अमेरिका में अगले चुनाव मत पत्रों से करवाने का सुझाव

अमेरिका में साल 2020 में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। वहां की विज्ञान अकादमियों का आग्रह है कि ये चुनाव मत पत्रों (बैलट पेपर) से किए जाएं।

दरअसल साल 2016 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में गड़बड़ियों की आशंका जताई जा रही थी। वहां की खुफिया एजेंसियों ने खुलासा किया था कि रूस की सरकार ने चुनाव में धांधली करवाने की कोशिश की थी।

अमेरिका में ईवीएम मशीन और इंटरनेट के ज़रिए वोट डाले जाते हैं। राष्ट्रीय विज्ञान, इंजीनियरिंग और चिकित्सा अकादमी की रिपोर्ट के अनुसार मत पत्र, जिनकी गणना इंसानों द्वारा की जाती है, चुनाव के लिए सबसे सुरक्षित तरीका है। उन्होंने पाया है कि चुनाव के लिए इंटरनेट टेक्नॉलॉजी सुरक्षित और भरोसेमंद नहीं है। इसलिए रिपोर्ट में उनका सुझाव है कि 2020 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को मत पत्रों से किया जाए। जब तक इंटरनेट सुरक्षा और सत्यापन की गांरटी नहीं देता तब तक के लिए इसे छोड़ देना बेहतर होगा। मत पत्र से मतगणना के लिए ऑप्टिकल स्कैनर का उपयोग अवश्य किया जा सकता है। मगर, इसके बाद पुनर्गणना और ऑडिट इंसानों द्वारा ही किया जाना चाहिए। अकादमी की रिपोर्ट में उन मशीनों को भी तुरंत हटाने का भी सुझाव दिया गया है जिनमें इंसानों द्वारा गणना नहीं की जा सकती।

कमेटी के सहअध्यक्ष, कोलंबिया युनिवर्सिटी की ली बोलिंगर और इंडियाना युनिवर्सिटी के अध्यक्ष माइकल मैकरॉबी का कहना है कि मतदान के दौरान तनाव को संभालने की ज़रूरत है। जब मतदाताओं की संख्या और जटिलता बढ़ रही है और हम उन्हें मताधिकार के प्रति जागरूक करना चाहते हैं तो चुनावी प्रक्रिया को भ्रष्ट होने से बचाना ज़रूरी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दाढ़ी-मूंछ रखने के फायदे और नुकसान – डॉ. ओ. पी. जोशी

फैशन के आयाम हमेशा बदलते रहते हैं। एक समय था जब क्लीन शेव रखना अच्छा माना जाता था परंतु अब दाढ़ी या मूंछ या दोनों ही रखना फैशन बनता जा रहा है। स्टाइलिश लुक देने के लिए दाढ़ीमूंछों के कई प्रकार भी हो गए हैं। इतिहास में झांककर देखें तो पता चलता है कि दाढ़ीमूंछ रखने की परंपरा काफी पुरानी है। साधु संत लोग दाढ़ीमूंछ रखते थे और आज भी रखते हैं। राजामहाराजाओं द्वारा दाढ़ीमूंछ रखना शौर्य व पराक्रम का प्रतीक माना जाता था, परंतु कुछ इसे नापसंद भी करते थे। सिकंदर को अपने सिपाहियों तथा तुर्की लोगों को अपने गुलामों का दाढ़ीमूंछ रखना नापसंद था। रूस के पीटर महान ने तो दाढ़ीमूंछ पर टैक्स लगाया था।

इतिहास कुछ भी रहा हो एवं फैशन में इसे कैसी भी मान्यता दी गई हो, परंतु अब दाढ़ीमूंछ वैज्ञानिकों, चर्म रोग के चिकित्सकों एवं पर्यावरणविदों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई हैं। दाढ़ीमूंछ रखने या न रखने के पक्ष एवं विपक्ष में खेमे बन गए हैं एवं सभी के अपनेअपने तर्क एवं विचार हैं।

चर्मरोग विशेषज्ञ मानते हैं कि दाढ़ीमूंछ त्वचा की कई समस्याओं एवं रोगों से बचाती हैं। दाढ़ीमूंछ चेहरे की त्वचा को सूखी होने से तथा पराबैंगनी किरणों के हानिकारक प्रभाव से लगभग 90 प्रतिशत बचाती हैं और जीवाणुओं के संक्रमण व धूल आदि से भी बचाव करती है। चेहरे के कई दाग धब्बे, निशान एवं झुर्रियां भी दाढ़ीमूंछ छिपा लेती हैं।

अलबत्ता, धूल एवं प्रदूषणकारी पदार्थों की रोकथाम में दाढ़ीमूंछ की फिल्टर समान भूमिका को अब वैज्ञानिक सही नहीं मानते हैं। कुछ वर्ष पूर्व सोवियत संघ की चिकित्सा विज्ञान अकादमी में कार्यरत वैज्ञानिकों ने बताया था कि दाढ़ीमूंछ रखने वाले लोगों की सांस के साथ अंदर जा रही हवा में कई प्रकार के विषैले रसायन पाए जाते हैं। जैसे एसीटोन, बेंज़ीन, टालुईन, अमोनिया, फिनॉल तथा आइसोप्रोपेन। वैज्ञानिकों ने केवल दाढ़ी रखने वाले, केवल मूंछ रखने वाले, दाढ़ीमूंछ दोनों रखने वाले तथा दाढ़ीमूंछ दोनों रखने के साथ धूम्रपान करने वाले लोगों पर अलगअलग प्रयोग किए। परिणाम चौंकाने वाले तथा खतरनाक थे।

वैज्ञानिकों ने पाया कि केवल मूंछ एवं केवल दाढ़ी वाले लोगों की सांस में विषैले रसायन आसपास की वायु से क्रमश: 4.2 तथा 1.9 प्रतिशत ज़्यादा थे। दाढ़ीमूंछ दोनों होने पर यह मात्रा 7.2 प्रतिशत अधिक पाई गई। मूंछों वाले धूम्रपान प्रेमियों में विषैले रसायन 24.7 एवं दाढ़ी वालों में 18.2 प्रतिशत अधिक आंके गए। दाढ़ीमूंछ के साथ धूम्रपान करने वालों में ज़हरीले रसायन  40.2 प्रतिशत अधिक देखे गए। अध्ययन दर्शाता है कि दाढ़ीमूंछ के साथ धूम्रपान का शौक काफी खतरनाक है।

दाढ़ीमूंछ चेहरे की त्वचा को सुरक्षा देती है या सांस के साथ फेफड़ों में पहुंचने वाले प्रदूषण की मात्रा बढ़ाती है। इन दोनों तथ्यों पर दुनिया भर में चिकित्सकों एवं पर्यावरणविदों ने अध्ययन कर अपनेअपने विचार रखे हैं। ज़्यादातर चिकित्सकों का मत है कि दाढ़ी एवं मूंछ पूरे चेहरे को नहीं अपितु केवल उतने क्षेत्र को ही सुरक्षा प्रदान करती हैं जहां तक वे फैली होती हैं। कई प्रकरणों में तो दाढ़ीमूंछ के अंदर भी त्वचा पर संक्रमण का पैदा होना देखा गया है। दाढ़ीमूंछ स्थायी तौर पर रखने वाले धार्मिक एवं कुछ संप्रदाय के लोगों के चेहरे पर कभी संक्रमण नहीं हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। दाढ़ीमूंछ के अलावा कई अन्य प्रयास भी लोगों द्वारा संक्रमण रोकने हेतु किए जाते हैं।

पर्यावरणविदों के मत भी तर्कसंगत तथा प्रासंगिक हैं। उनका कहना है कि आजकल लोग स्वास्थ्य, सुंदरता तथा फैशन के प्रति जागरूक हैं, इसलिए वे दिन में 3-4 बार चेहरे को धोते हैं। चेहरा धोने से प्रदूषणकारी पदार्थ पानी के साथ घुलकर बह जाते हैं और इस वजह से सांस के साथ ज़्यादा प्रदूषित पदार्थों का शरीर में प्रवेश करना संभव नहीं है। वैसे आजकल बालों के समान दाढ़ीमूंछ भी रंगी जाती हैं। डाई में उपस्थित रसायनों के शरीर में प्रवेश करने या न करने पर वैज्ञानिकों ने अभी तक कोई मत नहीं दिए हैं।

कुछ चिकित्सक एवं पर्यावरण वैज्ञानिकों ने दाढ़ीमूंछ के रखरखाव एवं सांस के द्वारा ज़हरीले रसायनों के प्रवेश के सम्बंधों पर भी अध्ययन किए है। दाढ़ीमूंछों के रखरखाव के तहत तेल आदि लगाने पर प्रदूषणकारी पदार्थ वहां चिपक जाते हैं एवं सांस के साथ शरीर में प्रवेश नहीं कर पाते हैं और यदि प्रवेश करते भी हैं तो उनकी मात्रा काफी घट जाती है। इसके विपरीत बगैर तेल लगी सूखी दाढ़ीमूंछों से ये पदार्थ सांस द्वारा तेज़ी से शरीर में पहुंचते है।

इस प्रकार दाढ़ीमूंछ, स्वास्थ्य व प्रदूषण के संदर्भ में वैज्ञानिकों, चिकित्सकों तथा पर्यावरणविदों ने अपनेअपने मत रखे हैं एवं तर्कों के आधार पर उन्हें सही या गलत बताया है। अब निर्णय आपको लेना है कि दाढ़ीमूंछ रखें या न रखें। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कपास का पालतूकरण और गुलामी प्रथा – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

बैक्टीरिया की एक नई किस्म किस प्रकार विकसित होती है? मान लीजिए, किसी बैक्टीरिया का सामना किसी खतरे से होता है। यह खतरा एंटीबायोटिक के रूप में हो सकता है। संयोगवश बैक्टीरिया के जीन में एक छोटासा परिवर्तन होता है, जो उसे इस खतरे का सामना करने के काबिल बनाता है। दूसरे शब्दों में, उसे प्रतिरोधी बनाता है। चूंकि बैक्टीरिया कुछ मिनटों या घंटों में तेज़ी से बढ़ते हैं इसलिए हम देख सकते हैं कि कुछ ही हफ्तों में बैक्टीरिया की दवा प्रतिरोधी किस्म बढ़ जाएगी और दवा संवेदनशील किस्मों की जगह ले लेगी।

उपरोक्त बात जो बैक्टीरिया के लिए सत्य है वह पौधों और जानवरों पर भी लागू होती है। फर्क केवल इतना है कि पौधों और जंतुओं के मामले में समय मिनटों और घंटों में नहीं बल्कि दशकों, सदियों या सहस्त्राब्दी में देखा जाता है क्योंकि इनमें एकएक पीढ़ी काफी लंबे समय की होती है। मगर यह सही है कि जब उन पर भी जलवायु या पर्यावरण परिवर्तन, या पालतू बनाए जाने के कारण स्थानीय परिवर्तनों का दबाव पड़ता है तो वे भी उत्परिवर्तन पैदा करते हैं।

क्या ऐसे तनाव एक के बाद एक उत्परिवर्तन क्रमिक रूप से उत्पन्न करते हैं या जीनोम अपेक्षाकृत थोक में (झटके के साथ रुकरुककर) प्रतिक्रिया देता है? क्रमिकता में विश्वास रखने वाले जीव विज्ञानी इन वैज्ञानिकों को जर्क’ (झटका) कहते हैं। इसके जवाब में झटकेदार उत्परिवर्तन में विश्वास करने वाले वैज्ञानिक क्रमिकता में विश्वास करने वालों को क्रीप (सरका) कहते हैं।

मक्का, गेहूं, कपास या चावल जैसे पौधों को देखें। इन्हें जलवायु में बड़े बदलावों का सामना करना पड़ा है। इनमें से कई परिवर्तन पुरातन काल में पृथ्वी पर हुए थे। जब मनुष्य ने पालतू बनाने की प्रक्रिया में उन्हें नए वातावरण प्रदान किए तब भी इन्हें परिवर्तनों का सामना करना पड़ा था।

सवाल है कि पौधे इस तरह के तनाव में कैसी प्रतिक्रिया देते हैं? क्या उनके जीन में क्रमिक परिवर्तनों के ज़रिए सदियों में अनुकूलन होगा, जिसमें एक के बाद एक प्रत्येक उत्परिवर्तन पहले वाले उत्परिवर्तन की मदद करेगा? या एक बड़े पैमाने पर एक झटके में थोक परिवर्तन हो सकते हैं जिनकी वजह से नई किस्में एवं संकर उत्पन्न हो जाएंगे?

जीव विज्ञानी डॉ. बारबरा मैकलिंटॉक मक्का (मकई) में आनुवंशिक परिवर्तन का अध्ययन कर रही थीं। कई वर्षों के की अथक मेहनत के बाद यह देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि जीनोम के भीतर जीन अनुक्रमों का थोक स्थानांतरण होता रहता है।

उन्होंने पाया कि जीनोम के भीतर डीएनए के टुकड़े कटकर अलग होते हैं, कहीं औेर चिपक जाते हैं, या उनकी प्रतिलिपि बनकर कहीं और जुड़ जाती है। इस प्रकार से जीनोम एक जड़ाऊ काम है, जिसका अनुक्रम बदलता रहता है और अनुक्रम बदलने के साथ संदेश भी बदलता है और नई किस्में पैदा हो सकती हैं।

(उदाहरण के तौर पर, एक वाक्य देखिए: मारो मत, जाने दो। अब काटछांट या शब्दों को कॉपीपेस्ट करने पर वाक्य का संदेश बदल जाएगा: मारो, मत जाने दो)। मैकलिंटॉक ने ऐसे चलतेफिरते डीएनए अनुक्रमों को ट्रांसपोज़ॉन या ट्रांसपोज़ेबल घटक का नाम दिया था। इस खोज के लिए उन्हें 1983 में नोबेल पुरस्कार मिला।

ट्रांसपोज़ॉन्स या फुदकते जीनअनुक्रम तनाव होने पर या पालतूकरण का दबाव होने पर विकास के लिए एक व्यवस्था प्रदान करते हैं। हाल ही में इस बिंदु को वारविक विश्वविद्यालय, यूके में कपास के पौधे का अध्ययन करने वाले एक समूह द्वारा रेखांकित किया गया है।

उन्होंने कपास के पुरातात्विक नमूने लिए (पेरू से दो, एकएक ब्राज़ील और मिरुा से)। इनके डीएनए अनुक्रमों का विश्लेषण करने पर देखा कि पालतू बनाई गई किस्मों में काफी जीनोमिक पुनर्गठन हुआ है, जबकि इन्हीं से सम्बंधित जंगली किस्मों में जीनोम अनुक्रम काफी स्थिर बना रहा है।

पालतूकरण और इससे उत्पन्न तनाव पौधों को मजबूर करते हैं कि वे ट्रांसपोज़ॉन्स का उपयोग करके जीन्स का स्थानांतरण करें।

मनुष्यों की सांस्कृतिक प्रथाओं के कारण इस तरह के एपिसोडिक (घटनाआधारित) परिवर्तनों का अनुभव अकेले कपास ने नहीं किया है। बल्कि साथसाथ, कपास के कारण मानव व्यवहार और सभ्यता में भी एपिसोडिक परिवर्तन आए हैं।

यह प्राचीन पौधा पहली बार सिंधु घाटी में 6000 ईसा पूर्व में पालतू बनाया गया था। वहां से यह अफ्रीका और अरेबिया तक फैल गया, जहां इसे अल कुत्न नाम दिया गया (स्पैनिश में यह अलगोडन हुआ और अंग्रेज़ी में कॉटन)

स्वतंत्र रूप से, मेक्सिको में 3000 ईसा पूर्व में, इसकी एक और प्रजाति उगाई गई थी। शुरुआती एशियाई और मेक्सिकन लोग इसे कातते और पहनते थे। मसाले, सोना और चांदी के साथ, कपास भी प्राचीन विश्व का खज़ाना था जिसे उपनिवेशवादी लूटा करते थे।

कपास की इस लूटपाट और व्यावसायीकरण ने गुलामी के अपमानजनक और अक्षम्य इतिहास को बढ़ावा दिया। जब युरोपीय लोगों ने अमेरिका की खोज की, और उसके अधिकांश दक्षिणी राज्यों को कपास के खेतों में परिवर्तित कर दिया तो उन्हें मज़दूरों की आवश्यकता पड़ी।

सिर्फ 1700 से 1900 के बीच, कपास खेतों में काम करने के लिए 40 लाख अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाकर यू.एस. लाया गया ताकि उन पर जानवरों की तरह अधिकार जताकर खरीदा और बेचा जा सके। (यहां तक कि अमेरिका के संस्थापक भी नीग्रो गुलामों के मालिक थे और उनका इस्तेमाल करते थे)

फलस्वरूप, कपास फलनेफूलने लगा। 1800 के दशक के मध्य तक अमेरिका प्रतिवर्ष लगभग दो अरब टन कपास निर्यात कर रहा था।

यह सही है कि इस अमानवीय प्रथा के खिलाफ असंतोष था, लेकिन जब इसने गृहयुद्ध का रूप ले लिया तब राष्ट्रपति लिंकन ने हस्तक्षेप करके युद्ध जीता और देश को एकीकृत किया।

लेकिन काले और गोरे लोगों को समान अधिकार तो तब मिले जब गांधीवादी नेता मार्टिन लूथर किंग के नेतृत्व में अश्वेत लोगों ने (अपने गोरे समर्थकों के साथ) इस लड़ाई को बहादुरी से बढ़ाया। उनका नारा था, हम होंगे कामयाब, हम होंगे आज़ाद एक दिन।

भारत में, ईस्ट इंडिया कंपनी की एक प्रमुख खोज कैलिको था। यह कोज़िकोड (कालीकट, इसलिए कैलिको) में बनाया गया एक कपड़ा था जिसे सूत और बिनौले के छिलके दोनों का उपयोग करके बनाया जाता था।

भारतीय (और मिस्र) सूत की मेहरबानी से कंपनी और साम्राज्य ने सालाना लाखों पाउंड कमाए। जब औद्योगिक क्रांति के दौरान इंग्लैंड में कपड़ा मिलों की स्थापना हुई, तो सूती कपड़ा और अधिक महीन व बेहतर हो गया और उसकी मांग बढ़ी। भारतीय सूती कपड़े ने यूके (जहां इसे प्रतिबंधित किया गया था) और खुद भारत में भी अपना मूल्य खो दिया।

गांधीजी ने मिलनिर्मित कपड़े के सांस्कृतिक और शोषक मूल्य को समझा। इसी के चलते उन्होंने चरखे और घर की बनी खादी को महत्व दिया। आर्थिक मूल्य के अलावा, यह आज भी राष्ट्रीय गौरव और देशभक्ति की भावना जगाता है। अर्थात कपास एक क्रमिक परिवर्तन नहीं लाया, बल्कि राष्ट्रवाद की भारतीय भावना में एक गहरे परिवर्तन को झटके से शुरू किया। यह कितना अन्यायपूर्ण है कि वर्तमान समय के खद्दरधारी नेताओं के युग में, ढाई लाख से अधिक किसान सिर्फ इस कारण आत्महत्या कर चुके हैं कि वे कपास की खेती करने के लिए उठाए गए ऋणों का भुगतान नहीं कर सके। और राहत की कोई उम्मीद भी नज़र नहीं आती (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या पैदाइशी दांत चिंता का विषय है? – डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

दांत आना बच्चे के जीवन के पहले वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण घटना होती है।  पहला दांत निकलना माता-पिता एवं परिवार के लिए बेहद खुशी का अवसर होता है। कुछ संस्कृतियों में इस समय बच्चे को दूध के अलावा पहला भोजन दिया जाता है।

सामान्यत: बच्चों में दांतों का पहला जोड़ा 6 माह की उम्र में दिखता है। इन्हें कृंतक दांत कहते हैं। कुछ ही हफ्तों बाद ऊपरी चार कृंतक भी दिखने लगते हैं। इसके बाद अन्य दांत आने लगते हैं। ढाई-तीन साल में निचले जबड़े और ऊपरी जबड़े में 10-10 दांत निकल आते हैं। ये दूध के दांत कहलाते हैं। फिर 6-12 वर्ष की आयु में दूध के दांत गिरने लगते हैं तथा उनकी जगह नए तथा मज़बूत दांत ले लेते हैं। जैव-विकास के क्रम में हमारे जबड़े छोटे हुए हैं और उनमें 32 दांतों के लिए जगह नहीं बची है। इसलिए अक्सर 28 दांत ही आते हैं और कई बार तो एक के ऊपर दूसरा दांत आ जाता है।

हाल ही में एक नवजात बच्ची ने सबको आश्चर्य में डाल दिया क्योंकि 12 दिन की आयु में ही उसके निचले मसूड़े में एक दांत चमक रहा था। जन्म के समय या एक महीने के भीतर दांतों का आना एक बिरली बात है। इस प्रकार के दांतों को पैदाइशी या प्रसव दांत कहते हैं और ये 2500 में किसी एक बच्चे में देखे जाते हैं। पैदाइशी दांत जबड़ों में मज़बूती से न जुड़े होने के कारण मसूड़ों में हिलते रहते हैं। दांतों के डॉक्टर ऐसे दांतों को निकाल देते हैं क्योंकि खुद निकलकर ये सांस की नली में भी जा सकते हैं हालांकि चिकित्सा साहित्य में पैदाइशी दांत के सांस की नली में जाने का कोई उदाहरण नहीं मिलता। इसके अलावा दर्द और अड़चन के कारण बच्चे अक्सर दूध पीना छोड़ देते हैं। मां को भी दूध पिलाने में दिक्कत हो सकती है।

इंडियन जनरल ऑफ डेंटिस्ट्री में सन 2012 में छपे एक शोध के अनुसार पैदाइशी दांतों के मामले में आनुवंशिकी की भी भूमिका होती है। अगर माता-पिता, नज़दीकी रिश्तेदार या भाई-बहन में पैदाइशी दांत थे तो नवजात में इसकी संभावना 15 प्रतिशत ज़्यादा होती है। अक्सर पैदाइशी दांत पर एनेमल की मज़बूत परत भी नहीं होती है और ये पीले-भूरे रंग के होते हैं।

कई संस्कृतियों में पैदाइशी दांत को शगुन-अपशगुन माना जाता है। रोमन इतिहासज्ञ टाइटस लिवियस (ईसा पूर्व पहली सदी) ने इन्हें विनाशकारी घटनाओं का संकेत बताया था। दूसरी ओर, प्लिनी दी एल्डर नामक इतिहासकार ने पैदाइशी दांतों को लड़कों में शानदार भविष्य तथा लड़कियों में खराब घटना का द्योतक बताया था। इंग्लैंड के लोग पैदाइशी दांत वाले बच्चों को मशहूर सैनिक और फ्रांस एवं इटली में ऐसे बच्चों को भाग्यशाली मानते थे। चीन, पोलैंड और अफ्रीका में ऐसे बच्चों को राक्षस एवं दुर्भाग्य का वाहक समझा जाता था।

आजकल बेहतर इलाज की उपलब्धता के चलते पैदाइशी दांतों के आने पर बच्चों को तुरंत ही दांतों के डॉक्टर को दिखाना चाहिए और सावधानीपूर्वक बच्चे की जांच की जानी चाहिए। माता-पिता की जागरूकता बढ़ाने के लिए चिकित्सकीय परामर्र्श भी बेहद आवश्यक है। (स्रोत फीचर्स)
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टापुओं पर निवास का विचित्र असर

हा जा रहा है कि जंतुओं के अलगथलग टापुओं पर रहने से उनकी साइज़ पर अजीबोगरीब असर होता है। और एक नए अध्ययन से पता चला है कि यह असर मनुष्यों पर भी होता है।

देखा गया है कि सायप्रस पर रहने वाले हिप्पोपोटेमस घटकर सीलायन के आकार के हो गए हैं। इसी प्रकार से, इंडोनेशिया के एक टापू फ्लोर्स पर हाथियों के जो जीवाश्म मिले हैं, वे बड़े सूअर की साइज़ के थे। दूसरी ओर, वहीं रहने वाले चूहे बिल्ली के बराबर हो गए थे। ये सब तथाकथित टापू प्रभाव के उदाहरण हैं। टापू प्रभाव अलगअलग साइज़ के जंतुओं पर अलगअलग असर डालता है। जब भोजन और शिकार का अभाव होता है तो बड़े जीव सिकुड़ने लगते हैं और छोटे जीव बड़े होने लगते हैं। अब प्रिंसटन विश्वविद्यालय के जोशुआ एकी, सेरेना टुक्सी और उनके साथियों द्वारा किए गए अध्ययन से पता चला है कि टापू प्रभाव मनुष्यों को भी नहीं बख्शता।

इन शोधकर्ताओं ने फ्लोर्स टापू पर रहने वाले रैम्पासासा पिग्मी लोगों का अध्ययन किया। इनका औसत कद मात्र 145 से.मी. होता है। पहले एक प्रतिष्ठित पुरामानव वैज्ञानिक ने सुझाव दिया था कि शायद पिग्मी लोगों में कुछ जेनेटिक लक्षण पुरामानव हॉबिट से आए हैं। उनका ख्याल था कि हॉबिट एक आधुनिक मानव था। चूंकि हॉबिट की ऊंचाई कम होती थी इसलिए ऐसा मत बना था कि उनके जेनेटिक लक्षण पिग्मी लोगों में आने के परिणामस्वरूप पिग्मी लोगों की ऊंचाई भी कम होती है।

शोधकर्ताओं की टीम इसी परिकल्पना को परखना चाहती थी। इसके लिए उन्होंने पिग्मी लोगों के डीएनए के नमूने प्राप्त किए। गौरतलब है कि इसकी अनुमति उन्होंने पिग्मी लोगों से ले ली थी। इन डीएन नमूनों के क्षार अनुक्रम का विश्लेषण करने पर पता चला कि इनमें और हॉबिट में कोई समानता नहीं है बल्कि पिग्मी लोग पूर्वी एशियाई लोगों के ज़्यादा करीब हैं। इनके पूर्वज फ्लोर्स टापू पर 50,000 से लेकर 5000 वर्ष पूर्व तक पूर्वी एशिया और न्यू गिनी से पहुंचे थे।

पिग्मी डीएनए के विश्लेषण से यह भी पता चला कि इनमें एक जीन का प्राचीन संस्करण मौजूद है जो एक एंज़ाइम का कोड है। यह एंज़ाइम मांस और समुद्री भोजन के वसा अम्लों को विघटित करने में मदद करता है। इसके अलावा पिग्मी जीनोम में वे जीन भी बहुतायत से पाए गए जो कद को छोटा रखने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। 

टीम का मत है कि इस विश्लेषण से लगता है कि टापू पर प्राकृतिक चयन की जो प्रक्रिया चली उसने छोटे कद के जीन्स को तरजीह दी। मतलब यह पर्यावरण के दबाव में विकास का उदाहरण है। इसी तरह के एक अन्य अध्ययन में पता चला है कि अंडमान द्वीपसमूह के टापुओं पर भी प्राकृतिक चयन ने छोटे कद को तरजीह दी है। लगता है कि अन्य जंतुओं के समान मनुष्य भी प्राकृतिक चयन का दबाव झेलते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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होंठों को पढ़ेगी कृत्रिम बुद्धि

जो लोग सुन नहीं सकते वे अक्सर होंठों की हरकत को देखकर अंदाज़ लगाते हैं कि सामने वाला क्या बोल रहा है। इसे लिप रीडिंग कहते हैं। मगर यह आसान नहीं होता और बहुत गलतियां होती हैं। अब शोधकर्ताओं ने कृत्रिम बुद्धि पर आधारित लिप रीडिंग का एक प्रोग्राम बनाया है जो कहीं बेहतर परिणाम दे सकता है। उम्मीद है कि जल्दी ही यह एक सरल से उपकरण के रूप में बधिरों की सहायता कर सकेगा। मगर इसे बनाना आसान नहीं रहा है।

पहले तो कंप्यूटर को लाखों घंटे के वीडियो दिखाए गए। इनमें लोग बोल रहे थे और साथ में लिखा था कि वे क्या बोल रहे हैं। इसके आधार पर कंप्यूटर को स्वयं सीखना था कि कौनसी ध्वनि के लिए होंठ कैसे हिलते हैं।

अब शोधकर्ताओं ने यूट्यूब पर उपलब्ध वीडियो में से 1 लाख 40 हज़ार घंटे का फुटेज लिया। इनमें लोग विभिन्न परिस्थितियों में बातें करते दिखाई देते हैं। इसके बाद उन्होंने इनमें से छोटेछोटे टुकड़े या क्लिप्स बनाए। प्रत्येक क्लिप में किसी एक शब्द की ध्वनि थी और उससे जुड़ी होंठों की हरकत थी। क्लिप्स मात्र अंग्रेज़ी भाषियों की ही बनाई गई थीं, और ध्वनि स्पष्ट थी तथा चित्र सामने से लिए गए थे। इन क्लिप्स में से शोधकर्ताओं ने वीडियो को इस तरह काटा कि सिर्फ मुंह दिखाई दे और शब्द सुनाई दे। इस तरह से उन्होंने 4000 घंटे का फुटेज तैयार किया जिसमें सवा लाख अंग्रेज़ी शब्द बोले गए थे। प्रत्येक क्लिप पर वह शब्द भी लिखा गया था जो उस क्लिप के होंठ बोल रहे हैं।

अब इन वीडियो क्लिप्स को एक अन्य प्रोग्राम के सामने चलाया गया। इस दूसरे प्रोग्राम को करना यह था कि होंठों की किसी भी हरकत के लिए वह संभावित शब्दों की सूची बनाए। और अंत में इन संभावित शब्दों को लेकर एक अन्य प्रोग्राम ने वाक्य बना दिए।

शोधकर्ताओं ने इस प्रोग्राम को 37 मिनट का वीडियो दिखाया और उसके द्वारा पहचाने गए शब्दों को रिकॉर्ड किया। पता चला कि कृत्रिम बुद्धि ने मात्र 41 प्रतिशत शब्दों को गलत पहचाना। aiXiv नामक वेबसाइट पर प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में टीम ने कहा है कि 59 प्रतिशत गलतियां बहुत ज़्यादा लगती हैं किंतु इन्हें पहले हासिल की गई उपलब्धियों के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। मसलन पूर्व में विकसित एक कंप्यूटर प्रोग्राम 77 प्रतिशत बार गलत होता था।

यदि यह कृत्रिम बुद्धि आधारित होंठ पढ़ने वाला प्रोग्राम सफल रहता है तो बधिरों के लिए काफी सुविधाजनक होगा।(स्रोत फीचर्स)

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जेनेटिक्स और स्कूल में बिताए वर्ष

हाल ही में सम्पन्न एक अध्ययन में यह देखने की कोशिश की गई है कि किसी व्यक्ति के जीन्स और स्कूली शिक्षा के बीच क्या सम्बंध है। इस अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता सदर्न कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के डेनियल बेंजामिन ने कहा है कि इसके परिणामों को बहुत सावधानीपूर्वक समझने की ज़रूरत है। इस बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने शोध पत्र के साथ इस विषय पर कुछ आम सवालों के जवाब भी दिए हैं।

पिछले पांच वर्षों में बेंजामिन और उनकी टीम ने यह समझने की कोशिश की है कि मानव जीनपुंज में कौनसी भिन्नताओं का सम्बंध इस बात से है कि आप कितने वर्षों की स्कूली शिक्षा हासिल करेंगे। 2013 में उनकी टीम ने युरोपीय मूल के 1 लाख से ज़्यादा लोगों के आनुवंशिक पदार्थ (डीएनए) का विश्लेषण करके पाया था कि मात्र तीन जेनेटिक भिन्नताएं स्कूली शिक्षा के वर्षों को प्रभावित करती हैं। इसके बाद 2016 में उन्होंने अपने अध्ययन का साइज़ तिगुना किया और 71 और भिन्नताएं पहचानीं।

इस टीम ने ऐसा ही अध्ययन अब युरोपीय मूल के 11 लाख लोगों पर किया है और इस बार उन्हें 1271 शिक्षासम्बंधी भिन्नताएं मिली हैं। टीम ने गणित में दक्षता और दिमागी क्षमता के परीक्षणों से जुड़े जीन्स भी देखे हैं। टीम का कहना है कि उन्होंने शिक्षा के जीन्सकी खोज नहीं की है बल्कि उपरोक्त में से कई जीन्स गर्भस्थ व नवजात शिशु में सक्रिय होते हैं और उनमें तंत्रिकाओं व मस्तिष्क की अन्य कोशिकाओं के निर्माण को और उनके द्वारा बनाए जाने वाले रसायनों तथा नई सूचनाओं के प्रति उनकी प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं।

टीम ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने ऐसा कोई जीन नहीं खोजा है जो स्कूल में बने रहने के वर्षों का निर्धारण करता है। और तो और, टीम के मुताबिक ये सारे जीन्स मिलकर भी लोगों के शैक्षिक भाग्य का निर्धारण नहीं करते। जब उन्होंने उपरोक्त 1271 जीन भिन्नताओं के आधार पर एक बहुजीन स्कोर बनाया तो उसके आधार पर स्कूली शिक्षा के वर्षों की मात्र 11 प्रतिशत व्याख्या हो पाई।

शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके इन परिणामों की व्याख्या सामाजिकआर्थिक संदर्भों में तथा वर्तमान शिक्षा प्रणाली के संदर्भों में की जानी चाहिए। उनका अध्ययन बच्चों को छांटने का नहीं बल्कि शिक्षा प्रणाली में सुधार का आधार बनना चाहिए। उदाहरण के लिए उनका कहना है कि आज से कुछ दशक पहले यदि ऐसा अध्ययन किया जाता तो पता चलता कि एक्स और वाय गुणसूत्र की उपस्थिति स्कूली शिक्षा का निर्धारण करती है। गौरतलब है कि दो एक्स गुणसूत्र हों तो लड़की और एक एक्स व एक वाय गुणसूत्र होने पर लड़का बनता है। इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि लड़के स्कूली शिक्षा में लड़कियों की तुलना में ज़्यादा अनुकूल हैं। इसके आधार पर इतना ही कहा जा सकता है कि पूर्व में समाज का गठन इस प्रकार हुआ था कि लड़कियों की शिक्षा को बहुत कम महत्व दिया जाता था। इसी तरह आज कुछ जीन्स शिक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण नज़र आ रहे हैं, तो इसलिए कि शिक्षा व्यवस्था उन जीन्स को ज़्यादा महत्व देती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मल-जल के विश्लेषण से नशीली दवाइयों की निगरानी

चीन में वैज्ञानिक और पुलिस मिलकर नशीली दवाइयों के उपयोग व उनकी रोकथाम की निगरानी करने के लिए मल-जल (सीवेज) के नमूनों की जांच का सहारा ले रहे हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तरीका काफी कारगर हो सकता है और अन्य देशों में भी अपनाया जा सकता है। इस तरीके में किया यह जाता है कि मल-जल के नमूनों में नशीली दवाइयों और उनके विघटन से बने रसायनों की जांच की जाती है।

उदाहरण के लिए, चीन के दक्षिणी शहर ज़ोंगशान में नशीली दवाओं के सेवन को कम करने के लिए चलाए जा रहे एक कार्यक्रम की सफलता को जांचने के लिए इस तरीके का उपयोग किया गया है। इस विधि को मल-जल आधारित तकनीक कहा जा रहा है। ज़ोंगशान पुलिस द्वारा इसकी मदद से नशीली दवाइयों के एक निर्माता को गिरफ्तार भी किया गया है।

वैसे बेल्जियम, नेदरलैंड, स्पेन और जर्मनी जैसे कई अन्य देशों में भी इस तकनीक के अध्ययन चल रहे हैं। किंतु इन देशों में इस तकनीक का उपयोग मात्र आंकड़े इकट्ठे करने के लिए किया जा रहा है जबकि चीन में इन आंकड़ों के आधार पर नीतिगत निर्णय किए जा रहे हैं और कार्रवाई की जा रही है। इस सम्बंध में चीन के राष्ट्रपति ज़ी जिनपिंग का कहना है कि नशीली दवाइयों के खिलाफ युद्ध उनके देश के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है।

इस तकनीक के विभिन्न अध्ययनों में मल-जल में किसी नशीली दवा या उसके विघटन से बने पदार्थों के विश्लेषण से उभरी तस्वीर और अन्य विधियों से दवाइयों के उपयोग की तस्वीर काफी मिलती-जुलतीरही हैं। मसलन, 2016 में युरोप के आठ शहरों में किए गए एक अध्ययन से पता चला था कि मल-जल में उपस्थित कोकेन और दवाइयों की जब्ती से प्राप्त आंकड़ों के बीच समानता थी। अलबत्ता, ऐसा लगता है कि कुछ दवाइयों के संदर्भ में दिक्कत है। जैसे मेट-एम्फीटेमिन्स के विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़े मेल नहीं खाते। बहरहाल वैज्ञानिक सहमत हैं कि मल-जल परीक्षण नशीली दवाइयों के उपयोग का ज़्यादा वस्तुनिष्ठ तरीका है।

इस संदर्भ में यह बात भी सामने आई है कि इस तकनीक का उपयोग ड्रग्स-विरोधी अभियानों के मूल्यांकन हेतु भी किया जा सकता है। जैसे, पेकिंग विश्वविद्यालय के पर्यावरण रसायनज्ञ ली ज़ीक्विंग और उनके दल ने चीन के विभिन्न स्थानों के मल-जल में दो नशीली दवाइयों – मेथ-एम्फीटेमिन और किटेमीन – का मापन किया था। यह मापन इन दवाइयों के खिलाफ चलाए गए अभियान के दो वर्ष पूरे होने पर एक बार फिर किया गया। पता चला कि मेथ-एम्फीटेमीन का उपयोग 42 प्रतिशत तथा किटेमीन का उपयोग 67 प्रतिशत कम हुआ था। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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गोताखोरों के अध्ययन में नैतिक नियमों का उल्लंघन

प्रैल माह में इंडोनेशिया के बजाऊ समुदाय पर हुए अध्ययन ने मानव के चलते हुए विकास का एक आकर्षक उदाहरण प्रस्तुत करके दुनिया भर के लोगों का ध्यान खींचा। इस समुदाय के पुरुष मछली और जलीय जीवों का शिकार करने के लिए अपना अधिकतर समय पानी के अंदर व्यतीत करते हैं। 2015 में इलार्डो ने 59 बजाऊ व्यक्तियों के अध्ययन के आधार पर पाया कि अन्य लोगों की तुलना में बजाऊ समुदाय के लोगों के स्पलीन बड़े होते हैं। ये बड़े स्प्लीन लंबे गोतों के दौरान अतिरिक्त रक्त कोशिकाएं मुक्त करके हाइपॉक्सिया (ऑक्सीजन की कमी) को संभालने में मदद करते हैं। शोधकर्ताओं ने इसके लिए ज़िम्मेदार एक जीन की पहचान भी की है।

लेकिन सेल में प्रकाशित इस अध्ययन ने इंडोनेशिया में अलग तरह की हलचल पैदा की है। यहां के कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि यह “हवाई शोध”का एक उदाहरण है जिसमें समृद्ध देशों के वैज्ञानिक स्थानीय नियमों और ज़रूरतों की परवाह नहीं करते।

इंडोनेशियाई अधिकारियों के अनुसार शोध दल ने स्थानीय समीक्षा बोर्ड से नैतिक अनुमोदन प्राप्त नहीं किया और बिना अनुमति डीएनए नमूने देश से बाहर ले गया। एक शिकायत यह भी है कि अध्ययन में शामिल एकमात्र स्थानीय शोधकर्ता के पास विकास या आनुवंशिकी में कोई विशेषज्ञता नहीं थी।

लेकिन टीम के प्रमुख, कोपेनहेगन विश्वविद्यालय सेंटर फॉर जियोजेनेटिक्स के निदेशक एस्के विलरस्लेव के अनुसार टीम के पास इंडोनेशिया के सम्बंधित मंत्रालय से अध्ययन करने की अनुमति थी और डेनमार्क नैतिकता समिति से भी नैतिक मंज़ूरी मिली थी। उन्हें यह बताया गया था कि मंत्रालय से मिली अनुमति में सभी स्थानीय अनुमतियां भी शामिल हैं। लेकिन वास्तव में टीम को इंडोनेशिया के एक नैतिक पैनल से भी अनुमोदन लेना चाहिए था; चिकित्सा विज्ञान शोध सम्बंधी अंतर्राष्ट्रीय दिशानिर्देश भी स्थानीय अनुमोदन की मांग करते हैं।

इस अध्ययन में शामिल रही इलार्डो ने मंत्रालय के साथ एक सामग्री स्थानांतरण समझौता भी संलग्न किया था। लेकिन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ रिसर्च एंड डेवलपमेंट, जकार्ता के अध्यक्ष सिस्वान्टो ने बताया कि टीम को मानव डीएनए के हस्तांतरण के लिए इस संस्था से मंज़ूरी लेनी चाहिए थी। इलार्डो का कहना है कि यह बात पहले ही बता देना चाहिए था।

इंडोनेशिया के संस्थानों ने उचित सहयोग की कमी, स्थानीय लोगों को शोध में न रखना, छोटे प्राइवेट संस्थानों के शोधकर्ता को शामिल करने जैसी समस्याओं का भी उल्लेख किया है। इन सब समस्याओं से विदेशी अनुसंधान को लेकर चिताएं झलकती हैं। भारत में भी कई विदेशी संस्थान शोध कार्य करते हैं। और कई बार ऐसी दिक्कतें सामने आती हैं। लिहाज़ा कोई प्रोटोकॉल बनाया जाना ज़रूरी लगता है। (स्रोत फीचर्स)

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मुंबई की आर्ट-डेको इमारतें विश्व धरोहर – जाहिद खान

किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति तथा सांस्कृतिक, प्राकृतिक व ऐतिहासिक धरोहर से होती है। यह धरोहर न सिर्फ उसे विशिष्टता प्रदान करती है बल्कि दूसरे देशों से उसे अलग भी दिखलाती है। हमारे देश में हर तरफ ऐसी सांस्कृतिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक छटाएं बिखरी पड़ी हैं। प्राचीन स्मारक, मूर्ति शिल्प, पेंटिंग, शिलालेख, प्राचीन गुफाएं, वास्तुशिल्प, ऐतिहासिक इमारतें, राष्ट्रीय उद्यान, प्राचीन मंदिर, अछूते वन, पहाड़, विशाल रेगिस्तान, खूबसूरत समुद्र तट, शांत द्वीप समूह और आलीशान किले।

इनमें से कुछ धरोहर ऐसी हैं, जिनका दुनिया में कोई मुकाबला नहीं। ऐसी ही अनमोल धरोहर दक्षिण मुंबई की विशेष शैली में बनीं 19वीं सदी की दर्जनों विक्टोरिया गॉथिक और 20वीं सदी की आर्ट डेको इमारतें हैं जिन्हें अब विश्व विरासत का दर्जा मिल गया है। युनेस्को की विश्व विरासत समिति ने हाल ही में बाहरीन की राजधानी मनामा में हुई अपनी 42वीं बैठक में विक्टोरिया गॉथिक और आर्ट डेको इमारतों को अपनी विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया है। एलिफेंटा और छत्रपति शिवाजी टर्मिनस स्टेशन के बाद मुंबई को यह तीसरा विश्व गौरव मिला है। इस घोषणा के साथ ही भारत में विश्व धरोहर स्थलों की सूची में 37 स्थान हो जाएंगे। यही नहीं, सबसे अधिक 5 धरोहर स्थलों के साथ महाराष्ट्र पहला राज्य हो जाएगा। ओवल ग्राउंड के साथ यह परिसर मियामी (अमेरिका) के बाद विश्व का एकमात्र ऐसा इलाका है, जहां समुद्र तट पर अन्य विक्टोरियन गॉथिक इमारतों के साथ बड़ी तादाद में बेहतरीन आर्ट डेको इमारतें मौजूद हैं। इनकी संख्या तकरीबन 39 होगी। युनेस्को के इस फैसले के साथ ही मुंबई की पहचान अंतर्राष्ट्रीय फलक पर और भी मज़बूती के साथ दर्ज हो गई है।

विक्टोरिया गॉथिक और आर्ट डेको इमारतों को विश्व धरोहर की फेहरिस्त में शामिल करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार बीते चार साल से लगातार कोशिश कर रही थीं। युनेस्को को प्रस्ताव तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने साल 2012 में ही भेज दिया था। कोशिश अकेली सरकार की नहीं थी, बल्कि इसमें मुंबई के नागरिक भी जुड़े हुए थे। सही बात तो यह है कि उन्होंने ही इसकी सर्वप्रथम पहल की थी। यूडीआरआई, काला घोड़ा एसोसिएशन, ओवल कूपरेज रेसिडेंट्स एसोसिएशन, ओवल ट्रस्ट, नरीमन पॉइंट चर्चगेट सिटिज़न एसोसिएशन, हेरिटेज माइल एसोसिएशन, फेडरेशन ऑफ रेसिडेंट्स ट्रस्ट, आब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन और एमएमआर हेरिटेज कंज़र्वेशन सोसायटी जैसे संगठनों ने इसके लिए जमकर मेहनत की और बाकायदा एक अभियान चलाया। युनेस्को की समिति जब इन स्थलों का दौरा करने मुंबई आई तो जानीमानी वास्तु रचनाकार आभा नारायण लांबा और नगर विकास विभाग के प्रधान सचिव नितिन करीर ने मुंबई का पक्ष मज़बूती से रखा। आभा नारायण लांबा ने मुंबई के दावे का शानदार डोज़ियर बनाया और चौदह साल तक लगातार कोशिश करती रहीं कि ये इमारतें विश्व धरोहर में शामिल हो जाएं। अंतत: ये कोशिशें रंग लार्इं और अंतर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल परिषद की सिफारिश पर विक्टोरिया गॉथिक और आर्ट डेको इमारतों को विश्व विरासत की फेहरिस्त में शामिल कर लिया।

विश्व धरोहर सूची में किसी जगह का शामिल होना ही ये बताता है कि उस जगह की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कितनी कीमत होगी। युनेस्को की सूची में शामिल होने के बाद निश्चित तौर पर मुंबई में पर्यटकों की संख्या और बढ़ेगी।

आर्ट डेको इमारतों की बात करें, तो ये इमारतें मुंबई के वास्तुकला का अलंकार हैं। आर्ट डेको इमारतें (बॉम्बे डेको) दरअसल, युरोप और अमेरिका में 1920 और 1930 के दशक में फैले स्थापत्य आंदोलन की देन हैं। दक्षिण मुंबई में चर्चगेट स्टेशन और मंत्रालय के बीच स्थित अंडाकार क्रिकेट ग्राउंड ओवल मैदान के नाम से मशहूर है। ओवल मैदान के दाहिनी ओर करीब एक ही शैली में कतार से आर्ट डेको या मुंबई डेको शैली में बनी 125 से अधिक इमारतें हैं। इनका निर्माण प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद साल 1920 से 1935 के बीच हुआ। उस समय मुंबई के नवधनाढ्यों द्वारा बनवाई गई इन इमारतों की शृंखला ओवल मैदान के किनारे तक ही सीमित नहीं रही। समुद्री ज़मीन पाटकर एक ही शैली की ये आर्ट डेको इमारतें मरीन ड्राइव पर भी बनाई गर्इं। ये आज भी नरीमन पॉइंट से गिरगांव चौपाटी तक खड़ी दिखाई देती हैं। इस शैली की इमारतों को विभिन्न वास्तुकारों ने डिज़ाइन किया था। आर्ट डेको इमारतों में रीगल सिनेमा, रजब महल, इंडिया इंश्योरेंस बिल्डिंग, न्यू एम्पायर सिनेमा, क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया, इंप्रेस कोर्ट, सूना महल, ओशियाना, इरोस सिनेमा और मरीन ड्राइव की कई रिहाइशी इमारतें शामिल हैं। कुछ आर्ट डेको इमारतें मुंबई के उत्तरी क्षेत्र में भी हैं।

ओवल मैदान के बार्इं ओर विक्टोरियन गॉथिक शैली की पुरानी बेहद खूबसूरत इमारतें हैं। इन इमारतों को सर गिल्बर्ट स्कॉट, जेम्स टिबशॉ और ले. कर्नल जेम्स फुलर जैसी हस्तियों ने डिज़ाइन किया था। इनका निर्माण ज़्यादातर 19वीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ था। फोर्ट क्षेत्र की विक्टोरियन शैली की इमारतों का वैभव चमत्कृत कर देने वाला है। इन इमारतों में मुंबई हाई कोर्ट, मुंबई विश्वविद्यालय, एलफिंस्टन कॉलेज, डेविड ससून लाइब्रोरी, छत्रपति शिवाजी वास्तु संग्रहालय, पुराना सचिवालय, नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, पश्चिम रेल मुख्यालय, क्रॉफर्ड मार्केट, सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज व एशियाटिक लाइब्रोरी और महाराष्ट्र पुलिस मुख्यालय प्रमुख हैं। 19वीं सदी की ये इमारतें ओल्ड बांबे फोर्ट की दीवारों से घिरी हुई थीं। बाद में दीवारें गिरा दी गर्इं, लेकिन इलाके के नाम के साथ फोर्ट शब्द जुडा रह गया। 11वीं सदी में विकसित युरोपियन शैली की इन इमारतों में गॉथिक शैली का वास्तुशिल्प है। इमारतों में लेसेंट खिड़कियां और दागे हुए कांच का भरपूर इस्तेमाल किया गया है, जो इन्हें बेहद आकर्षक बनाता है। मुंबई में हर साल आने वाले लाखों पर्यटक इन्हें देखकर कहीं खो से जाते हैं। 

युनेस्को द्वारा विश्व विरासत में शामिल कर लिए जाने के बाद कोई भी जगह या स्मारक पूरी दुनिया की धरोहर बन जाता है। इन विश्व स्मारकों का संरक्षण युनेस्को के इंटरनेशनल वर्ल्ड हेरिटेज प्रोग्राम के तहत किया जाता है। वह इनका प्रचारप्रसार करती है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पर्यटक इन स्मारकों के इतिहास, स्थापत्य कला, वास्तु कला और प्राकृतिक खूबसूरती से वाकिफ हों। विश्व विरासत की सूची में शामिल होने का एक फायदा यह भी होता है कि उससे दुनिया भर के पर्यटक उस तरफ आकर्षित होते हैं। अब केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार की सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वे दक्षिण मुंबई की इन शानदार इमारतों को सहेजने और संवारने के लिए एक व्यापक कार्य योजना बनाए। न सिर्फ सरकार बल्कि हर भारतीय नागरिक की भी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह अपनी अनमोल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को सहेज कर रखे। इनके महत्व को खुद समझे और आने वाली पीढ़ियों को भी इनकी अहमियत समझाए। एक महत्वपूर्ण बात और, जो भी विदेशी पर्यटक इन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को देखने आए, उन्हें यहां सुरक्षा, अपनत्व और विश्वास का माहौल मिले। वे जब अपने देश वापिस लौटकर जाएं, तो भारत की एक अच्छी छवि और यादें उनके संग हों। (स्रोत फीचर्स)

 नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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