सबसे बड़ा जीव 770 हैक्टर बड़ा है

1980 के दशक के अंत में, शोधकर्ताओं ने मिशिगन के ऊपरी प्रायद्वीप पर एक विशालकाय फफूंद की खोज की थी। आर्मिलेरिया गैलिका नामक यह फफूंद आकार में किसी मॉल के बराबर थी और 37 हैक्टर क्षेत्र में फैली थी। इसे दुनिया का सबसे बड़ा जीव माना गया। लेकिन हाल में वैज्ञानिकों ने एक और आर्मिलेरिया गैलिका फफूंद खोजी है जो पिछली खोज से लगभग चार गुना बड़ी और उससे दुगनी उम्र की है। यह फफूंद हनी मशरूम को जन्म देती है।

अन्य फफूंद की तरह आर्मिलेरिया पतले भूमिगत धागों के रूप में पनपती है। लेकिन अधिकांश फफूंद के विपरीत, ये धागे जूते के फीतों जैसी मोटीमोटी रस्सियां बना लेते हैं जो मृत या कमज़ोर लकड़ी का उपभोग करते हुए काफी दूरी तक फैलते जाते हैं। विशाल भूमिगत नेटवर्क का पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने दूर तक फैले 245 ऐसे रेशों के नमूनों का जेनेटिक विश्लेषण किया।  बायोआरकाईव में प्रकाशित पर्चे के अनुसार इस जांच में पाया गया कि ये दूरदूर फैले रेशे एक ही फफूंद के हिस्से थे। इसके तेज़ी से बढ़ने के आधार पर अनुमान लगाया गया कि यह फफूंद कम से कम 2500 वर्ष पुरानी है।

शोधकर्ताओं ने 15 समान रूप से वितरित नमूनों के जीनोम को अनुक्रमित करके देखा कि हनी मशरूम में समय के साथ बदलाव कैसे होता है। उन्हें जीनोम के 10 करोड़ क्षारों में से केवल 163 आनुवंशिक परिवर्तन देखने को मिले जो काफी धीमी गति है। उत्परिवर्तन की दर से यह पता लगाया जाता है कि एक जीव कितनी तेज़ी से विकसित हो सकता है। शोधकर्ता उत्परिवर्तन की इतनी धीमी दर को लेकर असमंजस में हैं और अभी यह नहीं कह सकते कि उत्परिवर्तनों पर अंकुश कैसे लगाया जा रहा है। वैसे उन्हें लगता है कि एक भलीभांति विकसित डीएनए मरम्मत की व्यवस्था या फिर भूमिगत रहते हुए सूरज की रोशनी से दूर रहना उत्परिवर्तन की धीमी दर का एक कारण हो सकता है।

यह अब दुनिया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा जीव है जिसकी उम्र 8000 वर्ष से भी अधिक है और यह 770 हैक्टर के लंबेचौड़े क्षेत्र में फैला है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विशेष पुताई करके घरों को ठंडा रखें

तेज़ धूप वाले देशों में घरों को सफेद रंग से पोता जाता है ताकि धूप टकराकर लौट जाए। इसी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए एक नई शीतलन सामग्री तैयार की जा रही है। इसे किसी भी सतह पर पोता जा सकता है और तापमान लगभग 6 डिग्री सेल्सियस तक कम किया जा सकता है।

वास्तव में धूप में अवरक्त (आईआर) और पराबैंगनी (यूवी) किरणें गर्मी का मुख्य कारण होती हैं। सफेद रंग 80 प्रतिशत दृश्य प्रकाश को परावर्तित करता है लेकिन आईआर और यूवी को नहीं। इस नई सामग्री में अधिकांश आईआर और यूवी को परावर्तित करने की क्षमता है। इसमें उपस्थित बहुलक और अन्य पदार्थों की रासायनिक संरचना के कारण अतिरिक्त गर्मी ऐसी तरंग लंबाइयों पर विकिरित होती है जिन्हें वायुमंडल नहीं रोकता और हवा गर्म नहीं होती।

पहले भी इस क्षेत्र में काफी काम किए जा चुके हैं। सिलिकॉन डाईऑक्साइड और हाफनियम डाईऑक्साइड की परावर्तक सतह तैयार करके तापमान में 5 डिग्री सेल्सियस की कमी प्राप्त की गई। इसी प्रकार से, एयर कंडीशनिंग में पानी को ठंडा करने के लिए एक बहुलक और चांदी की मिलीजुली फिल्म के उपयोग से एयर कंडीशनिंग लागत में 21 प्रतिशत बचत की गई। कांच के महीन मोती जड़ी एक प्लास्टिक फिल्म सतह को 10 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा करने में सक्षम थी। ऑस्ट्रेलिया में, एक ऐसा पॉलिमर तैयार किया गया जो छत को 3-6 डिग्री सेल्सियस ठंडा रख सकता था।

कोलंबिया विश्वविद्यालय में भौतिकविद युआन यांग और नैनफांग यू के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक में वायु रिक्तिकाएं जोड़कर अत्यधिक परावर्तक सामग्री बनाने पर प्रयोग किया। एक बहुलक पर काम करते हुए उन्होंने पाया कि कुछ स्थितियों में, यह सामग्री सूखने के बाद सफेद हो जाती है। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पाया कि सूखी फिल्म में एक दूसरे से जुड़ी वायु रिक्तिकाएं बन गई हैं जो अधिक प्रकाश को परावर्तित कर सकती हैं।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने अन्य बहुलक की मदद से इसको बेहतर बनाने की कोशिश की। आखिरकार, उन्होंने पीवीडीएफएचएफपी नामक एक बहुलक एसीटोन में घोल के रूप में तैयार किया। जब सतह पर पोता गया तो एसीटोन वाष्पित हो गया और बहुलक में पानी की बूंदों का एक जाल बन गया। अंत में, पानी भी वाष्पित हो गया जिससे वायुछिद्रों से भरी एक फिल्म तैयार हो गई। यह 99.6 प्रतिशत प्रकाश को परावर्तित कर सकती है।

साइंस में ऑनलाइन प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार दोपहर के समय में इस फिल्म से पुती सतह 6 डिग्री सेल्सियस तक ठंडी बनी रही। यह नई सामग्री कुछ मौसमों में ठंडा करने की लागत को 15 प्रतिशत तक कम कर सकती है। लेकिन यह पेंट आजकल उपयोग होने वाले एक्रिलिक पेंट की तुलना में पांच गुना अधिक महंगा है। तो सवाल यह है कि क्या यह व्यावसायिक तौर पर उपयोगी होगा या अभी पारंपरिक तरीके ही काम आएंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दाल की खाली होती कटोरी – भारत डोगरा

भारत में सदियों से दालें जनसाधारण के लिए प्रोटीन का सबसे सामान्य व महत्त्वपूर्ण रुाोत रही हैं। अत: यह गहरी चिंता का विषय है कि दाल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में बहुत गिरावट आई है। इस स्थिति को तालिका से समझा जा सकता है।

भारत में प्रति व्यक्ति दाल उपलब्धता
वर्ष मात्रा (ग्राम में)
1951 60.7
1961 69.0
1971 51.2
1981 37.5
1991 41.6
2001 30.0
2003 29.1
2007 35.5
2011 43.0
2016 43.6
रुाोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18

तालिका से स्पष्ट है कि वर्ष 1961 में हमारे देश में प्रति व्यक्ति 70 ग्राम दाल उपलब्ध थी, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के 80 ग्राम के सुझाव के बहुत पास थी। पर इसके बाद इसमें तेज़ी से गिरावट आई व एक समय यह उपलब्धता 29 ग्राम तक गिर गई। इसके बाद इसमें कुछ वृद्धि तो लाई गई पर यह वृद्धि काफी हद तक दाल के आयात द्वारा प्राप्त की गई जिसका हिस्सा कुछ वर्षों तक 14 प्रतिशत के आसपास रहा।

इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि वर्ष 1966 के बाद जो हरित क्रांति आई उसमें दलहन की उपेक्षा हुई व विशेषकर मिश्रित फसल में दलहन को उगाने की उपेक्षा भी हुई। पंजाब में तो इसके बाद के 16 वर्षों में दलहन का क्षेत्रफल कुल कृषि क्षेत्रफल में 13 प्रतिशत से घटकर 3 प्रतिशत रह गया।

इसके बाद आयात से दलहन उपलब्धता बढ़ाने के प्रयास हुए। आयात की गई बहुत सी दालों पर खतरनाक रसायनों, विशेषकर ग्लायफोसेट का छिड़काव होता रहा है।

दलहन की फसलों को अधिक उगाने से मिट्टी का प्राकृतिक उपजाऊपन बनाए रखने में मदद मिलती है क्योंकि इनकी जड़ें वायुमंडल से स्वयं नाइट्रोजन ग्रहण कर धरती को दे सकती हैं।

अत: देश में दलहन का उत्पादन बढ़ाने पर व इसकी मिश्रित खेती बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। हमारे देश की धरती अनेक तरह की दालों के लिए उपयुक्त है व हमारे किसानों के पास दलहन के उत्पादन का समृद्ध परंपरागत ज्ञान है। उन्हें सरकार की ओर से अधिक प्रोत्साहन मिलना चाहिए।(स्रोत फीचर्स)

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विज्ञान में लिंगभेद उजागर करने की पहल

अकादमिक सभाओं, पत्रिका के संपादक मंडल या अन्य अकादमिक पदों पर पुरुषों की अधिक भागीदारी वाले स्थानो को पुरुषअड्डे कहा जाने लगा है। इन स्थानों को पुरुषअड्डे कहना लिंगभेद उजागर करने का एक तरीका है। लिंगभेद उजागर करने की दिशा में एक ओर पहल हुई है। जर्मन कैंसर रिसर्च इंस्टिट्यूट द्वारा आयोजित सभा में आमंत्रित वक्ताओं में 28 में से 23 महिला वक्ता हैं।

जर्मन कैंसर रिसर्च सेंटर की जीव वैज्ञानिक और एक्ज़ेक्यूटिव वीमेन्स इनीशिएटिव की अध्यक्ष उर्सुला क्लिंगमुलर फ्रंटियर्स इन कैंसर रिसर्च मीटिंग की आयोजक हैं। सभा का उद्देश्य दुनिया भर में काम कर रहे अच्छे शोधकर्ताओं को सामने लाना है।क्लिंगमुलर का कहना है कि हमने उन महिलाओं को आमंत्रित किया है जो इस क्षेत्र में अग्रणी काम कर रही हैंयहां महिलापुरुष वक्ता का अनुपात आम तौर पर आयोजित सभाओं के एकदम विपरीत है। वैसे हमने पुरुषों को भी आमंत्रित किया है।

उनका कहना है कि उन्हें खुशी होगी यदि पहली नज़र में वक्ताओं के नामों की सूची देखकर किसी को कुछ अटपटा या असामान्य ना लगे। 9 से 12 अक्टूबर तक चलने वाले इस आयोजन के लिए लोगों की सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है और अब तक लगभग 250 प्रतिभागी पंजीकरण करवा चुके है। लोग वक्ताओं से प्रभावित हैं।

इस आयोजन पर प्रिंसटन विश्वविद्यालय की तंत्रिका विज्ञानी येल निव का कहना है कि यह कोशिश अकादमिक सभाओं के आयोजकों और वहां उपस्थित लोगों में लिंगभेद के प्रति जागरूकता ला सकती है। निव ने 2016 में नशे का तंत्रिका विज्ञान पर आयोजित एक सम्मेलन के अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने वक्ताओं की जो सूची तैयार की थी उसमें उन्होंने पाया कि सूची में एक भी महिला नहीं है। उसके बाद फिर से सूची तैयार की जिसमें महिला वक्ताओं को शामिल किया। उन्होंने पहले बनाई सूची पर फिर गौर किया और पाया कि आमंत्रित पुरुष वक्ताओं में से कुछ शोधकर्ता जानेमाने तो थे मगर सम्मेलन के विषय से सम्बंधित नहीं थे। वहीं बाद में जिन महिलाओं को जोड़ा गया उनके शोधकार्य सम्मेलन के विषय से सम्बंधित थे। उनके लिए यह मज़ेदार एहसास था। निव का मत है कि लैंगिक असंतुलन पर सवाल उठाना मात्र इसलिए सही नहीं है कि आयोजक लिंगसमानता के मुद्दे पर विचार करें बल्कि इसलिए भी है कि इससे हमारे अध्ययन बेहतर होंगे। (स्रोत फीचर्स)

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जलवायु परिवर्तन को समझने में मददगार खेलकूद

पिछले कुछ दशकों में हुए जलवायु परिवर्तन और पेड़पौधों पर इसके असर को समझने के लिए एक सर्वथा नया रुाोत सामने आया है खुले में होने वाले खेलकूद के वीडियो।

पारिस्थितिकी विज्ञानी और सायकल रेस प्रेमी पीटर डी फ्रेने टूर्स ऑफ फ्लैंडर्स नामक सायकल रेस के 1980 के दशक के वीडियो देख रहे थे। अचानक रेस ट्रैक के पीछे के नज़ारों ने उनका ध्यान खींचा। उन्होंने देखा कि रेस ट्रैक के पीछे के पेड़ों पर पत्तियां नहीं हैं। जबकि वर्तमान रेसों में ट्रैक के पीछे के पेड़ों पर पत्तियां दिखती थीं। रेस के इन वीडियो का उन्होंने जलवायु परिवर्तन और पेड़पौधों पर होने वाले प्रभाव के बीच सम्बंध को समझने के लिए इस्तेमाल किया।

अब तक इस तरह के अध्ययनों में परंपरागत हर्बेरियम (वनस्पति संग्रह) का उपयोग किया जाता था। लेकिन हर्बेरियम डैटा के साथ मुश्किलें हैं। उत्तरी अमेरिका और युरोप को छोड़कर बाकी जगहों पर हर्बेरियम नमूने बहुत कम हैं। एक विकल्प के तौर पर वैज्ञानिकों ने पर्यावरण के सचित्र विवरण वाले लेखों और किताबों का उपयोग शुरू किया। स्मार्ट फोन की सहज उपलब्धता से लोगों द्वारा यादगार दिनों और स्थलों की खींची गई तस्वीरों को भी अध्ययन के डैटा की तरह उपयोग करने पर विचार किया। किंतु यह डैटा काफी बिखरा हुआ है और इसे इकट्ठा करना मुश्किल है।

टूर्स ऑफ फ्लैंडर्स बेल्जियम की लोकप्रिय सायकल रेस है। 260 कि.मी. लंबी इस रेस की खास बात यह है कि यह हर साल अप्रैल में ही आयोजित होती है। यानी अध्ययन के लिए हर वर्ष का एक ही समय का डैटा आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही उन्हीं पेड़पौधों का अलगअलग कोण से अवलोकन जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने फ्लेमिश रेडियो एंड टेलीविज़न ब्राॉडकास्टिंग आर्गेनाइज़ेशन के अभिलेखागार से रेस के 200 घंटे के वीडियो लिए। इन वीडियो से उन 46 पेड़ों और झाड़ियों को चिंहित किया जिनका अलगअलग कोण से अवलोकन संभव था। इस तरह 525 चित्र  निकाले। इन चित्रों के विश्लेषण में उन्होंने पाया कि 1980 के दशक में अप्रैल माह के शुरुआत में किसी भी पेड़ या झाड़ी पर फूल नहीं आए थे। और लगभग 26 प्रतिशत पेड़पौधों पर ही पत्तियां थीं। लेकिन साल 2006 के बाद के उन्हीं पेड़ों में से 46 प्रतिशत पर पत्तियां आ चुकी थीं और 67 प्रतिशत पर फूल आ गए थे। शोधकर्ताओं ने जब वहां के स्थानीय जलवायु परिवर्तन के डैटा को देखा तो पाया कि 1980 से अब तक औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है।

गेंट विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञानी लोविस का कहना है कि इस तरह के अध्ययन आम लोगो को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव समझाने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। बढ़ते हुए तापमान के आंकड़े बताने या ग्राफ पर दर्शाने से बात वैज्ञानिकों की समझ में तो आ जाती है मगर आम लोग, खासकर राजनेता, इसे इतनी गंभीरता से नहीं देखते। इन प्रभावों के फोटो और वीडियो इसमें मददगार हो सकते हैं।(स्रोत फीचर्स)

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माइक्रोस्कोप खुद हुआ माइक्रो – डॉ. दीपक कोहली

चौंकिए नहीं! अब आप माइक्रोस्कोप को जेब में रखकर कहीं भी घूम सकते हैं, वह भी उसे मोड़कर। डॉ. मनु प्रकाश ने एक ऐसा माइक्रोस्कोप विकसित किया है जिसे जेब में मोड़कर रखा जा सकता है। इस माइक्रोस्कोप से आने वाले समय में चिकित्सकीय जांच में व्यापक सुधार देखने को मिलेगा।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.), कानपुर में कंप्यूटर साइंस से बीटेक के छात्र रहे डॉ. मनु प्रकाश को भौतिकी जीव विज्ञान के क्षेत्र में रचनात्मक कार्य करने के लिए मैक आर्थर जीनियस फेलोशिप से नवाज़ा गया है। उनके द्वारा विकसित किया गया शक्तिशाली माइक्रोस्कोप रक्त की एक बूंद से मलेरिया की जांच करने में सक्षम है। इस माइक्रोस्कोप से मलेरिया परजीवी का पता लगाने का खर्च महज 33.33 रुपए आता है। फिलहाल इस माइक्रोस्कोप का प्रयोग मलेरिया की जांच में सफल हुआ है, आगे इसे और समृद्ध किया जाएगा। अपने शोध कार्य को जारी रखने के लिए डॉ. मनु प्रकाश को मैक आर्थर जीनियस फेलोशिप प्रदान की गयी है। वर्तमान में वे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, अमेरिका के जैव अभियांत्रिकी विभाग में कार्यरत हैं। वह स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी व विज्ञान के क्षेत्र में आविष्कार कर रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

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चिकित्सा नोबेल पुरस्कार – डॉ. सुशील जोशी

इस वर्ष चिकित्सा/कार्यिकी का नोबेल पुरस्कार दो वैज्ञानिकों को संयुक्त रूप से दिया गया है। इन दोनों ने ही कैंसर के उपचार में शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र के उपयोग का मार्ग प्रशस्त करने के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी अनुसंधान किया है। अलबत्ता, कैंसर के उपचार में प्रतिरक्षा तंत्र की भूमिका को समझने के प्रयासों का इतिहास काफी पुराना है।

आम तौर पर कैंसर के उपचार में कीमोथेरपी, विकिरण और सर्जरी का सहारा लिया जाता है। इन सबकी अपनीअपनी समस्याएं है। उनमें न जाते हुए हम बात करेंगे कि हमारा प्रतिरक्षा तंत्र किस तरह से कैंसर का मुकाबला कर सकता है और जब कर सकता है, तो करता क्यों नहीं है। और नए अनुसंधान ने इसे कैसे संभव बनाया है।

यह बात काफी समय से पता रही है कि प्रतिरक्षा तंत्र कैंसर के नियंत्रण में कुछ भूमिका तो निभाता है। जैसे अट्ठारवीं सदी में ही यह समझ में आ गया था कि एकाध लाख मरीज़ों में से एक में कैंसर स्वत: समाप्त हो जाता है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में दो जर्मन वैज्ञानिकों ने स्वतंत्र रूप से देखा कि कुछ मरीज़ों में एरिसिपेला बैक्टीरिया के संक्रमण के बाद उनका ट्यूमर सिकुड़ गया। इनमें से एक वैज्ञानिक ने 1868 में एक कैंसर मरीज़ को जानबूझकर एरिसिपेला से संक्रमित किया और पाया कि उसका ट्यूमर सिकुड़ने लगा। यह भी देखा गया कि कभीकभी तेज़ बुखार के बाद भी ट्यूमर दब जाता है। 1891 में विलियम कोली नाम के एक सर्जन ने लंबे समय के प्रयोगों के बाद बताया कि 1000 से ज़्यादा मरीज़ों में एरिसिपेला संक्रमण के बाद ट्यूमर सिकुड़ता है। इन सारे अवलोकनों के चलते मामला ज़ोर पकड़ने लगा। यह स्पष्ट होने लगा कि संक्रमण के कारण जब शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र सामान्य से ज़्यादा सक्रिय होता है तो वह कैंसर कोशिकाओं को भी निशाना बनाता है।

मगर इस बीच कैंसर के उपचार के लिए कीमोथेरपी और विकिरण चिकित्सा का विकास हुआ और प्रतिरक्षा तंत्र की भूमिका की बात आईगई हो गई। मगर आगे चलकर विलियम कोली की बात सही साबित हुई। 1976 में वैज्ञानिकों की एक टीम ने मूत्राशय के कैंसर के मरीज़ों को बीसीजी की खुराक सीधे मूत्राशय में दी और उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त हुए। इससे पहले चूहों में बीसीजी टीके का कैंसररोधी असर दर्शाया जा चुका था। बीसीजी का पूरा नाम बैसिलस काल्मेटगुएरिन है और इसे टीबी के बैक्टीरिया को दुर्बल करके बनाया जाता है। आज यह मूत्राशय कैंसर के उपचार की जानीमानी पद्धति है।

यह तो स्पष्ट हो गया कि प्रतिरक्षा तंत्र (कम से कम) कुछ कैंसर गठानों का सफाया कर सकता है। लेकिन आम तौर पर कैंसर इस तंत्र से बच निकलता है और अनियंत्रित वृद्धि करता रहता है। सवाल है कि ऐसा क्यों है।

प्रतिरक्षा तंत्र कई घटकों से मिलकर बना होता है। इसमें से एक हिस्सा जन्मजात होता है और उसे बाहरी चीज़ों से लड़ने के लिए किसी प्रशिक्षण की ज़रूरत नहीं होती। दूसरा हिस्सा वह होता है जो किसी बाहरी चीज़ के संपर्क में आने पर उसे पहचानना और नष्ट करना सीखता है और इसे याद रखता है। आम तौर पर बाहर से आए किसी जीवाणु वगैरह पर कुछ पहचान चिंह (एंटीजन) होते हैं जो प्रतिरक्षा तंत्र को यह समझने में मददगार होते हैं कि वह अपना नहीं बल्कि पराया है।

अब कैंसर कोशिकाओं को देखें। यह तो सही है कि कैंसर कोशिकाओं के डीएनए में कई उत्परिवर्तन यानी म्यूटेशंस के कारण उनकी पहचान थोड़ी अलग हो जाती है, उनकी सतह पर विशेष पहचान चिंह होते हैं और प्रतिरक्षा कोशिकाएं उन्हें पहचान सकती हैं। किंतु कैंसर कोशिकाएं एक बात का फायदा उठाती हैं।

हमारी प्रतिरक्षा तंत्र की कोशिकाओं को कोई शत्रु नज़र आए तो वे उसे मारने के साथसाथ स्वयं की संख्या बढ़ाने लगती हैं। समस्या यह आती है कि यदि यह संख्या बहुत अधिक बढ़ जाए तो हमारे शरीर की शामत आ जाती है क्योंकि ये कोशिकाएं सामान्य कोशिकाओं पर भी हल्ला बोल सकती हैं। ऐसा होने पर कई बीमारियां पनपती हैं जिन्हें स्वप्रतिरक्षा रोग या ऑटोइम्यून रोग कहते हैं। इसलिए प्रतिरक्षा कोशिकाओं की सतह पर कुछ स्विच होते हैं। हमारी सामान्य कोशिकाएं इन स्विच की मदद से इन्हें काम करने से रोकती हैं। कैंसर कोशिकाएं इन्हीं स्विच का उपयोग करके प्रतिरक्षा कोशिकाओं को काम करने से रोक देती हैं। ऐसी स्थिति में होता यह है कि कैंसर कोशिकाएं तो बेलगाम ढंग से संख्यावृद्धि करती रहती हैं किंतु प्रतिरक्षा कोशिकाओं की संख्या नहीं बढ़ती।

जिस खोज के लिए इस साल का नोबेल पुरस्कार मिला है उसका सम्बंध इन्हीं स्विच से है जो एक तरह से ब्रोक का काम करते हैं। टेक्सास विश्वविद्यालय के ह्रूस्टन स्थित एम.डी. एंडरसन कैंसर सेंटर के जेम्स एलिसन और क्योटो विश्वविद्यालय के तसाकु होन्जो ने अलगअलग काम करते हुए दो ऐसे स्विच खोज निकाले हैं जो प्रतिरक्षा तंत्र पर ब्रोक का काम करते हैं। एक स्विच का नाम है सायटोटॉक्सिक टीलिम्फोसाइट एंटीजन-4 (सीटीएलए-4) तथा दूसरे का नाम है प्रोग्राम्ड सेल डेथ 1 (पीडी-1)। शोधकर्ताओं ने इन ब्रोक को नाकाम करके प्रतिरक्षा तंत्र की कोशिकाओं को सक्रिय करने में सफलता प्राप्त की है और दोनों के ही आधार पर औषधियां बनाई जा चुकी हैं। हालांकि अभी प्रतिरक्षा तंत्र के ब्रोक्स को हटाकर कैंसर से लड़ाई में सफलता कुछ ही किस्म के कैंसर में मिली है किंतु पूरी उम्मीद है कि जल्दी ही यह एक कारगर विधि साबित होगी।

लेकिन कैंसर कोशिकाओं के पास बचाव के और भी तरीके हैं। इसलिए प्रतिरक्षा तंत्र पर आधारित कैंसर उपचार की चुनौतियां समाप्त नहीं हुई हैं। जैसे कैंसर कोशिकाएं एक और हथकंडा अपनाती हैं। वे अपने आसपास सामान्य कोशिकाओं का एक सूक्ष्म पर्यावरण बना लेती हैं। दूसरे शब्दों में कैंसर कोशिका सामान्य कोशिकाओं के बीच में छिपी बैठी रहती है और प्रतिरक्षा तंत्र की कोशिकाएं वहां तक पहुंच नहीं पाती। शोधकर्ता कोशिश कर रहे हैं कि इन कोशिकाओं को उजागर करें ताकि प्रतिरक्षा तंत्र इन्हें नष्ट कर पाए।(स्रोत फीचर्स)

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खरपतवारनाशी – सुरक्षित या हानिकारक

ग्लायफोसेट, दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला खरपतवारनाशी यानी हर्बीसाइड है। ऐसा बताया गया था कि यह जंतुओं के लिए हानिकारक नहीं है। लेकिन शायद यह मधुमक्खियों के लिए घातक साबित हो रहा है। यह रसायन मधुमक्खियों के पाचन तंत्र में सूक्ष्मजीव संसार को तहस-नहस करता है, जिसके चलते वे संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। इस खोज के बाद दुनिया में मधुमक्खियों की संख्या में गिरावट की आशंका और भी प्रबल हो गई है।

ग्लायफोसेट कई महत्वपूर्ण एमिनो अम्लों को बनाने वाले एंज़ाइम की क्रिया को रोककर पौधों को मारता है। जंतु तो इस एंज़ाइम का उत्पादन नहीं करते हैं, लेकिन कुछ बैक्टीरिया द्वारा अवश्य किया जाता है।

टेक्सास विश्वविद्यालय की एक जीव विज्ञानी नैंसी मोरन ने अपने सहकर्मियों के साथ एक छत्ते से लगभग 2000 मधुमक्खियां लीं। कुछ को चीनी का शरबत दिया और अन्य को चीनी के शरबत में मिलाकर ग्लायफोसेट की खुराक दी गई। ग्लायफोसेट की मात्रा उतनी ही थी जितनी उन्हें पर्यावरण से मिल रही होगी। तीन दिन बाद देखा गया कि ग्लायफोसेट का सेवन करने वाली मधुमक्खियों की आंत में स्नोडग्रेसेला एल्वी नामक बैक्टीरिया की संख्या कम थी। लेकिन कुछ परिणाम भ्रामक थे। ग्लायफोसेट का कम सेवन करने वाली मक्खियों की तुलना में जिन मधुमक्खियों ने अधिक का सेवन किया था उनमें 3 दिन के बाद अधिक सामान्य दिखने वाले सूक्ष्मजीव संसार पाए गए। शोधकर्ताओं को लगता है कि शायद बहुत उच्च खुराक वाली अधिकांश मधुमक्खियों की मृत्यु हो गई होगी और केवल वही बची रहीं जिनके पास इस समस्या से निपटने के तरीके मौजूद थे।

मधुमक्खी में सूक्ष्मजीव संसार में परिवर्तन घातक संक्रमण से बचाव की उनकी प्रक्रिया को कमजोर बनाते हैं। परीक्षणों में ग्लायफोसेट का सेवन करने वाली केवल 12 प्रतिशत मधुमक्खियां ही सेराटिया मार्सेसेंस के संक्रमण से बच सकीं। सेराटिया मार्सेसेंस मधुमक्खियों के छत्तों में पाए जाने वाले आम जीवाणु हैं। दूसरी ओर, ग्यालफोसेट से मुक्त 47 प्रतिशत मधुमक्खियां ऐसे संक्रमण से सुरक्षित रहीं।

प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ जर्नल में प्रकाशित इस शोध ने मधुमक्खियों की तादाद में कमी के लिए एक संभावित कारण और जोड़ दिया है।

यह खोज मानव तथा जंतुओं पर ग्लायफोसेट के प्रभाव पर भी सवाल उठाती है। क्योंकि मानव आंत और मधुमक्खी की आंत में सूक्ष्म जीवाणुओं की भूमिका में कई समानताएं हैं। इस खोज ने विवादास्पद खरपतवारनाशी को दोबारा से शोध का विषय बना दिया है।(स्रोत फीचर्स)

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क्षुद्रग्रह पर पहली बार चलता-फिरता रोवर

जापान के क्षुद्रग्रह मिशन हयाबुसा-2 ने एक क्षुद्रग्रह पर दो रोवर उतारने में सफलता प्राप्त की है। 22 सितंबर के दिन जापान एयरोस्पेस एक्प्लोरेशन एजेंसी ने घोषणा की कि मिशन के दो रोवर मिनर्वा-II IA और IB रयूगु नामक क्षुद्रग्रह पर उतार दिए गए और दोनों ही उसकी सतह पर घूम-फिर रहे हैं। उन्होंने क्षुद्रग्रह की तस्वीरें भी भेजी हैं।

यह क्षुद्रग्रह बहुत छोटा है – चौड़ाई मात्र 1 कि.मी.। हयाबुसा पहले तो इन दो रोवर्स को लेकर क्षुद्रग्रह से मात्र 55 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचा। इतने करीब पहुंचकर उसने दोनों रोवर्स को सतह पर तैनात किया और वापिस अपनी कक्षा में लौट गया। शुरुआत में जब ये रोवर्स क्षुद्रग्रह की सतह पर उतरे तो इनका पृथ्वी पर स्थित स्टेशन से संपर्क टूट गया। ऐसा शायद इसलिए हुआ था क्योंकि तब ये दोनों रोवर्स क्षुद्रग्रह के उस साइड पर थे जो हमसे ओझल थी। मगर जल्दी ही इन्होंने संकेत भेजना शुरू कर दिया।

इससे पहले भी क्षुद्रग्रहों पर यान उतारे जा चुके हैं मगर यह पहली बार है कि ये यान वहां की सतह पर चल-फिर रहे हैं। इनमें मोटर लगी हैं जिनकी मदद से ये फुदकते हैं। क्षुद्रग्रह के कम गुरुत्वाकर्षण बल के चलते रोवर्स की प्रत्येक उछाल काफी लंबी होती है।

ऐसा माना जाता है कि यह क्षुद्रग्रह शुरुआती सौर मंडल के पदार्थ से निर्मित हुआ है। इसका अध्ययन सौर मंडल की प्रारंभिक स्थितियों को समझने तथा पृथ्वी व अन्य ग्रहों की उत्पत्ति को समझने के उद्देश्य से किया जा रहा है। हयाबुसा-2 कुछ समय बाद एक बार फिर क्षुद्रग्रह की सतह के नज़दीक जाएगा तथा दो और रोवर्स को वहां उतारेगा। इसके अलावा स्वयं हयाबुसा-2 भी सतह पर उतरेगा ताकि वहां की मिट्टी के नमूने पृथ्वी पर ला सके। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चोर के घर चोरी की मिसाल – डॉ. किशोर पंवार

कुछ ततैया पौधों पर परजीवी होती हैं। उनमें से एक है बेलोनानीमा ट्रीटी जो उत्तरी अमेरिका के दक्षिणी फ्लोरिडा में पाई जाती है। यह एक ओक वृक्ष पर अंडे देती है जिनसे इल्लियां निकलती हैं। ये इल्लियां कुछ वृद्धि हारमोन छोड़ती हैं जिनकी वजह से पौधों पर गठानें बन जाती हैं। ये गठानें युवा ततैया को रहने के लिए सुरक्षित स्थान प्रदान करती हैं। इन छोटी-छोटी गठानों को वैज्ञानिक गाल कहते हैं। ये गठानें ततैया की इल्लियों को लगातार पोषक पदार्थ भी उपलब्ध कराती हैं। इन ततैया के लिए तो ये गठानें वरदान हैं पर पौधे के लिए अभिशाप क्योंकि उनका पोषण ततैया के बच्चे चुरा लेते हैं।

पोषक पदार्थों से लबरेज़ ये लड्डू जैसे गाल अन्य परजीवियों की निगाहों से ओझल रह जाएं ऐसा कैसे हो सकता है। हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि पोषक पदार्थों से भरे ये गाल लव वाइन नामक एक परजीवी लता के निशाने पर हैं। एक सर्वे से पता चला कि यह लव वाइन (प्रेमलता) ऐसे गाल के आसपास लिपटी रहती है। ध्यान से देखा गया तो पता चला कि इस प्रेमलता ने वास्तव में गाल की दीवार को भेद रखा है जिसमें परजीवी ततैया वृद्धि कर रही थी। यह लता वहां से पोषक पदार्थ भी चूसती है। मज़ेदार बात है कि यह पोषक पदार्थ वह सीधे वृक्ष से नहीं बल्कि ततैया के शरीर से प्राप्त करती है। अंतत: वहां ततैया की लाश ही शेष बचती है। बेल के तो मज़े हैं पर ततैया की शामत। इसी को कहते हैं चोर के घर चोरी।

इस खोज के बाद वैज्ञानिकों ने परजीवी पर परजीवी सम्बंध की और जांच-पड़ताल की। उन्होंने पाया कि 51 मामलों में प्रेमलता ततैया के बनाए गाल पर चिपकी थी, और उनमें से आधे से ज़्यादा में ततैया मृत मिली। करंट बायोलॉजी के एक ताज़ा अंक में यह रपट प्रकाशित हुई है। 101 गाल पर प्रेमलता नहीं लिपटी थी और उनमें से केवल 2 में ही ततैया मृत मिली। पेड़ के लिए इसका क्या अर्थ है इस बारे में अभी कुछ स्पष्ट पता नहीं है।

क्या है प्रेमलता

प्रेमलता यानी लव वाइन एक पूर्ण परजीवी बेल है। यह अमेरिका, इन्डोमलाया, ऑस्ट्रेलेशिया, पोलीनेशिया और कटिबंधीय अफ्रीका की मूल निवासी है। इसका वानस्पतिक नाम कैसिथा फिलीफॉर्मिस है। वैसे कैरेबियन क्षेत्र में कई बेलों को लव वाइन कहा जाता है। यह उनमें से एक है। लव वाइन अर्थात प्रेमलता नामकरण के पीछे यह मान्यता है कि इसमें कामोत्तेजक गुण होते हैं। वैसे ऑस्ट्रेलिया में इसे डोडर-लॉरेल भी कहते हैं और डेविल्स गट्स भी। दक्षिण भारत में छांछ को स्वादिष्ट बनाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। इसका औषधीय महत्व भी है।

भारत में ऐसी ही एक परजीवी बेल बहुतायत से मिलती है जिसका नाम है अमरबेल (कस्कुटा)। इसकी करीब 100-170 प्रजातियां खोजी जा चुकी हैं। इनका तना नारंगी, लाल या हल्का पीला होता है। इस पूर्ण परजीवी बेल का बीज अंकुरित होकर पौधों के आसपास सर्पिल क्रम में वृद्धि करता है जब तक कि यह किसी सही पोषक पौधे के सम्पर्क में न आ जाए। इसकी पत्तियां शल्क पत्र के रूप में होती हैं, वे भी मात्र 1 मि.मी. लंबी। पत्तियां सूक्ष्म हैं और तना भी हरा नहीं होता। यानी पूरी बेल क्लोरोफिल विहीन होती है। ऐसे में इस बेल के पास दूसरों से भोजन चुराने के अलावा कोई और चारा नहीं है।

गंगा सहाय पांडेय तथा कृष्ण चंद्र चुनेकर द्वारा सम्पादित भाव प्रकाश निघण्टु में अमरबेल नाम कस्कुटा रिफ्लेक्सा के लिए और आकाशबेल कैसिथा फिलीफॉर्मिस के लिए प्रयुक्त किया गया है। दोनों ही भारत में मिलती है। अमरबेल लगभग सभी जगह और आकाश बेल समुद्र तट के पेड़ों और झाड़ियों पर। वासुदेवन नायर अपनी किताब कॉन्ट्रोवर्सियल ड्रग प्लांट्स में कहते हैं कि इसके बारे में भ्रम है कि आकाश वल्ली आखिर कौन है – कस्कुटा रिफ्लेक्सा या कैसिथा फिलीफार्मिस।

क्यों बनते हैं पौधों पर गाल

पौधो पर विभिन्न कीटों द्वारा बनाए जाने वाले ये गाल्स इन जीवों के लिए सुरक्षित वास स्थान और भोजन का स्रोत दोनों का कार्य करते हैं। इन गठानों के अंदर ये कीट परजीवियों और शिकारियों से आंशिक रूप से सुरक्षित रहते हैं।

गाल की आंतरिक भित्ती नम होती है जिसका द्रव सामान्यत: प्रोटीन और शर्करा से भरा होता है। जबकि पौधों के सामान्य ऊतकों में इन पोषक पदार्थों की मात्रा कम होती है। पोषक पदार्थों की सहज उपलब्धता के कारण कई कीट इन गठानों में सहयोगी के रूप में रहते हैं। इन्हें जीव वैज्ञानिक पर-निलय वासी (इनक्विलाइन) कहते हैं। यानी दूसरे के घर में रहने वाले। उदाहरण के तौर पर एक वैज्ञानिक ने एक गाल में ऐसे 31 रहवासियों की सूची बनाई है। जिनमें 10 पर-निलय वासी, 16 परजीवी और 5 यदा-कदा आने वाली प्रजातियां शामिल थीं।

ये गाल्स बैक्टीरिया, कवक, कृमि, माहू, मिजेस, ततैया और घुन बनाते हैं। यदि प्रभावित भागों पर अंडे या कीट दिखाई दें तो यह पता लगाया जा सकता है कि ये गाल कीट ने बनाए हैं या नहीं। ओक के पौधों पर गाल्स बहुतायत से देखे जाते हैं। ओक 500 से ज़्यादा ततैया, 3 एफिड (माहू), घुन और मिजेस का पोषक पौधा है जो इसकी पत्तियों और टहनियों पर गाल्स बनाते हैं।

सामान्यत: कीट और पिस्सू गाल बनाने वाले सबसे आम जीव हैं। कुछ लोग इन्हें बागवान भी कहते हैं क्योंकि ये पौधों पर नई रचनाएं बनाते हैं। पौधों मे दो तरह के गाल्स देखे जाते हैं – खुले और बंद। खुले गाल एफिड, काकसिड और माइट्स जैसे जीव बनाते हैं। जबकि बंद प्रकार के गाल कीटों की इल्लियों द्वारा बनाए जाते हैं।

पत्तियों और तनों पर बने ये गाल ज़्यादा जाने-पहचाने हैं बजाय उन कीटों के जो इन्हें बनाते हैं। ये कीट बहुत छोटे होते हैं और इन्हें पहचानना भी मुश्किल होता हैं। गाल बनाने वाले कीट अपने अंडे पोषक पौधे के ऊपर या अंदर देते हैं। अंडों से निकली इल्ली जहां पौधे के संपर्क में आती है, वहीं से गठान बनने की शुरुआत होती है।

ये गठानें असामान्य वृद्धि का नतीजा होती हैं और पत्तियों, शाखाओं, जड़ों और फूलों पर भी बनती हैं। ये गठानें इल्लियों द्वारा इन भागों को कुतरने के फलस्वरूप उत्पन्न उद्दीपन के कारण बनना शुरू होती हैं। ये गेंद, घुंडी, मस्सों आदि के रूप में होती है। इस तरह की गठानें आप करंज, सप्तपर्णी और गूलर, पाकड़ की पत्तियों पर देख सकते हैं। एक समय में ऐसा माना जाता था कि इनमें औषधीय गुण होते हैं। वर्तमान में इनका इस हेतु उपयोग नहीं किया जाता।

जहां तक इनके आर्थिक महत्व का सवाल है, इनमें टैनिक अम्ल बहुत अधिक मात्रा में होता है। युरोपियन सिनिपिड द्वारा बनाए गए गाल से लगभग 65 प्रतिशत टैनिक अम्ल जबकि अमेरिकन सुमेक गाल से 50 प्रतिशत टैनिक अम्ल प्राप्त होता है। इन गाल से रंग भी मिलते हैं। टर्की रेड रंग मैड एप्पल गाल से निकाला जाता है। पूर्वी अफ्रीका में इन गठानों का उपयोग टेटू बनाने में रंग के लिए किया जाता था। सिनिप्स गैली टिंक्टोरी नामक कीट से उत्पन्न गाल से स्याही बनायी जाती है। एक समय कुछ देशों में कानूनी दस्तावेज़ इसी स्याही से लिखे जाते थे। यहां तक कि यूएस टे्रज़री, बैंक आफ इंग्लैंड, जर्मन चांसलरी और डेनमार्क सरकार के पास एलेप्पो गाल से स्याही बनाने के विशेष फार्मूले हैं। अधिकांश गाल्स का स्वाद उनके पोषक पौधे जैसा होता है।

तो इस गाल में हैं शामिल हैं, एक स्वपोषी पौधा (ओक), एक शाकाहारी परपोषी जन्तु (बेलोनानीमा ट्रीटी) और साथ में एक परजीवी प्रेमलता (कैसिथा फिलीफॉर्मिस)। ऐसा तिहरा सम्बंध जीवजगत में काफी पाया जाता है और जीवन की रणनीति का एक हिस्सा है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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