
लॉस एंजिल्स की अदालत (Los Angeles court case) के एक अहम फैसले में सोशल मीडिया कंपनियों पर सख्त नियंत्रण की मांग करने वालों को बड़ी जीत मिली है। ज्यूरी ने माना कि बड़ी टेक कंपनियों ने जानबूझकर ऐसे प्लेटफॉर्म बनाए जो लोगों को ‘लत’ (addictive platforms) लगा देते हैं। अदालत ने स्वीकार किया कि इसी के चलते 20 वर्षीय युवती (कैली – के.जी.एम.) की मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचा है। 20 साल की कैली द्वारा दायर यह मामला इस बात में बदलाव ला सकता है कि समाज बच्चों के प्रति सोशल मीडिया कंपनियों की ज़िम्मेदारी (platform accountability) को कैसे देखता है।
कैली द्वारा अदालत को दिए बयान के अनुसार, उसने बहुत कम उम्र में ही यूट्यूब और इंस्टाग्राम (YouTube Instagram usage) का इस्तेमाल शुरू कर दिया था, जबकि नियम इसके खिलाफ थे। धीरे-धीरे उसका इन प्लेटफॉर्म्स पर व्यतीत समय इतना बढ़ गया कि उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित होने लगी। वह परिवार से दूर रहने लगी और घंटों ऑनलाइन रहने लगी। लगभग 10 साल की उम्र में उसे दुश्चिंता और अवसाद (anxiety depression) जैसी समस्याएं होने लगीं, जिसकी पुष्टि बाद में डॉक्टर ने भी की। साथ ही उसे अपने शरीर को लेकर ज़रूरत से ज़्यादा चिंता रहने लगी।
ज्यूरी ने यह भी पाया कि मेटा (Meta platforms) (इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सऐप) और गूगल (यूट्यूब) (Google YouTube) ने ऐसे फीचर्स बनाए जो लोगों को ज़्यादा समय तक ऑनलाइन बांधे रखते हैं, जिससे कैली की मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ा। अदालत ने उसे 60 लाख डॉलर का मुआवज़ा देने का आदेश दिया, जिसमें मेटा को ज़्यादा हिस्सा देना होगा। यह फैसला सिर्फ कैली के लिए ही नहीं, बल्कि अमेरिका में चल रहे ऐसे सैकड़ों मामलों (legal precedent) के लिए भी महत्वपूर्ण नज़ीर माना जा रहा है।
इस मामले का मुख्य मुद्दा यह था कि सोशल मीडिया के कुछ फीचर्स – जैसे लगातार स्क्रॉल करना और एल्गोरिदम के अनुसार कंटेंट दिखाना (content recommendation system) – इरादतन इस तरह बनाए गए थे कि लोग ज़्यादा समय तक जुड़े रहें। कैली के वकीलों ने इन्हें ‘लत लगाने वाली मशीन’ बताया और कहा कि कंपनियों को इसके असर का पता था, खासकर बच्चों पर। लेकिन उन्होंने नुकसान रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि कम उम्र के यूज़र्स को जोड़कर रखना कंपनियों का बड़ा लक्ष्य (user engagement strategy) था।
कंपनियों ने इस फैसले को मानने से इन्कार (legal appeal) किया है और अपील करने की बात कही है। मेटा का कहना है कि किशोरों की मानसिक समस्याएं कई कारणों से होती हैं, सिर्फ एक प्लेटफॉर्म को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। गूगल ने कहा कि यूट्यूब तो एक वीडियो सेवा (video platform) है, न कि पारंपरिक सोशल मीडिया। लेकिन ज्यूरी ने माना कि दोनों कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्म को बनाने और चलाने में गंभीर लापरवाही (corporate negligence) की है।
यह मामला ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में बच्चों पर सोशल मीडिया के असर (social media effects on children) को लेकर चिंता बढ़ रही है। हाल के महीनों में कई और फैसलों में भी कंपनियों को हानिकारक या अनुचित कंटेंट दिखाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि अब लोगों की सोच बदल रही है और टेक कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे मुनाफे और यूज़र एंगेजमेंट (profit vs safety) से ज़्यादा यूज़र की सुरक्षा को प्राथमिकता दें।
अब सरकारें भी इस मुद्दे पर कदम (government regulation) उठाने लगी हैं। कुछ देशों ने नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने या सीमाएं तय करने की शुरुआत कर दी है। ब्रिटेन (UK social media policy) में यह भी विचार हो रहा है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। इससे संकेत मिलता है कि सरकारें मान रही हैं कि मौजूदा सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं और सख्त नियमों (strict laws) की ज़रूरत है।
अभियान चलाने वालों और प्रभावित परिवारों (advocacy groups) ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि अब सोशल मीडिया से जुड़े खतरों को गंभीरता से लिया जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि असली बदलाव सिर्फ अदालत के फैसलों से नहीं आएगा, बल्कि इसके लिए कड़े नियम (policy reforms) और कंपनियों में सुधार भी ज़रूरी होंगे।
बहरहाल, यह मामला एक बड़ी बहस को सामने लाता है – तकनीकी विकास, मुनाफा और लोगों की सेहत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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