
नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ लेखक, शोधकर्ता और पर्यावरण चिंतक रमेश बिल्लौरे का रविवार 10 मई के दिन दोपहर इंदौर में निधन हो गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों ने उन्हें नर्मदा संघर्ष का ‘चलता-फिरता दस्तावेज’, ‘घुमक्कड़ बुद्धिजीवी’ और ‘नर्मदा का सच्चा पुत्र’ बताते हुए श्रद्धांजलि दी।
रमेश बिल्लौरे नर्मदा घाटी के सवालों पर उस दौर से काम कर रहे थे, जब नर्मदा बचाओ आंदोलन औपचारिक रूप से आकार भी नहीं ले पाया था। बड़े बांधों के सामाजिक, पर्यावरणीय और मानवीय प्रभावों को लेकर उन्होंने शुरुआती दौर में ही गंभीर अध्ययन शुरू कर दिया था और लगातार सवाल उठाए। बाद में यही चिंतन नर्मदा संघर्ष की वैचारिक ज़मीन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
बांधों की राजनीति और विकास के मॉडल पर उनकी सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक विरासत मानी जाती है पुस्तक डेमिंग दी नर्मदा: इंडियाज़ ग्रेटेस्ट प्लांड डिसास्टर जिसे उन्होंने पर्यावरण चिंतक क्लॉड अल्वारिस के साथ मिलकर तैयार किया था। 1988 में प्रकाशित यह अध्ययन नर्मदा परियोजना की शुरुआती तथ्यपरक आलोचनाओं में गिना जाता है। इसे नर्मदा आंदोलन के शुरुआती दस्तावेज़ों में एक महत्वपूर्ण कृति माना गया है।
रमेश बिल्लौरे का नर्मदा से रिश्ता केवल विचार या आंदोलन तक सीमित नहीं था। वह जीवन का रिश्ता था। नर्मदा आंदोलन से जुड़े साथी बताते हैं कि उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी नर्मदा घाटी, विस्थापन, पुनर्वास, पर्यावरण न्याय और जनसंघर्षों के सवालों को समर्पित कर दी।
वे केवल आंदोलनकारी नहीं थे; वे अनेक विषयों के गंभीर अध्येता, लेखक और संवेदनशील साहित्यकर्मी भी थे। बांधों, विकास और विस्थापन पर उन्होंने अनेक आलोचनात्मक लेख लिखे। सामाजिक प्रश्नों के साथ-साथ साहित्य, इतिहास, लोकजीवन और राजनीति पर भी उनकी पकड़ थी।
रमेश बिल्लौरे की पहचान एक घुमक्कड़, आत्मीय और बेहद जीवंत इंसान के रूप में थी। उनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं था—दोस्तों के घर, आंदोलन के मोर्चे, गांवों की चौपालें और संघर्ष के मैदान ही उनका घर थे। वे छोटी-छोटी घटनाओं, यात्राओं और जीवन के अनुभवों को इतने रोचक अंदाज़ में सुनाते थे कि कठिन संघर्षों के बीच भी हंसी और ऊर्जा का माहौल बन जाता था। (स्रोत फीचर्स)
पीछे मुड़कर देखा जो मैंने
फुरसत के समय
पीछे मुड़कर जो देखा
हुआ अवाक्
देख वह राह
चला जिस पर
हुआ विस्मय
देख उन मोड़ों को
मुड़ा जिन पर
लगा जैसे मैं देख रहा जो
पीछे मुड़ वो मेरी नहीं
किसी और की थी ज़िन्दगी
जो बीत गयी
जिसमें सब कुछ
अनियोजित
अव्यवस्थित
अनिश्चित!
हर बार जब मैं चौराहे पर ठहरा
तय करने के लिए कि
आगे जाना किधर
जाने-अनजाने
मैंने वही राह ली जो औरों ने नहीं ली
जो थी अपरिचित
मगर मुझे ज़रा भी नहीं हुआ अफ़सोस इस पर
आखिर अनजानी ही सही
मैं पहुंचा वहीं
जहां मुझे जाना था
और देख पाया तो कुल मिलाकर खूबसूरत ही रहा सफ़र!
रमेश बिल्लौरे
(29 सितंबर 2005)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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