धरती का चढ़ता पारा और आसमानी बिजली

सुदर्शन सोलंकी

र्मियों में चलने वाली भीषण ग्रीष्म लरहों के बाद जब आसमान में घने काले ‘क्युमुलोनिम्बस बादल’ घुमड़ते हैं, तो वे केवल बारिश का संदेश नहीं लाते। दरअसल, ये बादल हवा में तैरते हुए एक बिजली संयंत्र की तरह काम करते हैं। इन बादलों से अचानक कड़कती बिजली प्रकृति की सबसे शक्तिशाली ताकतों में से एक है।

आधुनिक मौसम विज्ञान और पर्यावरण वैज्ञानिकों के नए अनुसंधानों ने बताया है कि आसमान से बरसने वाली बिजली का सीधा सम्बंध धरती के बढ़ते तापमान से जुड़ चुका है।

बादलों का ‘पावर बैंकऔर तड़ित का विज्ञान

भौतिक विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार, बादल सिर्फ पानी की बूंदों के समूह नहीं हैं, बल्कि वे हवा में तैरते हुए विशालकाय प्राकृतिक संधारित्र की तरह हैं। जब तेज़ गर्मी के कारण नमी से भरी गर्म हवा तेज़ी से ऊपर की ओर उठती है तो वायुमंडल के ऊपरी हिस्सों में अत्यधिक ठंड के कारण यह नमी बर्फ के छोटे-छोटे कणों में बदलने लगती है। 

हवा के इस तेज़ ऊर्ध्वाधर बहाव के दौरान, कुछ कण बड़े होने लगते हैं और वज़न बढ़ने के कारण वे नीचे गिरने लगते हैं। दूसरी ओर, बारीक हिम कण हवा के साथ ऊपर उठते रहते हैं। जब नीचे गिरते और ऊपर उठते ये बर्फ के कण आपस में टकराते हैं, तो उनके बीच घर्षण के कारण स्थिर विद्युत पैदा होती है। कुल मिलाकर परिणाम यह होता है कि बादलों का ऊपरी हिस्सा धनावेशित और निचला हिस्सा ऋणावेशित हो जाता है। जब इन दोनों विपरीत आवेशों के बीच का विद्युत   क्षेत्र वायु की अवरोधक क्षमता को तोड़ देता है, तो बादलों के भीतर ही बिजली कौंधने  लगती है।

लेकिन जब बादलों का यह भारी-भरकम ऋणावेश धरती की तरफ लपकता है, तो इसे ‘क्लाउड-टू-ग्राउंड’ लाइटनिंग यानी ज़मीन पर बिजली गिरना कहा जाता है। पल भर के लिए गिरने वाली इस एक कड़क में करीब 10 करोड़ से 100 करोड़ वोल्ट का क्षणिक वोल्टेज और हज़ारों एम्पीयर का करंट हो सकता है। इस दौरान पैदा होने वाला तापमान सूर्य की दृश्य सतह से भी पांच गुना ज़्यादा (लगभग 30,000 डिग्री सेल्सियस) होता है, जो आसपास की हवा को अचानक फैलाता है। हवा के इसी तीव्र  और तात्कालिक फैलाव से उत्पन्न होने वाली शॉक वेव हमें भयानक गड़गड़ाहट के रूप में सुनाई देती है।

कैटाटुम्बो: जहां कभी शांत नहीं होता आसमान

अगर हमें प्रकृति के इस अद्भुत बिजलीघर को करीब से समझना है, तो वेनेज़ुएला में कैटाटुम्बो नदी और मैराकैबो झील के संगम पर जाना होगा। यहां के संगम पर प्रकृति का एक ऐसा अनूठा नज़ारा दिखता है, जो गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है।

इस अनोखे क्षेत्र में साल के 365 दिनों में से लगभग 300 रातों को लगातार बिजली कड़कती है। एंडीज़ पर्वतों से आने वाली बर्फीली हवाएं जब मैराकैबो बेसिन की अत्यधिक गर्म और नम हवाओं से टकराती हैं, तो यह पूरा इलाका एक कड़कड़ाते अखाड़े में बदल जाता है। यहां एक मिनट में दर्जनों बार बिजली कौंधती है, जिससे रातें भी दिन की तरह उजली हो जाती हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह प्रक्रिया पृथ्वी के पर्यावरण के लिए एक वरदान है, क्योंकि इस उच्च-स्तरीय बिजली से उत्पन्न नाइट्रोजन ऑक्साइड्स वर्षा जल के साथ मिलकर मिट्टी में पहुंचते हैं, जिससे प्राकृतिक नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है और पौधे इसे पोषक तत्व के रूप में ग्रहण करते हैं। कहते हैं कि इतनी बिजली कड़कने से ओज़ोन भी बनती है लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या यह धरती के ओज़ोन कवच को सुदृढ़ करती है।                                                                        

ग्लोबल वॉर्मिंग: बारूद के ढेर पर मौसम

चिंताजनक बात यह है कि जो प्रक्रिया पृथ्वी के वायुमंडलीय संतुलन के लिए ज़रूरी थी, वह अब मानवीय हस्तक्षेप के कारण एक घातक आपदा बनती जा रही है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और दुनिया भर के जलवायु वैज्ञानिकों के हालिया अनुसंधानों ने एक गंभीर चेतावनी दी है। जैसे-जैसे कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है, वायुमंडल में गर्मी और नमी सोखने की क्षमता अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। वायुमंडल में अधिक ऊष्मा का सीधा सा मतलब है बादलों के भीतर हवा का और तेज़ बहाव और कणों का अधिक आक्रामक घर्षण। वैज्ञानिक गणना के अनुसार, यदि पृथ्वी के औसत तापमान में केवल 1 डिग्री सेल्सियस की भी वृद्धि होती है, तो आकाशीय बिजली गिरने की घटनाओं में सीधे 12 प्रतिशत का इज़ाफा हो जाता है। इसके अतिरिक्त शहरों का बढ़ता प्रदूषण और हवा में तैरते धूल के सूक्ष्म कण बादलों के भीतर चार्जिंग की इस प्रक्रिया को बढ़ावा देते हैं। यही कारण है कि हाल के वर्षों में ‘मल्टीपल लाइटनिंग स्ट्रोक्स’ (एक साथ कई बार बिजली गिरना) की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं।

साइड फ्लैशका खतरा और ग्रामीण भारत का संकट

चक्रवात, बाढ़ या भारी बारिश जैसी आपदाएं दूर से आती दिखाई देती हैं, जिससे जान-माल को सुरक्षित करने का कुछ वक्त मिल जाता है। लेकिन आकाशीय बिजली एक ‘अदृश्य और तात्कालिक आपदा’ है, जो पलक झपकते ही सब कुछ खत्म कर देती है। भारत में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली कुल मौतों में से लगभग 40 प्रतिशत अकेले बिजली गिरने से होती हैं, जो बाढ़ और भूकंप से भी ज़्यादा हैं।

इसका एक सामाजिक-आर्थिक पहलू भी है। इससे प्रभावित होने वाले 90 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्रों के किसान, चरवाहे और खेत मज़दूर होते हैं। अक्सर खेतों में काम करते समय जब अचानक बारिश शुरू होती है, तो बचाव के लिए किसी ऊंचे पेड़ के नीचे खड़े हो जाते हैं। लेकिन कई बार बिजली आसपास के क्षेत्र को भी प्रभावित करती हैं। इसे ‘साइड फ्लैश’ कहते हैं। बिजली गिरती तो सीधे पेड़ पर है लेकिन पेड़ की उच्च विद्युत प्रतिरोधकता के कारण वह हवा या ज़मीन के रास्ते पास खड़े इंसानों के शरीर में डिस्चार्ज हो जाती है। जिससे पल भर में कार्डिएक अरेस्ट हो जाता है।

सुरक्षा के उपाय 

बिजली कड़के तब तुरंत किसी पक्के मकान या बंद कार के अंदर चले जाएं। और अंतिम गर्जना के बाद भी कम से कम 30 मिनट तक अंदर ही रहें।

तकनीक का सहारा: भारत सरकार का ‘दामिनी ऐप’ सैटेलाइट डैटा के ज़रिए 20 से 40 किलोमीटर के दायरे में बिजली गिरने से आधा घंटा पहले सटीक अलर्ट दे देता है। सुरक्षा के लिए इस डिजिटल सुरक्षा कवच को हर किसान तक पहुंचाना आवश्यक है।

तड़ित चालक: बहुमंज़िला इमारतों, ग्रामीण स्कूलों और पंचायत भवनों पर बेंजामिन फ्रैंकलिन द्वारा आविष्कृत तड़ित चालक लगाना अनिवार्य होना चाहिए, जो आसमानी बिजली को सुरक्षित रूप से ज़मीन के अंदर भेज देता है।

आसमान में बिजली का कौंधना प्रकृति की एक आवश्यक और खूबसूरत वैज्ञानिक प्रणाली है। लेकिन मानवीय गतिविधियों के कारण बढ़ता वैश्विक तापमान बादलों को अधिक आक्रामक और हिंसक बना रहा है। यदि हमने आज भी अपने कार्बन उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगाई, तो आने वाले दिनों में बादलों की यह गड़गड़ाहट हमारी तबाही का संगीत बन जाएगी। प्रकृति के इस बढ़ते गुस्से का मुकाबला अंधविश्वास या डर से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण से ही किया जा सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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