
पौधे प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) नामक प्रक्रिया को अंजाम देते हैं, जिसमें वे सूरज की रोशनी की मदद से कार्बन डाईऑक्साइड और पानी की क्रिया करवाते हैं और कार्बोहायड्रेट बनाते हैं। लेकिन मनुष्यों समेत सभी जंतुओं के पास इस क्रिया के लिए ज़रूरी आणविक मशीनरी नहीं होती।
अब एक अनुसंधान दल ने चूहों और मनुष्यों की कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण करने वाली संरचना जोड़ने में सफलता प्राप्त कर ली है। इन कोशिकाओं को प्रयोगशाला में तैयार किया गया था। लेकिन यह मत सोचिए कि ये कोशिकाएं प्रकाश संश्लेषण करके कार्बोहायड्रेट बनाकर हमें पोषण प्रदान करेंगी। ये तो हमें मात्र शुष्क आंख (dry eyes) की समस्या से छुटकारा दिलाएंगी।
सेल नामक शोध पत्रिका में सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के डेविड ताई लियोंग और कुओरान ज़िंग ने बताया है कि उनकी इस रणनीति से आंखों की कोशिकाएं एक ऐसा अणु बनाने लगीं जो शोथ में राहत देता है। इसके अलावा प्रकाश संश्लेषी मशीनरी जोड़ने के बाद शुष्क आंखों की वजह से होने वाली क्षति भी दुरुस्त हो गई।
वैसे तो प्रकाश संश्लेषण करने की क्षमता सिर्फ पौधों, शैवाल और कुछ सूक्ष्मजीवों में ही पाई जाती है। लेकिन कुछ समुद्री स्लग्स हैं जो शैवालों का क्लोरोप्लास्ट चुराकर कुछ अतिरिक्त पोषण प्राप्त कर लेते हैं। गौरतलब है कि क्लोरोप्लास्ट (chloroplast) ही वह कोशिकांग होता है जहां प्रकाश संश्लेषण की क्रिया सम्पन्न होती है।
इस सिलसिले में दो साल पहले टोक्यो विश्वविद्यालय (Tokyo university) के साचीहिरो मात्सुनागा की टीम ने यही करामात प्रयोगशाला में की थी। उन्होंने एक पूरा क्लोरोप्लास्ट मानव कोशिका में प्रत्यारोपित करके उसे दो दिन तक कामकाजी बनाए रखा था।
फिर कई अन्य शोधकर्ता सोचने लगे कि यदि हमारी कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण की थोड़ी-बहुत क्षमता जोड़ दी जाए, तो वे ऐसे अणु बनाने लगेंगी जिनसे ऊर्जा मिलेगी या शोथ हल्का पड़ जाएगा।
मसलन, 2022 में चीन के एक दल ने गठिया पीड़ित चूहों के घुटनों के जोड़ में कुछ कण इंजेक्ट किए जिनमें प्रकाश संश्लेषी मशीनरी के कुछ हिस्से थे। शोधकर्ताओं ने नेचर में रिपोर्ट किया था कि इन चूहों के घुटनों में उपास्थियों की क्षति धीमी पड़ गई थी। दिक्कत यह है कि हमारे घुटनों को धूप बहुत कम मिलती है। इन चूहों को प्रतिदिन आधे घंटे लाल रोशनी में रखने पर ही उपरोक्त लाभ मिल पाया था।
अलबत्ता, आंखों की बात अलग है। उन पर तो दिन भर रोशनी पड़ती है। तो वर्तमान अध्ययन में लियोंग और ज़िंग ने पालक में से प्रकाश संश्लेषण मशीनरी के प्रमुख हिस्से (थाएलेकॉइड) पृथक किए। इन तश्तरीनुमा रचनाओं में क्लोरोफिल तथा ऊर्जा को कैद करने के लिए ज़रूरी अणु पाए जाते हैं। पूर्व के अध्ययनों में शोधकर्ताओं ने थाएलेकॉइड (thylakoid) के टुकड़ों का इस्तेमाल किया था। लेकिन लियोंग और ज़िंग की टीम ने पूरे के पूरे थायलेकॉइड निकाले और उन्हें छोटे-छोटे कणों में पैक कर दिया।
वैसे तो प्रकाश संश्लेषण का अंतिम उत्पाद ऊर्जा से भरपूर ग्लूकोज़ होता है लेकिन शोधकर्ताओं की रुचि इस प्रक्रिया के दो मध्यवर्ती अणुओं में थी – एटीपी और एनएडीपीएच। ये दोनों ही शोथ को कम कर सकते हैं और तथाकथित ऑक्सीडेंट्स से निजात पाने में कोशिकाओं की मदद कर सकते हैं। रोचक बात है कि शोधकर्ताओं ने पालक आधारित इस पदार्थ को नाम दिया है लीफ (लाइट रिएक्शन एनरिच्ड थायलेकॉइड एनएडीपीएच फाउंड्री – LEAF)।
शोधकर्ताओं का ख्याल था कि कोशिकाओं में एनएडीपीएच (NADPH) का उत्पादन बढ़ने से शुष्क आंख समस्या में मदद मिलेगी। शुष्क आंख समस्या में होता यह है कि पर्याप्त मात्रा में आंसू नहीं बनते जो आंखों में स्नेहक (लुब्रिकेशन) दे सकें। कभी-कभी आंसू बहुत गाढ़े बनते हैं। परिणाम यह होता है कि आंख की सतह में क्षति होने लगती है।
प्रयोग के दौरान चूहों की कल्चर्ड कोशिकाओं ने थायलेकॉइड को अवशोषित कर लिया और ज़्यादा एनएडीपीएच बनाने लगी। टीम ने यह भी देखा कि लीफ प्रदान करने पर शोथ सम्बंधी जीन्स की सक्रियता कम हुई और शोथ से लड़ने वाले तथा ऑक्सीकारकों से निपटने वाले जीन्स की सक्रियता बढ़ी। मानव कॉर्निया (human cornea) से ली गई मानव कोशिकाओं पर भी ऐसे ही असर देखे गए।
ऐसे ही प्रयोग जीवित चूहों पर करने पर LEAF का लाभदायक असर देखने को मिला। अब बारी है इंसानों पर परीक्षणों की। उससे पहले इस उपचार की सुरक्षा व दीर्घावधि असर पर भी विचार करना होगा। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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