सुशील जोशी

आने वाले मौसम का अनुमान करना या भविष्यवाणी करना हमारा एक प्रमुख सरोकार रहा है। आखिर मौसमों के नियमित परिवर्तन से हमारा जीवन अभिन्न रूप से जुड़ा है। परंतु मौसम में भी सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण स्थान बारिश होने, न होने का रहा है। इस सम्बंध में भविष्यवाणियां काफी प्राचीन काल से की जाती रही है। इन भविष्यवाणियों का प्रमुख आधार जंतुओं व वनस्पतियों के व्यवहार में होने वाले परिवर्तन रहे हैं। कहीं किसी चिड़िया का पलायन तो कहीं आगमन, कहीं किसी वृक्ष पर फूल लगना, कहीं चींटियों का अंडा लेकर दीवारों पर चढ़ना, कहीं चिड़ियों का धूल में नहाना, वगैरह। अर्थात रोज़मर्रा के अवलोकनों को मौसम परिवर्तन के साथ जोड़कर कुछ सामान्य सिद्धांत बनाने की कोशिश करते रहना। किंतु अभी तक मॉनसून की भविष्यवाणी 1-2 दिन से ज़्यादा दूर तक नहीं की जा सकी है। इस सम्बंध में एक आशा की किरण दिखाई दी है एल नीनो। आखिर है क्या यह एल नीनो?
एल नीनो (El nino) एक स्पैनिश शब्द है जिसका अर्थ है बच्चा। दरअसल यह शब्द मछुआरों द्वारा एक विशेष घटना के लिए उपयोग किया जाता है – एक्वाडोर और उत्तरी पेरू के तट पर क्रिसमस के समय गर्म पानी का पहुंचना। आम तौर पर यहां पर समुद्र की सतह का पानी भूमध्यरेखा के अन्य स्थानों की अपेक्षा शीतल होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उत्तरी धाराएं सतह के पानी को तट से दूर बहा ले जाती हैं और गहराइयों से शीतल पानी ऊपर आ जाता है। इस पानी में पोषक तत्वों की मात्रा काफी होती है और इसी पर समुद्री वनस्पतियां जीवित रहती हैं। अंततः ये मछलियों का भोजन बनती हैं और मछुआरों को लाभ होता है। जब क्रिसमस के समय गर्म दक्षिणी धाराएं ठंडे पानी को हटाकर पोषक पदार्थों का ऊपर आना कम कर देती हैं तो मछली के धंधे पर असर पड़ता है। पर बहुत ही थोड़ा। यह गर्माहट अक्सर मार्च-अप्रैल तक खत्म हो जाती है। इस पूरी घटना को उस इलाके के मछुआरे एल नीनो कहते हैं।
परंतु कभी-कभी एल नीनो कहीं ज्यादा तीव्र, व्यापक और लंबे समय तक चलने वाला होता है। मार्च-अप्रैल में समाप्त होने की बजाय पेरू के पूरे तट और पूर्वी व भूमध्य रैखीय प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की सतह का तापमान बढ़ जाता है और एक वर्ष तक ऊंचा बना रहता है। ऐसा होने पर मछली पकड़ने पर काफी बुरा असर पड़ता है। ऐसे तीव्र एल नीनो 1953, 1957-58, 1965, 1972-73 और हाल ही में 1982-83 में देखे गए। 1982-83 के एल नीनो में तो सतह का तापमान करीब 7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एल नीनो का सम्बंध विश्वव्यापी मौसम से हो सकता है। अतः एल नीनो को समझ पाना मौसम की भविष्यवाणी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि अभी तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिल सकी है पर उन प्रयासों पर नज़र डालना दिलचस्प होगा।
यह तो साफ ही है कि एल नीनो एक अनियतकालिक घटना है। यह हमेशा एक और घटना से जुड़ी होती है जिसे दक्षिणी दोलन कहते हैं। इसमें प्रशांत महासागर के दक्षिण-पूर्वी और पश्चिमी उष्णकटिबंधीय इलाके के बीच वायुमंडलीय दबाव (Atmospheric Pressure) की रस्साकशी होती है। इस सम्बंध को सबसे पहले 1966 में जेकब ब्येरक्नेस ने उजागर किया था।
इन दोनों घटनाओं को समझने का क्रम तब शुरू हुआ जब यह देखा गया कि 1982-83 के एल नीनो-दक्षिणी दोलन के समय केलिफोर्निया में तो बाढ़ आई हुई थी और अफ्रीका में सूखे का तांडव चल रहा था। इस सम्बंध से ऐसा लगा कि भूमध्यरैखीय प्रशांत महासागर की असामान्य घटनाएं मौसम की भविष्यवाणी का आधार बन सकती है।
दरअसल दक्षिणी दोलन को सबसे पहले 1924 में रिकार्ड किया गया था। जब ईस्टर द्वीप के उच्च दाब क्षेत्र में वायुमंडल दबाव बढ़ता है तो इंडोनेशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के निम्न दाब क्षेत्र (Low Pressure Area) में दबाव कम हो जाता है, और इसका उल्टा भी होता है। इस प्रकार से वास्तव में यह प्रशांत महासागर के आर-पार वायुमंडल दबाव प्रणाली के बीच एक कड़ी स्थापित करता है। इन दोनों दबावों के अंतर को दक्षिणी दोलन सूचकांक कहा जाता है। हालांकि दक्षिणी दोलन के कारण पता नहीं हैं पर यह देखा गया है कि सूचकांक का परिमाण कम होने और एल नीनो के बीच सीधा सम्बंध है। जब यह सूचकांक कम हो जाता है तो भारत में बारिश कम होती है और सूचकांक बढ़ने पर पर्याप्त बारिश होती है। 1972-73 में यह सूचकांक बहुत ही कम हो गया था और इसके साथ ही भारत में भयानक सूखा पड़ा था। भारत के अलावा सोवियत संघ, न्यू गिनी और हवाई में भी सूखा (Drought) पड़ा था जबकि पेरू, फिलिपाइंस और कैलिफोर्निया में जबर्दस्त बाढ़ आई थी। इससे यह तो साफ है कि एल नीनो का असर काफी व्यापक होता है। और इसी से आशा बंधी थी के मौसम भविष्यवाणी (Weather Forecasting) के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। परंतु आखिर एल नीनो या दक्षिणी दोलन में क्यों परिवर्तन होते हैं? इस प्रश्न का उत्तर जाने बिना हम न तो एल नीनो की भविष्यवाणी कर सकते है और ना ही मौसम की भविष्यवाणी।
इस समय वैज्ञानिक इसी प्रश्न का उत्तर खोजने में लगे हैं। कई संभावनाएं व्यक्त की गई हैं पर किसी ठोस निष्कर्ष की अभी प्रतीक्षा है।
ऐसे सभी कार्यों में दिक्कत यह आती है कि कई वर्षों के मौसम सम्बंधी आंकड़ों का अध्ययन करके कुछ संभावित उत्तर बनाने होते हैं जिनकी सत्यता की जांच फिर प्राकृतिक घटना की कसौटी पर करना होती है। पहली बात तो ऐसे आंकड़े हाल ही के वर्षों के लिए उपलब्ध हैं। दूसरी बात कि आप सिर्फ तुक्का ही मार सकते हैं कि कौन से आंकड़े महत्वपूर्ण है। हालांकि ऐसा तुक्का मारने के लिए भी काफी समझ की आवश्यकता होती है। अभी तक जो उत्तर खोजे गए हैं उनका आधार हवा के दबाव, हवा की चाल और दिशा एवं समुद्री सतह (Sea Level) के तापमान के औसत आंकड़े हैं।
एक अध्ययन के अनुसार – जिसे विर्टकी मॉडल (Wyrtki model) कहते हैं – एल नीनो के आगमन के लिए दो शर्तें पूरी होना ज़रूरी है। पहली कि दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़े और दूसरी कि पेरु से बहने बाली हवाएं तेज़तर हो। विर्टकी मॉडल वास्तव में 1972-73 के एल नीनो के अध्ययन पर आधारित था। इस धारणा को बल मिला रेम्यूसन और कारपेंटर नामक दो मौसम वैज्ञानिकों के कार्य से, जिन्होंने 1949 से 1973 तक के एल नीनो के आंकड़े एकत्रित किए थे। तब पश्चिमी प्रशांत महासागर में बहने वाली तेज़ हवाओं को एल नीनो की भविष्यवाणी का एक आधार माना जाने लगा था। परंतु वास्तविक घटनाक्रम ने इस समझ को झकझोर दिया।
1974 में दक्षिणी दोलन सूचकांक बढ़ा और हवाएं तेज़तर हुई। इस आधार पर एल नीनो अपेक्षित था। परंतु कुछ नहीं हुआ। इसके बाद 1982-83 में एल नीनो के आगमन ने बलशाली हवाओं वाली धारणा को धराशायी कर दिया। तेज़ हवाएं नहीं चलीं, सूचकांक नीचे गिरता गया; लेकिन इसके बावजूद, इस सदी का सबसे तीव्र एल नीनो फिर भी आ पहुंचा। अमेरिका के प्रशांत तटीय क्षेत्र में भयानक बाढ़ें आईं, ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ा और सहेल का सूखा और गहरा हो गया। 1982-83 के एल नीनो ने दिखा दिया कि तेज़ व्यापारिक हवाओं का एल नीनो से कोई सम्बंध नहीं है। एल नीनो की भविष्यवाणी में इस असफलता का प्रमुख कारण अपर्याप्त आंकड़े लगता है।
इससे एक और बात भी स्पष्ट हो जाती है कि जिस घटना को एक सीधा-सादा चक्र समझा गया था, वह दरअसल एक बहुत परिवर्तनशील गोरखधंधा है। आगे चलकर यह भी प्रकाश में आया है कि भारत में 1979 का सूखा वास्तव में गैर-एल नीनो वर्ष में पड़ा था। इसी तरह की अन्य घटनाएं भी सामने आई हैं। इन सबसे यह बात रेखांकित होती है कि मात्र एल नीनो के आगमन के अध्ययन से पूरी बात नहीं समझी जा सकती है। गैर-एल नीनो स्थितियों का अध्ययन करना भी उतना ही ज़रूरी है। पहले प्रशांत महासागर के वायुदाब तंत्र में दो स्थितियां ही मानी गई थीं – एल नीनो व गैर-एल नीनो। परंतु अब यह साफ हो गया है कि बीच की स्थितियां भी संभव हैं और उनका अध्ययन करना भी आवश्यक होगा। हाल ही में कुछ अन्य व्याख्याएं भी प्रस्तुत की गई हैं पर साफ तौर पर कुछ कहना नामुमकिन है। इस सम्बंध में चक्रवातों, हवाओं की गति व दिशा (Wind speed and direction) आदि का बारीकी से अध्ययन करना होगा। परंतु एक बात लगती है – यदि एल नीनो के आगमन, उसकी तीव्रता और उसकी अवधि की भविष्यवाणी करने का काम इतना ही अधिक जटिल है तो हो सकता है कि यह सीधे मौसम की भविष्यवाणी जैसा ही अंधा खेल हो। कहने का मतलब यह नहीं है कि कोशिशें बेकार है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्राकृतिक घटनाएं बहुत सारे जटिल क्रियाकलापों का परिणाम होती हैं और उनकी भविष्यवाणी एक या दो कारकों के आधार पर नहीं की जा सकती।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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