
सतत विकास लक्ष्यों (SDG) के तहत संयुक्त राष्ट्र (United Nations )ने 2015 में विश्व के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया था: वर्ष 2030 तक नवजात शिशुओं की मृत्यु दर घटाकर प्रति 1000 जीवित जन्म पर 12 या उससे कम करना। नवजात शिशु मृत्यु दर यानी जन्म के पहले महीने (neonatal deaths) में होने वाली मृत्यु। लक्ष्य पूरा होने में सिर्फ 4 साल बाकी हैं, और 60 से ज़्यादा देशों के लिए इस लक्ष्य को पाना दूर की कौड़ी है। मसलन, केन्या 2014 के बाद से अब तक प्रति 1000 जीवित जन्मों पर सिर्फ एक मृत्यु कम कर पाया है। वहां नवजात शिशु मृत्यु दर 22 से घटकर महज़ 21 हुई है।
हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सम्मेलन (maternal neonatal health conference) हुआ, जिसमें प्रगति की धीमी रफ्तार पर और इस बात पर चर्चा हुई कि इसे गति कैसे दी जाए। इस दिशा में काम कर रहे शोधकर्ता, नीति-निर्माता और पैरोकार का कहना है कि असल में हमें मृत्यु के कारण पता हैं, उनके उपाय भी पता हैं। लेकिन वित्तीय कमी (health funding crisis) और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव इस काम में रोड़े डालते हैं।
नवजात शिशु मृत्यु दर पर 17 मार्च को संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रिपोर्ट बताती है कि अब भी हर साल 23 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु होती है (अकेले अफ्रीका में सालाना 11 लाख)। यह संख्या एड्स (AIDS deaths comparison) और कई अन्य गंभीर बीमारियों से होने वाली मौतों से कहीं ज़्यादा है। इन मौतों का सबसे बड़ा कारण है समय-पूर्व जन्म; 18 प्रतिशत मौतें इसी वजह से होती हैं। जन्म के समय दम घुटना व आघात (birth asphyxia), निमोनिया (pneumonia infection), मलेरिया और डायरिया मृत्यु के अन्य प्रमुख कारण हैं।
अफ्रीका में ज़्यादातर महिलाएं स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों में प्रसव (hospital delivery) करती हैं, जो घर की तुलना में कहीं ज़्यादा सुरक्षित जगह है। लेकिन फिर भी वहां हर साल 11 लाख नवजातों की मृत्यु होती है। अध्ययन बताते हैं कि इसका कारण स्वास्थ्य केंद्रों में मिलने वाली अपर्याप्त देखभाल (poor healthcare quality) है। एक अध्ययन में चार देशों – मलावी, तंजानिया, नाइजीरिया और केन्या – के 60 अस्पतालों की नवजात स्वास्थ्य इकाइयों में 18 महीनों (540 दिन) तक बिजली कटौती (power outage hospitals) पर नज़र रखी गई। पाया गया कि अस्पतालों में लगभग 200 दिनों तक बिजली कटौती हुई, जिससे इनक्यूबेटर, ऑक्सीजन सप्लाई और मॉनीटरिंग उपकरणों के काम करने में बाधा आई। प्रशिक्षित नर्सों (nurse shortage) की कमी एक और बड़ी समस्या है। तंजानिया में ही नवजातों की देखभाल के लिए 2000 से अधिक नर्सों की कमी है।
केन्या में, 1,30,000 नवजात शिशुओं के आंकड़ों (data analysis) के विश्लेषण से पता चला है कि जिन शिशुओं को इलाज के लिए दूसरे अस्पताल में रेफर किया गया, उनके मरने की संभावना उन शिशुओं की तुलना में तीन गुना ज़्यादा थी जिन्हें उसी अस्पताल में इलाज मिला जहां उनका जन्म हुआ था।
इसका एक कारण यह है कि अधिकतर गंभीर रूप से बीमार शिशुओं को ही रेफर किया जाता है। लेकिन आग में घी का काम करते हैं प्रसव वाले अस्पताल में मिली खराब या अपर्याप्त देखभाल (inadequate treatment), आवश्यक सुविधाओं-रहित वाहन (एंबुलेंस) और रेफर किए गए अस्पताल में भर्ती में देरी।
इन सब कारणों और समस्याओं के हल (healthcare solutions) हैं हमारे पास। 2019 में, 23 संगठनों (जिनमें से ज़्यादातर अफ्रीका के थे) ने मिलकर न्यूबॉर्न एसेंशियल सॉल्यूशंस एंड टेक्नॉलॉजीस (NEST360) नामक एक संगठन बनाया था, जिसका मकसद उन पांच देशों के 130 अस्पतालों में देखभाल को बेहतर करना है जहां नवजात शिशुओं की मृत्यु दर सबसे ज़्यादा है: केन्या, मलावी, नाइजीरिया, तंजानिया और इथियोपिया। NEST360 ने इन अस्पतालों में सस्ते उपकरण (जैसे इनक्यूबेटर और थर्मल गद्दे), सांस लेने के सहायक उपकरण और पीलिया के इलाज के लिए मशीनें वगैरह उपलब्ध करवाईं।
इसके अलावा उन्होंने डॉक्टरों और तकनीशियनों (medical training) को उपकरणों की देखभाल तथा कामकाजी रखने का प्रशिक्षण दिया। साथ ही उन्होंने उपकरण संचालकों को उपकरणों के सही इस्तेमाल के तरीके बताए। क्योंकि यदि उपकरणों का ठीक से इस्तेमाल न किया जाए, तो मामला और बिगड़ सकता है। जैसे, सांस लेने में सहायक उपकरणों के सुरक्षित उपयोग (oxygen monitoring) के लिए ऑक्सीजन के स्तर की सावधानीपूर्वक निगरानी की आवश्यक होती है, वर्ना यह आंखों को नुकसान पहुंच सकता है। NEST360 गैर-तकनीकी उपायों को भी अपनाने को बढ़ावा देता है। जैसे वे कंगारू मदर केयर – यानी शिशुओं का मां से सीधा (त्वचा से त्वचा) संपर्क।
यह भी देखा गया कि जन्म के समय शिशुओं का और अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्रों से जुड़े डैटा (health data systems) को व्यवस्थित और अपडेट रखना भी उपचार के सही फैसले लेने में मदद कर सकता है। इससे अस्पताल के कर्मचारियों को बेहतर फैसले लेने (data driven decisions) में मदद मिल सकती है क्योंकि इनसे पता चलता है कि कौन-सा उपाय काम कर रहा है और कौन-सा नहीं। ये डैटा सरकारी योजनाओं को दिशा दे सकते हैं।
65 सहभागी अस्पतालों के शुरुआती विश्लेषण से पता चलता है कि नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में काफी कमी आई है। सबसे ज़्यादा फायदा उन शिशुओं को हुआ है जो सबसे ज़्यादा जोखिम में थे, खासकर उन समय-पूर्व जन्मे बच्चों को फायदा हुआ जिन्हें सांस लेने में दिक्कत थी। मलावी (Malawi success case) इस मामले में सबसे अलग है: यहां 2019 और 2025 के बीच अस्पतालों में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में 23 प्रतिशत की कमी हुई है, और यह अफ्रीका के उन गिने-चुने देशों में से एक है जो 2030 तक SDG लक्ष्य को हासिल कर सकता है। अफ्रीका में प्रगति तो हो रही है लेकिन रफ्तार पर्याप्त नहीं है।
दक्षिण एशिया (South Asia progress) के कुछ देश इस दिशा में प्रगति पर हैं। दी लैंसेट में प्रकाशित अध्ययनों के निष्कर्ष बताते हैं कि पाकिस्तान ने 1990 से 2024 के बीच लगातार प्रगति की है, हालांकि वह अभी भी SDG लक्ष्य से बहुत पीछे है। दूसरी ओर, भारत, नेपाल और बांग्लादेश (India Nepal Bangladesh success) के प्रयास सफल दिखते हैं।
फंडिंग की कमी (global health funding) प्रगति में आड़े आ रही है। हेल्थ इकोनॉमिस्ट एलिस टारस कहती हैं कि हमेशा से नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य को मातृ और प्रजनन स्वास्थ्य (maternal health funding) की तुलना में कम फंडिंग मिली है। ऐसा मान लिया जाता है कि मातृ स्वास्थ्य को फंड करने से बच्चे अपने आप पूरी तरह सुरक्षा के दायरे में आ जाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।
वहीं, वैश्विक स्वास्थ्य सहायता (global aid cuts) में हुई भारी कटौती पिछले दो दशकों की प्रगति को बेअसर कर सकती है। फंडिंग के हालात पिछले साल और भी खराब हो गए। स्वास्थ्य से सम्बंधित एक गैर-मुनाफा संस्था PATH की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, मातृ, नवजात और शिशु स्वास्थ्य (maternal child health funding) को मिलने वाली वित्तीय सहायता 2025 में लगभग आधी हो गई (1.66 अरब डॉलर से घटकर 85 करोड़ डॉलर हो गई)। रिपोर्ट का अनुमान है कि अगर इस कमी की भरपाई नहीं की गई, तो 2040 तक 80 लाख से ज़्यादा शिशुओं की और 10 लाख से ज़्यादा माताओं की मौत हो सकती है। अफ्रीका समेत सभी देशों की सरकारों को अपने-अपने स्वास्थ्य बजट (health budget increase) बढ़ाने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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