
दुनिया के कुछ देश प्रतिवर्ष बाढ़ (flood) और सूखे (drought) की चपेट में आते हैं, जिसमें जान-माल की भारी क्षति होती है। इस विनाश को देखते हुए मौसम वैज्ञानिक बाढ़ और सूखे का अनुमान लगाते रहे हैं। अब (1989) जाकर थोड़ी सफलता मिली है। खोजों से पता चला है कि अफ्रीका व एशिया के कुछ देशों में वर्षा को प्रभावित करने वाला असली कारण प्रशांत महासागर (pacific ocean) में है और उसका नाम है ‘एल नीनो’। एल नीनो (El nino) स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ है बच्चा।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल नीनो ऐसी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर की हवाओं व समुद्री लहरों (ocean waves) के बहाव प्रभावित होते हैं। ऐसा तब होता है जब प्रशांत ऊष्ण कटिबंध के ऊपर, यानी पूर्व दिशा की ओर, हवाओं का चलना बंद हो जाता है। ये वे हवाएं हैं जो अपने साथ लहरों को भी बहा ले जाती हैं। खैर, जब ये हवाएं चलना बंद करती हैं तब गर्म पानी की धार इंडोनेशिया से दक्षिण अमेरिका तक बहने लगती है। इसी कारण दक्षिण अमेरिका के रेगिस्तान में मूसलाधार बारिश (heavy rains) होती है और ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा पड़ता है। मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि इसका सीधा असर हिंद महासागर (Indian ocean) पर भी पड़ता है। यही वजह है कि भारत व पूर्व अफ्रीका में मानसून (Monsoon) नहीं आ पाता।
एल नीनो के साथ पूरी दुनिया के समुद्रों का गर्म होना भी जुड़ा है। पिछले दस वर्षों के एल नीनो की हवाओं के चार्ट व ग्राफ के विश्लेषण से जलवायु के नियंत्रित होने का भी पता चलता है। मौसम वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि हवाओं व समुद्री लहरों में यह बदलाव प्राकृतिक चक्र का ही एक हिस्सा है जो लगभग चार साल में एक बार आता है। इन्हीं अध्ययनों के आधार पर न्यूयार्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय के मार्क केन व स्टीफन ज़ेबियाक ने 1986-87 में एक छोटे एल नीनो की भविष्वाणी की थी। जिसके कारण इथिओपिआ में दोबारा सूखा पड़ा।
एल नीनो के बारे में जानने लायक एक महत्वपूर्ण चीज़ यह भी है कि जब इसके चक्र में गर्त (ट्रफ) (trough) पड़ते हैं, तब इसका प्रभाव क्या होता है? और इसे क्या कहकर पुकारते हैं? वैज्ञानिकों ने इसकी गर्त वाली स्थिति को नाम दिया है ‘ला नीना’। ला नीना (la nina) के दौरान प्रशांत महासागर के ऊपर हवाएं तेज़ हो जाती हैं। उस समय दुनिया के सभी समुद्रों का तापमान (Sea temperature) गिर जाता है।
ऑस्ट्रेलिया के जलवायु अनुसंधान केंद्र के नेविल निकल्स का कहना है कि 1988 एक विशिष्ट ला नीना वर्ष था। और इसी कारण भारत, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में सामान्य से अधिक वर्षा हुई; सूडान व बांग्लादेश में बाढ़ आई। यहां तक कि 1982-83 के भीषण सूखे को भी ऊंचे एल नीनो के प्रभाव से जोड़ा गया।
दूसरी ओर जेनेवा शहर में स्थित वर्ल्ड मीटिरियोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन का कहना है कि एल नीनो के घटनाक्रम को पृथ्वी के ग्रीनहाउस प्रभाव से जोड़ा जा सकता है। एल नीनो वर्षों में देखा यह गया कि गर्म समुद्र, वातावरण को गर्म करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष कई गीगा टन कार्बन (carbon) वातावरण में जाता है, खासकर जब सूखा पड़ता है, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव (greenhouse effect) बढ़ जाता है। किंतु वैज्ञानिक इस मामले में एकमत नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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