वास को बढ़ावा देता है वह छद्म विज्ञान में लौट जाता है और तार्किकता को कम करता है। इस परिस्थिति का उपयोग सांस्कृतिक और राजनीतिक लड़ाई में हथियार के रूप में किया जाता है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोविड-19: कंटेनमेंट बनाम मेनेजमेंट – मिलिंद सोहोनी

कोविड-19 संकट से निपटने के लिए विभिन्न राष्ट्र अलग-अलग रणनीतियां बना रहे हैं। ये सभी रणनीतियां सम्बंधित राष्ट्र की क्षमता के अनुरूप तो हैं ही, साथ ही ये उनके समाज के विभिन्न तबकों के लिए लागत और अपेक्षित लाभ के प्रति चिंताओं को भी दर्शाती हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रचलित तरीका कंटेनमेंट और उन्मूलन का है।  

हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने भी कोविड-19 उन्मूलन की वकालत की है और इसके लिए व्यवहार परिवर्तन और कंटेनमेंट का मार्ग बताया है। हम भी लॉकडाउन और ‘हॉट-स्पॉट्स’ में आक्रामक पद्धति को जारी रखेंगे। ‘हॉट-स्पॉट्स’ यानी सघन संक्रमण के इलाके। हॉट-स्पॉट्स में संक्रमित लोगों के मिलने-जुलने के इतिहास पर नज़र रखना और पूरे इलाके पर नियंत्रण शामिल है। उद्देश्य सभी स्थानों से बीमारी को खत्म करना है। अभी रोगग्रस्त लोगों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। हम प्रार्थना करते हैं कि यह प्लान ‘ए’ काम कर जाए।   

उन्मूलन, कंटेनमेंट और प्लान बी

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कंटेनमेंट के लिए दिया जाने वाला तर्क दो तथ्यों पर निर्भर है, जो कई देशों के लिए सही है। पहला तथ्य यह है कि ये देश बेहतर प्रशासित हैं और इसलिए यहां बीमारी को खत्म करना एक विकल्प है। इन देशों के पास तकनीकी क्षमता और संस्थागत अनुभव है। दूसरा, रोगियों की संभावित संख्या और अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या लगभग बराबर है। लॉकडाउन संक्रमण को एक लंबी अवधि में बिखरा देता है और सभी रोगियों के लिए अस्पताल में देखभाल सुनिश्चित की जा सकती है। इस तरह से जोखिम का समाजीकरण हो जाएगा। इसके चलते कंटेनमेंट और उन्मूलन का मार्ग खुल जाता है। लेकिन इस बात के प्रमाण बढ़ते जा रहे हैं कि लक्षण-रहित रोगियों की संख्या लाक्षणिक रोगियों से काफी अधिक है। इस तथ्य ने कंटेनमेंट के आधार को ही कमज़ोर कर दिया है और कई देश अब सर्वथा अपारंपरिक कंटेनमेंट-उपरांत रणनीतियां बना रहे हैं।       

हमारे लिए, कंटेनमेंट, जिसके साथ लॉकडाउन अपरिहार्य है, की वजह से काफी आर्थिक और कल्याण सम्बंधी नुकसान हो रहा है, और साथ में उपरोक्त लाभ मिल नहीं रहे हैं। गरिमा, और रोज़गार की हानि, आर्थिक झटका और प्रवासियों पर मानसिक आघात जैसे नुकसान के रिपोर्टें बखूबी दर्ज हुई हैं।

यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि हमारी आक्रामक कंटेनमेंट रणनीति लागत-लाभ विश्लेषण पर आधारित है भी या नहीं। यदि कंटेनमेंट विफल हो गया है तो इन तरीकों को जारी रखने का कारण मुख्य रूप से प्रशासनिक है न कि चिकित्सकीय। फिर भी आज तक हमारे पास संक्रमण, इसके भूगोल और इसकी गतिशीलता से सम्बंधित अन्य बुनियादी सवालों के जवाब देने के लिए कोई अनुभवजन्य प्रणाली नहीं है। या तो हमारे वैज्ञानिक संस्थानों ने इस तरह का डैटा मांगा नहीं या फिर हमारे नौकरशाहों ने प्रदान नहीं किया। इस तरह के विश्लेषण और मार्गदर्शन के अभाव में राज्य अपनी-अपनी कंटेनमेंट और उन्मूलन की योजनाएं बना रहे हैं। राज्यों द्वारा अलग-अलग दिशाओं में कार्य करने से काफी लंबे समय तक राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के सभी स्तरों के वियोजित और अव्यवस्थित होने की संभावना है।

हमें स्थिति ‘बी’ पर विचार करना चाहिए कि कंटेनमेंट विफल हो गया है। इसका एक संकेत है कि नए-नए संक्रमित समूह उभरते जा रहे हैं। या शायद यह बीमारी पहले से ही लक्षण-रहित संक्रमित व्यक्तियों (वाहकों) के माध्यम से फैल चुकी है। दोनों ही स्थितियों में गांवों, कस्बों और शहरों की एक बड़ी आबादी के देर-सबेर संक्रमित होने की आशंका है। इस नए तथ्य और भविष्य में लंबी लड़ाई के प्रबंधन के लिए एक योजना की आवश्यकता है। दुर्भाग्य से, इस संभावित परिणाम की तैयारी के लिए हमारे पास ठोस जानकारी की काफी कमी है।

तो चलिए, एक ख्याली प्रयोग की मदद से हम एक संभावित प्लान ‘बी’ की तैयारी करते हैं। इसके लिए सबसे पहला काम तो भोजन और आवश्यक सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना होगा जो प्लान ‘ए’ में भी है। अगला काम प्रतिबंधों की एक समयबद्ध योजना और भूगोल निर्धारित करना है ताकि स्वास्थ्य के जोखिमों को न्यूनतम किया जा सके। और अंतिम कार्य यह होगा कि पूरी उथल-पुथल का अर्थव्यवस्था पर और लोगों के कल्याण, खास कर कमज़ोर वर्ग के लोगों पर हानिकारक प्रभाव कम से कम रहे। इसके लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्से कार्यशील रहें और वेतन अर्जित होता रहे। शुक्र है कि कम से कम ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए तो इसके बारे में सोचा गया है।              

स्वास्थ्य और कल्याण

यहां सिर्फ स्वास्थ्य और कल्याण पर ध्यान देते हैं। संक्रमण के प्रमुख संकेतक बहुत बुरे नहीं हैं। विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार भारत की कुल आबादी के 8 से 30 प्रतिशत के बीच संक्रमित होने की संभावना है जो कई महीनों में फैले चक्रों में हो सकता है। यह प्रतिशत किसी समाज में व्यक्ति-से-व्यक्ति संपर्क की दर पर निर्भर करता है। ऐसे में घनी शहरी आबादियों की अपेक्षा ग्रामीण समुदाय फायदे में है। लॉकडाउन यानी संपर्क दरों में अस्थायी कटौती की मदद से, संक्रमण को स्थगित किया जा सकता है, कुल संक्रमणों की संख्या को कम नहीं किया जा सकता। किसी-किसी मामले में अधिकतम संक्रमण वाला हिस्सा (शिखर) अधिक फैला हुआ नज़र आता है। अर्थात अधिकतम संक्रमण वाली स्थिति एक लंबी अवधि में फैली होती है। अधिकांश संक्रमण हल्के-फुल्के होते हैं, और एक अनुमान के मुताबिक मात्र लगभग 10-15 प्रतिशत संक्रमित लोगों को ही अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता होती है। यानी हमारी आबादी के लगभग 2 प्रतिशत लोगों को अस्पताल जाने की आवश्यकता हो सकती है। मृत्यु दर काफी कम रहने का अनुमान है – लगभग 5 प्रति 1000 जनसंख्या। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो डब्ल्यूएचओ के अनुसार वर्ष 2018 में टी.बी. के 20 लाख नए मामले सामने आए थे (1.3 प्रति 1000 जनसंख्या) और 4 लाख लोगों की मृत्यु हुई थी।        

ऐसा पहली बार हुआ है जब कोविड-19 के कारण भारत के शीर्ष 20 प्रतिशत को रुग्णता का सामना करना पड़ा जो निचले 80 प्रतिशत के लिए एक सामान्य बात है। इसके अलावा, इन दो वर्गों के जीवन के परस्पर सम्बंध और परस्पर विरोधी हितों को अभी भी पूरी तरह से समझा नहीं गया है। सबसे पहले तो इसके परिणामस्वरुप मलिन बस्तियों में लोगों की स्थिति तथा उनके कल्याण में यकायक रुचि पैदा हुई है और सामूहिक कार्यवाही के उपदेश दिए जा रहे हैं। अगली बात कि शीर्ष 20 प्रतिशत के लिए कंटेनमेंट और उन्मूलन सबसे पसंदीदा रणनीति है। यह रणनीति वैश्विक विचारों के अनुरूप है, यह टेक्नॉलॉजी-आधारित है और यह उन चिकित्सीय संसाधनों से मेल खाती है जो उस वर्ग की पहुंच में हैं। दूसरी ओर, निचले 80 प्रतिशत की प्राथमिक चिंता सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और बुनियादी कल्याणकारी कार्यक्रमों के माध्यम से रोग का प्रबंधन करना है। दुर्भाग्य से, रोग प्रबंधन और उसकी तैयारी पर उतना ध्यान नहीं दिया गया है जितना रोग के विज्ञान, प्रसार के अनुमान और परीक्षण के तामझाम पर दिया गया।         

मान लेते हैं कि हम संक्रमण के शिखर को लंबी अवधि में फैलाने में सफल हो जाते हैं, लेकिन फिर भी कोविड-19 मरीज़ों के लिए प्रति 1000 जनसंख्या पर 1 या 2 बिस्तरों की ज़रूरत होगी। यदि हम यह मानें कि अन्य मौजूदा बीमारियों के मरीज़ों के लिए प्रति 1000 जनसंख्या 1 बिस्तर की ज़रूरत होगी तो हमें कुल 2 से 3 बिस्तर प्रति 1000 जनसंख्या की ज़रूरत होगी। यानी पूरे भारत के लिए लगभग 30 लाख अस्पताली बिस्तरों की ज़रूरत होगी। विश्व बैंक का अनुमान है कि हमारे पास 0.7 से 1.0 के बीच बिस्तर उपलब्ध हैं, यानी पूरे देश में केवल 9-13 लाख बिस्तर हैं जो देखभाल के अलग-अलग स्तर के हैं। कागज़ों पर हमारे पास लगभग 10 लाख डॉक्टर और 17 लाख नर्सें हैं। लेकिन विभिन्न राज्यों में इनका वितरण असमान है और ये प्राय: शहरों में केंद्रित है। ऐसे में इन सुविधाओं तक पहुंच एवं परिवहन काफी महत्वपूर्ण होगा। वेंटीलेटर के अलावा शेष उपचार काफी सरल है। वेंटीलेटर का निर्माण अब नवाचार का विषय बन गया है जबकि भारत में कई दशकों से गरीब लोग निमोनिया से मरते रहे हैं।            

स्थानीयता

संक्षेप में, संभावना यह है कि 80 प्रतिशत मामलों में इलाज घर या गांव या मोहल्ले के भीतर ही किया जाएगा, जब तक कि बाहरी मदद की ज़रूरत न पड़ें। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे बहुत अधिक बीमार न हो जाएं। इसलिए परिवारों को सूचना, मार्गदर्शन और सहायता देने का काम बहुत महत्वपूर्ण है और इसके कई चरण हैं।

सबसे पहले क्षेत्र-अनुसार कोविड-19 दवाइयों और अन्य सामग्री (जैसे थर्मामीटर और मास्क) के पैकेट तथा देखभाल करने के निर्देश तैयार करना होगा। इसमें महत्वपूर्ण बिंदुओं और कार्यों को शामिल किया जाना चाहिए, जैसे रोगी को निकटतम अस्पताल तक ले जाना। इनमें से कुछ परिवार वैज्ञानिक शोघ हेतु डैटा भी दे सकते हैं।

इसके बाद हमें यह निर्णय लेना चाहिए गांव और वार्ड स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ता किस तरह की मदद प्रदान कर सकते हैं। इसके आधार पर ऑक्सीजन मापन उपकरण और अन्य सहायक उपकरणों के लिए उपयुक्त किट और प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा सकती है। इसमें संक्रमण के समय क्वारेंटाइन और सामुदायिक संसाधनों को साझा करने सम्बंधी दिशा-निर्देश भी शामिल होना चाहिए। उपकरणों, सुविधाओं और सामग्री के मामलों में ज़िला और उप-ज़िला अस्पतालों की तैयारियों का एक स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

अंत में, बिस्तरों और सुविधाओं की उपलब्धता पर लाइव अपडेट प्रदान किए जाने चाहिए। कई गंभीर रोगियों की मौत समय पर उपयुक्त अस्पताल न मिलने के कारण हुई है। स्थानीय स्तर पर इन जानकारियों या तैयारियों का एक सामान्य विश्लेषण अभी भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। जैसे, महाराष्ट्र में उच्च मृत्यु दर और केरल या पंजाब में कम मृत्यु दर, और स्वास्थ्य प्रबंधन के तौर-तरीकों का कोई विश्लेषण उपलब्ध नहीं है।   

इस सब में निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा निरीक्षण काफी महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही स्थानीय वैज्ञानिक और सामाजिक एजेंसियों और संस्थानों की सहायता और जुड़ाव काफी मददगार होगा। संकट की इस घड़ी में लंबे समय तक समन्वय, पेशेवर कौशल और संवेदना की आवश्यकता होगी। यह केवल इन्हीं वैज्ञानिक और सामाजिक एजेंसियों और संस्थाओं के पास उपलब्ध है। इस तरह की लामबंदी कई देशों में उपयोगी साबित हुई है। दुर्भाग्यवश, भारत में स्थानीय एजेंसियों की भूमिका को दोषपूर्ण विशेषज्ञ-शाही और उसके समर्थक राजनीतिक सिद्धांतों द्वारा बाधित कर दिया गया है।     

शहरी क्षेत्रों का प्रबंधन प्रशासनिक दुस्वप्न से कम नहीं है। अंधाधुंध लॉकडाउन से शायद अपेक्षित स्वास्थ्य सम्बंधी परिणाम न मिलें। कुछ लोगों के लिए तो शहरी चाल में रहने से बेहतर तो अपने ग्रामीण इलाकों में रहना होगा बशर्ते कि वे संक्रमण अपने साथ न ले जाएं। इसलिए नियंत्रित प्रवास की अनुमति देते हुए यातायात प्रतिबंधों में ढील देने पर विचार किया जाना चाहिए। सार्वजनिक परिवहन को नियंत्रित तरीके और नई सारणी के साथ शुरू किया जाना चाहिए। शहर, तालुका और गांवों को प्रवासियों के परीक्षण और क्वारेंटाइन सम्बंधी निर्देश दिए जाने चाहिए।      

ऐसे कई लोग होंगे जिनके पास भोजन, काम, पैसा या उचित कागज़ात तक नहीं हैं। पीडीएस और अन्य कल्याणकारी योजनाओं को संशोधित प्रक्रियाओं के तहत आवश्यक सामग्री वितरित करना चाहिए। गर्मी का मौसम नज़दीक है और ऐसे में पेयजल की समस्या शुरू हो जाएगी। संक्रमण को नियंत्रण में रखने के लिए इन मूलभूत सुविधाओं का सुचारु संचालन आवश्यक है। इसके लिए, सभी स्तरों पर आवश्यकतानुसार राज्य सरकार के कर्मचारियों को विभिन्न विभागों में तैनात किया जाना चाहिए और साथ ही इसमें ज़िम्मेदारी सौंपने सम्बंधी प्रोटोकॉल का पालन किया जाना चाहिए। हाल ही के वर्षों में सरकारी कर्मचारियों ने एक सुरक्षित जीवन व्यतीत किया है और अब उनके लिए एक आदर्श कार्य करके दिखाने का अवसर है।

प्लान बी की स्थिति

इस प्रकार, निचले 80 प्रतिशत लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए सुशासन, अनुमेयता और तैयारी काफी महत्वपूर्ण हैं। ये उतने ही मापन और विश्लेषण-योग्य हैं जितने रोग के मापदंड। लॉकडाउन सीमित उद्देश्य पूरे करते हैं, और वह भी केवल तब जब वे तैयारियों में सुधार की अवधि बनें। अन्यथा, इससे केवल वेतन तथा आजीविका में बाधा आएगी और अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी। ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि सभी सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों (कारखानों, दफ्तरों, संस्थानों, बस डिपो, बाज़ारों, रेस्तरां तथा होटल और सम्मेलनों में) में दीर्घकालिक रूप से संपर्क दर में कमी हो। शुक्र है कि इस तरह के दिशानिर्देश अब सामने आ रहे हैं। ये सभी दिशानिर्देश प्लान बी का निर्माण करते हैं। इसके बिना कई लोगों के अनिश्चित जीवन पर भयानक प्रभाव होंगे।       

लोगों को सामाजिक दूरी सीखना चाहिए, व्यवहार परिवर्तन को अपनाना चाहिए और समुदायों को बातचीत में एक नई शब्दावली अपनाना चाहिए। यह रोग इसी की मांग करता है। इसके साथ ही यह मांग करता है कि शासन उच्चतर स्तर का हो। इस नई सामान्य स्थिति को बनाने और बनाए रखने में हमारे वरिष्ठ नौकरशाह और वैज्ञानिक और उनका टीमवर्क निर्णायक कारक होगा। प्लान बी की सफलता इस सामाजिक समझ और हमारे नेताओं द्वारा प्रमुख विचारों को संप्रेषित करने की क्षमता तथा इस प्रणाली में विश्वास बनाए रखने पर निर्भर करती है।      

संक्षेप में प्लान बी, राज्य की तैयारियों के रूबरू व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर व्यवहार परिवर्तन का एक नपा-तुला प्रयोग है। यह स्वीकार करना होगा कि विभिन्न रणनीतियों के लिए लागत, लाभ और जोखिम अलग-अलग होते हैं और रोग की जनांकिकी और सुशासन को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसके अलावा, रोग की गतिशीलता स्वास्थ्य सम्बंधी उद्देश्यों, आर्थिक और सामाजिक व्यवधानों और समग्र कल्याण के बीच संतुलन की कई दिशाओं या कार्यक्रमों की अनुमति देती है। प्रत्येक देश को अपनी क्षमताओं और प्राथमिकताओं के आधार पर अपनी रणनीति तैयार करना चाहिए और हमें भी ऐसा ही करना चाहिए। ये सभी रणनीतियां ज़मीनी यथार्थ के अनुकूल होनी चाहिए अन्यथा अधिकांश कष्ट बेकार जाएंगे। अक्सर दक्षिण कोरिया या सिंगापुर की मिसाल दी जाती है, लेकिन हमारी स्थिति इंडोनेशिया या थाईलैंड या जर्मनी के संतुलित दृष्टिकोण के अधिक करीब है।      

नए युग के लिए सबक

अलबत्ता यहां सीखने के लिए और भी बहुत कुछ है। अब यहां एथ्रोपोसीन युग की दुर्बलता बिलकुल स्पष्ट है: हमारा वैश्विक समाज, विशाल विज्ञान पर उसकी निर्भरता और उस तक पहुंच में भारी असमानता। और भविष्य में हालात और बदतर हो सकते हैं। वैश्विक आर्थिक नेतृत्व तो अब वायरस द्वारा निर्मित जोखिम का प्रबंधन करने के लिए एक ‘पासपोर्ट’ प्रणाली का प्रस्ताव दे रहा है। इसमें राष्ट्रों के लिए पहला कदम होगा अपनी अर्थव्यवस्था के भीतर ‘सुरक्षित’ और ‘असुरक्षित’ क्षेत्रों का एक वर्गीकरण तैयार करना, जिससे ‘लौटने के लिए सुरक्षित’ श्रमिक एक सुरक्षित वातावरण में काम कर सकेंगे। कहा जा रहा है कि यह एक नई और सुरक्षित वैश्विक अर्थव्यवस्था के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगा। ‘सुरक्षित’ अर्थव्यवस्था में पदार्पण इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से व्यक्ति के संपर्कों का इतिहास खोजने, उन्नत परीक्षण तकनीकों और उच्च तकनीक वाले गैजेट्स पर आधारित हो सकता है। इनमें कई खामियां हैं और यह स्पष्ट नहीं है कि नई वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं इन लागतों को वहन कर पाएंगी या नहीं। लेकिन यह निश्चित रूप से श्रमिक वर्ग के लिए आर्थिक विकल्पों को सीमित कर देगा। राजनीतिक रूप से भी यह भारत सहित कई देशों को एक निगरानी-अधीन राज्य के करीब ले जाएगा।           

इस बात की पूरी संभावना है कि भारतीय अभिजात्य वर्ग इस प्रणाली में स्वयं तो शामिल होगा ही और हमें भी घसीट लेगा। इसके लिए भारत को अपनी मौजूदा प्रणाली को इसके अनुकूल ढालना होगा और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के भीतर इस वर्गीकरण को विकसित करना होगा। हमारे, औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को अपने खर्चे से शायद यह साबित करना पड़े कि वे नौकरी पाने के लिए ‘सुरक्षित’ हैं। यह तो जोखिमों के समाजीकरण के सर्वथा विपरीत है। निश्चित रूप से भारतीय अनौपचारिक अर्थव्यवस्था हमारी उच्च शिक्षा प्रणाली का प्रतिरूप है जिसमें हम यह चुनते हैं कि किस चीज़ का औपचारिक रूप से अध्ययन करेंगे और किसको अनदेखा कर देंगे। हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियां शायद अर्थव्यवस्था के निचले छोर पर और अधिक अनौपचारिकरण और विखंडन पैदा करेंगी।  

कोविड-19 संकट भारतीय वैज्ञानिक प्रतिष्ठान के लिए एक और चेतावनी है     

यह संकट याद दिलाता है कि आसपास के क्षेत्र की समस्याओं पर ध्यान देने और बुनियादी सेवाओं की वितरण प्रणालियों का निरीक्षण करने से भी विज्ञान के उद्देश्य की पूर्ति होती है। ये वास्तव में नई तकनीकों के, नवाचार के, अपने समाज को नए ढंग से संगठित करने और अपने हितों को पूरा करने के स्थल हैं। लेकिन इसके लिए विज्ञान करने के हमारे तरीकों में व्यापक परिवर्तन की ज़रूरत है। कई दशकों से हम नए टीकों और नई गाड़ियों का मुफ्त में लुत्फ उठा रहे हैं, यह जाने बिना कि इनके उत्पादन में किस तरह के अनुशासन, रचनात्मकता और सामाजिक समझ बूझ की आवश्यकता होती है। हम काफी लंबे समय से उधार के विज्ञान पर गुज़ारा कर रहे हैं, अब उधार की बीमारी का सामना करने की भी तैयारी कर लेनी चाहिए।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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युनिस फुट – जलवायु परिवर्तन पर समझ की जननी

ज जलवायु परिवर्तन और बढ़ते वैश्विक तापमान की समस्या और इसके कारणों से हम वाकिफ हैं और इसे नियंत्रित करने के प्रयास में लगे हैं। अब तक इस समस्या के कारण को समझने का श्रेय जॉन टिंडल को दिया जाता है। लेकिन युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के विज्ञान इतिहासकार जॉन पर्लिन का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की हमारी समझ की नींव रखने का श्रेय युनिस फुट को जाता है। फुट ने कार्बन डाईऑक्साइड के ऊष्मीय प्रभाव का अध्ययन किया था जो वर्ष 1856 में सूर्य की किरणों की ऊष्मा को प्रभावित करने वाली परिस्थितियां शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। जॉन टिंडल का कार्य तीन वर्ष बाद प्रकाशित हुआ था।

पर्लिन बताते हैं कि 1856 में न्यूयॉर्क में अमेरिकन एसोसिएशन फॉर एडवांसमेंट ऑफ साइन्स की 10वीं वार्षिक बैठक में फुट का पेपर प्रस्तुत किया गया था। तब महिलाओं को अपना काम प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं थी इसलिए उनके पेपर को एक अन्य वैज्ञानिक ने प्रस्तुत किया था। इसे बैठक की कार्यावाही में नहीं बल्कि अमेरिकन जर्नल ऑफ साइंस एंड आर्ट्स में एक लघु लेख के रूप में प्रकाशित किया गया था। अपने इस अध्ययन में उन्होंने नम और शुष्क वायु, और कार्बन डाईऑक्साइड, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैसों पर सूर्य के प्रकाश का प्रभाव देखा था। अध्ययन में फुट ने पाया कि सूर्य के प्रकाश का सर्वाधिक प्रभाव कार्बोनिक एसिड गैस पर होता है। उनके अनुसार वायुमंडल में मौजूद इस गैस के कारण हमारी पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हुई होगी।

इस बारे में 13 सितंबर के साइंटिफिक अमेरिकन के अंक में वैज्ञानिक महिलाएं संघनित गैसों के साथ प्रयोग शीर्षक से एक लेख भी प्रकाशित हुआ था। इसके एक साल बाद अगस्त 1857 में उन्होंने एक अन्य अध्ययन प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने वायु पर बदलते दाब, ताप और नमी के प्रभावों का अध्ययन किया और इसे वायुमंडलीय दाब और तापमान में होने वाले परिवर्तनों से जोड़ा।

उन्होंने कई आविष्कारों के पेटेंट के लिए आवेदन किए। अमेरिकी महिलाओं के मताधिकार और बंधुआ मज़दूरी के खिलाफ आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही।

फुट के काम के बारे में पता चलने के बाद एक महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि क्या लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूशन में काम कर रहे टिंडल अपने शोध प्रकाशन के समय फुट के काम से वाकिफ थे? पर्लिन का मत है कि टिंडल वाकिफ थे क्योंकि फुट के शोधपत्र की रिपोर्ट और सारांश कई युरोपीय पत्रिकाओं में पुन: प्रकाशित किए गए थे। रॉयल इंस्टीट्यूशन में अमेरिकन जर्नल ऑफ साइंस एंड आर्ट्स पत्रिका पहुंचती थी और नवंबर 1856 के जिस अंक में फुट का लेख प्रकाशित हुआ था, उसी में वर्णांधता पर टिंडल का भी एक लेख छपा था। दी फिलॉसॉफिकल मैगज़ीन में भी फुट का लेख प्रकाशित हुआ था, जिसके संपादक टिंडल थे। इसके अलावा, फुट के लेख का सार जर्मन भाषा में साल की महत्वपूर्ण खोज के संकलन के रूप में प्रकाशित हुआ था। टिंडल जर्मन भाषा के जानकार थे। पर्लिन का कहना है कि फुट को उनके काम का श्रेय ना मिलने की पहली वजह तो यह हो सकती है कि वे ये प्रयोग शौकिया तौर पर करती थीं; दूसरा, उस वक्त तक अंग्रेज़ अपने को अमरीकियों से श्रेष्ठ मानते थे; और तीसरा, कि वह एक महिला थीं। टिंडल खुद महिलाओं के मताधिकार के विरोधी थे और महिलाओं का बौद्धिक स्तर पुरुषों से कम मानते थे। बहरहाल, पर्लिन का मत है कि फुट को जलवायु परिवर्तन की समझ की जननी के रूप में जाना जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोविड-19 टीके के लिए मानव चुनौती अध्ययन

कोविड-19 से निपटने के लिए दुनिया भर में तरह-तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। और अब हाल ही में शोधकर्ता इससे निपटने के लिए मानव चुनौती अध्ययन करना चाहते हैं।

मानव चुनौती अध्ययन में किसी रोग के लिए दवा, टीके वगैरह की प्रभाविता जांचने के लिए जानबूझर कर लोगों को उस रोग से संक्रमित किया जाता है और फिर उन पर अध्ययन किया जाता है। इसलिए यह अध्ययन जोखिम पूर्ण हो सकता है, और साथ में लोगों की सुरक्षा और नैतिकता का सवाल भी पैदा करता है।

कई चिकित्सा समूह और कंपनिया कोरोनावायरस का टीका विकसित करने के प्रयास में लगी हुई हैं। इन प्रयासों में पहले तो हज़ारों स्वस्थ लोगों को या तो टीका या प्लेसिबो (छद्म-टीका) लगाया जाता है और फिर नज़र रखी जाती है कि इनमें से कौन से व्यक्ति संक्रमित हुए। लेकिन इस प्रक्रिया में काफी वक्त लगता है, इसलिए वेटलिस्ट ज़ीरो नामक अंगदान समूह के कार्यकारी निदेशक जोश मॉरिसन वन डे सूनर नामक मानव चुनौती अध्ययन करना चाहते हैं जिसमें वे स्वस्थ व युवा वालंटियर्स को जानबूझ कर कोविड-19 से संक्रमित कर टीके की कारगरता जांचना चाहते हैं। सैद्धांतिक रूप से मानव चुनौती परीक्षण में कम वक्त लगता है। गौरतलब है कि वन डे सूनर कोरोना वायरस के लिए टीका तैयार करने वाले किसी समूह, कंपनी या वित्तीय संस्थान से सम्बद्ध नहीं है।

मॉरिसन का कहना है कि हम अपने अध्ययन में अधिक से अधिक वालंटियर शामिल करना चाहते हैं। और अध्ययन में उन्हीं वालंटियर्स को शामिल किया जाएगा जो परीक्षण के लिए स्वस्थ होंगे। वैसे इस अध्ययन के लिए लगभग 1500 वालंटियर्स समाने आए हैं। जो लोग इस परीक्षण का हिस्सा बनने के लिए तैयार हैं वे युवा हैं और शहरी क्षेत्रों में रहते हैं, और कोरोनोवायरस महामारी से निपटने के लिए कुछ कर गुज़रने की ख्वाहिश रखते हैं। इनमें से कई लोगों का कहना है कि वे इस अध्ययन के जोखिमों से परिचित है लेकिन यदि इससे टीका जल्दी उपलब्ध हो सकता है तो वे इतना जोखिम उठा सकते हैं। वैसे इसके पहले भी इन्फ्लूएंज़ा और मलेरिया जैसी बीमारियों के लिए मानव चुनौती अध्ययन किए जा चुके हैं।

लंदन स्थित वेलकम की टीका कार्यक्रम प्रमुख चार्ली वेलेर का कहना है कि कोरोनावायरस के खिलाफ टीका विकसित करने के लिए मानव चुनौती परीक्षण की नैतिकता और क्रियांवयन पर चर्चा चल रही है। लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि मानव चुनौती परीक्षण से वास्तव में टीका जल्दी तैयार करने में मदद मिलेगी। बहरहाल शोधकर्ताओं को पहले यह निर्धारित करने की आवश्यकता है कि कैसे सुरक्षित तरीके से लोगों को वायरस से संक्रमित किया जाएगा, और कैसे और किस हद तक अध्ययन को नैतिक तरीके से किया जाएगा ताकि वालंटियर्स के स्वास्थ्य को कोई खतरा न हो।(स्रोत फीचर्स)

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क्या कोविड संक्रमण को रोक पाएगा प्लाज़्मा उपचार? – डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

तेज़ी से फैल रहे कोविड-19 संक्रमण को रोकने के लिए वैज्ञानिक उपाय खोजने में लगे हैं। हाल ही में भारत की शीर्ष संस्था आईसीएमआर ने कोविड-19 मरीज़ों के इलाज के लिए प्लाज़्मा उपचार के ट्रायल की अनुमति दी है। चीन में कोविड-19 संक्रमण से ठीक हुए रोगियों के रक्त में कोविड-19 के विरुद्ध एंटीबॉडीज़ से रोगियों का इलाज करने की संभावना देखी जा रही है। भारत में आईसीएमआर द्वारा विभिन्न संस्थाओं को क्लीनिकल ट्रायल्स प्रारंभ करने का आमंत्रण देने का कारण यह जानना है कि कोविड-19 संक्रमण के विरुद्ध बनी एंटीबॉडी रोगग्रस्त व्यक्तियों के इलाज में कितनी असरदार साबित होती हैं।

बैक्टीरिया, फफूंद, वायरस जैसे रोगाणुओं के लिए हमारा शरीर एक आदर्श आवास है। सर्दी या फ्लू के वायरस पर तो हमारा शरीर ज़्यादा ही मेहरबान प्रतीत होता है। जब रोगाणु हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं तो बी तथा टी प्रतिरक्षा कोशिकाएं उन्हें नष्ट करने में लग जाती हैं।

बी-प्रतिरक्षा कोशिकाएं रोगाणुओं पर उपस्थित एंटीजन से जुड़कर प्लाज़्मा कोशिकाओं का निर्माण करती है। प्लाज़्मा कोशिकाएं विभाजित होकर असंख्य प्लाज़्मा कोशिकाएं बनाती हैं जो तेज़ी से एंटीबॉडीज़ का निर्माण करने लगती है। चूंकि ये एंटीबॉडी खास रोगाणुओं के विरुद्ध बनती हैं इसलिए दूसरी बीमारी के रोगाणुओं के विरुद्ध कार्यवाही नहीं कर सकती है। जब शरीर में प्रतिरक्षा कोशिकाओं को एक अपरिचित एंटीजन का पता लगता है तो प्लाज़्मा कोशिकाओं को पर्याप्त रूप में एंटीबॉडी उत्पन्न करने में दो सप्ताह तक का समय लग सकता है। अत्यधिक मात्रा में निर्मित एंटीबॉडीज़ को रक्त रोगाणुओं के आगमन स्थानों पर पहुंचाता है जहां एंटीबॉडीज़ रोगाणुओं को बांधकर उन्हें अक्रिय कर देती हैं जिन्हें भक्षी कोशिकाएं खा जाती हैं।

एंटीबॉडीज़ एकत्रित के लिए पूरी तरह ठीक हो चुके व्यक्ति के शरीर से लगभग 800 मिलीलीटर रक्त निकाला जाता है और रक्त से प्लाज़्मा को अलग किया जाता है। प्लाज़्मा अलग होने के बाद लाल रक्त कोशिकाओं को सलाइन में मिलाकर वापस दानदाता के शरीर में डाल दिया जाता है। प्लाज़्मा में से खून का थक्का जमाने वाले प्रोटीन फाइब्रिनोजन को अलग कर सिरम प्राप्त किया जाता है। सिरम में केवल एंटीबॉडीज़ पाई जाती हैं। सिरम को अल्पकाल के लिए 40 डिग्री सेल्सियस पर तथा ज़्यादा समय तक संग्रहित करने के लिए कुछ रसायन मिलाकर -60 डिग्री सेल्सियस पर रखा जाता है। एक व्यक्ति से प्राप्त प्लाज़्मा में इतनी एंटीबॉडीज़ होती हैं कि 4 मरीज़ों का इलाज हो सकता है।

गंभीर संक्रमण से ग्रस्त रोगियों के प्लाज़्मा में अनेक प्रकार के सूजन पैदा करने वाले रसायन भी पाए जाते हैं जो फेफड़ों को गंभीर क्षति पहुंचा सकते हैं। ऐसी अवस्था में उनके प्लाज़्मा से अवांछित रसायनों को पृथक कर निकाल दिया जाता है। प्लाज़्मा उपचार का उपयोग केवल मध्यम या गंभीर संक्रमण वाले रोगियों पर किया जाता है।

कारगर टीके या इलाज के अभाव में कोविड-19 रोगियों के लिए प्लाज़्मा उपचार तकनीक लड़ाई में आशा की किरण है। चीन, दक्षिण कोरिया, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कई देशों में प्लाज़्मा उपचार पर प्रयोग चल रहे हैं और भारत भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहता।(स्रोत फीचर्स)

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वायरस का तोहफा है स्तनधारियों में गर्भधारण – कालू राम शर्मा

न दिनों कोरोनावायरस सुर्खियों में है। इसने लाखों लोगों को बीमार कर दिया है और ढाई लाख से ज़्यादा लोगों की जान ले ली है।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि वायरसों ने जीव जगत में सहयोग व सहकार की भूमिका भी अदा की है। और सहयोग व सहकार केवल थोड़े समय के लिए नहीं बल्कि हमेशा-हमेशा के लिए। उन्होंने जीवों में घुसपैठ कर उनकी कोशिकाओं में अपने जींस छोड़ दिए हैं जिनकी बदौलत उन प्रजातियों के विकास की दिशा बदल गई।

दिलचस्प बात है कि स्तनधारी अपने इस रूप में वायरस की बदौलत ही हैं। अगर वायरस स्तनधारियों में घुसपैठ न करते तो शायद हम इस रूप में न होते। आज के स्तनधारी जो अपने बच्चे को गर्भ में सहेजकर रखते हैं, वे तो हरगिज नहीं होते। गर्भधारण के लिए ज़रूरी गर्भनाल (प्लेसेंटा) वायरस की ही देन है। 

हम जानते हैं कि स्तनधारी समूह के एक बड़े वर्ग – चूहे, चमगादड़, व्हेल, हाथी, छछूंदर, कुत्ते, बिल्ली, भेड़, मवेशी, घोड़ा, कपि, बंदर व मनुष्य में गर्भनाल पाई जाती है। गर्भनाल मांसल, रस्सीनुमा संरचना है जिसका एक सिरा गर्भाशय से जुड़ा होता है और दूसरा बच्चे से।

गर्भनाल एक ऐसी व्यवस्था है जो गर्भ में पल रहे बच्चे को वहां एक नियत अवधि तक टिके रहने में अहम भूमिका अदा करती है। मनुष्य में बच्चा लगभग नौ माह तक मां के गर्भ में रहता है। इस दौरान उसे नियमित ऑक्सीजन व पोषण चाहिए जो गर्भनाल के ज़रिए ही मां से उपलब्ध होता है। गर्भनाल बच्चे के विकास को प्रेरित करती है। यह बच्चे को कई तरह के संक्रमण से भी बचाती है। यह दिलचस्प है कि जो बीमारी गर्भावस्था के दौरान मां को हो उससे गर्भ में पल रहा बच्चा सुरक्षित रहता है। गर्भनाल कई मायनों में बच्चे व मां के बीच एक अवरोध का भी काम करती है। और सबसे बड़ी बात तो यह है कि गर्भनाल की बदौलत ही मां का शरीर भ्रूण को पराया मानकर उस पर हमला नहीं करता।

सवाल यह है कि मादा स्तनधारी में अंडे के निषेचन के बाद गर्भनाल के निर्माण के लिए कौन-से जींस ज़िम्मेदार हैं? इस सवाल का जवाब वे वायरस देते हैं जिन्होंने सैकड़ों-लाखों साल पहले स्तनधारियों के पूर्वजों को संक्रमित किया था। उन वायरसों ने संक्रमित जंतुओं को परेशान नहीं किया बल्कि उनके शरीर में जाकर बैठ गए। मज़े की बात यह है कि वायरस मेज़बान की कोशिका के जीनोम का हिस्सा बन गए व मेज़बान ने उनका फायदा उठाया।

बात 6.5 करोड़ बरस पहले की है। एक छोटा, मुलायम, छछूंदर जैसा निशाचर जीव था। यह आधुनिक स्तनधारी जैसा ही दिखता था। अलबत्ता, उसमें गर्भनाल नहीं थी। आधुनिक स्तनधारियों की गर्भनाल उस छछूंदर के साथ एक रेट्रोवायरस की मुठभेड़ का नतीजा है।

वायरस की खासियत होती है कि यह किसी सजीव कोशिका में पहुंचकर उसके केंद्रक में अपना न्यूक्लिक अम्ल डाल देता है। वायरस का न्यूक्लिक अम्ल मेज़बान कोशिका के न्यूक्लिक अम्ल को निष्क्रिय कर देता है और खुद कोशिका पर नियंत्रण कर लेता है। अब उस सजीव की कोशिका पर वायरस की ही सल्तनत होती है। वायरस उस कोशिका में अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगता है।

रेट्रोवायरस एक प्रकार के वायरस हैं जो आरएनए को आनुवंशिक सामग्री के रूप में इस्तेमाल करते हैं। कोशिका को संक्रमित करने के बाद रेट्रोवायरस अपने आरएनए को डीएनए में बदलने के लिए रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज़ नामक एंज़ाइम का इस्तेमाल करते हैं। रेट्रोवायरस तब अपने वायरल डीएनए को मेज़बान कोशिका के डीएनए में एकीकृत करता है। एड्स वायरस रेट्रोवायरस ही है।

आज के स्तनधारियों के पूर्वज के शुक्राणु या अंडाणुओं में वायरस के जींस पहुंच गए और फिर हर पीढ़ी में पहुंचने में कामयाब हो गए। इस तरह से वायरस पूरी तरह से मेज़बान के जीनोम का हिस्सा बन गए। जीनोम अध्ययन से पता चलता है कि मानव के जीनोम में वायरस के लगभग 1 लाख ज्ञात अंश हैं जो हमारे कुल डीएनए का आठ फीसदी से अधिक है। यानी हम आठ फीसदी वायरस से बने हुए हैं।

जब कोई वायरस अपने जीनोम को मेज़बान के साथ एकीकृत करता है तो नए संकर जीनोम बनते हैं तथा वह कोशिका मर जाती है। लेकिन कभी-कभी कुछ दुर्लभ घटना घट सकती है। मसलन शुक्राणु या अंडाणु अगर वायरस से संक्रमित होकर निषेचित हो जाए तो अगली पीढ़ियों की संतानों में वायरल जीनोम की एक प्रति होगी। इसे वैज्ञानिक अंतर्जात रेट्रोवायरस कहते हैं।

प्रारंभिक स्तनधारियों में वायरस के उन कबाड़ में पड़े हुए जींस का इस्तेमाल गर्भनाल बनाने में किया जाने लगा जो आज भी जारी है। सिंसिटिन जो कि रेट्रोवायरस के जीनोम का हिस्सा था वह लाखों बरस पहले स्तनधारी के पूर्वजों में घुसपैठ कर चुका है। यह स्तनधारियों में गर्भधारण के लिए बेहद अहम है। मूल रूप से सिंसिटिन नामक प्रोटीन वायरस को मेज़बान कोशिका के साथ जुड़ने में मदद करता है। सामान्य हालात में वायरस के संक्रमण की स्थिति में सिंसिटिन का संश्लेषण मेज़बान की जीन मशीनरी के माध्यम से होता है और ये एक कोशिका से दूसरी में स्थानांतरित होते रहते हैं। बेशक, सिंसिटिन प्राचीन वायरस की देन है जो गर्भावस्था के दौरान गर्भनाल की कोशिकाओं में प्रकट होता है। सिंसिटिन बनाने वाली कोशिकाएं केवल वहीं होती है जहां गर्भनाल से गर्भाशय का संपर्क बनता है। ये एकल कोशिकीय परत बनाने के लिए एक साथ जुड़ती हैं व भ्रूण अपनी मां से इसके ज़रिए आवश्यक पोषण प्राप्त करता है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि इस जुड़ाव के लिए सिंसिटिन का बनना अनिवार्य है। सिंसिटिन का जीन तो वायरस में ही पाया जाता है।

यह दिलचस्प है कि सिंसिटिन प्रोटीन का जीन विकासक्रम में स्तनधारियों के जीनोम में बना रहा। सिंसिटिन तब प्रकट होता है जब कोई पराई चीज़ आक्रमण करे। स्वाभाविक है कि अंडाणु को निषेचित करने वाला नर का शुक्राणु मादा के लिए पराया होता है। जब निषेचित अंडा गर्भाशय में आता है, तब सिंसिटिन प्रोटीन का निर्माण गर्भाशय की कोशिकाएं करती है व भ्रूण को गर्भाशय की दीवार से चिपकने का रास्ता आसान बनाती है।

स्तनधारियों में सिंसिटिन का निर्माण करने वाले जीन आम तौर पर सुप्तावस्था में पड़े रहते हैं। जब गर्भधारण की स्थिति बनती है तब ये जागते हैं और सिंसिटिन के निर्माण का सिलसिला शुरू होता है। प्लेसेंटा में सिंसिटिन का निर्माण करने वाली कोशिकाएं होती हैं। सिंसिटिन नामक यह पदार्थ प्लेसेंटा व मातृ-कोशिका के बीच सीमाओं को निर्धारित करता है। अंड कोशिका के निषेचन के लगभग एक सप्ताह बाद भ्रूण गोल खोखली गेंदनुमा रचना (ब्लास्टोसिस्ट) में विकसित हो जाता है व गर्भाशय में रोपित होकर गर्भनाल के निर्माण को उकसाता है। यही गर्भनाल भ्रूण को ऑक्सीजन और पोषण उपलब्ध कराती है। ब्लोस्टोसिस्ट की बाहरी परत की कोशिकाएं गर्भनाल की बाहरी परत का निर्माण करती है और गर्भाशय से जो सीधे संपर्क में कोशिकाएं होती हैं वे सिंसिटिन का निर्माण करती है।

कोशिकाओं में कबाड़ के रूप में पड़े डीएनए में ज़्यादातर हिस्सा सहजीवी वायरस का है। मनुष्यों के हालिया विकास में अंतर्जात रेट्रोवायरस की भूमिका का खुलासा करने वाले नए अध्ययनों से पता चलता है कि डीएनए के ये टुकड़े मानव और वायरस के बीच की सीमा को धुंधला करते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए, तो मनुष्य आंशिक रूप वायरस ही हैं।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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शरीर में कोरोनावायरस का उपद्रव

चिकित्सक जोशुआ डेन्सन ने आईसीयू के रोगियों में विचित्र समानता देखी। इनमें से कई रोगी श्वसन सम्बंधी परेशानी का सामना कर रहे थे और कुछ के गुर्दे तेज़ी से खराब हो रहे थे। इस दौरान जोशुआ की टीम एक युवा महिला को बचाने में भी असफल रही थी जिसके ह्रदय ने काम करना बंद कर दिया था। यह काफी आश्चर्य की बात थी कि ये सभी रोगी कोविड पॉज़िटिव थे।

अब तक विश्व भर में कोविड-19 के 25 लाख से अधिक मामले सामने आ चुके हैं और 2.5 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है। चिकित्सक और रोग विज्ञानी इस नए कोरोनावायरस द्वारा शरीर पर होने वाले नुकसान को समझने में लगे हैं। हालांकि इस बात से तो वे अवगत हैं कि इसकी शुरुआत फेफड़ों से होती है लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है कि इसकी पहुंच ह्रदय, रक्त वाहिकाओं, गुर्दों, आंत और मस्तिष्क सहित कई अंगों तक हो सकती है।          

वायरस के इस प्रभाव को समझकर चिकित्सक कुछ लोगों का सही दिशा में इलाज कर सकते हैं। क्या हाल ही में देखी गई रक्त के थक्के बनने की प्रवृत्ति कुछ हल्के मामलों को जानलेवा बना सकती है? क्या मज़बूत प्रतिरक्षा प्रक्रिया सबसे खराब मामलों के लिए ज़िम्मेदार है, क्या प्रतिरक्षा को कम करके फायदा होगा? क्या ऑक्सीजन की कम मात्रा इसके लिए ज़िम्मेदार है? ऐसा क्या है जो यह वायरस पूरे शरीर की कोशिकाओं पर हमला करके विशेष रूप से 5 प्रतिशत रोगियों को गंभीर रूप से बीमार कर देता है। इस विषय में 1000 से अधिक पेपर प्रकाशित होने के बाद भी कोई स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं है।

संक्रमित व्यक्ति छींकने पर वायरस की फुहार हवा में छोड़ता है और अन्य व्यक्ति की सांस के साथ वे नाक और गले में प्रवेश करते हैं जहां इस वायरस को पनपने के लिए एक अनुकूल माहौल मिलता है। श्वसन मार्ग में उपस्थित कोशिकाओं में ACE-2 ग्राही होते हैं। जो वायरस को कोशिका में घुसने में मदद करते हैं। वैसे तो ACE-2 शरीर में रक्तचाप को नियमित करता है लेकिन साथ ही इसकी उपस्थिति उन ऊतकों को चिन्हित करती है जो वायरस की घुसपैठ के प्रति कमज़ोर हैं। अंदर घुसकर वायरस कोशिका को वश में करके अपनी प्रतिलिपियां बनाकर अन्य कोशिकाओं में घुसने को तैयार हो जाता है। 

जैसे-जैसे वायरस की संख्या बढ़ती है, संक्रमित व्यक्ति काफी मात्रा में वायरस छोड़ता है। इस दौरान रोग के लक्षण नहीं होते या बुखार, सूखी खांसी, गले में खराश, गंध और स्वाद का खत्म होना, सिरदर्द और बदनदर्द जैसे लक्षण हो सकते हैं।

इस दौरान यदि प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस पर काबू नहीं पाती है तो यह श्वसन मार्ग से बढ़कर फेफड़ों तक पहुंच जाता है जहां यह जानलेवा हो सकता है। फेफड़ों में प्रत्येक कोशिका की सतह पर भी ACE-2 ग्राही पाए जाते हैं।               

आम तौर पर ऑक्सीजन फेफड़ों की कोशिकाओं की परत को पार करके रक्त वाहिकाओं में और फिर पूरे शरीर में पहुंचती है। लेकिन प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा इस वायरस से लड़ते हुए ऑक्सीजन का यह स्वस्थ स्थानांतरण बाधित हो जाता है। ऐसे में श्वेत रक्त कोशिकाएं केमोकाइन्स नामक अणु छोड़ती हैं जो फिर और अधिक प्रतिरक्षी कोशिकाओं को वहां आकर्षित करता है ताकि वायरस से संक्रमित कोशिकाओं को खत्म किया जा सके। इस प्रक्रिया में मवाद बनता है जो निमोनिया का कारण बनता है। कुछ रोगी केवल ऑक्सीजन की सहायता से ठीक हो जाते हैं।    

लेकिन कई अन्य लोगों में यह गंभीर रूप ले लेती है। ऐसे में रक्त नलिकाओं में ऑक्सीजन का स्तर अचानक से गिरने लगता है और सांस लेने में परेशानी होने लगती है। आम तौर पर ऐसे रोगियों को वेंटीलेटर की ज़रूरत पड़ती है और कई तो ऐसी स्थिति में पहुंचकर दम तोड़ देते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पसीना – नैदानिक उपकरण और विद्युत स्रोत – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

पुराने समय में जब घर में कोई बीमार पड़ता था तो उसका इलाज करने के लिए पारिवारिक चिकित्सक को घर बुलाया जाता था। चिकित्सक सबसे पहले मरीज़ के चेहरे, कनपटी और छाती की त्वचा छूकर देखते थे। यह उन्हें जल्दी बीमारी पता लगाने में मदद करता था। त्वचा छूने पर यदि सामान्य से अधिक गर्म लगती है तो मरीज़ को बुखार है; यदि त्वचा का रंग सामान्य से अधिक फीका है, तो मरीज़ को डिहाइड्रशेन (पानी की कमी) है और उसे अधिक पानी पीने की आवश्यकता है; अगर त्वचा नीली पड़ गई है तो मरीज़ को अधिक ऑक्सीजन की ज़रूरत है; और अगर त्वचा गीली लगती है तो मरीज़ को व्यायाम या शारीरिक श्रम कम करने की ज़रूरत है। फिर वे मरीज़ को उपयुक्त औषधि के रूप में गोलियां, घुटी या इंजेक्शन देते थे।

इसके विपरीत, अब हम मरीज़ को दिखाने के लिए डॉक्टर के क्लीनिक जाते हैं, जहां रोग का पता लगाने के लिए वे मरीज़ को नैदानिक केंद्र (पैथॉलॉजी) भेजते हैं और उसकी रिपोर्ट के आधार पर दवा देते हैं। त्वचा देख-छूकर रोग का पता करना अब बीते ज़माने की बात हो गई है।

वैसे इस समय त्वचा विशेषज्ञ एक दिलचस्प तरीके का उपयोग कर रहे हैं। इस तरीके में वे एक महीन बहुलक-आधारित पट्टी में वांछित औषधि डालते हैं जिसे मरीज़ की बांह या छाती की त्वचा पर चिपका दिया जाता है। फिर इस पट्टी में बहुत हल्का विद्युत प्रवाह किया जाता है, और पसीने के माध्यम से दवा सीधे शरीर में चली जाती है। इस प्रकार यह पहनी जा सकने वाली व्यक्तिगत चिकित्सा तकनीक है जिसमें गोलियां या औषधि नहीं खानी पड़ती। माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक और जैव-संगत पोलीमर के आने से आज हमारे पास “इलेक्ट्रॉनिक त्वचा” (ई-त्वचा) है, नैनोवायर की मदद से इसे त्वचा पर जोड़ा जा सकता है और माइक्रो बैटरी की मदद से इसमें विद्युत प्रवाहित की जा सकती है।

पसीने की भूमिका

गौर करेंगे तो देखेंगे कि इसमें हमारे शरीर के सक्रिय तरल यानी पसीने को नज़रअंदाज कर दिया गया है या इसे महज एक अक्रिय वाहक के रूप में देखा जा रहा है जिसकी कोई अन्य भूमिका नहीं है। यह हाल ही में हुआ है कि हमारे शरीर में पसीने की भूमिका और इसमें मौजूद रसायनों के बारे में हमारी समझ और इसका इस्तेमाल बढ़ा है। पसीना हमारी पूरी त्वचा में वितरित तीन प्रकार की ग्रंथियों से निकलता है। ये ग्रंथियां पानी और कई अन्य पदार्थों को स्रावित करके हमारे शरीर के तापमान को 37 डिग्री सेल्सियस (या 98.4 डिग्री फैरनहाइट) बनाए रखने में मदद करती हैं। हमारे मस्तिष्क में तापमान-संवेदी तंत्रिकाएं (न्यूरॉन्स) होती हैं, जो शरीर के तापमान और चयापचय गतिविधि का आकलन करके पसीना स्रावित करने वाली ग्रंथियों को नियंत्रित करती हैं। इस तरह पसीना हमारे शरीर के तापमान को नियंत्रित रखता है।

पसीने में क्या होता है? यह 99 प्रतिशत पानी होता है जिसमें सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम और क्लोराइड आयन, अमोनियम आयन, यूरिया, लैक्टिक एसिड, ग्लूकोज़ जैसे अन्य पदार्थ होते हैं। किसी मरीज़ के पसीने में मौजूद पदार्थों के विश्लेषण और इसकी तुलना एक सामान्य व्यक्ति के पसीने करें, तो पसीना एक नैदानिक तरल हो सकता है (ठीक उसी तरह जिस तरह शरीर के अन्य तरल पदार्थ होते हैं)। जैसे, सिस्टिक फाइब्रोसिस बीमारी में मरीज़ के पसीने में सोडियम और क्लोराइड आयनों का अनुपात और सामान्य व्यक्ति के पसीने में सोडियम और क्लोराइड आयनों का अनुपात अलग-अलग होता है। इसी तरह डायबिटीज़ के रोगी के पसीने में ग्लूकोज़ की मात्रा सामान्य व्यक्ति से अधिक होती है। लेकिन इन नैदानिक तरीकों में समस्या पसीने की मात्रा की है।

त्वचा आधारित निदान

यहां आधुनिक तकनीक का महत्व सामने आता है। अब माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक और ई-त्वचा पट्टी दोनों उपलब्ध हैं। वैज्ञानिक इनका उपयोग पट्टी में लगे उपयुक्त संवेदियों की मदद से, पसीना निकलने के वक्त ही उसमें मौजूद में कुछ चुनिंदा पदार्थों की मात्रा का पता लगाने में कर रहे हैं। लेकिन क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम ई-त्वचा पट्टी पर एक की बजाए कई पदार्थों की जांच के लिए सेंसर लगाकर, एक साथ कई जांच कर पाएं?

इस बारे में कैलिफोर्निया के जीव विज्ञानी, भौतिक विज्ञानी, कंप्यूटर विशेषज्ञ और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों द्वारा एक महत्वपूर्ण अध्ययन 2016 में नेचर पत्रिका प्रकाशित हुआ था। इसमें उन्होंने ई-त्वचा पट्टी पर एक नहीं बल्कि छह सेंसर जोड़े थे जो सोडियम, पोटेशियम, क्लोराइड आयन, लैक्टेट और ग्लूकोज़ की मात्रा और पसीने का तापमान पता करते हैं। ये सेंसर इस तरह लगाए गए थे कि सेंसर और त्वचा के बीच हमेशा संपर्क बना रहे। प्रत्येक सेंसर से आने वाले विद्युत संकेतों को डिजिटल संकेतों में परिवर्तित किया जाता है और माइक्रो-नियंत्रक को भेजा जाता है। इन संकेतों को ब्लूटूथ की मदद से मोबाइल फोन या अन्य स्क्रीन पर पढ़ा जा सकता है, या एसएमएस, ईमेल के ज़रिए किसी को भेजा जा सकता है या क्लाउड इंटरफेस पर अपलोड भी किया जा सकता है।

2017 में इन्हीं शोधकर्ताओं ने प्रोसिडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में एक और पेपर प्रकाशित किया था। चूंकि एक जगह स्थिर रहने वाले (या गतिहीन) लोगों में प्राकृतिक रूप से पसीना बहुत कम निकलता है इसलिए शोधकर्ताओं ने आयनटोफोरेसिस नामक तरीके का उपयोग किया। इसमें वांछित स्थान को पसीना स्रावित करने के लिए उत्तेजित किया जा सकता है और पर्याप्त मात्रा में पसीना प्राप्त किया जा सकता है। फिर किसी सामान्य व्यक्ति और सिस्टिक फाइब्रोसिस वाले व्यक्तियों में सम्बंधित पदार्थों का विश्लेषण किया और पसीने में ग्लूकोज के स्तर को भी देखा। जांच के लिए प्रयुक्त शीट उनके द्वारा पूर्व में उपयोग की गई एकीकृत शीट जैसी थी। अध्ययन में उन्होंने पाया कि एक सामान्य व्यक्ति में प्रति लीटर 26.7 मिली मोल सोडियम आयन और 21.2 मिली मोल क्लोराइड आयन होते हैं (ध्यान दें कि यहां सोडियम आयन का स्तर क्लोराइड आयन के स्तर से अधिक है), जबकि सिस्टिक फाइब्रोसिस के रोगी में सोडियम आयन का स्तर 2.3 मिली मोल और क्लोराइड आयन का स्तर 95.7 मिली मोल था (जो सोडियम आयन की अपेक्षा कहीं अधिक है)। ध्यान रहे कि सिस्टिक फाइब्रोसिस विशेषज्ञों द्वारा किए जाने वाली सामान्य जांच में भी यही नतीजे मिलते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि उपवास के दौरान ग्लूकोज़ पीने पर पसीने और रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है।

गौरतलब है कि इन सब परीक्षणों में, प्रोब और सेंसरों को संचालित करने के लिए माइक्रोबैटरी की मदद से विद्युत प्रवाहित करने की आवश्यकता पड़ती है। यदि इन ई-त्वचा का रोबोटिक्स और अन्य उपकरणों में उपयोग करना है, तो क्या हम इन बैटरियों से निजात पा सकते हैं, और पसीने में मौजूद पदार्थों का उपयोग विद्युत उत्पन्न करने वाले जैव र्इंधन के रूप में कर सकते है?

कुछ दिनों पहले साइंस रोबोटिक्स में प्रकाशित शोध इसी सवाल का जवाब देता है। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने लोगों की ई-त्वचा पट्टी पर लॉक्स एंज़ाइम जोड़ा। यह लॉक्स एंज़ाइम पसीने में मौजूद लैक्टेट के साथ क्रिया करता है और इसे एक बायोएनोड (जैविक धनाग्र) पर पायरुवेट में ऑक्सीकृत कर देता है, और एक बायोकेथोड (जैविक ऋणाग्र) पर ऑक्सीजन को पानी में अवकृत कर देता है। इस प्रकार उत्पन्न विद्युत ऊर्जा, बिना किसी बाहरी स्रोत के, ई-त्वचा पट्टी को संचालित करने के लिए पर्याप्त होती है – क्या शानदार तरीका है!

और अंत में, कोविड-19 संक्रमण के दिनों में यह जानना लाभप्रद है कि पसीने में कोई भी रोगजनक (बैक्टीरिया या वायरस) नहीं होता; इसके उलट इसमें एक कीटाणु-नाशक प्रोटीन होता है जिसे डर्मसीडिन कहते हैं। हो सकता है कि डर्मसीडिन या इसका संशोधित रूप एंटी-वायरस की तरह काम कर जाए।(स्रोत फीचर्स)

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शरीर में कोरोनावायरस की जटिल यात्रा पर एक नज़र

चीन में नए कोरोनावायरस के शुरुआती मामलों के आधार पर डॉक्टरों को पता था कि यह वायरस फेफड़ों पर हमला करता है। लेकिन हाल ही में गंभीर लक्षण वाले ऐसे रोगियों के मामले सामने आए हैं जहां गुर्दे और ह्रदय जैसे अन्य अंगों को भी क्षति पहुंची है।

स्टेटन आइलैंड स्थित कोरोनावायरस उपचार अस्पताल के सह-निदेशक डॉ. एरिक सियो-पेना के अनुसार किसी रोगी में कमज़ोर प्रतिरक्षा के कारण जब फेफड़ों पर इस वायरस का अत्यधिक दबाव बनता है तो यह शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने लगता है। कोरोनावायरस सांस नली के माध्यम से फेफड़ों तक और फिर शरीर में पहुंचता है। यह श्वसन कोशिकाओं की सतह पर पाए जाने वाले एंज़ाइम से जुड़कर किसी व्यक्ति को संक्रमित करता है। शरीर में पहुंचने के बाद यह रक्तप्रवाह में मिलकर शरीर के अन्य अंगों तक पहुंचकर उन्हें क्षति पहुंचाने लगता है।             

कोविड-19 के गंभीर रोगियों के इलाज के दौरान उनके ह्रदय की मांसपेशियों में संक्रमण पाया गया। जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन कार्डियोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार वुहान में हर 5 कोविड-19 ग्रस्त रोगियों में से 1 में ह्रदय क्षति के प्रमाण सामने आए हैं।

ह्रदय और फेफड़ों की सतह पर उपस्थित ACE2 नामक प्रोटीन इस वायरस को कोशिकाओं में प्रवेश करने में मदद करता है। इसी तरह का एंज़ाइम अन्य अंगों जैसे आहार नाल में भी होता है। यानी यह वायरस अन्य अंगों पर भी ह्रदय और फेफड़ों के समान हमला कर सकता है। एरिक के अनुसार जिन रोगियों में श्वसन सम्बंधी लक्षण नहीं पाए जाते उनमें इसके लक्षण आहार नाल में मिलने की संभावना होती है।

इसके अलावा, कुछ सामान्य मामलों में लीवर में एंज़ाइम का उच्च स्तर भी इस वायरस की घुसपैठ का द्योतक हो सकता है। जब लीवर की कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं तो ये एंज़ाइम रक्तप्रवाह में मिल जाते हैं। अच्छी बात है कि लीवर खुद को पुनर्निर्मित कर सकता है इसलिए इसमें वायरस के कारण कोई दीर्घकालिक क्षति नहीं होती है।          

वैसे वायरस द्वारा किसी अंग को प्रत्यक्ष क्षति पहुंचने के अलावा व्यक्ति का प्रतिरक्षा तंत्र भी क्षति के लिए ज़िम्मेदार होता है। इस स्थिति में प्रतिरक्षा कोशिकाओं का एक झुंड, जिसे सायटोकाइन तूफान कहते हैं, रक्तप्रवाह में जारी होता है और पूरे शरीर के स्वस्थ ऊतकों को नष्ट करने लगता है। ऐसे में फेफड़ों को गंभीर क्षति पहुंचती है और कई अंगों के खराब होने का खतरा रहता है। कुछ कोविड-19 रोगियों के मस्तिष्क को भी सायटोकाइन तूफान ने प्रभावित किया है। इसके अलावा कई अन्य लक्षणों में गंध और स्वाद संवेदना का नष्ट होना भी देखा गया।

वैसे एरिक के अनुसार सिर्फ अत्यधिक गंभीर मामलों में ही स्थायी नुकसान की संभावना होती है। अपने काम के दौरान उनके सामने कई ऐसे मामले आए हैं जिनमें रोगी पूरी तरह से ठीक भी हुए हैं। विशेष रूप से लीवर और गुर्दे कुछ समय के लिए अपना काम बंद करने के बाद वापस सामान्य स्थिति में आ सकते हैं। लगभग इसी तरह का प्रभाव निमोनिया के दौरान फेफड़ों में भी देखा गया है।

यह तो अभी तक मालूम नहीं है कि वायरस से उबरने वाले लोगों ने कितनी प्रतिरक्षा विकसित की है लेकिन वे पूर्ण प्रतिरक्षा विकसित नहीं भी करते हैं तो भी संक्रमण से बचे रहने का मतलब यह होगा कि अगली बार यदि संक्रमण होता है तो कई अंगों पर पड़ने वाला प्रभाव कम होगा।(स्रोत फीचर्स)

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क्या कोविड-19 के विरुद्ध झुंड प्रतिरक्षा संभव है? – डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

दुनिया भर में तेज़ी से फैलते कोविड-19 के कारण हम सब घरों में कैद होकर रह गए हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण के प्रारंभ में यूनाइटेड किंगडम ने लोगों के एकत्रित होने पर रोक तथा कठोर सोशल डिस्टेंसिंग लागू नहीं किया था। यद्यपि चिकित्सा समुदाय के अनेक लोग रोक न लगाने से आश्चर्यचकित थे, फिर भी अधिकारियों की योजना पूरी तरह बंद की बजाय क्रमिक प्रतिबंधों के माध्यम से वायरस को दबाने की थी। प्रयास था कि प्राकृतिक तरीके से झुंड प्रतिरक्षा विकसित की जाए। झुंड प्रतिरक्षा को सामुदायिक प्रतिरक्षा भी कहते हैं क्योंकि इस में पूरे समुदाय में प्रतिरक्षा क्षमता विकसित होती है।

क्या है झुंड प्रतिरक्षा?

झुंड प्रतिरक्षा तब होती है जब एक समुदाय के अनेक लोग एक संक्रमणकारी बीमारी के प्रतिरोधी हो जाते हैं जिसके कारण रोग फैलने से रुक जाता है। झुंड प्रतिरक्षा दो प्रकार से प्राप्त हो सकती है – प्रथम, जब समुदाय के अनेक व्यक्ति बीमारी से संक्रमित हो जाते हैं और कुछ समय में प्रतिरक्षा तंत्र बगैर किसी दवाई या वैक्सीन के बीमारी को हराकर व्यक्ति को ठीक कर देता है।

झुंड प्रतिरक्षा प्राप्त करने का दूसरा तरीका है टीकाकरण यानी वैक्सिनेशन। इस तरीके में रोगजनक परजीवी को प्रयोगशाला में रसायनों या अन्य तरीकों से इतना कमज़ोर कर दिया जाता है कि वह प्रजनन और रोग उत्पन्न करने में असमर्थ हो जाता है। फिर उसे पोषक के शरीर में डाला जाता है। परजीवी के रसायन (प्रोटीन) पोषक के शरीर में प्रतिरक्षा तंत्र को एंटीबॉडी बनाने के लिए उत्तेजित तो करते हैं पर बीमार नहीं कर पाते। इस प्रकार शरीर परजीवी से लड़ने के तरीके विकसित कर लेता है और बीमार भी नहीं होता है। कुछ प्रकार के वैक्सीन में बीमारी के बेहद हल्के लक्षण (जैसे बुखार वगैरह) दिख सकते हैं। जब जनसंख्या के बड़े भाग में वैक्सिनेशन हो जाता है तो बीमारी पूर्ण रूप से खत्म हो जाती है क्योंकि परजीवी को कोई संवेदी पोषक नहीं मिलता और हमें झुंड प्रतिरक्षा मिल चुकी होती है।

कुछ बीमारियों के खिलाफ झुंड प्रतिरक्षा बेहतर कार्य करती है तो कुछ के लिए यह तरीका फेल हो जाता है। चेचक को मानव इतिहास की सबसे भयानक बीमारियों में से एक माना जाता है। वैक्सिनेशन से चेचक के सफाए के बारे में एडवर्ड जेनर के शोध प्रकाशन के लगभग 200 वर्षों बाद 1980 में विश्व स्वास्थ संगठन ने विश्व को चेचक मुक्त घोषित किया क्योंकि विश्व की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग वैक्सिनेट हो गया था।

अनेक प्रकार के वायरल एवं बैक्टीरियल इन्फेक्शन एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलते हैं। यह शृंखला तब टूटती है जब अधिकांश लोग संक्रमित नहीं होते या संक्रमण नहीं फैलाते। यह उन लोगों की रक्षा करने में मदद करता है जो वैक्सिनेशन नहीं करवाते हैं या जिनका प्रतिरक्षा तंत्र कमज़ोर है या वे आसानी से संक्रमित हो जाते हैं। आसानी से संक्रमित होने वाले व्यक्तियों में – बूढ़े, बच्चे, नवजात शिशु, गर्भवती महिलाएं, कमज़ोर प्रतिरक्षा या कुछ गंभीर स्वास्थ्य स्थितियों वाले लोग हो सकते हैं।

झुंड प्रतिरक्षा के आंकड़े

कुछ बीमारियों के लिए झुंड प्रतिरक्षा तब प्रभावी हो सकती है जब किसी आबादी में 40 प्रतिशत लोग रोग के लिए प्रतिरोधी हो जाएं। लेकिन ज़्यादातर मामलों में आबादी के 80-95 प्रतिशत लोग प्रतिरोधी होने पर ही बीमारी को फैलने को रोका जा सकता है।

उदाहरण के लिए खसरा (मीज़ल्स) की प्रभावी झुंड प्रतिरक्षा विकसित करने के लिए 20 में से 19 व्यक्तियों को खसरे का टीका लगना चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि अगर एक बच्चे को खसरा होता है तो उसके आसपास की आबादी में सभी को वैक्सिनेट करना होगा ताकि बीमारी को फैलने से रोका जा सके। यदि खसरे से पीड़ित बच्चे के आसपास अधिक लोग बगैर वैक्सिनेशन के होंगे तो बीमारी अधिक आसानी से फैल सकती है क्योंकि कोई झुंड प्रतिरक्षा नहीं है। यानी एक निश्चित प्रतिशत ऐसे लोगों का होना चाहिए जो बीमारी को आगे फैलने से रोकेंगे। इस प्रतिशत को झुंड प्रतिरक्षा का न्यूनतम स्तर या थ्रेशोल्ड कहते हैं।

झुंड प्रतिरक्षा कुछ बीमारियों के लिए काम करती है। नार्वे के लोगों ने वैक्सिनेशन एवं प्राकृतिक प्रतिरक्षा के तरीके से स्वाइन फ्लू के लिए आंशिक झुंड प्रतिरक्षा विकसित कर ली है। 2010 तथा 2011 में नार्वे में यह देखा गया कि इन्फ्लूएंज़ा के कारण कम मौतें हुई थीं क्योंकि आबादी का बड़ा हिस्सा इसके प्रति प्रतिरोधी हो गया था।

हम कुछ बीमारियों के लिए वैक्सीन लगाकर झुंड प्रतिरक्षा विकसित करने में मदद कर सकते हैं। झुंड प्रतिरक्षा हमेशा समुदाय के प्रत्येक व्यक्ति की रक्षा नहीं कर सकती है लेकिन बीमारी फैलने से रोकने में मदद कर सकती है।

कोविड-19 व झुंड प्रतिरक्षा

सोशल डिस्टेंसिंग और बार-बार हाथ धोना ही वर्तमान में स्वयं के परिवार और आसपास के लोगों में कोविड-19 बीमारी के वायरस के संक्रमण को रोकने का तरीका है। ऐसे अनेक कारण हैं जिनसे कोविड-19 के विरुद्ध झुंड प्रतिरक्षा फिलहाल तुरंत विकसित नहीं की जा सकती –

1. कोविड-19 के लिए वैक्सीन बनने में एक साल लगने की संभावना है। तो झुंड प्रतिरक्षा के लिए वैक्सिन का उपयोग फिलहाल संभव नहीं है।

2. कोविड-19 के उपचार के लिए एंटीवायरल और अन्य दवाओं की खोज के लिए वैज्ञानिक प्रयासरत है।

3. वैज्ञानिकों को पक्के तौर पर यह ज्ञात नहीं है कि कोविड-19 बीमारी से ठीक हो गए व्यक्ति को फिर से यही बीमारी हो सकती है या नहीं।

4. गंभीर संक्रमण में व्यक्ति मर भी सकते हैं।

5. कोरोना वायरस से कुछ तो बीमार पड़ जाते हैं जबकि अन्य व्यक्तियों को कुछ नहीं होता इसका कारण क्या है यह हमें पक्के तौर पर नहीं पता।

6. एक साथ अनेक लोग संक्रमित होने से अस्पताल एवं स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा सकती हैं।

वैज्ञानिक कोरोना वायरस के विरुद्ध वैक्सीन बनाने के लिए शोध कर रहे हैं। यदि हमारे पास वैक्सीन आ जाता है तो हम भविष्य में इस वायरस के विरुद्ध झुंड प्रतिरक्षा विकसित करने में सक्षम हो सकते हैं। यह तभी संभव होगा जब विश्व की अधिकांश आबादी वैक्सिनेट हो जाए। केवल वे व्यक्ति जो चिकित्सकीय कारणों से वैक्सिनेट नहीं हो सकते उन्हें छोड़कर जवानों, बच्चों सभी को वैक्सिनेट होना होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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