
मई 2026 के अंतिम सप्ताह में अमेरिका के लास वेगास में ओलंपिक खेलों की तर्ज पर ‘एन्हांस्ड ओलंपिक’ (Enhanced olympic) का आयोजन हुआ। इस आयोजन की खास बात थी कि इसमें खिलाड़ियों को प्रदर्शन बेहतर करने के लिए ड्रग (Drugs) लेकर खेलने पर कोई पाबंदी नहीं थी। खेलों में तैराकी, दौड़ और भारोत्तोलन जैसे खेल शामिल थे। यह खेल आयोजन ओलंपिक जितने बड़े स्तर का तो नहीं था; फिर भी इसमें लगभग 50 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया।
हालांकि इस पर विशेषज्ञों और खेल संगठनों ने कई नैतिक और स्वास्थ्य सम्बंधी सवाल उठाए और इसकी तीखी आलोचना की थी। खेल फेडरेशन (Sports Federation) ने तो यहां तक कहा था कि एन्हांस्ड ओलंपिक में बनने वाला कोई भी वर्ल्ड रिकॉर्ड (World record) मान्य नहीं होगा। और अब इसके नतीजे भी कुछ खास अंतर नहीं झलकाते हैं। दरअसल खेल संगठकों और विशेषज्ञों की चिंता डोपिंग (Doping) को लेकर है। यदि मुकाबला करने वाले कुछ या शायद सभी लोग बेहतर प्रदर्शन (Better Performance) के लिए ड्रग्स लेंगे, तो इसके स्वास्थ्य सम्बंधी नुकसान भले ही तुरंत न दिखें लेकिन लंबे समय में दिखेंगे। यह खिलाड़ियों की सेहत के साथ खिलवाड़ होगा।
एन्हांस्ड खेलों के आयोजकों का कहना था कि इन खेलों में यूं ही कोई भी ड्रग्स नहीं लिया जाएगा, सिर्फ यूएस संघीय औषधि प्रशासन (US FDA) द्वारा मंज़ूर ड्रग्स लेने की ही इजाज़त होगी, वह भी मेडिकल पेशेवरों की देखरेख में, ताकि जोखिम कम किया जा सके। साथ ही एथलीटों (Atheletes) को यूएस फेडरल और नेवादा राज्य के कानूनों का पालन करना होगा। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यूएस एफडीए द्वारा जिन ड्रग्स को मंज़ूरी मिली है वे चिकित्सकीय उपयोग के लिए है, न कि एथलेटिक प्रदर्शन-वृद्धि के लिए। जैसे, एनाबॉलिक स्टेरॉयड (Anabolic Steroids) को मंज़ूरी यौवनारंभ में विलंब की समस्या के इलाज के लिए मिली है, जिसमें वृषण में हार्मोन बहुत ही कम या बिलकुल नहीं बनते।
और तो और, खेल के पहले इस बारे में कोई जानकारी स्पष्ट रूप से साझा नहीं थी कि कौन से ड्रग्स और कितनी मात्रा में लिए जा सकेंगे, और संभावित जोखिम को कम करने की आयोजकों और मेडिकल पेशेवरों की क्या योजना होगी। जैसे डोपिंग करने वाले एथलीट्स की खेल के बाद देखभाल कैसे होगी? ड्रग्स लेकर जीतने की बात जितनी सरल लगती है, उसके बाद उन्हें छोड़ने की राह उतनी ही मुश्किल होती है। इस बात को स्पष्टता से उजागर न करना ऐसा आभास दे सकता है कि प्रदर्शनवर्धक दवाओं (Performace enhancing drugs) का इस्तेमाल करना और उन्हें बंद करना बहुत आसान है, जबकि ऐसा है नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल देख-रेख तात्कालिक जोखिम कम कर सकती है, लेकिन इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि डोपिंग से जुड़े कई परिणाम (मानसिक परेशानियां, अनुर्वरता, मांसेपशियों व अस्थि-तंत्र की चोटें) लंबे समय तक असर करते हैं।
एन्हांस्ड ओलंपिक में एथलीट्स ने संभवत: टेस्टोस्टेरॉन, ह्यूमन ग्रोथ हार्मोन, पेप्टाइड्स और स्टिमुलेंट्स लिए थे। टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) समान्यत: स्रावित होने वाला यौन हार्मोन है। यह शरीर में मांसपेशियां और उनकी ताकत (Muscle power) बढ़ाता है। लेकिन इससे हृदय सम्बंधी एवं हॉर्मोन सम्बंधी शारीरिक परेशानियां, और उग्र व्यवहार, मूड में उतार-चढ़ाव एवं अवसाद जैसी मानसिक परेशानियां होने का जोखिम होता है। इसी तरह, एरिथ्रोपोइटिन (EPO) शरीर में स्रावित होने वाला एक नैसर्गिक हार्मोन है जो लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन बढ़ाता है, नतीजतन शरीर में ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता बढ़ती है। बाहर से अतिरिक्त rEPO लेने से ऑक्सीजन उपलब्धता बढ़ती है जो धावकों या साइकिल रेसर्स के लिए मददगार हो सकती है। लेकिन इससे खून गाढ़ा होने का खतरा रहता है, नतीजतन एथलीट्स को हृदय रोग हो सकते हैं।
और फिर, वैसे ही एथलीट्स कई शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों से घिरे होते हैं। अक्सर खिलाड़ियों को मांसपेशीय व अस्थि तंत्र की चोटों का खतरा होता है। रग्बी (Rugby) और अमेरिकन फुटबॉल (American football) जैसे खेलों में बार-बार सिर पर चोट लगने से तंत्रिका क्षति सम्बंधी बीमारियां (Neurological diseases) होने का खतरा होता है, जिन्हें ठीक होने में अरसा लगता है। फिर प्रतिस्पर्धाएं एथलीट्स के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालती हैं। जिमनास्ट सिमोन बाइल्स, टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका और धावक नोआ लाइल्स ने अवसाद और दुश्चिंता (Depression & Anxiety) के बारे में सबके सामने बात रखी है। ऐसे में ड्रग्स आग में घी का काम करेंगे।
ऐसा नहीं है कि खिलाड़ियों को अपने स्वास्थ्य की चिंता नहीं है। कुछ खिलाड़ियों ने इस प्रतिस्पर्धा (Competition) का विरोध किया है। लेकिन कई खिलाड़ी, जिनके पास अपने को साबित करने के लिए जीवन के मात्र कुछ साल होते हैं, उनके पास यदि ड्रग्स लेकर जीतने की संभावना रहेगी तो वे इनमें दिलचस्पी दिखाएंगे। वैसे भी तवज्जो, शोहरत और पैसा उसे ही मिलता है जो खेल जीतता है। खेल की दुनिया में ऐसा दिखता है कि खिलाड़ी, खासकर ओलंपिक स्तर के खिलाड़ी, बहुत सम्पन्न घरों से नहीं होते हैं, और वे कोई न कोई काम करते हुए ही साथ-साथ प्रशिक्षण लेते हैं और खेलते हैं। जीत उन्हें आर्थिक सम्पन्नता हासिल करने में मदद कर सकती है। और यदि ड्रग्स जीतने की संभावना बढ़ाएंगे तो वे शायद न हिचकें।
लेकिन ऐसे आयोजन अक्सर खेल भावना और खेल कौशल (Sportsmanship & Proficiency) को कम करते हैं और उन्हें व्यावसायिक बनाते हैं। भारत में क्रिकेट के लिए शुरू हुए आईपीएल खेलों (IPL Games) से क्रिकेटरों को पैसा और शोहरत तो मिली लेकिन क्रिकेट एक बिज़नेस हो गया; सट्टेबाज़ी (Gambling) भी शुरू हो गई। और फिर, डोपिंग का संदेश क्या है? यही कि कोई भी खेल डोपिंग के बूते जीता जा सकता है? यकीनन, ये कुछ हद तक शरीर की ताकत और क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं, लेकिन असली सफलता के पीछे खिलाड़ी और प्रशिक्षक की सालों की मेहनत, अनुभव, प्रशिक्षण और कौशल काम आता है। एन्हांस्ड खेलों के नतीजे देखें तो यह बात और पुख्ता होती है। इन खेलों में डोपिंग वाले प्रतिभागियों में से मात्र एक प्रतिभागी जीता है, बाकी तीन वे प्रतिभागी जीते हैं जो बिना डोपिंग के खेल में शामिल हुए थे। प्रदर्शन बेहतर करने के लिए ड्रग्स की इजाज़त देकर एन्हांस्ड खेलों ने अनुशासन, तकनीकी दक्षता, मानसिक संयम और नियमों पर सामूहिक भरोसे को नज़रअंदाज़ किया है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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