
यह चमत्कार ही लगता है कि कई पक्षी (Birds) हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करते हैं, साल-दर-साल सही ठिकाने पर पहुंच जाते हैं और वापिस उड़कर अपने घर भी आ जाते हैं। और पक्षी ही नहीं समुद्री कछुए (Sea Turtels) तथा कई अन्य जानवर भी यह करतब करते हैं। सवाल यह उठता है कि ये प्राणी इस प्रवास (Migration) के दौरान अपना मार्ग कैसे ढूंढते हैं।
इसका जवाब खोजते-खोजते यह समझ में आया है कि ये जीव किसकी प्रकार से पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र (Earth’s Magnetic Field) को ताड़कर दिशा का अंदाज़ लगा लेते हैं।
चुंबकत्व आधारित दिशा-निर्धारण की क्षमता (Magnetoreception) कई जंतुओं में देखी गई है। जैसे पक्षी, कछुए, शार्क, और कुत्ते। कुछ शोधकर्ता तो मानते हैं कि मनुष्य में भी थोड़ी बची-खुची क्षमता है। खैर, यह काफी गरमागर्म बहस का विषय रहा है कि यह चुंबकीय ज्ञानेंद्री (Magnetic Sensory) कैसे काम करती है। एक परिकल्पना यह रही है कि जंतुओं के ऊतकों में मैग्नेटाइट नामक लवण के छोटे-छोटे रवे होते हैं। ये रवे एक तरह से चुंबकीय दिक्सूचक (Compass) का काम करते हैं।
एक ज़्यादा हालिया परिकल्पना आंखों के रेटिना पर केंद्रित है। इसमें माना जाता है कि रेटिना के प्रोटीन्स (क्रिप्टोक्रोम्स) (Chryptochromes) चुंबकीय क्षेत्र के प्रति संवेदी होते हैं। इसके अनुसार प्रवासी सॉन्ग बर्ड्स हल्के से धुंधलके में भी सही दिशा में उड़ते रह सकते हैं।
फिर पिछले साल होमिंग पिजन्स (घर लौटने वाले कबूतर) पर शोध करके एक और नवीन प्रक्रिया उजागर हुई है। प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों से पता चला है कि बदलते चुंबकीय क्षेत्र से इन कबूतरों के अंदरुनी कान में विद्युत धाराएं (Electric current) पैदा होती हैं। ये विद्युत धाराएं मस्तिष्क तक पहुंचने वाली तंत्रिकाओं को सक्रिय कर देती हैं।
मज़ेदार बात है कि इस अध्ययन की शुरुआत एक संयोग से हुई थी। मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल बिहेवियर के पक्षी वैज्ञानिक मार्टिन वाइकेल्स्की और बॉन विश्वविद्यालय के प्रतिरक्षा वैज्ञानिक क्रिस्टियन कर्ट्स के बीच बातचीत के दौरान वाइकेल्स्की ने जंतु प्रवास में चुंबकत्व की भूमिका का विवरण दिया। यह सुनकर कर्ट्स ने बताया कि उन्होंने चूहों और मनुष्य की तिल्ली (प्लीहा) से प्राप्त प्रतिरक्षा कोशिकाओं (मैक्रोफेज) में बारीक चुंबकीय लौह कण देखे जो तब बनते हैं जब मैक्रोफेज (Macrophage) पुरानी लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट करके उनके लौह परमाणु जज़्ब कर लेती हैं। क्या इसी तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाएं होमिंग पिजन्स (Homing Piegons) को प्रवास के दौरान दिशा-निर्धारण में मदद कर सकती हैं?
लेकिन सवाल था इस विचार की प्रायोगिक जांच का। कर्ट्स के दिमाग में एक आइडिया था और इस आइडिया को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने बॉन विश्वविद्यालय के पोस्ट-डॉक शोधकर्ता क्लिविया लिसोव्स्की को शामिल कर लिया। लिसोव्स्की की रुचि यह समझने में थी कि कोशिकाएं अपने पर्यावरण को कैसे भांपती हैं।
सबसे पहले तो लिसोव्स्की ने यह जांच की कि क्या कबूतरों की विभिन्न प्रजातियों की प्रतिरक्षा कोशिकाओं (Immune Cells) में वैसे ही चुंबकीय कण पाए जाते हैं जैसे चूहों में देखे गए थे। लिसोव्स्की और उनकी टीम को उम्मीद थी कि ऐसी कोशिकाओं का जखीरा प्लीहा में मिलेगा क्योंकि वहीं पर तो मैक्रोफेज लाल रक्त कोशिकाओं को रीसायकल करने का काम करते हैं। लेकिन अपेक्षा के विपरीत, एक बढ़िया चुंबकत्व-मापी (मैग्नेटोमीटर) ने दर्शाया कि सारे ऊतकों में सबसे शक्तिशाली चुंबकीय संकेत लीवर (यकृत, जिगर) में मिल रहे थे। हालांकि संकेत क्षीण थे लेकिन वे मैग्नेटोमीटर (Magnetometer) के हिसाब से काफी शक्तिशाली थे।
होमिंग पिजन्स के ऊतकों की पतली-पतली स्लाइस निकालकर अभिरंजित (Staining) करके यह पक्का हो गया कि लीवर के मैक्रोफेज में फेरिटिन (Ferritin) नामक लौह कण भरपूर मात्रा में थे लेकिन ये प्लीहा, मस्तिष्क और चोंच में नदारद थे। इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Electron Microscope) से अवलोकन से यह भी स्पष्ट हो गया कि कबूतरों के लीवर के मैक्रोफेज के आसपास थे। यह तो पहले से पता था कि स्तनधारियों और पक्षियों में प्लीहा (Spleen) की तंत्रिकाएं मैक्रोफेज से संवाद करती हैं और दोनों में ही ये तंत्रिकाएं केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से जुड़ती हैं।
अब एक उम्दा प्रयोग से इस बात की जांच की गई कि ये लौह-प्रचुर मैक्रोफेज चुंबकीय कम्पास की तरह कैसे काम करते होंगे। इस प्रयोग में एक औषधि क्लोड्रोनेट लिपोसोम की मदद से मैक्रोफेज को सुप्त कर दिया गया। शोधकर्ताओं ने 34 होमिंग पिजन्स को प्रशिक्षित किया कि वे ठीक पूर्व दिशा में 19 किलोमीटर की उड़ान भरें।
दिन के समय तो कबूतर दिशा-निर्धारण के लिए सूर्य की स्थिति की मदद लेते हैं। लेकिन जब घने बादल छाए हों, तो दिशा के लिए वे चुंबकत्व के सहारे रहते हैं। एक झील (लेक कॉन्स्टेन्स) के नज़दीक शोधकर्ता दल ने 18 कबूतरों को क्लोड्रोनेट (Clodronate) का इंजेक्शन दिया और 24 घंटे बाद उन्हें एक-एक करके उस समय छोड़ा गया जब घने बादलों के कारण सूर्य पूरी तरह ओझल था। ज़ाहिर है, इन पक्षियों पर जीपीएस चस्पा किया गया था जिसकी मदद से शोधकर्ता इनकी उड़ान पर नज़र रख सकते थे।
बादल आच्छादित आकाश के समय तो कबूतरों को 19 किलोमीटर सही-सही उड़ने में उस स्थिति में कोई दिक्कत नहीं आई जब उनके मैक्रोफेज सही-सलामत थे। लेकिन जब क्लोड्रोनेट इंजेक्शन ने उनके लीवर मैक्रोफेज को ठप कर दिया, तब वे खुले धूप वाले आकाश में तो आसानी से उड़े लेकिन मेघाच्छादित आकाश (Cloudy sky) में उन कबूतरों को दिशा तलाशने में खासी परेशानी हुई जिनके लीवर मैक्रोफेज ठप कर दिए गए थे। यानी प्रतिरक्षा कोशिकाएं दिशा निर्धारण में भूमिका निभाती हैं।
इंजेक्शन-प्राप्त समस्त 18 पक्षी बहुत भटक गए थे और तभी घर लौट पाए जब आसमान साफ हो गया। दूसरी ओर, जिन 16 पक्षियों को नकली इंजेक्शन दिया गया था वे सीधे घर लौट आए।
यह देखने के लिए कि क्या औषधि कबूतरों को सामान्य रूप से दिग्भ्रमित कर देती है, शोधकर्ताओं ने औषधि-उपचारित पक्षियों को खुले आकाश की परिस्थिति में भी छोड़ा। सारे के सारे बगैर किसी परेशानी के वापिस लौट आए।
कई वैज्ञानिकों ने इस खोज को रोमांचक बताया है लेकिन आगे और छानबीन का सुझाव दिया है। जैसे बोलिंग ग्रीन विश्वविद्यालय के वर्नर बिंगमैन का सुझाव है कि लीवर के मैक्रोफेज को ठप करने की बजाय लीवर की चुंबकीय सूचना के साथ छेड़चाड़ करके देखा जाए। इस तरह का एक प्रयोग 1970 के दशक में किया गया था। उस प्रयोग में शोधकर्ताओं ने होमिंग पिजन्स को चुंबकीय कुंडली (Magnetic coil) पहना दी थी जो उनके सिर के आसपास चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव करती थी। देखा गया था कि ये कबूतर उल्टी दिशा में उड़ चले थे।
बहरहाल, वाइकेल्सकी का कहना है कि यदि सही साबित हुआ, तो शायद यह प्रक्रिया मधुमक्खियों से लेकर चमगादड़ों, शार्क और व्हेल्स तक के लिए एक समान हो। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.science.org/do/10.1126/science.aal1065/full/_IMG_2564_16x9.jpg