यह जानकर हैरानी होगी कि तंबाकू (tobacco plant research) (जिससे बीड़ी-सिगरेट बनाई जाती हैं) अवसाद, चिंता और ट्रॉमा-उपरांत तनाव जैसे मानसिक विकारों का उपचार करने में सहायक हो सकती है।
हालिया शोध (scientific study) में वैज्ञानिकों ने पांच नशीले पदार्थों (psychedelic compounds) को एक साथ तंबाकू के पौधों में पनपाने का प्रयास किया है। इनमें से कुछ हैं – जादुई मशरूम के साइलोसाइबिन, अयाहुआस्का के अवयव और मेंढकों की आंखों से स्रावित होने वाले ब्यूफोटेनिन पदार्थ। यह खोज साइंस एडवांसेस पत्रिका (Science Advances journal) में प्रकाशित हुई है।
वैज्ञानिक लंबे समय से इस खोज (biochemical pathways) में लगे हैं कि पौधे और कुछ जंतु मतिभ्रामक (अफीमी) पदार्थ कैसे बनाते हैं। आखिरकार, अब वे कुछ पदार्थों के बनने की पूरी प्रक्रिया पता करने में सफल हो गए हैं। इस अध्ययन में उन्होंने ट्रिप्टोफेन नामक अमीनो एसिड से N,N-डाइमेथाइलट्रिप्टामाइन (DMT) बनने की प्रक्रिया समझी। DMT प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला मनोभ्रामक (साइकेडेलिक) पदार्थ है। यह प्रबल मतिभ्रम (hallucination effects) और मायावी मानसिक अनुभव देता है – अवास्तविक और अलौकिक चीज़ें घटने का अहसास कराता है। इसका असर तेज़ी से होता है, लेकिन बहुत कम समय तक रहता है। DMT अमेज़न के पारंपरिक नशीले पेय अयाहुआस्का का मुख्य घटक है। इसे अमेज़न के जंगल में पाए जाने वाले चक्रुना (साइकोट्रिया विरिडिस) पौधे से बनाया जाता है।
वैज्ञानिकों ने कई पौधों में DMT की मात्रा मापी (plant genetics study), जिसमें से उन्हें ऐसे दो पौधे मिले जिनमें DMT की मात्रा सबसे अधिक थी – साइकोट्रिया विरिडिस और अकेशिया एक्यूमिनाटा। उन्होंने इन दो पौधों के ऊतकों में दो ऐसे सक्रिय जीन खोजे जो DMT बनाने वाले एंज़ाइम बनाते हैं।
अगले चरण में शोधकर्ताओं ने जीन संपादन तकनीक से इन दो जीन्स को तंबाकू के जीनोम में जोड़ दिया। तंबाकू के पौधों को ही शोधकर्ताओं ने इस कार्य के लिए इसलिए चुना क्योंकि तंबाकू के पौधे बहुत ज़्यादा ट्रिप्टोफेन (high tryptophan levels) बनाते हैं और ट्रिप्टोफेन DMT का पूर्ववर्ती है। ट्रिप्टोफेन की प्रचुरता ने ही शोधकर्ताओं को तंबाकू में अन्य ट्रिप्टोफेन-आधारित अफीमी पदार्थ (bioengineered compounds) भी बनवाने की प्रेरणा दी – जैसे साइलोसाइबिन, ब्यूफोटेनिन और 5-मेथॉक्सी-डीएमटी।
कुछ चुनौतियां भी सामने आईं। जैसे शुरू में तंबाकू के पौधे ने 5-मेथॉक्सी-डीएमटी बहुत कम बनाया। तो, उन्होंने AlphaFold3 (AI protein modeling) नामक एआई सॉफ्टवेयर की मदद से पता लगाया कि मुख्य एंज़ाइम ठीक से काम क्यों नहीं कर रहा। जीन में परिवर्तन करने के बाद तंबाकू के पौधों ने पहले से 40 गुना अधिक 5-मेथॉक्सी-डीएमटी बनाया।
फिर, शोधकर्ता तंबाकू के पौधों में अलग-अलग मादक पदार्थ बनाने के जीन (synthetic biology) जोड़ते गए और एक ही पौधे में पांच अलग-अलग प्रकार के नशीले पदार्थ (multi compound production) एक साथ बनाने में सफल हुए। हालांकि एक साथ बनने के कारण हर पदार्थ कम मात्रा में बना लेकिन उम्मीद है अधिक अध्ययन करके एक दिन पदार्थों की काफी मात्रा बन पाएगी और तंबाकू के ज़रिए तनाव (mental health treatment) का इलाज संभव हो जाएगा।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zy5rmbg/full/_20260401_on_psychedelic_tobacco.jpg
सतत विकास लक्ष्यों (SDG) के तहत संयुक्त राष्ट्र (United Nations )ने 2015 में विश्व के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया था: वर्ष 2030 तक नवजात शिशुओं की मृत्यु दर घटाकर प्रति 1000 जीवित जन्म पर 12 या उससे कम करना। नवजात शिशु मृत्यु दर यानी जन्म के पहले महीने (neonatal deaths) में होने वाली मृत्यु। लक्ष्य पूरा होने में सिर्फ 4 साल बाकी हैं, और 60 से ज़्यादा देशों के लिए इस लक्ष्य को पाना दूर की कौड़ी है। मसलन, केन्या 2014 के बाद से अब तक प्रति 1000 जीवित जन्मों पर सिर्फ एक मृत्यु कम कर पाया है। वहां नवजात शिशु मृत्यु दर 22 से घटकर महज़ 21 हुई है।
हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सम्मेलन (maternal neonatal health conference) हुआ, जिसमें प्रगति की धीमी रफ्तार पर और इस बात पर चर्चा हुई कि इसे गति कैसे दी जाए। इस दिशा में काम कर रहे शोधकर्ता, नीति-निर्माता और पैरोकार का कहना है कि असल में हमें मृत्यु के कारण पता हैं, उनके उपाय भी पता हैं। लेकिन वित्तीय कमी (health funding crisis) और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव इस काम में रोड़े डालते हैं।
नवजात शिशु मृत्यु दर पर 17 मार्च को संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रिपोर्ट बताती है कि अब भी हर साल 23 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु होती है (अकेले अफ्रीका में सालाना 11 लाख)। यह संख्या एड्स (AIDS deaths comparison) और कई अन्य गंभीर बीमारियों से होने वाली मौतों से कहीं ज़्यादा है। इन मौतों का सबसे बड़ा कारण है समय-पूर्व जन्म; 18 प्रतिशत मौतें इसी वजह से होती हैं। जन्म के समय दम घुटना व आघात (birth asphyxia), निमोनिया (pneumonia infection), मलेरिया और डायरिया मृत्यु के अन्य प्रमुख कारण हैं।
अफ्रीका में ज़्यादातर महिलाएं स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों में प्रसव (hospital delivery) करती हैं, जो घर की तुलना में कहीं ज़्यादा सुरक्षित जगह है। लेकिन फिर भी वहां हर साल 11 लाख नवजातों की मृत्यु होती है। अध्ययन बताते हैं कि इसका कारण स्वास्थ्य केंद्रों में मिलने वाली अपर्याप्त देखभाल (poor healthcare quality) है। एक अध्ययन में चार देशों – मलावी, तंजानिया, नाइजीरिया और केन्या – के 60 अस्पतालों की नवजात स्वास्थ्य इकाइयों में 18 महीनों (540 दिन) तक बिजली कटौती (power outage hospitals) पर नज़र रखी गई। पाया गया कि अस्पतालों में लगभग 200 दिनों तक बिजली कटौती हुई, जिससे इनक्यूबेटर, ऑक्सीजन सप्लाई और मॉनीटरिंग उपकरणों के काम करने में बाधा आई। प्रशिक्षित नर्सों (nurse shortage) की कमी एक और बड़ी समस्या है। तंजानिया में ही नवजातों की देखभाल के लिए 2000 से अधिक नर्सों की कमी है।
केन्या में, 1,30,000 नवजात शिशुओं के आंकड़ों (data analysis) के विश्लेषण से पता चला है कि जिन शिशुओं को इलाज के लिए दूसरे अस्पताल में रेफर किया गया, उनके मरने की संभावना उन शिशुओं की तुलना में तीन गुना ज़्यादा थी जिन्हें उसी अस्पताल में इलाज मिला जहां उनका जन्म हुआ था।
इसका एक कारण यह है कि अधिकतर गंभीर रूप से बीमार शिशुओं को ही रेफर किया जाता है। लेकिन आग में घी का काम करते हैं प्रसव वाले अस्पताल में मिली खराब या अपर्याप्त देखभाल (inadequate treatment), आवश्यक सुविधाओं-रहित वाहन (एंबुलेंस) और रेफर किए गए अस्पताल में भर्ती में देरी।
इन सब कारणों और समस्याओं के हल (healthcare solutions) हैं हमारे पास। 2019 में, 23 संगठनों (जिनमें से ज़्यादातर अफ्रीका के थे) ने मिलकर न्यूबॉर्न एसेंशियल सॉल्यूशंस एंड टेक्नॉलॉजीस (NEST360) नामक एक संगठन बनाया था, जिसका मकसद उन पांच देशों के 130 अस्पतालों में देखभाल को बेहतर करना है जहां नवजात शिशुओं की मृत्यु दर सबसे ज़्यादा है: केन्या, मलावी, नाइजीरिया, तंजानिया और इथियोपिया। NEST360 ने इन अस्पतालों में सस्ते उपकरण (जैसे इनक्यूबेटर और थर्मल गद्दे), सांस लेने के सहायक उपकरण और पीलिया के इलाज के लिए मशीनें वगैरह उपलब्ध करवाईं।
इसके अलावा उन्होंने डॉक्टरों और तकनीशियनों (medical training) को उपकरणों की देखभाल तथा कामकाजी रखने का प्रशिक्षण दिया। साथ ही उन्होंने उपकरण संचालकों को उपकरणों के सही इस्तेमाल के तरीके बताए। क्योंकि यदि उपकरणों का ठीक से इस्तेमाल न किया जाए, तो मामला और बिगड़ सकता है। जैसे, सांस लेने में सहायक उपकरणों के सुरक्षित उपयोग (oxygen monitoring) के लिए ऑक्सीजन के स्तर की सावधानीपूर्वक निगरानी की आवश्यक होती है, वर्ना यह आंखों को नुकसान पहुंच सकता है। NEST360 गैर-तकनीकी उपायों को भी अपनाने को बढ़ावा देता है। जैसे वे कंगारू मदर केयर – यानी शिशुओं का मां से सीधा (त्वचा से त्वचा) संपर्क।
यह भी देखा गया कि जन्म के समय शिशुओं का और अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्रों से जुड़े डैटा (health data systems) को व्यवस्थित और अपडेट रखना भी उपचार के सही फैसले लेने में मदद कर सकता है। इससे अस्पताल के कर्मचारियों को बेहतर फैसले लेने (data driven decisions) में मदद मिल सकती है क्योंकि इनसे पता चलता है कि कौन-सा उपाय काम कर रहा है और कौन-सा नहीं। ये डैटा सरकारी योजनाओं को दिशा दे सकते हैं।
65 सहभागी अस्पतालों के शुरुआती विश्लेषण से पता चलता है कि नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में काफी कमी आई है। सबसे ज़्यादा फायदा उन शिशुओं को हुआ है जो सबसे ज़्यादा जोखिम में थे, खासकर उन समय-पूर्व जन्मे बच्चों को फायदा हुआ जिन्हें सांस लेने में दिक्कत थी। मलावी (Malawi success case) इस मामले में सबसे अलग है: यहां 2019 और 2025 के बीच अस्पतालों में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में 23 प्रतिशत की कमी हुई है, और यह अफ्रीका के उन गिने-चुने देशों में से एक है जो 2030 तक SDG लक्ष्य को हासिल कर सकता है। अफ्रीका में प्रगति तो हो रही है लेकिन रफ्तार पर्याप्त नहीं है।
दक्षिण एशिया (South Asia progress) के कुछ देश इस दिशा में प्रगति पर हैं। दी लैंसेट में प्रकाशित अध्ययनों के निष्कर्ष बताते हैं कि पाकिस्तान ने 1990 से 2024 के बीच लगातार प्रगति की है, हालांकि वह अभी भी SDG लक्ष्य से बहुत पीछे है। दूसरी ओर, भारत, नेपाल और बांग्लादेश (India Nepal Bangladesh success) के प्रयास सफल दिखते हैं।
फंडिंग की कमी (global health funding) प्रगति में आड़े आ रही है। हेल्थ इकोनॉमिस्ट एलिस टारस कहती हैं कि हमेशा से नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य को मातृ और प्रजनन स्वास्थ्य (maternal health funding) की तुलना में कम फंडिंग मिली है। ऐसा मान लिया जाता है कि मातृ स्वास्थ्य को फंड करने से बच्चे अपने आप पूरी तरह सुरक्षा के दायरे में आ जाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।
वहीं, वैश्विक स्वास्थ्य सहायता (global aid cuts) में हुई भारी कटौती पिछले दो दशकों की प्रगति को बेअसर कर सकती है। फंडिंग के हालात पिछले साल और भी खराब हो गए। स्वास्थ्य से सम्बंधित एक गैर-मुनाफा संस्था PATH की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, मातृ, नवजात और शिशु स्वास्थ्य (maternal child health funding) को मिलने वाली वित्तीय सहायता 2025 में लगभग आधी हो गई (1.66 अरब डॉलर से घटकर 85 करोड़ डॉलर हो गई)। रिपोर्ट का अनुमान है कि अगर इस कमी की भरपाई नहीं की गई, तो 2040 तक 80 लाख से ज़्यादा शिशुओं की और 10 लाख से ज़्यादा माताओं की मौत हो सकती है। अफ्रीका समेत सभी देशों की सरकारों को अपने-अपने स्वास्थ्य बजट (health budget increase) बढ़ाने की ज़रूरत है।(स्रोत फीचर्स)
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तितलियां फूलों से मकरंद चूसती (nectar feeding) हैं। वालरस और अधिकतर मछलियां अपने भोजन का भक्षण चूस कर करती हैं। हम मनुष्य भी कितनी ही चीज़ें चूसकर निगलते हैं। लेकिन पक्षी? वैज्ञानिकों ने अब तक पक्षियों में चूसने की क्रिया नहीं देखी थी। लेकिन करंट बायोलॉजी (Current Biology journal) में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि सनबर्ड मकरंदपान चूसकर ही करते हैं। यह खोज और भी रोमांचक इसलिए है कि हम मनुष्य या अन्य कशेरुकी जब चूसकर किसी चीज़ का पान करते हैं तो मुंह थोड़ा सिकोड़ते हैं। लेकिन सनबर्ड में यह पहला मामला देखने को मिला है जब कोई कशेरूकी बिना अपने मुंह का आकार बदले, सिर्फ अपनी जीभ से पैदा किए गए सक्शन (खिंचाव) (tongue suction mechanism) के ज़रिए कुछ पान करता है।
सनबर्ड और हमिंगबर्ड (hummingbird comparison) की चोंच पतली व लंबी होती है, जो अभिसारी विकास का उदाहरण है। अभिसारी विकास यानी कई अलग-अलग असम्बंधित प्रजातियों में एक से पर्यावरणीय दवाब के कारण एक जैसे अंगों का विकास। जीवविज्ञानी डेविड क्यूबन (David Hu research) की इनमें दिलचस्पी जगी। ये दोनों तरह के पक्षी आम तौर पर अपनी चोंच की मदद से घंटीनुमा फूलों के अंदर मौजूद मकरंद को पी लेते हैं। हमिंगबर्ड के मकरंद पीने का तरीका ऐसा है कि वे अपनी जीभ को बार-बार बाहर निकालते हैं, जिससे जीभ की नोक पर मकरंद चिपक जाता है। फिर वे जीभ को चोंच के अंदर ले जाते हैं और चोंच को कसकर बंद करके जीभ को निचोड़ते (capillary action feeding) हैं जिससे मकरंद उनके मुंह में आ जाता है, ठीक वैसे ही जैसे तौलिए को निचोड़ने से पानी निकलता है।
वाशिंगटन युनिवर्सिटी (University of Washington study) के क्यूबन जानना चाहते थे कि क्या सनबर्ड भी ऐसा ही करती हैं या उनके रसपान का तरीका अलग है। यह पता करने के लिए उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया में सनबर्ड की सात प्रजातियों का हाई-स्पीड कैमरे (high speed camera analysis) की मदद से मकरंदपान का वीडियो बनाया। इसके लिए उन्होंने थ्री-डी प्रिंटर की मदद से नकली फूल बनाए। इन फूल के निचले हिस्से को एक स्क्रीन के नीचे रखा, ताकि वे पक्षियों को परेशान किए बिना उनकी जीभ की हरकत को फिल्मा सकें। चूंकि सनबर्ड की जीभ पारभासी होती है, इसलिए वे जीभ से बहते हुए मकरंद को देख सकते थे। आप भी इस प्रक्रिया का आनंद इन वेबसाइट्स पर ले सकते हैं:
वीडियो ध्यान से देखने पर पता चला कि हमिंगबर्ड के विपरीत, सनबर्ड ने अपनी जीभ को फूल के अंदर सिर्फ एक बार डाला। उन्होंने जीभ को वहीं रखा जब तक कि पूरा मकरंद नहीं पी लिया और तब तक अपनी चोंच भी बंद नहीं की। देखा गया कि सनबर्ड मकरंदपान (feeding pattern) करते समय अपनी जीभ को बस थोड़ा सा ही अंदर खींचते थे। और कभी-कभी चोंच के अंदर जीभ को ऊपर-नीचे भी करते थे।
क्यूबन और उनके साथियों (scientific findings) का कहना है कि जीभ की ऐसी हरकत सनबर्ड की जीभ की बनावट के साथ मिलकर, एक खिंचाव (suction) पैदा करती है। इन पक्षियों की जीभ के ऊपरी हिस्से पर एक V-आकार की नाली होती है। जब वे अपनी जीभ को चोंच के ऊपरी हिस्से से दबाते हैं, तो वह चपटी हो जाती है और नाली सिकुड़ जाती है। जीभ को नीचे की ओर खींचने से चोंच के ऊपरी हिस्से और नाली के बीच जगह बन जाती है, जिससे एक खिंचाव (fluid dynamics mechanism) पैदा होता है जो फूलों से रस को अंदर खींच लेता है। टीम ने तरल पदार्थों की गतिशीलता की कंप्यूटर मॉडलिंग की और इससे उन्हें समझ आया कि रस को अंदर खींचने के संभावित अन्य कारणों, जैसे केशिका क्रिया (capillary action), इस मामले में काम नहीं करते। यह जानना कि सनबर्ड अपनी जीभ का इस्तेमाल खाने के लिए कैसे करते हैं, इस बात को समझने में मदद कर सकता है कि फूलों के साथ उनका विकास एक साथ कैसे हुआ और हमिंगबर्ड की तुलना में उनके खाने का तरीका अलग क्यों है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://news.berkeley.edu/wp-content/uploads/2026/04/Malachite-Sunbird_Photo_Keith-Barnes-crop-1536×878.jpg
लॉस एंजिल्स की अदालत (Los Angeles court case) के एक अहम फैसले में सोशल मीडिया कंपनियों पर सख्त नियंत्रण की मांग करने वालों को बड़ी जीत मिली है। ज्यूरी ने माना कि बड़ी टेक कंपनियों ने जानबूझकर ऐसे प्लेटफॉर्म बनाए जो लोगों को ‘लत’ (addictive platforms) लगा देते हैं। अदालत ने स्वीकार किया कि इसी के चलते 20 वर्षीय युवती (कैली – के.जी.एम.) की मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचा है। 20 साल की कैली द्वारा दायर यह मामला इस बात में बदलाव ला सकता है कि समाज बच्चों के प्रति सोशल मीडिया कंपनियों की ज़िम्मेदारी (platform accountability) को कैसे देखता है।
कैली द्वारा अदालत को दिए बयान के अनुसार, उसने बहुत कम उम्र में ही यूट्यूब और इंस्टाग्राम (YouTube Instagram usage) का इस्तेमाल शुरू कर दिया था, जबकि नियम इसके खिलाफ थे। धीरे-धीरे उसका इन प्लेटफॉर्म्स पर व्यतीत समय इतना बढ़ गया कि उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित होने लगी। वह परिवार से दूर रहने लगी और घंटों ऑनलाइन रहने लगी। लगभग 10 साल की उम्र में उसे दुश्चिंता और अवसाद (anxiety depression) जैसी समस्याएं होने लगीं, जिसकी पुष्टि बाद में डॉक्टर ने भी की। साथ ही उसे अपने शरीर को लेकर ज़रूरत से ज़्यादा चिंता रहने लगी।
ज्यूरी ने यह भी पाया कि मेटा (Meta platforms) (इंस्टाग्राम, फेसबुक, व्हाट्सऐप) और गूगल (यूट्यूब) (Google YouTube) ने ऐसे फीचर्स बनाए जो लोगों को ज़्यादा समय तक ऑनलाइन बांधे रखते हैं, जिससे कैली की मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ा। अदालत ने उसे 60 लाख डॉलर का मुआवज़ा देने का आदेश दिया, जिसमें मेटा को ज़्यादा हिस्सा देना होगा। यह फैसला सिर्फ कैली के लिए ही नहीं, बल्कि अमेरिका में चल रहे ऐसे सैकड़ों मामलों (legal precedent) के लिए भी महत्वपूर्ण नज़ीर माना जा रहा है।
इस मामले का मुख्य मुद्दा यह था कि सोशल मीडिया के कुछ फीचर्स – जैसे लगातार स्क्रॉल करना और एल्गोरिदम के अनुसार कंटेंट दिखाना (content recommendation system) – इरादतन इस तरह बनाए गए थे कि लोग ज़्यादा समय तक जुड़े रहें। कैली के वकीलों ने इन्हें ‘लत लगाने वाली मशीन’ बताया और कहा कि कंपनियों को इसके असर का पता था, खासकर बच्चों पर। लेकिन उन्होंने नुकसान रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि कम उम्र के यूज़र्स को जोड़कर रखना कंपनियों का बड़ा लक्ष्य (user engagement strategy) था।
कंपनियों ने इस फैसले को मानने से इन्कार (legal appeal) किया है और अपील करने की बात कही है। मेटा का कहना है कि किशोरों की मानसिक समस्याएं कई कारणों से होती हैं, सिर्फ एक प्लेटफॉर्म को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। गूगल ने कहा कि यूट्यूब तो एक वीडियो सेवा (video platform) है, न कि पारंपरिक सोशल मीडिया। लेकिन ज्यूरी ने माना कि दोनों कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्म को बनाने और चलाने में गंभीर लापरवाही (corporate negligence) की है।
यह मामला ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में बच्चों पर सोशल मीडिया के असर (social media effects on children) को लेकर चिंता बढ़ रही है। हाल के महीनों में कई और फैसलों में भी कंपनियों को हानिकारक या अनुचित कंटेंट दिखाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि अब लोगों की सोच बदल रही है और टेक कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे मुनाफे और यूज़र एंगेजमेंट (profit vs safety) से ज़्यादा यूज़र की सुरक्षा को प्राथमिकता दें।
अब सरकारें भी इस मुद्दे पर कदम (government regulation) उठाने लगी हैं। कुछ देशों ने नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने या सीमाएं तय करने की शुरुआत कर दी है। ब्रिटेन (UK social media policy) में यह भी विचार हो रहा है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। इससे संकेत मिलता है कि सरकारें मान रही हैं कि मौजूदा सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं और सख्त नियमों (strict laws) की ज़रूरत है।
अभियान चलाने वालों और प्रभावित परिवारों (advocacy groups) ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि अब सोशल मीडिया से जुड़े खतरों को गंभीरता से लिया जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि असली बदलाव सिर्फ अदालत के फैसलों से नहीं आएगा, बल्कि इसके लिए कड़े नियम (policy reforms) और कंपनियों में सुधार भी ज़रूरी होंगे।
बहरहाल, यह मामला एक बड़ी बहस को सामने लाता है – तकनीकी विकास, मुनाफा और लोगों की सेहत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://s.yimg.com/lo/mysterio/api/EAA607D8402D3D247AA84161D5576550FAA67D5C1D3A51F03683C6AF850BDBC0/subgraphmysterio/resizefit_w960_h640;quality_80;format_webp/https:%2F%2Fmedia.zenfs.com%2Fen%2Faol_bbc_articles_618%2Fb43bc078cf7a0ce4f38750618f63782a