आर्टिफिशियल एजेंटों का उपयोग

विवेक मेहता

र्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई, कृत्रिम बुद्धि) एजेंट ऐसी अजैविक कार्यप्रणालियां (system) हैं जिन्हें मानव बुद्धि की नकल करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ये कार्यप्रणालियां हमारी तरह ही सीखती हैं; अर्थात पर्यावरण के साथ संपर्क, संवाद या अन्य माध्यम से। ये प्रणालियां महत्वपूर्ण निर्णय ले सकती हैं, और ले भी रही हैं, जो मानवता को प्रभावित करते हैं। समस्याओं को हल करने में दक्ष होने के साथ-साथ ये बदलते हालातों के प्रति अनुकूलनशील भी होती हैं। 

एआई प्रणालियां इतनी स्मार्ट और महत्वपूर्ण होती जा रही हैं कि वर्ष 2024 में दिए गए दो नोबेल पुरस्कार एआई से सम्बंधित थे। रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्रोटीन फोल्डिंग (protein folding) की समस्या से सम्बंधित था, जिसमें प्रोटीन के 3डी आकार का पता लगाना एक महत्वपूर्ण समस्या है। बायोमेडिकल अनुसंधान (biomedical research) से जुड़ी इस महत्वपूर्ण समस्या का उद्देश्य बीमारियों से निपटने के लिए नई और बेहतर दवाइयां विकसित करना है। तीन तीन में से दो विजेताओं द्वारा विकसित एआई प्लेटफॉर्म केवल अमीनो एसिड अनुक्रम से प्रोटीन की 3डी जमावट की सटीक भविष्यवाणी करने में सक्षम साबित हुआ है। 

हम अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में ऐसी ही प्रणालियों से रू-ब-रू हो रहे हैं। जैसे जानकारी खोजने के लिए वेब सर्च; या हमारी स्क्रीन पर सुझाई गई कोई मूवी, वीडियो या उत्पाद। यह हमारे वॉयस असिस्टेंट (voice assistant) को दिया गया कोई आदेश हो सकता है। और अधिक उन्नत देशों में, यह एक स्वचालित टैक्सी हो सकती है। जनरेटिव एआई एप्लिकेशन जैसे ChatGPT और DALL-E के उदय के साथ, उपयोगकर्ता हर प्रकार की सामग्री बना रहे हैं।

आज तक, हम में से अधिकांश, जिन्होंने एआई का उपयोग किया है या इसके संभावित लाभों के बारे में सुना है, इससे प्रभावित हुए हैं। लेकिन समाज का एक वर्ग एआई की संभावित हानियों के प्रति आलोचनात्मक है। इन कई आवाज़ों में से एक है ज्यॉफ्री एवरेस्ट हिंटन, जिन्हें एआई के ‘गॉडफादर’ (Godfather of AI) के रूप में भी जाना जाता है। उनके पथप्रदर्शक कार्य ने इन एआई प्रणालियों की उन्नत क्षमताओं को जन्म दिया। इस योगदान के लिए उन्हें 2024 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। 

एक साक्षात्कार में, उन्होंने अपनी चिंताओं को सामने रखा: “आगे क्या होने वाला है, इसे लेकर भारी अनिश्चितता है! …. हो सकता है कि हम पीछे मुड़कर देखें और इसे एक ऐसा मोड़ मानें जब मानवता को यह निर्णय लेना पड़े कि क्या इन चीज़ों को आगे विकसित करना है, या अगर ये विकसित हुईं तो खुद की सुरक्षा के लिए क्या करना है।” उन्होंने और एआई क्षेत्र के कई अग्रणि शोधकर्ताओं ने एआई पर नियंत्रण रखने के लिए परमाणु तकनीक (nuclear technology) की तर्ज पर एक वैश्विक प्रणाली का आह्वान किया है। उनका मानना है कि एआई के मानव नियंत्रण से बाहर होने या इसके दुरुपयोग की संभावना, हालांकि कम है, लेकिन मौजूद है। ऐसा परिदृश्य मानवता के लिए विनाशकारी होगा।

फिर इतिहासकार युवाल नोआ हरारी जैसे लोक-बुद्धिजीवी हैं। उन्होंने लोगों और सरकारों को एआई के खतरों (Dangers of AI) के बारे में चेतावनी दी है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि एआई हर चीज़ की गति को इतनी तेज़ी से बढ़ा रहा है कि हम नश्वर मनुष्यों के लिए इससे कदम मिलाना नामुमकिन है। उन्होंने एआई की अग्रणी हस्तियों की चिंताओं को साझा किया है।

इसके अलावा वे एक और मुद्दे पर प्रकाश डालते हैं: एआई और असमानता। वे हमें याद दिलाते हैं कि औद्योगिक क्रांति (Industrial revolution), जो ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका आदि जैसे देशों द्वारा शुरू की गई थी, ने हमारे जैसे देशों को उपनिवेश बना दिया। स्वतंत्रता के बाद भी, हम इन देशों के बीच मौजूदा असमानता और उपनिवेशवाद (colonialism) के प्रभाव को महसूस कर सकते हैं। 

जहां तक एआई का सवाल है, इसकी सफलता को मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण कारक सीमित करते हैं: कंप्यूटिंग पॉवर और डैटा (computing power & data)। विभिन्न देशों की कंप्यूटिंग पॉवर की तुलना करने का एक आधार यह है कि प्रत्येक देश के पास कितने सुपरकंप्यूटर हैं। अगर हम दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं को देखें, तो अमेरिका के पास विश्व के कुल सुपरकंप्यूटरों (supercomputer) में से 34.6 प्रतिशत और उसके बाद चीन (12.6 प्रतिशत), जर्मनी (8.0 प्रतिशत), जापान (6.8 प्रतिशत), और भारत (1.2 प्रतिशत) का स्थान है। भारत में डैटा की उपलब्धता के बारे में, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) की 2019 की रिपोर्ट कहती है, “आज विभिन्न क्षेत्रों में भारी मात्रा में डैटा मौजूद है। हालांकि, यह ज़्यादातर अलग-अलग मोड में मौजूद है और प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं किया जा रहा है। जब इसका उपयोग होता भी है, तो यह केवल साइलो में होता है। कई बार, क्षेत्रों के बीच डैटा एकीकरण शानदार लाभ प्रदान करता है, जिन्हें नज़रअंदाज कर दिया जाता है।” 

आज के समय में, डैटा को तेल और गैस की तरह एक प्रकार की संपत्ति (wealth) माना जाता है। भारतीय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं से सम्बंधित इसका अधिकांश हिस्सा विदेशी सर्वरों पर संग्रहित है। निश्चित रूप से, शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में होने के बावजूद, हम कंप्यूटिंग पॉवर और डैटा के मामले में अन्य देशों से पीछे हैं। इस अंतर को पाटने के वित्तीय प्रभाव बहुत बड़े हैं। हालांकि, ये प्रभाव केवल वित्तीय प्रकृति के नहीं हैं। कुछ बड़ा दांव पर है।

आगे बढ़ने के लिए, मान लें कि दुनिया अचानक अधिक समान हो गई है और किसी भी देश को एआई के संदर्भ में अनुचित लाभ नहीं है। आगे मान लें कि सहयोग और विश्वास, जो फिलहाल दुर्लभ गुण हैं, ने विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच एआई को संचालित करने के लिए किसी प्रकार की नियामक रूपरेखा विकसित कर ली है। अब, इन धारणाओं के तहत, क्या यह मानवता के हित में होगा कि एआई को सामान्य उद्देश्यों के लिए विकसित और प्रयुक्त किया जाए? ऊर्जा खपत (energy consumption) के दृष्टिकोण से, इसका उत्तर सरल ‘हां’ नहीं हो सकता। 

एक उदाहरण लें: BigScience Large Open-science Open-access Multilingual (BLOOM) भाषा मॉडल का। यह एक लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) है जिसे प्राकृतिक व प्रोग्रामिंग भाषा प्रोसेसिंग के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस तरह के मॉडल जनरेटिव एआई चैटबॉट जैसे ChatGPT या Perplexity का आधार हैं। अब, इन मॉडलों को, तैनात होने से पहले, बड़े पैमाने पर डैटा एक्सपोज़र और प्रशिक्षण से गुज़रना पड़ता है। उदाहरण के लिए, आर्काइव पर उपलब्ध एक शोध पत्र के अनुसार, BLOOM एक 176 अरब पैरामीटर मॉडल है जिसे 46 प्राकृतिक भाषाओं और 13 प्रोग्रामिंग भाषाओं में 1.6 टेराबाइट डैटा पर प्रशिक्षित किया गया था। कुल प्रशिक्षण समय 118 दिन, 5 घंटे और 41 मिनट का अनुमानित था। प्रशिक्षण के लिए उपयोग की गई कुल ऊर्जा की मात्रा 4,33,196 किलोवॉट-घंटे (kWh) थी।

इन संख्याओं को परिप्रेक्ष्य में रखते हैं। यदि एक पृष्ठ पर 100 किलोबाइट डैटा मानें, तो 1.6 टेराबाइट डैटा लगभग एक करोड़ अस्सी लाख पृष्ठों के बराबर होगा। फिर, यदि हम औसत पुस्तक का आकार 300 पृष्ठ मानें, तो यह लगभग 56,667 पुस्तकों के डैटा के बराबर होगा। ऊर्जा खपत के संदर्भ में, यदि हम भारत में एक घर को लें, जो प्रति माह 200 kWh बिजली की खपत करता है, तो 4,33,196 kWh उस भारतीय घर की 180 वर्षों की बिजली खपत के बराबर होगा या 2165 ऐसे परिवारों की एक महीने की खपत के बराबर होगा। 

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि OpenAI (ChatGPT फेम) के मुख्य कार्यकारी सैम ऑल्टमैन ने सेवाओं को चलाने की लागत को ‘आंखें खोल देने वाला’ बताया है। Alphabet और उसकी सहायक कंपनी गूगल के सीईओ सुंदर पिचई ने एक साक्षात्कार में बताया था, “एआई के लिए अधोसंरचना, जिसमें ऊर्जा शामिल है, एक प्रमुख बाधा हो सकती है।” 

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, वर्ष 2022 में ऊर्जा से सम्बंधित वैश्विक कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन (global carbon emission) 1.1% बढ़कर 37 अरब मीट्रिक टन से अधिक हो गया। यह उत्सर्जन वृद्धि उस समय हो रही है जब पूरी दुनिया की आबादी किसी न किसी रूप में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को महसूस कर रही है। यह संभव है कि वर्तमान में इन एआई एजेंटों और प्लेटफार्मों को संचालित करने वाले बड़े डैटा केंद्रों का योगदान इतना महत्वपूर्ण न हो, लेकिन इस तकनीक की पहुंच और सीमाओं को बढ़ाने की बढ़ती कोशिशें निकट भविष्य में काफी महत्वपूर्ण हो सकती हैं। विशेषकर, हमारे जैसे देशों में, जो फिलहाल इस क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं।

दुनिया के किसी भी चिंतित नागरिक को यह स्पष्ट होना चाहिए कि वर्तमान एआई दौड़ के मूल में शक्तिशाली देशों के बीच विश्वास की कमी और उनकी असुरक्षाएं हैं। साथ में बड़े कॉर्पोरेशन्स की बाजार में हिस्सेदारी और मुनाफे की सतत बढ़ती लालसा भी है। और जब ड्राइविंग सीट पर ये भावनाएं और स्वार्थ विराजमान हैं, तो दुनिया के कभी भी बेहतर बनने की उम्मीद बेमानी होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.chitkara.edu.in/blogs/wp-content/uploads/2024/05/Intersection-of-AI.jpg

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